2009-09-01

शोर्टकट टू हैपीनेस .!!!!!!

जिंदगी एक कंपोजिट कोलाज़  है..  ..वक़्त सदियों से   ब्रश हाथ में पकडे है   ..   एक ही  गुजरते  लम्हे  के फ्रीज शोट  में तस्वीरे जुदा जुदा है.... कही मुस्कराती ,गुनगुनाती  ...  ....कही उदास  ओर कही रुकी हुई .....ओर .दिमाग  ने अभी भी गैर जरूरी सवाल पूछने  की आदत कायम रखी  है  ..



वक़्त एक सिगरेट है जिसका एक सिरा तेजी से जलता है.......
वो  अम्मा ओर आपा  के साथ आयी है ..उसे पहली  बार देखकर ही    आप   अंदाजा   लगा  लेते   है   उसे   .जिंदगी से भरपूर मोहब्बत  है.. ..बेफिक्र .अल्हड  शोख...गोद  में बिल्ली का बच्चा थामे ...बात बात पे खिलखिलाती है . तो .उसके दांत चमकते है ...अम्मा जितना डांटती है .वो उतना ही  खिलखिलाती है .
मरी को  कित्ता कहती हूँ इस निगोड़े का भला वहां क्या काम ...अम्मा बिल्ली के बच्चे से नाराज है .जो उसकी गोद में यूँ दुबका है जिसे सब समझ रहा है ...
रास्ते भर कित्ते लोग निगाह उठा कर देखे है ...
कल गिलहरी को देखने आँगन के पेड़ पे चढ़ गयी.....बतायो जवान जहान लड़किया क्या पेड़ पे चढ़ती है डॉ साहब अम्मा ड्रेसिंग करवाते शिकायत करती है ...
तो क्या बूढी औरते पेड़ पे चढ़ती  है  ...वो आँख फैला के बोलती है फिर खुद ही हंसती है ...उसके गालो पे पड़े डिम्पल ओर गहरे हो जाते है ....
"खामखां हंसती है "अम्मा नाराज है..
 पर ये खामखां की हंसी उसे बहुत सूट करती है ....  ....
 रिज़ल्ट आये तो मेरे लिए चोकलेट लाना ...मै उससे कहता हूँ...
एक रोज धूप में बारिश भी है .... "ऐसे में चिडिया का ब्याह होता है "...वो हर बात हंस कर कहती है .उसका रिज़ल्ट आया है .फर्स्ट डिविजन ....आप रोज रोज मर्ज देखकर बोर नहीं हो जाते ....उसका सवाल है ....
"चल मरी "अम्मा धमकाती है .....
मै  तो वकील बनूगी...वो जैसे कसम उठाती है...मेरे टेबल पे चोकलेट  छोड़ गयी है.....
उस रोज उनकी तिगडी  में  अम्मा गंभीर है ..
कोई ऐसे ट्यूब लिख  दो डॉ साहब के बड़ी  के चेहरे पे थोडा  नूर आये ...चार दिन बाद लड़के वाले देखने आ रहे है ....
एक हमारे लिए भी....वो मासूमियत  से कहती है ...."तीन दिन बाद सुना है  राहुल गांधी आ रहे है "दोनों बहने खिलखिला के हंसती है ...गोद में बिल्ली का बच्चा सिकुड़ जाता है...थोडा बड़ा हो गया है ."चल मरी "अम्मा अपना पेट डाइलोग दोहराती है..जिसपे  मुझे शक है की अब वो असर नहीं करता ....  अगले कुछ रोज गुजरते है ...आज बिल्ली का बच्चा नहीं है ....अम्मा के साथ वे दोनों  है...."अल्लाह के फजल से छोटे  भाई के लिए उन्होंने तरन्नुम  को भी मांग  लिया है  ...दोनों का एक ही टाइम निकाह है ..बड़े लोग  है....दोनों बहने खुश रहेगी ...आप को भी दावत में आना पड़ेगा ...".
वो  हंसी नहीं है !
वक़्त अपने सफ्हे पलटता है....
तीन साल बाद अम्मा किसी के साथ दाखिल हुई है ....
सफ़ेद जर्द चेहरा ..आँखों के नीचे काले घेरे ..एक अजीब सी उदासी ....गोद  में एक बच्चा ...दूसरा अम्मा के साथ है...मुझे पहचानने में वक़्त लगता है...कोई बाहर जोर जोर से मोबाइल पे बात कर रहा है ...
वक़्त जैसे छलांग लगाकर उसके चेहरे पे पहले आ जमा था
कोई टेंशन ?मै पूछता हूँ...
टेंशन काहे की ....अम्मा  कहती  है ..सहूलियतों  से .भरा पूरा घर है ..जी लगाने को दो बच्चे .....तंदरुस्त शौहर   ..सगी बहन घर में .बतायो  ओर क्या चाहिए औरत को.....?
वो जिंदगी से गायब सी है .बेहिस ...जैसे खामोशी ओड ली है ...
उसके सर पे कुछ इन्फेक्शन है ....
कुछ  दिन  सर  पे  पल्ला मत रखना ....  प्रेस्क्रिप्शन लिखते लिखते मै कहता हूँ....
"ये ही मुश्किल होगा डॉ साहब ...हमारे यहाँ इसी का चलन है .."हाथ में दो मोबाइल लिए ..मुंह में  मसाला  भरे सफ़ेद कपड़ो में ...बेडोल सा एक शख्स दाखिल होता है...
अपनी पेशेवर गैर पेशेवर जिंदगी में मैंने कई चेहरों को बुझते देखा है एक चेहरा ओर  रजिस्टर में दर्ज हो गया  है…... उसके जाने   के बाद पहली  बार कमरा  एक अजीब से  खालीपन से भर गया है ...चेंज के लिए कुर्सी से उठता हूँ....बाहर धूप के साथ बारिश है ..... औरत के हिस्से क्या दुखो की कोई जीरोक्स मशीन की वसीयत खुदा ने लिख छोडी है ?

एबस्ट्रेक्ट सा कुछ .....
24x7 की अरजेन्सी  में चलने वाली दुनिया में पता नहीं क्या है जो ठहर गया है ...जब कभी गुमान होने लगता है इसे समझ गया हूँ जिंदगी अपने जादुई तहखानों से  फिर अपनी एक नयी  गली का कोई  दरवाजा खोल देती है ...इतनी गलिया है छोटी बढ़ी .ताज्जुब तो जब होता है जब बचपन से गुजरी किसी गली के मुहाने पर दोबारा पहुँचता हूँ ..कुछ चीजे साफ़ साफ़ दिखती है नए मायनों के साथ....आगे सड़क पे बैलगाडी  में जुता बैल  हांफ कर मुंह से झाग  निकलता है . ईट लादे बैल गाडी वाले के  चाबुक  को  देख कर  डर लगता पीछे  चलती  गाडी   जोर से  चीखती  है ....सटाक ....एक  चाबुक........... शहर का हर  हिस्सा कभी कभी कस्बाई रूप दिखा देता है .... "सेमी -अरबन "यही कहता है मेरा  दोस्त ... पिछले दो घंटे से वे बाप बेटे अस्पताल के गलियारे में  है ..बेटा स्ट्रेचर  पे प्लास्टर  बांधे .बाप टांगो  पे  खडा... अजीब बात है दोनों के चेहरे पे कोई गुस्सा कोई झुंझलाहट नहीं ..गरीब के अन्दर इतनी पेशेंस क्या  जीन्स में होती है ? दूसरे गलियारे में डिजायनर साडी में फ्रूट बांटती एलिट क्लास  …..परोपकार संडे की एक्स्ट्रा केरिकुलर एक्टिविटी है ,दुखो के झुंडों को तलाशकर सामूहिक  रूप से किया जाने वाला थ्रिल....
.. दुःख के कितने  रजिस्टर खुले है . अपनी अपनी भाषा लिए. पर मसौदा वही है...
दुःख से वाक  आउट करने का कोई रास्ता नहीं बना है.  न ओवर टेक करने की तरकीब…..दो पैर वाले जानवर ने दुनिया की हर शै  पे कब्जा कर लिया है ...
 

80 टिप्‍पणियां:

  1. वक़्त एक सिगरेट है जिसका एक सिरा तेजी से जलता है.
    कुछ खास बयाँ करता आपका यह बेहतरीन पोस्ट..
    Thank You डॉक्टर साहब..

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  2. बहुत ही लाजवाब बयान डॉ. साहब।

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  3. बी प्रेक्टिकल आर्य.. शायद दोस्तों से बात करने पर यही जवाब मिले..

    भाभी के घर पर उनके कोलेज की तस्वीरे देखकर दंग रह गया था.. क्या जो लड़की मेरे गहरघर में रहती है वो अलग है.. ? मैंने कभी अपनी भाभी को बिना सर ढंके नहीं देखा.. उनके सर पर हमेशा पल्लू होता है.. टेनिस का रैकेट हाथ में लिए जब मम्मी की फोटो देखता हूँ तो विश्वास नहीं होता कि ये मेरी ही मम्मी है.. शादी के बाद जब मैंने पहली बार अपनी बहन से बात की तो उसकी आवाज़ इतनी धीरे थी कि पता नहीं खुद उसे भी सुनाई दी होगी या नहीं.. इन औरतो को पता नहीं भगवान किस मिट्टी से बनाता है.. हम चाहे कितनी भी बाते कर ले.. पर सच को झुटलाझुठला नहीं सकते..

    कितने ही अरमान तो तंदरुस्त शौहर के नीचे आकर दब जाते है..

    क्या ये वही पोस्ट है जो खो गयी थी... ?

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  4. वक़्त एक सिगरेट है जिसका एक सिरा तेजी से जलता है.......
    " बहुत दिनों के बाद आपका ब्लॉग पढना हुआ .....वही बेहतरीन अंदाज और कुछ जिन्दगी के नजिरये को सहलाते शब्द..."

    regards

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  5. aap bahut aam si cheezon/ wakayon ko ek khaas nazariye se pesh karte hai... yeh nazriya kayam rakhein..zindagi mein appreciate karne wali bahut si cheezein bhi mil jaayegi !

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  6. कोई कोई दिन ही ग़मज़दा करने वाला होता है.....कल दिन भर आंसू भरे चेहरे ही सामने आते रहे! आज आकर तुम्हारा ब्लॉग खोला तो दुःख के रजिस्टर का पन्ना देख लिया! काश जिंदगी में कोई ऐसा बटन होता जिससे दुःख डिलीट किया जा सकता या कम से कम सुख को थोडी देर पॉज़ ही कर लेते!

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  7. ओर क्या चाहिए औरत को.....?gazab ki observation hai..kitni bareeki se chehro ko dekh padh lete hai aap or etne hi shandar treeke se shabdo me piro dete hai....amazing post...

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  8. दिल की बात दिल में उतरकर ही रही!

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  9. सही कहा आपने अनुराग जी दुःख से वाक आउट करने का कोई रास्ता नहीं बना है. न ओवर टेक करने की तरकीब…..
    लेकिन सवाल यही है की औरत ही क्यों ज्यादा दुःख झेले... मर्द क्यों नहीं...
    मीत

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  10. औरत के हिस्से क्या दुखो की कोई जीरोक्स मशीन की वसीयत खुदा ने लिख छोडी है ?

    हर दुःख के लिए शायद उस खुदा को हमारा पता ही याद रहता है ....

    वक़्त एक सिगरेट है जिसका एक सिरा तेजी से जलता है.......
    और धुएँ सा कहीं खो जाता है ...संभाल के रखने लायक हैं यह पंक्तियाँ ..कहने को बहुत कुछ है पर लगता है इस पोस्ट को यूँ ही चुपचाप पढ़ा जाए शुक्रिया

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  11. किसी ओट से झांकती सी ये पोस्ट ठीक वैसी ही लगी जैसी एक औरत

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  12. वक़्त एक सिगरेट है जिसका एक सिरा तेजी से जलता है.......अनुराग जी
    पसन्द आया आप यह लेख,मीत जी ने सही कहा,लेकिन सवाल यही है की औरत ही क्यों ज्यादा दुःख झेले... मर्द क्यों नहीं...

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  13. वाकई बहुत अच्छा लगा. शुभकामनाएँ.

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  14. औरत के हिस्से क्या दुखो की कोई जीरोक्स मशीन की वसीयत खुदा ने लिख छोडी है...सही कह रहे हैं आप..कुश की बात से भी सहमत हूँ...जाने किस मिटटी से बनती है लड़कियां की सब कुछ बर्दाश्त कर लेती हैं...बिना सवाल किये. कभी कभार ही मुझ जैसी लड़कियां हर चीज़ पर सवाल करने लगती हैं, उनपर भी जिनपर सवाल करने की गुंजाईश नहीं रहती ...पर yakin से कह सकती हूँ...ये समाज एक मशीन है जिसमें धीरे धीरे करके हर लड़की के वजूद का चूरा बनाया जाता है...जिससे एक सी औरतें गढ़ी जाती हैं...एक सी, बिना सवाल सब करने वाली औरतें. आज कई देखे हुए से चेहरे नज़र आये आपकी पोस्ट में.

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  15. दिमाग ने अभी भी गैर जरूरी सवाल पूछने की आदत कायम रखी है ..

    - बेहतरीन बात है, वाह!

    --- एक कविता है...
    जवाब मिले, ना मिले
    सवाल पूछते रहो..

    . वक़्त एक सिगरेट है जिसका एक सिरा तेजी से जलता है.

    ..."और हमारी जिंदगी एक ऐशट्रे है जहाँ हमें अधजला बुझा दिया गया है... वहां जमा राखों का दायरा घाना है..." यह मेरी सालों पहले लिखी एक नज़्म के टुकड़े हैं...

    कुश की बात सच के बहुत करीब है की तंदुरुस्त शोहर के नीचे... पर बीमार भी यहाँ वाजिब है...
    aतमाम ऐसे कहानियां है जो क्रूर है, भयावह भी... गर्दन घुमा कर पीछे देखने की देर है... क्या अपने परिवार में नहीं ???

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  16. ......अक्सर हमारे साथ ये होता है कि जिस्से हम भागते है उसी को जिना पड्ता है बिना मरजी के भी..कोइ ओप्शन होता ही नही...ऐसा क्यू होता है कि शादि के बाद हर धर्म मे सिर्फ़ लड्कियो को ही बद्लना पड्ता है...नाम से लेकर हर चीज तक... और अगर कोइ सोच रहा है तो उस् ने अपनी तरफ़ से कोइ शुरुआत कि क्यु नही अभी तक?

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  17. औरत के हिस्से क्या दुखो की कोई जीरोक्स मशीन की वसीयत खुदा ने लिख छोडी है ?
    सच में!

    सुंदरता, सच्चाई, रोचकता से भरी पोस्ट...

    कवि ने सच कहा है..
    आह! जीवन तेरी यही कहानी
    आँचल में है दूध आँखों में पानी...

    उत्तर देंहटाएं
  18. औरत के हिस्से क्या दुखो की कोई जीरोक्स मशीन की वसीयत खुदा ने लिख छोडी है ?
    सच में!

    सुंदरता, सच्चाई, रोचकता से भरी पोस्ट...

    कवि ने सच कहा है..
    आह! नारी जीवन तेरी यही कहानी
    आँचल में है दूध आँखों में पानी...

    उत्तर देंहटाएं
  19. डर लगता है आपकी इस पोस्ट को देखकर. इस जेरोक्स मशीन को तोड़ने का बीडा उठा रखा है कम से कम एक लड़की के लिए... ! देखते हैं वक़्त ही बतायेगा. उसका सिरा तो वैसे भी तेजी से जल ही रहा है.

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  20. शानदार!

    क्या कहूँ और? जब भी आपकी पोस्ट पढ़ता हूँ, यही बात निकलती है. शब्दों की पेंटिंग्स बना देते हैं आप. इतना विशाल दृष्टिकोण और ऐसा लेखन! और क्या कहा जा सकता है, शानदार के अलावा? ज्यादा शब्द इस्तेमाल करने जाते हैं तो समझ में नहीं आता कि क्या लिखें?

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  21. पढ़ा-डूबे-उबर नहीं पा रहे हैं.

    एक से एक जबरदस्त ऑबजर्वेशन..रुक कर सोचने को मजबूर करते!!

    परोपकार संडे की एक्स्ट्रा केरिकुलर एक्टिविटी है ,दुखो के झुंडों को तलाशकर सामूहिक रूप से किया जाने वाला थ्रिल....


    -एक और सुपर्ब पोस्ट!!

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  22. मेरी एक रचना पर आपका ये कमेन्ट मिला था
    औरत के हिस्से क्या दुखो की कोई जीरोक्स मशीन की वसीयत खुदा ने लिख छोडी है ?
    लगता है इस विषय पर आपने जरूर पी एच डी की है । आज सुबह से ही कुछ खास पढ्ने को नहीं मिला था रूखे से आलेख पढ 2 कर दिमाग सुन्न हो गया था मगर आपके ब्लोग पर आते ही भावनाओं का प्रवाह बहने लगा एक छोटी सी बात को शब्द नहीं जुबां देते हैं आप जैसे वो कहानी खुद बोल रही हो बहुत सुन्दर पोस्ट आपकी मार्मिक पोस्ट को भी पढते हुये यूँ लगता है जैसे उस कहानी का दुख आधा रह गया है लाजवाब बधाई

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  23. दो बार आई कि अब कुछ कमेंट करूँ...! और फिर चली गई...! ये पोस्ट है कि पीछा भी नही छोड़ रही और कुछ लिखने भी नही दे रही....! कितनी कहानियाँ ज़ेहन में आ गईं...!

    दुःख से वाक आउट करने का कोई रास्ता नहीं बना है. न ओवर टेक करने की तरकीब…..

    आपका ये तरीका पीछा करता है डॉ‍० साहब..! और इस कदर कि अनचाहे ही अपना तरीका बन जाता है।

    लवली वाली पोस्ट में बार बार लग रहा था कि कुछ किसी और का आ जा रहा है। जब ध्यान से देखा तो लगा कि कहीं कहीं से डॉ० अनुराग झाँक ले रहे हैं। लगा कि कहीं कोई कॉपी करने का इल्ज़ाम न लगा दे। मगर करे क्या आप का लिखा ज़ेहन पे छाता है और वज़ूद में उतर जाता है।

    कुछ नही कहूँगी तरन्नुम के बारे में....!

    मेरी छोटी दीदी जैसे लगता है कि मैं ही थी. बल्कि मुझसे ज्यादा बागी तेवरों की। रेडियो से सुबह से शाम तक चिपकी रहना। रिक्शे वाले को किसी ने मार दिया तो फूट कर रोती जाना। कविताएं कहानियों को जीना, कविताए लिखना, गजले सुनना दहेज का विरोध, शोषण का विरोध, अत्याचार का विरोध, दुनिया की बेकार की बातो से परहेज, अपनी एक अलग दुनिया।

    और शादी के बाद..अगर मैने संभाल के न रखी होती तो कविताओं की डायरी भी पुरानी चिट्ठियों के साथ गला दी गई होती। कविता का एक लब्ज़ नही लिखा गया ८९ से। कभी जिद कर के अगर एक कहानी दे भी आऊँ तो पूरी नही हुई।

    अब बागी मैं होती हूँ। "तुम्हे बस चुप हो जाना है। कभी अपनी भी सोचा करो।" वो मेरी भी बातो पर वैसे ही चुप रहती हैं, जैसे सबकी। वो बीवी, माँ, बहू, भाभी और दीदी बन के रह गई है।

    नही कोई तनाव उन्हे भी नही है खुदा का दिया सब कुछ है उनके पास और वही सब कुछ संभाल रही हैं जाने कब से....!

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  24. सचमुच चारो तरफ दुखो के रजिस्टर खुल रखे है.
    दो पैर वाले ने सभी शै पर कब्जा कर लिया है पर दुःख से कहाँ किसको निजात है. हम क्यूँ और दुःख तलाशे हमारे पास औरत जैसी निरंतर दुःख सहने की शक्ति नहीं है... (सब कुछ आपने कह दिया)

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  25. आपकी पोस्ट पढ़ी और आँखों के आगे बहुत से चेहरे तैरने लगे.....

    इस सवाल को मैं भी आजतक हल नहीं कर पायी हूँ कि एक लाल रंग (सुहाग का ) माथे पर लगते ही जिन्दगी से बाकी सारे रंग क्यों रुखसत हो जाया करते हैं....

    लाजवाब तो आप लिखते ही हैं,इसलिए अब क्या बार बार प्रशंशा के वाक्य दुहराऊं...बस दुआ करती हूँ कि आपकी लेखनी प्रखर से प्रखरतम होती जाए...

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  26. आप का दिल हमेशा दिमाग पर हावी रहता है यही कारण है कि आप का लिखा दिमाग में जाने के स्थान पर सीधा दिल में पहुँचता है।

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  27. हमेशा की तरह असरकारी. कहन का ढंग ही आपका ऐसा है कि शब्द चित्रों में बदलते चले जाते हैं. रोचक पोस्ट.

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  28. आप की पोस्टे एक तूफ़ान लिए होती हैं -फिल्मी नगरी में गए होते तब भी रोजी रोटी चौडे से चल जाती !

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  29. मैं भी कुछ कहूँ क्या ?
    यह एक शानदार और अचँभित कर देने वाली प्रस्तुति है, पर..
    ररर, क्या यह पूरा कैनवास दिखला सकता है ?
    देखने वाले की दृष्टि-लेन्स कितनी पैन और ज़ूम-इन कर पाती है,
    यह तो उसके कैमरा ट्राली के कोण पर निर्भर है !

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  30. आपके लिखे पर कुछ लिखना लिखने के खिलाफ है

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  31. wo jo xwrox machine hai na, dukhonwali,khuda ne har aura ke hise mein di hai,chahe padhilikhi ho ya anpadh.aur wo jo waqt ki ciggarate ka sira jal raha hai,uski aag kahi dil ka ek kona jala gayi.
    bas har alfaz mein behte chale gaye,wahi andaaz jo kuch sochne par majboor karta hai,magar kehne kuch nahi deta,insaan ko ek jatkahazaron volt ka lagat hai.behtarin post.sach aapke likhe pe ippani karna bhi bahut mushkil hai doc saab.jhanjhodke reh jata hai dimaag.

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  32. लगा सब कुछ आँखों के आगे साक्षात हो गया हो ..दुखद पर सच..और कुश की टिप्पणी भी बहुत सटीक है.

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  33. सबसे पहले मेरी भी वही कशमकश थी जो कंचन दी की रही कई बार पोस्ट में डूबती उतरती रही उनका कमेन्ट देखा तो हौसला हुआ कुछ लिखूं .आपको तबसे पढ़ती आ रही हूँ जब आप सिर्फ त्रिवेणी लिखते थे ऑरकुट पे .एक बार वहां भी किसी ने कहा था आपको गरीबी से मोहब्बत है शायद ,बीस पचीस साल के लड़के लड़कियों में आप की त्रिवेणी अपना टेस्ट अलग लिए रहती थी .फिर आपने एक पोस्ट लिखी "रेड लाईट एरिया के तजुर्बे "दिमाग हिल गया ओर कई दिनों तक वो बंगलादेशी लड़की दिमाग में टिकी रही ,इससे पहले इस तरह की लड़कियों से नफरत थी आपकी पोस्ट ने एक नया नजरिया दिया .
    उसके बाद दूसरी पोस्ट थी जिसमे बस में एक स्मार्ट लड़की को कोई छेड़ता है ओर विरोध उसके पास बैठी गाँव वाली करती है यानी पहनावे से ज्यादा साहस जरुरी है ,गलत बात का विरोध जरुरी है

    मै हरियाणा में रहती हूँ जहाँ पंचायत के फरमान रोज निकलते है ,सड़क पे रोज फिकरे मिलते है ,लड़कियों से शादी उनकी मर्जी पूछ करतय नहीं होती बल्कि लड़के वालो का हाँ का इंतज़ार रहता है .ओर बहू का फर्ज सब जिम्मेदारी को आँख मीच के निभाना क्यूंकि नेक औरतो का चलन यही है ,कब वे बूढी हो जाती है .हिन्दुतान में मैंने कितनी बेमेल शादी अपनी रिश्तेदारी में देखी है खूबसूरत लड़कियों को धीरे धीरे कटते खपते देखा है .आज आपकी पोस्ट ने जैसे दिल पे नश्तर मारा है
    फिर भी पोस्ट की खूबसूरती बरकरार है जैसे
    1.जिंदगी एक कंपोजिट कोलाज़ है.. ..वक़्त सदियों से ब्रश हाथ में पकडे है .. एक ही गुजरते लम्हे के फ्रीज शोट में तस्वीरे जुदा जुदा है...
    2.औरत के हिस्से क्या दुखो की कोई जीरोक्स मशीन की वसीयत खुदा ने लिख छोडी है ?
    3.24x7 की अरजेन्सी में चलने वाली दुनिया

    4.गरीब के अन्दर इतनी पेशेंस क्या जीन्स में होती है ?
    5.परोपकार संडे की एक्स्ट्रा केरिकुलर एक्टिविटी है ,दुखो के झुंडों को तलाशकर सामूहिक रूप से किया जाने वाला थ्रिल....
    6... दुःख के कितने रजिस्टर खुले है . अपनी अपनी भाषा लिए. पर मसौदा वही है...
    7.दुःख से वाक आउट करने का कोई रास्ता नहीं बना है. न ओवर टेक करने की तरकीब…..


    ओर हाँ राहुल गांधी की फेन मै भी हूँ

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  34. कुछ महिलाओं को अपनी मांग में सिंदूर लगाने से भी सिर दर्द होता है अनुराग जी, लेकिन उन महिलाओं की जिंदादिली ( या मजबूरी) कहिये कि ताउम्र सिंदूर लगाती ही रहती हैं..... जिंदगी का एक कोलाज यह भी है।

    अच्छी पोस्ट।

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  35. वक़्त एक सिगरेट है जिसका एक सिरा तेजी से जलता है.......

    very nice doctor sahab

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  36. बहुत दिनों के बाद आपका ब्लॉग पढना हुआ ....
    ..दुखद पर सच.... वक़्त एक सिगरेट है जिसका एक सिरा तेजी से जलता है..... सचमुच चारो तरफ दुखो के रजिस्टर खुल रखे है.

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  37. "औरत के हिस्से क्या दुखो की कोई जीरोक्स मशीन की वसीयत खुदा ने लिख छोडी है ?"

    कितना अच्छी पोस्ट! दिल छू लेने वाली प्रस्तुति.

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  38. अच्छी बेहतरीन पोस्ट!
    औरत के हिस्से क्या दुखो की कोई जीरोक्स मशीन की वसीयत खुदा ने लिख छोडी है ?

    अपने आसपास बहुत सी ऐसी औरतें भी हम देखते हैं जो खुदा की दुखों वाली जीराक्स मशीन को पटरा कर देती हैं! उनको भी कभी-कभी देखने का मन बनाया जाये मालिक!

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  39. बढ़िया पोस्ट .... वैसे आपको यह मालुम है |
    नया क्या लिखू समझ के परे है |
    एक लड़की कब और कैसे औरत बन गई शायद उसको भी पता न चला !?
    पहेली बार पढ़ा है आपके ब्लॉग को, आने वाली पोस्टो का इंतज़ार रहेगा |

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  40. वो गैर जरूरी सवाल ही सबसे जरूरी हैं..जिन्हे कोई पूछना जरूरी नही समझता..आपकी जबर्दस्त पोस्ट पढ़ कर दिमाग मे इतने ख्याल जल उठे कि सारे शब्द ही धुआँ हो गये..सो speechless..
    हाँ वक्त अगर सिगरेट सा जलता तो हमॆ पता होता कि कौन सा कश आखिरी है! :-)
    अगली पोस्ट की प्रतीक्षा मे
    अपूर्व

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  41. -कहते हैं ईश्वर दुःख भी उसी को देता है जिस में सहने की शक्ति होती है.
    कुछ देखा कुछ अनदेखा कहीं छुआ कहीं अनछुआ सा कोई दर्द तो हर सीने में पलता रहता है.

    -उस स्त्री की मजबूरी तो थी ही..शायद उस पुरुष की भी ...जो अपने समाज के ,रीती रिवाज़ के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा हो..वह चाहता भी अगर होगा ki उसकी बीवी को आराम मिले ,वह कुछ दिन पल्ला न करे..मगर फिर वही..समाज दुनियादारी..के चलते वह ऐसा नहीं कह payega..
    और अगर कह भी दिया तो खुद बीवी ही पति और घर के नियम या रीतियों को तोड़ना नहीं चाहेगी..यह सच है.

    २-हाँ ,जिसे आप थ्रिल कह रहे हैं वह भी अच्छा ओब्सेर्वेशन है...
    लेकिन इसी बहाने कम से कम वे महिला ताश -किटी पार्टी छोड़ कर गरीबों के बीच में तो आयीं..और कुछ दे कर ही गयीं.
    ३-गरीबी का azaadi ke ' ६२ साल में bhi बड़े बड़े दिग्गज कोई इलाज नहीं ढूढ़ पाए..
    Shayad..सिर्फ कम्युनिस्ट राज?? ही इस विभाजन रेखा को छोटी कर सकता है..जैसा कुछ देशों में देखा गया है.

    बाकि तो भगवान् मालिक है ही सबका!

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  42. बड़ी सूनी सूनी है ...ये रातें, ये धड़कन और ..ये .खामोशियाँ
    काश ! वो लडकी सदा खिलखिलाते रहती ...तो, कितना अच्छा होता !
    आपका लिखा , हमेशा की तरह , बहुत गहरा से निकला , दिल को छूनेवाला ..सा
    मुकद्दरें , हमारे बस एम नहीं हैं ...उसीका रंज है ...
    स्नेह सहित,
    - लावण्या

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  43. अक्सर ही पढते हैं आपका ब्लाग। कई बार सोंचा आपको बताने का कि आप शब्दों के मंजे हुये कलाकार हैं। एक अलग सी दुनिया में पहुंच जाते हैं आपको पढकर। आज की आपकी पोस्ट भी बहुत अच्छी लगी।
    लेकिन ये सोंचकर अच्छा लगा कि हमारे हिस्से में भगवान ने कोई दु:खों की ज़ीराक्स करने वाली मशीन नहीं लिखी। वैसे तो सुख दु:ख सभी के जीवन में लिखे होते हैं पर ऎसा हमारे साथ नहीं हुआ कि सिंदूर की एक छोटी सी बिंदी और किसी के जन्म भर के साथ ने हमें बुझा दिया हो या दुख की पोटली साथ बंध गयी हो। बल्कि जहां तक हमें याद है हम पहले दबे दबे से रहते थे और अब पंखो को नई उडान मिल गई है। हंसी अब पहले से कहीं ज्यादा चहकती है, आंसू भी पहले की तरह ही गालों पर ढलके रहते हैं, पर अब उन्हें मोती बनाने वाली सीप उन हाथों की हथेली हमेशा साथ होती है।
    जैसी ज़िन्दगी आपने लिखी है शायद ज्यादातर लडकियों की नीयति वही होती है, जिसे हमने भी देखा है, पर कुछ लोग तो जरूर हमारे जैसे होंगे जिनकी ज़िन्दगी संवर भी गयी होगी।

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  44. बहुत सुन्दर पोस्ट लिखी आपने ....हर शब्द अपना जादू छोड़ता हुआ जाता है ..ख़ास तौर से ये पंक्तियाँ .....दुःख से वाक आउट करने का कोई रास्ता नहीं बना है. न ओवर टेक करने की तरकीब…..दो पैर वाले जानवर ने दुनिया की हर शै पे कब्जा कर लिया है ...

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  45. अनुराग जी प्रणाम ....फिर से जादू भरी पोस्ट ...औरतें जिस मिटटी से बनी होती हें खुदा के पास वो अलग से होती हें ...इस लिए तो मरना जीना संग-संग लगा होता है उनके.....साथ ,आपकी पोस्ट कई सवाल खडे करती है ...औरत के बुनियादी अधिकार की बिगड़ी सूरत पर सोचने पर मजबूर भी ...जी बस कायल हूँ आपकी लेखनी की ....कल ही पढ़ ली थी लेकिन तकनिकी कारणों से पोस्ट नहीं हो पाई थी

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  46. hamesha ki tarah ek behratin blog.. mai na jane kitni choti choti batton ko bahut bada dukh samjhe baitha rehta hu pareshan rehta hu unhi mein lekin aapka blog padke lagata ki duniya mein bahut gum hai bahut bade bade...

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  47. निखर गए हो डॉक्टर साहब! :)

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  48. दुःख से वाक आउट करने का कोई रास्ता नहीं बना है. न ओवर टेक करने की तरकीब…..दो पैर वाले जानवर ने दुनिया की हर शै पे कब्जा कर लिया है.

    आपके मन की पीडा का एहसास हमें भी हो रहा है.

    वैसे, आप हमारे पोस्ट पर नहीं आये, आपके लिये आपकी फ़रमाईश का गीत डाला है, कई बार यूंहि देखा है.

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  49. दिल को छू जाने वाली पोस्ट है, डॉ अनुराग. कल खुर्जा-बुलंदशहर के पास एक कसबे जेवर में जाना हुआ जहाँ एक दोस्त गायनेकोलोगिस्ट है. हैरानि होती रही दिन भर ओपीडी में बैठे हुए. उम्र 20 साल, नौ महीने का गर्भ, मल्टी ग्राविडा, एचबी सिर्फ 5 ग्राम और इंशाअल्लाह रोजे रखे हुए हैं. डाक्टर कहती है रोजा नहीं रखो, मर जाओगी. साथ आयी सास कहती है-यों न होने का डाक्टर साहिब. साल भहर में एक दफा तो रामदान का महीना आवे है. सालभर खाना ही होवे फिर.
    सही है, दुखों के जेरोक्स मशीन कि वसीयत औरतों के नाम न सही, लेकिन उस वसीयत की एक-एक फोटोकॉपी हरेक औरत के पास है.

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  50. आसान लफजों में बडी बडी और ह़दय स्पर्शी बातें कहना कोई आपसे सीखे।
    ( Treasurer-S. T. )

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  51. कुछ किरदारों का ये मानना रहा है कि ये जिदंग़ी अपनी नही दूसरों की भी होती है। और वे इसी को मानते हुई पूरी जिदंग़ी जी जाते है। और उनकी इच्छाएं और अरमान यूँ ही वक्त के नीचे दबते चले जाते है। आप ही के शब्दों में " औरत के हिस्से क्या दुखो की कोई जीरोक्स मशीन की वसीयत खुदा ने लिख छोडी है ?"

    सच पूछिए तो आपकी पोस्ट पढकर जुबान कुछ कह नही पाती।

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  52. साले अभी भी सेंटीयाना नहीं छोडे..हमारे एक पुराने दोस्त हमसे जब भी मिलते है कहते है ..कैसे कहूँ ..ये तो कोई जींस में ही डिफेक्ट घुस गया है ...कोशिश कर रहा हूँ की अगली पीढी में ये डिफेक्ट न जाये ....पिछले कुछ दिन एक अस्पताल के ज्यादा चक्कर लगे इस बार बतोर पेशेंट ...पिता का ओपरेशन हुआ ..उसी अस्पताल की ओ टी के बाहर दो घंटे से खड़े बाप बेटे को देखा ..तो इसमें अजीब क्या था .गरीब के लिए सब नोर्मल है ...दोस्त ओर्थोपेडिक था ओ टी से बाहर आया मैंने कहा वो बाप बेटे तेरे पेशेंट है .....उसने भी यही डाइलोग चेप दिया ....
    कुछ महीनो पहले दस साल बाद अपनी पुरानी दो दोस्तों से मिला .जबरदस्त ट्रांस्फोर्मेशन था ...शर्मीली ....अपने प्रेम के लिए परिवार के विरूद्व न जाने वाली ...कुछ छोटे मोटे अधिकारों को न मांगने वाली रिश्तो ,दोस्तों ,ओर चीजों को मेनेज करना सीख गयी थी.....देश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से अपनी दो बेटियों को लेकर बिंदास सफ़र करती थी ....उसका ट्रांस्फोर्मेशन खुशनुमा था .ओर हमेशा जींस कुरता पहनने वाली .कभी कभी हमारी सिगरेट का एक कश लेकर मांगने वाली .न लिबास को लेकर जोश में थी .न किसी ओर चीज को लेकर ..अलबत्ता उसने लव मेरिज की थी ...कौन से फलसफे में रखे जिंदगी को.... रोज मुई स्क्रिप्ट चेंज करती है ....ओर स्क्रिप्ट राइटर कभी नजर नहीं आते ...
    मुझे पढने वाली राखी मेरी पिछली पोस्ट को देख मेल करके कहती है .बस डॉ साहब ओर गम नहीं .अगली बार कुछ खुशनुमा लिखिए ....सोचता हूँ ...ऐसा ही करूँगा ....एक दोपहर सारा मामला बिगड़ देती है ....
    एक मजदूर सा आदमी बदबू से भरा शरीर लिए क्लिनिक में दाखिल होता है ..उसे यौन रोग भी ओर स्किन इन्फेक्शन भी ... साथ में बीवी है...एक चार महीने का बच्चा गोद में लिए .दूसरा हाथ पकडे ...बतलाती है .नहाता नहीं ..पीता है ..दूसरी औरतो के पास जाता है....कई दिनों से रोग है.....पास आने को मन करती हूँ तो भी मानता नहीं ..पीटता है...मुझे भी रोग हो गया है....आप कहिये के नहा ले...वो उसे वही धमकाता है... .नज़्म लिखने की इच्छा वही मर जाती है....

    हम भी कभी सोचते थे साले हिंदी कवि फालतू में भावुक होकर लिखते थे .वो तोड़ती पत्थर.....
    @कंचन ..भी खामखाँ सेंटी हो जाती है...पोस्ट पढ़कर उसे दिल पे लगा लेती है .कम्पूटर स्विच ऑफ़ करके ..या मायूस घुमा कर अगली कविता क्यों नहीं पढ़ती ? दुःख पाएगी आगे अगर यही लक्षण रहे सेंटियाने के ....
    लोग लम्बी चौडी कहानिया बयाँ नहीं करते कम शब्दों में बड़ी बात कह जाते है....मसलन @रंजना जी .कहती है
    "इस सवाल को मैं भी आजतक हल नहीं कर पायी हूँ कि एक लाल रंग (सुहाग का ) माथे पर लगते ही जिन्दगी से बाकी सारे रंग क्यों रुखसत हो जाया करते हैं...".


    ओर @डॉ. रवि शर्मा अपनी टिपण्णी में मेरी इस पोस्ट से भी बड़ी बात कह गए है ....

    हैरानि होती रही दिन भर ओपीडी में बैठे हुए. उम्र 20 साल, नौ महीने का गर्भ, मल्टी ग्राविडा, एचबी सिर्फ 5 ग्राम और इंशाअल्लाह रोजे रखे हुए हैं. डाक्टर कहती है रोजा नहीं रखो, मर जाओगी. साथ आयी सास कहती है-यों न होने का डाक्टर साहिब. साल भहर में एक दफा तो रामदान का महीना आवे है. सालभर खाना ही होवे फिर.



    ऐसे दुःख दिखते नहीं .....ओर कई लोग तो इन्हें दुःख की टेबल में रखते नहीं ....

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  53. वक्त मिलता नहीं आजकल....और आता हूँ देर से आपकी पोस्ट पे तो एक पन्ने में पूरी कायनात सिमटी नजर आती। पोस्ट तो पोस्ट, तमाम टिप्पणियाँ भी...

    आपके पोस्ट पे देर से आना सार्थक रहता है...हमेशा, हर बार!!!

    अक्टूबर का बेसब्री से इंतजार है।

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  54. बहूत अच्छी रचना. कृपया मेरे ब्लॉग पर पधारे

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  55. औरत के हिस्से क्या दुखो की कोई जीरोक्स मशीन की वसीयत खुदा ने लिख छोडी है ?
    इतनी बड़ी बात कह दी है ...क्या सचमुच आप औरत के दुःख को समझ पाए हैं ....औरत के दुःख को कोई बाहर से देख सकता है पर समझना बहुत ही मुश्किल है ....फिर भी एक बात आपने सही कही ...दुःख के कितने रजिस्टर खुले है . अपनी अपनी भाषा लिए. पर मसौदा वही है...दुःख से वाक आउट करने का कोई रास्ता नहीं बना है. न ओवर टेक करने की तरकीब...
    जब तक जिन्दगी है ये दुःख भी रहेंगे और इनसे भागने का कोई रास्ता नहीं है ...
    एक खूबसूरत मेसेज मिला था ....जिन्दगी सिगरेट के धुएँ की तरह होती है ...एन्जॉय करो ...वरना जल तो रही है ...ख़त्म भी हो ही जायेगी ....
    कुश ने जो हकीकत बयां की है ..उससे एकदम सहमत हूँ ....और कुश जी , भगवान् ने जब औरत को बनाया था तो उसकी मिटटी में बहुत सारे एयर गैप छोड़ दिए थे जिसमे वह अपने सारे दुखों , तकलीफों को एब्सोर्ब करती जाती है ...उसका ज्वालामुखी तो तभी फटता है जब ये सारे एयर गैप भर जाते हैं ...कुल मिला कर अच्छी पोस्ट थी ...दिल की दुखती रगों को छेड़ जाती हैं आपकी पोस्ट ...भावुक हो कर इतना कह गयी ...बुरा न मानियेगा ...

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  56. परोपकार संडे की एक्स्ट्रा केरिकुलर एक्टिविटी है ,दुखो के झुंडों को तलाशकर सामूहिक रूप से किया जाने वाला थ्रिल....
    .. दुःख के कितने रजिस्टर खुले है . अपनी अपनी भाषा लिए. पर मसौदा वही है...
    दुःख से वाक आउट करने का कोई रास्ता नहीं बना है. न ओवर टेक करने की तरकीब…..दो पैर वाले जानवर ने दुनिया की हर शै पे कब्जा कर लिया है ...
    ye apki bahut achhi post rahi hai...

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  57. वक़्त एक सिगरेट है जिसका एक सिरा तेजी से जलता है.......

    औरत के हिस्से क्या दुखो की कोई जीरोक्स मशीन की वसीयत खुदा ने लिख छोडी है ?
    गरीब के अन्दर इतनी पेशेंस क्या जीन्स में होती है
    ..परोपकार संडे की एक्स्ट्रा केरिकुलर एक्टिविटी है ,दुखो के झुंडों को तलाशकर सामूहिक रूप से किया जाने वाला थ्रिल....
    दुःख के कितने रजिस्टर खुले है. अपनी अपनी भाषा लिए. पर मसौदा वही है

    डियर डॉक्टर, इतना मर्मस्पर्शी चित्रण किया है प्रशंसा के लिए शब्द नहीं हैं. तुम केवल स्किन के डॉक्टर नही हो, बल्कि दिल ओ दिमाग तक प्रभाव छोड़ते हो. बधाई हो, दिल से.
    अनुपम गोयल.

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  58. k ..kash wah ladki hamesha khilkhilati rahatee.
    दुःख से वाक आउट करने का कोई रास्ता नहीं बना है. ise to kat kar hee katm kiya ja sakata hai.

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  59. डॉ इस बार फिर से मरीज बना दिया आपने। शायद ये पहली पोस्ट होगी आपकी जिसके की सब कमेंटस भी पढ़ लिए। ऊपर जाकर देखता हूं तो 63वां मेरा है यानी 62 पढ़े। पर वहीं आपने कुश का जवाब नहीं दिया। बहुत ही गजब लिखा है आपने। शायद कई बार पढ़ने लौटूं।

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  60. HAD HO JAATI HAI KABHI KABHI MAGAR YE HAD KE MAIN IS TARAF HUN YA USTARAF... BAS YAHI EK LAKIR HAI JISKA PATA AAPKE LEKHAN SE CHALTA HAI... AJIB SI KASHMAKASH ME PAD JATA HUN... AGAR KARWAT LETA HUN TO HAD SE KOSO DUR CHALAA JATA HUN AUR DUSARI LENE CHALUN TO HAD HI PAAR HO JAATI HAI... ISKA KOI IAALJ HAI DAKTAR SAHIB AAPKE PAS... AAPKE LEKHAN KO PARASPAR LEKHAR SOCHNAA JARA... SALAAM


    ARSH

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  61. परोपकार संडे की एक्स्ट्रा केरिकुलर एक्टिविटी है ,दुखो के झुंडों को तलाशकर सामूहिक रूप से किया जाने वाला थ्रिल.... सच है
    इस बहाने अपने से अधिक दुखी की तलाश, रिलेटिविटी के जरिये ही जब सब निर्धारित होता है तो क्यों ना ये भी सही कहा जाये. दिलफरेब मंज़र है दिलफरेब निगाहें...

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  62. कभी पढा था कि "औरत की आधी क्वालिटीज़ अगर आदमी मे आ जाय तो वो महात्मा बन जाता है।"

    एक बार की बात है, अपनी एक दोस्त और उसके fiancé के साथ डिनर पर गया था... काफ़ी बाते की, काफ़ी हसा...और मैड्म उसे बोलती है कि मै बोर हो गया। अगले दिन आफ़िस मे पूछ्ती भी है.. मै सोचता हू तो अहसास होता है कि हा मै सच मे खुश नही था और वहा होने के बावजूद भी वहा नही था...

    BTW आपके बारे मे काफ़ी कुछ यहा से पता चला और यकीन मानिये तस्वीर और निखर गयी....
    http://coffeewithkush.blogspot.com/2008/06/blog-post_13.html

    आपका ’अ’ भी बन पाया तो अपने आप को खुशनसीब समझूगा.... :)

    Hats Off..

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  63. अरे सर जी आप क्या और कहाँ से लिखते हो यार ,मन ,दिमाग दोनों हिल जाते हैं ,वह डॉक्टर साहिब मन गए ,यह कहना गलत ही साबित कर दिया, की रेत को पेरने से तेल नही निकलता ,साधुवाद, कीप इट अप् ॥

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  64. वैसे तो औरतों की दुर्दशा बचपन से ही देखते पढ़ते आ रहे हैं, लेकिन आपकी पोस्ट और उन पर आई टिप्पणियों को पढ़ कर तो लगने लगा कि वास्तव में किसी को भी 'किसी जनम में बिटिया न कीजे'. लेकिन सारिका सक्सेना की टिपण्णी ने हिम्मत बंधाई है और मेरा मानना है कि औरतों की स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन आ रहा है.

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  65. sir ji...main khud ko itna kabil nahin samajta ki is lekh par koi aur tippani doon...bas haan ek pathak ke roop se itna keh sakta hoon ki...dil chhoo liya aap ne...

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  66. bilkul sahi kaha sir.. hamesha ki tarah is baar bhi kuch kehne ki halat mein nhi hoon ..

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  67. उम्दा पोस्ट... ज़िन्दगी की कुछ कसमसाहट भरी, फिर भी दिलचस्प बातों को कहने का आपका अन्दाज़-ए-बयाँ निराला है। यूँ ही लिखते रहें।

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  68. दुःख से वाक आउट करने का कोई रास्ता नहीं बना है.
    न ओवर टेक करने की तरकीब….

    ह़दय स्पर्शी पोस्ट



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  69. Anuragji........ aaj pehli baar aapke blog pe aana hua...... jab aaya to padhna bhi zaroori tha........ aur sahi bata raha hoon..... padhte padhte mai kho sa gaya....... itni tanmayta se main dooba hua tha aapki ki kahani mein...... ki chai bhi thandi ho gayi....... is kahani ka solid pehloo yeh hai ki iske characters mein poora doob ke likha gaya hai..... aapne jo keen observation kiya hai apne aas-paas ke cheezon ka.... asli kamaal usi observation ka hai.... ek writer safal writer wahi ho sakta hai jo apne aas-paas ki happenings mein khud ko dhaal ke dekhe..... tabhi characters mein jaan aa paati hai....

    aur aapne isko bakhoobi nibhaya hai......

    mujhe achcha laga aapke blog par aa kar....


    ThanX!

    Mahfooz Ali.......

    www.lekhnee.blogspot.com

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  70. Bas fir khamosh kar diya aapne .....bohot se lafz jinda ho aaye hain ....ek aisi hi masoom si pyari si zahin thi ...billiyon se behad lgav....ek aawaz pr doudi chali aati ...apne hisse ka dudh bhi use pila deti ....ek bar us billi ne char bache diye ...behad pyare ....kuch bade hue to maa ke mna karne ke bavjud shrarton se baz nahin aate ....aise mein hi ek baccha achanak ek car ke chkke ka shikar ban gya ....maan ke karun kandran ke sath sath wo bhi hjaar hjaar aansu roti ........vivah hua to ek din wo -n jane kahaan se billi ka bacha utha lai ....par dusare din kai aankhon ka moun virodh aur fir ek din uski lash...uski zehni hamoshi ka ek hissa ban gayi .....

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  71. रास्ता ज़रूर है लेकिन खुद समझे बिना हम बच्चों को कैसे सिखा पायेंगे? किसी ने ठीक ही कहा है, "common sense is very uncommon these days."

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  72. कितनी बड़ी विडम्बना है, समग्र रूप में आदमी इस धरती का स्वामी है, सारे संसाधन उसके कब्जे में है पर अगर उसे इकाइयों में विखण्डित कर देखें तो कईयों के हिस्से अपार बेबसी, मायूसी और दुःख आये नज़र आते है.
    आपकी हर पंक्ति बहुत सारी अदृश्य हाइपर लिंक्स के ज़रिये कई अर्थों तक ले जाती है.

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  73. बेहतरीन पोस्ट ...वैसे समय करवट ले रहा है डॉक्टर साहब ...शायद अब लड़कियों को उतना सब नहीं सहना पड़े ...आमीन बोलिए ..मेरी अपनी दो बिटिया है ...समय नहीं बदला तो मैंने नहीं भेजना है उल्लू के पठ्ठे के साथ ....

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  74. बहुत दिनों बाद बहुत देर से आपका ब्लॉग पढ़ रही हूँ, पर इस पोस्ट ने रोक लिया. शुक्र है आंसू ही नहीं आये. शायद भगवान् ने सभी औरतों की तकदीरें एक ही जेरोक्स मशीन से छापी हैं .
    तंदरूस्त शोहर और दो बच्चे शायद यही सबसे बड़ा सच है

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  75. आपकी पोस्ट पढ़ी और पाठको के कमेन्ट भी...कई सारे इमोशन से गुजरी ....लेकिन अगले ही पल आदतन दिमाग में सवाल कौंधा...अगर हम सब सच में इतने ही संवेदनशील है ...दूसरों के दर्द, तकलीफ को समझ सकते हैं....तो सांझते क्यों नहीं? क्यों, दिलो में, रिश्तो में दूरियां है.....हमने अभिव्यक्ति को तो विकसित किया .....लेकिन प्रेम, भावना, समर्पण, त्याग..ये शब्द बनकर नहीं रह गए क्या? लफ्ज़ भी कमर्शिअल हो गए.....ऐसा मत लिखा करिए ....बेवकूफ लोग कमजोर हो जाया करते हैं :-)

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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