2008-07-28

हर परिंदा डाल पे सहमा हुआ के आसमां भी जात पूछकर रास्ता दे रहा


किसी घर के किसी बुझते हुए चूल्हे में ढूंढ उसको
जो चोटी ओर दाढ़ी तक रहे ,वो दीनदारी क्या -
निदा फाज़ली



उन दिनों सेकंड क्लास में बतियाते ,गप्पे हांकते १८ -२० घंटे हम यार दोस्त गुजार देते थे ,अक्सर टोलियों में चलते थे .सिगरेट से फेफडे जलाते ओर गाना गाकर गला बैठा लेते ....दिल्ली सुबह आता था ...नई दिल्ली उतरकर एक दूसरे से गले मिलते ..पंजाब ,हरियाणा वाले वापस डब्बे में चले जाते ,दिल्ली वालो के साथ हम ऑटो पकड़कर बस अड्डे पर....

पश्चिम एक्सप्रेस टाइम पर थी ,बस अड्डे तक पहुँचते पहुँचते १२ बज गये,थकान इतनी नही होती थी पर घर पहुचने की जल्दी जरूर होती थी ...दिल्ली से मेरठ का रास्ता चुभता था ..मेरठ वाली तख्ती के नीचे हम ५ मिनट खड़े हुए,दो बस गुजरी ,लोग भागे .ओर टूट पड़े .भीड़ देखकर .हमारी हिम्मत नही हुई . . सोचा अगली से चल देंगे....१० मिनट गुजरे कोई बस नही आयी...खैर एक बस पर मेरठ लिखा देख हम भी लपके .किसी ने सामान खिड़की से फेंका ,कोई पहले चढा तो रुमाल सीट पर रखकर हमें इत्तिला कर दिया की रिज़र्व है..आगे बढे दो लोगो की सीट पर जींस टी शर्ट में एक लड़की बैठी हुई थी ,कानो में वाकमैन की तारे ओर आँखों में चश्मा ..हम एक मिनट हिचकिचाये,इत्ते में पीछे वाले एक भाईसाहब अपना बैग पीछे से ही सीट पर धकेलने लगे तो हम बैठ गये ....दो चार मिनट गुजरे ओर लोगो का आने का सिलसिला जारी रहा ..हमसे ठीक आगे की सीट पर .कंडक्टर कानो में पेन्सिल दिये,कंधे पे बैग रखे 'मेरठ- मेरठ' का शोर मचा रहा था...पीछे मुड कर देखा तो सारी सीट फुल थी ..फ़िर किस बात का शोर मचा रहा है . एयर बेग को सीट के नीचे खिसकाया ..बस अड्डे से बाहर निकलते ही ड्राईवर ने फ़िर बस रोकी ,एक रेला भीड़ का चढा …ओर पूरी बस खड़े बैठे लोगो से भर गई ,एक तीखी सी गंध नथुनों में घुसी तो देखा एक 45-50 साल की शरीर से थोड़ा भारी औरत पूरी बाजू की सफ़ेद शर्ट जिसके बटन बंद थे उसके साथ एक मटमैली सी साड़ी पहने एक हाथ में कोई थैला दबाये ओर दूसरे में टीन का कनस्तर थामे थी उसके साथ कोई 4-5 साल की एक सांवली सी लड़की थी , पिंक कलर के फ्राक में ,बाल लगभग मुंडे हुए फ़िर भी बहुत प्यारे नैन नक्श लिए हुए थी .अपनी दादी (शयद दादी ही थी) की धोती को पकड़े ,इधर उधर ताकती हुई ,बस के हिचकोलों से इधर उधर झूलती सी ..एक अजीब सी कशमकश शुरू हुई थी कि इस बच्ची को बिठा लूँ ?या नही ?कुछ देर गुजरने के बाद जब कंडक्टर ने टिकट के आवाज लगानी शुरू की , लोगो के बार बार आगे पीछे होने कि वजह से उंघती बच्ची को परेशान देखकर ...मैंने बच्ची को इशारा किया .लेकिन बच्ची के साथ दादी भी आयी ओर गोद में लेकर बैठने लगी ..दो लोगो की सीट सो मरता क्या न करता अब खिसकाना लाजिमी था उस तरफ़ थोड़ा सा खिसका ही था कि बराबर वाली ने डपट दिया . " व्हाट इस् यूर प्रोब्लम मेन ?मै खड़ा हो गया .....३०-४० मिनट तक सिरके की गंध अपने फेफडो में भरता रहा ...कंडक्टर ने आवाज लगायी ....मोहन नगर वाले .......लड़की उठी ओर मुझे घूरती हुई उठ खड़ी हुई....मैंने अम्मा जी को उधर खिसकने को कहा ओर बैठकर आँखे मूँद ली .....की चलो अगला एक घंटा तो थोडी तसल्ली से कटेगा ..ऐ .लाल्ला तम् कौन हो ?मैंने आँखे खोली ..".मै समझा नही' ?मैंने अम्मा जी से पूछा ....मतलब थारी बिरादरी कौन सी है ? .बमाहन ,के बनिया ?


जब कभी भ्रम होने लगता है की सामजिक परिवेश बदल गया है ,कुछ वाक्यात इसे तोड़ देते है ,आर्यसमाजी परिवार से हूँ इसलिए दोनों भाइयो के नाम के आगे आर्य लगा हुआ है ,आज से तकरीबन ५ साल पहले मेरे क्लीनिक में एक साहेब धड धडाते घुस आये,उनके "अफसरशाही इगो" को दो चार मिनट का इंतज़ार बर्दाश्त नही हुआ (वे साहेब एक I.A.S ऑफिसर थे ),मेरे एक सीनियर डॉ के खासमखास थे ओर कुछ देर बाद मुझे एक procedure करना था इसलिए हम चुप लगा गये,उन्होंने अपनी wife को दिखाना था ,कुछ सवाल जवाब पूछने के बाद जब मै प्रेस्क्रिप्शन लिखने लगा ... बोले डॉ साहब आप कौन हो ?मैंने ऊपर से नीचे तक उन्हें देखा ,साले फीस के रुपये देने में जान जा रही है ओर उम्मीद ये भी लगाए बैठे है कि डॉ साहेब सैम्पल की कोई ट्यूब भी पकड़ा दे ...आपने डॉ साहेब से नहीं पूछा था क्या ?मैंने प्रेस्क्रिप्शन लिखते लिखते हुए कहा ...वे खिसिया गये ..नहीं डॉ साहेब दरअसल हमारे यहाँ कई तरह के लोग आर्य लिखते है "मन तो चाहा की . पूछ लूँ की अगर" वही "होता तो क्या प्रेस्क्रिप्शन फाड़ देते ?पर मुह पर एक मुस्कान चिपका कर मैंने उन्हें विदा कर दिया .......वे भारत की सबसे बड़ी प्रशासनिक सेवा में प्रतियोगिता से चुने गये एक योग्य व्यक्ति थे ,पर अपनी मानसिकता नही बदल पाये थे
मैंने ढेरो ऐसे लोगो को देखा है जिनकी शेल्फ बड़ी बड़ी किताबो से भरी है जो ढेरो ज्ञान इधर उधर बांटते है ,जिनकी व्यवहारिकता ओर वाक्पटुता के लोग कायल है ,जो समाज के बड़े खम्बो में से एक है पर जहाँ बिरादरी की बात आती है ,वे एक साधारहण आदमी हो जाते है ......


अंत में इस पोस्ट के लिये अभिषेक को खास शुक्रिया जिन्होंने मुझे टेबल बनाने में मदद की ...

2008-07-26

हम जीने की हमेशा तैयारी करते है जीते नही ...


जिंदगी में हमारी सबसे बड़ी ग्लानि हमारे द्वारा किये ग़लत काम नही अपितु वे सही काम होते है जो हमने नही किये
- आज सुबह ९.१५ मिनट पर मेरी दोस्त डॉ प्रिया का एस .एम्.एस

कैंसर diagnose होने से तीन महीने पहले का चित्र 

स्ते वैसे ही है बस आस पास ऊँची इमारतों ने सूरज का रास्ता रोक लिया है ... ऐसा लगता है ये शहर अब आसमान से बातें करता है..५ साल बाद उस शहर में आया हूँ जो अब भी मेरी रगों में दौड़ता है पर पाँच साल इस शहर को जैसे अपने साथ आगे ले गये है ..मै ओर जाट अपार्टमेन्ट में गाड़ी पार्क करते है ..दसवे फ्लोर पर घर है ,लिफ्ट तक जाते जाते जाट का मोबाइल बज गया है जिग्नेश का फोन है ...आधे घंटे में पहुँच रहा है.....खाना घर पे खाना है ...वो कहता है ..घंटी बजते ही अंकल दरवाजा खोलते है ..पैर छूने झुकता हूँ तो सीधे गले लगा लेते है .....कुछ सेकेंड तक गले लगा कर रखते है....."अरे आंटी आप तो जरा भी बूढी नही हुई "मै आंटी से पैर छूते हुए कहता हूँ तो वे मुस्कराती है....सोफे पर बैठा हूँ तो दीवार पर नजर जाती है...सामने कृपा की तस्वीर है.....मुस्कराती हुई....

मूमन कम बोलने वाली वो लड़की हमेशा आगे बैठी नोट्स लिखती मिलती या एनाटोमी dissection हॉल में किसी को कुछ समझाती .... ओर छोटी छोटी बातो को खुश होकर बताती ..हमारे ग्रुप में सबसे सीधी ..मेरे गुजराती उच्चारण को .हमेशा ठीक करने की कोशिश करती ओर जाट की हरियाणवी पर अक्सर उलझती ,उसके मासूम से सपनो में से एक सपना अक्सर रहता ....नयूरोलोजिस्ट बनने का जिंदगी मगर कई तह में है धीरे धीरे खुलती है

दो भाई बहनों में बड़ी ,माँ की लाडली ,माँ की आँखों से सारे सपने जैसे उसकी उसकी आँखों में सिमट आते ..छोटी छोटी खुशियों को सहेजती ओर घडा भरती ....मुझे याद है . कॉलेज के function मे DEBATE पर बोलते बोलते वो पहली बार जब ब्लेक आउट हुई थी हमने इसे नर्वस नेस समझ मामूली घटना की तरह नजर अंदाज किया था .,कुछ दिनों बाद उसने जब अपने कंधे मे दर्द की बात की तो हम सभी ने इसे भी हँसी-मजाक मे टाल दिया ......फ़िर सी .टी स्केन...फ़िर biopsy......कागज का एक टुकडा ..
Ewings sarcoma “of scapula १ लाख लोगो मे १ व्यक्ति को होने वाला कैंसर .....पूरा परिवार थम गया ...२० साल की वो लड़की ...रातो रात बदल गयी ....जसलोक हॉस्पिटल जाने से पहले मिली ..कही कोई घबराहट नही ,शांत खामोश ...बस इतना कहा "एक चक्कर लगाना पड़ेगा ब्लड ग्रुप ओ वालो को....मैंने सर हिलाया

बॉम्बे जसलोक हॉस्पिटल .,AMPUTATION ..(..पूरा हाथ काटना) एक आप्शन रखा गया ......पिता जैसे टूट गये थे .माँ खड़ी रही चट्टान की तरह अपनी बेटी के साथ .....कभी पलक गीली नही देखी मैंने ..पिता कई बार फूट पड़ते ....माँ ने ढेरो डॉ से बातें की कभी टाटा ,कभी अहमदाबाद ..ढेरो डॉ से मुलाकाते ...,ढेरो किताबे पढ़ी ...क्या बिना हाथ काटे ऑपरेशन हो सकता है ?हाँ इंग्लेंड के एक डॉ ने कहा ...जसलोक हॉस्पिटल में ऑपरेशन हुआ ...महीनो अस्पताल में रेंगते से गुजरे ...वापस आयी....


chemotherepy के दौरान लिया गया फोटो ( ४ बेस्ट फ्रेंड) 

 chemotherepy का दौर ओर उसके साइड एफ्फेक्ट्स....... पर वो जीवट थी ..विग पहनकर कॉलेज आती अब भी आगे बैठती ,कभी इस मुद्दे पर कोई बात नही ,जब हमारा ग्रुप कैंटीन में खामोश बैठता जाट को छेड़ती"क्यों तुम्हारे हरियाणवी चुटकले ख़त्म हो गये ?जिस दिन उसकी chemothrepy की लास्ट डोज़ हुई ,उसके एक हफ्ते बाद हम सब मिलकर लॉन्ग ड्राइव पर समंदर पे गये ....वहां समंदर के किनारे खड़े होकर उसने फ़िर कहा "देखा मै neurologist बनकर रहूंगी ".......
ऐसा प्रतीत हुआ जैसे गम के साये धीरे धीरे धुंधले पढ़ रहे है ,हम सभी दोस्त फ़िर अपनी अपनी जिंदगी मे मुड़ने लगे ..... लापरवहिया फ़िर सर उठाने लगी ...सपने दुबारा उठ कर खड़े होने लगे ...एक रूटीन सी टी स्केन .....कैंसर शरीर में फ़ैल गया था ....मेटास्टेसिस ..... उस उम्र मे जब जिंदगी दुबारा अच्छी लगने लगे सपने रोज आपके बिस्तर के सिरहाने पड़े मिले ,एक कागज का टुकडा फ़िर आपको इत्तिला दे की आपके सपनो की मियाद इतनी ही थी ....सच जानिये बड़ी बड़ी बाते किताबो मे पढ़ना ,ओर दूसरो को दिलासा देना बेहद आसान है पर ख़ुद उन रास्तों पर गुजरना बेहद मुश्किल....

उसके बाद मुश्किलों के दिन गुजरे ,....याददाश्त खो देना ,कभी हॉस्पिटल ,कभी आई सी यू के चक्कर ,हर रात एक कशमकश ,हर रात उधार की साँसे ......एक साधारहण इन्सान अपनी हठ ओर लगन से कब जिंदगी को इबारत में बदल लेने की ठान ले …कौन जाने ! कही पढ़ी हुई ऐसी बातें जब सामने से गुजरे तो ?
माँ बेटी के सिरहाने रहती ...बिना गीली पलक लिये,उस दौरान भी उन्हें किसी से कोई शिकायत नही रहती ,कभी भगवान् को नही कोसा ,कभी लोगो पर नही झुंझलाई ,कभी हालात ओर मुक्कद्दर जैसे शब्द सामने नही आये .. जिंदगी से रोज उसी शिद्दत से जूझना ओर पल पल के लिये लड़ना ,कहते है औरत अपने अधूरे सपने बेटी की आँखों में डाल देती है उन्हें उतने ही जतन ओर प्यार से सहेजती है ,पर टूटे सपनो को रोज सिलेवार लगाना उन्हें जोड़ने की जद्दोजहद मेरी जबान में उसे हिम्मत नही कहते ,हिम्मत से बड़ी ,उससे जुदा कोई चीज़ है .अपने किसी को तकलीफ मे देखना जितना दुखद है उससे भी कही ज्यादा मुश्किल है इस बात का अहसास की आप उसके लिए कुछ नही कर सकते .....फ़िर
एक रोज जिंदगी हार गयी....पहली बार वे टूट कर बिखरी ....दो सालो का सारा दर्द जैसे कही रुका हुआ था ...बस एक ही सवाल वो हमसे पूछती 'अगर मैंने AMPUTATION करवाया होता तो क्या मेरी बच्ची बच जाती ?

खाना खायोगे ?उनका ये सवाल मुझे वापस खींच लाता है ....भूख नही है ....पर हम दोनों मना नही कर पाते ...जानते है की खाना कही ओर भी बना है... पर उस आवाज में कुछ ऐसा है जिसे हम ना- उम्मीद नही कर सकते उनके चेहरे पे एक खुशी है पूरी परोसते वक़्त....इसलिए दो पूरी ओर ले लेता हूँ...दरवाजे की घंटी बजती है ,जिग्नेश है खाना देखकर गुस्सा होता है फ़िर ना जाने क्यों साथ बैठकर खाने लगता है दोनों अमेरिका जाने वाले है अगले महीने ..अपने बेटे के पास ,कुछ देर उसी की बातें चलती है
चलते वक़्त तस्वीर पर नजर जाती है....कृपा मुस्करा रही है.,अंकल का गला रुंध जाता है गले लगाकर कहते है ‘आते रहा करो ,अच्छा लगता है" ,मै अपनी आँखों को छुपा कर आंटी के पैर छूकर लिफ्ट की ओर बढ़ जाता हूँ...

2008-07-25

दस सालो मे कितना बदल गयी है शब ?


उसने जब सिगरेट बढाई तो दो कश मार कर मैंने वापस कर दी ...क्यों ?उसने पूछा ...बस यार अब आदत नही रही ..कभी कभी कोई मिल जाता है ख़ास तो कुछ सुट्टे मार लेते है .....मैंने कहा ....तू आ रहा था इसलिए खरीद ली ...मै उसे पैकेट पकडाता हूँ ...मै भी नही पीता आजकल ...वो मुस्कराया ..तो कहा क्यों नही ?....बेकार सुलगाई ..मै उससे कहता हूँ ....बस तूने जलायी तो मना नही कर पाया .वो कहता है .चाय पीयेगा अभी ट्रेन में वक़्त है ?मै उससे पूछता हूँ ....वो सर हिलाता है .चाय के कुल्हड़ को पकड़ हम वक़्त को समेटने की कोशिश करते है ...लोन ?बीवी ?बच्चे ?काम काज ?ओ पी डी?कोई मुश्किल केस ? हर घूँट के साथ हमारे सवाल बदलते है .....
ट्रेन की सीटी बजती है .....वो उठता है ...गले मिलता है "कितने साल हो गये हमें मिले ?१० साल मै याद करता हूँ ..वो ट्रेन की पटरी पर खड़ा होता है ....जाते जाते मेरे हाथ को छूता है....उसे दूर जाते देखता हूँ ..... हाथ हिलाता हूँ ....मेरे हाथ में गोल्ड फ्लेक का पैकेट है ...बाहर गाड़ी पार्किंग वाले से मै पूछता हूँ की वो सिगरेट पीता है फ़िर बिना उसका जवाब सुने मै पैकेट उसे पकड़ा देता हूँ....
M.B.B.S. करते ही उसने कॉलेज छोड़ दिया था .फ़िर मारीशस चला गया ..देहरादून अपनी मौसी के यहाँ आ रहा था ,मेरठ कुछ देर का स्टोपेज था ..गाड़ी को मोड़ता हूँ....शाम हो रही है.....मोबाइल बज रहा है ......क्लीनिक से फ़ोन है....दस साल ........दस सालो में ये शाम भी बदली सी लगती है ?.



अब
चाय की आधी प्यालियों मे
डूबे हुए ना वो नुकते है
ना बँटी सिगरेटो के साथ
जलते हुए
वो बेलगाम तस्सवुर
ना वो
मासूम उलझने है
ना
कहकहों के वो काफिले
बस
कुछ संजीदा मस्ले है
कुछ गमे -रोजगार के किस्से
ओर
जमा -खर्च के कुछ सफ्हे .........

"दस सालो मे कितना बदल गयी है शब "

2008-07-22

एक दिल जिसकी रगों में उम्मीद ओर हौसले दौड़ते है


सई को अपने बारे मे ज्यादा कहना पसंद नही है ,उससे मैं कभी रूबरू भी मिला नही हूँ ओर सच बतायूं कभी फोन पे भी बात नही की है ,सिर्फ़ sms ही इधर उधर
गये है हाल मे ही एक गुजारिश की थी उनसे कुछ लिखने की ....मुझे मान देते हुए
उन्होंने कुछ भेजा है .....

दुनिया से मेरा परिचय...इसने कराया....
कुछ किस्से कुछ कहानियाँ सब के पास होती है.मेरे पास भी है.थोड़ी बहुत दुनिया किताबों में...ज़्यादातर डॉक्टरों के यहा और इस अस्पताल में देखी है.अपोलो चेन्नई के बारे में कुछ लिख रही हू..मेरे नज़र में अपोलो चेन्नई क्या है...बस वही..और तो आप सब जानते ही है अस्पताल क्या और कैसे होते है.यहा अनजान लोग अपनी तक़लीफ़ ऐसे बाँट लेते है जैसे की पड़ोसी हो।एक महिला मेरे पापा को लिफ्ट के यहा मिलतीहै, बातों बातों में बताती है की उनके पति डायलयसिस पर है और बचने की उम्मीद कम है(तब इसका मतलब नही समझ पाई थी क्यूंकी आई वाज़ स्टिलडिसकवरिंग की मुझे क्या हुआ है)जाने क्यू उसने बताया..मुझे तब नही समझा पर अब लगता है..जहा सभी किसी बीमारी से जूझ रहे है वही सबसे ज़्यादा सहानुभूति समझने वाले मिल सकते है.पहले ऑपरेशन के वक़्त १ महीना लगा था सर्जरी फाइनलाइस होने को.फिर भी वही रह रही थी ताकि एकदम ठीक हो जाो (आइरॉनिकल इसन्त इट?) वहां की नर्सस से संवाद करना....अपने आप में एक कला थी॥उनकी अँग्रेज़ी ठीक ठाक और हमारी तमिल सुभान अल्लाह ! वैसे ही ऑपरेशन से थके हुएहोते है॥उसमे भी इशारों से बात करना ..उउफ्फ!पर नर्स ये माँ का ही एक रूप है इस पर मेरा पूरा विश्वास हो चुका है ( पर्सनल अनुभव ) किसी को कोईऔर अनुभव हुआ हो..तो सॉरी।
अस्पताल एंटर करते ही सामने एक छोटी सी गणेश जी की मूर्ति है ,वहां एक अखंड दीप जलाया हुआ है।हर कोई उसके सामने दो पल रुक कर अपने लिए अपने प्रियजन के लिए कुछ माँग लेता है (एक नमाज़ पढ़ने का कमरा और गिरिजाघर भी है पर दूसरी जगह है)।वह जगह मुझे पूर्णा विश्वा का दर्शन करवाती है. हर साल नयेलोगों से मिलवाती है। (सालाना चेक-उप और दो ऑपरेशन्स के बाद काफ़ी जानती हू उस जगह को अब) कोलकाता से सीधे अपना समान साथ रखे हुए लोगों को देखा है जो एक अन्जान डॉक्टर नामक देवता के हाथों अपने आप को सौंप देते हुए देखा है.एक ही आशा होती है की बस अपने दुखो का निवारण यही होने वाला है. वहां जाकर इस बात में कोई शंका नही रहती की दुनिया में भगवान है वरना हमारा विश्वास...बिन पैंदे का लोटा है..कभी यहा कभी वहां?
अब अंतरराष्ट्रिया मरीज़ भी होते है. पिछले ऑपरेशन के वक़्त (२१ जुलाइ २००६) एक अफ़गानी बूढ़ी औरत आई सी यू में मेरी पड़ोसन थी.उसे देख कर मुझे अपने नानी की याद आती थी. वही गोरा रंग, वही छोटी आँखें, वही झुर्रियाँ नज़र आती थी.हमेशा ऐसा लगता की उसे एक बार गले लगा लू (हम दोनो के ड्रेसिंग देखते हुए नामुमकिन था )वो सब चीज़ों के लिए मना करती थी..ना उसे खाना खाना होता ना दवाई लेना. एक दिन तो पूरा आई सी यू सिर पर उठा लिया..नर्सस ने मिन्नतें की..डॉक्टर्स आये..पर वो ना मानी. फिर उसके पोते को बुलाया गया..वो लड़का..उसके नज़दीक बैठा..दो प्यार के बोल बोले..हाथो से खाना खिलाया..और सुलाया..क्या चाहिए था उसे?एक जाना पहचाना चेहरा..अन्जाने देश में अजनबी चेहरो के बीच..
ऐसे कई किस्से है..यादें जुड़ी है अपोलो के साथ..और वो बस बढ़ती ही जाती है..हर बार इंसानियत का कोई पाठइंसानो की अच्छाई का एक उदाहरण देख आती हू..और मन ही मन दुआ करती हू...जब भी यहा आऊं कुछ सीख के जायूं जो मुझे एक बेहतर इंसान बनाता रहे..
-सई



सई को जुलाई महीने से खासा लगाव है यूँ कहे उनका दिल का नाता है . दो बार उनके दिल से छेड़ छाड़ इसी महीने मे हुई है (उनके दिल की सर्जरी हुई है 'मिट्रल वाल्व रिप्लेसमेंट "आम भाषा मे कहूँ तो उसके दिल मे छेद है) पहली सर्जरी जुलाई २००२ मे plaaned थी दूसरी सर्जरी २१ जुलाई २००६ मे इमर्जेंसी मे...क्यूंकि पहली सर्जरी कामयाब नही हो पायी ....उनके दिल मे ढेरो नज्मे ओर शेर भी जमा है ओर बावजूद चाकू छुरों ओर ढेरो ग्लोव्स का सामना किए हुए अब भी वही टिके है ..कभी फ़िर गुजारिश करूँगा उनसे भी.....

2008-07-20

कौन समझाये इन नज्मो को कि अब वैसी बारिशे नही होती ..


जब किसी छुट्टी वाले दिन ढेरो बारिश गिरती है ,डायरी के सीले से सफ्हो पे कई पुरानी नज्मे बैचेनी से चहलकदमी करती है ,उचक कर आवाजे देती है ,११ साल पहले मसूरी की लायब्रेरी के सामने ठिठुरती सड़क पे मिली ये नज़्म अक्सर ऐसी बारिशो में "लॉन्ग-ड्राइव "पे चलने की जिद करती है ओर कभी कभी मेरी कार की विंडस्क्रीन पे बूंदों संग सोयी हुई मिलती है...



कुछ लफ्ज़ भेजे थे तुम्हे
जब लौटे तो,
भीगे-भीगे से थे
उन्हे रखकर
किसी किताब मे,
एक सिगरेट जलाकार तन्हाई से लड़ता हूँ
फिर खोलकर खिड़की
बाहर की दुनिया तकता हूँ
सर्दी का सूरज कितना भला लगता है ,
ठंड है,
लिहाफ़ ओड कर निकला लगता है

आते-जाते लोगो ने इस रस्ते को ज़िंदा रखा है
गोया हर शक्स ने अपने दिल मे
कोई क़िस्सा छुपा कर रखा है
कुछ चेहरे इस सड़क पर जाने-पहचाने लगते है
उन बच्चो के बस्ते अब पुराने लगते है

बंजारो की तरह भटका दिन
अब शाम खीच लाया है ........
उदासी के कुछ टुकड़े भी साथ लाया है
सड़क के कोनो पर
मूंगफ़लियो का ढेर उग आया है
काले बादलों से छेड़खानी करता
चाँद भी जगह बदल-बदल
नज़र आया है

मकई के दानो की गंध
सर्द हवा मे घुल गयी है
कुछ अलाव जल उठे है
उसके इर्द-गिर्द लोगो के
तजुर्बे पिघल रहे है

पहाड़ो की शाम
रात सरीखी लगती है
अपने साथ ढेर सारा
अंधेरा उठा लाती है

अपनी चाय की प्याली
मे कुछ यादे डूबोता हूँ
भरी हुई ऐश-ट्रेय को
पानी से भिगोता हूँ
सिगरेट की ख़ाली डीबी पर
तेरा नाम लिखता हूँ
कैसे कटेगी लंबी रात .........
तेरी तस्वीर देखता हूँ

2008-07-19

किताबे -माजी मे है बहुत से किस्से ....किसे कहे अब ओर किसे छोडे

हते है मेडिकल कॉलेज में P.G की डिग्री आपको अवार्ड दी जाती है आपके उसके हक़दार कभी नही हो सकते और अंडर-ग्रेजुएट के एक्साम में आप बड़ी मेहनत से उस एक्सामनर की सारी कोशिशों पर पानी फेर देते है. जो आपको पास करना चाहता है.
साल दूसरा था ओर फोरेंसिक मेडीसिन का इन्टरनल एक्साम था सुब्रहमन्यम सर अपने डिपार्टमेन्ट में वक़्त पर आते है ओर एक्साम की कवायद शुरू होती है ...पहली कवायद स्पॉट speciman है जिसमे हमें अलग अलग स्पेसिमन को identify करना है .कुछ भी हो सकता है बॉडी के पार्ट्स से लेकर कोई स्नेक भी या कोई poison भी.वक़्त निश्चित है एक एक बैच को बारी बारी जाना है .जिसकी जो समझ में आ रहा है वो लिख रहा है.हम वही है हालात के मारे रोल नंबर एक .जैसे तैसे गाड़ी आगे खीच लेते है .
१५ मिनट का गेप मिलता है .इसके बाद viva शुरू होगा .सुब्रहमन्यम सर अचानक गुस्से में बाहर आते है उनका चेहरा तमतमाया हुआ है .हाथ में शीट है " ये रोल नंबर ३५ कौन है ?"

 जिस तरह नदी फटती है उस तरह से सारे लोग उसके आस पास से छिटक जाते है .शिबू अचानक गोल घेरे के बीच खड़ा दिखायी देता है.वे धीरे धीरे उसकी ओर बढ़ते है .
"विनायक' वे तेजी से चिल्लाते है .विनायक डिपार्टमेन्ट का कर्मचारी है

" specimen लायो " विनायक specimen की एक बोतल  थामे प्रकट होते है .
.'testis' समूह में फुसफुसाहट specimen पहचान लेती है.
ये किडनी है ?वे शिबू के नजदीक आकर कहते है .

फ़िर धीरे से उसके ओर नजदीक जाकर झुक जाते है 
 "तुम साला लड़का होकर, ये गलती कैसे कर सकता है ??"
"मेरे २० साल के करियर में ऐसा नही हुआ ?"वे सर हिलाते है  "कोई जवाब है तुम्हारे पास"
'सर "शिबू डरते डरते बोलता है ."मुझे लगा फोर्मलिन में पड़ी पड़ी सुकड़ गयी है "
विनायक वे फ़िर जोर से चिल्लाते है .'आज viva रोल नंबर ३५ से शुरू होगा.".
क़्त एक्साम के दिनों में रुकता नही ,भागा चला जाता है .लोग तरह तरह के टोटके अपनाते है ,कुछ लोग एक ही कमीज पेंट पहने रहते है ,शिबू बस
दाढ़ी बढ़ा  लेते है. viva पर ही शेव होती है. दो बार एक बार सीधी एक बार उलटी.
फोरेंसिक मेडीसिन का दिन आता है ,शिबू का दूसरा बैच है
शिबू अन्दर घुसता है .external examnier कुछ पूछे उससे पहले सुब्रहमन्यम सर विनायक को इशारे से किडनी का specimen आगे करने को कहते है "?  हाथ की छड़ी घूमती है ओर सीधी किडनी के स्पेसिमेन पर आकर रूकती है ? 

दो बार खटखटा के वे पूछते है "what is this young boy.?"
'testis सर
" शिबू आत्मविश्वास से भरा जवाब देता है.


पुनश्च :शिबू आजकल उत्तरांचल के किसी मेडिकल कॉलेज में फोरेंसिक मेडीसिन पढाते है




कुछ ऐसी ही दुःख भरी कहानिया यहाँ देख सकते है ....
रोल नंबर एक हाज़िर हो
बा -अदब मुलाइजा होशियार रोल नंबर एक आ रहे है

2008-07-17

रिश्ता ??


एडीयो से उचककर
जब तुमने
उस रिश्ते के लबो पर
अपने होठ रखे थे,
उफक का सूरज
सुर्ख़ हो कर भभका था,
पिघली आग फैल गयी थी.
इक छोर से जिस्म के....
रूह के मुहाने तक

इक लौ सी फड्फडाती है वक़्त के सफ्हो मे कही.......

2008-07-16

बेघर ?


कभी कभी मन करता है सूरज को वापस बादलो में धकेल दूँ ओर रात को आसमान से खींचकर ओर लंबा कर दूँ.....ओर किसी दिन पर बड़ा बड़ा सा 'सन्डे " लिख दूँ......















रोज सुबह उठते है कई ख़्याल
दिन के साथ-साथ
कि
शायद कुछ लफ्ज़ मिले उन्हे
कि
शायद कुछ सफ्हो पर
अपना घर बसा ले वे भी.........
कि
शायद आज़ पूरा कर ले ये दिन
अपना वादा.........
सैकड़ो ज़रूरते अपने मुज्तरिब सर
उठा कर
झाँकती है उस दरीचे से
ओर
आवाज़ देती है दिन को
दिन मसलसल भागता है
शफक होने तक.......

ज़ेहन के फ़र्श पर
बैचन चहल-कदमी करते है
वे दिन के इंतज़ार मे....
थका-झुंझलाया सा दिन
जब लौटकर आता है
फिर
रात की बाँह पकड़ कर सो जाता है.

कितने ख़याल बेघर है यूँ ही कितने रोज़ से?

2008-07-14

जिंदगी मंटो की कहानी से भी बेरहम होती है

मंटो कौन ? अश्लील कहानी लिखने वाला ये नामुराद लेखक इस सदी की विलुप्त होती प्रजातियों में से एक है .... लेकिन जिंदगी मंटो की कहानी से भी बेरहम होती है , ये उसूलो को तो खाती ही है दुःख दर्द ओर उम्मीद भी चबा चबा कर बिना थूक सटके निगल जाती है .....दया का बाप जब अपनी बाकी की तीन बच्चियों का भविष्य 'मुआवजे "की उस रकम में देखता है .जो केस दायर ना करने के एवेज में उसी दी गयी थी ....तो महीनो  रेप की शिकार   दया  को इसी "सामान्य जिंदगी ' में लाने के लिए जूझती  साइकेट्री डिपार्टमेंट  की फिमेल रेसिडेंट कही भीतर से टूट जाती है . सच की इस विकृत दुनिया के बीमार समाज का इलाज उसके पास नही है ........
समाज  भले ही  कितने हिस्सों में बंटा हो  ......  पर इसका पाटा  औरत को ही पीसेगा ?
जब  किसी  जयंती  बेन का शराबी पति उसे डंडो से अधमरा करता है ओर उसके 5  महीने बच्चे को साथ   लेकर उसकी बूढी सास अस्पताल आती है तो आप् का मन करता है की उसके शराबी पति को लात घूंसों से मर कर अधमरा कर दूँ ..........आप् शायद एक दो बार ऐसा कर भी दे पर जब हर हफ्ते कोई जयंती बेन आती है तो आप् उसके घावो को खामोशी से स्टिच करते है ......साल दर साल आपकी खामोशी बढती जाती है ...ओर आपके हाथो की सफाई भी . .....अब आप बिना दर्द किये तेजी से स्टिच करना सीख जाते है ......लिजलिजे शराबी से आपको नफरत  तो होती है पर आप अपनी नफरत को दबाना सीख जाते है . ....शुरू में आप ऐसा कभी करते भी है तो यही जयंती बेन अपने पति को बचाने पट्टियों से लदी सामने आ जाती है …. महान औरत ?...देवी ?
ये कौन से संस्कार के बीज है जो सिर्फ़ औरतो के जिस्म में उगते है ,पलते है ? भूखे जिस्मो में भी ?
दस साल बीत गये है पर शायद दया अब भी सरकारी अस्पतालों में दिख जाती होगी, कभी उम्र बदल कर ,कभी चेहरा ..










2008-07-12

एक लम्हा मेरे माज़ी का मुझे आइना दिखाता है

रोजमर्रा के दिन की तरह सर ने पूछा था कितने रेफेरेंस है? ओ पी डी के बाद अमूमन सर प्रोफेसर लेवल के या ए.पी लेवल के रफेरेंस दोपहर में ही देखते थे ओर बतोर सीनियर रेसिडेंट मै उनके साथ जाता था ,मेरे जूनियर ने लिस्ट मुझे दी....तीन रेफेरेंस थे ,एक फिमेल वार्ड का था चूँकि वो सेकंड फ्लोर पे था तो ये तय हुआ की उससे सबसे आख़िर में देखा जायेगा...फिमेल वार्ड तक पहुँचते पहुँचते आधा घंटा बीत गया वहां जब हम पहुंचे तो ...सिस्टर से पूछा ...
एक स्किन रेफेरेंस था सिस्टर ....'
एक मिनट आप बैठे साहेब ' सिस्टर बोली.
सिस्टर टाइम नही है
पेशेंट  किस बाजू है सर बोले...
.साहेब एक मिनट बैठिये  सिस्टर फ़िर बोली.
हेड सिस्टर ने भी कुर्सी खिसका ली .अमूमन ऐसा होता नही था.
कया नाम था उस patient का ?
सर ने मुझसे पूछा ओर वार्ड के दाहिने तरफ़ जहाँ बेड लगे हुए थे बढ़ गये 'दया ' मैंने जेब से में कागज निकाल कर कहा .
दया कौन है ?फ़िर मैंने जोर से पूछा .
साहेब साहेब कहती सिस्टर हमारे पीछे दौडी थी.
दया कौन है . एक मरीज ने कोने की तरफ़ इशारा किया १४ सल् की एक लड़की मैले कुचेले कपड़ो में सिमटी उकडू बैठी थी ,काँप रही थी
.दया ..मैंने उसे पुकारा .उसका शरीर जोर से हिलने लगा .आँखे उलट गयी ओर फ़िर वो बेहोश हो गयी.
"साहेब तभी तो मै आपको मना कर रही थी".सिस्टर बोली.
"आप एक मिनट बाहर जाइये .उसकी माँ जो शायद बाहर कुछ चाय लेने गयी थी दौड़ कर आ गयी थी.पता नही क्यों सर ओर मै बाहर आ गये थे .बाहर रखी कुर्सी पर सर बैठ गये मै खड़ा रहा .तीन मिनट बाद हेड सिस्टर आ गयी थी .
सॉरी साहेब, इस बच्ची के साथ दो दिन पहले ४ लोगो ने जबरदस्ती की है .किसी मर्द को पास आते देखती है तो दौरे पड़ने लगते है .हमने रेफेरेंस में भी लिखा था किसी फिमेल रेसिडेंट को या आपकी मैडम के लिए .शायद आपने पढ़ा नही.psychiatry डिपार्टमेन्ट में शिफ्ट की भी बात चल रही है साहेब....
"सॉरी सिस्टर" सर बोले ,धीमे से उठे ओर हम दोनों बाहर चल दिये ...मर्द होने का गुनाह भरा अहसास लिये .


2008-07-11

जाट ओर रोज डे

weaker sex is strongar than weaker sex
because
weaker sex is weakness of stronger sex

अहमदाबाद के सिविल हॉस्पिटल में radiology डिपार्टमेन्ट के रिपोर्टिंग रूम में टंगे ब्लेक बोर्ड पर10 साल पहले लिखी एक फिमेल रेसिडेंट की उक्ती (जहाँ जाट ने अपनी residency की थी )

जब रोज़ कमेटी हमें जुगाड़ से मिली तो सबसे पहला ऑर्डर जाट-2 ने दिया "कुछ डिसकाऊंट है ?उसने पूछा था ,कैसा डिस काउंट मेरे साथ रोज कमेटी वाली लड़की ने पूछा ?अरे वही जो बड़ी बड़ी कंपनिया देती है एक के साथ एक फ्री जैसा कुछ ? ....जाट बोला ।प्रदीप ये रोज है .....वो लड़की बोली॥ जाट ने एक साथ ढेरो पिंक रोज बुक कराये ओर कॉलेज की सारी जूनियर सीनियर खूबसूरत लड़कियों के नाम लिख कर दे दिये ..प्रगतिशील जाट था इसलिए ना धर्म ,ना जात,ना उम्र, ना कद कोई भी आडे नही आया ..फिक्स हो या " हाँ या ना" में लड़की अटकी पड़ी हो ...सबको रोज ...उनमे से एक दो लड़किया ऐसी थी जो फिक्स थी ओर खासी रौबीली थी ओर उस वक़्त हम वैसे भी थर्ड इयर में थे सो थोड़ा घबराहट भी हुई "अबे जाट वहां रहने दे 'मैंने उसे अकेले में समझाया ...क्यों पिंक रोज देने में के है ?लाल थोड़े ही ना दे रहा हूँ ? खैर हमने डरते पड़ते उसके रोज भी सारे रोज के साथ बाँट दिये ,रात को cultural evening थी ,लड़किया साडीयो ओर खूबसूरत लहंगों में ऑडिटोरियम में आती ..गजल का प्रोग्राम था ...हम एक जगह बैठे हुए थे ..अचानक वही रौबीली मोहतरमा अपने बॉय फ्रेंड के साथ दिखी ..हम थोड़ा सिमट गये....हे प्रदीप तुम्हारा रोज मिला ..थैंक्यू ..वे बोली ......तो आज से अपां दोस्त...जाट बोला था ......
कल जाट का जन्मदिन है , दोपहर बाद साडे तीन घंटे की ड्राइव के बाद उससे मिलने जा रहा हूँ..... चियर्स

2008-07-10

वक़्त के उन मोडो पर मैं अब भी ठहरता हूँ

तब वक़्त चुराकर लाते थे हम दोनों
अब जब मिलते है जब फुर्सत होती है --- जावेद अख्तर



अजीब बात है आदमी गुजरे वक़्त की खिड़की में गाहे बगाहे झांकना नहीं छोड़ता है ...इस वास्ते नहीं के आज की दुनिया में उसे बड़े दुःख है .इस वास्ते के इतने सुखो के बाद भी ...
 बेफिक्री ओर  अल्ल्हड़पन की वो दुनिया मीलो पीछे छूट गयी है.........
   रोज हम दोनों ने सुबह से ही ही तय किया था की रात का खाना  बाहर खायेंगे.... die hard पार्ट देखेगे 
यूँ भी जब आप हॉस्टल में रहते है ..फिल्मे आप की दुनिया का एक बड़ा हिस्सा होती है ..... शहर मे दो ही हॉल ऐसे थे जो हॉलीवुड मूवी दिखाते थे ओर वे हम होस्टल  मे खासे हिट थे.......
तब हमारे पास यामहा RX100 हुआ करती थी......हम सीडियो पर बैठे थे ओर जले भुने उनका इन्तजार किया उन साहब का एवेनिंग क्लीनिक था .वक़्त गुजर रहा था ओर वे लापता थे......
अचानक हमारे एक सीनियर को हमारी मोटरसाइकिल की दरकार हुई उनका नया नया अफेयर था ओर उन्हें डेटपर जाना था चलते चलते उन्होंने कुछ पैसे भी मांगे हमने अपने पास से (उन दिनों गिने चुने ही होते थे )निकालकर  कुछ दे दिये उन्होंने हमें अपनी हरे रंग की लूना पकडाई ओर फ़ुर्र हो गये अब हम ओर लूना दोनों इन्तजार करनेलगे ..खैर हमारे दोस्त प्रकट हुए हमने उन्हें ढेरो गाली दी ओर लूना दौड़ा दी की मूवी छूट जाये
न्दर हॉल मे पहुंचे अंधेरे मे किसी तरह सीट टोलते हम बैठे ,देखा अमिताभ साहब है,हमने सीट पर पैर फैलाएकी ट्रेलर ख़त्म हो ओर फ़िर ज़रा लुत्फ़ ले ...१० मिनट गुजरे .....वही कहानी ...हमने बराबर वाले से पुछा "भाईसाहेब पिक्चर कब शुरू होगी ?उसने हमें ख़ास नजरो से देखा "मियां ये क्या देख रहे हो ?
अबे तेरी...हॉल पर पुरानी डॉन दिखायी जा रही थी ओर die hard कल लगनी थी.....खैर हमने डॉन देखी ..बाहरनिकले तो भूख लग रही थी ओर लूना मे पेट्रोल ख़त्म ....साला ......उसे बारी बारी से घसीटते हूए हमें एक चय्नीसलारी दिखायी दी ,हमने फ़ौरन खाने का कुछ आर्डर दिया ,खाते खाते मैंने उससे पूछा जेब मे कितने पैसे है ?सौ सवासो होंगे ?अब दूसरी टेंशन शुरू हुई ...दोनों ने जेब टटोली कुल जमा १७० रुपये थे ..ज्यूँ त्यु खाना खाया ...बिल पूछा१६० रुपये ........
एक गोल्फ फ्लेक सिगरेट पे ओर आधा आधा मीठा पान खाया ओर लूना घसीटते हम होस्टल चल पड़े ......
तन्हाई भरे इस पर्स से मुफलिसी के वो सिक्के कितने अच्छे थे



....

2008-07-09

वो एक लम्हा जो गिराया है तुमने ......


बारिशे नही बदली ..जिंदगी बदल रही है ,फलसफे भी ,रिश्ते भी पर ये अब भी वैसी है ,मुस्कराती ..बूँद दर बूँद ढेरो लम्हे गिराती यहाँ वहां ....
पोलियो के लिये हम दोनों की ड्यूटी लगायी गई थी intrenship में थे इसलिए अनमने मन से गये,सोचा की दोनों दोस्त साथ में है इसलिए वक़्त कट जायेगा,एक वोर्केर के साथ बच्चो को पोलियो ड्राप पिलवानी थी ,यदि किसी की कोई शंका हो तो उसे मोटिवेट करना था ,यानि की बड़ा बोरिंग काम था ..एक कालोनी के एक कोने में हमें जगह मिली ,दोनों दोस्तों ने अनमने ढंग से घड़ी देखकर काम शुरू किया एक प्यारा सा ७-८ साल का बच्चा साईकिल लेकर दवा पीने आया ...कुछ वक़्त गुजरा ..हलकी हलकी बूंदे शुरू हुई ... वही नन्हा अपनी छोटी सी साईकिल पर अपने प्यारे से छोटे भाई को पीछे वाले स्टेंड पर बिठाकर आया ...."डॉ साहेब इसको भी दवा पिलाईये ."..एक बादल बड़े जोर से गरजा ऐसा लगा जैसे इस खूबसूरत लम्हे की आसमान ने फोटो ली हो..... ,कल से बारिश खूब हो रही है ...पर ये बादल कभी कभी ये बेवफाई भी कर जाते है.....


उमस भरी दोपहरी में
बादल का एक टुकडा
पड़ोसी की छत भिगो गया .......

अजीब बेवफाई है.?


.

2008-07-08

अच्छा लिखने से कही बेहतर है अच्छा इन्सान होना

क्या आपने कभी उस रिक्शा वाले को " टिप" दी है जो ..आपको मंजिल पर पहुंचाकर अपना पसीना पोछ रहा हो ? ढेर सारे बच्चो को लेकर कही ढलान पर अटक कर रिक्शा वाले की मदद करने को जो बच्चे रिक्शा से उतर कर धक्का लगाते है …. बड़े होने पर वही बच्चे किसी ठेले पर भारी सामान ले जाते मजदूर के लिए अपनी गाड़ी धीमी नही करते ….ये जानते हुए की उनके पास गियर है …वे जब चाहे अपनी रफ़्तार कम या ज्यादा कर सकते है …..हम आप सब शायद वही बच्चे है जो बड़े हो गए है ।ऐसा क्यों है कि शिक्षा पाकर पढ़ लिख कर हम ओर ज्यादा आत्म - केंद्रित होते जाते है फ़िर उसे ‘यही दुनिया है ” के नारे के पीछे छिपा देते है .पढ़ लिख कर हम अपनी चालाकियों को ओर पैना करते है ओर अपनी कमियों को ज्यादा अच्छे तरीके से छिपाना सीख जाते है ….हम ढेरो आंसू किसी मूवी को देखकर बहा देते है ..पर अपनी संवेदना उसी हॉल कि सीट पर मूवी ख़तम होने के साथ छोड़ आते है . हर इन्सान अपने परिवार के लिए संवेद्नानायो से भरा है पर वही दिल एक अजनबी या मजलूम के लिये दर्द महसूस नही करता ?हो सकता है वो अच्छा पिता हो ?शायद अच्छा बेटा भी, पर क्या ये काफ़ी है ?
जिंदगी बहुत तेज रफ़्तार से भाग रही है ओर हम भी.... वक़्त के साथ शायद हमारे भीतर ढेरो भूले जमा हो जाती है ,ढेरो ऐसे शब्द जो कहे नही गये ,ढेरो ऐसे काम जो करे नही गये ..हमारे दिल का एक कोना ऐसी कई चीजो से भरा रहता है....कभी सोचा है आपने इन्हे उलीचना ?

चरित्र दो वस्तुयों से बनता है ,आप की विचारधारा से ओर आप के समय बिताने के ढंग से ..धारणाये बदल सकती है लेकिन चरित्र का केवल विकास होता है ।२१ साल के जो आप होते है 31 मे वही नही रहते …तजुर्बे सिर्फ़ गुजरने के लिये नही होते ,क्या क्या आपने उनमे से समेटा है ये महतवपूर्ण है .....जीना भी एक कला है कुछ लोग सारे भोग भोगकर भी उनसे मुक्त रहते है ओर कुछ लोग अध्यात्म की शरण मे जाकर भी इस संसार से मुक्त नही हो पाते ॥
मेरा एक सीनियर था कॉलेज मे जिससे मैं बहुत प्रभावित था ,वो दिखने मे अच्छा था ,पढने मे अच्छा था ,ढेरो लड़किया उसकी दोस्त थी ,अच्छा पहनता था ..एक दिन मैंने उससे पूछा ऐसा कैसे ?उसने कहा "आजकल की दुनिया मे "नोर्मल" रहना ही असाधारहण होना है,आप अपने वो काम वक़्त पर करते रहिये जिन्हें उसी वक़्त करना है ,सब चीजे अपने आप होती जायेगी ......
कई बार जब हम मेडिकल प्रोफेशन के दोमिलते है तो अपने पेशे के सुख दुःख भी बांटते है मेरा एक दोस्त ऐसे ही कई बार कहता है 'कई बार ऐसे ऐसे मरीज जिनके बचने की संभावना हम भी नही करते जाने किस चमत्कार से ठीक हो जाते है ओर वे हमें ढेरो आभार ओर आशीर्वाद देकर चले जाते है ,जानते हो कभी कभी जब मैं किसी मरीज के परिवार वालो I.C U मे कहता हूँ की चिंता मत करो सब ठीक हो जाएगा तो ऐसा लगता है की किसी खिड़की पे बैठा भगवान् हंस रहा है.....कही कोई ईश्वर है ......जिसके भय या श्रद्धा से हम अनुशासन मे रहते है
वक़्त बड़ा ही बलवान है इसके एक पन्ने पर जो मनुष्य आपको देवता सा दिख रहा है शायद अगले कुछ पन्नो मे वही आपको साधाहरण से भी गया गुजरे लगा...परिस्थितिया ओर हालात आपके मुताबिक नही चलते ...मेरी कालोनी में,मेरी गली में एक पति पत्नी पता नही कौन सी कुमारियों के बाबा से प्रभावित होकर अपने घर के ऊपर एक आश्रम सा बना लिया है कई बार इन पति को अपनी ऐ।सी गाड़ी में इन कुमारियों को उनके बाबा के साथ ढोते देखा है ॥सुबह उनके ७७ साल के पिता को रिक्शा के इंतज़ार में खड़े देखा॥वे दिल के मरीज़ है ।किसी डॉ को दिखाने जा रहे थे ..ऐसा भक्ति का क्या मूल्य जब आपने रोजमर्रा के कर्तव्य पूरा नही कर रहे ?
हो सकता है उसके घर में कोई किताबो की शेल्फ न हो ..किसी लेखक का नाम उसने न सुना हो , कोई शेर उसे मुह जबानी भी याद न हो ,..किसी मंच पर उसने दो शब्द न बोले हो लेकिन अक्सर शाम को वो बच्चो के साथ पार्क में फूटबाल खेलता दिख जाता है , कभी ऑफिस से लौटी अपनी पत्नी के लिए उसे चाय बनाने में कोई हिचक न होती है .....अपने बूढे माँ बाप की डांट वो अब भी सर झुका कर खाता है , दोस्तों के लिए वो अब भी अपनी ऍफ़ डी तुड़वा देता है ..उसका चेहरा इतना आम है कि उसे याद करने के लिए आपको दिमाग पर जोर देना पड़ता है ..पर यकीन जानिये वो हम आप से कही बेहतर इन्सान है

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