2009-01-17

"वो लोग जो आसमान थे "

बंगलौर के उस हॉल में जहाँ देश भर के डरमेटोलोजिस्ट जमा है ,मेरे मित्र ओर AIIMS में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ सोमेश गुप्ता विटिलोगो सर्जरी की उस टेक्नीक का श्रेय जब PGI चंडीगढ़ के .टी अस्सिटेंट को देते है ..तालियों के उस शोर में जाने क्यों मुझे अपने कॉलेज के सर्जरी विभाग का वो रेसिडेंट याद आ जाता है .जिसके हाथ में खुदा ने बरकत दी थी ...मुश्किल से मुश्किल सर्जरी को कम समय में इतनी सफाई से करना ...उसके स्टिच जिस्म पर चाकू की बेजोड़ कारीगिरी का नमूना होते ..चाकू का ये दोस्त मगर अंग्रेजी में लगभग संवाद हीनता की स्थिति के कारण जब दो बार एक्साम में असफल रहा ..निराशा के उस दौर में .. अगले एक्साम में सिस्टर इंचार्ज ने सीधे एक्साम्नर से गुजराती भाषा में ही संवाद की दरखवास्त की....ओर नतीजा सुखद रहा.... ईश्वर के भी खेल निराले है....
इंटरनेशनल एअरपोर्ट खूबसूरत ओर भव्य है ..काल मार्क्स ने कभी अमेरिका को "नींद की हत्या करने वाला देश" कहा था .बंगलौर आई टी का हब है ...सॉफ्टवेयर वाले मेरे दोस्त इसे भी "नींद की हत्या करने वाला शहर "कहते है .कांफ्रेंस से वापस लौटते वक़्त मै फ्लाईट में गाँधी के ब्रहमचर्य के प्रयोग किताब को पढता हूँ...सार्वजानिक रूप से अपनी पत्नी के साथ कोई देह संबंध न होने की घोषणा करने वाले गांधी ...क्यों अपने ब्रहमचर्य के प्रयोग करना चाहते है ?.जिसमे वे दो कम उम्र लड़कियों के साथ नग्न अवस्था में सोते है ...प्रखर तार्किकता से रखी गयी उनकी आत्म स्वीकृतिया मुझे छदम विमर्श ओर बौद्धिकता का दुरूपयोग लगता है....मन विशुब्ध होने लगता है ...आत्म्शुद्धियो की ये कोशिश मुझे पचती नही.......अपनी आत्मशुद्धि के लिए दूसरे की देह का बेजा इस्तेमाल नैतिकता का दिग्भर्मित रूप है ओर ईमानदारी का बेहूदा हस्तक्षेप ..... मै किताब बैचैन होकर बंद कर देता हूँ.....शायद एक बैठक में नही पढ़ पायूँगा ..... फ्लाईट में मुझे टहलने की इजाज़त नही है...मुझे तीन साल पहले ४८ पेज के संस्करण में निकले "सहारा- समय" में इसी विषय पर छपे लंबे श्रंखलाबद आलेख ध्यान आते है .....मै खिड़की से बाहर देखता हूँ ,खिड़की से बाहर केवल बादल है....केवल बादल....





81 टिप्‍पणियां:

  1. post ke saath mujhe jharte huye kan khoobssorat lage, sambhat: java ka bhi prayog kiya gaya hai.

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  2. शायद ये बादल भी कभी छटेँगे

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  3. वह किताब मैं भी कभी पूरी न कर सका. और बंगलोर के बारे में क्या कहूं. दोस्ती सी हो गयी थी उस शहर से. मौसम कोई भी हो मेरे कदम वहाँ की ज़मीन छते थे और वह हलकी सी बूंदाबादी कर के खुशी का इज़हार करता था. जितने दोस्त बंगलौर में बने, उतने बाकी सारी दुनिया मिलाकर भी नहीं बना पाया. उस लडकी से भी वहीं मिला जिसने बाद में मुझसे शादी की. वैसे गरमी और बारिश में पिट्सबर्ग भी बंगलोर ही लगता है.

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  4. आपके और कुश के लेखन में एक समानता देख रहा हूँ , आप दोनों को पढते हुए ऐसा लगता है जैसे फिल्म देख रहे हैं !

    गज़ब अंदाज है आप दोनों का !

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  5. Baudhik tark siddh karne ke liye jo prayog kiye gaye, usme shayad kuch ati ho gayi. Jaisa ki kaha gaya hai ki "ati sravatra varjayet", is lihaaj se aapki tippani bahut sateek ban padi hai.

    Naitikta ya imaandari bhi kaise drishtikatu ho sakti hai, iska ek bahut achcha udaharan aapne diya hai.

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  6. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  7. विवेक जी का कहना बिल्कुल सही है. लेख का structuring ही कुछ ऐसा है. सुंदर लेखन. आभार.

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  8. डाक्टर साहेब, आपने सीधे सीधे पोस्ट मारटम कर दिया है.. मैने ये किताब तो नहीं पढी है और ये बात तय है कि पढ्ना भी नहीं चाहूंगा... अपनी नैतिक शक्ती का विकास कर अपने मन के दुराचरण वाली प्रवितियों पर अंकुश कौन नहीं लगाना चाहेगा पर यकीनन प्रयोग की बात सुन कर ही कई सूरमा मैदान से किनारा कर लेते हैं। अगर गांधी जी ने इतना कुछ हासिल कर भी लिया था तो भी उन्होंने ऎसा प्रयोग कर के सब गंवा दिया।
    योगाभ्यास की नींव की ईंट माने जाने वाले ऋशी पराशर जब कई साल के तप के बाद जंगल से वापस आये तो यकीनन उन के अंदर कई आलौकिक शक्तियों का विकास हो चुका था, नदी पार करने के लिए खेवट से कहा कि नदी पार करवा दो.. खेवट ने अर्ज की कि बाबा अभी खाना खा लूं फिर ले चलता हूं.. अब इतना बडा ऋशी और कई शक्तियों का स्वामी.. बोल कि तुझे श्राप दे दूंगा, जल्दी से नदी पार करवाओ.. खेवट ने अपनी किशोर बेटी को भेज दिया.. अब तपस्वी ने बहुत अर्से के बाद किशोरी देखी थी..मन चलायमान हो गया.. गंदा विचार प्रकट किया तो किशोरी बोली कि मेरे मुंह से गंध आती है.. तपस्वी ने इच्छा शक्ती से कहा कि जा योजन गंधारी हो जा, कई योजन [ पुराने जमाने में दूरी योजन में नापी जाती थी ] तक खुशबू आने लगी। अब किशोरी बोलती है कि सूर्य देखता है..तपस्वी ने धुंध कर दी..पानी देखता है तो तपस्वी ने नदी को बरेती कर दिया... देखो मन के खेल.. अपनी पूरी शक्ती व्यर्थ कर दी.. यही किशोरी आगे चल कर पंडवों की दादी बनी.. तो कहानी गढने का तात्पर्य सिर्फ ये था कि मन कभी भी चलायमान हो जाता है.. अच्छे अच्छे नहीं बच पाये तो बेचारे गांधी जी क्या चीज़ थे। गुरुबाणी में भी फरमाया गया है... मन के जीते जीत है.. अर्थात मन को जीतना ही कठिन है।

    आदर सहित
    [ अगर कुछ भूल हुई हो तो क्श्मा प्रार्थी हूं ]

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  9. आत्म्शुद्धियो की ये कोशिश मुझे पचती नही.......अपनी आत्मशुद्धि के लिए दूसरे की देह का बेजा इस्तेमाल नैतिकता का दिग्भर्मित रूप है ओर ईमानदारी का बेहूदा हस्तक्षेप ।

    agree ।

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  10. बादल ना ही छ्टें तो अच्‍छा है। कई बार ऐसा होता है कि समय और मति, हमारी सोच को प्रभावित करते हैं।

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  11. संवादों की अहमियत कहाँ किस क्षेत्र में नहीं है...कहाँ किस को चन्द शब्दों के अभाव में कोई मुकाम हासिल न हो पाया और कहीं किसी ने शब्दों के छद्म जाल में सब को उलझा दिया.
    यह अच्छा हुआ सिस्टर इंचार्ज के माध्यम से ही..उन डॉक्टर साहब को अपने करियर में एक नया मुकाम मिल सकेगा/सका.सच में ईश्वर सब को सब कुछ नहीं देता--किसी में हाथों का हुनर है तो कोई वाक् पटु ,कोई बौद्धिक रूप से सह्तिशाली है तो कोई शारीरिक रूप से.
    -ब्लॉग्गिंग या नेट्वर्किंग भी नींद की हत्या करने वाला टूल है....
    --गाँधी के ब्रहमचर्य के प्रयोग 'किताब कभी नहीं पढ़ी.न देखी-सुनी--लेकिन जो पता चला उस से मैं भी इसी बात से सहमत हूँ--और ...आत्म्शुद्धियो की ये कोशिश मेरे भी गले नहीं उतरती..
    --बादल अगर छंट जायेंगे तो बहुत कुछ साफ़ दिखने लग जाएगा...और शायद [अक्सर] कुछ छवियाँ धुंधली ही रहें तो बेहतर है..
    --अनुराग जी,पोस्ट किए गीत मुझे दुर्लभ लगे ..ये सभी गीत ..मैं ने पहली बार सुने थे..इस लिए सब के साथ बाँटना चाहे.आप की पसंद जानी अच्छा लगा..कई दिन से common कोल्ड हुआ है.सर्दी अभी भी यहाँ काफी है.ख़ास कर मेरे शहर में १४-१५ डिग्री --कोल्ड ..अभी तक पूरा ठीक नहीं हुआ है.इस लिए कुछ नया रिकॉर्ड नहीं कर पा रही हूँ.-आभार सहित-:)-

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  12. बादल तो छट ही जायेंगे ..मन को जीत लो तो सब सही है पर सबसे मुश्किल काम ही यही है .

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  13. (चाकू का ये दोस्त मगर अंग्रेजी में लगभग संवाद हीनता की स्थिति के कारण जब दो बार एक्साम में असफल रहा ..निराशा के उस दौर में)जब आशा के किरण निकल आती है तो लगता है कि वाकई ईश्वर है और उसके खेल निराले भी होते है। नही तो मैं सोच में पढ जाता हूँ कि वो है भी या नही। और कभी उसे दोस्त कह जाता हूँ। एक अजीब सा रिश्ता है उसका और मेरा। और नींद की हत्या तो अब लगभग हर शहरी घर में होने लगी है। गाँधी जी को पढा तो है पर उस पर कुछ कहना अभी वश में नही।

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  14. वो लोग जिनके साथ महानता का टैग टंगा होता है , वो हर बार हर काम में महान होगा ये जरूरी तो नहीं। फिर उनकी महानता तो पीआर का इतना बड़ा कारनामा है कि उसके आगे बड़े बड़े पीआरओ फेल हैं, अच्छा हुआ जो किताब बंद करके थोड़ी देर आसमान का साथ कर लिया, वरना जो लोग आसमान हैं उनके साथ वक्त गुजार पाना वाकई मुश्किल है।

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  15. प्रखर तार्किकता से रखी गयी उनकी आत्म स्वीकृतिया मुझे छदम विमर्श ओर बौद्धिकता का दुरूपयोग लगता है....मन विशुब्ध होने लगता है ...आत्म्शुद्धियो की ये कोशिश मुझे पचती नही.......अपनी आत्मशुद्धि के लिए दूसरे की देह का बेजा इस्तेमाल नैतिकता का दिग्भर्मित रूप है ओर ईमानदारी का बेहूदा हस्तक्षेप ....

    बेहद ईमानदार हैं आप.....इसके आगे क्या कहूँ।

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  16. उसके स्टिच जिस्म पर चाकू की बेजोड़ कारीगिरी का नमूना होते ..चाकू का ये दोस्त मगर अंग्रेजी में लगभग संवाद हीनता की स्थिति के कारण जब दो बार एक्साम में असफल रहा ..निराशा के उस दौर में .. अगले एक्साम में सिस्टर इंचार्ज ने सीधे एक्साम्नर से गुजराती भाषा में ही संवाद की दरखवास्त की....ओर नतीजा सुखद रहा.... ईश्वर के भी खेल निराले है....

    sundar lekhan

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  17. अनुराग जी, नमस्कार
    आपने अपनी बात बड़े ही दार्शनिक अंदाज में लिखी है. एक बार में तो सिर से गुजर गई, दूसरी बार पढने पर समझ आई.

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  18. "अपनी आत्मशुद्धि के लिए दूसरे की देह का बेजा इस्तेमाल नैतिकता का दिग्भर्मित रूप है ओर ईमानदारी का बेहूदा हस्तक्षेप"
    सोलह आने सच्ची बात....क्या लिखते हैं हैं आप...ग़ज़ब..
    नीरज

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  19. डॉ साहब आप ही बेवकूफ है जो इसी किताबे पढ़कर खामखा विचलित हो जाते है ओर ऐसी नैतिक ताओ में उतरने का जोखिम उठाते है दो चार कविता लिखते ,लोग वाह वाह करके गुजर जाते ,देखा नही आपने सो कॉल्ड बड़े ब्लोगर भी स्पष्टवादिता से बचते हुए कैसे किनारा कर गए ,कोई बर्फ की बात करता है ,कोई बादलो की,मुद्दा किसी को दिखता नही या कोई देखना नही चाहता .आप खामखा टाइम वेस्ट करते है .
    वैसे गांधी जी के बारे में इन पुस्तकों ओर लेखो का जिक्र मैंने भी थोड़ा पढ़ा सुना है ,पिता शायद नही चाहते मै उन्हें पढूं पर उनकी अलमारी में ऐसी एक किताब मेरे हाथ आयी थी ,शायद वे नही चाहते ओर दूसरे भारतीयों की तरह की जिस महात्मा को हम पूजते है उसका ये मानव रूप भी हमारे सामने आए ,वैसे भी भारतीय सेक्सुअलिटी के किसी भी रूप पर बात करने से कतराते है .लेकिन यहाँ मुझे निराशा हुई खास तौर पर महिलाओं से .
    मुझे अब समझ में आया की राजेश रोशन साहब क्यों ओर किस बात से उखड़े थे .देखिये सब घुमा फिर कर बात करने लगे है .क्या वाकई उनकी सोच पे हथोडे नही बजते जब महात्मा की बारे में वे ऐसा सुनते है ?

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  20. अंग्रेजी ने तो कईयों को डुबाया इस देश में. इस अंग्रेजी ने कितनी ही हुनर जाया किए है.

    और गाँधी बाबा को तो हम कई बार समझ नहीं पाते... ये पुस्तक तो नहीं पढ़ी पर ये वाकया मालूम है.

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  21. बापू बहुत पसंद हैं, लेकिन ये ब्रह्मचर्य के प्रयोग हमें भी कभी नहीं पचे।

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  22. us resident ki tarah na jane har hosp mein kitne doc honge,sach 10min ke viva se kisiko jacha nahi jaa sakta.

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  23. अनुराग जी आपका ब्लाग का दायरा बहुत विशाल है।

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  24. सार्वजानिक रूप से अपनी पत्नी के साथ कोई देह संबंध न होने की घोषणा करने वाले गांधी ...क्यों अपने ब्रहमचर्य के प्रयोग करना चाहते है ?.जिसमे वे दो कम उम्र लड़कियों के साथ नग्न अवस्था में सोते है ...प्रखर तार्किकता से रखी गयी उनकी आत्म स्वीकृतिया मुझे छदम विमर्श ओर बौद्धिकता का दुरूपयोग लगता है....मन विशुब्ध होने लगता है ...आत्म्शुद्धियो की ये कोशिश मुझे पचती नही.......अपनी आत्मशुद्धि के लिए दूसरे की देह का बेजा इस्तेमाल नैतिकता का दिग्भर्मित रूप है ओर ईमानदारी का बेहूदा हस्तक्षेप .....

    मैने पढी है..और शायद ण्तत: वहीं पहुण्चेण्गे जहां मैं पहुचा था.

    रामराम.

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  25. गॉंधी जी का यह पक्ष काफी वि‍वादास्‍पद रहा। उन्‍होने स्‍त्रि‍यों को माता और देवी के रूप में महि‍मामंडि‍त कि‍या और शायद इसने स्‍त्री की छवि‍ को उस रूप में स्‍वाधीन नहीं होने दि‍या, जैसी दरकार थी।
    काफी सुंदर लि‍खा।

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  26. दूसरे की देह का बेजा इस्तेमाल नैतिकता का दिग्भर्मित रूप है ओर ईमानदारी का बेहूदा हस्तक्षेप


    -इस किताब को पढ़्कर बादल को बादल पहचाना, बहुत हुआ..हम तो रुई के फाहे समझते रहे. जब सब झुटलाना ही है तो प्रकृति को क्यूँ नहीं..है न!!

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  27. अपनी आत्मशुद्धि के लिए दूसरे की देह का बेजा इस्तेमाल नैतिकता का दिग्भर्मित रूप है ओर ईमानदारी का बेहूदा हस्तक्षेप"

    बहोत ही सही कहा आपने ,महानता हर क्षेत्र में आप नही दिखा सकते जो सही भी नही है चहुमुखी प्रतिभा का होना अलग बात है मगर हर क्षेत्र में महान होना ये दूसरी बात .........बहोत ही उम्दा लेखन ...
    ढेरो बधाई कुबूल करें..मेरी नई ग़ज़ल में शायद अन्तिम छोड़ कोई और भी पसंद आए यही उम्मीद करता हूँ ........

    अर्श

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  28. गांधीजी के ब्रह्मचर्य के प्रयोग के बारे में परसाई जी ने पाठकों के सवाल जबाब देते हुये विस्तार से लिखा है। और तमाम बातों के बारे में लिखते हुये उन्होंने गांधी के अनुयायियों के चुटकी लेने वाले कमेंट के बारे में भी बताया है। एक अनुयायी (नाम याद नहीं इस समय) कहते हैं- बापू अगर कहीं आपके स्वयंसेवक ब्रह्मचर्य के प्रयोग करने लगे तो बड़ा गड़बड़ होगा।

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  29. अनुराग जी,
    गांधी जी के ब्रह्मचर्य पर आपके दिल की बात तार्किक है लेकिन मैने गांधी को बहुत कम जाना है।...या कहिए कि उन्‍हें पढ़ने-समझने की हिम्‍मत नहीं जुटा पाया कभी लेकिन गांधी के समग्र चिंतन को जाने बिना मैं क्‍या कहूं। डर लगता है।

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  30. इस वाकये पर कई बार अखबारों में विचार विमर्श पढ़ चुका हूँ। इस तरह के प्रयोग को कोई उचित तो नहीं ठहरा सकता पर यही कह सकता हूँ कि हर व्यक्ति का किसी भी पहलू को आँकने का अपना एक दृष्टिकोण होता है जिसमें वो कभी सही और गलत हो सकता हैं चाहे वो कितना महान क्यूँ ना हो। गाँधी जी ने कम से कम अपने प्रयोगों को समाज के सामने खुल कर रखा ये भी एक बड़ी हिम्मत की बात है।

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  31. सलाम एक ईमानदार और बेबाक कलम को।

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  32. इस मुद्दे पर अभी और बहस की जरूरत है। कोई विद्वान यदि गान्धीजी का मन्तव्य भी स्पष्ट करे तो बात बने। गान्धीजी के प्रयोग को बिना पूरा समझे खारिज करना ठीक नहीं होगा।

    लगता है इसे खोजकर टीका सहित पढ़ना ही चाहिए।

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  33. अनुराग जी आप का लेख हमेशा की तरह से तारीफ़ के काबिल है,
    गाँधी के ब्रहमचर्य के प्रयोग** इस किताब को मेने पढने की जरुरत ही नही समझी, क्योकि गाधीं जी की कुछ बातो को छोड कर मै बाकी किसी भी बात से मै सहमत नही रहा, कारण बहुत से है,
    धन्यवाद

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  34. कहाँ की बात कहाँ ले गए डॉ साहब ! किसके बहाने आप क्या जिक्र करना चाह रहे थे -बंगलौर शहर की कर्चा के बहाने गांधी या फिर आपने कांफ्रेंस या हवाई उड़ान के दौरान अपनी पाठ्य रुचियों के बहाने गांधी ! बहरहाल आपका अंदाजे बयाँ पसंद आया ! चर्चा तो आप गांधी की ही करना चाहते रहे -गांधी एक ऐसा व्यक्तित्व है ही जो हर देश काल में चर्चा का विषय रहेगा ! क्योंकि वह आम होकर भी अतिशय विशिष्ट है !
    आप ने गांधी के जीवन के जिस पक्ष को चर्चा में लाने का हवाई उपक्रम किया है अब वह बासी पड़ गया है .पर हो सकता है आपके लिए वह नया हो ! हर पढा लिखा माडर्न खयालो वाला गांधी के कथित प्रसंग पर ठीक वही सोचता है जैसा आपने बयाँ किया है -मैं भी अपनी चालीस साल उम्र तक ऐसयीच सोचता रहा -पर तभी एक नयी समझ विकसित होती गयी और मेरा वजूद गांधी के सामने साष्टांग हो गया !
    मैं महज कुछ सवाल आपके चिंतन मनन के लिए छोड़ रहा हूँ -जवाब का आकांक्षी नही हूँ !
    ! .गांधी अगर नवयौवनाओं के साथ सहज जैवीय सम्बन्ध स्थापित करना चाहते ही थे तो वाक्य चातुर्य -क्षद्म बौद्धिक विमर्श की जरूरत ही क्या थी ? वे चुप रहते और दीगर समकालीन नेताओं की तरह ही यौनानंद उठाते रहते ! लोग उन पर मर मिटने पर को उतावले थे ! फिर अदना सा देहदान क्या गांधी के लिए इतना अलभ्य था !
    २-क्या आप यह मानते हैं कि सत्य की समझ की आड़ में गांधी अपनी यौन पिपासा शांत कर रहे थे ? तो फिर इतने बौद्धिक बकवाद की जरूरत ही क्या थी -नेपथ्य में तो यह चल ही सकता था .
    ३-अब सवाल यह कि गांधी जैसी शख्शियत बिना किसी भूमिका के कैसे नर लीला कर सकता था इसलिए उसने दार्शनिकता की आड़ लेकर लोगों को बरगलाया और मनोवांछित दैहिक सुख भोगने का मार्ग प्रशस्त किया -प्रकारांतर से दैहिक शोषण जैसा घृणित काम अंजाम दिया .
    ४.क्या जैवीय लालसा बोले तो लिबिडो बुरी बात है ?
    ५-क्या मनुष्य को उसकी पूरी उम्र तक नवयौवना संसर्ग की चाह नही रहती ?
    6-क्या हममें और आपमें यह नैतिक साहस है कि गाहे बगाहे ऐसे सम्बन्ध बनने के बावजूद भी हम उन्हें स्वीकारने का साहस रखते हैं ?
    ७-तो फिर अनैतिक कौन हुआ जो सम्बन्धों को चोरी छिपे अंजाम दे रहा वह या वह जो अपनी मजबूरी को खुले आम बयाँ कर रहा हो ?
    आप डाक्टर है इसलिए मैंने यह सवाल सही व्यक्ति के सामने रखे हैं !
    गांधी केवल इसलिए ही महान हैं कि उनमें अनैतिक काम तक को भी सार्वजनिक करने का आदमी नैतिक साहस था
    इसलिए ही वह महान है -उसे समझ पाना इतना सहज नहीं डॉ अनुराग !
    और गांधी पर चर्चा के लिए किसी और उपाख्यान -पूर्वराग की जरूरत भी नही ! वह एक महामानव था !

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  35. अब जब गांधी जी अपनी सफाई देने के लिए हमारे बीच नहीं हैं तो मुझे लगता है हमें ऐसा नहीं लिखना चाहिए जिसके लिए उनकी सफाई की आवश्यकता हो !
    और टिप्पणी में मजाक में भी लेखक को बेवकूफ कहने के मैं विरुद्ध हूँ !

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  36. नैतिकता के खिलाफ तो है ही
    ये कुछ हद तक गिरी मानसिकता है
    किन्ही गैर लड़कियों के सामने सिर्फ़ अपने को साबित करने के लिए न्ग्न होना बहुत ग़लत है
    गाँधी जी को अभी तक जितना जाना था उसमें ये सब नही पढ़ा था
    बातों को बहुत अनूठे अंदाज़ में कहते हो

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  37. अनुराग जी आपकी बातो से पूर्र्ण सहमत हूँ. उस वक़्त भी गाँधी के भक्तो ने उनके इस प्रयोग को शुद्धि की आवश्यकता बताया था.देखिये...




    Experiments with Brahmacharya

    Towards the end of his life, it became public knowledge that Gandhi had been sharing his bed for a number of years with young women.[38][39] He explained that he did this for bodily warmth at night and termed his actions as "nature cure". Later in his life he started experimenting with Brahmacharya in order to test his self control. His letter to Birla in April, 1945 referring to ‘women or girls who have been naked with me’ indicates that several women were part of his experiments.[40] Sex became the most talked about subject matter by Gandhi after ahimsa (non-violence) and increasingly so in his later years. He devoted five full editorials in Harijan discussing the practice of Brahmacharya.[41]

    As part of these experiments, he initially slept with his women associates in the same room but at a distance. Afterwards he started to lie in the same bed with his women disciples and later took to sleeping naked alongside them.[40] According to Gandhi active-celibacy meant perfect self control in the presence of opposite sex. Gandhi conducted his experiments with a number of women such as Abha, the sixteen-year-old wife of his grandnephew Kanu Gandhi. Gandhi acknowledged “that this experiment is very dangerous indeed”, but thought “that it was capable of yielding great results”.[42] His nineteen-year-old grandniece, Manu Gandhi, too was part of his experiments. Gandhi had earlier written to her father, Jaisukhlal Gandhi, that Manu had started to share his bed so that he may "correct her sleeping posture".[42] In Gandhi’s view, the experiment of sleeping naked with Manu in Noakhali would help him in contemplating upon Hindu-Muslim unity in India before partition and ease communal tensions. Gandhi saw himself as a mother to these women and would refer to Abha and Manu as “my walking sticks”.

    Gandhi called Sarladevi, a married woman with children and a devout follower, his “spiritual wife”. He later said that he had come close to having sexual relations with her.[43] He had told a correspondent in March, 1945 that “sleeping together came with my taking up of bramhacharya or even before that”; he said he had experimented with his wife “but that was not enough”.[42] Gandhi felt satisfied with his experiments and wrote to Manu that “I have successfully practiced the eleven vows taken by me. This is the culmination of my striving for last thirty six years. In this yajna I got a glimpse of the ideal truth and purity for which I have been striving”.

    Gandhi had to take criticism for his experiments by many of his followers and opponents. His stenographer, R. P. Parasuram, resigned when he saw Gandhi sleeping naked with Manu.[44] Gandhi insisted that he never felt aroused while he slept beside her, or with Sushila or Abha. "I am sorry" Gandhi said to Parasuram, "you are at liberty to leave me today." Nirmal Kumar Bose, another close associate of Gandhi, parted company with him in April 1947, post Gandhi's tour of Noakhali, where some sort of altercation had taken place between Gandhi and Sushila Nayar in his bedroom at midnight that caused Gandhi to slap his forehead. Bose had stated that the nature of his experiments in Bramhacharya still remained unknown and unstated.[44][45]

    N. K. Bose, who stayed close to Gandhi during his Noakhali tour, testified that “there was no immorality on part of Gandhi. Moreover Gandhi tried to conquer the feeling of sex by consciously endeavouring to convert himself into a mother of those who were under his care, whether men or women”. Dattatreya Balkrishna Kalelkar, a revolutionary turned disciple of Gandhi, used to say that Gandhi’s “relationships with women were, from beginning to end, as pure as mother’s milk”.[46]



    http://en.wikipedia.org/wiki/Mahatma_Gandhi#Experiments_with_Brahmacharya


    यहाँ सिर्फ़ एक लिंक दे रहा हूँ पर आप ढेर सारे लिंक गूगल में ढूंढ सकते है .दुर्भाग्य से हमारे देश के ८० प्रतिशत लोग इन बातो को जानते नही है.

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  38. One defense that could be made for Gandhi's actions is that he experienced intimate relations with men as well. Hermann Kallenbach, a South Africa associate, was very close to the Mahatma. Kallenbach promised that he would travel to the "ends of the earth in search of [Gandhian] Truth," and he also promised Gandhi that he would never marry. Gandhi reciprocated by declaring unconditional love and a declaration that they would always be "one soul in two bodies."



    Gandhi was also very close to Pyarelal Nayar, Sushila Nayar's brother, and boasted that Pyarelal slept closer to him than his sister did. For Gandhi, however, sleeping with men was different from sharing a bed with women. Abha Gandhi's husband Kanu once objected to his wife sleeping with the Mahatma and offered himself as a "bed warmer." Gandhi rejected his proposal by making it clear that brahmacharya tests required young women as bedmates. Finally, if someone makes an appeal to the Indian custom and necessity of intimate Indian family sleeping arrangements, Girja Kumar is not convinced: "Not even in India do grown-up daughters sleep with their fathers."



    I

    In his book My Days with Gandhi Bose does mention in passing that Gandhi’s techniques are “reminiscent of the Tantras,” and Gandhi himself said that he read the books on Tantra written by Sir John Woodroofe, but, as far as I know, only Gopi Krishna has argued at any length about Gandhi’s Tantricism.



    In his on-line essay “Mahatma Gandhi and the Kundalini Process,” Krishna argues that the only way that we can explain Gandhi’s actions with these young women is to assume he was a kundalini yogi. Krishna speculates that “upward flow of reproductive energy [shakti]” started as soon as he committed himself to brahmacharya in 1906. Gandhi was 37, “the usual time,” from Krishna’s own experience, “for the spontaneous arousal of the Serpent Power.”



    As evidence that Gandhi had perfected this state, Krishna cites this passage from Gandhi’s Key to Health: “[the brahmachari’s] sexual organs will begin to look different. . . . He does not become impotent for lack of the necessary secretions of sexual glands. But these secretions in his case are sublimated into a vital force pervading his whole being.” Krishna claims that this passage makes it “patently clear” that Gandhi had attained the state of brahmacharya, but it is not clear that Gandhi is writing about himself, and that, except during the crisis with Manu, he rarely ever claimed spiritual perfection.



    As the kundalini yogi matures, Krishna states that he “needs constant stimulation to increase the supply of reproductive juices. . . . The Tantras and other works on kundalini clearly acknowledge the need of an attractive female partner in the practices undertaken to awaken shakti.” Gandhi does in fact say that “my brahmacharya . . . irresistibly drew me to woman as the mother of man. She became too sacred for sexual love.”



    Krishna admits that Gandhi himself most likely “had no inkling of the transformative process at work in him,” even though he claims that Gandhi noticed that his male organ had shrunk. Krishna brushes aside criticism of Gandhi’s actions and also concern for the young women’s mental health, because “nature accomplishes her great tasks in her own way and leaves short-sighted mortals wondering how it could happen.” Apart from the speculative nature of Krishna’s theory, we should be most concerned about his disregard for the women’s well being, as well has the implication that Gandhi was driven by forces over which he had no control.

    II

    For Gandhi the virtues of patience, self-control, and courage were absolutely essential to defeat the temptation to retaliate and respond with violence. Gandhi made it clear that each of these virtues were found most often in women. Gandhi once said that he wanted to convert the woman=s capacity for "self-sacrifice and suffering into shakti-power." Gandhi describes womankind as follows: "Has she not great intuition, is she not more self-sacrificing, has she not greater powers of endurance, has she not greater courage?" He also claimed that nonviolence is embodied in the woman: she is "weak in striking. . . strong in suffering."



    The women around Gandhi were amazed how comfortable they felt in his presence and how much of a woman he had become to them. Millie Polak observed that "most women love men for [masculine] attributes. Yet, Mohandas Gandhi has been given the love of many women for his womanliness." His orphaned grandniece Manu considered Gandhi as her new mother, and she simply could not understand all the controversy surrounding their sleeping together.



    The fact that women felt no unease in his presence was proof to Gandhi that he was approaching perfection as a brahmachari. Indeed, Bose contends that Gandhi attempted to “conquer sex” was “by becoming a woman.” Gandhi told Pyarelal Nayar that he once tore the burning sari off a woman in his ashram, but "she felt no embarrassment, because she knew I was a brahmachari and so almost like a sister to her." Alternatively, Gandhi says that his goal was the state of "complete sexlessness" recommended by Jesus and that this condition could be achieved by becoming a eunuch by prayer not by an operation.



    Gandhi is no doubt referring to shakti when he states that "all power comes from the preservation and sublimation of the vitality that is responsible for the creation of life." Gandhi may very well be indicating a Tantric process of empowerment that involves the preservation and sublimation of a male vitality that has its source in shakti. When Gandhi did his first radio broadcast on November 12, 1947, he declared that the phenomenon of broadcasting demonstrated “shakti, the miraculous power of God."

    When Gandhi once described himself as "half a woman,” an alternative view of masculine and feminine power suggests itself. The Chinese/Jungian view of complementary yin (anima) and yang (animus) energies is found in this passage: "A man should remain man and yet should learn to become woman; similarly, a woman should remain woman and yet learn to become man." Hsi Lai uses the yin/yang model to explain Gandhi’s sexual experiments: “He didn’t do this for the purpose of actual sexual contact, but as an ancient practice of rejuvenating his male energy. . . . Taoists called this method ‘using the yin to replenish the yang.”

    The source of Gandhi’s dipolar views of male and female may have been Christian rather than Asian. While a young man in England, Gandhi came into contact with the Esoteric Christian Union, whose interpretation of the image of God meant that the individual "must comprise within himself the qualitiesBmasculine and feminineBof existence and be spiritually both man and woman." When he confessed to Kedar Nathji and Swami Anand that his sexual experiments were “unorthodox,” Gandhi says that his views on this subject had been influenced by “Western writers on this subject.”

    t is the male who is active in Tantric rites. Only males undergo initiation, and the only instruction females receive, if they get any, is that they "should not even mentally touch another male." Gandhi's Tantricism definitely follows this androcentric approach. Gandhi also takes the defiant stance of the Tantric who says that he cares nothing for what others thinks of his practice: "The whole world may forsake me but I dare not leave what I hold is the truth for me.” Gandhi once admonished a critic that he would sleep with a thousand women if that is what it took to reach spiritual purity. Gandhi's experiments in truth took on the value free aspects of the scientific method, and left-handed Tantrics believe that their actions are above conventional law and morality.

    Normally Tantric practices are tightly structured, highly ritualized, and the initiation procedures, guided by a guru, are esoteric. The only bona fide guru in Gandhi’s spiritual development was Raichandcharya, a Jain saint, not a Tantric, with whom Gandhi corresponded during his formative South Africa period. Gandhi officiated at daily worship and hymn singing, encouraged the chanting of the Ramanama (the god Rama's name), and followed an unconventional diet, but these practices are not Tantric in any way. The chanting of the Ramanama is said to have magical properties, but its use is so widespread in India it may not indicate any special Tantric associations. Nevertheless, Gandhi does connect the chanting of Rama's name with "an alchemy [that] can transform the body" that leads to "the conservation of vital energy."

    Gandhi’s experiments with truth were highly personalized but not spiritually esoteric as are Tantric practices. Only after the sexual experiments came under public scrutiny did Gandhi started telling his female associates to keep their activities secret. Not until his last days, when his sleeping with Manu became public, did Gandhi confess that this secrecy was actually a sign of untruthfulness. Gandhi's secrecy was simply expedient and not spiritually required.

    IV

    Before Gandhi started his brahmacharya experiments in 1938, he had a string of intimate relationships with European and Indian women. While he was in South Africa, Gandhi fell in love with Millie Polak, the wife of Henry Polak, both of whom lived with Gandhi at Phoenix Farm. Kumar describes their first contact as follows: "Gandhiji and Millie started conversing through their eyes. They made a pact between them immediately. Poor Henry was left stranded." As with all of his female friends, Gandhi insisted that he and Millie be sisters or alternatively that he be her father, but after they were together in London in 1909 without Henry, Gandhi dared to suggest that he was a substitute husband.



    Even though Millie was smitten by him, she stood up to Gandi's controlling nature and argued against his absurd dietary ideas and his goal to force chastity on all his coworkers. This independent spirit that defines most of his female intimates of this early period stands in instructive contrast to the passive participants in the later brahmacharya experiments. For example, Kumar describes Manu as a devotee who "was prepared to sacrifice her life at the altar of her personal God." Gandhi controlled every aspect of Manu's life, and when she once forgot his favorite soap at their last stay, he made her walk back through a dark jungle to retrieve it.



    When Millie finally broke off their 3-year affair, Gandhi's attentions turned to Maud Polak, Henry's sister. Maud worked with Gandhi at Phoenix Farm as his personal secretary until 1913. In a letter to Henry, Gandhi described Maud seeing him off at a railway station: "She cannot tear herself from me. . . . She would not shake hands with me. She wanted a kiss. [This incident] has transformed her and with her me."



    Esther Faering, a young Danish missionary, was the next major love in Gandhi's life. From her very first visit at the Satyagraha Ashram in 1917, Kumar describes Faering as "completely hooked on" Gandhi, and as with Millie Polak, "an instant chemistry developed" between them. Gandhi "experienced an intensely personal passion for Esther," and she praised him as the "Incarnation of God in man."



    The other ashramites were alarmed at Gandhi's obsession with Faering, and Kasturba Gandhi was particularly cool to her husband's new love interest. Gandhi made matters worse by siding with Faering against his wife. While he was away from the ashram, he wrote daily letters to Faering, which Kumar describes as having the passionate intensity of the poets of Hinduism and Sufi Islam. He hazards a guess that "Esther must have stirred," as young beautiful women are supposed to do in the Tantric yogi, "the serpent resting uncoiled in [Gandhi's] kundalini."



    One would expect Gandhi to have at least been serially monogamous in his relationships, but that was not the case. While Faering was struggling against Kasturba and other ashramites, and receiving Gandhi's constant support from afar, he was conducting what Kumar calls a "whirlwind romance" with Saraladevi Chowdharani, a Bengali revolutionary married to a Punjabi musician. Her father was a secretary of Indian National Congress in Calcutta, and by virtue of her singing and activism, Saraladevi was celebrated as Bengal's Joan of Arc and as an incarnation of the Goddess Durga. She rose to the challenge and wrote that "my pen reverberated with the power of Shiva's trumpet and invited Bengalis to cultivate death."



    After the Jallianwala Bagh massacre in 1919, Gandhi stayed at Saraladevi's home in Lahore and then toured India together during 1920. Her husband, R. D. Chowdhary, was in jail for the first eight months this period, but he was content, as was Henry Polak, to share his wife with the Mahatma. Gandhi agreed with Chowdhary that Saraladevi was the "greatest shakti of India."



    Gandhi called Saraladevi his "spiritual wife" after "an intellectual wedding," and he reported that he bathed “in her deep affection” as she showered "her love on [him] in every possible way." Kasturba Gandhi had refused to wear khadi—the homespun and hand woven garments that Gandhi made famous—but Saraladevi became the Mahatma's most elegant khadi model. Kumar describes them as "lovelorn teenagers with stars in their eyes," and depicts Saraladevi as "aristocratic, gorgeously dressed, sensuously beautiful, and imperious. In short, she had everything that [Kasturba] lacked."



    In contrast to his later brahmacharya mistresses, Saraladevi, just as Millie Polak before her, did not bow to Gandhi's authority in any way. For example, as the quotation above implies, she agreed with fellow Bengalis, such as the young Aurobindo, that independence required violent revolution. Following her Goddess, Durga's shakti was always accompanied by violence, and Saraladevi eventually broke with Gandhi over this very issue.



    Kumar concludes that just as his relation to Faering, while "full of sensuality," was asexual, Gandhi's romance with Saraladevi was "probably . . . entirely platonic." There was, however, a "large component of eroticism" and the "line of demarcation between sexual, sensuous, erotic and platonic was only of degree and not of kind."



    Kumar's phrasing is unfortunate and logically incoherent, because "degree" means a slippery slope and not a strict line between the intellectual/spiritual and the physical. In letters to Saraladevi in July, 1920, Gandhi insists that being "spiritually" married means that the "physical must be wholly absent," but he then admits that he is "too physically attached to" her for there to be a true "sacred association."



    In his conversations with Margaret Sanger, Gandhi refers to a "woman with whom I almost fell," and "the thought of my wife kept me from going to perdition." Writing to Rajkumari Amrit Kaur, a later bedmate, he admitted the he, "with one solitary exception," had never "looked upon a woman with lustful eyes." These two references must have been to Saraladevi Chowdharani.



    Madeleine Slade, who became Gandhi's beloved Mirabehn, was the daughter of a British naval officer who was once stationed in Bombay. Mirabehn first learned of Gandhi through Romain Rolland, who was then writing a Gandhi biography. She wrote to Gandhi requesting that she become a member of the Sabarmati Ashram, but he required that she live as an ascetic for one year before coming to India. More than any of his disciples, Mirabehn eagerly took to the austerities that Gandhi demanded. As opposed to Kasturba, who disliked latrine duties, Mirabehn eagerly took charge of the toilets, even those for all the delegates to a meeting of the Indian National Congress.



    At their first meeting in November, 1925, Mirabehn found Gandhi "divine," and she was able to confirm Rolland's claim that he was indeed the second Christ. They fell in love with one another and Kumar says that "Mira was Saraladevi . . . all over again." Once again, because of Gandhi's fascination for her, Mirabehn was shunned by the ashramites. Gandhi soon discovered that Mirabehn's emotional instability caused his blood pressure to rise, so he frequently sent her away on other tasks. They did, however, keep in contact with weekly self-described "love letters," and Gandhi wrote that she haunted his dreams.



    Mirabehn agreed with Gandhi's depiction that their passion was like a "bed of hot ashes," a veritable ascetic-erotic rhapsody of yogic tapas. Gandhi also shared with Mirabehn agonies about his spontaneous erections, daytime ejaculations, and wet dreams, for which he castigated himself unmercifully, and they even discussed the causes and cures of constipation.

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  39. Of the women closely associated with Gandhi, at least ten were said to have slept in his bed. They can be identified as follows:



    · Sushila Nayar was only 15 when she came to the Sabarmati Ashram and then became Gandhi's intimate companion, with some periods of alienation and remove, for the rest of his life. Gandhi claimed that Nayar was a natural brahmachari, having observed it from childhood. They bathed together and even used the same bath water, but Gandhi assured everyone that he kept his "eyes tightly shut."



    · Lilavati Asar, associated with Gandhi from 1926-1948, slept in his bed and gave him "service," which meant bathing and massaging.



    · Sharada Parnerkar slept "close" to Gandhi and rendered "service." She was very ill in October, 1940, and Gandhi gave her regular enemas.



    · Amtul Salaam, whom Gandhi called his "crazy daughter," was a Punjabi from Patiala. She was also a bedmate and masseuse. Gandhi once wrote about the joy he gave Salaam when she received a massage from him.

    · Prabhavati Narayan, a Kashmiri, lived in an unconsummated marriage with Jayaprakash Narayan, Indira Gandhi's most famous political foe. Because of her lack of sexual interest or desire, Gandhi thought that Prabhavati would be a perfect married brahmachari. In addition to sleeping with Gandhi, she also gave him "service."



    · Raj Kumari Amrit Kaur, married to a Rajasthani prince, was India’s first health minister and was a Gandhi associate for 30 years. Although older, she slept right along with the younger women in Gandhi's quarters. She also helped with baths and massages.



    · Sucheta Kriplani, a member of Parliament and professor at Benares Hindu University, was a member of Gandhi’s Peace Brigade in East Bengal in 1947. She maintained a brahmachari marriage with J. B. Kriplani, a famous socialist and saint. Gandhi fought their union tooth and nail. Although Gandhi invited Mrs. Kriplani to his bed on a regular basis, he insisted that married couples in his ashrams always sleep in different quarters.



    · Abha Gandhi was a Bengali who accompanied the Mahatma in East Bengal. She started sleeping with Gandhi when she was 16; she also bathed him and washed his clothes.



    · Kanchan Shah, also a married woman, had a "one night stand" with Gandhi and was banned from brahmacharya experiments because she reputedly wanted to have sex with him. Gandhi gave the following instructions on brahmachari marriage to Shah and her husband: "You should not touch each other. You shall not talk to each other. You shall not work together. You should not take service from each other." But Gandhi of course received "service" from his women on a daily basis. On the hypocrisy of taking what he denied to others, Kumar has this to say: "The vow of brahmacharya was a revenge he took upon everyone else."

    · Manu Gandhi was his brother’s granddaughter and she was his constant companion for the last eight years of his life. Interestingly enough, there is a temple to Manu, a powerful rain goddess, in Gandhi’s home city of Porbandar.



    Most accounts of Gandhi’s spiritual experiments focus on those with Manu in 1946-47 in East Bengal. Although he conceded at the time that it “may be a delusion and a snare,” and although he seemed to be recalling his earlier experiments at Sevagram—“I have risked perdition before now”—he was still confident that he had “launched on a sacrifice [that] consists of the full practice of truth” and the development of a “non-violence of the brave.” He said that these tests were no longer an experiment, which could be seen as optional, but a compulsory sacred duty (yajna). His hut where he slept with Manu was called "holy ground," and Manu's father had to sleep elsewhere when he visited.



    There is some confusion about whether the women simply slept next to him or shared the same cover, or whether they slept clothed or unclothed. The scenario appeared to be that they first slept next to him, then slept under the same cover without clothes. Significantly, Gandhi admitted that "all of them would strip reluctantly. . . and they did so at my prompting." As to the reason for complete nakeness, Sushila Nayar recalls Gandhi's explanation to Manu: "We both may be killed by the Muslims at any time. We must both put our purity to the ultimate test. . . and we should now both start sleeping naked."



    Gandhi described his sleeping with Manu as a “bold and original experiment,” one that required a “practiced brahmachari” such as he was, and a woman such as Manu who was free from passion. Confessing as she even might have done with her own mother, Manu told Gandhi that she had not ever experienced sexual desire. Presumably because of these ideal conditions, Gandhi predicted that the “heat would be great.” It is not clear whether Gandhi was speaking of the yogi heat of tapas, or the heat of the negative reactions that he anticipated.



    One has to admire Manu because it was she, not Gandhi, who suggested that they not sleep together any longer. It is harder to credit Gandhi, particularly when he said that the experiments ceased because of Manu’s “inexperience,” not because of any failing on his part. As Kumar states: "Just five days before Gandhiji was assassinated, he charged her with failing to realize the potential of mahayajna." So it was Manu's fault, not his.



    Controversy about the practice continued during the summer of 1947, but Gandhi was pleased when two editors of his journal Harijan, who had resigned in protest about the experiments, confessed that they had misjudged Gandhi. It is not clear that the experiments stopped because Pyarelal notes that "the practice was for the time being discontinued"; indeed, after returning to Delhi, Manu and Gandhi resumed sleeping together and "continued right till the end."



    Gandhi’s "sacred associations" actually began at his Sevagram ashram as early as 1938, when his wife Kasturba was still alive. Sushila Nayar not only slept with him there, but also gave him regular massages, sometimes in front of visitors, and they, as I have noted, bathed together. About his relations to Nayar, Gandhi states: "She has experienced everything I have in me. . . . She is more absorbed in me. Hence I would even make her sleep by my side without fear." Nayar told Ved Mehta that “long before Manu came into the picture, I used to sleep with him just as I would with my mother. . . . In the early days there was no question of calling this a brahmacharya experiment. It was just part of a nature cure. Later on, when people started asking questions about his physical contact with women, the idea of brahmacharya experiments was developed.” The fact that Gandhi changed the justification for these experiments after closer public scrutiny suggests that his motivation for these actions may not have been as pure as he wanted people to assume.



    In an extremely candid confession, Gandhi admits that at Sevagram he had made a grave mistake:



    I feel my action was impelled by vanity and jealousy. If my experiment was dangerous, I should not have undertaken it. And if it was worth trying, I should have encouraged my co-workers to undertake it on my conditions. My experiment was a violation of the establishment norms of brahmacharya. Such a right can be enjoyed only by a saint like Shukadevji who can remain pure in thought, word and deed at all times of day.



    Gandhi, however, could not maintain his resolve, because shortly thereafter (as soon as 12 hours!) intimate contact with women of the ashram resumed. According to Mark Thomson, “Gandhi explained that he could not bear the pain and anguish suffered by women devotees denied the opportunity to serve him in this fashion.” Gandhi confessed that he "could not bear the tears of Sushila and fainting away of Prabhavati." In February, 1939, there was another crisis. Gandhi admitted that four women at Sevagram did not like "giving service" and they were ordered to sleep "out of reach" of his arms.



    When Gandhi spoke of the dangers of his sexual experiments in 1938, he must have realized that he was not ready for the test. While he did claim that he “can keep [sexual desire] under control,” he admitted he had not “completely eradicated the sex feeling,” a criterion that he had honored from the traditional rules of brahmacharya. Gandhi openly admitted that there were some “black nights,” presumably sleeping with his women, in which God “saved me in spite of myself.”



    One of these dark nights must have been May 9, 1938. In a letter to Nayar's brother, Gandhi admitted that he may have had "a dirty mind" and may have played "the role of Satan." His "diseased mind" might have "aroused him" and thereby compromised Nayar, causing her "untold misery." Gandhi was obviously wrong when he claimed previously that Nayar's natural purity could "forestall any mistake I may make," and that "contact with her has brought greater purity to me." Although he took all the blame upon himself, Gandhi appears incredibly obtuse in assuming that Nayar had no reason to feel disturbed or unhappy about the psychological effects of her intimate relations with him.



    Sushila Nayar was away from the ashram for long periods for her medical education. When she finished, Gandhi begged her to return as the ashram's doctor. He was upset that she now refused to be called his daughter, and he urged her, without her preconditions, to "rush to me and become one with me." Reading the dozens of letters exchanged during this time, it is clear that Nayar was still very troubled about what happened at Sevagram. She wrote that she would return only on "conditions," which were that she would not have to give Gandhi "service." Nayar reluctantly submitted to Gandhi's indomitable will in September, 1940. While he was in Delhi, she did give him a massage, but she came to him "with great difficulty." She also sent him a letter beforehand, which he described as "hurtful." While describing himself as unhappy, he acknowledged that Nayar was suffering "deep misery."It looked as if Nayar could have succeeded in tearing herself away from Gandhi's possessive domination, just as his earlier intimates had, but she did eventually return to him and was with him and Manu in East Bengal.



    Although Gandhi declared that he, compared to other men, could take greater liberty" with women, and that no woman "has been harmed by contact with me or been prey to lustful thoughts," there is sufficient evidence to prove that Gandhi's experiments had a deleterious effect on his female intimates' mental health. There was intense competition among the women for Gandhi’s attention. For example, Lilavati Asar and Amtul Salaam were very jealous of Sushila Nayar, and Gandhi promised Asar that he would stop sleeping with Nayar because of her anger.



    Gandhi was always inclined to blame others for not understanding the unique nature of his experiments. In 1940 Gandhi admitted that the "atmosphere here [Sevagram] cannot be said to be natural for anyone," but nevertheless the conflict was caused by those who were not properly "absorbed" in it. Those who had learned "master the atmosphere" could live at Sevagram "comfortably and grow." Several visitors attested to definite signs of psychological turmoil among Gandhi's women companions. In 1947 Swami Ananda and Kedar Nath, two visitors with substantial spiritual credentials, queried Gandhi as follows: “Why do we find so much disquiet and unhappiness around you. Why are your companions emotionally unhinged?” The former Tantric Raihana Tyabji observed that the more Gandhi's young women "tried to restrain themselves and repress their sexual impulses . . . the more oversexed and sex-conscious they became."



    After learning of the experiments, Bose wrote that he would “never tempt [himself] like that; nor would my respect for a woman’s personality permit me to treat her as an instrument of an experiment undertaken only for my own sake.” He was also concerned about the women’s emotional health: “Whatever may be the value of the [experiment] on Gandhiji’s own case, it does leave mark of injury on the personality of others who are not of the same moral stature as he himself is, and for whom sharing in Gandhiji’s experiment is no spiritual necessity.”



    Bose was also concerned about Gandhi’s own emotional state, observing that Sushila Nayar’s presence brought him out of his normal “unruffled” composure. On December 17, 1946 at 3:20 AM, Bose heard two loud slaps and “deeply anguished cry” from Gandhi’s sleeping quarters. He went in to find both Nayar and Gandhi in tears. Bose had assumed that Gandhi had slapped Nayar, but she insisted that Gandhi had hit himself on the forehead twice, a physical form of Gandhi’s “self-suffering” that Manu had witnessed as well. Bose also mentions an unnamed woman “Z,” who “was not always disinterested in her relations with” with Gandhi, and who also upset him and distracted him from his political work.

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  40. किसी भी ग़लत चीज को सार्वजानिक तौर पे करने से वह ठीक नही हो जाती...उम्र किसी भी व्यक्ति की बुद्धि या उसके आचरण का पैमाना नही है....उन्होंने इसे सार्वजनिक नही किया था बल्कि विरोध के स्वर उठने के कारन ओर प्रयोग के लिए जिनका इस्तेमाल किया गया था उनकी मानसिक हालत में परिवर्तन के कारण उन्हें ये बंद करना पड़ा था हम ओर आप सामान्य मनुष्य है अवगुणों से भरे हुए...न हमारे पास कोई गौरवशाली अतीत है ओर न कोई सन्दर्भ किए जाने वाला भविष्य ...पर हां ओर आप को दूसर भी सादा हरण रूप में देखते ओर स्वीकारते है.....यहाँ प्रशन मेरा ओर आपका नही है...

    .दरअसल मैंने जिस किताब का सन्दर्भ लिया है वो दयाशंकर सागर शुक्ल द्वारा लिखित किताब "गांधी ओर ब्रहमचर्य के प्रयोग "वाणी प्रकाशन न्यू देल्ही है .सवाल गांधी के अस्तित्व ओर भारतीय स्वन्तान्त्रता में उनके अमूल्य योगदान को नकारने का नही है ....गाँधी एक ऐसे महापुरुष है जिनसे आपका लव ओर हेट का रिश्ता सारी उम्र चलता है ....आप कभी इस इंसान की इच्छा शक्ति ओर आत्म बल पर मुग्ध हो जाते हो..कभी सुभाष चन्द्र बोस ओर भगत सिंह को फांसी न दिलवाए जाने में उनके अपील मना करने के फैसले पर नाराज होते हो...दरअसल बचपन से ही हम गाँधी को एक ऐसे इंसान के रूप में देखते है ...जो एक सादाहरण मानव से एक विलक्षण व्यक्तित्व में बदल जाता है .शायद कुछ खास ही होगा उस मानव में जिसकी आवाज पर लाखो लोग कूद पड़ने को तैयार रहते थे ...एक आम घरेलु भारतीय जो स्वन्तान्त्रता के लिए बन्दूक नही उठा सकता था...अहिंसा का उसे ऐसा जादुई हथियार पकड़वाना ....
    शायद उन्ही भारतीयों की तरह उनकी भी एक देव जैसी छवि मेरे भी मन में थी ओर उन्हें सादा हरण से कही ऊँचा स्थान मैंने भी अपने मन में दिया था ..कुछ मुद्दों को छोड़कर ...ओर उनकी सबसे बड़ी शक्ति मै आत्म नियत्रण ओर आत्म बल ही मानता था ...आप जिसे बासी बता रहे है ..मुझ जैसे अल्प ज्ञानी के लिए वो आज से तीन सल् पहले तक दूर ही था....पहली बार इनके लंबे विवाद्स्पस्द लेख मैंने सहारा समय में शायद आज से ३-४ वर्ष पूर्व पढ़े थे ....तब भी मै हैरान हुआ था ....निराश भी ....क्यूंकि यहाँ वे मानव सिद्ध हुए थे ..याधिपी उन्होंने कही किसी किताब में इन प्रयोगों को ग़लत भी माना है .एक ऐसा व्यक्ति जिसके साथ लाखो लोग जुड़े है जिसको लोग महात्मा मानते है....पूरा देश उसके इशारे का इंतज़ार करता है .उस पर स्वंय एक जिम्मेदारी आ जाती है...जाहिर है मन्दिर में उपदेश देने वाला व्यक्ति जब ख़ुद उच्च चरित्र का होगा तभी उसके उपदेशो का असर होगा.....हमारे देश में एक अजीब प्रथा है की हम अंध भक्ति में बहुत सारी चीजो को इग्नोर करने लगते है....हमारे यहाँ (मेडिकल टर्म ) में इस तरह का आचरण भी किसी ख़ास श्रेणी में आता है...मुआफ कीजिये शब्दों के बेहतर जाल से बुने गए किसी भी तरह के तर्क मुझे हज़म नही होते......ओर मै इस बात से कभी सहमत नही हूँगा..गांधी भक्त यहाँ मुझे शमा करे .गूगल्स पर आप 6060 के लगभग कई संदर्भित लेख देख सकते है

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  41. पोस्ट और तमाम टिप्पणियां पढ़ ली और अब जा रहा हूं रविवार मनाने

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  42. पहली बार आपके ब्लॉग को पढ़ा, तोड़ा उचे कोटि का है. लेकिन फीर भी समझने की कोशिश की.
    धन्यवाद

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  43. गांधीजी ने एक ऐसे समय में देश को संभाला था जब देश की भोली जनता को उनकी ज़रूरत थी..उनके वचन आज भी भारत की नींव हैं और भारत ने कभी हिंसा का समर्थन नही किया.. अगर आज मैं भारत पर गर्व करती हूँ तो इसीलिए की उस महापुरुष ने इसका निर्माण किया था.. उनके प्रयोग सत्य जानने की दिशा में उनके प्रयास थे और निश्चय ही वो इसमें सफल हुए होंगे.. नग्न शरीर तो इश्वर की देन है..उतनी ही पवित्र.. उसे पवित्र आंखों से देखें तो उसकी पवित्रता पर आंच नही आती..

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  44. इतनी सार्थक टिप्पणियों के बीच मौन ही ठीक रहेगा

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  45. पोस्टिया बेहतरीन तो होनी थी, और वह है !
    डाक्टर अरविन्द के प्रश्न ज़ायज़ हो सकते हैं, सो वह भी हैं !
    पर, मैं गाँधी को यदि महात्मा ( जोकि वह नहीं थे )के टैग से अलग करके देखता हूँ, तो
    एक चालाक गुज़राती बनिये से अधिक कूछ अलग नहीं दिखते ।
    अपने व्यक्तिगत अपमान को राष्ट्र के स्वाभिमान का मुद्दा बना देना कोई हँसी-खेल नहीं, अनुराग बाबू ?
    एक ज़िद्दी व्यक्तित्व.. जो तत्कालीन ब्रिटिश मूल्यों को भुना गया । इसी देश में आज अनशन और आत्मदाह करके मरते हुये लोग किस सरकार की आत्मा झकझोरने में कामयाब हो पाते हैं ?
    सही मायनों में उनका यह तथाकथित प्रयोग, केवल और केवल उस ग्लानि पर आजीवन पश्चाताप है, जो उनको पिता की मृत्यु के समय दुछत्ती पर चढ़कर कस्तूरबा के संग संभोग करने से होती रही है ।
    बाकी, वह कितने ब्रह्मचारी थे, यह उनकी संतानों की संख्या से आप अंदाज़ सकते हो ।
    यहाँ टिप्पणीकारों के हुज़ूम में, मैं यह टिप्पणी बोल्ड में देना चाहूँगा ।

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  46. mujhe lagta hai ki har vykti ka do roop hota hai. ek jisme aap jeete hain aur dusraa wo jismee aap duniya ka jeete dikhaten hain. jab aap duniyaa wale roop men rahte hain to kafee achha lagta hai . lekin jaise hee aap apne jeene wale roop men aate hain apnaa syaah -safed sab najar aane lagtaa hai. ab yeh aankanaa jarooree hai ki hum kitnee imaandarre se apne liye jeene wale roop ko jamaane ke samne rakhaten hain. gandhi ji ke sath bhee yahee hai.

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  47. even i raed about tses episodes in the book "Freedom at midnight"

    And like you dont quite agree with this gandhian experiment..i would say...what was he trying to acchieve?fight his own biology?Fight nature...?

    and more ever Brhamachray doesnt mean..sexless life..it means Life like Bhramha..like God..thats it.And who said God are sexless?

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  48. अनुराग जी, नमस्कार
    आपने अपनी बात बड़े ही दार्शनिक अंदाज में लिखी है. एक बार में तो सिर से गुजर गई, दूसरी बार पढने पर समझ आई.


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  49. koi insaan mahaan ho to bhi wo sampoorn ho ye jaroori to nahi!
    jin prayogon ko wo sahi samajhte the unhe hama aap galat samajh sakte hain ye vyakti aur vyakti ka bhed hai
    ichchhaon, lalsaaon aur un baaton ko jine ham galat samajhte hain unse bhagwaan bhi pare nahi hai

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  50. " आपका हर लेख जिन्दगी के छोटे छोटे सुखद और कडवे दोनों ही तरह के अनुभव को शब्दों मे उतरने में सक्षम होता है.... पढ़कर ये नही लगता की हम सिर्फ़ पढ़ रहे हैं बल्कि यूँ लगता है उन पलो को जी रहे हैं....गाँधी जी के जिस वाक्य का यहाँ उल्लेख किया है वो पहले नही पढा था...मन जरुर विचलित हुआ पंक्तियों से....इतने लोगो की प्रतिक्रिया पढ़कर इस पर कुछ भी कहना मुश्किल है ...जो भी है आपके लेख और शब्दों की मै हमेशा ही प्रसंशक हूँ ..."

    Regards

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  51. भाई अनुराग जी ....एक विचारोतेजक लेख ...देर से ही सही लेकिन पढने को मिला...कुछ ही तो पोस्ट हैं जिन्हें इत्मीनान की दरकार होती हैं ....दिल की बात उन्ही मैं से एक है कुछ पोस्ट मैं कई दिनों तक दिल मैं रखती हूँ .मंथन के बाद ही जवाब देना होता है ...मेरी माँ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थी और पिता विनोबा भावे के अनुयायी ....उनका एकाधिक बार गांधी जी से मिलना हुआ था..वो बताती थी .बस इतना ही की हरिजनों के प्रति उनकी आस्था ..मुखोटों वाली थी...जैसे की वो उनसे भेंट स्वरुप छिलकों वाली खाद्य वस्तु ग्रहण करते थे ....उपवास के दिनों मैं या इतर दिनों मैं....मेरा बस कहना है की व्यक्ति दो रूपों को जीता है एक अपने लिए दूसरा आप हम के लिए,...हम तो जान ही नही पाते आस -पास ही ऐसे तत्व होते हैं ...आप फ़ोन करें या बात ..आवाज़ सुनते ही भांप जायेंगे आपकी मंशा...बहुत सी बातें एक दूसरी चीजों से जुड़ी हुई हैं ....किसी एक को भी धोखा देना सिद्धांत की आड़ मैं या आचरण की खाल के पीछे ...सब कुछ एक जाना बूझा व्यवहार होता है ...हम वातावरनमैं, समाज मैं राजनीति मैं ,,आपके-मेरे जैसे व्यक्तियों के दुखों और चिंता का स्वर पहचान सकतें है ....आमीन

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  52. हम आपके आभारी है , और आपके सुझाव , छत्तीसगढ के विकास में सहायक बने इसी आशा के साथ , हमें अपने सुझाव भेजते रहे..
    cg4bhadas.com
    http://www.cg4bhadas.blogspot.com ... अपने सुझाव भेजकर छत्तीसगढ के विकास में All Cg Citizen is Journalist ki की भूमिका का निर्वहन कर Cg Citizen Journalism में शामिल होवे.

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  53. आपके ब्लॉग पर आने पर हर बार एक नया अनुभव होता है.

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  54. आपके ब्लॉग पर आने पर हर बार एक नया अनुभव होता है.

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  57. गाँधी तर्क की कसौटी पर तो कभी आदर्श या राष्ट्रीय नायक नहीं प्रमाणित होते, उनका अपनी कमजोरियों को दूसरे पर थोपने का आग्रह( बल्कि हठ या जिद) ही तो थी कि अलग मुस्लिम देश की स्थापना का दंश झेलकर पर भी देश उनकी उदारता का दंश झेलने को बाधित हुआ। उनकी जिद ही तो थी कि भगत,राजगुरु और सुखदेव को संभव व सुगम होते हुए भी वे फाँसी-मुक्त करवाने के लिए दबाव की कोई प्रक्रिया नहीं अपनाते। वरना बात बात में अनशन, सत्याग्रह,पदयात्रा और जाने कितनी किस्मों के ऐसे मारक हथियार होते हुए भी वे कुछ नहीं करते। बस, एक तर्क का नाम लेकर - कि वे(गर्म दल वाले)हिंसा के अनुयायी हैं और मैं अहिंसावादी। अहिंसा का यह अर्थ भी उनकी निजी उपज था, जिसके प्रति वे अत्यन्त हठधर्मी रहे। राम के भक्त गाँधी यदि राम की अहिंसा की मर्यादा का लेश भी समझ जाते तो हिंसा और अहिंसा का सही अर्थ तो समझते ही, देश का इतिहास भी दूसरा होता।

    उनके अतिवाद का ही परिणाम था कि उनका अपना बेटा धर्मान्तरण का शिकार हुआ, जिसे आर्यसमाज और आर्यसमाज के पं. रामचन्द्र देहलवी(शास्त्रार्थ महारथी) ने दल- बल के साथ जाकर मुस्लिमों से शास्त्रार्थ कर, उन्हें पराजित कर (बेटे को) बचाया था व वापिस गाँधी जी को लाकर सौंपा था।

    ब्रह्मचर्य के प्रयोग भी गाँधी की उसी हठधर्मिता और अतिवाद का परिणाम थे। जहाँ वे अपने को अपनी नजर में विजयी घोषित देखने के लिए स्त्री का वस्तु की भाँति प्रयोग करते रहे।

    इस विषय में विनोबा का स्त्री के प्रति दृष्टिकोण बेहद सम्मानजनक व मातृवत् था। गाँधी के संस्कारों में वह बात थी नहीं, जिसे आप तलाश रहे हैं - स्त्री को मातृस्थान मानना। वे स्वयं कभी बा को लंबे वर्षों तक पीटते भी रहे थे।

    अभी अभी वाणी प्रकाशन से दयाशुक्ल सागर की एक पुस्तक आई है - ‘महात्मा गाँधी : ब्रह्मचर्य का प्रयोग’(२५०/-रु.), जो बहुत भयंकर रूप में गाँधी को इस विषय में कटघरे में खड़ा करती है।

    मेरी दृष्टि में गाँधी का वैशिष्ट्य उनका वह होने में नहीं है, जो वे न थे या होना चाहते थे या होने के लिए करते थे और हो नहीं पाये या पाए। गाँधी के इन या ऐसे अनेक अन्य विषयक प्रयोगों के प्रति मेरी कोई सहानुभूति, श्रद्धा या स्वीकृति भी नहीं और निजी तौर पर मैं गान्धी की विरोधी ही के रूप में स्वयं को पाती हूँ, इन अर्थों में भी और सुभाष, भगत, राजगुरु, चन्द्रशेखर,सुखदेव आदि वाले गर्म दल के प्रति अपनी निजी आस्था व श्रद्धावनतता के कारण भी।

    फिर भी, गान्धी को एकदम सिरे से नकार देने की पक्षधर भी मैं नहीं हूँ, जैसा कि दयाशंकर या और भी कई लोग करते/सकते हैं।

    कमजोरियाँ होना एक बात है,उनकी आत्मस्वीकृतियाँ और सार्वजनिकीकरण उनसे भी बड़ी। गाँधी अपनी कमजोरियों और गलतियों के जितने भागी या उत्तरदायी और बल्कि दोषी हैं, उसी के समानान्तर वे इन अर्थों में विशिष्ट भी हैं।

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  58. महात्मागांधी अपनी देश-भक्ति की मिसाल कायम करते है.... फिर भी एक मनुष्य ही है।... उनके जीवन की हर घटना अनुकरणीय या अविवादित नहीं हो सकती।... गांधी के ब्रह्मचर्य के प्रयोग'... इस किताब में लिखी बातों को आंखें मूंद कर स्वीकृति देना किसी भी बुद्धिजीवी के लिए संभव नहीं है।... आपके विचारों से मै सहमत हूं।

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  59. महात्मागांधी अपनी देश-भक्ति की मिसाल कायम करते है.... फिर भी एक मनुष्य ही है।... उनके जीवन की हर घटना अनुकरणीय या अविवादित नहीं हो सकती।... गांधी के ब्रह्मचर्य के प्रयोग'... इस किताब में लिखी बातों को आंखें मूंद कर स्वीकृति देना किसी भी बुद्धिजीवी के लिए संभव नहीं है।... आपके विचारों से मै सहमत हूं।

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  60. guru tussi chha gaye....sach mai pictures can speak....i like the way u present ur feelings??
    keep going....and hey where r u ?? no comment from ur site.....look if u wana sent bad comment i wll try to recoverd my self.....

    Jai Ho Magalmay Ho ....

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  61. Like always, in your best reflective being when you travel … :-)… somewhere I too felt the same Gandhi experiments with himself…you articulated it brilliantly …

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  62. इन सब बातों से एक बात तो जाहिर होती है, जो ख़ुद डॉक्टर साहब ने भी लिखी है, की गांधीजी के साथ love hate का रिश्ता लगा रहेगा !! बाकी सही क्या था और ग़लत क्या वो तो या गांधीजी या फिर उपरवाला जानता है!! मुझे तो बस इतना पता है की उनके दम पर जाने कितने बेक़सूर लोग हिंसा का शिकार होने से बचे। क्या ये कम है??

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  63. डॊ. अनुराग जी नें एक सार्थक बहस अनजानें में छेड दी है, जो विचारोत्तेजक भी है, और आज भी मौजूं है.

    तार्किक धरातल पर ये बात पच नहीं पाती, कि गांधीजी नें एक्सपेरिमेंटल बेसिस पर ये सभी किया जो आज भी स्वीकार्य नही है, उस युग की बात क्या बात करें.

    हालांकि गांधीजी और उनके सिद्धांत महान है इसमें शक नहीं, और हम लोग बौने है, उनका कद नापने में.इस के जवाब में कई तर्क और आये, मगर इन सवालों का जवाब मेरे पास नहीं:

    १. इन experiments की आवश्यकता?
    २. इससे हासिल क्या?क्या साबित हुआ?
    ३. उसके बिना गांधीजी क्या कम महान रह जाते?

    सबसे महत्वपूर्ण सवाल जिसपर कोई नहीं सोच रहा-

    ४. महात्माजी के experiment में नग्न युवतीयों के देह की proximity का उन पर प्रभाव और ब्रम्हचर्य पर उनकी पकड का उनके मानस पर प्रभाव, तो सबनें देख सुन लिया, मगर उन युवतीयों क्पर एक वृद्ध शरीर के पास इस अवस्था में सोने का जो अत्याचार हुआ है, गिनी पिग की Sick मानसिकता का क्या कभी परिमापन हुआ है?...

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  64. जो धुंध छंटने से तस्वीर धुंधली नज़र आए ...
    ऐसी धुंध बने रहे तो अच्छा...
    लेख और टिप्पणियां दोनों पठनीय हैं.

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  65. हालांकि पब्लिश होने के दो या अधिक दिनों के बाद इसे पढ़ रहा हूँ लेकिन टिप्पणी देने का लोभ नहीं सँवरण कर पा रहा।

    टिप्पणियों के हुजूम में जो सबसे सार्थक बात छ्नकर सामने आई वह यही थी कि गाँधी के साथ हमारी लव-हेट रिलेशनशिप जीवनपर्यंत चलती रहेगी। मेरा मानना है कि गाँधी जैसी अज़ीम शख्सियत को छोड़िये, एक आम आदमी के मूल्यांकन का भी कोई एब्साल्यूट पैमाना नहीं हो सकता। इसलिये भी क्योंकि दुनिया में कुछ भी निरपेक्ष नहीं है।

    गाँधी को तथा उनके आलोचकों को अपनी अ्ल्पबुद्धि से जितना पढ़ा, यही नहीं समझ पाया कि आखिर हमें जल्द-से-जल्द किसी नतीज़े पर पहुँचने की इतनी बेचैनी क्यों होती है? या तो हम उन्हें विष्णु का ग्या्रहवां अवतार सिद्ध करने के लिये क़त्लोग़ारत करने लगते हैं या फ़िर एकदम सड़कछाप घोषित कर देते हैं।

    मेरे विचार से किसी के व्यक्तित्व और कृतित्व का सम्यक मूल्यांकन उम्दा बात है लेकिन उसके आधार पर उसे महामानव या राक्षस की पदवी देना नितांत ग़लत। इस आधार पर गाँधी को महात्मा घोषित करना भी उतना ही अस्वीकार्य है जितना उन्हें स्वार्थी या सेक्सुअ्ल मेनि्यक कहा जाना। शायद यही जगहें हैं जहाँ मध्यमार्ग ही उचित होता है।

    रही बात मेरी पोस्ट पर आपकी टिप्पणी की, तो अब तो ठीक है ना, आपका छोरा वापस आ गया।
    और कोशिश करता हूँ कि आगे से सेंटि्मेंटल ना होऊँ।

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  66. jaane kitni baate chupa rakhi hai aapne....itna kuch yaad kaise rahta hai aapko??? :D ... kafi dino aapka likha padha...aap likhte raho ....aapka likha padh kar lagta hai ki abhi bhi achcha padhne ko mil raha hai....

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  67. अरे यार बंगलौर आए और बताया भी नहीं? ये ज़ुर्रत? माना कि अपन आजकल व्यस्त चल रहे हैं मगर इतने भी नहीं कि अपने शहर में कोई आए तो मिल भी न सकें. लगता है अगली बार तुम्हारी एंट्री बैन करवानी पड़ेगी.
    वैसे बंगलौर में एक एअरपोर्ट ही खूबसूरत है.
    गांधी की सत्य के प्रयोग पढ़ी थी. उसमें भी इन प्रयोगों के बारे में चर्चा थी मगर मैंने तब इस और ज़्यादा सोचा नहीं. तुम्हारी बात से असहमत होने का कोई कारण नज़र नहीं आता भाई.

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  68. एक बात आप सभी से कहना चाहूगी...हर इंसान में अच्‍छाई के साथ बुराई भी होती है पर जिस
    इंसान में अच्‍छाइयाँ ज्‍यादा हों उसकी बुराई को नजर अंदाज कर देना चाहिए। हममें से देवता
    तो कोई भी नहीं है ... इस बात को तो मैं भी नहीं जानती थी, हाँ ; गाँधी फिल्‍म में दो स्‍त्रियाँ
    देखी थीं उनके साथ जो उनके व्‍यक्‍तित्‍व से प्रभावित होकर रहती थीं उनके साथ ...rista kya tha kya nahi ye to bhgvan jane....

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  69. आपकी बातों ने गांधी के बारे में सोचने की एक नई द़ष्टि दी।

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  70. किसी महान विचारक का कहना है कि जब भी आपके मन में किसी के प्रति श्रद्धा हो तो कभी उसके बारे में ज्यादा जानने की कोशिश न करें ! चाहे वो माँ-बाप ही क्यों न हों !

    मानव अपने कृत्यों से ही महा-मानव बनता है ! राम,,,कृष्ण,,,,बुद्ध,,,,महावीर .......सभी मानव से महामानव बने !

    गांधी के बारे में इतने ज्यादा महान लोगों की राय पढ़कर दिल धन्य हो गया ! मै स्वयं को इस लायक नहीं समझता कि "प्यारे बापू" पर कुछ कह सकूं !
    अरविन्द मिश्रा जी की सटीक टिप्पणी ही मुझे स्वीकार्य है !

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  71. अनुराग जी देरी से आने के लिए क्षमा। बस इतना कहूंगा कि मैं आपके लेख पढ़कर और कविताएं पढ़कर बहुत कुछ सीखता हूं। धन्यवाद।

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  73. एक flight या ३०-४० मिनट में सोल्व कर ली जाने वाली पहेली नहीं हैं गाँधी. उन्होंने कभी महात्मा होने का दावा नहीं किया और आजीवन एक प्रयोगकर्ता ही रहे. अपने प्रयोगों को कभी छुपाया भी नहीं की हमें कहीं और से सन्दर्भ लेने पड़ें. लड़के और लड़कियों को एक साथ रखने के उनके विचार का बा ने ही द. अफ्रीका में विरोध किया था. उन्होंने समझाया भी था तुम्हारी सोच को समाज अभी स्वीकार नहीं कर सकता. और यदि गांधीजी में तमाम दोष ही थे तो आख़िर 'भूल क्यों नहीं जाते गाँधी को'? क्या आज व्यक्ति के रूप में ही सही किसी को राम-कृष्ण के आदर्शों पर चलने को तैयार है? किसी को रजा राम मोहन राय या विद्यासागर की याद है. तो why not 'Let's Forget Gandhi'.
    (gandhivichar.blogspot.com)

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  74. कम बात में अच्‍छा बताने का प्रयास किया है, हमने भी गांधी जी पर बहुत लिखा, पर आपका लिखा हमें भा गया।

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  75. गांधीजी जी पर कही गई खरी-खरी बात पर मैं आपसे शत-प्रतिशत सहमत हूँ.........बाकी नींद के हत्यारे शहर...या देश.........मेरे ख्याल से हम ख़ुद ही तो होते हैं........देश या शहर को क्यूँ दोष दें.......हैं ना....!!??

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  76. पक्ष भी मजबूत और विपक्ष भी चौकस और हम रहे टेनिस देखने वाले एक दर्शक। कभी दाएं देख रहे थे और कभी बांए। पर हर अच्‍छे शॉट पर तालियां जरुर बजाईं। अच्‍छे मैच के लिए शुक्रिया।

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  77. बापू एक अलग इन्सान थे..उन्होने वो सब कुछ किया जो उन्हे लगा कि उन्हे करना चहिये..हममे से कितने ऐसे है जो ऐसा सोच भी सकते है... बस एज़ ए नार्मल ह्यूमन बीइग उन्होने भी कुछ गल्तिया की है..ये भी उनमे से एक है..

    लेकिन तब भी मै समझना चाहूगा कि उनके मस्तिश्क मे ऐसा क्या चल रहा होगा..कभी कभी हमे भी लगता है कि हमे काम पर विजय पानी चाइये..लेकिन उन्होने ऐसा ही क्यू सोचा??

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  78. विशद चर्चा हुई है भाई! आपकी बात से सहमत हूँ कि गाँधीजी ने अपने प्रयोग में दूसरे पर होने वाले असर को ज़रा भी मान्यता नहीं दी।

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  79. नमस्कार !
    वैसे तो अभी हमारी उम्र आपके अनुभव से काफी छोटी है, लेकिन पता नहीं क्यूँ हमे ऐसा लगता है की वो साया आज भी हमारे आस-पास, हमारे दीमाग में पल-बढ़ रहा है जो सदियों पहले कथित सतयुग में हुआ करता था... बचपन में सिर्फ कहानियां सुनने की आदत थी, दादी से, दादा जी, और ये आज भी कभी कभी माँ-बाबुजी से पूरी हो जाती है ! जब कभी भी हम छुट्टियों में हॉस्टल से घर जाते हैं... दो पल के लिए तो फिर से बचपन लौटा हुआ सा लगता है, जब किसी को कोई परहेज नहीं था की हम किस अवस्था में है... धुल-धूशरित.. और अब ये आलम है की मशीनों के साथ हम खुद भी मशीन हो गए हैं, अब तो अंगुलियाँ सोते हुए भी कीबोर्ड तलाशती है... आँखों को सपने नहीं क्लासरूम और लेबोरेटरी दिखाई देते है... और कभी खुद को किसी अंतररास्ट्रीय सम्मलेन में रिसर्च प्रस्तुत करते हुए ! अब सब बातों में संवेदना कही खो सी गयी है, ऐसा लगता है ! अब तो ईश्वर पे भी पूरी तरह से यकीं नहीं होता, उनके लिए भी प्रयोग करने का दिल करता है... खैर... नविन शर्मा जी ने तो इतिहाश की कुछ झलकियाँ हमे दिखा ही दी है, मगर हमे ऐसा लगता है की कुछ चीजे आज भी हमारी सोच-हमारी समझ से काफी परे है ! जैसे की श्री कृष्ण जी का जीवन चरित ... अब... जैसा की नीलिमा जी ने लिखा की सो कॉल्ड बड़े ब्लोगर भी स्पष्टवादिता से बचते हुए कैसे किनारा कर गए ,कोई बर्फ की बात करता है ,कोई बादलो की,मुद्दा किसी को दिखता नही या कोई देखना नही चाहता... तो हम तो बस अभी ... हम थोड़ा कोशिश कर ही लेते है !! वैसे तो हम आपकी कलम को बहुत पहले से पढ़ रहे है मगर आपके पन्ने पे पहली बार लिख रहे है, उम्मींद है हमारी सोच भी आपको थोड़ा मजबूर तो जरुर करेगी सोच की जमीन पर...
    धन्यवाद्...

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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