2008-10-30

लो एक ओर दिन ख़र्च हो गया ज़िंदगी का

पिछले दो दिनों से एस .एम. एस ही बेगारी कर रहा है इतनी की कभी कभी डर लगता है की पलट कर गाली न दे दे के सालो अब बस करो ...मुझे भी तो आराम करने दो....पहला एस .एम .एस अमेरिका से है...ये साहब अमिताभ बच्चन साहब के बहुत बड़े मुरीद है,इतने बड़े की जिस पिक्चर मे अमिताभ बच्चन साहब मरते है उसका अंत ये नही देखते है…इनके मुताबिक वे ओस्कर के हक़दार है.....ये महाशय हमे दिन भर क्लास में पीछे बिठाकर उसी अंदाज में अग्निपथ के डाइलोग सुनाते ,...नाम दीना नाथ चुहान .उम्र ३७ साल गाँव मांडवा..... इन्होने अपने घर हमें इतनी बार ले जाकर अग्निपथ दिखायी है कि पूछिए मत… फिर ये हमसे पूछते है “अब क्या कहते हो”? “मिथुन की एक्टिंग लाज़वाब है ना”मै कहता हूँ……. आज़ वो अमेरिका मे है,मुझे पूरा यक़ीन है आधे से ज़्यादा अमेरिसियो को उन्होने अपने घर बुलाकर अमिताभ की पिक्चर दिखाई होंगी.

.दूसरा एस,एम एस बॉम्बे से है...ये साहब .हमारी लॉबी मे रहते थे, पूरे 5 साल (अंडर-ग्रॅजुयेट) के दिनों मे इन्होने कभी साबुन नही ख़रीदा , पूरी लॉबी के साबुनों से मल मल कर नहाते रहे…..P.G के दीनो मे चूँकि हॉस्टिल अलग हो गये तो बाद का हमे पता नही, पर साबुन का कौन सा ब्रांड ज़्यादा बेहतर है इनसे बेहतर कभी कोई नही बता पायेगा….
सुबह बजे -
छुट्टी वाले दिन जब आप चाहते है की आराम से सोयेंगे .पता नही नींद क्यों जल्दी खुल जाती है ...सुबह अब थोडी ठण्ड होने लगी है .छत पर घूमते घूमते मै चाय की चुस्किया लेता हूँ... बराबर वाले गुप्ता जी माली को सामने वाले खाली प्लाट में उग आई बेतरतीब घास को काटने को कह रहे है...पैसे मै दूँगा ...वे कहते है....पैसे शब्द पर उनका जोर है...वे बार बार उसे दुहराते है...मुझसे नजर मिलती है .हम दोनों मुस्करा देते है...मुझे याद आता है जब कभी हम खून देकर आते थे तो शर्ट की बाजू ऊपर चढा लेते थे ...परोपकार भी करना है ओर यश का लोभ भी है....ओर यश का लोभ उम्र के फर्क को नही मानता है...हर आदमी इसकी गिरफ्त में है..
रेडियो ऍफ़ एम पर रॉक ओन का गाना चल रहा है ...."पिछले सात दिनों में मैंने क्या खोया ".....मै सात सालो का हिसाब गिनने लगता हूँ ....बेफ़िक्री की दुनिया ,अल्ल्हड़पन ओर वो मासूम सी दोस्ती........जब प्रेक्टिस करनी शुरू की थी तो सोचता था की बस रोज का एक हज़ार बहुत है...पर जरूरते पूरी हो सकती है लालच नही.... दो घंटो बाद वही दुनिया शुरू हो जायेगी ...काम पर जाने से पहले का एक मुखोटा ...वही सड़के ..वही चौराहे ..वही हॉस्पिटल की गंध .जिंदगी है मगर भागी चली जा रही है .....


आज की त्रिवेणी

सुनो इस महीने हाथ तंग है थोड़े पैसे भिजवा देना
वो तुम्हारा चाँद जिसको तक कर की थी हमने ढेरो बातें .......

अपने तकादे को मुआ..... रोज दरवाजे पे बैठा रहता है

2008-10-20

चाँद कल गिर पड़ा था आँगन में

गांधी के पूर्णता शराब बंद राज्य के उस शहर के एक कोने में स्थित उस होस्टल में उस रात ये "एक्सीडेंटल डिस्कवरी "हुई .पहला जाम अभी पुरा हुआ नही था ..जगजीत सिंह की अभी केवल दो गजले हुई थी की अचानक "माइक "के शरीर में चीटिया सी रेंगनी शुरू हुई ..फ़िर चेहरा लाल ,ओर शरीर पर तमाम तरह की आकृतिया बनने लगी ..फ़ौरन रात के उस पहर में मोटरसाइकिल निकाली गई ओर स्किन डिपार्टमेन्ट के रेसिडेंट की तलाश शुरू हुई ,समस्या ये थी की उस हालात में जब बीमार भी पिए हुए हो ओर तीमारदार भी तो इस शर्मिंदगी को किसी मेल रेसिडेंट के सामने कमतर महसूस किया जा सकता था ओर डिपार्टमेन्ट में केवल  4 मेल रेसिडेंट थे दो उसमे लोकालाईट थे ,ओर बाकी बचे दो में से एक साहब अपने पैतृक घर गए हुए थे .बचे एकमात्र रेसिडेंट के बारे में विश्वसनीय सूत्रों से ज्ञात हुआ के वे किसी पिक्चर हाल में रात्री सिनेमा का आनंद ले रहे है. मोटरसाइकिल का रुख सिनेमा हॉल की तरफ़ मोड़ दिया गया ...पिक्चर थी मणि रत्नम की बॉम्बे .दो लोग अन्दर घुसे किसी तरह (कैसे लाये ये आज तक रहस्य है ओर होस्टल में इसके बारे में तरह तरह की किदवंतिया है) खैर सिनेमा हाल के एक कोने में माइक के कपड़े उतारे गये वही तुंरत -फुरंत उन्हें "एडलट्रेटेड अल्कोहल "(देसी भाषा में बोले तो मिलावटी शराब )से एलर्जी -ग्रस्त घोषित किया गया .

उसके बाद सोते ,उंघते ,या लाइब्रेरी में किताबो से जूझते माइक तो तीनो बोयस होस्टल में होने वाली किसी भी पार्टी के लिए उठा लिया जाता .पहला जाम उन्हें पेश होता , फ़िर  अगले  15 मिनटों  का  लंबा  इंतज़ार  उनके शरीर के कपड़े उतारकर गहरा परिक्षण होता . कही कोई निशाँ नही दिखता तो पार्टी का बिगुल बजता .
किसी आपातकालीन स्थिति के लिए लोग डेक्सोना ओर एविल के इंजेक्शन कमरे में रखते  ,साथ ही   स्किन डिपार्टमेन्ट के रेसिडेंट का उस रात का आगामी प्रोग्राम भी (उन दिनों मोबाइल जैसी चीजे आयी नही थी )
इस एलर्जी से हुए इन दुषपरिणामो से हताश ओर निराश होकर माइक ने दबंगों की शरण ली,आखिरकार  इस समस्या से निबटने के लिए सभी होस्टल की एक सर्वदलीय बैठक हुई . जिसमे सर्व सम्मति से ये निर्णय लिया गया की माइक केवल अपनी इच्छानुसार किसी भी पार्टी का आमंत्रण स्वीकार करेगे ओर उनकी सहूलियत के लिए सुबह ही होस्टल नोटिस बोर्ड पर नोटिस लगा दिया जायेगा की आज फलां बजे पार्टी है.


बाद के सालो में हमने स्किन डिपार्टमेन्ट ज्वाइन किया (तब तक मोबाइल आ चुका था ) खुशकिस्मती से हमने कई रात्रीकालीन शो निर्विरोध देखे ..ओर माइक के साथ हमने भी पी तब तक शायद मिलावट करने वालो का स्टेंडर्ड उठ गया था या उसके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता .
 ..ओर भारत ने मोहाली टेस्ट जीत लिया है ...चियर्स



आज की त्रिवेणी

रात भर तारो की बेवफ़ाई पर बड़बड़ाया है
तुम उठाकर इसको आसमान मे टांग देना .......
चाँद कल पी कर गिर पड़ा था आँगन मे

2008-10-17

छुट्टी ?

धूप जब किवाडो की दरारो से झाँककर
मेरे घर मे दख़ल देती है..
अलसायी सी मेरी नींद
उबासी लेकर उसको उलहाना देती है.
तुलसी का वो पोधा ,जो आँगन मे खड़ा है
धीमे लहज़ो मे
पानी ना मिलने की शिकायत करता है।
मेज़ पर रखी किताब के पन्ने हवा मे फडफ़ड़ाते है.......
पता नही.......
सबको कैसे मालूम है..
आज मेरी छुट्टी है.







चलते चलते एक त्रिवेणी -



जाने क्या निस्बत है कि शब जाते जाते
रोज याद का कासा छोड़ जाती है .....

हर सुबह एक लम्हा पड़ा मिलता है

2008-10-13

एक ओर रात अपने हिसाब से घटायी होगी ......


सुबह तकरीबन साढे सात का वक़्त है ...शहर का ये छोर इस वक़्त मसरूफ रहता है ... पाँच सौ मीटर या एक किलोमीटर के उस दायरे में तीन-चार बड़े बड़े पबिलिक स्कूल है , वही एक सड़क पर -बड़ी -छोटी कई किस्मों की गाडिया ...कही ड्राईवर का खिड़की से झांकता उनीदा चेहरा ..कही ट्रेक सूट में बेटे के बालो को तरतीब से लगाता बाप .....कही स्कूल के गेट पर किन्ही नन्हे कदमो का दूर तक पीछा करती किसी मां की नजरे ...स्कूल बस से उतरते बच्चो का शोर .....इन सबके बीच सड़क के उस पार ...तमाम भीड़ से गुजरती एक साइकिल ...उसके डंडे पर बनी एक छोटी सी गद्दी पर दो चुटिया ओर आँखों में काजल लगाये.....वो बच्ची साइकिल के कोने पर लगी घंटी को जोर से बजाती है ...फ़िर सर उठाकर अपने कंधे पर उसका स्कूली बस्ता टाँगे उसके पिता को मुस्करा कर देखती है.....उसका पिता उसके कान में कुछ कहता है...फ़िर घंटी को बजाता है....
बड़ी बड़ी गाडियों के इंजन ओर हार्न के बीच उस घंटी की आवाज ........जैसे जिंदगी अपनी शिनाख्त करती है !












एक बूढे नायक के पेट दर्द की मेडिकल रिपोर्ट मीडिया देश को हर घंटे ख़बर दे रहा है .. इस दौरान सौ करोड़ की इस आबादी वाले उस देश में जिसमे अभी अभी परमाणु करार पर हस्ताक्षर अधिक्रत रूप से हो गये है ....७० फीट गहरे बोरवेल में गिरे दो साल का वो नन्हा बच्चा जिंदगी से अपनी जंग हार गया है .....

2008-10-09

ये भी क्या कम इत्तेफाक हुआ है मेरे साथ ,हर शै मिल जाती है इत्तेफाक़न वो नही मिलता

वक़्त
के मोडो पर
कई बार
बेसबब ही रुका हूँ
ये सोचकर
क़ी शायद
मिल जायोगी तुम कही.....


तुम्हारे शहर के एरपोर्ट से जब भी गुज़रता हूँ
वेटिंग लाउंज मे ,बाहर चेहरो क़ी भीड़ को
देख कर सोचता हूँ
गर
तुम किसी को छोड़ने आ जाओ ……..

बीच शहर क़ी दुकानो पर झाँकते हुए गुज़रता हूँ
कि
शायद किसी गोल्गप्पे क़ी दुकान पर
'खट्टा मीठा पानी"पीती हुई तुम दिख जाओ
या सड़क किनारे किसी मेहंदी वाले से
किसी नये डिजाईन मे उलझी हुई….
या किसी होटेल के वेटर से "रेसीपी "पूछती हुई

क्या अब भी बारिशो मे
मोटरसाइकल के पीछे बैठकर शोर मचाती होगी तुम!
क्या अब भी सर्दियों में
काँपते हुए आइसक्रीम खाती होगी तुम !
क्या अब भी सिगरेट छीनकर
लंबे लंबे कश लेकर खांसती होगी तुम !
क्या अब भी
खुले बालो मे अच्छी दिखती होगी तुम!
कैसी होगी तुम?
साड़ी पहनने का बहाना ढूँढती थी उन दिनो,
तब ब्लेक साड़ी फ़ेवरेट थी तुम्हारी.......
आजकल मेरी है!
कभी किसी को छोड़ने आ जाओ ........













सिगरेट की डब्बी पर लिखे गये कुछ बेतरतीब से लफ्ज़ .....................कई बार ये सोचकर ही लिख लेता हूँ कि शायद पढ़ लोगी तुम कही ?

2008-10-06

यादो की गलियों से गुजरता आज

शनिवार २७ सितम्बर रात साढे सात बजे नॉएडा -

अट्टा मार्केट में करीम के रेस्टोरेंट के सामने हम दोनों सिगरेट का कश लेते है,मै कभी -कभी उस जैसे किसी पुराने यार के मिलने पर पीता हूँ ,पर हम दोनों में से किसी को भी रामदौस से नाराजगी नही है अजीम पिछले तीन साल से नॉएडा में है .....हर साल अलबत्ता उसकी कम्पनी बदल जाती है इस वक़्त वो एयरटेल में काम कर रहा है उसके चाचा जायसी साहब ढेड साल तक हमारे किरायेदार रहे ओर अजीम अक्सर उनके यहाँ आता रहता ,हम उम्र था इसलिए हम दोनों में छानने लगी ,जायसी साहब का बेटा इरफान जहाँ किताबो में घुसा रहता ,अजीम मुझे मेहंदी हसन की गजले सुनवाता ."रंजिश की सही "तीन वर्ज़न में सुनी ...स्लो ...फास्ट...मेहंदी हसन से मेरा तार्रुख उसी ने करवाया था ,मै सिर्फ़ दो वक्तों पर उसके लिए बददुआ मांगता एक जब वो बैटिंग कर रहा होता ओर दूसरे छोर पे मै बोलिंग ..(कमाल का बैट्समन था वो.)..दूसरा जब वो एक ख़ास लड़की से गुफ्तगुं कर रहा होता ..
जिस तरह मै गुजरात को होस्टल के उस छोटे से समूह से याद नही रखता जो मुझे या मेरे दोस्तों को 'नॉर्थ इंडियन "होने की वजह से परेशान करता था ,वो भी अपनी तकलीफों ओर कडवाहटो को अपनी पीठ पर लेकर नही घूमता वो पांचो वक़्त नमाज नही पढता ठीक वैसे ही जैसे मुझे मन्दिर गये ज़माना हुआ ,उसे भी इमाम बुखारी से उतनी ही नफरत है जितनी मुझे तोगडिया से ..वो भी सैयद शाहबुद्दीन या हाजी अख़लाक़ के बोलने पर उतना ही बैचैन होता है जितना मै राज ठाकरे के ,ना उसके चेहरे पर गज भर की दाढ़ी है ओर न मेरे सर पे चोटी ....
हफ्ते भर की मेहनत के बाद एक छुट्टी वाला दिन ....दो वक़्त की रोटी ... बस यही मेरी उसकी ख्वाहिशे है


जाने क्यों पंजाब के कवि हरभजन की एक कविता याद आ जाती है
तुम्हारे पास ताकत है लट्ठबाज है ,
बंदूके है ओर वक़्त की सरकार पीठ पर है
मेरे पास कागज है ,किताब है
कलम है ओर कविता



2008-10-03

कितने आसमां ?

गो कि  मुख्तलिफ किस्म की मसरूफियत  है  बाज़ मर्तबा किसी अजनबी से देर तक  कम्प्यूटरी गुफ़्तगूं ज्यादा आसां है  बनिस्बत इस शहर में कुछ किलोमीटर की दूरी पर किसी दोस्त से रूबरू मिलना .फुर्सत भी ख्वाहिशो कि फेरहिस्त में में अपना वजूद बनाये हुए शामिल है   . शाम को क्लिनिक आते वक़्त रास्ते से गुजरता हूँ सड़क के दोनों ओर नजर डालता हूँ ..इश्तेहारों की दुनिया ही जैसे असल दुनिया है सबने अपने अपने सच के बड़े बड़े होर्डिंग लगा रखे है . कुछ दूरी पर एक 6 साल का नन्हा सा बच्चा अपनी 3 साल की बहन की साइकिल ठीक कर रहा था,उसके घुंघराले बाल है .वो इस कदर साईकिल मे झुका हुआ है कि मन करता है गाड़ी से उतर कर उसकी मदद कर दूँ .
बाज लम्हे  जब गुजरते है आप उनसे बेपरवाह होते है  वे आहिस्ता में आपकी मेमोरी सेल में जमा होते जाते है .फिर किसी रोज अचानक वे  जिंदगी में बिना डोर बेल बजाये यूँ दाखिल होते है के लगता है जैसे वक़्त ने कोई मुआवजा हाथ में रख दिया है . एक रिवाइंड  बटन दबता है उन मेमोरी सैल में फौंरन  छलांग लगवाता है .
 पल्स पोलियो का वो दिन याद आता है , जब हम एम् .बी.बी.एस के फाइनल ईयर मे थे ओर हम दो दोस्तों बतोर ओबसर्वर    सूरत के एक इलाक़े में थे .  5 साल तक के बच्चे तक को पोलीयो ड्रॉप पिलानी थी. मुझे याद है मौसम करवट ले रहा था सब अपना सामान समेट रहे थे . वो अपनी छोटी सी साइकिल  के  पीछे ने 3 साल के भाई को बिठा कर लाया था. कुछ देर  जाने क्या देखता रहा फिर बोला था "अंकल" इसको भी दवा पिलायो ना". उसकी उम्र शायद छह रही होगी . उसके घुंघराले  बाल उसके छोटे भाई से एक दम मैचिंग मैचिंग  थे ऊपर आसमान में बादल गरजा  था ओर नन्हे ने डरकर बढे  का हाथ पकड़ा था .इतने सालो  बाद भी वो सूरते वैसी ही रिकौल होती है. वैसी ही.

टेक्नोलोजी के इस युग में क्या सब कुछ बदल गया है ? पढ़-लिख कर हम सिर्फ़ अपनी असहमतियों को अलग अलग किताबो से इकठ्ठा कर जमा करके रख रहे है ,हमारी सोच की ताकत उस गली की ओर मुड गयी है जिसमे सिर्फ़ अपने फायदे -नुकसान है ,जिसके मुहाने पर बड़ा बड़ा दुनियादारी लिखा हुआ है .
रिक्शे वाला अब भी हाथ से पसीना पोछता है ,मंजिल पर पहुंचाकर सहमे सहमे पानी मांगता है ओर उसे अगर फ्रिज का ठंडा पानी गिलास में भर कर दे दिया जाए तो असहज हो उठता है ,उसे इसकी आदत नही है वो फ़िर भी अपनी हथेली में पानी उडेल कर ऑक से पीता है मुझे न जाने क्यों . मुंबई के जसलोक हॉस्पिटल का वो करोड़पति बाप याद आ जाता है जिसके १८ साल के बेटे को कैंसर था उसने मुझे आंसू भरी आंखो ओर रुंधे गले से कहा था की "मैं सोचता था की पैसे से सब कुछ खरीद लूंगा पर अपने बच्चे को नही बचा पा रहा ....

.कही कोई तो ईश्वर है जिसने कुछ अपने पास रखा हुआ है .....!

कही जुस्तजू की ऊँची परवाज है
कही सतरंगी धनक वाले तसव्वुर है
कही गुमानो के सूरज है
कही हकीक़तो  की बर्क़ है
कही हौसलों के परिंदे है
कही तअल्लूकातो  का पूरा चांद है
कही मरासिमो के टूटते तारे है
कही रवायतो की धूप है
कही अदब की छाँव है
कही जनून की बदली लिये हुए ...


हर उम्र का एक अलग आसमां है !!








परवाज=उड़ान ,तस्सवुर=कल्पना ,बर्क़=बिजली
हिज्र=जुदाई ,मरासिम =रिश्ते

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