2019-02-06

तुम्हारा खुदा किसी गैर आबाद इलाके में रहता है

वे पूछती है पांचो वक़्त नमाज पढ़ने वाले आदमी को कैंसर कैसे हो सकता है ?उन्होंने तो ज़िंदगी में कभी किसी का बुरा नहीं किया ?
मै उन्हें क्या जवाब दूँ।
मेरे पास कोई जवाब नहीं है.
आदमी जब गम में होता है तो उसे जवाब की तलाश होती है !
खुदा पे एतबार करने वाला अपनी नेकी बदी का हिसाब टटोलने लगता है।कितने कुर्तो की जेबी में उदासी छुपी हुई है। बूढी उदासी ,जवान उदासी !कुछ उदासियों से मुकाबला किया जा सकता है ,कुछ से नहीं।
कोई पूछता है "साइंस दानो के रहते उदासी को ख़त्म करने की कोई दवा ईज़ाद नहीं हुई "?
मेरे पास इसका भी जवाब नहीं है !
मेरे एजेंट मुझे बीमे की तारीखों को गिनवाता है मार्च का महीना है। हमने अपनी अपनी तसल्ली के लिए इंतज़मात कर रखे है।
उसकी बोसीदा सी डायरी को देख मेरा मन करता है मै उससे कहूं के वो इसे बदल ले, पर कहता नहीं।
बहुत सी बाते कभी कही नहीं जाती ! वे भीतर ही रह जाती है। सर्दियों में एक दफा कॉलेज से घर आते लौटते ट्रेन में सामने वाली सीट पर बैठी किसी उम्र दराज महिला ने रात में मुझ पर अपना कंबल डाल दिया था ,मै उन्हें जानता नहीं था। सुबह आँख खुली थी वो बैठी हुई थी।
मुझे तो नींद नहीं आती ,बैठना था सो "
वे बोली थी।
मैंने कोशिश की थी के मेरे शुक्रिया में उन्हें मेरी आवाज के भीगने का इल्म ना हो पता नहीं मै कितना कामयाब हुआ था या नहीं। उस रोज घर लौटकर बस मै मां से लिपटा था।

2019-02-04

कोई क्यों होता है अपने जैसा ! क्या उसके इख़्तियार में होता है वैसा होना !!


तुम्हारी हंसी की आमद मेरी ज़िंदगी में पहले हुई थी .तुम्हारी हंसी उजली थी उसमे एक खनक थी। पोस्ट ऑफिस के बाहर तुम रेड स्कर्ट में अपनी सहेलियों के साथ खड़ी थी मै एडमिशन की फोर्मल्टी करने के लिए कुछ फॉर्म भरने और कुछ टिकट खरीदने आया था। कमर तक लम्बे बाल और तुम्हारे चश्मे की रेड फ्रेम , सब कुछ तो खूबसूरत था।
तीन दिन बाद सबसे अगली बेंच पर संजीदगी से नोट्स बनाती लड़की को देखा तो हैरानी और ख़ुशी हुई ,
तुम मेरे बैच में थी !
तुममे में बस एक ऐब था !
तुम पढ़ने में अव्वल थी !
बेहद संजीदा !
मेरी फितरत में आवारगी थी। सलीके की कभी आदत नहीं रही हॉस्टल की सोहबत ने कुछ और हुनर जोड़ दिए । मै शायद तुम्हारे लिए "अननोटीसेबल " था  .मै तुम्हारे ड्रेसिंग सेन्स का कायल था। उसने मेरा फलसफा तोडा था के ज्यादा पढ़ने लिखने वाली लड़किया फैशनेबल नहीं होती। तुम अपने आप को एलीगेंटली कैरी करती ! एक दफा सेकण्ड ईयर में पैथॉलजी लैब में तुम्हे इतना नजदीक पाकर मै नर्वस हो गया था ,तुम्हारे कानो में बड़े बड़े गोल ईयर रिंग थे। मै उन ईयर रिंग से बचने के लिए नीलम से सवाल पूछने लगा था !
और उस रोज हॉल में पहुँचने से पहले मैंने और रोशन ने धड़ाधड़ कई सिगरेट फूंक डाली थी। भागते दौड़ते हम अँधेरे में पहुंचे ,खाली सीटों में किसी तरह पहुँचने तक मेरे दिल की धड़कन तेज हो गयी थी ,मुझे तुम्हारी बगल में बैठना था
या खुदा !
नीलम ने एक दफे कहा था तुम्हे "सिगरेट" की स्मेल से "एलर्जी "है और मेरी जैकेट में सिगरेट जैसे उस रोज बसी हुई थी। मैंने रोशन को लगभग उस सीट की और धकेला था। तुम्हे शायद उस स्मेल ने परेशान कर दिया था ! तुम कितनी देर तक अनमनी सी रही। मुझे एक दो दफा गुस्से से देखा था
मै तुम्हारे लिए अब भी "अननोटीसेबल" शै था !
मै अपनी हदे जानता था !

उस रोज शदीद बारिश थी ,सुबह से गिरनी शुरू हुई थी। मै सिगरेट लेकर लौट रहा था ! तुम अपने स्कूटी के साथ खड़ी थी .तुमने ब्लैक सूट पहना हुआ था। उस पर वो लाल दुपट्टा जिस पर तुम कभी कभी बिंदी लगाती थी ,बड़ी सी !बड़ी बिंदिया मुझे पसंद थी ,अब भी है !
इत्तेफाकों के शायद कुछ सबब होते हो। जाने क्यों मै रुक गया था।
तुम्हारी स्कूटी को चेक करने !
मैंने बस यही दुआ की थी के ये स्कूटी स्टार्ट ना हो !
उस रोज खुदा मेरे साथ था
स्कूटी स्टार्ट नहीं हुई। मैंने तुम्हे हॉस्टल तक छोड़ने का ऑफर किया था
मैंने आहिस्ता आहिस्ता मोटर साइकिल चलायी थी मै उस लम्हे को जैसे रोक देना चाहता था !तुम पूरा भीग गयी थी ,बैठे हुए काँप रही थी शायद तुम्हे ठण्ड लग गयी थी मै तुम्हे महसूस कर सकता था मुझे अफ़सोस हुआ के मैंने खामखां तुम्हे बारिश में रोक के रखा ! हॉस्टल पहुंचकर भी तुम एक मिनट तक बाइक से उत्तरी नहीं तुम काँप रही थी।
हॉस्टल की उस चारदीवारी से मै कैसे बेदम होकर निकला था उस रोज !
अपने रूम में पहुंचकर अहसास हुआ मेरा सिगरेट का पैकेट तुम्हारे पास रह गया है। तुम्हे सिगरेट से कितनी नफरत थी
उस रात मै देर तक सोया नहीं था क्या सोचती होगी तुम मेरे बारे में
सुबह आँख देर से खुली थी रोशन मुझे उठाने आया था स्टेशन तक छोड़ने के लिए ! पापा को पैरालिटिक अटैक पड़ा था अगला एक महीना हॉस्पिटल और उसके बाद के दो महीने तकलीफ देह थे। पापा कुछ बोल नहीं पाते थे इशारो से बात करते थे। यूँ तो घर का बड़ा बेटा पहले भी था पर अचानक से बड़ा हो गया था। मां एक दम उदास हो गयी थी ,छोटी भी अचानक से सहम गयी थी ,मुझसे लड़ना छोड़ दिया था। पापा की वजह से मैंने पूरी इंटर्नशिप इसी शहर में लेने की रिकवेस्ट डाली जो खास केस की वजह से मंजूर हो गयी थी।
तकरीबन दस महीने बाद हम नार्मल हुए थे जब पापा बोलने और बिना सहारे के चलने लगे थे। चाचा के यू इस ए से के लगातार कई फोन से मुझसे पहले पापा कनविंस हुए थे। मैंने यू इस एम् ली दी थी। तुम्हारे बारे में दो चार लोगो से दरयाफ्त किया था। किसी ने बताया तुम भोपाल में हो ,कम्पीटिशन की तैयारी में हो। तुम्हार फोन भी हासिल हुआ था पर कभी कर नहीं पाया!
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आज यहाँ शदीद बारिश है ,सुबह से गिर रही है ! अपने वतन से दूर रहने वाले कुछ बाशिंदो ने एक रेडियो चैनल बनाया है। कार में हूँ ,रोजाना 25 किलोमीटर ड्राइव करता हूँ। अरिजीत सिंह जैसे रकीब बन गया है।
"जान जाती है जब उठकर जाते हो तुम
एक तलब सी सीने में उठी है !
तुम बेसबब याद आयी हो !
मैंने कार को किनारे लगा दिया है सिगरेट ढूंढ रहा हूँ।
कोई किसी को चूम रहा है !
"खुदा तुम्हे खुश रखे "


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कोई क्यों होता है अपने जैसा ! क्या उसके इख़्तियार में होता है वैसा होना !!
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तुम बेतरतीब बालो में अच्छे लगते थे ,जब कभी उन्हें तरतीब करके क्लास में आते मेरा मन करता उन्हें बिखेर दूँ। खास तौर से ग्रीन सी वो बढ़ी दाढ़ी तुम पर सूट होती। तुम पर क्या फबता है तुम्हे इल्म नहीं था ना तुम्हारे दोस्त तुम्हे कभी बताते। तुम्हारी डार्क ब्लू शर्ट भी मुझे पसंद थी। पता नहीं तुम मुझसे इतना खौफ क्यों खाते थे। एक दफा सेकंड ईयर में पैथोलॉजी स्लाइड्स देखते वक़्त तुम मेरी बगल में थे फिर भी बाबत नीलम से पूछा। नीलम को कभी कुछ मालूम था ,वो मुझसे पूछती फिर तुम्हे बताती। मै भी बेवकूफो की तरह उसके सवालों का जवाब देती रही। गुस्सा तो बहुत आया था। दूसरी मर्तबा हमारी पूरी क्लास फाइनल इयर में मूवी देखनी गयी थी। तुम्हारी सीट से इत्तेफ़ाक़ से मेरे बगल में आयी थी। मुझे बैठा देख तुम जैसे हड़बड़ा गए थे फिर तुमने रोशन को मेरे बराबर में बैठा दिया था। 
रोशन जिसे लगता था क्लास की सारी लड़किया उस पर मरती है। । मेरा सारा मूड ख़राब हो गया था ,सर दर्द में मैंने वो मूवी देखी थी। गुस्सा इतना आ रहा था के तुम्हारे कॉलर पकड़ कर झापड़ रसीद कर दूँ "समझते क्या हो तुम अपने आप को "
मैंने तय कर लिया था तुम्हे अब इग्नोर करुँगी। वैसे भी मेरे अलावा मेरे दिल का हाल कौन जानता था और तुम्हे पसंद करने वाले थे ही कितने लोग
एक वो सेकण्ड ईयर की जूनियर जो हमेशा जींस पहने रहती ऊपर से शर्ट का पहला बटन खुला रखती। हाँ मानती हूँ वो स्मार्ट थी पर उसमे अक़्ल कितनी थी !
उस शहर में बारिश बहुत होती थी पर उस रोज उसके मिज़ाज़ से ज्यादा हुई थी कॉलेज के अंदर आते वक़्त मेरा स्कूटी बंद पड़ गया था तुम ना जाने कहाँ से वापस आ रहे थे। अमूमन ना रुकने वाले जाने क्यों उस रोज मुझे देखा रुक गए थे स्कूटी में उलझने से पहले तुमने हिचकते हुए अपने हाथ से "सिगरेट का पैकेट" मुझे पकड़ाया था बारिश में भीगते हुए तुम मेरी स्कूटी से उलझे रहे थे !
मेरा सारा गुस्सा काफूर हो गया था
मैंने उस वक़्त दो ही दुआ की थी
एक मेरी स्कूटी स्टार्ट ना हो
दूसरी बारिश बंद ना हो
अजीब बात है ऊपर वाले ने मेरी दोनों बाते सुन ली थी।
तुमने ग्रीन कलर की टी शर्ट पहनी थी जिसमे ब्लू स्ट्रिप्स थी। कुछ देर जूझने के बाद ,
"मै आपको हॉस्टल तक छोड़ देता हूँ "तुमने कहा था
आज भी सोचती हूँ सबको "तुम" बोलने वाले तुमने मुझे "आप "क्यों कहा था
तुम मुझे पीछे बैठा कर हॉस्टल तक छोड़ने आये थे। पहली दफा मुझे अफ़सोस हुआ के कॉलेज के गेट से हॉस्टल का रास्ता इतना कम क्यों है
तुम अंदर तक छोड़ने आये थे। मै पागलो सी तुम्हारी मोटरसाइकिल रुकने के बाद भी एक मिनट तक बैठी रही थी। मैं तुम्हे "थैंक क्यू" भी नहीं कह पायी थी ! तुम्हारा सिगरेट का पैकेट मेरे हाथ में रह गया था। मुझे लगा तुम उसे वापिस लेने लौटोगे। पर तुम आये नहीं। शायद तुम्हे लगा होगा कही गिर गया है।
पता नहीं तुम कहाँ गुम हो गए थे उसके बाद !
मैंने एक हफ्ते तक वो अपने पास छिपा कर रखा था अपनी रूम मेट्स के हाथ लगने तक। उसने "स्मोकिंग" की बाबत जाने क्या क्या लेक्चर दिए थे मुझे ! उसके बाद से इंटर्नशिप शुरू थी अलग अलग जगहों पर पोस्टिंग। मैंने भी दूसरी लड़कियों की तरह घर के पास पोस्टिंग ली थी।
तुम मुझे कभी नहीं मिले !
इत्तेफ़ाक़ से भी नहीं !!
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आज भी बारिश है ! ऊपर से फरीदा खानम गा रही है "जान जाती है जब उठकर जाते हो तुम "
सचमुच जान जाती है।!
लिखने वाले ने मोहब्बत में ही लिखा होगा ,
कम्बखत बड़ी बुरी शै है !!










2016-07-31

Dcember notes part 2


उसे S .L. E है , वो हंसकर कहती है
"ऊपर वाले ने तमाम उम्र दवाओ के पैकेज के साथ भेजा है "
पर चीज़े उतनी आसान नहीं है जितना बाहर वालो को लगता है ,उसकी बीमारी अपनी कैफियत  मुसलसल  बदलती रहती है बावजूद तमाम दवाइयों के !
इस बीमारी में उसे ताउम्र दवाई लेनी पड़ेगी !
"मेरी बीमारी भी मेरी तरह अनप्रेडिक्टबल है" उसकी मुस्कराहट अब भी कायम है , ब्लड और यूरिन रिपोर्ट में डिस्टर्ब पैरामीटर है ! मैंने उसे उदास कम ही देखा है। इस बीमारी में जब सर दर्द से फटा हो और रेशेस पूरी बॉडी पर हो। तब भी वो कहती है
"ऐसा लगता है ना जैसे किसी ने सुर्खी पाउडर लगा लिया हो वो भी सस्ता वाला !"
पल्स थेरेपी  के दौरान जब दूसरे मरीज निढाल पढ़े होते है ,वो हॉस्पिटल के बिस्तर पर कहती
"अगली पल्स सन्डे को मत रखियेगा ,टी वी पर मेरा कूकरी शोज है !"
मेरा रयूमटोलॉजिस्ट दोस्त मेरी और देखता ! कुछ महीने बाद वो एलान करती है
"डॉ साहब मुझे बेबी करना है और आपके दोस्त (रयूमटोलॉजिस्ट) मना कर रहे है"
"बड़ी मुश्किल से आप रिमीशन फेज में पहुंची है ,थोड़ा सब्र कीजिये बीमारी बढ़ सकती है" मै समझाने की नाकमायब कोशिशे करता हूँ !
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7 महीने की प्रेग्नेंसी में वो तमाम मुश्किलो से जूझती है फिर अचानक बी पी शूट अप !
"आपकी टीम में एक नया प्लेयर आया है" वो नेफ्रोलॉजिस्ट को देखकर कहती है
हमेशा सीरियस रहने वाला मेरा रयूमेटोलॉजिस्ट दोस्त बाहर निकालकर कहता है
" कमाल है ये लड़की भी" !
प्री टर्म डिलिवरी !
बच्चा इनक्यूबेटर में !
21 दिन बाद गायनेकलॉजिस्ट मुझसे कहती है" अनुराग इसकी विल पॉवर में ही ऐंटीबौडीज़ है , मुझे तो खामखाँ क्रेडिट मिल रहा है "
बच्चा भी सर्वाइव कर जाता है !
लड़ने का हुनर उसकी रगो में जो है !
पांच रोज पहले वो फिर क्लीनिक में दाखिल हुई है !
"आप अपनी टीम दोबारा असेम्बल कीजिये ,मुझे फिर माँ बनना है " !
मै उसके पति  को देखता हूँ ,उसकी हिम्मत शायद वही से आती है ! कम बोलने वाला वो शख्स कितनी शिद्दत से उसके साथ है ना !
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मै ऐसे कितने लोगो को जानता हूँ जिन्होंने अपनी तंदरुस्त ज़िंदगी शिकायतों में बेतरतीब सी गुजार दी है, बिना किसी ख़्वाब की ताबीर किये ,बिना कोई नेकी खर्च किये !
और ये दिसम्बर !! 
अपनी कैफियत नहीं भूला !
तजुर्बे ठंडी हथेली पर रख रहा है !
जीने के हुनर सिखा रहा है 

December notes part one


"वो खूबसूरत थी और इसे बात का इल्म भी था ,हर खूबसूरत शख्स को होता है। हमारे कॉलेज की छुट्टी उसके कॉलेज से कुछ पहले होती थी, उस मोड़ पर उसके आने के वक़्त से कुछ देर पहले मै वहां पहुँच जाता ,वो जानती थी मै वहां उस कोने में किसलिए खड़ा हूँ ! उस उम्र में इतनी तवज़्ज़ो अच्छी लगती है!
वो इस तवज़्ज़ो को एक्नॉलेज करती और तिरछी आँखों से मुझे देखते हुए मुस्कराते अपनी सहेलियों के साथ निकल जाती।
कुछ आँखों को काजल बहुत फबता है ! उसकी आँखे उसके चेहरे में सबसे ज्यादा बोलती थी, मै उन आँखों के लिए 5 किलोमीटर साइकिल चला कर रोज वो कोना पकड़ता "
वो ,चाय के घूँट भरता है उसका यूँ " पॉज़ "लेना मुझे खलता है ! मैंने इस दौरान एक इमेजनरी स्केच खींच लिया है।
फिर ?
"उस रोज मै थोड़ा पहले पहुँच गया था ,मेरी साइकिल में पंक्चर भी था ,मै कोने से थोड़ा पहले पंक्चर वाले से पंक्चर लगवा रहा था। अचानक वो आती दिखी अपनी सहेलियों के साथ ,उस रोज उनके ग्रुप में कोई एक लड़की और थी ,जिसके पैरो में उतनी चुस्ती नहीं थी वो एक हाथ से अपने एक पैर को दबाती फिर आगे कदम बढ़ाती । वो पीछे रह गयी थी ,ऐसा लगा जैसे वो उन्हें आवाजे दे रही थी के वे अपने कदम थामे ,पर आगे वाली लड़की जैसे सुन नहीं रही थी। मै एक खम्भे की ओट में था। उस एक पॉइंट पर सड़क एक सी नहीं थी सो पीछे रह गयी वाली लड़की जैसे बेलेंस संभाल नहीं पायी और गिर पड़ी !
आगे वाली तीनो लडकिया जोर से हंसी ,वो भी , उसने अपनी दोनों सहेलियों से कुछ कहा और उसके हँसते हँसते मेरी उसकी आँखे मिली !
उस रोज पहली दफा उसकी आँखे मुझे खूबसूरत नहीं लगी !
उस दिन के बाद से मै कभी उस मोड़ पर दोबारा नहीं गया !"
वो फिर कुछ सेकण्ड के लिए खामोश हो गया है ! अपनी चाय का आखिरी घूँट भरता है
मेरी चाय भी ख़त्म हो गयी है !
"अजीब बात है ना फकत एक सेकण्ड में आदमी आपके दिल से उतर जाता है ,फकत एक सेकण्ड में " नहीं मालूम वो मुझसे पूछ रहा है के बता रहा है !
मुझे सिगरेट की तलब लगी है !
दिसंबर के पास कई तजुर्बे है








किसी सानेहा के इंतज़ार में !!

स्कूल की छुट्टी के वक़्त  माँ गेट पर खड़ी है कुछ कुछ तैयार सी। रिक्शे में वो मुझे अपने साथ लाये परांठे खिलाती है और याद दिलाती है मैंने कब  "गुड आफ्टरनून" बोलना है । रिक्शा दूर तक चलता है माँ ने मेरी कंघी कर दी है और गीले रुमाल से मेरा मुंह भी साफ़ कर दिया है।
ये बड़ा सा स्कूल है जिसके गेट के बाहर दो चौकीदार है ड्रेस में  । बड़ी मुश्किल से वो हमें अंदर जाने देते है । उस स्कूल में सब कुछ साफ़ सुथरा है । रंग बिरंगे गमले। माँ प्रिंसिपल से मिलना चाहती है । कोई हमें ऑफिस के बाहर बेंच पर बैठने को कहता है । हम देर तक बैठे रहते है फिर कुछ देर बाद एक आदमी आकर कहता है
"कल मिलेगे"
हम तीन दिन तक रोज यही करते है । माँ रस्ते में मुझे "गुड आफ्टरनून "बोलना याद कराती है और रोज कंघी करती है । हम रोज बिना मिले वापस आ जाते है ।
दादी नाराज है,  दादी हमेशा माँ से नाराज रहती है । माँ को कितना कहती है पर माँ कभी कुछ नहीं कहती पापा से भी शिकायत नहीं करती । पर दादी रोज पापा से शिकायत करती है । दादी कहती है वो स्कूल महंगा है दूर भी है । पांचवे दिन प्रिंसिपल सर मिल जाते है ।
मैं उन्हें "गुड आफ्टरनून "कह देता हूँ । माँ उनसे कुछ रिक्वेस्ट कर रही है वे मना कर रहे है ।मां मेरे पुराने स्कूल के रिजल्ट एक फ़ाइल में रखकर लायी है । वे कुछ देर उन्हें देखते है फिर कुछ सवाल पूछते है ।मैं सबके जवाब दे देता हूँ । वे घंटी बजाकर किसी को बुलाते है । माँ दूसरे ऑफिस में मुझे ले जाती है । मैं बाहर बोर्ड पर लिखे इंग्लिश के कोटेशन पढ़ने लगा हूँ । माँ उन अंकल से बात कर रही है । कितना साफ़ सुथरा और बड़ा बड़ा लिखा है ना। रिक्शे से लौटते वक़्त माँ किसी किताब की दूकान पर रुकी है ।उन्होंने कुछ किताबे ली है ।अगले हफ्ते मेरा टेस्ट है ।रात को माँ को नयी किताबो में उलझा देखता हूँ ।  सुबह मेरे उठने से पहले माँ रोज उठ जाती है पर आज टेबल पर किताबे खुली पड़ी है । दो दिन तक माँ की डांट पढ़ने पर पड़ती है । दादी माँ को पढ़ने पर क्यों डांटती है । मैं सोच रहा हूँ माँ सोती कब है ।
दो दिन बाद माँ मुझे नया नया सब सिखाती है । मेरी पसंद की खीर भी बनाती है और आलू शिमला मिर्च की सब्जी भी । अगले हफ्ते मैं स्कूल से छुट्टी लेकर दूसरे स्कूल में टेस्ट देंने जाता हूँ । सारे सवाल मुझे आते है । दो दिन बाद माँ फिर मुझे स्कूल में लेने आई है । सबके सामने मेरा माथा चूमती है । मेरा नए स्कूल में एडमिशन हो गया है ।
माँ आज बहुत खुश है ।
माँ जब खुश होती है तो कितना अच्छी दिखती है

यकीनो के ग्राफ्स


इंजियरिंग कॉलेज में मेरा चौथा समेस्टर है । कुछ दिनों से पीठ में दर्द है ,दर्द अब बढ़ने लगा है
एक रोज सुबह मुझसे उठा नहीं जाता । पापा मुझे लेने आये है । कितने टेस्ट ,कितने एक्स रे। डॉ कहते है मुझ अब बिस्तर पर प्लास्टर के साथ रहना पड़ेगा।दादी रो रही है । मैं बिस्तर पर हूँ । सारा दिन लेटा रहता हूँ ।माँ कुर्सी पर मेरे सामने बैठकर गीता पढती है । सारा दिन गीता पढ़ती है
कभी कभो मेरे आंसू निकलते है तो पोंछ देती है । अब वो कुछ श्लोको का अर्थ भी समझाने लगी है ।
दिन रात जब भी आँख खुलती है माँ को कुर्सी पर बैठा पाता हूँ ।माँ मेरी पंसन्द की खीर भी बनाती है ,ताई जी ,बुआ जब मेरे आगे रोती है के मैं अब ठीक नहीं हूँगा माँ उनसे झगड़ पड़ती है । दो महीने बीत गए है ऐसा लगता है मैं बरसो से हिला नहीं हूँ ।मैं माँ से पूछता हूँ क्या मैं ठीक नहीं हूँगा
माँ मुस्करा देती है और कलेंडर की तारीख पर लगा लाल निशान दिखा देती है । वो मेरे पैरो की उंगलियो की मालिश करती है और हाथो को कई बार उठवाती है ।
कलेंडर की तारीखे रुक गयी है ।माँ नया रेडियो लेकर आई है ।बी .बी .सी से लेकर सब स्टेशन पूछ कर लगाती है । ताई और बुआ को मैंने कई रोज से घर पर नहीं देखा। दादी माँ को उसी के लिए कुछ कह रही है ।
इतने सालो में पहली बार माँ ने दादी को कुछ कहा है ।
माँ ने कई सारी किताबे इकठ्ठी कर ली है ।रोज एक कहानी उसमे से सुनाती है । सच्ची कहानी । हिम्मतो की कहानी ।
"जब ठीक हो जायूँगा माँ तो तेरी भी कहानी मैं लोगो को सुनाऊंगा" मैं माँ से कहता हूँ ।
माँ बस मुस्करा देती है । पापा इन दिनों खामोश से हो गए है ।आजकल मेरी आँखों में देखते नहीं ।जब आँखे बंद कर लेटा रहता हूँ तब मेरे पैर सहलाते रहते है । एक रोज मुझे सोया जान कर चुप चुप रोते है माँ से पूछते है "मेरा बच्चा ठीक भी होगा "
माँ उन्हें भी संभालती है ।
मैं बिस्तर में पडा रोता हूँ।
अगले रोज माँ अपनी दोनों टाँगे खोये पाइलट की कहानी मुझे सुनाती है ।उसने अपनी आर्टिफिशियल टांगो से दोबारा फाइटर प्लेन उड़ा लिया है ।उसकी लंबी कहानी को माँ एक सीटिंग में सुना देती है । कई दिनों बाद मुझे अपनी रीढ़ की हड्डी में सरसराहट महसूस होती है ।
रात को मेरी आँख खुलती है ।
माँ मैं कुर्सी पर सोई माँ को आवाज देता हूँ ।
वही कहानी वापस सुनाओगी
आधी रात माँ वही कहानी वापस सुनाती है ।
कलेंडर की कई तारीखों बाद मैं अपने पैरो पर खड़ा हो गया हूँ ।
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इतने सालो बाद डॉ कहते है उन्हें पार्किंसंस हो गया है ।मैं मेडिकल साइंस की गलियो में उम्मीदे ढूंढ रहा हूँ । मै माँ के लिए कुछ करने को छटपटा रहा हूँ
मैं माँ को गीता सुनाने बैठा हूँ।



(एक  दोस्त की ज़िन्दगी से , असल ज़िन्दगी से    ,बिना उसकी इज़ाज़त के  )

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