2008-09-18

सर पे धूप मिली तो याद आया ,मेरे आँगन मे एक बरगद रहता था

बचपन ऐसी अलमारी की तरह है जिसके हर खाने मे ढेर सारी बाते जमा होती है ओर   कुछ बाते उम्र के एक मोड़ पे जाकर अपना रहस्य खोलती है.  तब हम एक ऐसे   मोहल्ले मे रहते थे जो लगता था की कभी सोता नही था सड़क के पास एक खिड़की होती थी जो रात भर जागती रहती.  रात भर स्कूटर, कार की आवाज आती रहती. बस अड्डो के पास के मोहल्ले उन परिंदों  की तरह होते है जो आँख खोल कर सोते है .मैं ओर  छोटा  दोनों भाई  पैदल स्कूल जाते  ,जो  घर  से  थोड़ी दूर  होता . तब मैं शायद पहली या दूसरी  क्लास मे  हूँगा  अक्सर हम स्कूल जाते जाते बीच- बीच मे कई जगह रुकते  

स्कूल जाने के लिए हम शोर्टकट लेते जिसके लिए हमें एक कच्ची गली से होकर गुजरना पड़ता  गली के मुहाने पे हलवाई की दूकान थी  ओर सुबह -सुबह उसकी भट्टी पर चढी कड़ाई से पूरियों की खुशबू आती ,उसके पास से गुजरते वक़्त मैं अक्सर सोचता की बड़े होने पर ढेर सारी पूरिया खाया करूँगा   (जैसे की बड़े होने से ही पैसे अपने आप आ जाते है ) 
उसी  टूटी  फूटी  गली  के  दूसरे  कोने मे एक कोयले का गोदाम था ,जिसके दरवाजे पे अक्सर आर्मी की वर्दी पहने एक  लंबे खुले बालो वाला सरदार जिसकी  बड़ी ओर घनी दाढ़ी थी ,अक्सर कोयले को तोड़ता मिलता .कुछ हाथ दूर उसकी बैसखिया पड़ी रहती ,उसके बारे मे तब हम बच्चो के बीच तरह -तरह की अफवाहे थी ओर शायद उनका असर भी हम पर था , उसके  पास  से  गुजरते  वक़्त  छोटा  अक्सर कस-के मेरा हाथ पकड़ लेता ओर  मैं  भी  तेज  कदमो  से  वो  दूरी  तय करता .  हमे  देखकर वो अक्सर मुस्करा देता .एक रोज स्कूल की छुट्टी हुई ,गली के उस मुहाने पे उसने हमे आवाज दी ,छोटे का हाथ  मेरे  हाथ  पे  कस  गया  ओर मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा फ़िर  भी  भय  पर  जिज्ञासा  हावी  हुई ओर  मैं लगभग छोटे को घसीटता   हुआ उसके पास गया उसने हाथ से फर्श पे इशारा किया वहां कुछ अंग्रेजी मे लिखा था  
"तुम्हे अंग्रेजी भी आती है ? " मैंने उससे पूछा , मेरे लिए ये बहुत बड़ी बात थी .
फ़िर उसने मुझे बहुत कुछ लिख कर बताया . कुछ पलो मे मेरा सारा डर जाता रहा ,  फ़िर ये हमारी रोज की दिनचर्या मे शामिल हो गया , रोज मैं लौटते वक़्त उसके पास कुछ देर रुकता , रोज छोटा मुझे माँ को बताने की धमकी देता , रोज माँ पूछती की देर क्यों हुईन  छोटे  ने  कभी  बताया    मैंने  उसकी  धमकी  मानी.
 एक रोज उसने कुछ लिखा जो मेरी समझ नही आया पर आज लगता है शायद उसने कोई अंग्रेजी की कविता लिखी थी वो रोज  कोई  एक मन्त्र  मेरे कानो मे  फूंकता "अपनी शक्ल पे कभी गरूर मत करना क्यूंकि इसके ऐसा होने मे तेरा कोई हाथ नही है " ,बड़े होके भी छोटे का हाथ ऐसे ही पकड़ना ओर 
न जाने कितने!   
मैं नही जानता वो कौन था ? उसका परिवार कहाँ था? किस हादसे मे उसकी टाँगे गयी? मुझे याद है पापा का ट्रांसफर  देहरादून हुआ तो मैं उससे मिलने गया छोटे ने छुपा के रोटी सब्जी मुझे दी , जब मैंने उसे देनी चाही तो उसने मना कर  दिया  भरे गले से बोला " आदते ख़राब नही करनी ,वो भट्टी  ही  अपनी  रसोई  है "उसने हलवाई की ओर  इशारा किया  .फ़िर मेरे सर पे हाथ रख के बोला
"बड़ा होके भी ऐसे ही बने रहना "
.वो हमारी आखिरी मुलाकात थी ,उसके बाद वो कहाँ है ,नही जानता ? जिंदा भी है या नही ?
बड़ा तो हो गया  पर  शायद मन उतना बड़ा  नही  रहा  जरूरतों ओर ख्वाहिशों ने इसे मैला कर दिया है




२१ सितम्बर सन्डे सुबह .४० मिनट ...
पिछले दो दिन से सूरज जैसे छुट्टी पर है .,सारा आसमान बादलो के हवाले से है किसी को रोडवेज़ छोड़ने के बाद उसी गोल चक्कर से मुड़ना है उल्टे हाथ टर्न लेते ही कुछ कदम आगे कोने पे हलवाई की वही दूकान है ,अचार –आलू की वही खुशबू ..गाड़ी की खिड़की से ..एक नजर कोयले की गोदाम में झाँकने की कोशिश .. …..बारिश की बूंदे विंड-स्क्रीन पर गिरती है ….3 -5 सेकेंड .बमुश्किल गुजरते है की पिछली गाड़ी के हार्न . जैसे जोर से ऐतराज जताते है ……आगे बढ़ जाता हूँ , रेडियो FM पर रॉक ओन का गाना है. " आंखो में जिसके कोई .तो .ख्वाब है खुश है वही जो थोड़ा बेताब है "…….”ढेर सारी बूंदे फ़िर शीशे को ढक लेती है ..

52 टिप्‍पणियां:

  1. अपनी शक्ल पे कभी गरूर मत करना क्यूंकि इसके ऐसा होने मे तेरा कोई हाथ नही है " ,............ बड़े होके भी छोटे का हाथ ऐसे ही पकड़ना ओर............ "भगवान् तुम्हारी छत पे रोज आता है उससे डर के रहना "।

    सच में यह बात तो शायद ही कभी भुलाई जा सके ...

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  2. बड़ा तो हो गया पर शायद मन उतना बड़ा नही रहा जरूरतों ओर ख्वाहिशों ने इसे मैला कर दिया है
    " bachpan kee is vakye ko jis treh aapne shabon mey sjonya hai vo srahneya hai, sach kha ke bachpan ek almaree ke treh hotta hai jis ke kaunon mey bhut kuch aisa chupa hotta hai jo shayad sirf hum hee janteyn hain, bachpan ke ye yaad pdh kr bhut accha sa lga or jane anjane dil ye janne ko utawla ho utha kee vo "उसके बाद वो कहाँ है ,नही जानता ?जिंदा भी है या नही ?" sach kha aapne ke bachpan mey dil deemag bhut saff or bdha hotta hai, or umer ke sath sath jrurtey or sapne us jgeh ko ghair latien hain. bhut sunehree yaad ko share kerne ke liye shukriya.

    Regards

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  3. अनुराग जी, हमेशा ही जैसी आप से अपेक्षा,वैसा ही आपने डिलीवर किया। बहुत ही बढिया। सरदारजी की सीख भी काफी अच्छी। हो सके तो बूंदों में भीगते हुए ही हलवाई की दुकान के सामने से गुजरते हुए उस कोयले की दुकान को देख आइएगा। दिल हल्का हो जाएगा और शायद उनकी सीख भी।
    हाथ छूटे तो रिश्ते नहीं छूटा करते।

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  4. सही है अनुराग....बचपन में हम कई लोगों को उनके शक्लो सूरत के कारण रहस्यमयी या डरावना मान लेते हैं! मुझे याद है हमारी नानी के गाँव में एक मंझली बाई रहती थी..बिलकुल अकेली एक अँधेरे से मकान में....हम बहुत डरा करते थे उससे लेकिन एक दिन उसने बुलाया तो हिम्मत करके चले गए. बहुत प्यार से उसने बैठाया और ढेर सारी किशमिश खाने को दीं!तब से डर जाता रहा..... आपकी यादें सुनकर ये भूली बिसरी याद ताज़ा हो गयी!

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  5. ज़िंदगी की कितबे खंगालने से अच्छा है आपके ब्लॉग पर तोड़ा वक़्त बिताया जाए.. आजकल जिंदगी यहा पर मिलती है...

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  6. ज़िंदगी की कितबे खंगालने से अच्छा है आपके ब्लॉग पर थोड़ा वक़्त बिताया जाए.. आजकल जिंदगी यहा पर मिलती है...

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  7. "अपनी शक्ल पे कभी गरूर मत करना क्यूंकि इसके ऐसा होने मे तेरा कोई हाथ नही है "

    behatarin rachna............achchi rachna.....

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  8. aakhir me padhkar laga ki aapne ise dubara kyu baanta!sach me bada hone par man maila ho jata hai.

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  9. Aree wah Anurag ji agar meri yaddast sahi hai to maine aapka yeh lekh shayad padha hai... kuch mahine pahle jab log is chitthe par kam aaya karte the tab ek din shayad mai kisi ke chitte se aapke blog par aaya aur ek post padhte hi aap.. hamare dilo dimaag par cha gaye the.. usi din maine aapke blog ki sari post padh dali thi.. aur shayad yeh bhi usi mein thi :-).. lekin phir bhi yaadon ko dohrana bahut acha laga :-)

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  10. दिल को छू गयी,आपकी यादे,मुझे भी बचपन की याद दिला गयी।बहुत सही किया आपने अपनी यादो कि खिड्की खोल कर सब को अपनी-अपनी पोट्ली टटोलने पर मज़बूर कर दिया।

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  11. डॉ. साहब बचपन की यादों को दिल छु लेने वाले खूबसूरत अंदाज़ मैं प्रस्तुत किया है .

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  12. "अपनी शक्ल पे कभी गरूर मत करना क्यूंकि इसके ऐसा होने मे तेरा कोई हाथ नही है " ,............ बड़े होके भी छोटे का हाथ ऐसे ही पकड़ना ओर............ "भगवान् तुम्हारी छत पे रोज आता है उससे डर के रहना "।

    एकदम सही बात.आपको पढ़कर लगता है ,यह आपके व्यक्तिव में समाहित है.
    मेरे भी मन में यह कबसे और कितने गहरे जमी हुई है,कह नही सकती.

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  13. बहुत सादगी से बहुत खू़ब कहा आपने।

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  14. उम्दा लेख!
    अच्छा लिखा है...
    और बचपन में लौट जाना किसे नहीं भाता...
    जारी रहे...

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  15. आज ही मैं अपनी शक्ल देख रहा था; और अपने को पुरातन से कितना अलग पाता हूं।
    पता नहीं कोई मेरी शक्ल से न डरता हो?!
    बहुत अच्छा लिखा मित्र।

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  16. अनुराग जी,
    संस्मरण शैली में लिखा यह वर्णन निश्चय ही दिल को छू लेने वाला है। आपकी यह संवेदन शीलता ही है जो इन अनुभवों रूपी मोतियों को आज तक संभाल कर रखे है। अपने अनुभव में हमको शामिल करने के लिए आभार।

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  17. अनुराग जी...शब्दों के साथ खेलना कोई आप से सीखे...कैसे सीधे सीधे दिल में उतर जाते हैं...बेहतरीन पोस्ट...हमेशा की तरह.
    नीरज

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  18. अनुराग भाई,
    आपसे २ बातेँ कहना चाहती हूँ
    १ ) आप का जाल घर " दील की बात " सार्थक है !
    २) आप अपने लिखे हुए पोस्टसे एक कीताब जल्द से जल्द छपवाने का इँतजाम करीये
    और चलते हुए, उस "अनाम सरदार " को याद करते हुए, ये गाना गुनगुना रही हूँ
    " ऐ ज़िँदगी...गले लगा ले .." ना जाने क्यूँ !
    बहुत अच्छा लिखते हो आप...सदा ऐसे ही रहना..
    स स्नेह,
    - लावण्या

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  19. अद्भुत...ढेर सारी संवेदनाओं को समेटे हैं आप. आप हमेशा ऐसे ही रहें.

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  20. बचपन ऐसी अलमारी की तरह है जिसके हर खाने मे ढेर सारी बाते जमा होती है कुछ बाते उम्र के एक मोड़ पे जाकर अपना रहस्य खोलती है
    these lines tells every phase of our life
    regards

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  21. अच्छा लगा उस गुमनाम सरदार के बारे में पढ़कर...

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  22. बचपन की एकदम जीवंत प्रस्‍तुति‍, जैसे कल की ही बात हो और पैसे की ख्‍वा्ईश ने हमें क्‍या दि‍या और हमारा क्‍या छीन लि‍या-

    मैं अक्सर सोचता की बड़े होने पर ढेर सारी पूरिया खाया करूँगा (जैसे की बड़े होने से ही पैसे अपने आप आ जाते है )

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  23. अपने बचपन की अलमारी से निकली इस सौगात को हमारे साथ बांटने का बहुत बहुत धन्यवाद ..बहुत ही भावुक करने वाली यादें हैं !!!!

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  24. आप में संवेदनशील ह्र्दय के साथ साथ बात कहने की एक विशिष्ट कला है, जो बार बार खीच कर लाती है और आपकी दिल के कोने में अंकित हो जाती हैं. बनाये रखिये और सुनाते रहिये. बधाई!!

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  25. बचपन की यादों को अच्छा समेट आपने... 'आप ऐसे ही बने रहिये'

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  26. Accha laga us gumnaam ke baare me parkar, ye baat ye bhi batati hai ki har kisi se kuch na kuch seekhne ko mil sakta hai.

    ek request hai, agar chote chote para banake likho to parne me thora asani rehti hai.

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  27. .

    मेरी पिछली टिप्पणी कहाँ हाईजैक हो गयी ?


    खै़र छोड़.. तुम्हारे ही किसी पोस्ट पर किन्हीं देवीजी की टिप्पणी पढ़ी थी, कि..
    " अति सुन्दर, अनुराग जी... आपका लेखन वाकई ऎसा होता है, जैसेकि आँखों के सामने
    विडियो कैमरे से ली हुई कोई तसवीर चल रही हो.. "

    आज उनकी यह उक्ति देवा जी ( कोई शक ? ) दोहरा रहे हैं...
    सच्ची, पाठकों को बाँध कर अपने साथ साथ चलने में मज़बूर करने में सफल रहते आये हो, बहुत उम्दा... बहुत उम्दा .... बहुत उम्दा मेरे दोस्त !

    मैंने तुम्हारी पीठ कुछ ज़्यादा तो नहीं खुज़ा दी ?
    चल, ग़र कभी मैं लिखूँगा तो तुम भी कसर निकाल लेना !

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  28. yaaden hi sabse meethi aur hamesha pyaara sa ehsaas liye ,chalti rehti hai hum sang....aajiwan..

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  29. sir ji 2 baar comment de chuki hu.n badi emotionality ke sath..publish nahi ho raha...!

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  30. le ye upar vaala comment to aa gaya....! khair pichhali do baar bhi maine ye hi kaha tha ki kuchh post itani achchhi hoti hai ki un par koi bhi comment dene ka man nahi hota, aap ki ye post bhi un me se ek hai...Lavanya di ki dua.on ke sath ek swar mera bhi.... aap ye ki samvedanshilata hamesha bani rahe....!

    lag raha hai ki computer kuchh jyada hi samajhdaar hai... kaha comment karme ka man nahi hota to kah itani mehanat kar rahi ho... ham comment publish hi nahi hone de.nge.... badi mehanat karvai Dr. sahab..! :) :)

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  31. कितनी सादगी और कितना अपनत्व लग रहा है आपके साथ ?
    हम तो आपके लेखन के और आपकी यादों की जुगाली के मुरीद
    हैं डाक्टर साहब ! आप तो युहीं दिल की बातें इस परिवार (ब्लॉग जगत )
    में सबसे बाँटते रहिये ! आपको बहुत बहुत शुभकामनाएं !

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  32. aapke blog par aana yani ki kisi baagiche mein aana...man khush ho jaata hai..... :)

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  33. आपके किरदार सरदार जी बहुत अच्छे लगे। बहुत लोगों की यादें यूँ ही साथ रहती हैं उम्र भर। बहुत अच्छा लिखा है आपने।

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  34. sahi hai sir, Kuchh aisi yaden hoti hai anurag ji jo kabhi nai bhulaya ja sakta, chahe bachpan ki ho ya kisi bhi age ki, mere life se ek aesa mohalla ki yaden juda hai jahan mai ja nai sakta par us mohalle ki yad or vahan rahne vali kisi ki bahot yad ati hai, or ye bachpan ki bat nai hai, apki lekh etani achhi hoti hai ki ek aadat si ho gai hai, par sayad mujhe nai padhna chahiye tha, kyo mujhe nai pta par jo mai abhi mahsus kar raha hun kafi kastdayak hai,

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  35. मार्मिक अनुभूति...
    संवेदना से भरपूर...

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  36. अनुराग जी,
    एक बार फिर कहूँगा कि आपके शब्दों का जादू इस कदर बोलता है कि शब्द नही मेरे पास।
    आपकी शुरु की लाईने बहुत कुछ कह जाती है। गहरे अर्थ के साथ।
    अपनी शक्ल पे कभी गरूर मत करना क्यूंकि इसके ऐसा होने मे तेरा कोई हाथ नही है।

    यह सच हैं पर....।
    बचपन की यादें दिल के पास से निकलती है और दूसरे के दिल को छूती है।
    आपकी इस पोस्ट का फोटो भी सुन्दर है अच्छा लगा।

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  37. बहुत सुनहरी यादे बटोर लाये हैं अनुरागजी.....कभी-कभी ये यादे मन की तपिश पर पानी की फुहारों सा काम करती हैं....ठंडी...नरम सुकुमार यादे......अच्छी पोस्ट।

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  38. Bus ye sab hi zindagi ki dharohar hai jo hamare sath rah jati hai, aur kabhi kabhi to inhe yaad kar bahut rona aata hai.

    Ye zindagi ke palchin hein!

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  39. अनुराग जी, ना जाने मै देर से पहुँचता हुँ आपके post पर या लोग पहले पहुँच जाते है.... टिप्प्नियो की संख्या देख अनायास ही ये ग्लानी feeling आती है कि मै इतनी देर से क्यो पढ रहा हुँ|

    अब आपके इस post के बारे मे क्या कहुँ, लेखनी हमेशा की तरह लयबध, त्रुटीहीन मानो शब्दो की सरिता भावो को बहा कर ले जा रही है और प्रसंग मानो आपके बचपन से चुराया हुआ है जिसे कोई आपके आँखो के सामने ज्यो का त्यो इस कदर पलट कर रख दे रहा है मानो बन्द आँखो मे वह फि से घट रहा हो| मुझे भी "एक काला कलुटा" शक्श याद आ रहा है जिससे हम डरते थे और वो उतना ही प्यार करता था, वो हलवाई की दुकान भी याद आ रही है जहाँ मै भी यही सोचता था कि मै जब बडा हो जाउन्गा तो रोज यहाँ से कचौडी खाउन्गा| .........क्या कहुँ अब और, सिर्फ इतना ही की बस युँ ही दिल की बात लिखते रहे ताकि हमे भी अपने होने का गुमान हो वरना ना जाने इस भागम-भाग मे संवेदनाये कब दम तोड दे|

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  40. यादों की रहगुजर, बहुत सुन्‍दर।

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  41. यह लेख मेरा दिमाग कहता हे पहले भी कभी पढा हे?? शायद आप के यहां ही.... दिमाग काम कर रहा हे, याद आते ही बतादुगां
    धन्यवाद

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  42. बड़ा तो हो गया पर शायद मन उतना बड़ा नही रहा जरूरतों ओर ख्वाहिशों ने इसे मैला कर दिया है
    ..................
    डा. साहब इस बार फिर आपने भावुक कर दिया.
    सच में बचपन का खजाना ही ऐसा होता है जिसे जब चाहें इस्तेमाल कर सकते हैं.
    कभी मौका मिला तो अपनी गठरिया भी खोल कर दिखाऊंगा

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  43. आप सभी लोगो का दिल से शुक्रिया..कुनाल ऐसे कितने लोग जिंदगी भर हमारे साथ चलते है .
    @राज जी
    जब ब्लोगिंग शुरू की थी तब ये लेख आपसे बांटा था ,ज्ञान जी ,अल्पना जी ,प्रशांत,कुश ओर पूजा ने इसे पहले पढ़ा हुआ है.

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  44. बड़ा तो हो गया पर शायद मन उतना बड़ा नही रहा जरूरतों ओर ख्वाहिशों ने इसे मैला कर दिया है ।
    हां पर हम सब के भीतर आज भी एक बच्चा है जो हमारी मासूमियत को थोड़ी ही सही पर बचाए रखता है

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  45. रोज छोटा मुझे माँ को बताने की धमकी देता ,रोज माँ पूछती की देर क्यों हुई ?न छोटे ने कभी बताया न मैंने उसकी धमकी मानी...एक रोज उसने कुछ लिखा जो मेरी समझ नही आया पर आज लगता है शायद उसने कोई अंग्रेजी की कविता लिखी थी .वो रोज कोई एक मन्त्र मेरे कानो मे फूंकता "अपनी शक्ल पे कभी गरूर मत करना क्यूंकि इसके ऐसा होने मे तेरा कोई हाथ नही है " ,............ बड़े होके भी छोटे का हाथ ऐसे ही पकड़ना ओर............ "भगवान् तुम्हारी छत पे रोज आता है उससे डर के रहना "।

    अनुराग जी, नमस्‍कार,

    बेहतरीन संसमरण, और आपने इतनी सि‍द्दत के साथ अपने मन के कोने में इसे संजोये रखा था, यह बहुत बड़ी बात है। आज संजोये रखने की बात तो छोड़ो, ये सब आज लोगों को याद भी नहीं रहता है और न ही इस प्रकार के अहसास उद्वेलि‍त करते हैं। सचमुच पढ़कर लगा, जैसे यह घटना मेरे सामने ही घट रही हो। आज भी उस सरदारजी को खोजते हुए आपके अहसास आपके इस संसमरण में झलकते हैं। बधाई, बधाई और साधुवाद आपकी संवेदनशीलता के लि‍ए... पढ़ते-पढ़ते लगा गले में कुछ अटका अटका सा है और ऑखें भीग गयी हैं।

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  46. sir jee main aapka fan ho gaya hoon. Samay ke abhaav se jyada kuch likh aur padh to nahin pata lekin jabse aapki rachnayon ko padhna shuru kiya hai, aapki nayi post ka intezaar rehta hai aur ye intezaar rahega. wah maza aa gaya..

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  47. aapke blog par pehle bar aana hua...mgar yakeen maniye es blog ne mughe aannayas he rok liya....subah se padna suru hua ye blog ab jake khatam hua hai...ek saans me saari racnaye pad daali...behad sunder lekhte hai aap....

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  48. yaadein kabhi guzrti nahi bus aanchal se apna chehra chhupaaye baithi rehti hain!! ......ye post parhke mujhe KABULIWALA ki kahani yaad aa gayi!

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  49. Well done Doctor sahab,kabhi kabhi mukhe shak hota hai ki apne medical ki nahi literature ki study ki hai,well done bro keep it uo

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  50. Sir
    final mbbs exam ki raaten chal rahi hain
    aapake blog ka chaska laga hai
    ek 2 topic dimag me thusne ke baad sochta hu chalo ek post ho jaye ..
    Ek post 2 ' 3 ,4 me kab badal jati hai pata nahi ..
    Ab to 'posten'(hindinasation):-)
    khatm hone ko ayi ..
    Ajkal aap kam likhte hai

    उत्तर देंहटाएं

कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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