2008-11-25

मुझसे मुख्तलिख एक शख्स मेरे जेहन मे आवारा सा फिरता है


प्लेन की सीट पर बैठे बैठे मेरी ऊँघ को उस चार साल की बच्ची का सवाल तोड़ता है जो मेरे दांयी ओर की सीट पर बैठी है जिसके पास सवालों की बड़ी पोटली है ओर पिछले पन्द्रह मिनटों मे उसमे से कई सवाल निकले है ....उसका एक सवाल अपनी माँ से है...एरोप्लेन कहाँ पार्क् होगा ?माँ मजबूरी मे बाप को देखती है जो हेड फ़ोन लगाकर म्यूजिक सुन रहा है....बच्ची अपना सवाल दुहराती है...मेरे बराबर मे बैठे डॉ साहब अपने कान के दर्द को भगाने के लिए जोर जोर से अपना कान मल रहे है .....इंदोर से दिल्ली लौटते वक़्त इस प्लेन को कुछ वक़्त भोपाल हवाई अड्डे पर भी बिताना है ...........मै फ़िर अपनी आँखों पर चश्मा चढाकर एक मुस्कराहट जेट की उस खूबसूरत एयर होस्टेस को दे कर आँखे बंद करने की कोशिश करता हूँ ....कुछ मिनटों बाद मुझे वापस उसी दुनिया में लौटना है .....जहाँ मोबाइल स्विच ऑफ़ करना एक सामाजिक अपराध है ,उस दुनिया में ...... जहाँ ड्रग रिअक्शन के उस ३० साला मरीज को जिसे असल मे आई .सी यू में एडमिशन की दरकार है ...पर पैसे एक बहुत बड़ा सवाल बनकर उसके बूढे माँ बाप की खामोशी मे सुनाई देते है .....उस दुनिया में .....जहाँ तीमारदार आपसे इसलिए निगाह बचाते है की कही आपकी" विजिट" का बिल उन्हें अपनी जेब से न देना पड़ जाये .....उस दुनिया में....जहाँ ढाई साल के बच्चे की गरीब मां उस वक़्त भयभीत भरी निगाह से देखती है .. जब वो अपने जले पाँव पर ड्रेसिंग करवाते वक़्त आपकी महँगी टाई पर सू सू करता है......उस दुनिया में ....जहाँ बोटोक्स के इंजेक्शन में उम्र से लड़ने की कवायद है ...जहाँ लेजर के साथ सपनो की मार्केटिंग है .. उस दुनिया मे ......जहाँ शामिल होने से पहले आप ये भरम रखते है कि ये दुनिया इस देश की ईमानदारी का अस्सी प्रतिशत बोझा ढो रही है ......उस दुनिया में जहाँ जहाँ चीजो को तटस्थता से देखने की आपकी कुशलता आपकी योग्यता का पैमाना है .....मुझे अपने दोस्त रघु का फलसफा याद आता है जो उसने अपनी अलमारी पे स्केच पेन से कुछ शेरो के बीच लिखा हुआ था .....मुझे  उस दुनिया में  आगे जीना  है ...  जहाँ मुफलिसी के जीवाणु  हर साल  जादू  से  अपनी शक्ल  बदलते है.....
.प्लेन लैंड हो रहा है........फ़िर से वही जद्दोजेहद !


खीं देता है दलीलो की लकीर
हम दोनो के दरमियां
उलझता है मेरी ख्वाहिशो से,
टोकता है मेरी जुस्तजुओ को..
जुदा है मेरे रास्तो से
जिद्दी भी है ...मगरूर भी है थोडा
यादो के टीले पर अक्सर तन्हा खड़ा मिलता है
मुझसे मुख्तलिख ....एक शख्स


मेरे ज़ेहन मे आवारा सा फिरता है !










आज की त्रिवेणी -
सफ्हे डर सफ्हे कुछ देर रूकती है
कुछ लफ्ज़ टटोलती है ,कुछ हर्फ़ पलटती है ......

हर शब् एक नज़्म अपनी शनाख्त करती है


सफ्हे =कागज ,हर्फ़ =शब्द ,शब् =शाम शनाख्त= पहचान

63 टिप्‍पणियां:

  1. 'यादो के टीले पर अक्सर तन्हा खड़ा मिलता है
    मुझसे मुख्तलिख एक शख्स........

    मेरे ज़ेहन मे आवारा सा फिरता है '
    ---
    यकीन है उस की आवारगी खटकती तो नहीं होगी क्योंकि शायद उस की और आप की सोच के टकराव से ही
    यह लेख जन्मा है.
    गंभीर चिंतन भरा यह लेख-लेकिन उपाय कहाँ और कैसे?
    सच में ,आज़ादी के इतने सालों बाद भी'गरीबी एक संक्रामक रोग है'
    की विकट स्थिति ही है.

    ----------------------------------
    त्रिवेणी-'हर शब् एक नज़्म अपनी शनाख्त करती है-'
    उम्दा ख्याल!
    ---

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  2. हर शब् एक नज़्म अपनी शनाख्त करती है

    ख्याल यूँ ही आवारा से फिरते हैं ..और न जाने क्या क्या सोचते लिखवाते रहते हैं ..

    उत्तर देंहटाएं
  3. यादो के टीले पर अक्सर तन्हा खड़ा मिलता है
    मुझसे मुख्तलिख एक शख्स........

    मेरे ज़ेहन मे आवारा सा फिरता है

    aap ka ye andaz jis me poori post samvedana dil me ikatthi hote hote, aap ki antim panktiyo.n ke sath ankho me ikatthi ho jati hai.n aur dar lagta hai ki kahi.n bah na jaye.n to jaldi se comment likhne lagti hu.n..ye andaz bahut nirala hai... khuda ise baneye rakhe...!

    उत्तर देंहटाएं
  4. यह विचारों की तीव्रता ही है, जो किसी को रचने के लिए उद्धत करती है। यही रचना प्रक्रिया है, जिसके बाद ही किसी अच्‍छी रचना का जन्‍म होता है।

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  5. क्या कहे अनुराग जी हर बार मेरे दिल की बात कह जाते हो।
    यादो के टीले पर अक्सर तन्हा खड़ा मिलता है
    मुझसे मुख्तलिख एक शख्स........
    मेरे ज़ेहन मे आवारा सा फिरता है

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  6. उस दुनिया में तो लौटना ही पड़ता है ! वो यथार्थ है वास्तविकता है.

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  7. एक तरफ़ -- ".उस दुनिया में ....जहाँ बोटोक्स के इंजेक्शन में उम्र से लड़ने की कवायद है ...जहाँ लेजर के साथ सपनो की मार्केटिंग है .."

    दूसरी तरफ़ "..उस दुनिया में .....जहाँ तीमारदार आपसे इसलिए निगाह बचाते है की कही आपकी" विजिट" का बिल उन्हें अपनी जेब से न देना पड़ जाये ..."

    बहुत मार्मिक और संवेदनात्मक रचना ! हमेशा की तरह दिमाग सोचने पर मजबूर है !

    तीसरी तरफ़ -- ".....इंदोर से दिल्ली लौटते वक़्त इस प्लेन को कुछ वक़्त भोपाल हवाई अड्डे पर भी बिताना है ........ "

    इस इंदौर में एक ताऊ नाम का प्राणी , उसका लट्ठ और भैंस भी रहती है ! ये गलत बात जो हमेशा ही गलत रहेगी ! इब रामराम !

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  8. मुझसे मुख्तलिख एक शख्स........

    मेरे ज़ेहन मे आवारा सा फिरता है

    दुआ है यह सख्स यूँ ही फिरता रहे आपके और हमारे ज़हनों में।

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  9. जिद्दी भी है ......मगरूर भी है थोडा
    यादो के टीले पर अक्सर तन्हा खड़ा मिलता है
    मुझसे मुख्तलिख एक शख्स........
    मेरे ज़ेहन मे आवारा सा फिरता है
    खूबसूरत अभिव्यक्ति...

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  10. काफी खूबसूरती से लिखा है आपने दिल को छुने वाला है ....

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  11. यादो के टीले पर अक्सर तन्हा खड़ा मिलता है
    मुझसे मुख्तलिख एक शख्स........

    मेरे ज़ेहन मे आवारा सा फिरता है
    waah bahut marm bandha hai en mein,hmmm garibi ka vaccine nahi hai kahi,kaash hota.bahut bhavnik lekh raha doc saab aur triveni bahut khas nazm apni shinakth karti hai sundar.
    lagta hai aaj sare logger doctor apne peshe se juda bhavnao ka sailab khole baithe hai,ya koi telepathi hai doston ke bich,aaj beji ji ke drushtikon par bhi aisi hi ek jijivisha padhi.bahut badhiya

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  12. क्या बात है डॉ साहब बहुत गहरी बातें कहीं आपने पोस्ट में. आपके मित्र की पंक्तियाँ दिल को छू गयी सर. त्रिवेणी की शनाख्त तो हमेशा से अलहदा और उम्दा है ही आपकी. बहुत बधाई सर आपको.

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  13. मै इस दुनिया का बाशिंदा हूँ जहाँ गरीबी एक संक्रामक रोग है....जिसका कोई वैक्सीन कभी ईजाद नही हुआ ..जिसके जीवाणु शायद हर महीने म्यूटेट होते है
    kitni sahi baat hai....hamesha ki tarah aapke dil se roobru karwati post.

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  14. हम चाहे खयालों की दुनिया में कितनी भी ऊंचाई पर उडते रहें, अंततः यथार्थ की धरातल पर उतर आना ही पडता है और फिर शुरू हो जाती है वही जद्दोजहद...

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  15. जिद्दी भी है ......मगरूर भी है थोडा
    यादो के टीले पर अक्सर तन्हा खड़ा मिलता है
    मुझसे मुख्तलिख एक शख्स........

    मेरे ज़ेहन मे आवारा सा फिरता है
    " बहुत भावनात्मक लेख है, सच ही तो कहा है, यादों के टीले अक्सर बहुत बडे होतें हैं और इसलिए तन्हा भी होतें हैं , और फ़िर ख्यालों की आवारगी भी बढ़ जाती है .... जेहन मे यहाँ वहां , भटक कर बहुत कुछ कुरेद लातें हैं .....और हमारी कलम उन्हें किसी ना किसी रूप मे ढालने मे कामयाब हो जाती है ...जैसे आपकी ये शानदार प्रस्तुती..."
    Regards

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  16. गहरी बात!अंदर तक झकझोर देती है ये जद्दोजहद की दुनिया!त्रिवेणी अपनी शनाख्त करा गई!आपको बहुत-बहुत बधाई!

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  17. यादो के टीले पर अक्सर तन्हा खड़ा मिलता हैमुझसे मुख्तलिख एक शख्स........मेरे ज़ेहन मे आवारा सा फिरता है

    वाह अनुराग जी
    यथार्थ के धरातल का खूबसूरती से वर्णन करती हुई ,एक दिल छू जाने वाली रचना

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  18. इतने सवेदनशील होकर आप डाक्टरी कैसे कर लेते हैं?
    हमेशा की तरह दिल की बात दिल को छु जाने वाली...
    और त्रिवेणी का हर हर्फ़ दिल पर उतरने वाला....

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  19. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  20. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  21. शायद आपसे मुख्तलिख इस शख्स ने आवारगी भी तो आपसे ही सीखी है. आप भी तो जाने किन किन अहसासों को पकड़ लाते हैं यूँ ही भटकते भटकते. गरीबी के कितने पहलुओं से आप रोज़ रूबरू होते होंगे, पर भी हर का चेहरा कैसे याद रह जाता है आपको?और ये चेहरा इतना साफ़ होता है कि हमें भी नज़र आने लगता है.

    वैसे एक बात कहनी थी, ताऊ की भैंस तो चाँद पर है...तो फ़िर ये इन्दौर में कौन है?

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  22. ये कौन है भाई, डॉक्टर साहेब इस आदमी से हम भी बड़े ही त्रस्त हैं. इसको भी 2-3 इंजेक्शन लगाइए. :)

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  23. शुक्र है आप आये तो सही ...मेरे मेल ने मुझे बताया की डॉ साहब ने कोई पोस्ट डाली है ....
    जहाँ बोटोक्स के इंजेक्शन में उम्र से लड़ने की कवायद है ...जहाँ लेजर के साथ सपनो की मार्केटिंग है .. उस दुनिया मे ......जहाँ शामिल होने से पहले आप ये भरम रखते है कि ये दुनिया इस देश की ईमानदारी का अस्सी प्रतिशत बोझा ढो रही है ......उस दुनिया में जहाँ जहाँ चीजो को तटस्थता से देखने की आपकी कुशलता आपकी योग्यता का पैमाना है ....
    ओर आपके दोस्त रघु का फलसफा लगता है शुरू से अच्छी संगत मिली है आपको ,चलिए हमारा भी ये भरम टूट गया की डॉ सिर्फ़ खडूस बूढे ओर चिडचिडे लोग होते है अपने आप में मुख्तलिख उस शख्स को जिन्दा रखिये !हाँ आपकी त्रिवेणी आपकी उर्दू पर पकड़ का अहसास दिलाती है

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  24. गरीबी और अमीरी का यही भेद है ! बेहद मार्मिक और दिल को छू लेने वाली पोस्ट !

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  25. सफ्हे डर सफ्हे कुछ देर रूकती है
    कुछ लफ्ज़ टटोलती है ,कुछ हर्फ़ पलटती है ......
    हर शब् एक नज़्म अपनी शनाख्त करती है

    बहुत उम्दा ! तिवारीसाहब का सलाम !

    @poemsnpuja - हमारी जानकारी के अनुसार ताऊ के पास दो भैंसे हैं ! चम्पाकली, राजा भोज ने दी थी वो आजकल चाँद पर गई हुई है ! और दूसरी भैंस अनारकली, बादशाह अकबर से, ताऊ को मिली थी, वो आजकल ताऊ के साथ इंदौर में होगी ! :)

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  26. डाक्टर होकर भी आपके भीतर का इंसान अब तक ज़िंदा है , हैरत की बात है । सेवा से उद्धोग में तब्दील हो चुके पेशे में जज़्बातों को मुख्तलिफ़ अंदाज़ में बयां कर आपने कमाल कर दिया ।

    उत्तर देंहटाएं
  27. डा सहाब आपको जब भी पढता हूं, सच अच्छा लगता है। आपके पास अनुभव भी है, भाषा भी और खास किस्म की सादगी भी। आप लगातर लिखते रहें, इंतजार रह्ता है। शुभकामनाएं।

    उत्तर देंहटाएं
  28. मै फ़िर अपनी आँखों पर चश्मा चढाकर एक मुस्कराहट जेट की उस खूबसूरत एयर होस्टेस को दे कर आँखे बंद करने की कोशिश करता हूँ .

    ye bhi khub rahi... magar aapki triveni to kahar barpa rahi hai bahot hi umda hai aapko dhero badhaii...
    aur han mere khas kar akhiri sher hi aapko ku pasand aate hai iska jawab dhundhane me laga hun.....

    उत्तर देंहटाएं
  29. यादो के टीले पर अक्सर तन्हा खड़ा मिलता है
    मुझसे मुख्तलिख एक शख्स........

    मेरे ज़ेहन मे आवारा सा फिरता है

    इस शख्‍स की आवाज आप सुनते हैं और दूसरों तक इतनी खूबसूरती से पहुंचा पाते हैं..इसीलिए तो आप डॉ. अनुराग हैं।

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  30. यथार्थ में तो जीना ही होगा. बच्चे की शंका का समाधान हो ही गया होगा. आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  31. डाक्टर साब क्या कहूँ...आपकी लेखनी से चमत्कृत हूँ और भावनाओं की अभिव्यक्ती से विस्मित....बहुत सुंदर...तमाम पंक्तियाँ अपनी डायरी में नोट कर लेने लायक..

    और त्रिवेणी हर बार की तरह कातिलाना...

    जल्दबाजी में दर की जगह डर टाइप हो गया शायद

    उत्तर देंहटाएं

  32. अनुराग, आज के पोस्ट की क्रेडिट मैं तुम्हारे दोस्त रघु के नाम करूँगा..
    साथ ही Sareetha जी की हैरत पर अपनी हैरत दर्ज़ करवाना चाहूँगा !

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  33. आत्मा से लिखे और महसूस किए गए इस भाव वर्णन को इनके शब्दों को जिन्दगी के अंधेरे -उजालों से लिपटे इस भोतिक माया जाल मैं ,इतनी शिद्दत से गौर करने के लिए ,आपको अंतर्मन से शुभकामना

    उत्तर देंहटाएं
  34. बहुत ही सुनदर,, एक सच आप ने कलम से लिख दिया.
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  35. wakai mein doctor sahab, kai din baad, blogs padh ke kaafi achcha laga. abhi kuch dino se hi main samay nikal paayi. aapka blog padha sabse pehle....:)
    achcha paost hai

    उत्तर देंहटाएं
  36. "...जहाँ ढाई साल के बच्चे की गरीब मां उस वक़्त भयभीत भरी निगाह से देखती है .. जब वो अपने जले पाँव पर ड्रेसिंग करवाते वक़्त आपकी महँगी टाई पर सू सू करता है.."
    और डॉक्टर साहब का गुस्सा करने के बजाय हमदर्दी से मुस्करा देना उस माँ को ईश्वर के अस्तित्व में पुनः विश्वास दिला देता होगा. ईश्वर आपको सलामत रखे और इतना सक्षम बनाए कि उस माँ जैसी अनगिनत माँओं के ह्रदय तक पहुँच सकें!

    उत्तर देंहटाएं
  37. डॉक्टर साब आपकी डॉक्टरी के बारे मे तो नही कह सकता लेकिन ये गारँटी से कह सकता हूँ आप आदमी बहुत अच्छे हो.मै लगातार मिलने के बाद भी बहुत् कम लोगों को बडी मुश्किल से अच्छा मानता हूँ मगर आपके मामले मे पता नही क्योँ बिना मिले ही ये राय बन गई है.बहुत अच्छा लिखा आपने दिल की बातोँ ने दिल को छू लिया.

    उत्तर देंहटाएं
  38. हस्पताल जाकर हम तो कुछ दिन ही अपना या अपनों का व अन्य मरीजों विशेषकर गरीब लाचार मरीजों का दुख देखकर परेशान हो जाते हैं और आप लोगों का तो जीवन ही यही है । सच में किसी की सहायता न कर पाने की मजबूरी कितना कचोटती होगी ।
    घुघूती बासूती

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  39. दिल से निकली हुई एक और बात.. जो दिल तक उतार गयी

    उत्तर देंहटाएं
  40. भाई,
    इतना ही कहूंगा कि इस पोस्‍ट को बार-बार पढ़ने को मन करता है। इतना ही कहूंगा कि इस पोस्‍ट पर कोई भी फास्‍ट फूड जैसी टिप्‍पणीं करना बेमानी होगा।
    तीसरी बार पढ़ते हुए नेपथ्‍य में यूट्यूब पर एक गीत सुन रहा हूं-आप भी सुनिए-
    http://in.youtube.com/watch?v=V0TW6xMl9l0&feature=related

    उत्तर देंहटाएं
  41. भाई अनुराग जी,

    जीवन की सच्चाइयों को उघेड़ने और रोचक शैली में हम सब के सामने परोसने में आपका मानवीय दिल कित्मा संजीदा है, हम सहज ही अनुमान लगा सकते हैं.
    आपका यही मानवीय पक्ष आपको अपने पेशे में भले ही आर्थिक न सही पर कुशलता, सक्षमता, कीर्ति और संतुस्टी के उच्चतम पायदानों पर अवश्य पहुचायेगा, ऐसी हमारी दुआ है.

    चन्द्र मोहन गुप्त

    उत्तर देंहटाएं
  42. yadon ke teelon par har shkhsa tanha hai .....
    padkar achchha laga . mere blog par dustak dene ke liye shukriya .

    उत्तर देंहटाएं
  43. अफ़सोस इस बात का हो रहा है की आप की इस पोस्ट को इतने दिनों बाद क्यूँ पढ़ रहा हूँ...ये चूक हो कैसे गई ???? लगता है बुढापा तेजी से अपना असर दिखा रहा है....बहार हाल आप ने जिस दुनिया का खाखा खींचा है उसे पढ़ कर रोंगटे खड़े हो गए हैं...बहुत तल्ख़ सच्चाई बयां की है आपने...एक बार फ़िर आप की लेखनी को मेरा सलाम...
    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  44. उलझता है मेरी ख्वाहिशो से,
    टोकता है मेरी जुस्तजुओ को.........
    जुदा है मेरे रास्तो से
    जिद्दी भी है ......मगरूर भी है थोडा
    यादो के टीले पर अक्सर तन्हा खड़ा मिलता है
    मुझसे मुख्तलिख एक शख्स........

    मेरे ज़ेहन मे आवारा सा फिरता है


    इस शख्स को अपने भीतर ऐसे ही जीने दीजिए, इसे यूंही बना रहने दीजिए, थोड़ा सा कम दुनियादार थोड़ा सा गैरपेशेवर पर इसे इंसान बने रहने दीजिए।

    उत्तर देंहटाएं
  45. त्रिवेणी बहुत अच्छी लगी.
    डाक्टर साहब!
    आपकी हर पोस्ट दिल लो
    छूती है....ये बात और है कि
    हर बार टिप्पणी नहीं कर पाता हूँ.
    =========================
    डॉ.चन्द्रकुमार जैन

    उत्तर देंहटाएं
  46. उलझता है मेरी ख्वाहिशो से,
    टोकता है मेरी जुस्तजुओ को.........
    जुदा है मेरे रास्तो से
    जिद्दी भी है ......मगरूर भी है थोडा
    यादो के टीले पर अक्सर तन्हा खड़ा मिलता है
    मुझसे मुख्तलिख एक शख्स........

    मेरे ज़ेहन मे आवारा सा फिरता है

    bahut hi khoob...

    उत्तर देंहटाएं
  47. उलझता है मेरी ख्वाहिशो से,
    टोकता है मेरी जुस्तजुओ को.........
    जुदा है मेरे रास्तो से
    जिद्दी भी है ......मगरूर भी है थोडा
    यादो के टीले पर अक्सर तन्हा खड़ा मिलता है
    मुझसे मुख्तलिख एक शख्स........

    मेरे ज़ेहन मे आवारा सा फिरता है

    bahut hi khoob...

    उत्तर देंहटाएं
  48. ऐसी ही बेबसी मुझे भी महसूस होती है !!आप किसी चीज को बहुत बारिकि से देखते है और महसुसते है !!

    वक्त आयेगा जब बहार हम भी देखेंगे !!
    गरीब हिन्द को ताजदार हम भी देखेंगे !!

    उत्तर देंहटाएं
  49. खींच देता है दलीलो की लकीर
    हम दोनो के दरमियां
    उलझता है मेरी ख्वाहिशो से,
    टोकता है मेरी जुस्तजुओ को.........
    जुदा है मेरे रास्तो से
    जिद्दी भी है ......मगरूर भी है थोडा
    यादो के टीले पर अक्सर तन्हा खड़ा मिलता है
    मुझसे मुख्तलिख एक शख्स........

    bas wah wah hi nikalti hai. Humesha ki terah bahut khoob likha hai aapne

    उत्तर देंहटाएं
  50. ना तो सुंदर कहूँगा ना मार्मिक, एक यथार्थ है जो हम सबको दीखता है रोज, हर कोने में ये मजबूरिया बिखरी पड़ी है, Orrisa में कभी १० kg चावल में बिकती १७ साल की लड़की के रूप में तो कभी delhi के बाहर के इलाको में सडको के devider में रात गुजरते मजदूरो के रूप में, ख़ुद में सोच के तकलीफ होती है की क्यों चाह के भी कुछ नही कर पाते उनके लिए, खैर आपको इस पोस्ट के लिए तारीफ नही बस धन्यवाद देना चाहूँगा, इश्वर आपकी कलम को लम्बी आयु दे,एक बड़ा तबका ऐसे बातो पे ध्यान नही दे पाता या देता. बहोत काम की है ये रचना.
    वैसे आपको पढ़ के एक और डॉक्टर याद आ जाते है farrukhabaad district UP से है डॉक्टर गौर, लेखन करते है वो भी,और उससे होने वाली सारी आय से गरीबो को निशुल्क दवा देते है, अपनी फीस तो उन्होंने कभी ली ही नही उनसे जो दे नही सकते, अद्भुत!!!
    आप भी उसी श्रेणी में है जरुर.
    बहुत बहुत शुक्रिया

    उत्तर देंहटाएं
  51. ''...........मै फ़िर अपनी आँखों पर चश्मा चढाकर एक मुस्कराहट जेट की उस खूबसूरत एयर
    होस्टेस को दे कर आँखे बंद करने की कोशिश करता हूँ ....'' ऊँ हूँ ये आदत अच्‍छी नहीं डा. साहब...
    इससे मरीजों के बढने का खतरा है... त्रिवेनी छू गई।

    उत्तर देंहटाएं
  52. जुदा है मेरे रास्तो से
    जिद्दी भी है ......मगरूर भी है थोडा
    यादो के टीले पर अक्सर तन्हा खड़ा मिलता है
    मुझसे मुख्तलिख एक शख्स........

    मेरे ज़ेहन मे आवारा सा फिरता है

    बहुत खूबसूरत लफ्ज़
    खूबसूरत अंदाज़

    उत्तर देंहटाएं
  53. यादो के टीले पर अक्सर तन्हा खड़ा मिलता है
    मुझसे मुख्तलिख एक शख्स........

    मेरे ज़ेहन मे आवारा सा फिरता है

    गजब की लेखनी है । सोचने लगता हूं तो सोचता ही रह जाता हूं

    उत्तर देंहटाएं
  54. खींच देता है दलीलो की लकीर
    हम दोनो के दरमियां
    उलझता है मेरी ख्वाहिशो से,
    टोकता है मेरी जुस्तजुओ को.........
    जुदा है मेरे रास्तो से
    जिद्दी भी है ......मगरूर भी है थोडा
    यादो के टीले पर अक्सर तन्हा खड़ा मिलता है
    मुझसे मुख्तलिख एक शख्स........

    मेरे ज़ेहन मे आवारा सा फिरता है


    speechlees neeraj jii
    aapke bhavo ki gahraai ko mehsoos karne ke liye us dard ke sagar mein utarna paregaa ..

    aapse parichay hona aaj ke daur mai khushkismatii hai.

    yakinan aapka lekhan or uske bhaavon mein gahra chintan or sacchaai hai.

    aapki profile mai jo photo hai bahot sudar or prabhavshali hai.

    उत्तर देंहटाएं
  55. यादो के टीले पर अक्सर तन्हा खड़ा मिलता है
    मुझसे मुख्तलिख एक शख्स........

    मेरे ज़ेहन मे आवारा सा फिरता है.

    ek to urdu apne aap mein hi itti khoobsoorat hai - jaanti bahut kam hun - na ke barabar - par uspe koi is andaaz mein un shabdon ko piro de to taarif ke liye shabd kam padte hain. humesha ki tarah hi aapne dil ko chune wala kuch likha diya hai. padhna to yeh isliye shuru kiya tha ki aapne ise 'mere dil ke kareeb' mein jagah di par padhke malum chala ki kyu di..

    उत्तर देंहटाएं
  56. "यादो के टीले पर अक्सर तन्हा खड़ा मिलता है
    मुझसे मुख्तलिख एक शख्स........

    मेरे ज़ेहन मे आवारा सा फिरता है"
    - aap likhte bhi hain..aisi gehraiyaan likhi bhi ja sakti hain.. yeh baat kisi tarah dil mein utarti hai, har baar jab kuch aapka likha padhti hun.. har bar shyd yahi kehti hun aur aaj fir keh rahi hun "aap behad khoobsoorat likhte hain".. dhanyawad.

    उत्तर देंहटाएं

कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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