2008-04-30

कुछ त्रिवेनिया .......

भरोसेमंद नही रहा उड़ान भरना इन दीनो
हर परिंदा डाल पर सहमा हुआ है ........

आसमान भी जात पूछकर रास्ता दे रहा



परिंदे तय कर लेंगे अपना सफ़र
मौसम की दीवानगी से वाकिफ़ है........
मुए "एरोपलेंन " ही होश खो बैठे है




कासिद बनकर आया है बादल
कुछ पुराने रिश्ते साथ लाया है .......
आसमान से आज कई यादे गिरेंगी


हर इतवार सवेरे उठकर मीलो पैदल चलता था
जेब मे छिपाकर मज़हब पहली पंगत बैठता था.........
हर इतवार अब्दुल पेट भर खाना ख़ाता था


रिक्शावाला .........

धौंकते सीनो से, पेशानी के पसीनो से
लड़ -लड़कर सूरज से जो जमा किया था.........

एक गिलास मे भरकर पी गया पूरा दिन













































2008-04-27

पाँच मंजिला ख्वाहिशों के दरमिया आधा दिन



दोपहर के सूरज भी अपनी दिहाड़ी करके जैसे सुस्ताने के मकाम पे था तब नॉएडा के ग्रेट इंडियन मॉल की बसेमेंट पार्किंग मे हम दाखिल हुए ,अन्दर घुसा तो ऐसा लगा उस   पांच मंजिला माल पे आपकी जुदा-जुदा  ख्वाहिशो को करीने से सजा कर रखा है..........लेडिस सेक्शन के किनारे पे एक कोफ़ी शॉप ..शीशे में चमकती पेस्ट्री ...मीनाक्षी शोपिंग में बिजी है  मैं ओर आर्यन वहां  कुर्सियों में बैठे है.. ,उन्ही कुर्सियों के पीछे किनारे पे दो सोफे पड़े थे ,जिन्हें शायद सुस्ताने के लिए रखा गया  है ,वे इस तरह से रखे गए  है की उस छोटी सी   कोफ़ी शॉप से थोड़ा बाहर  है .........,आर्यन ने दो मिन्टो मे मुझसे १५-१६ सवाल पूछे ओर तकरीबन उस पेस्ट्री को नकार दिया ,इसलिए मैंने सैंडविच का ऑर्डर दिया ओर इंतज़ार करने लगे ... फ़िर वो नजर आई ......पिंक ड्रेस मे ,नन्हें नन्हें पैरो मे आवाज करते हुए जूते पहनकर ,उन जूतों की आवाज पूरे शोपर स्टॉप मे गूंजती जब भी वो दौड़ती पर कानो को बहुत भली लगती ......गोरी चिट्टी ..बिल्कुल परी सी .उसके कंधे पे एक पानी की बोत्तल लटकी थी ओर माथे पे बिल्कुल नन्ही सी बिंदी ..एक दम बीचों बीच .वो आर्यन की तरफ़ बढ़ी ...."..मिष्टी "पीछे  से आवाज आई 
," लक्ष्मी मिष्टी को देखो "....
मैंने देखा ,एक उम्रदराज सी महिला ओर एक युवती ओर एक लगभग ३० -३५ के लपेटे मे महिला थी ,अंदाजा लगाया वही मिष्टी की माँ होंगी .उस किनारे पे रखी सोफे पे से एक १३ साल की दुबली पतली सांवले से भी कुछ गहरे रंग की एक लड़की उठी ओर मिष्टी को उठाकर गोद मे ले गई , ओर उसकी माँ के बराबर मे रखी खली कुर्सी पर उसे बिठा दिया मिष्टी की शरारती आंखो से ने जैसे आर्यन से कुछ बातें की ओर दो चार मिनट बैठने के बाद फ़िर उन्ही जूतों के परिचित से आवाज गुंजी ...
."मिष्टी " ...माँ ने फ़िर खीचकर बैठा लिया ,शायद तब तक उनका ऑर्डर आ चुका था वे कुछ खाने लगे थे .....लक्ष्मी तुम कुछ लोगी ?
उन उम्रदराज महिला ने उस १३ साल की लड़की से पूछा ....फ़िर उसका जवाब सुनने से पहले ही अपने प्याले को होठो से लगाकर बातचीत मे व्यस्त हो गई ..उस लड़की ने फुसफुसा कर कुछ अस्पष्ट सा कहा जो मेरी भी समझ नही आया ...कोफी अचानक कड़वी लगने लगी थी ..उसका एक घूँट भरकर .मैंने देखा मिष्टी अभी खाली प्लेट मे चम्मच बजा रही थी .....तीनो महिलाये बातचीत मे व्यस्त थी ,तभी वेटर मिष्टी का सैंडविच लेकर आया ....एक नजर अपनी प्लेट को देख उसकी आँखे सोफे पर गई ...".लक्ष्मी " उसने तोतले लफ्जों से पुकारा ,लक्ष्मी ने वही से उसे मुस्कान दी ."आराम से खायो ...."माँ ने अंग्रेजी मे हिदायत दी ,मिष्टी ने एक बार सोफे की ओर देखा फ़िर नीचे उतरी ओर अपनी सैंडविच वाली भारी सी प्लेट लेकर सोफे की तरफ़ बढ़ी ...."मिष्टी कम हियर"माँ ने पुकारा ...मिष्टी सीधी चलती हुई सोफे पे पहुँची .सोफा उसके कद से थोड़ा ऊँचा था,पहले प्लेट रखी......' मिष्टी कम हियर 'वापस वही आवाज ...मिष्टी ने अपने नन्हें पैर उचके ओर लगभग कसरत सी करती हुई सोफे पे चढ़ गई ..प्लेट मे से एक सैंडविच उठाया लक्ष्मी की दिया ओर एक अपने हाथो मे पकड़ खाने लगी....लक्ष्मी सहम गई थी ..'.खायो -खायो"मिष्टी ने लक्ष्मी से कहा फ़िर आर्यन की ओर मुस्कराते देख खाने लगी...






2008-04-21

एक दिन अचानक

जब एअरपोर्ट के बाहर प्रशांत ने गाड़ी रोकी तो मैं उससे गर्मजोशी से गले मिलना चाहता था पर पीछे गार्ड की सीटिया बजने लगी तो हम दोनों ने मुस्कराते हुए हाथ मिलाया , प्रशांत मेरा सहपाठी था फिलहाल मुम्बई मे नेत्र रोग विशेषग के तौर पे प्रक्टिस कर रहा है ... दिसम्बर का महीना था ,पर मुम्बई मे मौसम महीनों की बात नही मानता है ।मेरे साथ देहरादून के एक डोक्टर थे गहरे मित्र नही थे पर हाँ इस तरह की कांफेरेंस मे अक्सर मुलाकात के बाद बेतकल्लुफ जरूर हो गए थे ,हमउम्र थे इसलिए एअरपोर्ट तक वे भी साथ आए थे ,हमे delhi आना था,पर उनकी flight इंडियन एयर लाइन से थी तो वे भी अपनी clearing के लिए अलग हो गए ,मैंने घड़ी देखी सवा घंटा बाकी था ,सन्डे होने की वजह से शायद ट्रैफिक उतना नही मिला था इसलिए उम्मीद से पहले पहुँच गए थे ।साडी औपचारिक ताये निपटा कर हमने कुछ अखबार ओर कुछ किताब खरीदने की सोचे ,एक अखबार लेकर हम किसी सीट की जुगाड़ कर बैठे अखबार मे घुस गये. "अनुराग ये तुम हो ?...आवाज सुनकर हम पलटे तो मुस्कराती हुई ,शर्ट जींस ओर कोट मे एक लेडी थी ,पहचानने की कोशिश मे मैंने अपने दिमाग के सारे घोडे खोल दिये॥नही पहचाना ....चेहरा कुछ जाना पहचाना सा लग रहा था पर...... "शशि " याद है ......शशि .......हरियाणा के जींद की वो दुबली पतली सी छोटी सी लड़की ,पूरी बांहों का सलवार कुरता पहने हुए ,हमेशा कोई जर्नल हाथ मे लिए हुये .आंखो मे एक अजीब सी परेशानी ओर बाल बिल्कुल चिपके हूए ... हम्म्म गाँव वाली लगती है ...चंडीगढ़ से आई हुई गोरी गोरी स्लीव लेस पहनने वाली वो लड़की अपनी सहेलियों से कहती ...तब हम कुल जमा ८ लोग थे जो सीबीएसई के अल इंडिया एक्साम से सूरत भेजे गये थे ,ओर मेरे ओर जाट के अलावा सारी लड़किया थी ,जिनमे एक हट्टी कट्टी सरदारनी थी ओर २ बिल्कुल शहरी ओर २ की सूरत हमने नही द्खी थी ,रही एक बेचारी निरीह गाय सी ये लड़की ...पिता जी के मातहत कम करने वाले किसी कर्मचारी की रिश्तेदारी मे थी इसलिए हमसे कहा गया कि उनका ध्यान रखे ....अलबत्ता उस वक़्त हम ख़ुद किसी स्थिति मे नही थे ,हॉस्टल अलौट नही हुआ था ओर मुझे ओर जाट को एक सरदार ओर उसके रूम पार्टनर के रूम मे फिलहाल किसी शरणार्थी कि तरह रात गुजरनी पड़ती थी ,जिसमे कि ये बताया गया कि सरदार के साथ रहने वाला चुपचुप गम सुम गोरा सा घुंघराले बालो वाला अंग्रेजी दा लड़का "होमो " है ,इसलिए सारी रात हम जागते हूए काटते (अलबत्ता बाद मे मालूम चला कि वे साहब १४४ i. q वाले निहायत ही सीधे सादे बन्दे है जो अपने मे फक्कड़ हाल मे रहते हूए मस्त रहते है ओर ये सब हमे यानि कि नए नए मुर्गो को डराने के लिए फैलाया गया षड़यंत्र था ) इन बातो का जाट पर तो कोई असर नही पड़ता ,पर हम अगर बाथरूम जाने के लिए भी उठते तो डर डर के ....तब हमारे पास एक बिस्तर बंद था जिसकी इजाजत सरदार जी ने अपने रूम मे लाने कि नही दी थी सो हमने इन्ही शशि के रूम मे रखवा दिया था चूँकि लड़कियों को रूम मिल गये थे .हर सुबह हमे स्टू डेंट सेक्शन के उस खडूस क्लार्क से जिराह्बजी ओर मिन्नत करनी पड़ती जिसे गुजरात से बाहर आए हूए हर सतुदेंट से कुछ खास खुन्नस थी ,हमारे कागजो मे वो रोज एक कमी निकाल देता ओर रोज हमे यूनिवर्सिटी के कई चक्कर काटने पड़ते ....रोज सुबह जब हम इन शशि के पास अपने बिस्तर-बंद से समान लेने जाते "क्लास मे नही आयोगे ? नही यूनिवर्सिटी जाना है ॥खैर हम टुकडों टुकडों मे क्लास attend करते ..कभी कभी केन्टीन मे उन हाई-फाई लड़कियों कि संगत पा लेते जिनके महंगे महंगे ड्यू कि महक अक्सर मेरी चाय मे घुल जाती ....तब शशि अक्सर लंच टाइम मे किसी जर्नल या नोट्स मे उलझी रहती ......उसके बालो ओर पहनावो पर वे अक्सर कमेंट मारती,हाँ अलबत्ता वो लम्बी चौडी सरदारनी जरूर खामोश रहती ओर शशि से भी कई बार बतियाती मिलती ....."मैं यहाँ नही रहने वाली...मैंने दूसरे स्टेशन के लिए अप्प्लिकेशन दे दी है....मुझे गाँव वालो के साथ नही रहना .....वो चंडीगढ़ अक्सर यही कहती मिलती....तुम परेशां न हो मैं तुम्हारी जर्नल पूरी कर दूँगी ?शशि को लगता मैं पढाई कि वजह से परेशां हूँ....बातो बातो मे उसने बताया कि हरियाणा का मेडिकल का रिजल्ट अभी आना बाकी है शायद उसमे उसका सेलेक्शन हो जाये.... एक हफ्ते मे हमे हमारा रूम मिल गया ,मैं ओर जाट रूम पार्टनर बन गये ....पहले ३ दिन तोमे सोता ही रहा ......फ़िर ख़बर आयी कि ४ लड़किया वापस जा रही है ,चंडीगढ़ वाली "सेक्सी" भी (जाट उसे इसी नाम से बुलाता था ) ओर शशि भी ,उसका सेलेक्शन हरियाणा मे हो गया था इसलिए वो भी जा रही थी .....तुम इन जर्नल को अपने पास रख लो ....ओर इन नोट्स को भी.....मैं बस २ मिनट के लिए उससे मिला था ,उसके पापा उसके साथ थे........

ओर आज १८ साल बाद
॥थोड़े मोटे हो गये हो ?कुछ बाल भी उड़ गये है ?उसने कहा तो मैंने मुस्करा के अपनी बालो को माथे पे खींच लिया ...बातो बातो मे पता चला कि वो आजकल अमेरिका मे है ,किसी रिसर्च फेल्लो शिप मे जुड़ी हुई ,वाही एक साउथ इंडियन से मुलाकात हुई ओर दोनों ने शादी कर ली ...फिलहाल छुट्टियों मे घर आयी है ....उसका कांफिडेंस,बातचीत करने का अंदाज ,हाथ की स्टाइलिश घड़ी कितना बदल गया है पर उसकी आंखो मे वो सच्चाई ,मासूमियत ओर गर्मजोशी अभी तक वही थी.... तब तक मेरी flight का टाइम हो गया था ,हमने सम्पर्क सूत्र लिए ....ओर मैं उससे विदा लेकर अपना बेग उठा कर आगे बढ़ा ....पीछे मुड़कर उसे देखा तो बुदबुदाया .....
पता नही सेक्सी कहाँ होगी ?

2008-04-18

नन्हा शायर


रोज़ लिखता है कई
ख़ूबसूरत नज़्म
तोतले हर्फो से बदलता है
हर लफ्ज़ के माने,
खीच कर लाता है
कई सोयी हुई ख़वाहिशे
ओर जगा कर उन्हें
उडेल देता है
वक़्त के सफ्हे पर
रात को लौटकर जाता हूँ जब मै .......
जहा-तहाँ बिखरी रहती है
बेतरतीब सी
कुछ मुस्कराती ,
कुछ रूठी
कुछ शिकायती नzमे
ओर
उन नzमो के बीच
घुटने मोड़
थका हुआ सो रहा होता है
मेरा नन्हा शायर





पिछले दो दिनों से मेरे छोटू को "चिकन पोक्स "निकल आया है,ये चिकन पोक्स क्या होता hai पापा ? वाही जों होम होम अलोन मे उस बच्चे को हुआ था ,अच्छा मेरा छोटू समझ जाता है ,उसके ४ साल के कोल्लेक्शन मे बहुत मूवी है ,जिन्हें न जाने ढेरों बार ,अनेको बार मैं भी देख चुका हूँ ओर सच बताऊँ तो कई बार मैं भी बेहद दिलचस्पी से उन्हें देखता हूँ...ओर हैरान होता हूँ बनने वाले की कल्पना शीलता का ,निमो.....एक ऐसी मूवी है जिसका एक एक dialogue मुझे याद है ,ice-age के दोनों पार्ट मैं मजे से देखता हूँ, ओर न जाने कितनी .."आपके पास बचपन मे कितनी cd थी पापा?'देर रात उसे नींद नही आ रही थी तब उसने ये सवाल पूछा ? मैं झूठ मूठ कुछ नम्बर बताता हूँ ....उसे नही कह सकता की बेटे तेरे बाप ने cd प्लेयर २४ साल की उम्र मे आकर देखा है ...तब तो हमारे पापा भी कट्टर आर्यसमाजी होने के कारण ओर कुछ आत्मनिर्भर होने की वजह से अनुशासन प्रिय थी ,ओर जब मैथ्स पड़ने बैठते थे हम बिना पिटे नही उठते थे .शायद इसी कारण से हमने मैथ्स से खुन्नस निकलते हुए एक उम्र मे जाकर biology ले ली....ओर पढते- पढते जब देर रात हो जाती ,हम चोक से दरवाजे पर लिखते की हम फलां बजे सोये है तो फलां बजे तक न उठाना ,..हमारी माँ बेचारी झगड़ती रह जाती पर पापा हमारे किसी न किसी बहाने कोई शोर वाला काम करके मुझे उठा ही देते .....तब बहुत झुंझलाहट होती थी अलबत्ता बाद मे लगा की ये सब जरूरी था .....हमे उस वक़्त केवल चित्रहार देखने की आजादी थी ,ओर रविवार की सुबह रंगोली ओर महाभारत ...हाँ किताबे पढने के लिए कभी नही रोका ,अलबत्ता माँ चलते वक़्त जेब मे कुछ ओर पैसे डाल देती की वो पैसे तो तू किताबो मे खर्च कर देगा इससे खा लेना ... दुनिया के सारे बच्चे चद्दर नही ओढ़ते ,दूध नही पीते ,ओर बहुत सारे सवाल पूछते है .....अहमद फराज की एक नज़मो की किताब मुझे मेरे दोस्त ने गिफ्ट की है . उसके बाबा उसे देखने आए है उसके लिए वो कोई    सी .डी लेकर आए है "बड़े होने पर किताबे गिफ्ट मे मिलती है ?वो उनसे सवाल पूछता है ....वो उसे कोई गोलमोल सा जवाब देते है .....उसके "सुबह इसे जल्दी मत उठाना ।देर तक सोने देना "पापा मुझसे कहते है .....पापा भी बदल गए है मैं सोचता हूँ...


2008-04-16

तजुरबो का एक ओर दिन.....


पहला तजुर्बा

(1)रोटी दाल की फ़िक्र मे गुम गये
मुफलिसी ने कितने हुनर ज़ाया किये



दूसरा तजुर्बा

(2)अहले-सियासत का इन दिनों कुदरत मे दख़ल देखिये
फ़सादो का मौसम भी अब हर साल आता है


तीसरा तजुर्बा

(३)कुछ काँटो से चुभते है
सब रिश्ते गुलाब नही होते


चौथा तजुर्बा

(४)अपनी हथेलियो को आज खोले बैठा है
रोज़ पढ़ कर जो बताता था सबका मुक्कद्दर
अब चलते चलते ........
मीडिया परेशां है की प्रियंका गाँधी नलिनी से क्यों मिली ?हर चीज़ मे राजनीति छिछोरी लगती है .एक मूवी देखि थी जिसमे एक औरत अपने पति के हत्यारे से मिलना चाहती है ओर उससे से मिलकर उसकी नफरत ओर ghrna उस व्यक्ति के लिए कम हो जाती है ,ये प्रियंका का एक बेहद निजी मामला है,जिसमे मीडिया ओर बाकि राज्नातिक पार्टियों को अपने कयास नही लगाने चाहिए .....सुना है कि मल्कोम स्पीड साहेब को कानपूर कि पिच से परेशानी है ,जरूर होगी साहेब ,ऑस्ट्रिलिया ओर साउथ अफ्रीका कि पिचो से कभी नही होगी ,टी. वी वाले रखी सावंत को फ़िर फुटेज दे रहे है.......चाय ठंडी हो रही है ...सो पी लेते है.......पता नही कल का दिन कौन से तजुर्बे लेकर आये? ओ आस्मान मे रहने वाले भगवन ......चाय वाय पीते हो या नही ?ब्रेक नही लेते क्या?

2008-04-15

कभी कभी


कभी कभी मन करता है
होस्टल के उस कमरे मे
वापस -जाऊँ
वहाँ जहाँ -तहाँ
बिखरे लम्हों को
ठूंस ठूंस कर
अपनी जेबों मे भर लाऊँ
कुछ सिगरेट के ,
कुछ कागज के टुकड़े
उठा लाऊँ
कुछ आँसुओ से,
कुछ मुस्कानों से
अपनी हथेलिया भर आऊँ
यार मेरे मैं लौट जाऊँ

वो अल्ल्हड़ दिन, वो बेफिक्र शामे
दोस्ती की उन लम्बी रातो को
आसमां के सीने से खींच लाऊँ
सीडियों के पास  मिलेगी गिरी हुई
टेनिस की कुछ गेंदे ,
वोलिवोल के उस मैदान की
मिटटी उठा लाऊँ
यार मेरे मैं लौट जाऊँ

हर कमरे मे
है कुछ अधूरी दास्ताँ
कुछ देर ठहर ,सबसे मिल आऊँ
फेफ्डो मे वो हवा भर लाऊँ
कोने के उस पनवारी का
केन्टीन का बिल...... चुका आऊँ
यार मेरे मैं लौट जाऊँ

लौकर रूम के तालो मे
रखे है कुछ अधूरे ख़त ,
उन्हें उठा लाऊँ
उसका भी
दिल धड़कता होगा कभी
बचपन के उस प्यार से
मिल आऊँ
यार मेरे मैं लौट जाऊँ

बिन चिटकनी वाले
उस बाथ- रूम मे नहा आऊँ
जिस्म पे पड़ी
समय की ये गर्द उतार आऊँ
इस तनहा रईसी से
उन दिनों की
मुफलिसी खरीद लाऊँ
उन रस्तो, उन मोडो पे
इस दुनियादारी को फेंक आऊँ
इस बेहिस दिल को छोड़
बचपन के उस दिल को
उठा लाऊँ
सो गयी है मेरी रूह
आओं उसे जिला लाऊँ
यार मेरे मैं अब लौट जाऊँ










उन दिनों  को  जब वक़्त के पायदान   में दोस्ती   फेरहिस्त   में सबसे ऊँची थी ....जब हर हसीन से इश्क  हो जाता था ....ओर इश्क का समंदर    मीठा हुआ करता  था ....जब आसमां इतना छोटा  था के उचक कर छू ले ....उन दिनों को ....... जब जिंदगी की बड़ी  बड़ी मुश्किलें एक बंटी  सिगरेट ओर आधी प्याली चाय में डूब जाती थी ....जब दुनिया    के चारो ओर सिर्फ  एक चाहरदीवारी थी ....एक सीमा  रेखा .. ..    उन दिनों को..... जब  वक़्त के किसी मोड़ पे ठहरा नहीं जाता था .....जब कच्चे उधडे  रास्ते डराते नहीं थे ....   ..जब राते अपनी हथेलियों में फलसफे लिए होस्टलो में दाखिल  होती  थी ......जब राते दिन से  छोटी   थी .... जिंदगी तब रूमानी थी .....

2008-04-12

चंदन को .....

इन्ही सर्दियों मे .....बांदा (u।p) मे एक रिक्शेवाले ओर उसकी पत्नी ने अपने दोनों बच्चो को मुफलिसी ओर भुखमरी की वजह से किसी ऐसे इंसान को बेच दिया जिसको औलाद की चाह थी ,मीडिया मे ख़बर छापी ,प्र्शशासन सचेत हुआ ,हो हल्ला मचा ओर फ़िर आखिरकार शहेर के डी।म के आदेशानुसार बच्चो की बरामदगी तुरंत-फुरांत हो गई ,कड़ाके की ठंड थी ,असली माँ बाप कलपे की नही पाल सकते .....खैर रात भर ४ महीने का नन्हा बच्चा अपनी माँ के साथ उस कड़ाके वाली ठंड मे पूरी रात थाने मे रहा ओर दुर्भाग्य से उसने न्युमुनिया पकड़ लिया.....अगली सुबह तक उसने दम तोड़ दिया ... मैं नही जानता की इश्वर के कौन से पैमाने है ?या कोई पैमाने भी है या नही.... उसका नाम चंदन था .....उसी पर कुछ त्रिवेनिया लिखी थी ........

(1)तजुर्बे के अपने मानी है
सारी रात अकेला लड़ा वो........

ज़िंदगी से पहली जंग थी

(२)
इक इक साँस की जद्दो-जेहद
फेफड़ो ने भी क़बूल किया अब....

मुफलिसी से बड़ा जुर्म नही कोई?

(३)एक नन्ही जान ने आवाज़ दी
रात भर कई दुआ आवारा फिरी.....

कल तू कहाँ था खुदा?


किसान कही के भी हो कर्ज लेने के बाद आत्महत्या का रास्ता अपनाते है,उसी रात अगली ख़बर NDTV पर इसी विषय मे थी..... उसी पर ये त्रिवेणी

सफ़ेद चादर ऑड हँसता है
बहुत बड़ी "चीटिंग "कर गया.....
मुर्दे कभी क़र्ज़ नही देते

2008-04-11

अपने बेटे के लिए

ईट पत्थरो की इस दुनिया मे
रोजमर्रा की आज़माइशो से
उबकर
किसी शब जब
अपनी आँखे बंद करता हूँ ,
कोई नज़्म मेरी जनिब हाथ बढ़ाती है
मैं नज़्म का हाथ पकड़
ख़्यालो के जीने दर जीने
आहिस्ता- आहिस्ता उतरता हूँ
कुछ लफ़्ज़ो से गुफ़्तगू करता हूँ
कुछ मायनो से उलझता हूँ
उन्हे सिलेवार लगाने की कशमकश करता हूँ
तभी तुम
जीने के दरवाज़े से
मुझे आवाज़ देते हो
मैं तुम्हारा नन्हा हाथ पकड़कर
वापस इस बेहिस दुनिया मे
दाख़िल होता हूँ
ज़िंदगी मुस्कराती है
सच मानो.........
ये दुनिया ख़ूबसूरत हो जाती है









कई दिनों पहले ये नज्म उसी के लिए लिखी थी जब मैं इन्ही नज़मो मे उलझा हुआ था ओर वो मेरे साथ खेलना चाह रहा था ,आप क्या पढ़ रहे हो ? उसने मुझसे पूछा .मैंने कहा "नज्म"उसने दुहराया जब ये शब्द तो यकीन मानिये मुझे इससे पहले नज्म शब्द इतना अच्छा नही लगा । अब भी कभी किताबो की दूकान मे जब मैं कुछ किताबे देखता हूँ तो वो पूछता है नज्म की किताब है ? वैसे ये नज्म मैंने प्रवीण शाकिर जी के किसी ख्याल से प्रेरित होकर लिखी है ....

2008-04-08

दस्तक ?


जब किसी रोज दोपहरी मे
तीन चार बूंदे खिड़की से छलांग लगाकर
इन कागजो ओर चेहरे पे
अचानक आ गिरती है,
हवा भी खिड़की के दरवाजे से
लटक कोई शरारत करती है
खिड़की पे टंगा बादल
चिल्लाकर कहता है
"छोड़ो ये गमे- रोजगार के मसले,
छोड़ो ये रोजमर्रा के बेहिस फलसफे ,
छोड़ो ये खामोश मेज ओर कुर्सी
फेंको ये जहीनीयत का लिबास ......."
खिड़की से
...उफक की ओर अपना बस्ता थामे
भागते सूरज को देख
मैं भी सोचता हूँ ...........

चलो यूं करे यारो
"उन्हें "एक "मिस कॉल" दी जाये

2008-04-02

यूं ही

जब किसी शाम
तेज बारिश मे ,
किसी शेड के नीचे ,
तुम अपना दुप्पटा
सर से ढके
शरीर हवायो से
जूझती नजर आती हो
तब एक ही बात सोचता हूँ
कि
इश्क के मौसम मे......
ये बरिशे कितनी लाजिमी है

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