2009-03-29

नेपथ्य का स्केच ??


उसके एक हाथ में किताब है ,दूसरे में चाय का डिसपोसेबल ग्लास ..रुकी ट्रेन में से वो परदे हटाकर बाहर देखता है प्लेटफोर्म पर बीडी फूंकते कुली के पीछे अर्धविक्षिप्त सा कोई बूढा है ...उसके बराबर में हांफता कुत्ता . ... वो बूढे को गौर से देखता है ओर उसकी दुनिया को .........जहाँ हर दिन एक दुस्हास है ....शीशे के पार गंध नहीं आती पर वो जानता है हर प्लेटफॉर्म की एक सी गंध होती है .... समाज का मेटामोरफोसिस नहीं होता ?,वो सोचता है .....
चाय का घूँट भरते हुए वो फिर किताब के पन्नो से होता हुआ इतिहास में विचरता है .इतिहास कभी कन्फेस नहीं करता .....पर उसके कुछ आरक्षित पन्ने मानो उससे जिरह करते है .अलिखित सा कुछ झांकता है ..... ये महज संयोग है ,किसी युग पुरूष या महान व्यक्ति के नेपथ्य में उसके किसी अपने का ही चेहरा दिखता है .गांधी के पीछे कस्तूरबा .राम के पीछे सीता .लक्ष्मण के पीछे उर्मिला ..बुद्ध . या . विज्ञान का कोई महान ज्ञाता .... ...ऐसे कितने चेहरे है ..जो बिना अपनी हिस्सेदारी मांगे खामोशी से हमें इतिहास का एक उजला पक्ष दे गये है ....क्या नेपथ्य अनिवार्य शर्त है विधान की ......इस नेपथ्य के बिना इतिहास का चेहरा कैसा होता ? वो सोचता है ......पर एक आहट उसे वापस खींचकर वर्तमान में लाती है ...बूढा शीशे पर हाथ टिकाये ट्रेन के भीतर झाकने की कोशिश कर रहा है ....अन्दर कोई उसे भगाने की कोशिश ......ट्रेन चल पड़ी है ...बूढे के हाथो ने जैसे कोई तस्वीर कांच पे छोडी है ...क्या ये भी वर्तमान के नेपथ्य के किसी हिस्से का स्केच है ?




"सूखा"

एक आहट ओर उम्मीद की कई आँखे जाग जाती है
फलक के रास्ते पर कब से बैठा है पूरा गाँव......

लगता है इस साल फिर "बेईमानी "कर गया बादल

2009-03-24

कोई सिलवट नहीं ... इस चेहरे पे


वो चेहरा बिना मुस्कान का चेहरा है .. ...रिकंसट्रक्ट चेहरे ऐसे हो होते है बिना मुस्कान ओर गम के ...
९८ में श्रीनगर में किसी माइन पे उसकी बटालाइन में से किसी का पैर पड़ा था ...वो भी हवा में उडा नीचे आया तो एक पैर ,हाथ की दो अंगुलिया ओर अपना चेहरा खो चूका था ....कजिन का दोस्त है ..आपकी आवाज में जरा सी नरमी उसे चौकन्ना कर देती है ...आँखे एक्स रे की तरह आहिस्ता आहिस्ता आपकी चमड़ी के भीतर कही उतर कर जैसे तलाश करती है की सहानुभूति का कोई अंश तो नहीं..... एक कोने पे दो शराबी रेस्तरा वाले से लड़ रहे है ..उसकी निगाह उधर उठी है मेरी भी...क्या सोचता होगा ये ?....एक काफी पीकर वो विदा लेना चाहता है विदा लेते समय समय कुर्सी से उठना चाहता हूँ पर उस आवाज में अजीब सी ठंडक है की मै उठता नहीं ...........
धातु के छोटे छोटे टुकड़े इंसान की जिंदगी में कितना खलल डालते है ... इंसान को ख़त्म करने के नए नये नुस्खे ....उसको गये करीब दो घंटा हुआ है...पर मन में अभी भी धातु के टुकड़े फंसे हुए है ...अचानक दिल में ख़याल आता है उस आदमी का .. ..जिसने ६ अगस्त १९४५ हिरोशिमा पर बम गिराया ... क्या सात अगस्त से उसकी दुनिया में सूरज उसी तरह उगा होगा ...किसी नन्हे बच्चे को खिलखिलाते देख क्या उसके दिमाग में कुछ सवाल उठे होगे ... ...कम्पूटर पर अंगुली दबती है ......
छह अगस्त १९४५ को वारफील्ड तिब्बेट्स जूनियर .की उम्र महज़ ३० साल थी .. . .उस वक़्त ..उनका कहना था ..उन्हें अपने किये का कोई रिग्रेट्स नहीं है....६२ साल तक वे उसी बेफिक्री की नींद लेकर सोये ....

"there are no Marquess of Queensberry rules in war."
९२ साल की उम्र में उनकी मौत हुई .....क्या उनकी सोच उनकी ट्रेनिंग का नतीजा है ..... युद्ध में .सिपाही पूछता नहीं है....उसकी ट्रेनिंग का मकसद शायद उसके सवालो को ख़त्म करना है ... पर युद्ध के बाद .?क्या हर सिपाही के सवाल ख़त्म हो जाते है पर कुछ सवालो के जवाब कम्पूटर नहीं देता ...





चौबीस मार्च के लिए

किसी सफ्हे पे किसी नज़्म की जानिब ढूंढो
वक़्त की गलियों में आवारागी के निशान मिलेगे

कुछ सालो पे हमारा इख़्तियार आज भी नहीं


या यूँ कहिये (रिवर्स त्रिवेणी )

ज़िंदगी क़ी क्रिकेट यूँ चली

खुदा मेडन ओवर फेकता रहा
किस्मत क्लीन बोल्ड करती रही



इस उम्मीद में के अगले कुछ ओवर टी ट्वेंटी की माफिक साबित होगे ..

2009-03-19

पहली बारिश !!!


बारिश की बूंदे जब किसी शाम को भिगोती है .. विंडस्क्रीन पर एक तलब उभरती है .. ... माजी की गलियों की इक तस्वीर.... ... कितने रंग है उसमे ..गिनने की कोशिश ... .. .. वाइपर खामोश रहता है...जैसे किसी की आमद का इंतज़ार हो... ......सिगरेट के धुंये की चादर में धुंधले से कुछ अक्स उभरते है ...ओर गुम हो जाते है....

इत्तेफ़ाकॉ के मोडो पे,
कुछ खवाहिशे छोड़ आया हूँ,
एक रिश्ता अब भी दरमियाँ है
उसके
ओर लफ्जो के बीच
बे-इरादा
कुछ कोरे कागज
छोड़ आया हूँ

बड़ी खुश्क हुआ करती थी वो आँखे,
बादल का इक टुकड़ा
काट के घर लाया हूँ
साल की पहली बारिश है आज .........

2009-03-16

कितनी नफ़ीस बुनावट थी....... इंसान ने उधेड़ दी दुनिया.

बनारस के उस रस्ते पे शुरुआत में सीधे हाथ पर में एक गुरुद्वारा है...थोडा आगे चलने पर चर्च .....सबके जुदा जुदा भगवान् है ..मै अपने वालो की राह पर हूँ...रास्ते में नंगे पैर चलते कई लोग दिखते है ....मालाओं ओर पूजा का सामान बेचती ढेरो दुकानों को नजर अंदाज करते हुए ..कोई साउथ इंडियन परिवार है ...कुछ बुदबुदाता हुआ ..लकडी के फ्रेम में बनी उस चौरस मशीन में मुझसे आगे ....एक पीठ पर लगभग बारह साल की लड़की है ...शायद उसका पिता है....तकलीफ को किसी अनुवाद की आवश्यकता नहीं होती .... उस लड़की के चेहरे से पढ़ी जा सकती है ...... मशीन की वही जानी पहचानी सी आवाज .... सीने में जमा दर्द मगर डिटेक्ट नहीं करती ....कतार में लोग है...यंत्रवत चलते हुए ...अजीब बात है मेरा मन भगवान् में नहीं है ....पांच या दस सेकंड में उसकी मूर्ति के सामने लगभग धेकेला गया हूँ... बंदूको के साये में हिफाजत से घिरे भगवान् से मै क्या मांगू ?फिर धकेल कर आगे कर दिया हूँ ...आगे .कोई पंडा एक सौ एक का दान मांगता है... एक रुपया नहीं है ...सौ के नोट को वो मुट्ठी में दबा लेता है...दाये बाये लोग झुके हुए है ....अजीब बात है अपने ही देश में अपने ही भगवान् को बंदूको के साये की जरुरत है .हम कहाँ जा रहे है ?
बाहर सूरज की रोशनी में घाट बेतरतीब सा नजर आता है नाव में एक ओर परिवार है...तीन साल की उनकी बिटिया को मेनिंगो -मायलोसिल की एक बीमारी है ..अपनी उम्र से ज्यादा अब तक उसके ओपरेशन हो चुके है ...उसकी दादी गंगा का पानी उसके मुंह में डाल रही है.. ...मै गंगा का पानी देखता हूँ......मटमैला सा.....नाव का माझी बताता है रविदास घाट का पुनः - निर्माण हुआ है इस सरकार के आने से ...वो क्या चीज है जो इन लोगो कों
बी एच .यू के मेडिकल से जुदा इस मंदिर ओर इस नदी की ओर खींच लाती है ....आस्था ....श्रद्धा ...या हालात की बेबसी में कोई उम्मीद की चाह? तुम कहाँ हो ईश्वर ????




उन्नीस साल की उम्र जाने की नहीं होती है ,इस तरह जाने की तो ...कोई उम्र नहीं होती है....हम ओर आप पैसो से बच्चो को मेडिकल ओर इंजीनियरिंग में दाखिला तो करवा सकते है पर इंसानी जज्बे ओर इंसानी जान की कीमत क्या होती है ये नहीं सिखा सकते....टेक्नीकल भाषा में कुछ लोग इसे रेगिंग कहे पर आम भाषा में पीट पीट कर मारे जाने को मर्डर कहते है ..ओर ये एक कच्ची उम्र का कत्ल ही है .....वैसे भी मै उन लोगो को इस पेशे के लायक नहीं समझता जिनमे इंसानी सवेदना नहीं है...मै शर्मसार हूँ की मै भी उस समाज का हिस्सा हूँ जहाँ एक निरीह निर्दोष बच्चा अपनी जान बचाने की गुहार लगातार लगाता है ओर हम इसे प्रोफेशनल कालेजो में होने वाली एक स्वाभाविक प्रक्रिया मान कर नजर अंदाज करते है....


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अमन कचरू १९ सल् डॉ राजेंद्र प्रसाद मेडिकाल कॉलेज , टांडा , काँगड़ा हिमाचल जिसकी उसके सीनियरों ने शराब पीकर कई दिनों तक इतनी पिटाई की जिससे होली वाले दिन उसको असमय काल के ग्रास में जाना पड़ा .



2009-03-06

आप जो मेरी जानिब होते !!!!!!!

पहली हर चीज कितना थ्रिल देती है है ना......पहला किसी पतग को काटा हुआ पेचा........ मोहल्ले के खूंखार बोलर पर लगाया हुआ वो पहला चौका ..... . पहला स्कूल बंक.....स्कूल के माने हुए गुंडे को आँख मीच कर लगाया हुआ पहला घूँसा ....टूशन साथ पढने वाली काली स्कर्ट को पहला ख़त....वो पहली बार ऍ टी एम् से पैसे निकलना ..हाय कितना रोमांटिक है ना !
ग़लतफ़हमी मत पालिये..... अपने चारो ओर नजर डालिए ...आप कौन से फ्लोर पे खड़े है .तीसरे चौथे .....या .......किस्मत की लिफ्ट कभी खाली नहीं मिली आपको ....ओवरलोड का इशारा लिफ्टमेन करता ओर आप खिसियाये से बाहर निकल कर एक ओर खड़े हो जाते या अपने सामने बंद होते लिफ्ट के दरवाजे को देखते ..... फिर सीडिया दर सीडिया चढ़कर कर आप जिंदगी की बिल्डिंग में हर फ्लोर में हांफ हांफ कर चढ़ते ...आखिरी सीडी पर सफ़ेद कपड़ो में देवदूत मुस्कराते बोलते ..."यू आर लेट माय सन ...पर लिफ्ट ....आपके शब्द मुंह में रह जाते ..."नो आरगयुमेंट माय सन" .....
बरसो से आप उस मंदिर को ढूंढ रहे है .... जिसकी घंटी पकड़ कर (भले ही थोडा उचक कर )आप कह सके "आज खुश तो बहुत होगे तुम "....वैसी घंटी ओर वैसी एक मूर्ति देख एक दिन .आप पोज़ लेते है ..शर्ट को बाहर निकल कर गाँठ मारते ही है .कि ........ मंदिर का पुजारी ...यहाँ केवल क्रेडिट कार्ड चलता है बेटे .... .........
निराश हताश आप फ्लेश्बेक में चले जाते है....
जिस क्योशचन को छोड़ आपने रात भर सारी किताबे घोटी है .... अगली सुबह पेपर में सबसे पहले वही दिखता .. ..ओर हॉल में चित्रगुप्त का अट्हास गूंजता ......ओर फिर वो .....
आपकी पहली ऍ. सी यात्रा ...राजधानी ट्रेन चेयर कार ...दस घंटे का सफर .....एक कमसिन खूबसूरत हसीना कंधे पर बेग टाँगे दूर से आती दिखती है ..आपके दिल की धड़कन बढती है....धीरे धीरे अहिस्ता आहिस्ता वो आपकी बराबर वाली सीट पर बैठती है....आप का दिल अभी बाग़ बाग़ हुआ ही है ...की अचानक एक मोटे पसीने में गंधाये अंकल एंट्री मारते है मैडम ये मेरी सीट है.....बिजली कड़कने की वही चिरपरिचित आवाज ...कर्टसी रामानन्द सागर .... आप इधर उधर देखते है ..ट्रेन की खिड़की के बाहर मुस्कराते चित्रगुप्त ...अभी तुम्हारा टर्न नहीं है वत्स .
वो पहला ..नहीं चौथा या शायद पांचवा छोडिये प्यार कहाँ किसी गणित में बंधता है ...रात भर कागजो में उलझकर आप ग्रीटिंग कार्ड पर कुछ जुमले लिखने में सफल हुए है ..केवल आँखों पर चुनकर फ़िल्मी गीतों की एक केसेट तैयार कर .उलटी शेव खीचकर आप वही काली शर्ट पहन कर (जिसमे आपके दोस्त कहते है बड़ा स्मार्ट दिखता है )..लोकर रूम में एक गुलाब हाथ में लिए उसे "बर्थ डे विश" करने पहुँचते है .पर उन्हें किसी ओर से गले मिलता देख आपका दिल " रंगीला "के आमिर खान की तरह टूटा है बस..... फर्क इतना है की कोई बेक ग्राउंड म्यूजिक नहीं बजता ..निराश .टूटे हुए ..धीमे कदमो से आप बाहर निकलते है साइड में चित्र गुप्त खड़े है ..कभी कभी वो भी रियायत देते है इसलिए मुस्कराते नहीं ..आप उनसे लिपट कर रोना चाहते है...पर वे "अभी ड्यूटी पर हूँ" कहकर पीठ थपथपा देते है.....

ओर अब जब लगता है टॉप फ्लोर का सफ़र बस कुछ सालो में तय हो जायेगा .....


उमस भरी दोपहरी में
बादल का एक टुकडा आकर
पडोसी की छत भिगो गया
अजीब बेवफाई है !



ये शायर ओर कवि बड़े खतरनाक होते है ... साले ....सलीके से गाली देते है ..ओर हम शेर समझ कर ताली बजा देते है... फ्लाईट में ...एक पतले कम गंधाये इन्सान का बिन मांगे दिया फलसफा.

ओर ऊपर वाला फोटोग्राफ बेंगलोर के एअरपोर्ट से चलती गाडी से मोबाइल से ..

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