2009-04-13

जिंदगी की आइस -पाइस

कुछ चीजे कभी नहीं बदलती ....व्हाइट शर्ट ओर जींस आज भी फेशन में है ....पूरी- छोले ओर जलेबी का नाश्ता भी...बच्चे आज भी सोते वक़्त चद्दर को लात मारके उतारते है ... .खूबसूरती आज भी अपील करती है .. संडे आज भी हफ्ते का शानदार दिन है …. अख़बार ओर सुबह के बीच अब भी मोहब्बत है
…….पर बहुत कुछ बदल रहा है लोग शर्ट के ऊपर टी शर्ट पहनकर नया स्टाइल स्टेटमेंट ला रहे है..... मेल अंडरवियर भी डिजाइनर ,ओर ब्रांडेड हो गये है … .देव डी की हिरोइन साईकिल पर बिस्तर टाँगे नदी किनारे प्रेमालाप करने की इच्छा जाहिर कर रही है …
नर्सिंग होम आ गया है. इमरजेंसी पिल के ऐसे ही एक बड़े इश्तिहारी बोर्ड के ठीक नीचे मै अपनी कार पार्क करता हूँ .…दिमाग की चिप में कितने जी. बी की केपेसिटी होगी....साला एक मिनट में क्या क्या सोच लेता है....??
...सुबह सुबह आप थोड़े से इन्सान ज्यादा होते है ऐसा मेरा तजुर्बा भी है .. पर डॉ गुप्ता रिक्शा वाले की लगातार दरख्वास्त के बाद भी उसके बेटे के डिस्चार्ज बिल में एक रूपया कम न करके मेरे तजुर्बे को गलत ठहरा रहे है .....एक रेफरेंस की बाबत मै वहां आया हूँ ..वे उसके कंधे पे हाथ रख के कुछ फुसफुसाते है जो मुझे सुनाई नहीं देता . ..वापसी में वे .नर्सिंग होम के बाहर किसी स्टाफ को बोर्ड के लिए 'गोल्ड मेडलिस्ट "को अलग कलर से लिखवाने के इंस्ट्रक्शन दे रहे है ... उम्र में मुझसे दस -पंद्रह साल बड़े डॉ गुप्ता मिलते ही ऐसे झुकते है की रशियन जिमनास्ट भी उनसे रश्क करे..चेहरे पे फेविकोल के जोड़ से चिपकायी मुस्कान . विनम्रता के म्युचुअल फंड में .इनका इनवेस्टमेंट तगड़ा होगा...
जमाना अब "पोलिशड- कमीनो " का है …ओर कमीनियत की भी लिगेसी होती है ..खानदानी ....मुझे वर्मा का डाइलोग याद आता है .... लाखो की प्रेक्टिस छोड़ वर्मा जी किसी अकेडमिक इंस्टीट्युट से जुड़ रहे है …कुछ ओर नया करने की बात औरो की तरह मेरे पल्ले भी नहीं पड़ती ... पैसो से अलग नया क्या ??????
" क्यों " के सवाल पे ...बस यूँ ही ....का जवाब देते है......पर जमी जमाई प्रेक्टिस .इस उम्र में ?.......
जिंदगी जीने की कोई उम्र नहीं होती ... कुछ फैसले गज फीते से नाप -जोख कर तय नहीं किये जाते….
शाम की विजिट में साइन बोर्ड पे 'गोल्ड मेडलिस्ट "अलग चमक रहा है ,बचपन में "नैतिक -शिक्षा " ऑप्शनल सब्जेक्ट होता था .. अब भी ऑप्शनल ही है... सोचता हूँ हर साइंस के ग्रेज्यूवेट को डिग्री मिलते वक़्त इसका क्रेश कोर्स कम्पलसरी कराना चाहिए ...फिर हर ५ साल बाद रिवाइज़ ...

85 टिप्‍पणियां:

  1. अनुराग जी यही है जिंदगी । कभी कभी एक पल में न जाने क्या सोच लेते हैं और कहां तक की उड़ान के लेते है जिसकी कोई सीमा नहीं ।

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  2. 'जिंदगी जीने की कोई उम्र नहीं होती ... कुछ फैसले गज फीते से नाप -जोख कर तय नहीं किये जाते"....नैतिक -शिक्षा " ऑप्शनल सब्जेक्ट होता था .. अब भी ऑप्शनल ही है... सोचता हूँ हर साइंस के ग्रेज्यूवेट को डिग्री मिलते वक़्त इसका क्रेश कोर्स कम्पलसरी कराना चाहिए ...फिर हर ५ साल बाद रिवाइज़ ...
    बहुत खूबसूरती से व्यंग्य किया है आपने ,जहाँ इंसानियत से ज्यादा महत्वपूर्ण पैसा हो गया है ..
    आपके सार्थक लेखन को मेरी शुभकामनाएं .....

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  3. उस रात कुछ अध बुने ख्वाबों ने दस्तक दी थी .... पर सुबह सड़क मुझ से भी तेज़ भाग रही थी ....

    मंदिर के बाहर एक बच्चा गंदे जूतों पर पोलिश करवाने के लिए जिद कर रहा था ..... अन्दर जा कर 501 के चढावा जा रहा था

    मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

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  4. अलग कलर में लिखवाने की तरकीब नहीं आई। अपनाने में शरम आई। शायद यही कारण है कि इंन्सान बना रहा।

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  5. LOL @ पोलिशड- कमीनो :)
    moral science kash sabka favourite subject ho!.. ek optional period ki tarha hota tha skool mein!...agar teacher ka moral thiek ho to moral scicence sabko compulsary lagey!

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  6. बचपन में "नैतिक -शिक्षा " ऑप्शनल सब्जेक्ट होता था .. अब भी ऑप्शनल ही है...
    SANSKAR, SANSKRITI ke THEKEDAR kahlawaane ka IRADA hai kya?
    NAITIK-ANAITIK ab kya hai?

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  7. sachhi baat kahi hai Dr. baabu aapne magar ek baat aur nahi badali wo ye ke naitikata apne aap se apna aawaran khone nahi deti ,kuchh galat log usme samaa jaate hai...

    badhaayee aapko...meri gazal pe aapka pyaar abhi baaki hai... dekhta hun kaun sa she'r is baari pasand aaye aapko..

    arsh

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  8. Where's the Triveni?
    Apne liye na sahi, mere liye hi likh diya karein :-)

    God bless
    RC

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  9. विचारों का ताना बना ठीक यूँ हमारा दिलो दिमाग बुनता रहता है ...और ज़िन्दगी जीने के फैसले और फासले भी बनाता रहता है ..कभी बात बनी कभी न बनी ..पर ताना बना यूँ ही बुनता रहा ..त्रिवेणी मिस की इस बेहतरीन पोस्ट में ..

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  10. अनुराग जी आपकी पोस्‍ट पढी बिल्‍कुल सही और सच्‍ची बातें और उन बातों का जो कहने का आपका ढंग होता है देखते ही बनता है लेकिन पूरी पोस्‍ट दो बार पढ चुका हूं लेकिन कुछ कहने को शब्‍द ही नहीं मिल रहे कि लिखूं तो क्‍या लिखूं क्‍योंकि आपकी हर पोस्‍ट हर कहानी हर कविता ऐसे ही बोलती बंद कर देती है बेहतरीन रचना या पोस्‍ट कहना तो जैसे एक तौहीन भरा शब्‍द होगा सच में आप दिल से लिखते हो कि मजा ही आ जाता है पढते समय और पढकर

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  11. kuchh cheeze kabhi nahi badltee.....or zindgee jeene ki koee umar nahi hotee..

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  12. वैसे तो आज के जमाने का यही जीवन दर्शन है। पर इसे सब लोग अपना नहीं सकते इसलि‍ए इस जीवन में जिंदगी अभी बची हुई है।

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  13. har bar ki tarah is baar bhi padha kar accha laga....bilkul shamat.

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  14. आप ने सही लिखा है..कि सुबह हम सब से ज्यादा इंसान होते हैं.दिमाग की चिप को reactivate होने में समय जो लगता है!अब तो हर चीज़ ही ब्रांडेड होती जा रही है..बच्चे बालों में लगाने वाली क्लिप या slides भी clairs या lifestyle से लेते हैं ,पहले हमारा एक पेन और एक निब से पूरा सत्र निकल जाता था.अब स्कूल में पेन भी डिजाइनर चाहिये!
    पिछले साल भारत में गयी थी तब chemist की दूकान पर vicks और पुदीन हरा की tablets के साथ सामने के काउंटर पर ७२ hrs वाली पिल्स रखी देखीं..जैसे उन सब की बिक्री में समानता हो!सच में इतनी तेजी से सब कुछ बदल रहा है.आश्चर्य है!
    'पोलिशड- कमीनो '-नया शब्द!रोचक! लेकिन यथार्थ के नज़दीक.
    नैतिकता की शिक्षा की क्या बात कहें...नैतिक विषय के मार्क्स तो टोटल मार्क्स में जुडते भी नहीं हैं.अब यहीं से उनका मूल्य शून्य है तो जीवन में कितना दे पायेंगे..वैसे भी यह किताबों से कहाँ मिल पायेगी?बहुत ही अच्छा लिखा है..इस बार की त्रिवेणी??

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  15. नैतिक -शिक्षा " ऑप्शनल सब्जेक्ट होता था .. अब भी ऑप्शनल ही है... सोचता हूँ हर साइंस के ग्रेज्यूवेट को डिग्री मिलते वक़्त इसका क्रेश कोर्स कम्पलसरी कराना चाहिए ...फिर हर ५ साल बाद रिवाइज़ ...
    shayad aisa hi hona chahiye,taki zindagi bhi har 5 saal mein polish ho sake ,log to crash course na karne ke laakh bahane aur paise hi denge,paise lo nagar hamara picha chodo,gupta ji aur verma ji jaise bhinna bhinna khayalat ke log bhi hote hai,ek ko paisa bhagwan aur duje ke liye mitti,shayad paise se badh ke bhi koi chiz hai sukyn? .
    ab bahut kuch kehne ka mann hai,par fullstop kar de.

    doc sahab triveni kaha hai? aisa nahi chalega,ab aapko iski kya saja de,aap khud tay karle?

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  16. एक एक लाइन अपने आप में समुन्दर है अथाह समुन्दर.. वाकई कुछ चीजे नहीं बदलती.. आपकी ये अदा भी नहीं.. बड़े दिनों बाद आप वाला कुछ पढने को मिला..

    एक और बात, इस बार फिर से आपकी और मेरी पोस्ट का शीर्षक मिलता जुलता है.. या कहू की हु ब हु है.. मैंने तो पहले भी कहा था ये टेलीपेथी से भी दूर की गोटी है..

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  17. जमाना अब "पोलिशड- कमीनो " का है …ओर कमीनियत की भी लिगेसी होती है ..खानदानी
    अनुराग जी इस जुमले का पेटेंट करवा लीजिये...इस तरह के वाक्य हर कोई नहीं लिख सकता...वाह...पूरी पोस्ट ही इतनी शानदार है की क्या कहूँ? वैसे भी आपको पढ़ कर सिवा वाह के और कहा भी क्या जा सकता है?
    नीरज

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  18. अनुराग जी जिदंग़ी की आईस-पाईस जिदंगी भर चलती रहती है। कोई जिदंगी भर इस खेल में बचता रह्ता है और कोई पहली बार में ही पकडा जाता है।
    जिंदगी जीने की कोई उम्र नहीं होती ... कुछ फैसले गज फीते से नाप -जोख कर तय नहीं किये जाते।
    सच कुछ इंसान विरले ही होते है जो अपनी शर्तो पर जीये जाते है। पता नही किस मिट्टी के बने होते वो इंसान। वैसे अनुराग आज की त्रिवेणी किधर है। कुश भाई ने तो गजब की त्रिवेणी लिख मारी है।

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  19. "जमाना अब "पोलिशड- कमीनो " का है …ओर कमीनियत की भी लिगेसी होती है ..खानदानी!"
    बिलकुल सही पहचाना आपने. खानदान नहीं बदल सकते, खुदा नहीं बदल सकते, खुद को तो बदल सकते हैं. मगर नहीं, खुद को बदलने में आमदनी में कमी हो सकती है न. और वह कमीना कैसा जिसे कमी न डराए?

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  20. इंसानियत को झंझोड़ता, दिल, दीमाग, आत्मा के दरवाज़े खोलता... खुद से सवाल करता "क्या रोज सुबह मैं इंसान अधिक हूँ यदि हाँ तो सारा दिन क्यों नहीं रह सकती?"

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  21. दिमाग की चिप में कितने जी. बी की केपेसिटी होगी....साला एक मिनट में क्या क्या सोच लेता है....??
    ...सुबह सुबह आप थोड़े से इन्सान ज्यादा होते है ऐसा मेरा तजुर्बा भी है...aapkaa tjurbaa sahi hai ...ek baar phir maanviy post ke liye badhai

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  22. आज कल तो नैतिकता ही ऑप्शनल हो गयी है...........मगर इसे चुनने वाले अभी भी हैं इसलिए उम्मीद बाकी है।

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  23. दिमाग की चिप में कितने जी. बी की केपेसिटी होगी....साला एक मिनट में क्या क्या सोच लेता है....??

    सच है कुछ चीजें नहीं बदलती.. पर बहुत कुछ ऐसा है जो आज बदल गया है....

    शानदार शब्द संरचना..... धन्यवाद.

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  24. आपकी पोस्टें मन को बोझिल कर देती हैं और आदमी ठगा सा थोड़ी देर सोचता ही रह जाता है वह कैसे रिएक्ट करे ! यह भी ऐसयिच ही है ! यह दुनिया सचमुच कमीनों और धूर्तों से भरी हुयी है !

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  25. नैतिकता के रिफ्रेशर कोर्स और जमीनी हकीकत से रूबरू होने के लिये विचार-मन्थन सतत होने चाहियें।

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  26. बचपन में "नैतिक -शिक्षा " ऑप्शनल सब्जेक्ट होता था
    अब नैतिकता ऑप्शनल है , अनैतिकता कम्पलसरी है .
    अक्सर हम लोगों की बात करते है की वो गलत है पर कभी खुद का गिरेबान थामकर नहीं देखते की हमकितने सही है .

    एक मेरे जानने वाले है हमेशा पुलिस को गली देते रहते थे की पुलिस भ्रष्ट है , कुछ सालपहले उन्होंने अपने बेटे को पुलिस में भर्ती करवाया एक अच्छी रकम दे कर , मैंने पूछा क्या आप का पुत्र घूस नहीं लेगा तो बोले अरे इतने पैसा लगा है भर्ती में वो कैसे निकलेगा, तो मैं कहा फिर आप गली क्यों देते है पुलिस को . जो पहले भी लोग करते आ रहे थे आपने भी वही किया .

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  27. आपके पोस्ट जिंदगी की टॉर्च है, देर सबेर कही न कही रौशनी फेंकती रहती है मुलाहिज़ा फरमाए
    एक -
    दिमाग की चिप में कितने जी. बी की केपेसिटी होगी....साला एक मिनट में क्या क्या सोच लेता है....??
    दो-अख़बार ओर सुबह के बीच अब भी मोहब्बत है
    तीन-सुबह सुबह आप थोड़े से इन्सान ज्यादा होते है
    चार -विनम्रता के म्युचुअल फंड में .इनका इनवेस्टमेंट तगड़ा होगा...
    पाँच -जमाना अब "पोलिशड- कमीनो " का है …ओर कमीनियत की भी लिगेसी होती है ..
    छः- सोचता हूँ हर साइंस के ग्रेज्यूवेट को डिग्री मिलते वक़्त इसका क्रेश कोर्स कम्पलसरी कराना चाहिए

    कुछ लोग होते है जिनकी पोस्ट का इंतज़ार रहता है ,आप उनमे से एक है ओर यकीन मानिये कभी निराशा हाथ नही लगी .
    इस बार जरूर हुई त्रिवेणी न देखकर .

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  28. बहुत ही अच्छा लगा| आपने तो ज़िन्दगी में ही हैकिंग कर दी| हम भी आज कि युवा पीढी कि ही नुमाइंदे हैं| लेकिन जो कुछ भी आपने लिखा है वह ११०% सही लिखा है|

    कंप्यूटर के बन्दे होने के से हम सिर्फ यही कह सकते हैं कि दिमाग चाहे जितनी जी बी का हो लेकिन होता फिक्स है| अगर आज हम कुछ नया सीखते हैं तो कुछ न कुछ तो ज़रूर भूल जाते हैं..

    हमें आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगता है| लेकिन आपकी त्रिवेडी कि कमी जरूर खली|

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  29. अभी ना परदा गिराओ, ठहरो , कि दास्तान आगे और भी है
    अभी तो टूटी है कच्ची मिट्टी ,
    अभी तो बस जिस्म ही गिरे हैं
    अभी तो किरदार ही बुझे है
    अभी सुलगते हैं रूह के गम
    अभी धड़कते हैं दिल के गम
    अभी तो अहसास जी रहा है

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  30. कबीरस्थल वाराणसी के लहरतारा में गया था तब एसा ही एक वाकया देखा था जहाँ कि कबीरजी के चेले का नाम गाढे चटक रंग से लिखा गया था और कबीरजी को फीके रंग से जो बहुत ध्यान देने पर ही पढा जा सकता था। गाढे चटक रंग में अपना नाम लिखना शायद बडप्पन और लंठई का मिश्रित रूप है और जब बात गोल्ड मेडलिस्ट लिखने की हो तो उसे उजबक शब्द से ज्यादा करीब से व्यक्त किया जा सकता है :)

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  31. जिंदगी जीने की कोई उम्र नहीं होती ... कुछ फैसले गज फीते से नाप -जोख कर तय नहीं किये जाते….
    नैतिक -शिक्षा " ऑप्शनल सब्जेक्ट होता था .. अब भी ऑप्शनल ही है... सोचता हूँ हर साइंस के ग्रेज्यूवेट को डिग्री मिलते वक़्त इसका क्रेश कोर्स कम्पलसरी कराना चाहिए ...फिर हर ५ साल बाद रिवाइज़ ...
    फिर रिफ्रेश कोर्स जरुर करना चाहिए.
    बहुत सटीक विचारणीय पोस्ट अभिव्यक्ति . आभार अनुराग जी

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  32. Anuragji
    Aaj mai bina kuchh padhehee likh rahee hun...waisebhee, hamesha kehtee ayee hun, ki aapke lekhanpe tippanee karoon, aise meree qabiliyat hee nahee...aur isme mujhe koyee sandeh nahee...
    Haan, bohot dinobaad aapko apne ek blogpe paayaa...shukrguzaar hoon...
    Kiskee zindageekee baat kee aapne jo hichkole khaake chal hai? Meree?
    Meree to ek aisaa mod le gayee ki, ruksee gayee hai...apnaa "The light by a lonely path", jo mere manke itnaa qareeb tha, kisee atyant avanchhit ghatnayon ke karan maine inactive kar diya. Afsos...zindageeme yebhee dekh liya...palme jhoothko sach maan lenewaale logon kaa parichaybhee ho gaya...shayad is ghatnase kuchh sakaratmak seekha to wo yahee, ki kuchh insaanon se sahee waaqfiyat ho gayee....kafee mukhaute uth gaye...jo mujhe aaeenaa dikha rahe the, unke...ek sabaq anchahe hee sahee, seekh liya...
    Maine apnee bhadas nikalee hai to kshama prarthee hun...And I really mean it...

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  33. व्हाइट शर्ट ओर जींस ......, पूरी- छोले ओर जलेबी का नाश्ता....सोते वक़्त चद्दर को लात मारके उतारते ...., .संडे आज भी हफ्ते का शानदार दिन...... , अख़बार ओर सुबह के बीच अब भी मोहब्बत है..... , दिमाग की चिप में कितने जी. बी की केपेसिटी होगी.... , साला एक मिनट में क्या क्या सोच लेता है....?? हा...हा ....हा.....!!


    कौन कहता है ये एक डॉ. की पोस्ट है .....?? अनुराग जी आप किसी पत्रिका का कालम क्यों नहीं लिखना शुरू कर देते....जैसे ज्ञानोदय में ज्ञान चतुवेदी लिखते हैं....!!

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  34. meri shame jab udaas hoti hain, kandhe pe aapke blog hatheli rakh dete hain.

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  35. डॉ साहेब ,वह दौर दूसरा था ,यह दौर दूसरा है .जीवन इसी का नाम है .आप की लेखनी भी अनोखी है , तारीफ के काबिल -एकदम अलग -लीक से हट कर .आपको टिप्पडी करनें में भी सोचना पड़ता है .

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  36. "संडे आज भी हफ्ते का शानदार दिन है ....."मेडल का कलर-चेंज... अब तो ये भी बदल रहे है। कहीं-कहीं जुम्मे का दिन शानदार होता है तो कहीं गोल्ड-मेडल से गोल्ड नदारद है।...किस-किस के लिए रोएं ज़ार-ज़ार क्या!!!!

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  37. वाकई ज़िँदगी एक पहेली है -
    आइस पाइस की तरह ही तो --

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  38. क्या कहें...! हम तो स्तब्ध हैं। यह सब रोज ही हमारे आसपास घटित हो रहा है लेकिन आपने उन्हें शब्दों का जामा पहना दिया तो ध्यान चला गया। वर्ना हम तो ऐसा देखते रहने के आदी हो चले हैं।

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  39. आपके हर पोस्ट का बेसब्री से इंतजार रहता है....शायरों की बात न करूँ तो अमृता प्रितम और गुलज़ार के वाक्य-विन्यास का दीवाना रहा हूँ और अब इस लिस्ट में एक और नाम जुड़ गया है डाक्टर साब....जी आपका।
    शब्दों और वाक्यों का ये तिलिस्म जो आप बुनते हो, किसी विस्तृत भूल-भुलैया की तरह....निहित भावनाओं तक तो बाद में पहुँचता हूँ-शायअद तीसरी या चौथी रिडिंग में
    कमबख्त एक-एक जुमला डायरी में नोट कर लेने का मन करता है-----किसी रोज ये डायरी दिखाता हूँ आपको। आपके नाम की ही है...

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  40. यह छोटा सा हार्ड डिस्क पता नहीं पल भर में कितने रंग बदल लेता है, कभी डॉक्टरों के धर्म को पेशे में बदलते देख दुखी होता है तो कभी चुहल करते हुए किसी से उसकी उम्र पूछ लेता है। :-)

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  41. जमाना अब "पोलिशड- कमीनो " का है.
    बचपन में "नैतिक -शिक्षा " ऑप्शनल सब्जेक्ट होता था .. अब भी ऑप्शनल ही है.
    ये दोनों लाईने तो हमेशा के लिए याद रहेंगी !

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  42. रै बालक, मन्ने तो लाग्यै इब तू गया काम से ?
    मेरे पास दो तीन घँटे और बैठ जा, पूरा बिगाड़ने का ज़िम्मा मेरा !

    इस पोस्ट के गोल्ड मेडलिस्ट साहब की आत्मा धनपिशाच बन तेरे संग मेरे को भी सतायेगी !
    ताज़्ज़ुब नहीं कि, मरते वक़्त भी अपने किसी जूनियर की तन्ख़्वाह काट लें..
    क्योंकि उनका अंत जानते हुये भी, वह उन्हीं पर आक्सीज़न बरबाद कर रहा होगा !
    जियो.. सही लाइन और लेंग्थ की पोस्ट !

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  43. इतने अच्छे लेख पर कुछ भी कहना ठीक नहीं होगा। शायद यह टिपियाने के लिए नहीं है केव्ल मह्सूस करने के लिए है।
    घुघूती बासूती

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  44. कम शब्दों में अधिक बात कही गयी है। शिक्षा मंत्री आपकी अंतिम पंक्ति पर ध्यान दें।

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  45. जिन्दगी सच मे ही एक आइस पाइस हर लम्हा जैसे एक पहेली......इसकी उड़ान का अंदाजा लगाना मुश्किल है.....आपके लेख कुछ अलग ही एहसास से रूबरू करा जाते हैं..."

    regards

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  46. पोलिश्ड कमीने यही शब्द तो खोज रहा था मैं , आज इन्ही का जमाना है चाहे राजनीती हो या डाक्टरी या दुनिअदारी

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  47. kya kahu, bas dil bahut kuch sochne lagta hai apki post padhkar....shaandaar

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  48. फैसले तो इंसान आवेश में ही लेता है... कुछ फैसले उसे ऊँचा बनाते हैं... और कुछ का मलाल उसे ज़िन्दगी भर रहता है...
    मीत

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  49. जमाना अब "पोलिशड- कमीनो " का है....सार्थक व्यंग्य वाक्य.स्कूलों में नैतिक- शिक्षा भले हीऑप्शनल सब्जेक्ट रहे परन्तु परिवार में यह कोर्स कम्पलसरी होना आवश्यक है .बाकि ......... जिंदगी आइस -पाइस की तरह हल्की फुल्की और मजेदार रहे तो बेहतर ......

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  50. बहुत अच्छी सोच है। अगर ऐसा होता, तो देश की हालत इतनी बदतर न होती।

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    तस्‍लीम
    साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

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  51. जिंदगी जीने की कोई उम्र नहीं होती ... कुछ फैसले गज फीते से नाप -जोख कर तय नहीं किये जाते….

    Bilkul sahi kaha apne...

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  52. समझ नहीं आता कि क्‍या कहूं या लिखूं। पोस्‍ट की एक-एक पंक्ति में सौ-सौ या उससे भी कहीं ज्‍यादा टिप्‍पढि़यां समाहित हैं।..एक-एक शब्‍द पर मैमोरी चिप हजार-हजार चरित्रों के चेहरे देखती है।...जमाना अब पोलिश्‍ड कमीनों का है...ये हमें रोज महसूस होता है, दिखाई देता है...और ईमानदारी से कभी खुद को भी यही महसूस होता है कि तुम भी पोलिश्‍ड कमीने हो गए हो...कोशिश होती है कि सच के आसपास रहूं लेकिन फिर बीच में महसूस होता है कि सच तो कई किलोमीटर पीछे छूट गया। हांलाकि कुछ झूठ सच से लाख गुना अच्‍छे होते हैं; क्‍या ये भी अपने को समझाने का एक तरीका नहीं है।...कुछ भी है लेकिन यह सच है कि आपको पढ़ने के बाद मन बहुत कचोटता है।

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  53. वाकई जिन्दगी में कुछ चीजें कभी नहीं बदलतीं, दुनिया बदल जाती है पर वो हमेशा आपके दिल के पास रहती हैं। ठीक वैसे ही जैसे बचपन के संस्कार और वो खेल-खेल में सिखाई गई बातें कभी नहीं भूलती, जो आपके अच्छे इंसान होने का आधार होती है

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  54. शानदार
    !

    लेकिन नैतिक शिक्षा ऑप्शनल नहीं है बन्धु, कम्पल्सरी है. मुश्किल बस ये है कि उसका इम्तिहान नहीं होता था, आज भी नहीं होता है. सोचिए अगर होने लगे तो क्या हो? अपने नेताजी लोग, डॉक़्टर साहेबान, इंजीनियर साहेबान, और तो और पत्रकार बिरादरी भी... इन सबका क्या होगा? नैतिक शिक्षा के एक गुरूजी की बात आपको बताऊं तो दंग रह जाएंगे. हम लोगों को 7वी घंटी में पढ़ाते थे नैतिक शिक्षा. मुंह से गाली ऐसे निकलती रहती थी जैसे विद्वानों के मुंह से उद्धरण. कभी-कभी पीटी करवाते थे और जो छात्र-छात्राएं कुछ गड़्बड़ कर देते थे उनसे ऐसे क़रीबी संबंधों का दावा करने लगते थे कि क्या बताएं. शाम को दो बोतलें (ब्रैंड इसलिए नहीं बता सकते क्योंकि तब अपन को इस बारे में बिलकुल मालूम ही नहीं था कुछ) भीतर गटकाते थे और दो बोतलें दोनों कांखों के नीचे दबाते थे और डमडमाते चल देते थे घर की तरफ़. बोलने की हिम्मत कोई कर ही नहीं सकता था, क्योंकि बगल में उनकी माउज़र लटकती रहती थी, जिसके लाइसेंस का दूर-दूर तक किसी को अता-पता भी नहीं था.
    अब बताइए, है हिम्मत? पढ़िएगा नैतिक शिक्षा?

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  55. आप का ब्लोग मुझे बहुत अच्छा लगा और आपने बहुत ही सुन्दर लिखा है ! मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है !

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  56. अनुराग जी, काफी दिन बाद आज आपको पढ़ा, कुछ बातें तो मेरे पल्ले पड़ गयी और कुछ नहीं पड़ी. जो भी पल्ले पड़ी हैं, एकदम बेहतरीन लगी.

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  57. सही कहते हो अनुराग....कुछ चीज़ें आज भी नहीं बदली हैं! कमीने पहले भी होते थे मगर अब खुद को पोलिश करने की विधा सीख गए हैं! और किसी ने मुझे बताया की नैतिक शिक्षा की किताब आज भी पढाई जाती है स्कूलों में ! ये बात और है की अब उस किताब को बच्चे एक रात पढ़कर अच्चे नंबर ले आते हैं...कहते हैं की किताब सरल है! मज़े की बात है की जो चीज़ें पढने में सरल हैं, अपनाने में उतनी ही कठिन!

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  58. जमाना अब "पोलिशड- कमीनो " का है …ओर कमीनियत की भी लिगेसी होती है ..खानदानी ....

    bilkul sahi kaha aapne anurag ji...aise kayi kaamine logon se aate jaate roz mulaaqaat hoti hai. sochti hoon tou samajh nahi paati ke isse un logon ko kya haasil hota hai. apne hi zameer par ek bojh lekar nahi chalte kya aise log?? khud se nazarein bhi kaise mila paate honge....par shayad aise logon ke liye zindagi ke maayne hi alag hain.

    जिंदगी जीने की कोई उम्र नहीं होती ... कुछ फैसले गज फीते से नाप -जोख कर तय नहीं किये जाते….

    kabhi zindagi jeene ko ek umr bhi chhotti padd jaati hai...aur kabhi kabhi thodi umr guzarne ke baad hi zindagi se hamara mann uktaa jaata hai...jaane kyun....thak jaate hain shayad... :)

    aapki ye post mujhe behad pasand aayi...apni is chhoti si post mein aapne bahut kuch keh diya.
    but wheres the triveni???

    Regards
    Rakhee

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  59. अनुराग जी बिल्कुल सही लिखा है आपने । खासकर कुछ चीज ऐसी होती है जो कभी नही बदलती है उसका प्रचलन हमेशा बना रहता है । बात आपने शत-प्रतिशत सही कही है और उसके कहने का नजरिया बिल्कुल ही अलग । यही तो लिखने की कला है । अच्छी टिप्पणी है आभार

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  60. अनुराग जी, आप तो हमेशा ही झकझोर देते हैं। सब कुछ बदलता है... कुछ नहीँ भी। हमें तो आशा, विश्वास और अपेक्षा भी है कि आपका दृष्टिकोण अपेक्षाकृत स्थायी होगा... सीख तो हमेशा लेनी ही होगी... देखिये
    सुबह सुबह आप थोड़े से इन्सान ज्यादा होते है ऐसा मेरा तजुर्बा भी है ... ...एक रूपया कम न करके मेरे तजुर्बे को गलत ठहरा रहे है सीखा फिर नया कुछ न! तजुर्बे का Version upgrade कर दिया!

    रही नैतिक शिक्षा की बात... सब ठीक है, पर हम कहाँ से लायेंगे इसके लिये समर्पित शिक्षक - हमारे मास्टर साहब जैसे! जिनके सम्पर्क / शिक्षण से कुछ तो बदल ही जाता था हर कोई!

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  61. भाई अनुराग जी,

    यह बात ........
    "बचपन में "नैतिक -शिक्षा " ऑप्शनल सब्जेक्ट होता था .. अब भी ऑप्शनल ही है... सोचता हूँ हर साइंस के ग्रेज्यूवेट को डिग्री मिलते वक़्त इसका क्रेश कोर्स कम्पलसरी कराना चाहिए ...फिर हर ५ साल बाद रिवाइज़ ... "

    मुझे पसंद आयी. खासकर इसलिए भी कि पढ़े लिखों की याददाश्त कितनी कमजोर होती है कि उन्हें रिवाइज कोर्स करवाने की आवश्यकता पड़े आपने यह सिद्ध कर दिया.

    वस्तुतः उन्हें सैधान्तिक कोर्स की नहीं बल्कि प्रयोगात्मक कोर्स की आवश्यकता है और वह भी काफी गहन, तभी शायद नैतिकता नामक भाव को अनगिनत जी बी की मेमोरी में स्थान मिल पायेगा.

    नैतिकता की गिरावट का कारण आप भी जानते हैं और हम भी. पर सिवाय रोने गाने के और कुछ कर नहीं सकते..................................सो कलम चला कर या कंप्युटर पर खट-खट कर भड़ास पूरी कर रहे..........

    चन्द्र मोहन गुप्त
    www.cmgupta.blogspot.com

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  62. लोगो ने डार्विन के सर्वाइवल ऑफ़ फिटेस्ट को पढ़ा है ,माना है पर ऐसा क्यों है की वर्तमान में जब मनुष्य के पास जीने के लिए भीतर परिस्तिथिया ओर वातावरण मौजूद है वो न केवल इस दुनिया की दूसरी प्रजातियों के लिए खतरा बना हुआ है बल्कि खुद भी पीड़ी दर पीड़ी कम मनुष्य होता जा रहा है ...अगर हम अपने देस्श के भीतर ही पिछले ५० सालोका इतिहास उठाकर देख ले ....विज्ञानं ,टेक्नोलोजी में कहाँ से कहाँ पहुँच गए पर बतोर मनुष्य ?????
    दरसाल हम सभी के भीतर इन्सान ओर राक्षस दोनों मौजूद है .कब किसे कितनी खुराक देनी है ये महत्वपूर्ण है....
    किस हद तक अपने जमीर को बचाए रखते हुए आप इस बाजारी दुनिया में अपना अस्तित्व बनाये रखते है
    अब दरअसल यही मुद्दा है ...आप जैसा जीवन जीना चाहे जी सकते है बशर्ते आप जीना चाहे..... आप जैसे लोगो से जुड़ना चाहे जुड़ साकते है बशर्ते आप जुड़ना चाहे ...यानी आपमें जीने का सहस होना चाहिए .अपने जीवन का .....

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  63. app ka likha padhkar bahoot kuch sochta h dimag 1 minute m or m pehle yahi kahti thi ki kuch chize kabhi nahi badalti par bad m mahsus hua ki chnage is the law of nature y bhi utna hi sahi h , or aj kal har chiz utni hi tezi s or asani s badal rhi h..........tajmahal bhi (pathar bi) or ensan or ensaniyat ka to kya kah ja sakta h fir.par shayd fir badle ka y bhi kis din esi hope k sath chlte rhte h .........

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  64. क्या बात है अनुराग जी !
    वाह !!!

    बिलकुल श्री लाल शुक्ल के राग दरबारी वाला धारदार अंदाज !

    आज आपकी पोस्ट के कई वाक्य मैंने अपनी डायरी में दर्ज
    कर लिए हैं !

    सही है आपकी बात
    आज ज़माना "पोलिशड- कमीनो " का है !
    मुझे लगता है इस दौर में ऊंचा उठने की एक अनिवार्य शर्त
    सी हो गयी है - यह पोलिशड कमीनापन !
    आप मानें या न मानें हम-सबके अन्दर यह कमीनियत कहीं
    न कहीं बरकरार है .... बस परसेंटेज का फर्क है !

    ऊपर लिखी कई प्रभावशाली प्रतिक्रियाओं के बीच एक प्रतिक्रिया "आलोक सिंह" की भी है ,....शायद आपकी नजर पडी हो ......... उनकी सहज प्रतिक्रिया क्या चिंतन को बाध्य नहीं
    करती !

    अभ मेरी बात ख़त्म नहीं हुयी ....... फिर आऊंगा ........

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  65. नैतिक -शिक्षा " ऑप्शनल सब्जेक्ट -सही कहा-हमें यहाँ अपना ट्रेडिंग लाईसेन्स हर साल रिन्यू करवाने एथिक्स एवं कन्डक्ट का छोटा सा एक्जाम पास करना होता है -ताकि बातें रिवाइज़ हो जायें.

    यह बात भी जमी:

    कुछ फैसले गज फीते से नाप -जोख कर तय नहीं किये जाते….


    -सुन्दर सटीक पोस्ट.

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  66. नैतिक शिक्षा हमेशा ही ऑप्शनल रही.कम्पलसरी की भी नहीं जा सकती.नैतिक शिक्षा एक विषय न हो कर लिपि बन जायेगी तभी सार्थकता को प्राप्त होगी.कुछ भी लिखो नैतिक लिपि में लिखा मिलेगा.अनैतिकता स्वयं ही समाप्त हो जायेगी.

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  67. मानव की प्रवृतियाँ बदलती है या नही कहना मेरे लिए कठिन है लेकिन हाँ अँधेरा बुनने वाले हाथ असामयिक रूप से रोशनी में लाये जाते, पचास के दशक में कमलेश्वर जी ने जब "गरमी के दिन" कहानी लिखी तो वैद्य जी अपनी उपाधि को लिखवा रहे थे आज अनुराग जी धवल मूरतों के श्याम लक्ष्यों को उघाड़ते हैं बेदर्दी से. मुझे नही पता कि ये टिपण्णीकार किसी रचना को गुलज़ार या परवीन शाकिर जैसे नामों से इतर अनुराग को अनुराग कि दृष्टि से क्यों नहीं देख पाते, ऐसा उनके लेखन से किसी ने क्या चुराया है जो हर बात पर उनकी ही बात है, कभी अपने आप से पूछिए मित्रों कि एक लेखक कितनी कठिनाई से अपनी शैली का विकास करता है और आप चार शब्दों में उसे किसी का वारिस घोषित कर उसकी अकाल मृत्यु का पत्थर रोप जाते है.

    उत्तर देंहटाएं
  68. डॉक्टर साब, पालिश्ड क*** पे काफी व्यंग मिले यहाँ मगर गड़बड़ तो अंदर से है ना? डोनेशन से ही सही मगर मेडिकल में, बी टेक में एड्मिसन कराना है जरुर ये जिद तो हर घर में होती ही है, ट्यूशन के शार्टकट से आये हाई परसेंटेज के लम्बे रास्तो में खो ही जाते हैं. वस्तुवाद एक हद तक हो जाये तो ये सरे परिणाम तो अवश्यसंभावी हैं ना? हमारी खासियत रही है सादा जीवन मगर अब नहीं है. सादा हप्पेनिंग नहीं रहा ना अब शायद इसलिए. खुद नहीं जानता की क्या लिखना है बस लिखने का दिल किया सो लिख डाला मगर पोलिश करने के काम में हम सारे ही लगे है शायद. BPD( a political party formed by IITians and other young professionals) वाले कितने साल से चुनाव लड़ रहे है मगर क्यों नहीं जीत पाते. हम सब ही अपना फौरी नुक्सान नहीं सहन कर सकते शायद इसलिए. मगर फिर लगता है की नहीं आम इन्सान बुरा नहीं है सिर्फ ३दिन में आपके पोस्ट पे आई ७२ टिपण्णी सबूत है की सब चाहते है एक बदलाव,बस पहल चहिये.मंदिर के नाम पे वोट मांगने वाले बुजुर्गो को बोझ बता रहे हैं,समझ नहीं आता कमबख्त हमें भगवन चाहिए या इंसान. वैसे एक अपील थी आप सबसे की वोट जरुर करे और हो सके तो अपने area के BPD candidate के बारे में मालूमात करके उस पर भी गौर फरमाए. एक गुजारिश है ये कोई प्रचार नहीं किसी का.एक लिंक पोस्ट के अंत में दे रहा हूँ, जरा देखियेगा कही नफरत हौले हौले से फैला रहे है लोग, http://www.facebook.com/home.php?#/group.php?gid=2212447883

    Please have a look and comment on what they are saying or doing there.
    I am not certainly Hindu scholar but its not hinduism.
    I apologies for my bad hindi mistakes.
    Thanks

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  69. अनुराग जी , आपकी यह पोस्ट, पोस्ट ना होकर जिन्दगी का चित्र है । जैसे कैमरे को किसी का भी चित्र लेने मे सेक्ण्ड भर लगता है वैसे ही आपकी इस छोटी सी पोस्ट मे पता ही नही चलता कितना रस्ता तय हो जाता है । आपकी लेखनी मे मेरा जैसा लठ मार आदमी ही बह जाता है तो और लोग जो विद्वान साहित्यकार है उनका क्या हाल है । पाठक के बेड़ियां डाल देते है आप ।

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  70. अनुराग जी
    आप का ब्लाग बहुत अच्छा लगा।
    मैं अपने तीनों ब्लाग पर हर रविवार को
    ग़ज़ल,गीत डालता हूँ,जरूर देखें।मुझे पूरा यकीन
    है कि आप को ये पसंद आयेंगे।

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  71. HY per tareef ka bahut bahut shukriya! I was Overwhelmed!! I dont think I deserve it!

    God bless
    RC

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  72. इतनी टिप्पणियों के बाद तो टिप्पणी करने की भी हिम्मत नहीं होती। घूघूती बासूती जी ने इस लेख पर जो लिखा है, मेरा अनुभव भी कुछ ऐसा ही है।

    उत्तर देंहटाएं
  73. Sir, aapka article padh kar to dimaag ki batti jal gayi.... aapka shukriya jo aapne hamhe saraha

    उत्तर देंहटाएं
  74. anurag ji samajh nahi paa rahi hoon ki apka blog meri nazar se ojhal kese ho gaya shayad umar ka takaza hai yaa is blog ki dunia se abhi poori tarah vakif nahin hoon nahi to itani badia post na padh pane ka durbhagya na milta khair der aaye durust aaye ab mujhe pata chal gaya hai ki achhe blog ko bookmark me save karna hota hai ha ha ha

    उत्तर देंहटाएं
  75. fir se bilkul dil se nikli, dil tak pahunchi dil ki baat !!!

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  76. सुबह थोड़े ज्‍यादा इंसान होते हैं। क्‍योंकि चेतना लौटी नहीं होती लौट रही होती है। जैसे जैसे ज्ञान भरता जाता है इंसान कम होने लगता है। और ज्ञानी बन जाने के बाद तो अज्ञान अपनी पराकाष्‍ठा पर होता है।

    सुबह सुबह की इंसानियत की हार्दिक बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  77. आप मानें या न मानें हम-सबके अन्दर यह कमीनियत कहीं
    न कहीं बरकरार है .... बस परसेंटेज का फर्क है !

    Prakaash Govind ki ye baat khalti to hai, janchti bhi hai.

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  78. डॉक्टर अनुराग, हम दोनों ही इस बात से सहमत होंगे कि थर्ड इयर प्रोफेशनल के बाद जिस तरह रिश्ते गज-फीते से नापकर बनने लगते हैं, वहीँ पर हम जैसे स्कूलों में नैतिक शिक्षा पढ़ चुके लोग तकलीफ पाते हैं. फर्स्ट इयर के दोस्ताने फोर्थ इयर तक आकर पीजी के "गायनी-पीडियाट्रिक्स" या "सर्जरी-अनास्थीसिया' जैसे 'कोम्बो-कप्पल' बन जाते हैं. डिग्री कोर्स में यहीं से नैतिक शिक्षा का ऑप्शनल कोर्स शुरू होना चाहिए. मैंने तो फाईनल इयर में ही तय कर लिया था कि "गोल्डन कलर में गोल्ड मेडलिस्ट' लिखवाने की बेशर्मी नहीं कर पाऊंगा, सो डाक्टरी पेशा छोड़कर यहाँ आ गया कागज़ काले करने के पेशे में. आपने भी नहीं सीखा??? चलिए, एक से भले दो.

    उत्तर देंहटाएं
  79. anuraag ji

    main kya kahun aur kya likhun ,, jeevan ko aap aisa paint karte hai ki , kuch kahne ko bachata hi nahi ,man nishabd ho jaata hai , kahin jaakr chup hokar rah jaata hai .. kho jaat hai .. apne jeevan me chaayi hui maanvata ko pare rakhgti hui dincharya men...

    aapki lekhni ko mera salaam bhai ..


    vijay
    http://poemsofvijay.blogspot.com

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  80. पॉलिश्ड कमीनों की इस भरी-पूरी दुनिया के बिल्कुल बीचो-बीच में बैठे हुए भी इसे देख और लिख पाने वाले कुछ लोग अभी भी मौजूद है और यह दुनिया उन्ही के कदमों पर अपने पाँव धर-धर कर चलती है ...

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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