उन लम्हों का कर्ज ........

कुछ प्यादे है
जात के
कुछ प्यादे है
धर्म के
कब आगे बढ़ेगे
नही जानते
इस खेल के
नियम नही
कही भी खेलो
जैसे भी
कैसे भी खेलो
तय है
दोनो सूरतो मे
वे जीतेंगे
प्यादा ही हारेंगा
फिर भी
ये खेल है
व्यवस्था का
जिसमे खेलने वाले
बदलते है
प्यादे वही है
हम तुम
देश हारता है
हारने दो
धर्म तो जीतेंगा
जात भी
इंसान हारता है
हारने दो
घ्र्णा तो जीतेंगी
अविश्वास भी
कितने प्यादे है
क़तार मे
क़वायद जारी है
खेल की........



उन ४९ घंटो में हम आप नही ठहरे न ही देश के दूसरे हिस्से ...लोग रोज की तरह ऑफिस गये.बच्चे स्कूल गये ....कामकाज चलता रहा ....पर शायद कही एक हिस्सा रुका रहा .. ४९ घंटो तक......
जाबांज ओर देशभक्त सिर्फ़ जान न्योछावर करने के लिए नही होते ...वे देश की अमानत भी होते है ....हम कर्जदार है इन लोगो के ओर ऐसे तमाम गुमनाम लोगो के जो अपनी लडाई खामोशी से लड़ते है .इस देश की खातिर ,हमारी आपकी खातिर ..... दो दिन मोमबत्ती जलाकर उन्हें याद करने से हम ओर आप इस बलिदान से मुक्त नही हो पायेंगे ...हमें ओर आपको ओर ज्यादा अनुशासन लाना होगा अपने जीवन में .ओर कही न कही वही अनुशासन अपनी अगली पीडी में रोपना होगा .....हमें ओर आपको ओर बेहतर नागरिक ओर बेहतर भारतीय बनना होगा

मुझसे मुख्तलिख एक शख्स मेरे जेहन मे आवारा सा फिरता है


प्लेन की सीट पर बैठे बैठे मेरी ऊँघ को उस चार साल की बच्ची का सवाल तोड़ता है जो मेरे दांयी ओर की सीट पर बैठी है जिसके पास सवालों की बड़ी पोटली है ओर पिछले पन्द्रह मिनटों मे उसमे से कई सवाल निकले है ....उसका एक सवाल अपनी माँ से है...एरोप्लेन कहाँ पार्क् होगा ?माँ मजबूरी मे बाप को देखती है जो हेड फ़ोन लगाकर म्यूजिक सुन रहा है....बच्ची अपना सवाल दुहराती है...मेरे बराबर मे बैठे डॉ साहब अपने कान के दर्द को भगाने के लिए जोर जोर से अपना कान मल रहे है .....इंदोर से दिल्ली लौटते वक़्त इस प्लेन को कुछ वक़्त भोपाल हवाई अड्डे पर भी बिताना है ...........मै फ़िर अपनी आँखों पर चश्मा चढाकर एक मुस्कराहट जेट की उस खूबसूरत एयर होस्टेस को दे कर आँखे बंद करने की कोशिश करता हूँ ....कुछ मिनटों बाद मुझे वापस उसी दुनिया में लौटना है .....जहाँ मोबाइल स्विच ऑफ़ करना एक सामाजिक अपराध है ,उस दुनिया में ...... जहाँ ड्रग रिअक्शन के उस ३० साला मरीज को जिसे असल मे आई .सी यू में एडमिशन की दरकार है ...पर पैसे एक बहुत बड़ा सवाल बनकर उसके बूढे माँ बाप की खामोशी मे सुनाई देते है .....उस दुनिया में .....जहाँ तीमारदार आपसे इसलिए निगाह बचाते है की कही आपकी" विजिट" का बिल उन्हें अपनी जेब से न देना पड़ जाये .....उस दुनिया में....जहाँ ढाई साल के बच्चे की गरीब मां उस वक़्त भयभीत भरी निगाह से देखती है .. जब वो अपने जले पाँव पर ड्रेसिंग करवाते वक़्त आपकी महँगी टाई पर सू सू करता है......उस दुनिया में ....जहाँ बोटोक्स के इंजेक्शन में उम्र से लड़ने की कवायद है ...जहाँ लेजर के साथ सपनो की मार्केटिंग है .. उस दुनिया मे ......जहाँ शामिल होने से पहले आप ये भरम रखते है कि ये दुनिया इस देश की ईमानदारी का अस्सी प्रतिशत बोझा ढो रही है ......उस दुनिया में जहाँ जहाँ चीजो को तटस्थता से देखने की आपकी कुशलता आपकी योग्यता का पैमाना है .....मुझे अपने दोस्त रघु का फलसफा याद आता है जो उसने अपनी अलमारी पे स्केच पेन से कुछ शेरो के बीच लिखा हुआ था ....मै इस दुनिया का बाशिंदा हूँ जहाँ गरीबी एक संक्रामक रोग है....जिसका कोई वैक्सीन कभी ईजाद नही हुआ ..जिसके जीवाणु शायद हर महीने म्यूटेट होते है .......प्लेन लैंड हो रहा है........फ़िर से वही जद्दोजेहद......

खींच देता है दलीलो की लकीर
हम दोनो के दरमियां
उलझता है मेरी ख्वाहिशो से,
टोकता है मेरी जुस्तजुओ को.........
जुदा है मेरे रास्तो से
जिद्दी भी है ......मगरूर भी है थोडा
यादो के टीले पर अक्सर तन्हा खड़ा मिलता है
मुझसे मुख्तलिख एक शख्स........

मेरे ज़ेहन मे आवारा सा फिरता है








आज की त्रिवेणी -
सफ्हे डर सफ्हे कुछ देर रूकती है
कुछ लफ्ज़ टटोलती है ,कुछ हर्फ़ पलटती है ......

हर शब् एक नज़्म अपनी शनाख्त करती है


सफ्हे =कागज ,हर्फ़ =शब्द ,शब् =शाम शनाख्त= पहचान

जाग जायेगा कोई खवाब तो मर जायेगा


अब बजाज स्कूटर बुक कराकर महीनो इन्तजार करने की कवायद नही है...फोन बूथ पर लम्बी लाइने भी नही है ....न पड़ोसी के यहाँ ट्रंक कॉल सुनने के इंतज़ार की असहजता ....अब छोटी सी कार मोहल्ले में कोई उत्तेजना पैदा नही करती है...देश हाई टेक हो रहा है ......मोनोपोली ख़त्म हो गयी है....अ अपने खांसते बच्चे को घर छोड़ "गिल्ट "में दबी कामकाजी माँये है ...ख्वाहिशो के एवेज में कैलेंडर में लाल घेरो में कैद तारीखों पर ..... एम आई की मुहर है अब बच्चे मेकडोनल में बर्गर खाकर भूख मिटाते है... . .मंहगे डाइपर में सू- सू करते है .. .फ़िर महँगी एंटीबाओटिक खाकर अपनी बीमारी भगाते है..........
इस देश को शायद सबसे ज्यादा पढ़ा लिखा प्राइम मिनिस्टर नसीब हुआ है....अमेरिका का नव निर्वाचित राष्टपति भी भारत की प्रतिभा से अपने यहाँ नौकरी के खतरे महसूस करता है.....अब आतंकवाद आतंकवाद नही रहा है....हिंदू आतंकवाद ....मुस्लिम आतंकवाद बन गया है.....इस शब्द के खोजी की सब पीठ थपथपा रहे है........
१३ साल का सोनू अब भी उसी ढाबे में है....तीन साल में उसने रिन ओर निरमा की टिकिया में फर्क सीख लिया है....हाथ में आते ही पहचान लेता है की कौन सी असली है ओर कौन सी नकली .... कम पानी में बर्तन धोने के उसके हुनर का कोई सानी नही..... ग्राहक को पहचानने लगा है ...सिगरेट लाकर देने में बचे पैसे कैसे मालिक से बचाकर अलग अलग रखने है ...ताकि सिक्के आवाज करे ...सब जान गया है.....इंडिया हाईटेक हो गया है....टी वी में रियल्टी शो देखा है उसने.....सर्दियों में ...पैबंद पुराने कम्बल में उकडू मारकर कर भी उसके सपने सिकुड़ते नही है....रोज सुबह स्टेज पर उसे जाते हुए देख ... उसकी माँ अपने पल्लू से आंसू पोछती है ...पीछे से तालियों की आवाज .में कोई उसका नाम पुकारता है...घुटने मोड़कर इस भद्दी आवाज को अनसुना करने की कोशिश ..रोज बेकार जाती है ........कसकर आँख बंद कर स्टेज को दुबारा पकड़ने की एक पुरजोर कोशिश .... बर्तनों की आवाज ...

गर्म पानी के भगोने में रोज सुबह उसकी उपस्थिति दर्ज होती है ,गल्ले पे अगरबत्ती घुमाते मालिक को देख उसके होठो पे मुस्कराहट आयी है ..इंडियन आइडल का गाना गुन गुनाते हुए वो बर्तन मांजना शुरू कर देता है.....
तिरंगा चाँद पर लहरा गया है इंडिया अब "ऑफिशियली हाई टेक" हो गया है



आज की त्रिवेणी-

चिलचिलाती धूप ओर छाँव का बँटवारा हुआ है
ज़िन्दगी की कचहरी मे बेनामा लिखा है

रसूखवालो ने मौसम को रिश्वत दी है

एक टुकडा नज़्म का मेरी साँस मे सरकता रहा

दोनों नज्मो का मिजाज अलग है....एक अक्सर किसी मोड़ से गुजरते वक़्त मिलती है दूसरी इस मसलसल भागती बेसबब जिंदगी में वक़्त- बेवक्त मुझे आइना दिखाती है .......


सुबह से छेनी हथौडे खोल रहे है
उसके जिस्म की तहे …
जिद्दी है मगर रूह उसकी
ना कोई आह है ,ना दर्द की शिकन है चेहरे पर
बस इक हवा है
जों कभी कभी दबी सी सिसकिया भरती है
खामोश खडी है धूप भी
गमजदा सी लगती है ।
जख्मी बदन से
बेतरतीब सी कुछ दुनिया
बाहर निकली है
कोनो पे खडी कुछ बेबस आंखो मे
थोडी नमी भी उभरी है
कितने वाकये ,कितने हादसे
शिरकत करने आये है
क़त्ल मे शामिल
कुछ लोग भी सर झुकाये है

मुफलिसी दोस्त थी उसकी ,
वो मुफलिसों का दोस्त था

आओं इस फुटपाथ को दफ़न कर आये .


(२)
रहने दो चन्द ख़ुशनुमा यादे
वक़्त क़ी तहो मे,
ज़िंदगी हमेशा मन- मुताबिक़ नही होती
अब जब ,
मिलते है बचपन के दोस्त,
ना वो फ़ुरसत होती
ना वो पहले सी ख़ुशी होती


आज की त्रिवेणी

कासिद बनकर आया है बादल
कुछ पुराने रिश्ते साथ लाया है .....

आसमान से आज कई यादे गिरेंगी

तुम्हारे हिस्से का चाँद अब भी चमकता है .....

वो किसी सेमीनार में स्पीकर बनकर मेडिकल कॉलेज में आयी है ..इसलिए घर आकर लंच साथ करना मुश्किल है ...आज ही वापसी है रात ८ बजे की ट्रेन है। शाम साडे छ बजे तक वो फ्री हो जायेगी ......मै वक़्त से १५ मिनट पहले मेडिकल कॉलेज पहुँच जाता हूँ.एक मिस कॉल देता हूँ उसके फोन पर ..फ़िर गाड़ी में बैठकर उसका इंतज़ार करता हूँ.....बाहर आकर वो गाड़ी में बैठते ही एक नजर मुझ पर डालती है...
.तुम्हारे बाल उड़ रहे है अनुराग !
हाँ , तभी मुझे आजकल हॉलीवुड के हीरो पसंद आते है .मै मुस्कराकर उसको जवाब देता हूँ ......
तुम्हारे दोस्त ने तुम्हारे लिए कुछ भेजा है ...मै निगाह डालता हूँ एक शानदार टाई है ..तुम्हारे पहनने का शौंक उसे याद है...वो कहती है ..मै ड्राइव करता सिर्फ़ मुस्करा देता हूँ...ओर तुम्हारा दूसरा शौंक अभी जिंदा है या ?वो मेरे लिखने के बारे में पूछती है...हाँ कभी कभी कलम-घसीटी कर लेता हूँ....घर आ गया है.....हम तीनो ने सात आठ साल एक साथ एक ही मेडिकल कॉलेज में गुजारे है .उन दोनों की लव मेरिज है.
औपचारिकताओ के दौर के कारण हम घर में अपने तय समय से आगे है ...उसे स्टेशन छोड़ने के लिए मेरा बेटा भी साथ आता है मै उसे मॉल रोड वाले रास्ते से ले जाता हूँ ताकि मेरे शहर के बारे में उसके ख्याल अच्छे रहे ...ये इलाका थोड़ा साफ़ सुथरा है ..स्टेशन पर हम वक़्त से पहुंचे है....गाड़ी अभी खड़ी है.....
दोस्त कैसा है ?मै उससे पूछता हूँ .कॉलेज टाइम में वो उसे दोस्त ही कहा करती थी ...
दोस्त! .......अब सिर्फ़ पति है....
हम दोनों थोड़ा तेज चलकर उसके कम्पार्टमेंट तक पहुँचते है वो गाड़ी में चढ़ गयी है......."तुम सारे मर्द शादी के बाद सिर्फ़ पति हो जाते हो.....वो हंसती है......ट्रेन ने सीटी दे दी है..........मेरा बेटा उसे हाथ हिलाकर बाय करता है



आज की त्रिवेणी .....
याद है उस रोज बांटा था आधा आधा
तुम्हरी गोद से चकोर नजर आता था ....

तुम्हारे हिस्से का चाँद अब भी चमकता है

बीच सड़क से .......

सुबह गाड़ी बाहर निकालने के लिए गेट खोलता हूँ तो गली में साइकिल पर बैठा आदमी जोर जोर से चिल्ला रहा है जोडो के दर्द ,कमर दर्द ओर पैरो की सूजन के इलाज़ का मर्ज बेच रहा है ,उसके कंधे पर एक झोला है ..इस "मोबाइल डॉ "के दर्शन पर मै मुस्करा उठता हूँ ..किसी भी प्रकार की खुजली ....एक्जीमा ...उसका विज्ञापन जारी है...अरे साला ये तो मेरे पेट पर भी लात मार रहा है .... बीच सड़क पर आते ही आपकी आज़माइश शुरू हो जाती है अपने ठिकाने तक पहुँचते पहुँचते आपके धेर्य की अनेको परीक्षाये हो चुकी होती है. ट्राफ़िक सिग्नल पर कोई रुकने को तैयार नही है, क्रॉसिंग पर आप लाइन मे गाड़ी मे खड़े है, एक महाशय लंबी चौडी गाड़ी लेकर तिरछी कर खड़ी कर देती है, बाक़ी ट्राफ़िक गया भाड़ मे, कोई ट्रक सड़क पर मूड रहा है, उसका हेलपर हाथ देकर रुकने का इशारा कर रहा है की कुछ मोटर साइकल वाले उसकी साइड से निकल कर भागे जा रहे है, ...सड़क के कोने पर एक लड़की जींस ओर टी शर्ट पहन कर सिमटी सिमटी सी जा रही है .. कोने पर खड़ा पेटू पुलिस वाला भी ओर लोगो की तरह उसे घूर रहा है ...उसके ठीक पीछे बोर्ड लगा है .उत्तर प्रदेश सदैव आपकी सहायता के लिए तत्पर -सौजन्य से कविता साडी ...
सोचता हूँ चरित्र प्रमाण पत्र हर महीने में रिवीयू होना चाहिये..केवल नौकरी में दाखिले के वक़्त ही इस देश में चरित्र की जरुरत समझी जाती है ..... एक साहब गाड़ी बीच सड़क मे खड़ी करके अपने दोस्त से बतिया रहे है ओर हॉर्न देने पर ऐसे घूरते है जैसे मैग्राथ चोका पड़ने पर बेट्समेन को घूरता है. .....आगे बढ़ता हूँ ....पेट्रोल पम्प जाने के लिए एक गली से मूडना पड़ेगा तो पूरी गली मे तंबू तना हुआ है की आज जागरण है.उनकी भक्ति महान है.पेट्रोल पम्प पर पहुँच गया हूँ.....मेरे आगे एक मोटर साइकिल है ...दस रुपया का ? पेट्रोल पम्प का सेल्समेन इतनी हैरानी से बोलता है .की बेचारे लड़के शरमा जाते है .उनकी उम्र १९-२० साल है ...पेट्रोल भरवाते भरवाते भी दस रुपये मेरे दिमाग में घूम रहे है ...
जब चलते चलते अचानक जोरदार झटके लगने शुरू हो जाते....कुछ फासला खींच कर वो बीच सड़क में घोडे के हिनहिनाने जैसी आवाज के साथ बंद होती ...पीछे बैठने वाला सिर्फ़ एक सवाल पूछता जिसका जवाब उसे मालूम होता ,..पेट्रोल ?वो सर खुजाते हुए कहता भूल गया. .उसकी याददाश्त कई सालो तक ऐसी ही रही .....फ़िर पूरी मोटरसाइकिल को सड़क पर लिटाया जाता ,हिलाया डुलाया जाता फ़िर ,सीधी करने के बाद वो हिनहिना कर स्टार्ट हो जाती .. कुछ फासलों के बाद अगर पेट्रोल पम्प दूर तक नजर नही आता ....तो फेफडो में हवा भर कर पूरी ताकत से पेट्रोल की टंकी में हवा भरी जाती .बरसो ये सिलसिला चला , कही किसी पार्टी में जाना हो या मूवी देखने आप सड़क पर एक बार ज़रूर हिनहिना कर रुकेगे . सबसे कमाल की बात तो यह होती की आधी रात आप पेट्रोल पम्प वालो से मिन्नतें करके उन्हें नींद से उठाते फ़िर ये महाशय कहते “10 रुपये का डाल दो .उस पर ये चलते चलते कहते पेट्रोलमै सिविल हॉस्पिटल में हूँ कोई काम हो तो बताना . ….सिविल हॉस्पिटल का नाम इस तरह इन्होने कई बार रोशन किया .हम बाकी दोस्तों के पास बाद में यामहा आर एक्स १०० रही ,पर इस होंडा मोटरसाइकिल की वजह से हम सब इन्फीरियरटी काम्प्लेक्स में रहे ....होंडा वालो ने भी दुबारा ऐसी मोटरसाइकिल नही बनायी ...
पीछे हार्न बज रहा है...रेडियो ऍफ़ एम् खोलता हूँ .....बाबा रामदेव ने कैंसर के मरीजो को ठीक करने का दावा किया है...यश को संभालना भी बड़ा मुश्किल है जी.......




आज की त्रिवेणी

कई बार टोका है यूँ बेवक्त
नंगे हाथो माजी न कुरेदा करो.......

कुछ लम्हे बड़ी तेज चुभते है

ओर हाँ आज कुश का जन्मदिन है ...दुआ करे उनको अलादीन का चिराग अनलिमिटिड ख्वाहिशो के पैकेज में मिले ...