सुबह सुबह जब उस हॉस्पिटल से एक रेफ़रन्स देखकर बाहर निकला तो कोरिडोर में ही कुछ भीड़ है ,भीड़ के बीच एक ३५ साल का गेहुये रंग का आदमी है ...मझोले सा कद ,बिखरे बाल ,हाथ में कुछ फाइल
तुम जानते नही मै कौन हूँ....मेनका गांधी की संस्था की कार्यकर्ता हूँ ..एक फोन घुमायूंगी तो मुश्किल में पड़ जायोगे तकरीबन ४० साल की औरत थी.....छोटे से बच्चे को रौंद देते तुम.....पूरी मोटरसाइकिल टूट गयी है
मेरा फोन बजता है ,मै उठाता हूँ पर मेरा ध्यान फोन में नही है ...वो आदमी अपने माथे का पसीना पोच रहा है..."देखिये बहन जी मै तो २५ की स्पीड से चल रहा था ,उसने पीछे से टक्कर मारी ...फ़िर रिक्शे से उलझ कर गिरा है '
भीड़ में करीब साथ -आठ लोग है ,इस भीड़ का कोई चेहरा नही है.... "अजी साहब गाड़ी चला रहे हो तो कोई अंधेर गर्दी है ...उनमे से एक बोला
"भैय्या गाड़ी में बैठकर तो हर आदमी यूँ सोच्चे की दूसरे की तो कोई कीमत नही ..हवा में उडे है ! एक ओर जुमला
मोटरसाइकिल का नुक्सान हो गया ,अस्पताल का बिल है ....वो औरत हाथ में मोबाइल से कोई नंबर डायल करते हुए बुदबदाती है
"अस्पताल वालो से मैंने कह दिया है .. बिल के लिए "मझोले कद वाला धीमे से कहता है....
अजी तो कोई अहसान कर दिया ?भीड़ से फ़िर एक जुमला निकलता है ....वो अपने माथे से पसीना पूछ रहा है ..की अचानक मेरे कंधे पर हाथ पड़ता है डॉ नवनीत है ",आ तुझे चाय पिलाता हूँ... मै कुछ हाँ या न का जवाब दूँ उससे पहले ही वे मेरा हाथ पकड़ कर डॉ रूम में ले चले ..तभी पीछे से आवाज आयी "डॉ साहब सी .टी .स्केन की जरुरत तो नही है ?
वही औरत है "अरे नही आपका बच्चा बिल्कुल ठीक है ,सर पे थोडी सी खरोच है ...हाथ में घिसट आयी है बस ..पट्टी कर दी है ,आप चाहे तो ले जा सकती है "
डॉ नवनीत मुझे पकड़ कर डॉ रूम में ले चले
क्या किस्सा है ?मैंने पूछा
कुछ नही ! एक एक्सीडेंट केस है ,एक लड़के को गाड़ी की साइड से हल्का सा धक्का लगा है ,मोटरसाइकिल स्लिप हो गई हालांकि लगता ऐसा है इस लड़के ने साइड से तेजी से निकलने की कोशिश की है...फ़िर एक रिक्शा वाले से टकरा गया .. . दोनों गिर पड़े ..गाड़ी वाला बेचारा उसे यहाँ ले आया भला मानसत में ...लड़के को मामूली सी चोट है
चाय के कुछ पल गुजरे ही थे की दरवाजे पर क्नोक हुआ ....वही मझोले कद वाला आदमी
चेहरे पर बैचेनी.... डॉ साहब ! आपको जो ठीक लगे करियेगा ..बिल का पेमेंट मुझसे ही कहियेगा अगर सी .टी .स्केन की जरुरत समझे तो ?
अरे नही ....निश्चित रहिये .सब ठीक है.........डॉ नवनीत उनसे कहते है ...
उसके चेहरे पर अब भी बैचेनी है.. डॉ नवनीत उसे बैठने को कहते है .कोई ओर दिक्कत है ?वे उससे पूछते है
"एक फेवर चाहिए आपसे "?वो हिचकिचाता है
कहिये ?
वो रिक्शे वाला मुझे नही मिल रहा है ,उसको भी थोडी चोट आयी थी यही कुछ पट्टी हुई है उसकी ,उसका एक टायर पूरा मुड गया था ..उसको अगर कुछ पैसे दे देता .... ?
बेतरतीब सी कई सौ ख्वाहिशे है ...वाजिब -गैरवाजिब कई सौ सवाल है....कई सौ शुबहे ...एक आध कन्फेशन भी है ...सबको सकेर कर यहां जमा कर रहा हूं..ताकि गुजरे वक़्त में खुद को शनाख्त करने में सहूलियत रहे ...
2008-09-30
2008-09-24
वो मिला तो याद आया हम कितने पेचीदा है
हम सबके भीतर एक ऐसा कमरा छिपा है ,जिसमे हमारी कमजोरियों ,झूठो ओर इंसानी दुर्बलतायो के पलो के ढेर को सावधानी से सकेर कर रखा गया है जिसकी चाभी हम किसी से नही बांटते ,उसकी खिड़की कभी नही खुलती ......अलबता गुजरते वक़्त के साथ वो ढेर जरूर बढ़ा हो रहा है. |
आज आपके स्कूल चलना है एक सन्डे की सुबह मेरा पौने पाँच साल के बेटा उससे १०-१२ दिन पहले किए हुए एक वादे की याद दिलाता है ...पहले ही आलस में मै दिमाग में तयशुदा कई कामो की लिस्ट में छटनी कर चुका हूँ...गाड़ी की सर्विस भी मै अगले सन्डे पर धकेल देता हूँ. एक कप चाय ओर टाईम्स ऑफ़ इंडिया के पन्नो में मै इस उम्मीद में उतरता हूँ की कुछ समय बात छोटू अपने दूसरे खेलो में लग जायेगा ओर स्कूल की बात आयी गयी हो जायेगी ..पर कुछ मिनटों बाद मेरे सैंडिल मेरे सामने रख दिए जाते है ,अनमने मन से मै शहर के उस हिस्से में पहुँचता हूँ जहाँ नीचे आर्यसमाज मन्दिर है ऊपर मेरा स्कूल....."आज छुट्टी है इसलिए स्कूल बंद है "मै उसे बहलाने की कोशिश करता हूँ पर वो नन्हे पैरो से सीडिया चढ़ता हुआ ऊपर भाग जाता है...ऊपर एक कोने में बूढा चौकीदार है आवाज सुनकर बाहर आया है .सफ़ेद बढ़ी हुई दाढ़ी.मोतियेबिंध से ढकी हुई अधूरी आँखे ओर एक पुराने फ्रेम का चश्मा ....छुट्टी है पर वो अब भी वर्दी में है .....शायद ये वर्दी ही उसकी पहचान बन गयी है.
"ये मेरे पापा का स्कूल है'मेरा बेटा उससे कहता है ओर उसकी सुने बगैर गलियारे में दौड़ जाता है..बूढा चौकदार मेरे नजदीक आता है ...उसकी बातो का मै सिर्फ़ हां- हूँ में जवाब दे रहा हूँ...मेरा सारा ध्यान अपने बेटे पर है ..मेरे दिमाग में पहले से फिक्स कुछ appointment बैचेनी से चहलकदमी करने लगे है .असहजता के कुछ पल गुजरते है....फ़िर .मै अपने बेटे को बुलाता हूँ .. ....सीडियो के नजदीक खड़ा होकर वो उससे कहता है....
ये मेरे पापा का स्कूल है जब वो छोटे थे ....अब वो बड़े हो गये है ना!
"हाँ बड़े होने के बाद लोग कम बोलने लग जाते है.'....चौकीदार उसके सर पे हाथ फेर कर कहता है फ़िर अपने कमरे की ओर बढ़ जाता है..
आज का तजुर्बा :- .२४ सेप्टेम्बर ..बुधवार ... सवेदनाये फ्लैशलाइटों की चमक में चोंधिया रही है फ़िर रिमोट से कोने में धकेल दी जा रही है ,। बाजार वक़्त की पीठ पर बेताल की तरह बैठ गया है....हर ख्वाहिश की E.M.I है ओर उसे बदलने की सुविधा भी.... रिश्तो का एक स्केल है..जिसके नंबर बदलते रहते है......सच का भी बाजारीकरण हो गया है...कई किस्मों के सच अब मुहैय्या है... ..समाज फ़िर एक नये" म्यूटेंट संक्रमण " से गुजर रहा है .... बुद्दिजीवी फ़िर चुप है ..ओर अब सरोकार सिर्फ़ निजी है |
2008-09-18
सर पे धूप मिली तो याद आया ,मेरे आँगन मे एक बरगद रहता था
बचपन ऐसी अलमारी की तरह है जिसके हर खाने मे ढेर सारी बाते जमा होती है ओर कुछ बाते उम्र के एक मोड़ पे जाकर अपना रहस्य खोलती है. तब हम एक ऐसे मोहल्ले मे रहते थे जो लगता था की कभी सोता नही था सड़क के पास एक खिड़की होती थी जो रात भर जागती रहती. रात भर स्कूटर, कार की आवाज आती रहती. बस अड्डो के पास के मोहल्ले उन परिंदों की तरह होते है जो आँख खोल कर सोते है .मैं ओर छोटा दोनों भाई पैदल स्कूल जाते ,जो घर से थोड़ी दूर होता . तब मैं शायद पहली या दूसरी क्लास मे हूँगा अक्सर हम स्कूल जाते जाते बीच- बीच मे कई जगह रुकते स्कूल जाने के लिए हम शोर्टकट लेते जिसके लिए हमें एक कच्ची गली से होकर गुजरना पड़ता गली के मुहाने पे हलवाई की दूकान थी ओर सुबह -सुबह उसकी भट्टी पर चढी कड़ाई से पूरियों की खुशबू आती ,उसके पास से गुजरते वक़्त मैं अक्सर सोचता की बड़े होने पर ढेर सारी पूरिया खाया करूँगा (जैसे की बड़े होने से ही पैसे अपने आप आ जाते है )
उसी टूटी फूटी गली के दूसरे कोने मे एक कोयले का गोदाम था ,जिसके दरवाजे पे अक्सर आर्मी की वर्दी पहने एक लंबे खुले बालो वाला सरदार जिसकी बड़ी ओर घनी दाढ़ी थी ,अक्सर कोयले को तोड़ता मिलता .कुछ हाथ दूर उसकी बैसखिया पड़ी रहती ,उसके बारे मे तब हम बच्चो के बीच तरह -तरह की अफवाहे थी ओर शायद उनका असर भी हम पर था , उसके पास से गुजरते वक़्त छोटा अक्सर कस-के मेरा हाथ पकड़ लेता ओर मैं भी तेज कदमो से वो दूरी तय करता . हमे देखकर वो अक्सर मुस्करा देता .एक रोज स्कूल की छुट्टी हुई ,गली के उस मुहाने पे उसने हमे आवाज दी ,छोटे का हाथ मेरे हाथ पे कस गया ओर मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा फ़िर भी भय पर जिज्ञासा हावी हुई ओर मैं लगभग छोटे को घसीटता हुआ उसके पास गया उसने हाथ से फर्श पे इशारा किया वहां कुछ अंग्रेजी मे लिखा था
"तुम्हे अंग्रेजी भी आती है ? " मैंने उससे पूछा , मेरे लिए ये बहुत बड़ी बात थी .
फ़िर उसने मुझे बहुत कुछ लिख कर बताया . कुछ पलो मे मेरा सारा डर जाता रहा , फ़िर ये हमारी रोज की दिनचर्या मे शामिल हो गया , रोज मैं लौटते वक़्त उसके पास कुछ देर रुकता , रोज छोटा मुझे माँ को बताने की धमकी देता , रोज माँ पूछती की देर क्यों हुई ? न छोटे ने कभी बताया न मैंने उसकी धमकी मानी.
एक रोज उसने कुछ लिखा जो मेरी समझ नही आया पर आज लगता है शायद उसने कोई अंग्रेजी की कविता लिखी थी वो रोज कोई एक मन्त्र मेरे कानो मे फूंकता "अपनी शक्ल पे कभी गरूर मत करना क्यूंकि इसके ऐसा होने मे तेरा कोई हाथ नही है " ,बड़े होके भी छोटे का हाथ ऐसे ही पकड़ना ओर
न जाने कितने!
मैं नही जानता वो कौन था ? उसका परिवार कहाँ था? किस हादसे मे उसकी टाँगे गयी? मुझे याद है पापा का ट्रांसफर देहरादून हुआ तो मैं उससे मिलने गया छोटे ने छुपा के रोटी सब्जी मुझे दी , जब मैंने उसे देनी चाही तो उसने मना कर दिया भरे गले से बोला " आदते ख़राब नही करनी ,वो भट्टी ही अपनी रसोई है "उसने हलवाई की ओर इशारा किया .फ़िर मेरे सर पे हाथ रख के बोला
"बड़ा होके भी ऐसे ही बने रहना "
.वो हमारी आखिरी मुलाकात थी ,उसके बाद वो कहाँ है ,नही जानता ? जिंदा भी है या नही ?
बड़ा तो हो गया पर शायद मन उतना बड़ा नही रहा जरूरतों ओर ख्वाहिशों ने इसे मैला कर दिया है
२१ सितम्बर सन्डे सुबह ७.४० मिनट ... पिछले दो दिन से सूरज जैसे छुट्टी पर है .,सारा आसमान बादलो के हवाले से है किसी को रोडवेज़ छोड़ने के बाद उसी गोल चक्कर से मुड़ना है उल्टे हाथ टर्न लेते ही कुछ कदम आगे कोने पे हलवाई की वही दूकान है ,अचार –आलू की वही खुशबू ..गाड़ी की खिड़की से ..एक नजर कोयले की गोदाम में झाँकने की कोशिश .. …..बारिश की बूंदे विंड-स्क्रीन पर गिरती है ….3 -5 सेकेंड .बमुश्किल गुजरते है की पिछली गाड़ी के हार्न . जैसे जोर से ऐतराज जताते है ……आगे बढ़ जाता हूँ , रेडियो FM पर रॉक ओन का गाना है. " आंखो में जिसके कोई .तो .ख्वाब है खुश है वही जो थोड़ा बेताब है "…….”ढेर सारी बूंदे फ़िर शीशे को ढक लेती है .. |
2008-09-15
ऍफ़ .आई .आर
थाने में अन्दर घुसते ही एक ओर गाडियों का ढेर नजर आया ,बरामदे में अधेड़ तोंद वाला सिपाही आपकी परेशानी तौलता है स्कूटर चोरी की F I R सुनकर उसकी दिलचस्पी आपमें ख़त्म हो जाती है..वो आपको बायीं ओर के कमरे की ओर इशारा करके भेज देता है ,बिन बिजली के उत्तर प्रदेश में पसीने में डूबे तीन लोग बैठे है मेरे साथ ५० साल के मेरे दोस्त के पिता है ,जिनका स्कूटर मेरे क्लीनिक से कुछ दूरी पर चोरी कर लिया गया है उनके सुपुत्र भी डॉ है ..ओर मै ओर मेरा एक मित्र उनके साथ FIR लिखवाने आये है ,मेरा मित्र डेंटिस्ट है ....FIR के नाम पर एक कागज देने से पहले वे हैरान होते है की हम स्कूटर की चोरी क्यों लिखवाना चाहते है ...."अरे बाउजी चार पाँच हज़ार की कीमत होगी अब तो उसकी."... ..खैर एक कागज देकर हमें अपनी भाषा में FIR लिखने को कहा जाता है...कोई नही बता रहा की कैसे लिखना है...लिखे .कागज को लेकर वे रख लेते है...ठीक है कोई आ जायेगा मौके पर ....आप चलो.....गर्मी ओर उमस में मुझे एक डी .एस. पी साहब याद आते है ....उन्होंने कई बार मुझसे फ्री में इलाज़ करवाया है....आजकल गाजियाबाद पोस्टेड है पर शायद इस थाने में कोई जान पहचान निकल आये ...उन्होंने फोन मिलाता हूँ.. ५ मिनट बाद थानेदार साहब अन्दर बुलाते है वे दाई ओर के कमरे में बैठे है .दरवाजे पर एक चिक लगी है......
अरे डॉ साहब आपको सीधे यही आना था ना...उनके पीछे खड़ा हवलदार बेवजह खीसे निपोर देता है...मेहंदी ने उनके बालो में एक अजीब सी लाली भर रखी है ,खिड़की से आती धूप में उनके सावले चेहरे पर लाल बाल ओर चमक उठते है ...वे एक सिपाही को बुलाकर बाउजी को बाहर FIR लिखवाने को कहते है..बाउजी बाहर गए है इतने में वे अपनी शर्ट उठाकर मुझे कुछ दिखाने लगते है ...बाहर शोर मचता है...किसी लड़की की आवाज है ....मुझे मिलना है ....कोई सिपाही मना कर रहा है .एक दो मिनट ऐसे ही शोर शराबा होता है फ़िर दो लड़किया धडधडाती हुई अन्दर घुस आती है थानेदार साहब हडबडा कर शैर्ट नीचे करके बैठ जाते है .......,तकरीबन २६-२७ साल की उम्र की....गुस्से में है....किसी ने उन्हें छेडा है .पर कोई रिपोर्ट लिखने को तैयार नही ...फ़िर वही कहानी ....मन ही मन मै सोचता हूँ...देखो हमसे ज्यादा हिम्मत है इस लड़की में ..अपने अधिकारों के लिये ..कुछ देर बहस चलती है फ़िर एक सादे कागज पर वो रिपोर्ट लिखती है.....वही सादा कागज ...लाईट अभी तक नही आयी है ..."वैसे एक बात कहूँ तुम भी ना ऐसे कपड़े लत्ते पहनोगी तो छोरे तो छेडेगे ही " थानेदार साहब उनकी जींस ओर स्लीवलेस कुरते को देखकर कहते है .....पीछा खड़ा हवलदार फ़िर खीसे निपोर देता है.....उसके दांत खैनी खा- खा के बदरंग हो गए है ....मन करता है.....इतने में बाउजी दिखे है...मै ओर मेरा दोस्त उठ जाते है....उन्हें शुक्रिया कहकर निकल आते है.....
सोमवार शाम ६.३० बजे .....फोन बजता है ..वही थानेदार साहब है ....अपनी बिटिया को दिखाना है.....पूछते है की मै कब तक हूँ ?तकरीबन साढे सात बजे वे क्लीनिक में आते है...बस डॉ साहेब वक़्त नही मिलता ओर बिटिया को अकेले भेज नही सकता ज़माना बहुत ख़राब है....आओ बेटे .....
स्लीवेलेस ऊँची टी शर्ट ओर जींस पहने एक २३ साल की लड़की अन्दर आती है ..."हेल्लो डॉ "
2008-09-11
ओ ...तुसी चिंता न करो ... मजहब भी एडजस्ट हो जायेगा
हमारे मेडिसिन के हेड डॉ त्रिवेदी कहते थे की इस भोजन को नमस्कार करो .क्यूंकि ..जितने लोग भूख से नही मरते है उससे कही ज्यादा इसे खाकर बीमार होते है |
नवरात्रे नजदीक है ,इसलिए अब लोगो का व्यवहार बदलने से लगा है ,राज ठाकरे भी बदल रहे है ऐसा अमर सिंह आज के टाईम्स ऑफ़ इंडिया में कह रहे है ........इन दिनों कई किस्से होते है ... मैं अगर मरीजो से पूछता हूँ की क्या वे मदिरा का सेवन करते है ? ये एक सामान्य सा प्रशन है जो कि आम तौर से दवा लिखने से पहले पूछा जाता है ओर कई बार उनकी किसी बीमारी से सम्बन्ध प्राप्त करने के लिए ?मरीज हाथो को कानो पे लगाता है ...क्या बात कर रहे है डॉ साहेब ?नवरातो मे?तभी मोबाइल बज उठा है शायद उधर से पूछा गया है "कहाँ हो " अभी शहर से बाहर हूँ सोमवार को मिलना होगा ?बिना शरमाये वे मोबाइल जेब मे रखते है .... झूठ बोलना कोई नही छोड़ता ?चालाकी कोई नही छोडेगा?परायी औरतो को घूरना कोई नही छोडेगा ....पर साहेब शराब नही पियेगे ...नवराते मे .. ......कोई कम नही है ..... मेक्डोनल ने "नवराते बर्गर" लॉन्च किया है ,मोबाइल कम्पनिया स्पेशल कलर ट्यून दे रही है .टीवी सीरियल भी नवरातो को अपनी कथा मे शामिल कर रहे है ..ओर तो ओर जूस वाला भी पूछता है की "साहेब व्रत वाला की सादा?जय माता की .......धर्म को भी लोग अपने हिसाब अनुसार एडजस्ट कर देते है .... ये नवराते अगर ६ महीने रुक जाये तो शराब कम्पनिया ठप हो जायेगी आधा भारत संतमय हो जाएगा .... हर शख्स अपनी - अपनी जुगाड़ मे लगा है .....ऐसे भी कई लोग है भारी भारी मालाये गले मे डाले भरी भरकम शरीर के साथ उंगलियों में कई अंगूठी फंसाये आयेगे ......बस डॉ साहब मंगलवार को नही पीता हूँ चाहे कुछ हो जाये.....फ़िर माला को हाथ में लेकर चूमते है ...उनकी बीवी सर हिलाकर अपने पति को गर्व से देखते हुए इस बात की तस्दीक़ भी कर देती है ..... ये मंगलवार के संत है ,कोई शनिवार का है........ जैसे की भगवान् पे अहसान कर रहे हो ....अजीब फिलोसफी है लोगो की ..... .......
खैर .....जय माता दी
हमारे पेशे मे मरीज ही हमे अनुभवी बनाता है .....एक साहेब ने मुझे बड़ा परेशां किया अक्सर रात ११ बजे फ़ोन आता कि "डॉ साहेब उलटी सी होने को हो रही है !क्या करू ?,मैं उन्हें फ़िर कुछ दवाई बताता ओर सुबह मिलने को बुलाता ....वो सहेब सुबह तो नही आते पर रात ११ बजे हमारा मोबाइल फ़िर बज उठता "डॉ साहेब उलटी सी होने को हो रही है ! 'तीन रात हो गई चौथी रात हम बिफर गये "अमा तुम सुबह क्यों नही दिखाते हो .....?खैर चार रात के बाद वे अगली सुबह आये ...हमने सब कुछ तस्दीक़ की फ़िर पूछा "दारू तो नही पीते हो ??नही डॉ साहेब......हमने दवा मे कुछ बदलाव किये ,खाने की कुछ सलाह दी.....रात ११ बजे फ़िर फोन बज गया ......अब हमने नोटिस किया की एक खास तरह का बेक ग्राउंड म्यूजिक सुनाई दे रहा है .....हमने पूछा कहाँ बैठे हो ? उन साहेब ने एक बार का नाम लिया.....हमने फोन काट कर उन्हें सुबह मिलने को कहा ....वे साहब सुबह आये ....तुम तो कहते थे की तुम दारु नही पीते हो ...मैंने कहा .....जी हाँ ! उन्होंने भोलेपन से कहा ....तो फ़िर बार मे क्या कर रहे थे ? बियर पी रहा था उन्होंने फरमाया मैंने आँखे तरेरी तो वे फ़ौरन बोले ....."हाँ तो बियर दारू थोड़े ही ना होती है ! अब मैं मरीज से कुछ इस तरह सवाल पूछता हूँ कोई शौंक है आपका?पीने का ?बियर भी नही ना? |
2008-09-08
अपने अपने हिस्से का सच
हम सब के पास एक फिल्टर होता है ,मायूसियों ओर ना-उम्मीदों को फिल्टर करते करते जब हम सहूलियत की दहलीज़ पर पहुँच जाते है तब हम केवल एक ही चीज़ फिल्टर करते है ...असहमति ..हम सिर्फ़ वही देखना सुनना चाहते है जो हमारे मुताबिक है |
पिछले तीन चार दिन से मै उनके फोन को अवोइड कर रहा था ...पर कल रात जब उनका फ़िर फोन आया तो मै न चाहते हुए भी उनसे मिलने गया ..लायंस क्लब की उच्चधिकारी होने के कारण वे कोई केम्प करना चाहती थी ओर बतोर चिकित्सक उन्हें मेरी सेवायों की जरुरत थी.बचपन से वे मेरे उस मोहल्ले की पडोसन थी जहाँ हम किराये के मकान में रहते थे हालांकि अब उस मोहल्ले में न वे रहती थी ओर न मै .... ,अब वे एक बुटीक की मालिक थी ओर वक़्त ने बहुत कुछ बदल दिया था ,वे अब ज्यादा व्यवाहरिक हो गयी थी इसलिए शायद मुझे मेरे बचपन के नाम से ना बुलाकर डॉ साहब बुला रही थी .
"डॉ साहब इसमे आपका भी फायदा है ,आपको भी पबिलिसिटी मिल जायेगी "वे चाय का कप मुझे पकडाते हुए बोलती है ,मै सिर्फ़ सर हिलाता हूँ...लोबी में चल रहे टी वी में अचानक मोनिका बेदी दिखती है ,वे एकदम दुखी हो जाती है "इस औरत ने भी बहुत सहा है " मोनिका कह रही है उसके लिए डॉन ने वाकई बदलने की कोशिश की है.......फ़िर एक ओर जज्बाती सवाल ....कैमरा एक दम मोनिका के चेहरे के नजदीक है उनकी आँखों के आंसू पकड़ने की कोशिश ..मोनिका भी पोज़ दे रही है ,इंटरव्यू लेने वाले भावुक होजाते है ...कहते है हम आपको इस तरह उदास होकर जाने नही देंगे ....ये वही दीपक चौरसिया है जो कुछ दिन पहले तक सबसे तेज चैनल पर चिल्ला चिल्ला कर कहते थे "कही जाइयेगा नही हम बतला रहे है आपको डॉन की असलियत "....ब्रेक हो गया है.........
मीडिया ओर मोनिका ......दोनों की अपनी अपनी जरूरते है ,बाईट की छटपटाहट इतनी ज्यादा है कि अब सच के ढेर में से हर इंसान सिर्फ़ अपने हिस्से का सच उठाता है ओर बाकी छोड़ देता है ,उस ढेर में बचे खुचे ऐसे कितने सच आपस में इतने गड मड हो जाते है की झूठ से लगने लगते है .वे दुखी हो गयी है ,मुझे प्लेट उठाकर बिस्किट लेने को कहती है कि उनका मोबाइल फोन बज उठता है वे आवाज लगाती है १२-१३ साल कि एक लड़की उनका फोन लेकर आयी है .....फोन देकर वो टी वी पर आ रहे किसी विज्ञापन को देख रुक गयी है .....एक कोने में दीवार से सिमटी उसकी आँखे एक टक टी वी पर है .वे फोन पर बात करते करते .रुक जाती है ,..उसे आवाज देकर आँखे दिखाती है ..वो लड़की सहम कर चली गयी है ...चाय मुझे अचानक कड़वी लगने लगी है ....... ढेरो लोग अपनी निजी त्रासदियों से बाहर ना निकल सामाजिक सरोकारों से जुड़ नही पाते ओर जाने अनजाने उस जानिब झांकते नही है ,उनकी सवेदना कुछ कारणों के घेरे में ही सिमटी रहती है ....अगले ५ मिनटों में मै उनसे आने का वादा करके विदा लेता हूँ ..
घर पहुँच कर अनमने मन से टी वी का रिमोट उठाता हूँ.....लकड़ी की कुछ खपच्चियों को जोड़कर बनायी हुई जुगाड़ की एक नाव को चलाकर ८-१० साल की कुछ लड़किया रोजाना एक नदी को पार कर स्कूल जाती है ,राजिस्थान के इस गाँव में केवल दो लड़किया ही दसवी पास है.....NDTV की पत्रकार जब उनमे से एक बच्ची से पूछती है की वो क्या बनना चाहती है तो वो शर्माते हुए जवाब देती है "टीचर "
शुक्र है हौसलों की कोई उम्र नही होती .......
2008-09-05
जिंदगी........ जिंदगी..............जिंदगी

जिंदगी का मतलब...... जेब में चंद रुपये ... दो पुरानी यामहा ओर एक खुली सड़क है ,
जिंदगी का मतलब.... इम्तिहान से पहले की रात ,कभी समझ न आने वाली किताब ओर पाँच बेवकूफों के बीच बंटी एक सिगरेट है ,
जिंदगी का मतलब कुछ ग्रीटिंग्स कार्ड्स ,कुछ बेहूदा कविताये.....लड़किया ओर सिर्फ़ लड़किया है ,
जिंदगी का मतलब सुबह ३.३० बजे की भूख ......होस्टल के कमरे में रखा हिटर्स ओर एक मैगी नुडल्स है ,
जिंदगी का मतलब सर्दियों की एक शाम ,धीमी बारिश ,चार दोस्त ओर गर्म पानी में मिली व्हिस्की है ,
जिंदगी का मतलब ...आधी रात को बजे एक मोबाइल में बरसो से रूठे किसी दोस्त की नशे में रुंधी आवाज है
जिंदगी का मतलब ......................................दोस्ती है
सुबह एक दोस्त का मिला एस .ऍम. एस जिसे पढ़कर एक अधूरी नज़्म को अधूरा रहने दिया ...ओर यहाँ बेतरतीब सा कुछ उडेल रहा हूँ
जिंदगी का मतलब.... इम्तिहान से पहले की रात ,कभी समझ न आने वाली किताब ओर पाँच बेवकूफों के बीच बंटी एक सिगरेट है ,
जिंदगी का मतलब कुछ ग्रीटिंग्स कार्ड्स ,कुछ बेहूदा कविताये.....लड़किया ओर सिर्फ़ लड़किया है ,
जिंदगी का मतलब सुबह ३.३० बजे की भूख ......होस्टल के कमरे में रखा हिटर्स ओर एक मैगी नुडल्स है ,
जिंदगी का मतलब सर्दियों की एक शाम ,धीमी बारिश ,चार दोस्त ओर गर्म पानी में मिली व्हिस्की है ,
जिंदगी का मतलब ...आधी रात को बजे एक मोबाइल में बरसो से रूठे किसी दोस्त की नशे में रुंधी आवाज है
जिंदगी का मतलब ......................................दोस्ती है
सुबह एक दोस्त का मिला एस .ऍम. एस जिसे पढ़कर एक अधूरी नज़्म को अधूरा रहने दिया ...ओर यहाँ बेतरतीब सा कुछ उडेल रहा हूँ
2008-09-01
उस शायर को जो रेडियो मे घुसकर लोरिया सुनाता था
जिंदगी जब अपने नाखूनों से
रूह के जिस्म पर
कई खराशे छोडती है
ऑर वक़्त किसी सुद्खोर की माफिक
हर शाम नुक्कड़ पर खडा
दिन के हर लम्हे का हिसाब मांगता है .........
लफ्जो के ढेर पर बैठा
एक शायर
आहिस्ता आहिस्ता
अपनी हथेलियों मे छिपे
कई तसव्वुर
छोड़ता है
कितनी रूहे मुस्करा उठती है
सोचता हूँ कभी मैं भी जाकर
उन हथेलियों को छू आऊँ
ऑर
उस "लम्स" को सूरज पर रख आऊँ
लम्स =स्पर्श
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