2009-02-08

यू क्नो अवर ब्लडी समाज .....इमोशनल अत्याचार ओर जानेमन .....


भीड़ भाड़ भर उस मोहल्ले में जहाँ चारो ओर पंजाबी ही पंजाबी थे ओर उनकी ढेर सारी लड़किया .. इश्क से हमारी मुलाकात वही हुई थी ,उस पंजाबी मोहल्ले में रहने के दो बड़े फायदे हुए हमारी माँ को पंजाबी स्टाइल का राजमा बनाना आ गया ओर वही उन्होंने पंजाबी सांभर बनाना सीखा ...आलू के पराँठे में अचार का मसाला भर कर हम कभी कभी आज के पिज्जा ओर मेक्दोनल के बर्गर से उन दिनों मुकाबला करते थे ....
खैर इश्क के मौसम में इश्क पर आते है , ...साइकिल पे चलते इश्क से पहला टकराव हुआ ...तब हम कुल जमा ७ -८ साल के होगे ....नीचे वाले घर में ४ लड़किया थी बड़ी बड़ी..उनमे से एक थी शम्मी दीदी ।सबसे सुंदर....वो चश्मा लगाने के बाद ओर सुंदर लगती थी.....सफ़ेद रंग का उनका वो फ्रेम मुझे आज भी याद है..... कुल जमा ४ घर थे ..ओर बिल्डिंग की लड़कियों को जब भी बाहर निकलना होता .हम जैसे छोटो को पकड़ा जाता ....कई बार बड़ी कोफ्त होती ....आप कंचा ताड़ रहे होते .. या किसी घर आए मेहमान के लिए प्लेट में रखे ग्लूकोज़ के बिस्किट के आगे मुस्तैद रहते .. ओर आपको अचानक फरमान सुनाया जाता की समेट लो ....हमें समझ नही आता की शम्मी दीदी जाती है तो हमें क्यों अपने साथ ले जाती है...पर जब किसी दूकान पे कंचे वाली बोतल का नमकीन पानी गटकते तो शम्मी दीदी अच्छी लगने लगती......
उन छोटी -छोटी गलियों के मुहाने पर ढेरो ऐसे प्रेमी होते जिनका नाम इतिहास में दर्ज नही है ... .... एक साहब चौडी सी बेल बोटम पहने अक्सर गली के कोने पे साइकिल लेकर खड़े होते ..पास से गुजरते तो अक्सर कुछ न कुछ गाना सुनाते ...शम्मी दीदी दूर से उन्हें देखती ओर नीची नजरे करके तेजी से हमें घसीटते हुए ले जाती ....हम अचानक हुए इस गति परिवर्तन से अक्सर नाराज होते ओर अक्सर उन साइकिल वाले साहब को देर तक पीछे मुड कर देखते ...वे हमें आँख मारते....एक रोज हमने भी पलटकर मार दी...कई दिनों ये सिलसिला चला ....
उन दिनों हमारा प्रिय शगल कंचे था ..ओर जीत जीत के हम बिल्डिंग में एक खास सीक्रेट जगह उनको छिपा कर रखते ...दुनिया के दूसरे पिताओ की तरह हमारे पिता को भी कंचो से नफरत थी .... एक दिन हम जब अकेले अपने कंचे संभाले गली में से गुजर रहे थे , तो उन्ही साहेब ने हमें आवाज देकर बुलाया ...उस दिन हम हार के ग़मगीन लौट रहे थे ....उन्होंने एक ख़त ...ओर बड़े बड़े कंचे ... हमें दिए .... ख़त को हिदायतों के साथ थमाया गया छोटी सी जेब में कंचे बजाते हम घर की ओर चले .....तभी पिता श्री के लेम्ब्रेटा स्कूटर की आवाज सुनाई...पिता श्री के आने से पहले ही हमने उन्हें सीक्रेट जगह छिपाना था .. .कंचे बड़े भारी थे .... ...इश्क की गहराई तब हम समझते नही थे .......सो बिल्डिंग में घुसते ही ख़त हमने सामने खड़े शम्मी दीदी के पिता जी चमन अंकल को दे दिया ......
थोडी देर बाद जब हमारी ठुकाई हुई ओर सीक्रेट जगह का राज भी हमारे छोटे भाई ने पिता श्री के आगे खोल दिया...ओर हमारी अमानत ...हमारा खजाना .. सारे कंचे फेंके गए .... उस दिन हमें अहसास हुआ की ये ख़त भी खतरनाक चीज है....उस दिन के बाद से ना तो गली में बेल बोटम दिखी ओर कई दिनों तक हमने कंचे वाली बोतल भी नसीब नही हुई
कई दिनों बाद हमारा प्रमोशन हुआ ओर हमें बड़ी नीता दीदी के साथ ट्रांसफर कर दिया गया ओर हम रंगीन बर्फ के गोले खाने लगे ....नीता दीदी ऐसे एक साईकिल वाले के पास पहुंचकर ओर धीमी हो जाती ...वो फुसफुसा कर बोलता 'जानेमन " ...सुनकर वे आँख तिरछी कर देखती फ़िर मुंह दबाकर हंसती.....हम समझ नही पाते ..एक रोज हमने अपनी टीचर से इसका मतलब पूछा ... उन्होंने डांटकर डस्ट - बिन पर मुंह पर टेप लगाकर बिठा दिया ......हमने दिमाग की डायरी में दूसरा खतरनाक वर्ड नोट कर लिया
कुछ ही महीनो में नीता दीदी की शादी तय हो गयी .ओर उन्होंने सगाई होने की खुशी में हम सबने ऋषि कपूर की' कर्ज -मूवी" देखी ....एक संभावित प्रेम कहानी के क्रूर कत्ल के पाप का बोझ हम बरसो से अपने सीने में लिए घूम रहे है....
देव -डी रिलीज हो गयी है .... अभय देओल मुझे पसंद है ओर अनुराग कश्यप भी... ..अभय की . पहली पिक्चर 'सोचा ना था "खासी दिलचस्प थी .. उसी का एक डाइलोग था "यू क्नो अवर ब्लडी समाज " ....याद आ रहा है.......सामने .रिक्शा में लड़की चल रही है....ओर मोटरसाइकिल पे लड़का... उसे कार्ड देने की कोशिश कर रहा है ....इश्क का "एपिडेमिक" इस महीने खासा फैलता है .....संस्क्रति के लम्बरदार ओर उनके लठैत कितनी कोशिश कर ले ये "इमोशनल अत्याचार" रुकेगा नही.... ...कम्बखत . इश्क के सेल मगर मरते नही ... ..


आज की त्रिवेणी ...

कागज की पर्चियों को अब बेगारी भी नही मिलती
देर रात तक "एस.एम् एस " ही गुलाब तक ढोता है .......

ये इश्क भी इन दिनों कितना पेचीदा है

ओर अजित वडनेकर जी से मुआफी मांगते हुए जिन्हें ६- ७ महीने पहले "बकलम- ख़ुद' में लिखने के वादे को पूरा नही कर पाया ..एक तो कोई गौरवशाली अतीत है नही ...वर्तमान भी रफू करके जैसे तैसे काम चला रहे है... ओर जो फिल्टर करके थोड़ा बहुत निकला है वो पहले ही बाँट दिया....१४ फरवरी को अपनी सगी बीवी को साथ में घूमने -पिक्चर देखने में डर लगने लगा है ....वैसे १४ फरवरी को हमारी टेंशन दूसरे कारणों से होती है... अपनी एनिवर्सरी भी १४ को पड़ती है...


81 टिप्‍पणियां:

  1. ये इश्क होता ही कमबख्त है...खूबसूरत लगी मुहल्ले के दिनों की वो यादें. और त्रिवेणी भी लाजवाब. वैसे अब डरने की कोई बात नहीं है...आज बिदारी साहब का बयान आ गया है, बंगलोर में कोई किसी को वैलेंटाइन डे मानाने से नहीं रोक सकता. मैं तो फ़िर कहती हूँ...बंगलोर चले आइये

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  2. ये इश्क भी इन दिनों कितना पेचीदा है ...यह इश्क भी जितने रंग दिखाए उतना कम है .बहुत अच्छे अंदाज़ में आपने अपनी खूबसूरत यादे बांटी यहाँ और क्या बढ़िया दिन है शादी की सालगिरह का ..बधाई प्रेम दिवस पर ज़िन्दगी से नए अंदाज से रूबरू होने की ....और बकलमखुद पर लिख डाले ..बहुत सी बातें अभी भी आपके दिल के तहखाने में दबी होंगी ..उनको जरा वहां हवा लगवाइए :)

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  3. ये बचपन के मुहल्ले वाला प्यार बड़ा जालिम होता है. भुलाए नहीं भूलता :-) और ये क्यूट भी था.

    देवडी तो हमने देख ली. बोल्ड फ़िल्म है तो साथ ले जाने वालों का ख्याल रखियेगा जरा. हमारे साथ गए १० में से मुझे मिलाकर कुल २ को अच्छी लगी बाकी ने कहा बेकार. अब धीरे-धीरे पता चल रहा है की लोग इसलिए बेकार कह रहे थे क्योंकि साथ में एक लड़की भी गई थी ! कमाल है.

    बकलमखुद लिखने का अनुरोध ही कर सकता हूँ !

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  4. वाह ! लुत्फ़ आ गया बचपन से जुड़े इन किस्सों को पढ़कर।
    ज्यादातर आपकी पोस्ट पढ़कर मन भारी हो जाता है पर आज ठीक उलट हुआ ।
    और त्रिवेणी के क्या कहने लाजवाब थी !

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  5. Maza aa gaya anurag ji aur ab hume bhi samajh aa gaya ki pados ke didiyo ke sath bacpan mein hume kyon thela jata tha humesha :-)

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  6. hmm.....aaj subah jab online hokar dekha ki apne pasand ke blog likhne walo ne aaj bhi kuch nahi post kiya to kuch khali sa laga....par abhi abhi aapke aur kush ke blog par ek se hi naam wale post padhke chahere par fir muskan aa gai.... waise dono ki post alag hai aur majedar bhi ..... :)

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  7. आज का लिखा पढकर तो दिल हिलोरे मार रहा है। आँखे चमक रही है। पुराने दिनों की लहरें दिल से टकरा कर आ रही और वापिस जा रही है। सच्ची आज तो एक अलग सा आनंद आ गया। ये इमोशनल अत्याचार रुकेगा नही और इश्क के सेल मरेगे नही। चाहे कुछ भी हो जाए। वैसे अनुराग जी एक बात कहूँ अभी बहुत कुछ दबा हुआ उस दिल से बनी संदूक में, बस हाथ डालकर निकालने भर की मेहनत है। "बकलम- ख़ुद" में भी लिख डालिए।

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  8. yयूँ तो ब्लॉगवाणी पर गये थे अपना नया ब्लॉग ग़ज़लों के खिलते गुलाब जमा करने लेकिन चटका लगाके यहाँ आ गये और जो पढ़ने को मिला वह शायद अब तक सबसे लाजवाब लेख!

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  9. Anurag ji,
    Mai aapke blogpe kuchh kehne atee hun, aur padhneme itnee mashgool ho jaatee hun, ki kya kehnaa tha ye bhool jaatee hun !
    "Down the memory lane" ke tehet aap jo likhten hain, wo isqadar baandh leta hai ki phir maibhi apne bachpan yaa ladakpanme kuchh arsaa guzaar letee hun...aur triveni ke liye mere paas kabhi bhi shabd nahee rehte...maafee chahtee, hun, lekhikaa nahee hun, naa kavi...alfaaz kam pad jaate hain !

    Haan...yaad aya...poochhana chaah rahee thee ki aapne 39 vi kadee padhee yaa nahee ?(Duvidha maalikaaki).Ab mujhe pichhalee 3/4 kadiyonse faisalon kaa intezaar rahegaa...behad besabrise...jaise ki court me barson chala case khatm hone waalaa hai...nyaymoorti ki sunwaayee/aadesh jaaree hain...doosaree or ek adnaasi aurat apne jeevan muaaanaa letee huee,apne gunaah qooboolte hue, eqbaaliya bayaan de rahee hai..jobhi ho sazaa manzoor hai, faisala manzoor hai, kyonki pichhhale 35 saalonse wo ik muqadamaa ladte hue, hiraasat me band hai...

    Intee lambee tippaneese aap naraaz to nahee ?Aapki bohot izzat kartee hun.

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  10. इश्क के खेल को बहुत दिलचस्प अंदाज़ में प्रस्तुत किया है आपने...आप के किस्से लगते हैं जैसे अपने ही हों...मेरी समझ में हर सामान्य व्यक्ति के साथ कमो बेश इसी तरह के या इस से बहुत मिलते जुलते किस्से जीवन में होते हैं...अगर नहीं हुए तो समझिये वो इंसान किसी दूसरे ग्रह का है...
    अभय देओल का मैं भी फेन हूँ इसलिए देव डी मैंने कल देखी...अकेले...कोई यार दोस्त चलने को तैयार नहीं हुआ...हाल में भी बीस तीस लोग ही थे....इसलिए देखने में मजा आया...अपनी कोई टिपण्णी फ़िल्म के बारे में नहीं दूँगा क्यूँ की फ़िल्म की पसंद या नापसंद व्यक्तिगत होती है...आप देखिये फ़िर बात करेंगे.
    चौदह फरवरी को मेरे छोटे बेटे की भी शादी की साल गिरह है...उसके पास अहमदाबाद जा रहा हूँ...आप को आपकी शादी की वर्ष गांठ की अग्रिम बधाई देता हूँ...खुश रहिये.
    नीरज

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  11. आपकी ज़िन्दगी के एक टुकड़े से रु-ब-रु होकर अच्छा लगा...
    मीत

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  12. ye mausaam ke rukh tu badale badale seishq fiza mein ghulne laga hai:);),lajawaab,bas itana hi kehenge,haste haste pet dard ho raha hai.maza aagaya.vaise14 ko aapki sagi annversery ho doc saab to abhi se badhai.aur agar purane yaadon ki annversery ho tab bhi dhero badhai.valentine day ki bhi bahut mubarak baat abhi se aapko aur bhabhi ji ko bhi:)

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  13. असली आनंद आया डाक्साब्।कंचो के लिये हम भी पिटे हैं,और मेरे बाबूजी को तो पतंग और कंचो से सख्त नफ़रत थी।वैसे आपको अजीत भाऊ के सफ़र लिख देना चाहिया,शायद यादो के बंद पड़े खज़ाने से कोई कोहेनूर निकल आए। और आप की त्रिवेणी उसका तो जवाब ही नही,एस एम एस वाला आईडिया क्लिक कर गया है,अपना एक और किस्सा सामने लाने के लिये।बहुत अच्छा लगा आपको पढकर,हो सके तो संपर्क नंबर दे दिजियेगा कभी-कभार बात कर लेंगे।वैसे मै कल से मामाजी की लड़की की शादी के लिये अमरावती जा रहा हूं,उसकी शादी भी 14 को ही है।17 को वापस लौटूंगा फ़िर नियमित लिखूंगा,वहां भी लिखने की कोशिश करुंगा।

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  14. वर्तमान भी रफू करके जैसे तैसे काम चला रहे है... ओर जो फिल्टर करके थोड़ा बहुत निकला है वो पहले ही बाँट दिया..

    शानदार!

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  15. बचपन की छोटी छोटी बातों को, मीठी यादों को खूबसूरत अंदाज़ में समेट है.
    त्रिवेणी भी मजेदार है

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  16. पढ़कर मजे लिए अनुराग जी अब एक मजाक -इस वर्णन सरीखा एक चरित्र देव डी में भी है -लेकिन जब तक आप देखेंगे नहीं जान नहीं पायेंगे -इसलिए देख तो लीजिये मुझे अभयदान दीजिये ! अग्रिम !
    हाँ बच्चों को साथ मत लीजियेगा ! लाज से नजरे गड़ जाएँगीं !

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  17. बहुत ही दिलचस्प अंदाज़ लगा....आपके बचपन के किस्सों का....हमेशा की तरह

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  18. आजकल के मौसम के मुताबिक पोस्ट ।
    अनुराग जी आपके लिखने के style के कायल हो रहे है ।

    वैसे dev d के बारे मे जो अभिषेक जी ने कहा ठीक कहा है ।देखनी तो हमें भी है क्योंकि हमारे बेटों ने भी इस फ़िल्म की तारीफ़ की है ।

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  19. पंजाबी सांभर! ...मेहमान के लिए प्लेट में रखे ग्लूकोज़ के बिस्किट के आगे मुस्तैद! ... कंचे वाली बोतल का नमकीन पानी! ... ढेरों ऐसे प्रेमी, जिनका नाम इतिहास में दर्ज नही! ... दिमाग की डायरी में दूसरा खतरनाक वर्ड! ... इश्क के सेल!

    वर्तमान भी रफू करके जैसे तैसे काम चला रहे है...

    क्या बात है! क्या बात है!!

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  20. भई वाह.. डाक्टर साहब अब समझ में आया.. बचपन से खाद-पानी का साथ रहे तो इस उम्र में गद्य हो ya पद्य हिलोरें मारता ही निकलता है...
    आपने कंचे क्या याद दिलाये.. बहुत कुछ याद आ गया... आनंदम्.. आनेदम्... घोर आनंदम्....

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  21. बचपन में दीदी टाइप कन्याए हमे साथ नही ले जाती थी.. शायद उन्हे दूसरो से ज़्यादा हमसे ही ख़तरा रहा होगा.. बचपन से एक टाइप का सोफेस्टिकेशन मम्मी ने सेफ्टी पिन के साथ हमरे साथ बाँध दिया था.. इसलिए ना कभी कांचे खेल पाए और ना कभी पतंग उड़ाई.. लेकिन बचपन की रंगिनिया बरकरार रही..

    अभय देओल की फ़िल्मे मैने हमेशा दस बीस लोगो से भरे हाल में ही देखी है.. अनुराग अपना भी फ़ेवरेट है.. फिल्म मस्त है.. बोल्ड भी है.. फैमिली के साथ जाने की तो सोचना भी माना है.. फिल्म में पॉर्न दृश्यो से ज़्यादा पॉर्न संवाद ज़रूर मिलेंगे..

    कुछ नज़र अंदाज़ कर पाए तो ज़रूर फिल्म देखे..

    रही बात बकलम खुद की तो आपके जीवन के पन्ने कुछ तो मिले ही है आपकी ब्लॉग पर.. और एक साथ मिल जाए तो भी बढ़िया.. फ़ुर्सत मिले कभी तो लिखिएगा..

    अभी मैं चलता हू हरीश बैंड का पता करने.. अपनी शादी में वही बजाऊंगा...

    तौबा तेरा जलवा...... तौबा तेरा प्यार...

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  22. काफी स्वादिष्ट पोस्ट है डाक्टसाब....अचार वाले परांठे ने मुंह में पानी ला दिया।
    बकलमखुद के लिए माफी-वाफी मत मांगो डॉक्टर...हम बड़े धैर्यवान हैं। पल्लवी ने तो प्रमाणपत्र भी दिया है हमें। वैसे भी जब प्रमोदसिंह और अनामदास का नाम हमने अभी तक लिस्ट से नहीं काटा है तो आपको अभी से शर्मिंदा होने की ज़रूरत नहीं है:)

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  23. इश्क मुश्क के किस्से तो खैर...क्या कहें मगर बचपन की दिनों की यादें रह रह कर लौटी...दुनिया के दूसरे पिताओ की तरह हमारे पिता को भी कंचो से नफरत थी .... :) हमारे तो सारे कुऐं में फैंक दियेग ये थे सीक्रेट जगह से पकड़ाने के बाद..रोज रात में गिन कर सोते थे और सुबह फिर गिनते थे.

    बेहतरीन आलेख.

    कागज की पर्चियों को अब बेगारी भी नही मिलती
    देर रात तक "एस.एम् एस " ही गुलाब तक ढोता है .......

    ये इश्क भी इन दिनों कितना पेचीदा है


    -क्या बात है..बहुत उम्दा ऑबजर्वेशन है भाई.

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  24. हा हा हा......लाजवाब इश्क्नामा.......हँसते हँसते पेट में बल पड़ गए......

    यह बहुत सही कहा आपने....
    ""१४ फरवरी को अपनी सगी बीवी को साथ में घूमने -पिक्चर देखने में डर लगने लगा है ...."'

    ........वैसे १४ फरवरी को हमारी टेंशन दूसरे कारणों से होती है... अपनी एनिवर्सरी भी १४ को पड़ती है...

    चलिए यह तो अच्छी रही......वसंत/प्रणय दिवस को ही विवाह दिवस बना आपने इसे अमरत्व प्रदान कर दिया.....सालगिरह की अग्रिम बधाई...

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  25. bahut khub. bahut dino baad aapko padha. aapki shaili bahut rochak hoti hai. achha likha hai.

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  26. बहुत दिनों बाद खालिस "अनुरागाना पोस्ट " पढ़ी वरना पिछली कई पोस्ट आप बड़ी बड़ी भारी भारी लिख रहे थे ,कम लिखे में ज्यादा कह कर सरक जाते थे .आजकी आपकी पोस्ट का शीर्षक पढ़कर हमें लगा था आप कोई अपनी दास्ताँ सुनायेगे .पर किस्सागो तो आप है ही सीधी -सादी बात को भी ऐसे बताते है की वो भी एक किस्सा सा लगने लगती है
    ओर ये कहना
    "एक तो कोई गौरवशाली अतीत है नही ...वर्तमान भी रफू करके जैसे तैसे काम चला रहे है... ओर जो फिल्टर करके थोड़ा बहुत निकला है वो पहले ही बाँट दिया...."
    सुभानालाह कुछ न कहने का बहाना ही है .अब भी आपके पास कई कोहिनूर यकीनन होगे. ओर हाँ त्रिवेणी

    कागज की पर्चियों को अब बेगारी भी नही मिलती
    देर रात तक "एस.एम् एस " ही गुलाब तक ढोता है .......

    ये इश्क भी इन दिनों कितना पेचीदा है

    सुपर्ब. .

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  27. घणा नोश्टाल्जिया है।
    पोस्ट का शीर्षक जरूर अजदकीय है!

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  28. shayad aaj ki peedhi ke paas aisi isk ki kahaniya nahi hongi kyun ki workd virtual ho gaya hain. hai na?

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  29. लाजवाब! किस्सागोई और शब्दों से चित्र खींचने में आप बेजोड़ हैं।

    बधाई। वेलेण्टाइन की शुभकामना। सगी बीबी के साथ घूमने के लिए कोई और दिन चुनना चाहिए। इस दिन तो घर में ही रहना ठीक है।

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  30. डाक्टर यार मजेदार लिखा है. अफ़सोस की थोड़ा ही लिखा है. दो-चार एपिसोड और लिख डालो. नहीं तो बकलम पर ही तफसील से लिख दो भाई.

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  31. Bachpan ki yaade humesha hi yaad rahti hai...
    aapne lajwaab tarike se in yaado ko likha hai...
    maza aa gay...

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  32. अरे ? कोई मिलीभगत है..क्या
    क़ाफ़ी वाले कुश और त्रिवेणी वाले डा. अनुराग
    दोनों एक साथ ही देव-डी का शिकार हो गये ?

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  33. सच कहें ये गली मुहल्ले के आशिक ही इतने संजीदा होते हें, इतना वक्त निकाल देते हें नुक्कड़ पर खड़े होने में। जबकि उन्हें पता होता है की कोई शरीफ लड़की उन्हें भाव नही देने वाली। पर वो हार नही मानते! जाने किस मिटटी के बने होते हें।

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  34. बात को इतने खूबसूरत तरीके से बयान करना बस आप के बस का है।

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  35. वर्षा जी काश वो इतने समझदार होते की नुक्कड़ पर खड़े न होते ....तो क्या पता हसीना मान जाती .....अब माशूका के दीदार के लिए शायद ऐसा करते हों

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  36. एनिवर्सरी और वेलाइंटीन डे दोनों एक साथ। बधाई हो। सुलेमान खतीब के शेर का एक मिसरा याद आया-
    क्या क्या मज़े है यारो हर-हर जगह घुमाना...
    बधाई हो:)

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  37. आज मन कुछ उदास सा था पर आपकी पोस्‍ट के शुरुआत के शब्‍द-पंजाबी...लड़कियाँ...इश्‍क... पढते- पढ़ते चेहरे पर मुस्‍कुराहट आ गई...समझ गई आज अनुराग जी
    मूड में हैं...अच्‍छा लगा आपका बचपन...!!

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  38. डॉ साहब.. नासमझी ्में आपने बेचारे का घर बनाते बनाते उझाड दिया...आप कंचों में ्खो गये और बेचारे की "कांची" खो गई.. बहुत नाइंसाफी है..:)

    वैसे त्रिवेणी में सारा दर्द आ गया..

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  39. बहुत ही सुंदर आलेख रहा. बचपन के संस्मरण बड़े ही रोचक ढंग से व्यक्त किए. बहुत अच्छा लगा. आभार.

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  40. बचपन के खूबसूरत दिन ? भाई जा चुके हमारे हाथ से तो. अब कहां से लायें ? :)

    त्रिवेणि जोरदार.

    रामराम.

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  41. सुन्दर। सबेरे से पढ़ नहीं रहे थे कि आखिर में रोना आयेगा। :)
    लेकिन जी कड़ा करके आज ही पढ़ गये। शानदार। मजेदार। मजा आ गया!

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  42. ye hui na baat...aaj ki post tou lagta hai aapne bahut fursat mein likhhi hai...jaise bahut saari yaadon ki tahon ko ulat palat kar chun ke likhhi ho :)

    post padd kar na jaane kyun JS ki ye ghazal yaad aa gayi....

    Phir se mausam baharon ka aane ko hai
    Phir se rang-e-zamana badal jaayega

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  43. आपके अनुभव पढ़े। वाकई इश्क नहीं आसाँ। बढ़िया लेख के लिए आभार डॉ साहब। आपकी लेखनी यूँ ही हमें रोमाँचित करती रहे। मैं वैलंटाईन डे को नहीं मानता और न ही इसे ज़रूरी मानता हूँ इसीलिए इस अंग्रेज़ी "ग्रहण" की बधाई देना उचित नहीं मानता हूँ और रही आपकी लेखनी की बात उसका तो मैं कायल हूँ ही।

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  44. क्या बात है अनुराग जी, बहुत सही लेख लिखा, मजा आ गया, हम ने भी देखे है ऎसे कई किस्से,
    धन्यवाद

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  45. aap jo likhte hain wo dil se likhte hain. saaf saaf dikhta hai. aapne jo bhi patra dikhaye wo humein saaf saaf ekdam live dikhte hain.
    Aur rahi baat Dev D ki, jee humne dekh daali hai aur aap bhi dekh len. Sharatchandra ke patron se khatarnaak patra hain yahan par. Abhay deol ke hum bhi fan hain. 'Oye Lucky, lucky oye' bhi jaroor dekhen :)

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  46. ह्म्म्म्म...आज समझ में आया मेरे भाई को बड़े लड़कों के साथ क्रिकेट खेलने का मौका और उसकी जेब कंचों से भरी होने का कारण.......
    डाक्टर साब! अगले पोस्ट का इंतज़ार रहेगा जब आप बेलबाटम पहन किसी लड़के को डाकिया बनाने के लिए कंचे की घूस दे रहे थे :-)

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  47. रोचक दास्ताँ. अब कंचे खेलने का तजुर्बा तो हमें भी है...

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  48. गली मुहल्लों के नुक्कड़ पर पलने वाले भारतीय इश्क के विभिन्न रूपों का अत्यन्त की मनोहारी रेखाचित्र। लगता हैं डॉक्टर साहब ने रोग के साथ इश्क की भी नब्ज़ पकड़ ली हैं। इश्क के माह (फरवरी ) में इश्क रंग भरने के लिए साधुवाद

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  49. इमोशनल अत्याचार तो बहुत ही इमोशनल था, रूलायी ही नही रूक रही। त्रिवेणी भी मजेदार थी और आप रफ्फू के काम में भी सिद्धहस्त दिखते हैं। सालगिरह की अग्रिम बधाई और शुभकामनायें अभी से स्वीकार कर लें, १४ तारीख का कुछ पता नही हो सकता है रामसेने ने उसके लिये भी मुसटंडे बैठायें हों।

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  50. " इश्क की सुनहरी यादे बेहद रोचक लगा जिन्दगी की इस अनछुए पहलू से रूबरू होना. अंदाज तो कमाल है ही....शब्द जैसे बोलने लगते हैं.."

    regards

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  51. इमोशनल अत्‍याचार पर युवाओं का मौलिक अधिकार है, इसपर कोई कैसे रोक लगा सकता है।

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  52. emotional अत्याचार की फिलॉस्फी सही है ,त्रिवेणी भी समकालीन है, बढ़िया

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  53. bahoot achha likhte h aap, bahoot umda tarika s apni bat kahte h aap.
    bahoot -2 badhai shadi ki shalgirah ki. or eshak k sare tarike badal gaye h tabhi shyad sagi bibi k sath nahi ja sakteh

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  54. पहली बात तो हम ये नही समझ पा रहे कि आपकी नादानियो पर हँसें या शम्मी दीदी की अधूरी प्रेम कथा पर रोयें......! खैर मैं तो इतने सारे बड़े और छोटों की छत्रछाया में रही कि कि दुनिया कि इन सब चीजों का पता ही नह चला।

    हाँ वैलेंटाईन डे बहुत धूमधाम से मनाती हूँ, पूरे रिचुअल्स के साथ.....एक तो हमारी दीदी की शादी की वर्षगाँठ होती है इस दिन तो हमें विथ फेमिली रेस्टोरेंटिंग करने का मौका मिल जाता है। फिर मेरे दोनो भतीजे इस दिन मुझे विशेषतया विश करते हैं, जिनकी मैं पहली गर्लफ्रैंड हूँ.....! मुझसे ७ साल छोटा मेरा छोटा भतीजा हर बार एक नई मित्र के साथ टहलता हुआ मुझे फिर से कहता है " विल यू बी माई वैलेंटाइन" और फोन पर पीछे से एक बालिका की खिलखिलाहट गूँज जाती है। उसे इस वैलेंटाईन से कोई समस्या नही होती। फिर थोड़े दिन बाद उनके भतीजे से भले रिश्ते खतम हो जायें मेरे पास फोनिंग चलती रहती है। पिछली बार मेरे कज़िन ने पैर छू कर एक लाल गुलाब दिया और "हैप्पी वैलेंटाइन डे दीदी" झिझकते हुए दिया तो मन नेह से उमड़ आया...प्रेम को, इतने प्यारे शब्द को इतने प्रतिबंधों की ज़रूरत है क्या....! कहीं हम खुद ही तो नही बहुत संकुचित कर दे रहे इस शब्द को...!

    फिलहाल खुश हूँ कि मुझे देने वाले ने कबीर के ढाई आखर का सही स्वरूप दे दिया है.....! बाकि कुछ दिया या नही ...शिकायत नही...!

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  55. एनिवर्सरी की एड़वांस बधाई के साथ, इ इमोशनल अत्याचार के साथ तो हरकोई इमोशनल हुआ जा रहा है अब कहीं येहमको इमोशनल न करदे उससे पहले अपने यहां से डिस्अपीयर हो जाते हैं।

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  56. बकलमखुद में आपके बारे में पढ़ना अच्छा लगेगा ,जरुर लिखे,अभी से शादी की सालगिरह की बधाई . आपकी हर पोस्ट बेहतरीन होती हैं ,बहुत अच्छी पोस्ट के लिए बधाई

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  57. आलू के पराँठे में achaar का मसाला - ग्लूकोज़ के बिस्किट-- रंगीन बर्फ के गोले -----बचपन की यादों से ले कर...''त्रिवेणी के इश्क की पेचीदिगियों'' तक का सफर बहुत ही रोचक लगा.
    इस बार एक अलग रंग में रंगी है पोस्ट..लगता है बदलते मौसम का असर है..

    [ ख़ास दिन--१४ तारिख -आप की शादी की वर्षगाँठ [एडवांस में]-आप दोनों को बहुत बहुत मुबारक हो.]

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  58. Ishq ki daastaan hai pyaare..
    Apni apni zubaan hai pyaare...

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  59. बचपन की मुहब्बत को दिल से.......

    बहुत लज़ीज पोस्ट डाक्टर साब,कई कहानियां याद दिलागय ी

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  60. अच्छा खाका खींचा है आपने अपने बचपन की यादों का...कई बार ऐसा लगा जैसे आप अपने बारे में नहीं बल्कि मेरे बारे में बात कर रहे हैँ।

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  61. इश्क के सेल मगर मरते नही ... ..
    जिस दिन ऐसा हो गया.....कयामत आ जाएगी... हम तो मानते है प्रेम ही सत्य है....!

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  62. मोहल्लों में प्रेम कहानियां कभी कंचों,कभी किताबों और कभी ट्यूशन के सहारे ही फलती फूलती हैं.....कंचे छुपाने की जगह तो हमने भी बनायीं थी लेकिन न जाने कैसे विरोधी गुट को हमेशा पता चल जाता था तो हमने उन्ही के घर में छुपाना शुरू कर दिया था!उसके बाद कभी कंचे चोरी नहीं गए!

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  63. बडा मजेदार किस्‍सा था लेकिन थोडा छोटा था। आपकी हिस्‍सेदारी केवल कंचो तक ही खतम हो गई इसका अफसोस है।

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  64. कमबख्‍त यादें फिर याद आ गईं। चूहा दौड़ में फंसकर खो गई यादों से रू-ब-रू करा दिया आपने। सचमुच बहुत खराब हैं आप।
    चौदह फरवरी की अग्रिम बधाई स्‍वीकारें।

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  65. आपकी असली जीवनसंगिनी हमारी असली भाभी के साथ आपके विवाह की वर्षगांठ पर अग्रिम बधाईयां.

    मैं कंचे कभी नहीं खेल पाया, किन्ही कारणों की वजह से. आज वह पीडा़ फ़िर से उभरी है आपके बचपन की यादों में.

    मगर हमनें भी दीदीयों की चाकरी की है. संयोग ही कहिये, जया भादुरी (बच्चन) घर के पीछे रहती थी, और गीतांजली (डा. शंकरदयाल शर्मा की पुत्री)के साथ हमारे कालोनी के पोस्ट ओफ़िस पर हमें एक दो और छोटूओं के साथ ले जाती थी भोपाल में तालाब के किनारे, जहां उनके मित्रों के साथ वे बतियाती थी और हमें भी बैठे रहना पडता था,कंचे खेलते हुए.एक दिन शर्माजी नें पकड लिया, घर पर रिपोर्टिंग हुई. हमारे कंचे गये, और मन ही उखड गया.

    यादों की बारात जब निकलती है तो क्या क्या याद आता है, और मन कभी उल्ल्हासित तो कभी ग़मगीन हो जाता है.

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  66. बडी ही पुरानी यादें बांट रहे हो भई। मुंह पर टेप तो मेरे भी बंधा था क्लास में........ज्यादा बातें करने के लिये :)

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  67. yun to aapki har post pe itni tippni hoti hai ki aapki tariif mein kuch kahna suraj ko roshni dikhane ki baat hai..
    isliye hum sirf padh lete hai tariif mein kuch nahi kahte par iska ye matlab bilkul nahi hai ki
    aapka andaj-e-bayan aam hai
    yakinan aapki prastuti bejod hai

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  68. डाक्‍टर साहब जी आपने हमें भी कुछ समय पहले ही बीते हुए दिन याद दिला दिए और वो गाना गाने को भी दिल कर रहा है
    कर दे मुश्किल जीना इश्‍क कमीना
    इश्‍क कमीना
    इश्‍क कमीना
    इश्‍क कमीना
    इश्‍क कमीना
    इश्‍क कमीना

    आगे आता नहीं है वरना पूरा ही गा देता

    अच्‍छा लिखा कोटि कोटि धन्‍यवाद

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  69. शब्दों से आपने जो चित्रकारी की है........अच्छी लगती है......
    लगा मानो जैसे शम्मी दीदी के साथ आप नहीं हम हों.......
    कंचे हमे कभी खेले नहीं हैं.......हमारे टाइम तक outdated हो चुके थे
    सोंचते हैं किसी बच्चे को पकड़ के सीखेंगे कभी.

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  70. आपकी वैवाहिक वर्षगाँठ पर आप दोनों को सुखद जीवन की असंख्य मंगल कामनाएँ।

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  71. डॉक्टर साहब
    सबसे पहले सालगिरह कके अवसर पर बधाई | दालान में बैठे तो मुखिया जी ने आपके ब्लॉग का पता बताया | वाकई एक बहुत उम्दा ब्लॉग को मिस कर रहा था | वैसे आपका इश्क का शुरुआत बड़ा दिलचस्प हुआ | कंचे खेलने के दिनों से ही आप आँख मारने की ट्रेनिंग ले लिए थे :) |

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  72. हा हा डा॓. क्या बात कही आपने! बचपन के सारे मोहब्बती लफ़ड़े, बाआबोहवा बयानोअयाँ कर डाले | मज़ा आ गया पढ़ कर और बहुत बड़ा संदेश जो आप देना चाहते थे बखू़बी हासिल हुआ| त्रिवेणी भी हमेशा की तरह लाजवाब|
    डा. साहब एक बात और जो हमने देखी है जिन भी ब्लॉगों में ये जुगनू तैरते हैं वो बहुत धीमे चलने लगते हैं शायद, राज भाटिया जी आदि सबने हटा लिया आप भी ऐसा ही करें तो बेहतर हो शायद |
    ---आग्रहपूर्वक आपका मुरीद बवाल

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  73. आपने दिलचस्प यादें बाँटीं हैं.प्रेमिका का पत्र उसके पिता को देने वाली घटना और भी मजेदार रही.

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  74. Jadugar ye kya likha.....Emotional Atyachaar.... http://idiva.com par maine bhi pramod Muthalik ko ek comment de mara. Chaddi to nahi de paya.... Yaar aapke post ke saath aapke yaha ke comment bhi khase majedar hote hain.... Is naukri ne to meri batti bana di hai... Aaaj BUDGET khatm hua to thodi chain mili hai.... Missing your post doctor

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  75. कभी नहीं से देर भली!! कृपया देर से आने के लिये क्षमा करें और अब वर्षगांठ के लिये भरपूर बधाईयां एवं शुभकामनायें स्वीकार करें!!

    अब आते हैं कहानी की ओर (एक संपादक-पाठक के नजरिये से) -- आप के लेखन में आपकी एक विशिष्ठ शैली दिखती है. यह शैली कहानी को एकदम जीवंत बना देती है. मै तो काफी समय तक अपने बचपन में लौट गया था.

    ईश्वर करे कि आप लिखते रहें, छापते रहें!!

    सस्नेह -- शास्त्री

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  76. इश्‍क का वो खुमार और उसे उस उम्र में देखने का अंदाज।

    और अंदाजे बयां।

    वाह वाह....

    बहुत सुंदर।

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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