2009-01-22

अपने अपने तर्कों से गुजरते हुए


जिस रोज महज़ तीन हज़ार रुपये में दिन रात आपकी कालोनी के दरवाजे पे खड़ा चौकीदार आपको सलाम नही ठोकता है .रोज के इस अपेक्षित आदर को न पाकर आप आहत हो उठते है ,दरअसल ये भी एक प्रकार का अहं है....ठीक उसी तरह जैसे अपने द्वारा किए गए अच्छे कामो की लिस्ट तैयार करके रखना .या उन्हें सार्वजनिक करना ... नेकी के पीछे गौरवान्ववित होने का लोभ है .......खामिया भी इस इश्तिहारी जमाने में खूबिया सी लगने लगी है...
बचपन में स्कूल के कोर्स में पढ़ा एक निबंध याद आता है जिसमे लेखक कहता है की एक शराबी ओर स्त्रेन जहाज़ का कप्तान भी अगर डूबते वक़्त अपने जहाज को नही छोड़ता है तो वास्तव में उसका चरित्र मन्दिर के पुजारी या गिरजाघरों के पादरियों से कही ऊँचा है .....अपने परिवार बच्चो के प्रति अति सवेदनशील व्यक्ति अपने कार्य स्थल या किसी दूसरी जगह असंवेदनशील हो सकता है...यानी सवेदनशीलता के भी दायरे है ....चरित्र के भी ....ऐसा लगता है चरित्र की कई परीक्षाये है जिसकी एक परीक्षा में डिस्टिंक्शन से पास हुआ विधार्थी दूसरी में फेल हो जाता है .... चरित्र की व्याख्या या उसकी माप तोल मुश्किल है .बेहद मुश्किल .....
तो क्या अब वर्तमान समय में अच्छे चरित्र विलुप्त हो गये है या उनकी प्रोग्रामिंग सिर्फ़ १९५० तक ही थी ? या हमने अच्छे चरित्र की कोई जटिल परिभाषा गढ़ दी है जिसके सांचे में अब कोई फिट बैठता नजर नही रहा है ?तो क्या आदर्शो को खीच कर थोड़ा नीचे लाया जाये .....
.सचिन तेंदुलकर को देखता हूँ ..करोडो अपेक्षाओं का बोझ पिछले १८ साल से अपने कंधे पर विनम्रता से ढो रहे है....क्या उन्हें हीरो कह सकते है ....या १९ साल की शगुफ्ता को जो भारी भारी डोनेशन अपनी जेब में लिए माँ बापों की लम्बी कतारों के बीच बिना किसी कोचिंग के मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में पहले प्रयास में सफल होती है .... रेड लाईट एरिया से निकली वो पहली लड़की है जिसके हौसलों की उड़ान का ये पहला पड़ाव है....या पड़ोस में रहने वाली" मित्तल आंटी" जो अपनी बहन की अकस्मात म्रत्यु होने पर अपने से १० साल बड़े किसी ऑफिस में सरकारी बाबू ...अपने जीजा के साथ ब्याह दी जाती है ...जिनके पहले से तीन बच्चे है ..जिनमे से एक मानसिक रूप से बीमार है....अपनी सारी उम्र वे उनमे झोंक देती है...ओर एक उम्र में आकर उनकी एकमात्र संतान उनका १९ साल का लड़का भी मानसिक अवसाद का शिकार हो जाता है ...ओर वे अब भी अपनी उस मानसिक रूप से विक्षीपित सौतेली बेटी की संतान को उसी जतन से पाल रही है....उनकी पारी कभी ख़त्म नही होती ... पर उनके चेहरे पर थकान नही दिखती .. पड़ोस में किसी शादी ब्याह में वे अब भी ढोल बजा कर हँसते -मुस्कराते गीत गाती है.... .... या एक रुपये में एक कपड़ा प्रेस करने वाला धोबी जो अपनी टूटी फूटी साइकिल पे आपको आपका पर्स लौटाने कुहरे भरी ठण्ड में वापस आता है जिसमे डेबिट ,क्रेडिट कार्ड्स,कुछ अधफटे कागज ओर १८०० रुपये कैश है .

चरित्र विलुप्त ? शायद उनकी शक्ले बदल रही है!




आज की "त्रिवेणी"

हर इतवार सवेरे उठकर मीलो पैदल चलता था
जेब मे छिपाकर "मज़हब" पहली पंगत बैठता था.........

हर इतवार अब्दुल पेट भर खाना ख़ाता था

90 टिप्‍पणियां:

  1. There are few things money can't buy,

    For rest all we have master card.

    शायद इस बात को सोचने वाला यही सोच रहा था।

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  2. वाकई, चेहरे बदल गए हैं बस...और इन चेहरों को देखने की फुर्सत आप जैसे भलेमानस को ही हो सकती है, बाकी लोगों को शायद इसके खोने का अहसास भी न हो. खूबसूरत ताना बाना बुना है आपने जिंदगी के इन किरदारों का. आपको पढ़ना जाडों में एक गर्म कप काफ़ी पीने जैसा होता है...गर्मी अन्दर तक महसूस होती है और संतुष्टि भी.

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  3. *बेहद संवेदनशील लेख..
    *आज शब्द ढूँढ़ रही हूँ..क्या लिखूं..?
    *वास्तविकता यही है--सवेदनशीलता के भी दायरे है ....चरित्र के भी --
    *जिस के हौसले की उड़ान में ताकत नहीं है वोही नीचे आ गिरता है..उडते रहने को हौसले बांधने पड़ते हैं परों के साथ ..
    ***-त्रिवेणी--भूख जो करा दे कम है!

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  4. चरित्र तो हैं, उत्कर्ष भी है। पर देखने वालों का नजरिया बहुत मीडियॉटिक हो गया है।
    सोचने में मायोपिया बढ़ता जा रहा है। अपने पास में भी नहीं दीखते हमें अच्छे चरित्र के उदाहरण।
    बहुत सुन्दर लिखा आपने।

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  5. जिन्दगी में यही सब आस पास बिखरा पड़ा है..अवसाद के कारण है तो साथ ही खुशियों की बारिश भी..गर्व करने के विषय पसरे पड़े हैं तो शर्म से सर झुकवा देने नाले भी यहीं बह रहे हैं..

    बस, देखिये और कितने संवेदनशील आप हो सकते हैं..वही आधार बन जाता है कि आपको कितना कुछ देखने मिल जाता है वरना तो खुली आंख भी देखने को कहाँ तैयार है..


    सुन्दर संवेदनशील आलेख और बेहतरीन त्रिवेणी.

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  6. ये वो आनुवंशिक व्यवहार है जिनसे मनुष्य दीगर पशुओं से अलग बन गया -मानवता के इतिहास में पहले भी ऐसे उदहारण हैं ही आज भी हैं और ये कमोबेस तब तक रहेंगे जब तक मानव रहेगा !

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  7. बहुत सही कह रहे है आप . जिस व्यक्ति में अहम् की भावना होती है सम्मान न पाकर आहत होता है यह कटु सत्य है . भावपूर्ण संवेदनशील पोस्ट. शुक्रिया जी

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  8. बेहद संवेदनशील पोस्‍ट....बहुत अच्‍छा लगा पढकर।

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  9. अगर अहं मार के ज़िन्दा रहते ओत संत कहलाते पर आज जो संत हैं वह क्या संत है! सचमुच दिल की बात कही आपने! त्रिवेणी भी लाजवाब!

    ---आपका हार्दिक स्वागत है
    चाँद, बादल और शाम

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  10. ैआपने सही कहा चरि की व्याख्या या उसका मापतोल नही किया जा सकता बहुत ही चिन्तनपरक और संवेदन्शील विषय है

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  11. जिस तरह से आपके ब्लोग पर कुछ महीन छोटे सफेद मोती से चमकते हुए नजर आते है ठीक उसी तरह आपकी पोस्टों में भी ज़ज्बातों,अहसासो के शब्दों के मोती भी नजर आते हैं। और यही शब्दों से निकली भावनाएं दिल को छू जाती हैं। और जो शब्द दिल को छूते है वो सच्चे होते हैं और जो सच लिखता है वही अच्छा लिखने वाला होता हैं। और अच्छा होता है उसे लोग प्यार करते है। और प्यार की परिभाषाएं बदल जाती हैं पर अहसास नही बदलते। और जिस दिन अहसास बदलने लगेगे उस दिन यह दुनिया........।
    और पता है अनुराग जी अभी आपका कमेंट भी आया है। जब मैं यह कमेंट लिख रहा हूँ। ये क्या है अनुराग जी ......। क्या मेरी आवाज आपतक पहुँच गई थी? ऐसा आज ही नही पहले भी हुआ था। सच पूछिए तो यह देखकर मै भावुक हो गया हूँ। बाकी बाद में....।

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  12. बड़ा ही जटिल सवाल । एक मामूली सा इंसान भी कभी कभी ऐसे काम कर जाता है की समझ में नही आता कौन सी रेखा है जिसे पार करके पुरूष महापुरुष बन जाता है। जिन्हें हम अपना विशवास सौंपते हैं वो तो अपनी सात पीढियों के लिए जमीन जायदाद इकठ्ठा करने में लग जाते हैं।

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  13. चरित्र का मापतोल मुश्किल है यह सच है मगर यह इलूज़न है कि १९५० के बाद अच्छे लोग बनने बंद हो गए हैं. १९५० से ठीक ३ साल पहले लाखों हिंदू-मुस्लिमों ने एक-दूसरे को काट डाला था. अच्छे-बुरे लोग हर समय हर काल में मिलते हैं.
    उम्मीद न छोडो भाई. कम से कम अभी मैं ज़िन्दा हूँ ;)

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  14. चरित्र हैं और रहेंगे।
    त्रिवेणी बहुत अच्छी है। दिल को छू गई।

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  15. अनुराग जी, कईं बार ऐसा नहीं लगता क्या हम जो बातें नहीं समझना चाहते ससुरी वही समझ आती हैं..... बहरहाल बहुत सी बातें ऐसी हैं.....

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  16. अनुराग जी, कईं बार ऐसा नहीं लगता क्या हम जो बातें नहीं समझना चाहते ससुरी वही समझ आती हैं..... बहरहाल बहुत सी बातें ऐसी हैं.....

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  17. अनुराग जी, कईं बार ऐसा नहीं लगता क्या हम जो बातें नहीं समझना चाहते ससुरी वही समझ आती हैं..... बहरहाल बहुत सी बातें ऐसी हैं.....

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  18. चरित्र विलुप्त हो रहे हैं ये आपकी पोस्ट से तो नहीं लगता है. हाँ बस देखने का नजरिया बदल रहा है इसमें कोई दो राय नहीं.

    कितने संघर्ष भरे हीरो हैं अपने इस देश में... अभी सोच रहा हूँ तो कदम-कदम पर दिखाई दे रहे हैं.

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  19. aapke "dil ki baaten" hamesha hi nihshabd kar jatee hain.

    Bilkul sahi kaha aapne...
    चरित्र की व्याख्या या उसकी माप तोल मुश्किल है ......

    Yah duniya jo chal rahi hai,pramanit karti hai ki achche logon ki kami nahi.

    उत्तर देंहटाएं
  20. aapke "dil ki baaten" hamesha hi nihshabd kar jatee hain.

    Bilkul sahi kaha aapne...
    चरित्र की व्याख्या या उसकी माप तोल मुश्किल है ......

    Yah duniya jo chal rahi hai,pramanit karti hai ki achche logon ki kami nahi.

    उत्तर देंहटाएं
  21. अनुराग जी ये अंह की बीमारी कुछ ज्यादा ही फैलने लगी है। नेकी आजकल....?। वैसे नेकी जमुना बाजार पर कभी कभी मंग़लवार को देखता हूँ और उन्हीं में से एक आध को अपने यहाँ सरकार और गरीब का माल हडपते भी देखता हूँ। पर अच्छे चरित्र भी हैं। जो लोगो का हौंसला बनते है। वो लड़्का याद आ रहा है जो मेरे हाथ में एक रुपया रखकर चला गया था। जिसकी भूख ने भी उसे मंगलवार को नेकी करने वाला जैसा नही बनाया .....। बाकी तो जी आप दिल से लिखते है और हम दिल से पढ़ते है। और त्रिवेणी का तो जवाब नही।

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  22. यानी सवेदनशीलता के भी दायरे है ....चरित्र के भी ....ऐसा लगता है चरित्र की कई परीक्षाये है जिसकी एक परीक्षा में डिस्टिंक्शन से पास हुआ विधार्थी दूसरी में फेल हो जाता है .... चरित्र की व्याख्या या उसकी माप तोल मुश्किल है .बेहद मुश्किल .....

    Dil ko chhune wala lekha.....

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  23. आपका लेख झकझोर रहा है. प्रश्न द्रिश्टिकोण का भी है. "अच्छे चरित्र विलुप्त हो गये है या उनकी प्रोग्रामिंग सिर्फ़ १९५० तक ही थी" यह जो वर्ष है, लोग आगे बढ़ाते रहेंगे. आभार.

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  24. अनुराग जी आज आपके दिल की बात पढ़ कर तो सन्न रह गया ,स्तब्ध हूँ कोई शब्द नही के क्या लिखूं ,किस विषय पे लिखूं चरित्र पे ,या अहं पे एक का पारा जहाँ हो सकता है बढ़ गया है तो दूसरा बिकते समय नही लेता... वाकई बेहद उम्दा लिखा है आपने .. ढेरो बधाई आपको ....


    अर्श

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  25. dil se nikli ek aur dil ki baat...

    triveni bahut hi achchi hai..

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  26. संवेदनशीलता को पकड पाना अलग बात है और उसको आपके शब्दों जैसी अभिव्यक्ति दे पाना अलग बात है. मैं तो समझता हुं कि ज्यादातर लोग संवेदनशील होते हैं पर अभिव्यक्त नही कर पाते.

    इश्वर आपकी इस कला को बनाये रखे. यही शुभकामना है.

    रामराम.

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  27. मेरे ख्याल से चरित्र विलुप्त नही हुए, हमारी नजर बदलती जा रही है| और कुछ तो यह भी की ये सब देखने का समय भी नही है हमारे पास|

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  28. बात वही है बगल में छोरा शहर में ढिंढोरा . अच्छे लोग हमारे आसपास भी बहुत मिलेंगे . पर हम देखते ही नहीं .

    कहते हैं कि ईमानदारी के बल पर ही पृथ्वी टिकी है .

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  29. संवेदनशीलता लिए हुए इस लेख कि तारीफ के लिए शब्द सटीक नही मिल रहे .....बहुत ही बढ़िया

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  30. चरित्र विलुप्त ? शायद उनकी शक्ले बदल रही है!

    सवाल कठिन......लेकिन शायद हां.....

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  31. हर तरह के चरित्र हर कालखंड में थे। पर चरित्र के आधार पर सम्मान देने की रिवायत खत्म हो गई लगती है। बेहतरीन लगी आपकी त्रिवेणी !

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  32. अनुराग भाई,

    "अहम्" से लिप्त रहना ही
    "बुध्ध" या "ज्ञानी" की अवस्था है !
    और मुझे तो लगता है,
    कई सारे "एवरी डे हीरोज़्"
    और "रोल मोडलज़्"
    हमारे हिन्दी ब्लोग जगत का हिस्सा हैँ :)

    आप भी ...उनमेँ शामिल हैँ ..

    ज्रिवेणी गहरी बात कह गई .
    .इसी तरह बने रहीये ..

    स्नेहाशिष
    -लावण्या

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  33. क्या अब वर्तमान समय में अच्छे चरित्र विलुप्त हो गये है या उनकी प्रोग्रामिंग सिर्फ़ १९५० तक ही थी ? या हमने अच्छे चरित्र की कोई जटिल परिभाषा गढ़ दी है जिसके सांचे में अब कोई फिट बैठता नजर नही आ रहा है ?तो क्या आदर्शो को खीच कर थोड़ा नीचे लाया जाये .....
    bas main bhi kahungi....bemisaal..aadaab..

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  34. चरित्र विलुप्त हो गये हैं या उनकी प्रोग्रामिंग सिर्फ १९५० तक ही थी....क्या बात कह दी है डाक्टर साब

    और फिर विभीन्न शक्लें इस बदलते चरित्र की

    और फिर युगों के बाद आई ये त्रिवेणी......सलाम साब !

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  35. स्वार्थ व लाभ ये दो तत्व ऐसे हैं, जो व्यक्ति की मूल चेतना को बाधित करके, उसे निर्वैर नहीं रहने देते। जो इन से असम्पृक्त रह गया, वह हर वह चेहरा हो सकता है जो आप को १९५० के पश्चात् आज भी कहीं अचानक मिल जाएगा और जब तक आप अचकचा कर उसका हाथ थाम चेहरा प्रकाश में लाने जुगत करें वह लुप्त हो चुका होगा/होगी.
    बहुधा भारत में इनकी नियति अन्धेरे में मिट जाने की रही है।
    इन चरित्रों को उकेरने के लिए धन्यवाद।

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  36. आज भी मिलते है ऎसे लोग, जो बहुत कूछ करते है लेकिन अपना नाम नही आने देना चाहते, ओर ऎसे भी लोग मिलते है सब कुछ करते है लेकिन सब से पहले अपना नाम आगे लाते है, कि अगर *मै* ना करता,
    लेकिन आज भी समाज मे चरित्र है, शायद ऎसे ही महान आत्माओ के बल से दुनिया टिकी है, जो सब कुछ कर के भी भीड मै चुपचाप सब से पीछे रहना चाहते है.
    अनुराग जी आप का लेख पढ कर इंसान सब से पहले अपने अंदर देखता है, ओर इतना ही काफ़ी है...
    धन्यवाद

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  37. चरित्रवान लोग पहले भी थे आज भी हैं आगे भी रहेंगे। अब उनको देखने के मायने बदल रहे होंगे उसका क्या किया जाये?

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  38. चरित्र भी वही है, शक्लें भी बस देखने वालों ने दिखावे और झूठ मूठ का मोटा सा चश्मा लगाना शुरू कर दिया शायद

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  39. बहुत ही संवेदनशील और यथार्थ लेख। साधुवाद।

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  40. चरित्र विलुप्त ? शायद उनकी शक्ले बदल रही है!
    चरित्र और आदर्श की कोई सटीक परिभाषा नही है....जिन भी वाक्यों का आपने यहाँ वर्णन किया है क्या वो सब ईमानदारी से आपना फर्ज नही निभा रहे.....हाँ देखने का नजिरया जरुर बदल गया है क्यूंकि अपेक्षाए बढ़ गयी है ....बहुत भावनात्मक संवेदनशील लेख .....बहुत कुछ सोचने पे मजबूर करता है....एक एक शब्द.."

    Regards

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  41. Manish Ji ki Baat se sahamt ....achchhe bure charitra har kaal me hue hai.n........!bas mulyankan ke parimaan badal gaye hai.

    aur ek baat jo man ko bhai ki charitra ki pariksha me kabhi aap ko dictantion mil sakta hai aur kabhi zero.....! kitne hi udaharan hai mere apne dekhe hue......!

    baat kaal ki nahi hai ...ek hi vyakti me dono pahalu milte hai.n

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  42. मैं महेन की हां में हां मिलाती हूं

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  43. चरित्र गुम हो गए हैं या नहीं पर सोचने के नजरिया जरुर बदलता जा रहा है ..अब सिर्फ़ अपना स्वार्थ सर्वोपरि है पर कुछ लोग अभी हैं जो दूसरों के लिए सोचते हैं ..

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  44. पहले तो आपसे माफ़ी चाहती हूँ अगर पिछली पोस्ट पर मैंने कोई हार्श कमेन्ट किया हो क्यूंकि मुझसे ज्यादा आपको अब मेरा भाई पढता है उसके बाद लोगो के कमेन्ट देखकर मुझे लगा वाकई कई लोग ऐसे है जो सच में कई सार्थक बहसों को healthy मोड़ देते है जैसे की दिलीप जी ,कविता जी ,अनूप जी ओर सबसे ज्यादा मुझे पसंद कार्तिकेय की टिप्पणी आई खैर
    चरित्र की व्याख्या या उसकी माप तोल मुश्किल है .बेहद मुश्किल .....शायद इस पोस्ट का सबसे अहम् वाकया यही है
    या हमने अच्छे चरित्र की कोई जटिल परिभाषा गढ़ दी है जिसके सांचे में अब कोई फिट बैठता नजर नही आ रहा है ?तो क्या आदर्शो को खीच कर थोड़ा नीचे लाया जाये .....
    कल तक वाकई लगता था लेकिन आज सुबह आपकी पोस्ट पढने के बाद लगा शायद मैंने भी कई चरित्रों को देखकर भी नही देखा है
    ओर त्रिवेणी
    "गुरुदारे में अब्दुल" सही कहा आपने भूख का कोई मजहब नही होता

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  45. जिंदगी की आपा-धापी में गुजरते जिन छोटे- छोटे पहलुओं को आम आदमी नजर अंदाज क देता है
    उन्‍हीं पहलुओं में जीवन तलाशती है आपकी पोस्‍ट... कैसे एक डा. से आम आदमी बन जाते हैं आप...?
    पिछली पोस्‍ट में आपकी और कविता जी की लंबी टिप्‍पणी नहीं पढ पाई थी । यह जानकर मन
    खिन्‍न हो गया कि वे बा पर हाथ उठाते थे ...समझ सकती हूँ आपको भी बादल क्‍यों नजर आये थे...!

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  46. Bahut badhiya triveni. Touchy!

    Aur aapki tippani per tippani -
    Chaliye hai kisi ko toh photo mein "jo" baat hai woh samajh aayi! ;-)
    Warna mujhe abhi tak jo offline online comments aaye hain we ird-gird hi ghoomte rahe !

    I plan to post more pics soon!

    RC

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  47. बहुत ही सुंदर पोस्ट. चरित्रवान लोग तो आज भी हैं बस नज़र चाहिये और आपके पास वो है । आपकी त्रिवेणी तो बस कमाल !

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  48. "चरित्र की कई परीक्षाये है जिसकी एक परीक्षा में डिस्टिंक्शन से पास हुआ विधार्थी दूसरी में फेल हो जाता है".. सही कहा.. हम अपने चरित्र को अपने नफे नुकसान के अनुसार.. आगे ्पिछे करते रहते है..और शायद धीरे धीरे ये गुण लुप्त हो जाता है..

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  49. वाह अनुराग जी बहुत अच्‍छा लेख लिखा है आपने सच भी है

    चरित्र विलुप्त ? शायद उनकी शक्ले बदल रही है!

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  50. anuraag, bahut khoob janab
    kafi gehra, marmsparshi aur katu saty
    manuj mehta

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  51. charitra vilupt huye ya shakle badal gayi,shayad shakle badal gayi,doc saab ye kin bhawnao ki baadh mein har post ke baad baha le jate hai aap har pathak ko,thodi der hum soch mein dub jaae hai,magar jawabaasan nahi lagta,phir se ek behtarin post.

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  52. सही लिखा है आपने, लेकिन यह विलुप्त नहीं होगा इसकी गारंटी है.

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  53. यह आदर्शों के विध्वंस का समय है !
    क्या समाज, क्या राजनीति, क्या साहित्य
    और क्या सिनेमा ! इस मूर्तिभंजक समय में
    नए आदर्श गढ़ने और चुनने का प्रयास ग़लत
    सिद्ध हो सकता है !
    फिर भी इस उहापोह में केवल इनकार में तो
    नहीं जी सकते ! इस इन्कार में कहीं हम
    जीवन को ही तो नहीं नकार रहे ?
    अच्छे और ख़राब चरित्र कब और किस युग में
    नहीं थे !
    दरअसल सारा मामला महज "एक्सपोजर" का है ! पहले के हमारे जो आदर्श रहे, उनके बारे में पच्चीस प्रतिशत ही जानते थे बाकी के पच्चहत्तर प्रतिशत हम अपनी कल्पना से गढ़ लेते थे !
    आज ऐसा नहीं है ! आज कोई जरा सा भी "पापुलर" होता है तो उसकी छोटी से छोटी
    बात भी विभिन्न माध्यमों से सबको मालूम हो जाती है !
    अच्छे चरित्र कहीं विलुप्त नहीं हुए, अपने आस-पास ही नजर डालने पर मिल जायेंगे !
    चार साल पूर्व मेरा एक्सीडेंट हो जाने पर सर्वथा अनजान लोग अपना काम-काज छोड़कर 5 किलोमीटर दूर मेरे घर टैम्पो पे लादकर ले आए थे ! मै तो धन्यवाद तक बोलने तक की स्थिति में नहीं था !
    इसी तरह एक बार बरेली शहर में मेरी जेब कट जाने पर एक शुद्ध व्यवसायी ने मेरी हर तरीके से मदद की और खाना वगैरह खिलाकर घर तक लौटने का प्रबंध किया ! है न घोर कलियुग ?

    त्रिवेणी अच्छी लगी !

    धर्म-जाति की आड़ में भूल गया इंसान
    भूख, उदासी, बेबसी , सबकी एक समान !!

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  54. अपने परिवार बच्चो के प्रति अति सवेदनशील व्यक्ति अपने कार्य स्थल या किसी दूसरी जगह असंवेदनशील हो सकता है.

    kitni sahi baat hai.. ki sanajy dutt apni ek paari mein drugs lete hue naujawan the jinka sambandh underworld se tha... aaj wo gaandhigiri karte hue filmo mein nazar aate hai..

    maaf kar dene aur bhool jaane ke kala bhartiyo mein hamesha se payi jaati hai..

    salman khan ke fans unke hiran ka shikar karne par bhi kam nahi hote..

    monika bedi abu salem ke sath rehkar laut aati hai.. aur tv shows waale unhe lekar big boss bana daalte hai..

    aisa nahi hai ki logo mein galat ko galat kahne ka saahas nahi.. aankh par chadhe chasme utna hi dekh paate hai.. jitne unke number hai.. door tak dekhne ke liye door ka chasma jaruri hai..

    maine aapki pichli post par comment isliye nahi kiya ki mujhe vivado mein fasne se dar lagta hai.. balki isliye ki mera gaandhi ji ke vishay mein janne ka koi interest nahi hai.. yadi bhavishy mein kabhi hua to zaroor padhunga...

    maaf kijiyega commnet hindi mein nahi de pa raha hu.. kuch technical prob hai..

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  55. हमारे आसपास कितने हीरो हैं देखने की लिये आप जैसी आँख और दिल चाहिए.
    मानवता को उजागर करने वाला बेहतरीन... लेख..शब्द...भाव...आशय...

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  56. अब तक छप्पन मुझे मिलाकर ,
    बहुत उम्दा
    regards

    उत्तर देंहटाएं
  57. bahut badhiya lekh..har baar ki tarah...!
    Charitra...wo kya hota hai bhai??Apna kaam banta..bhar me jaye janta...yahi hai sabsa bada charitra...aaj ke samaj me...

    aur bade bade udaharn ki jarrorat nahi hai...line ko tod kar counter par jane wale us waykti ko dekhiye..ya road pe apni car ya bike ko traffic rules tod kar chalate hue logo ko dekhiye..apne desh ka charita ka pura lekha jokha mil jayega....har cheez me jugad..har cheez me..'mai'..yahi hai aaaj ke samaz aur uske logo ka charitra...

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  58. सही लिखा
    संवेदनाएं बदलती रहती हैं..........
    त्रिवेणी बहुत ही खूबसूरत हमेशा की तरह

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  59. बस यही तो है ज़िन्दगी...
    ---मीत

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  60. "चरित्र की व्याख्या या उसकी माप तोल मुश्किल है .बेहद मुश्किल ....."

    बिल्कुल सही. अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में वे सभी हीरो हैं जिनका जिक्र आपने किया है. केवल आज के दौर में नहीं, हर दौर में अच्छे चरित्र वालों को ढूढ़ते वक्त ये याद रखना चाहिए चरित्र बहुत सारे गुन और दोष से बनता है.

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  61. कई बार कोई टिप्पणी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ओर कभी कोई टिप्पणी पोस्ट को सार्थक कर देती है ...अमूमन मै इसका श्रेय डॉ अमर कुमार को देता हूँ....पर आज प्रकाश गोविन्द जी टिप्पणी शायद पहली श्रेणी में आती है...जो कही न कही हमें वर्तमान समय में जीने का साहस देती है ..... इस भागती दौड़ती साइबर दुनिया में भी कुछ चेहरे ऐसे है जो हमें उम्मीद देते है .@कविता जी ने भी जैसे चरित्र का एक चेहरा दिखाया है.....@कुश ने भी ठीक कहा हम लोग जल्दी ही सब कुछ भूल जाते है ओर जल्दी ही किसी मिथक को गढ़ देते है....@fightar जेट ठीक कहता है .रेड लाईट पर बिना पुलिस वाले के रुकना भी चरित्र है...ओर किसी लाइन में खड़ा रहना भी ....बीच शहर में लो बीम पर गाड़ी चलाना भी चरित्र है ...ओर खाकर फेकना भी.... ये दोनों युवा चेहरे है.....@मनीष की टिप्पणी शायद हमारे आज का समाज का आइना है...की अब चरित्र को कोई सम्मान नही देता..वैसे रवायते नही रही....क्या सचमुच ?मै फ़िर प्रकाश जी उम्मीद से अपनी उम्मीद जोड़ता हूँ...
    @नीलिमा शुक्रिया ..

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  62. अनुराग भाई पहुँचने में देरी हुई...लेकिन आ तो गया...आप की लेखनी से रचे चरित्र जब पढता हूँ तो अचानक ही वो मुझे अपने आस पास के परिवेश में भी दिखाई देने लगते हैं...जो पहले नजर नहीं आते थे...ये होती है एक पारखी की नजर...आपने इतना अच्छा लिखा है की उस पर टिपण्णी करना मेरे बस की बात नहीं...दिल की बात सीधी दिल में उतर गयी...त्रिवेणी...वल्लाह क्या बात है...वाह.
    आप का उपकार है की आपने बात १९५० से शुरू की है...हमारा जन्म वर्ष ये ही है भाई...
    नीरज

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  63. The first thing that appealed to me about your blog is its layout. I don't know how to do it for myself. Especially, I can upload pictures but I can't place them at desired position in my write ups. If I copy paste a ready made table with text and photographs, photos don't get uploaded automatically. If you can direct me to a link which will teach me this, I shall be especially thankful to you.

    Secondly, I visited your blog today only and that too thru some link. I feel that what you are writing is the essence of blogging. You really deserve this much following. I am the latest follower of your blog.

    Sushant Singhal
    www.sushantsinghal.blogspot.com

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  64. चरित्र विलुप्त ? शायद उनकी शक्ले बदल रही है!
    बहुत ही सच कहा आपने !!!

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  65. Anuraagjim
    Muddaton baad aaj apne blogpe aayee...aur baadme aapkee tipanee padh aapke...Phir kab aa paungi, nahee jaantee...aur aake aapne tippaneeke roopme chhodee "aurat", sheershak tehet, rachnaakee taareef karun, shukraguzaree karun....yaa aapkee triveneekee, yaa phir aapke likhe do sansmarnonkee....vishleshan ke roopme kahe, alfaazonkee, mano aap apne aapse batiyaa rahe hon...Har vicharse sehmat hun aur hameshaaki tarah nishabdbhee...
    Gandheeji ke baareme kuchh nahee keh paaungi, ye sach hai.....gar har insaan apne gun doshon sahit hota hai to, unke jo gun the, use mai adhik ehmiyat doongee, kyonki "satyake prayog"pe mai tippanee karun, is qabil hun nahee....
    Aaapke blogse phir ekbaar aatm vimochan karte hue laut rahee hun..
    aisaa karnepe aapkaa lekhan baadhy kar detaa hai....
    Kaash aaj har koyee, jise mai thoda saabhee jaantee hun, mere aanewaale kalke liye mangal prarthna kare...!!

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  66. ...इस जीवन का , यही है रंग रूप...
    हमेशा की तरह बढ़िया लिखा है...

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  67. हमने अच्छे चरित्र की कोई जटिल परिभाषा गढ़ दी है जिसके सांचे में अब कोई फिट बैठता नजर नही आ रहा है ?तो क्या आदर्शो को खीच कर थोड़ा नीचे लाया जाये .....

    i really dont have words....remarkably thought provoking write up. :)

    zindagi mein itne alag alag tarah ke log dekhne ko milte hain....ke kuch sawaal bas sawaal ban kar hi reh jaate hain.
    bahut saal pehle kahin padda tha maine...

    "If Wealth is lost
    nothin is lost
    If character is lost
    Everything is lost"

    par aaj ki tareekh mein...duniya daulat aur shohrat ke liye itni pagal hai...ke achhe character ki value kisi ko pata hi nahi hai....

    aadarshon ko kheench kar neeche laane ki jarrurat bhi nahi hai shayad....kyunki kuch logon ke liye is shabd ke koi maayne hi nahi hain.

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  68. गणतंत्र दिवस की आप सभी को ढेर सारी शुभकामनाएं

    http://mohanbaghola.blogspot.com/2009/01/blog-post.html

    इस लिंक पर पढें गणतंत्र दिवस पर विशेष मेरे मन की बात नामक पोस्‍ट और मेरा उत्‍साहवर्धन करें

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  69. अंहकार..........हा-हा-हा-हा-हा-.......क्या खूब.!!अरे यही इक अदद सी चीज़ तो बची हुई है आदम के पास.......इसे लेकर ये विक्षिप्त प्राणी सड़कों पर नाचेगा....गायेगा......झूमेगा....और क्या......और संवेदनशीलता.......अरे-अरे-अरे-अरे ये क्या बला है भाई.....मैंने तो सुना है कि आदम ने उसके पकौडे बना कर खा लिए हैं.......!!??

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  70. डॉ साहब क्या लिखते हो आप ,खूबसूरत . १०० मे ९० बेईमान उन १० लोगो का दिया नारा था जो अपनी ईमानदारी [?] की मार्केटिंग कर सकते थे . जबकि ९० लोगो को तो बेईमानी का कोई मौका ही नही मिलता .
    त्रिवेणी लाजबाब है ,

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  71. subah hoti hai sham hoti hai,
    Jindgi yu hin tamam hoti hai.

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  72. भारतीय गणतंत्र की हार्दिक शुभ कामनाएं
    और सादर अभिवादन

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  73. हम तो कहना भूल ही गये..

    गणतंत्र दिवस की आपको बहुत बहुत बधाई

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  74. डाक्टर साहब पहुँचने में देरी हुई...लेकिन आ गया... और बे फिकर रहिये, अच्छे चरित्र विलुप्त नहीं होंगे. आप खुद ही उन्हें कहीं न कहीं से इसी तरह खोज निकालेंगे. या जब भी उनकी ज़रूरत पड़ेगी, वो कहीं न कहीं से निकल आयेंगे.

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  75. आप उम्मीद मत छोड़िए , अच्छे लोग पहले भी थे और अब भी हैं बस नजरिया है या हम ऐसे लोगों से शायद मिल नहीं पाते

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  76. 'perfect namkeen' per comment ke liye shukriya. Sach kahoon to jab wo likhi, mujhe exactly wahee laga jo aapko laga hai. Ditto!
    If you want I can send it to you in email ..

    Bade din ho gaye .. kuchh naya post keejiye!

    God bless
    RC

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  77. Bahut Khoob !!
    गाँधी जी की पुण्य-तिथि पर मेरी कविता "हे राम" का "शब्द सृजन की ओर" पर अवलोकन करें !आपके दो शब्द मुझे शक्ति देंगे !!!

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  78. बहुत सुन्दर लिखा आपने।

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  79. soch se insan bana hai
    insanon se samaj
    insan sochta hai
    ye samaj bahut bura hai!

    sach natikta ke mapdand nichey khiskanee ki zarurat hai..bus me ladki ko ladies seat dene wale ko bhi padmshri dena chahiye!

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  80. नेकी और बदी... कल भी थी और आज भी है|... चरित्रवान और चरित्रहीन लोग पहले भी थे और आज भी है|... राम और रावण समकालीन ही थे|

    .... फिरभी नेकी करनेवाले लोग हर युग में पूजे जाते है; यही सच्चाई है|... लेख बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर कर देता है|... यह मंजी हुई कलम की ताकत है|

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  81. "एक रुपये में एक कपड़ा प्रेस करने वाला धोबी जो अपनी टूटी फूटी साइकिल पे आपको आपका पर्स लौटाने कुहरे भरी ठण्ड में वापस आता है जिसमे डेबिट ,क्रेडिट कार्ड्स,कुछ अधफटे कागज ओर १८०० रुपये कैश है"

    ये और उसके जैसे अनेक चरित्र आज भी विद्यमान होंगें, इस आशावाद के साथ आपको इस संवेदनशील विषय के लिये और उसे निभाने के लिये बधाई!!!

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  82. बहुत खूबसूरत भावाभिव्यक्ति है आपकी.
    युवा शक्ति को समर्पित हमारे ब्लॉग पर भी आयें और देखें कि BHU में गुरुओं के चरण छूने पर क्यों प्रतिबन्ध लगा दिया गया है...आपकी इस बारे में क्या राय है ??

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  83. संवेदनशीलता के पैमाने बदल गये हैं। पहले बिना किसी स्वार्थ के किसी की सेवा करने वाले को संवेदनशील कहा करते थे...अब तो यह तक कहा जाता है कि कोई बिना निजी लाभ के किसी का भला नहीं करता चाहे भगवान ही क्यों न हो...इसी से संवेदनशीलता का पैमाना नापा जा सकता है।

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  84. hmm Dr Saheb bhook ka bhi koi mazhab hua hai

    choukidaar ka salaam na thokna bhi bura lagta hai haan ahm hi to hai
    kahi na kahi hum apni har achhi baat yaad rakhte hain ginanae se nahi chukte kyuki hum achha banne koshish karte rahte hain
    ahm hai na

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  85. आपका लेख पढ़ कर सिर्फ इतना कह सकता हूँ की अक्षर भी जादुई होते हैं!!!

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  86. आपका लेख पढ़ कर सिर्फ इतना कह सकता हूँ की अक्षर भी जादुई होते हैं!!!

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  87. boht hi khoobsurat likha hai Anurag ji...aapki is rachna ko padhte padhte ekdum se ek muskaan se aa jati hai chehre pur..ya khaiye kuch sukoon sa mahsoosh hota hai...aas jaagti hai...acchai ke prati...pata nahi kya hai...pur isse pata chulta hum sabke ander acchai hoti to hai pur so si gaye hai..kabhi kabhi ek karwat le kur kunmunati hai aur fir so jati hai...pur hai jaroor kahin na kahin...

    dhanyawad..
    manu

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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