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"बाँध के रखो इन ख्यालो को....कम्बखत आसमां तक उडान भरते है "

राशिद मियां ….तकरीबन ५० साल के है एक रुपये में एक कपडा प्रेस करते है .दस किलोमीटर से साईकिल चलाकर एक दूकान के आगे लकडी के एक तख्त पर ऊपर एक चद्दर तानकर सूरज से लड़ के पिछले बीस सालो से कोयले की प्रेस के संग है .. बचपन की पढाई से यहाँ तक के सफ़र में उन्हें वही खड़े देखा है .जैसे कोई किरदार खामोशी से अपना एक ही रोल निभा रहा है... पहले सूरज इतना चुभता नहीं था ...सूरज बदला है या मै....
आपकी प्रेस इस बिजली की मोहताज नहीं मियां...मै उनसे कहता हूँ....
एक बात बतायेगे छोटे मियां ....वे गाडी की खिड़की पे आ गये है ...मुझे लगता है वे किसी बीमारी की बाबत बात करेगे ...
" कोई जन्नत है भी या ये भी खामखाँ हम जैसो को बहलाने के शगल है ….उनकी नजर मेरे लेपटोप पर रुक गयी है … .. " सुना है साइंस ने बड़ी तरक्की कर ली है इन दिनों .. ...आपका ये जादू का डब्बा कुछ कहता है इस बारे में ..." मै सिर्फ मुस्कराता हूँ ….अक्सर मेरी गाडी से प्रेस के लिए कपडे उठाते उन्हें किताबे ओर लेप टॉप दिख जाते है .इसलिए उन्हें गलतफहमी है के मै खूब पढने लिखने वाला इंसान हूँ
आप तो हवाई जहाज में कई बार बैठे होगे .आसमान में...
हाँ क्यों ?
कुछ नहीं......वे हंसते हुए कपडे उठाते है. हमारी बेगम कहती है .. रब ऊपर बैठा है …फिर एक ठंडी सांस ..…"पगली है " ...
"मुए जहाजो से कहो कभी हार्न बजाये......

अपनी दुनिया को आसमान से ढक कर
तुम्हारा खुदा बड़ी बेफिक्री से सोया है "






सुना है कपिल सिब्बल शिक्षा में नयी क्रान्ति ला रहे है ....तो क्या इस देश के किसी दूर दराज गाँव का
बच्चा भी वही किताब पढेगा . जो दिल्ली या कलकत्ता में ए. सी क्लास रूम में पढने वाले बच्चा पढ़ रहा है . ...... .तो क्या अब स्कोलर शिप के फार्म हर गरीब के बस्ते में होगे …..की कोई हुनर दाल- रोटी की फ़िक्र में जाया न हो..... तो क्या अब ..... २२ साल के होने पे ....जिंदगी की दौड़ में .. मौको की एक सी रिले -रेस होगी ..तो क्या अब किस्मत केवल दौलत वालो के पाले में खड़ी न होगी .. .हिश -श- श- श...... बावरा मन देखने चला एक सपना ….अभी तो राखी सावंत की शादी पे नेशनल डिबेट हो रही है...

'मिडिल क्लास का कोकटेल युग "


'इस इश्तेहारी जमाने में जब तक आप अपने कारनामो के पम्पलेट छपवा कर नहीं बाँटेंगे .आप पिछडो की जमात में शामिल रहेगे ..."वे किसी को कह रहे है...गोल्डन फ्रेम ओर फ्रेंच कट दाढ़ी में दूर से पहचाने जाते है ..मुझे देख बगल वाली कुर्सी में बैठने का इशारा करते है .......बकोल उनके इस फ्रेंच कट से उनकी पर्सनेल्टी में सीरियसनेस का टच आया है .. बचपन से ही उनमे हर इंसान में छिपे संभावनाओं के दरवाजे देखने की इनोवेटिव प्रतिभा है.ऐसे कई सही दरवाजे सही वक़्त पे खटखटा के आज वे यहाँ पहुंचे है …उनकी क्वालिफिकेशन तो हमें ठीक ठाक नहीं पता पर हाँ इन दिनों एजुकेशन इंडस्ट्री में उन्होंने मखसूस जगह बनायीं है ,उम्र से मुझसे पंद्रह साल बढे है....पर बिना 'डॉ -साहब 'लगाये बात नहीं करते है .इन दिनों एक डोनेशन वाले कॉलेज में डायरेक्टर के पद पर है .....भीड़ में ..कई जाने पहचाने चेहरे है ..मंत्रो के उच्चारण के बीच तेरहवी की रस्म जारी है ...जोशी जी धोती पहनकर पंडित जी के साथ बैठे है...ऊपर कंधे पे सफ़ेद चादर .....पीछे सफ़ेद शामियाने पे उनके पिता की तस्वीर लटकी है ....एक ओर खाने का इंतजाम है ..कोई साहब लगातार दौड़ भाग कर रहे है.....सभी इंतजामात देखते..नंगे पैर सफ़ेद कुरते पजामे में .हाथ में काला मोबाइल ..उन्हें देख डायरेक्टर साहब कुछ बुदबुदाये है ...जिसका कुछ अपरिहार्य कारणों से मूल अनुवाद नहीं दे सकता .लिप मूवमेन्ट से अलबत्ता आप आईडिया लगा सकते है.....फिर वे फ्री होकर मुझसे मुखातिब हुए है ...बताते है बड़े जोशी का इंतज़ार है ..अमेरिका से आ रहे है ..एयरपोर्ट से निकले ढाई घंटा हो चूका है .फिलहाल रास्ते में कही है अब पहुंचे की तब पहुंचे .... एक ओर महिला है ....गहरी लिपस्टिक ओर डिजायनर सफ़ेद साडी में लिपटी आकर्षक देह यष्टि से पूरे माहोल को थ्री -डी इफेक्ट दे रही है ... सबसे छोटे जोशी छोटा मोटा बिसनेस सँभालते है ..... इसलिए सामने होते हुए भी कही बेकग्राउंड में है...
डायरेक्टर साहब मेरे कान में बुदबुदा रहे है . 'हर बाप अपने प्रतिभाहीन बेटे को सेट कराने की जुगाड़ में है ...कई भौंडे संस्करण मार्केट में उतरने को तैयार है.. ...अब जमाना इनपुट और आउट -पुट का है ....जितना डालोगे उतना मिलेगा ..मंत्रो के उच्चारण में मुझे फिजिक्स के टीचर भोपाल सिंह याद आते है .....वे कहते थे .." मिडिल क्लास लोगो के लिए दिमाग की एकमात्र सम्पदा है..'….अच्छी जिंदगी हासिल करना चाहते हो तो मेहनत करो…...मोर्डन वक़्त के व्यापारीकरण ने उनके इस फंडे को आउट डेटेड कर दिया है .... .अब लगता है मिडिल क्लास केवल अमेरिकी बेस्ट सेलर लिखने के लिए रह गयी है
… इतने में डॉ अवस्थी नजदीक आकर बैठ गये है ...डायरेक्टर साहब के मुंह में मुंह डालकर कुछ बतिया रहे है ... पिछले साल हार्ट ट्रबुल होने के बाद से प्रेक्टिस में कम टाइम देते है .सुबह केवल दस मरीज ही देखते है.....इसलिए फीस बढा दी है .बड़ा बेटा साउथ के किसी मेडिकल कॉलेज से आकर पहले ही कुनबे का गौरव बढा रहा है .फिलहाल यहाँ छोटे की पी. जी डील तय हो रही है.....उन्हें थोडा ओर स्पेस देने के लिए मै कुर्सी थोडा एक ओर खींच लेता हूँ.......अचानक चहल पहल बढ़ गयी है .....काले मोबाइल वाले जैसे रास्ता बना रहे है ....बड़े जोशी जी ने सपत्नीक एंट्री ली है.....
.पीछे बिसलेरी के बोतल पकडे दो बच्चे .....देवरानी -जिठानी का खामोशी से मिलन द्रश्य है.....हमें ननिहाल का गाँव याद आता है .ऐसे अवसरों पे दरवाजे से रोने की आवाज शुरू होती थी....फिर सामूहिक रुदन की फ्रीक्वेंसी अचानक बढती थी......दो चार मिनट बजकर एडजस्ट हो जाती थी...ऐसे कई रुदन ओर फ्रीक्वेंसी की सेटिंग आगंतुको की घर में इम्पोर्टेंस बताती थी........अगले आधे घंटे में सभी काम तुंरत फुरंत होते है.....बड़े जोशी जी की सुना है शाम को दिल्ली में कोई इम्पोटेंट मीटिंग है ......
जोशी भाइयो से भी हाथ जोड़कर विदा लेता हूँ ...डॉ अवस्थी अभी भी डायरेक्टर साहब के मुंह में घुसे हुए है ...मै दूर से ही उन्हें नमस्कार कर ...बाहर गाडियों की लम्बी कतार ने सड़क के ट्रेफिक को भी डिस्टर्ब कर रखा है .....गाडी बेक करता हूँ तो काले मोबाइल वाले साहब इशारा कर रहे है ....उन्हें बिठाता हूँ ..बताते है उनकी गाडी रास्ते में ही पंक्चर हो गयी थी ..... सोच रहा हूँ जोशी जी के कोई खास रिश्तेदार मालूम पड़ते है ...उस एक घंटे में काफी भाग दौड़ की है...इन्होने ...'बस -बस "वे एक जगह रुकने को कहते है ...स्टेपनी भी चेक करनी होगी .वो क्या है कि ..आजकल ईमानदारी बड़ी रेयर चीज है .....वे मुस्कराते हुए कहते है.....उतारते हुए वे शुक्रिया अदा करते है ....
कभी जरुरत हो हमें याद कीजियेगा डॉ साहब....वे कार्ड पकडा देते है .... तनेजा इवेंट ओर्गानाज़र ....कार्ड के ऊपर दाहिनी ओर शेरा वाली माता की तस्वीर बनी हुई है....



कहते है वक़्त अब बदल गया है , सारी मिडिल क्लास लड़किया अब सन्डे को राजमा मसाला छौंक कर बालो में मेहंदी लगाकर रविवारी संस्करण के मेट्रोमोनियल एड के पन्नो में सुन्द र सुशील गोरी ओर गृहकार्यो में दक्ष जैसो में अपनी प्रोफाइल सेट करके नहीं देखती …अब …शादी डॉट .कॉम ओर .जीवन साथी डॉट कॉम के एक क्लिक ने उनकी पहुँच बढा दी है .कोकटेल युग में जीने के फायदे भी है



अबे सुन बे गुलाब !


जब रोज़ कमेटी में हमारा नाम शुमार हुआ ... जाट गंभीर से दिखे ..हम चिंतित हो गये .उनके गंभीर होने का मतलब किसी घटना के होने का आसार था..पिछली बार जब वे गंभीर हुये थे तब डॉ देसाई की लड़की को प्रपोज़ कर आये थे .वो तो शुक्र था की की उनकी ठेठ हरयाणवी उसकी समझ नहीं आयी थी .ओर वो उसे कोई लोक-गीत समझ सारु छे .... सारु छे ...करती रह गयी थी ....
उन्होंने गंभीरता से रोज़ डे के पोस्टर के आगे खड़े होकर अलग अलग एंगल से पोज़ दिये....हमारी छठी सेंस का एंटीना सिग्नल देने लगा ...शाम को जब हम कमेटी के चार मेंबर काम करने की रणनीति को लेकर डिस्कस कर रहे थे .जाट उसी गंभीर मुद्रा में अवतरित हुये ....
डिसकाऊंट कित्ता है .... उन्होंने पूछा .
ओह कम ओन प्रदीप ये रोज है मेरे साथ रोज कमेटी में शामिल लड़की बोली.....
.कोई स्कीम ....दो पे एक फ्री जैसी ....जाट
रोज में डिसकाऊंट ??? कितने अनरोमांटिक हो ... लड़की ने मुंह बनाया .....
तुम्हे कितने रोज चाहिए ......दूसरी थोडा नर्म पड़ी....हम चूँकि उनके रूम पार्टनर थे .इसलिए न्यूट्रल के किरदार में खामोश खड़े थे ...जाट ने एक लम्बी सी लिस्ट निकाल कर सामने रख दी .... कॉलेज की सारी जूनियर -सीनियर खूबसूरत लड़किया किब्ला सभी शामिल थी ...........फिक्स या " हाँ या ना" में अटकी पड़ी ...सबको पिंक रोज ...प्यार से पहले दोस्ती में जाट का अटूट विशवास था .....उसके बाद दोनों कई सारी गुलाबी पर्चिया निकाली जिनमे ऑटोग्राफ के साथ कोई सन्देश भी था ...किब्ला कोई अंग्रेजी कविता का हिस्सा ..मोर्डन दर्जे के रोमानटीजिम की ये नई थ्योरी थी .जिसके आखिर में "हेंस प्रूव्ड ' की जगह जाट के ऑटोग्राफ थे ....
पर एक नाम देखकर हम गश खा गये... वे न केवल फिक्स ओर खासी रौबीली थी ओर उस पे तुर्रा ये की उसका बॉय फ्रेंड भी हट्टा कट्टा गबरू जवान ......ओर सीनियर .......ओर हम दूसरे साल में ....
"अबे जाट वहां रहने दे ' हमने उसे अकेले में समझाया ..
.क्यों पिंक रोज देने में के है ? लाल थोड़े ही ना दे रहा हूँ ?जाट अंगद के पाँव की माफिक अडिग था ......
कल्चरल फेस्टिवल पांच दिन चलता था ....चौथे दिन रोज बाँटने थे ...आखिरी दिन हमने फिर उन्हें टटोला ....पर उन्होंने अपना फैसला रिज़र्व रख छोडा था ..
हमने डरते पड़ते बाकी रोज के साथ उसके रोज भी बाँट दिये ,.....रात को कल्चरल एवेनिंग थी ,गजल का प्रोग्राम था ...कोई साहब गुलाम अली की ऐसी तैसी फेर रहे थे ....लड़किया साडीयो ओर खूबसूरत लहंगों में ऑडिटोरियम में नुमाया होती ......हम एक जगह जाट के साथ बैठे हुए 'कोई उम्मीद बर नजर नहीं आती ' ग़ालिब के इस शेर को याद कर रहे थे ..... ..अचानक वही रौबीली मोहतरमा अपने गबरू बॉय फ्रेंड के साथ दिखी ..हम थोड़ा सिमट गये...
.हे प्रदीप तुम्हारा रोज मिला ..थैंक्यू ..वे बोली ......
"तो आज से अपां दोस्त."..जाट बोला था ......



weaker sex is stronger than stronger sex
because
weaker sex is weakness of stronger sex

अहमदाबाद के सिविल हॉस्पिटल में रेडियोलोजी डिपार्टमेन्ट के रिपोर्टिंग रूम में अगर कोई सबसे दिलचस्प चीज थी तो वो था एक ब्लेक बोर्ड जिसका ईजाद वहां के पी जी ने आपसी तफरीह के लिया किया था ....उस पर 10 साल पहले लिखा एक फिमेल रेसिडेंट की लिखी एक सूक्ति .. ... जाट ने अपनी रेसीडेंसी वही की थी ....

बैठे रहे देर तलक तसव्वुरे जानां किये हुए


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Originally uploaded by k3nt
वर्ल्ड कप पिछली दो रातो से दस्तक दे रहा है ........इन सुबहो में भी दोपहर की मिलावट है ...आने वाले दिन का मिजाज दे देती है ..... दिल है कि रोज सुबह 'एक ब्रेक 'की अर्जी रोज सामने रख जिरह करता है ...ओर बेख्याली यूँ इस अंदाज में आमद ले रही है कि गोया कई दिनों बतोर पेइंग गेस्ट रहेंगी ... कुछ किताबे खफा है कई रोज से .... आते जाते टोका करती है ... रोज वादा करता हूँ... .रोज तोड़ देता हूँ...
दोपहरे मुई कर्फ्यू सा लगाती है शहर में ....एक दो बागी छाते रिक्शो पे सूरज से ....बेअदबी सी जरूर करते नजर आते है .........

जब
किसी रोज
दोपहरी में
तीन चार बूंदे खिड़की से
छलांग लगाकर
इन कागजो पे
अचानक गिरती है,
हवा भी
खिड़की के दरवाजे से लटक
कोई शरारत करती है
खिड़की पे टंगा बादल
चिल्लाकर कहता है
"छोड़ो ये गमे- रोजगार के मसले,
छोड़ो ये रोजमर्रा के बेहिस फलसफे ,
छोड़ो ये खामोश मेज ओर कुर्सी
फेंको ये जहीनीयत का लिबास ......."
खिड़की से
...उफक की ओर अपना बस्ता थामे
भागते सूरज को देख
मैं भी सोचता हूँ ...........
क्यूँ ना
"उन्हें भी "एक मिस -कॉल" दे दी जाये



कुछ लोग इस ख्याल से पहले गुजर चुके है ....बेख्याली में पुरानी गठरी को ही खोलना मुनासिब समझा .....
.वैसे कित्ते दिन हुए आपको लॉन्ग ड्राइव पे गये हुए .....बेसबब उन्हें गुलाब की एक अदद डाली दिये हुए

वक़्त के पहिंयो से बंधी मुजरिम रूहे


उसने ओर मैंने साइकिल से मोटरसाइकिल का सफ़र साथ तय किया है .....पोस्ट ऑफिस के बाहर कितने कम्पीटीशन के फार्मो पर डाक टिकट लगाकर रजिस्ट्री करायी है .. बाद के कई सालो को हमने जुदा- जुदा तरीके से लांघा है .बीच में जब कभी फुरसत मिली हमने मन की परतो को उधेडा ओर सिया है .
वो फिर फोन पर है.... 'रात को साथ खाना खायेंगे' ..उसकी आवाज में कुछ है जो नोर्मल नहीं है ... ...वो आजकल बाहर पोस्टेड है.....महीने में एक बार घर का चक्कर लगा ही देता है ... रात को हम साथ बैठे है...रेस्टोरेंट के उस कोने में 'होटल केलिफोर्निया ' के बीच वो अपनी उदासी का सबब खोलता है ....
'गाँव मे एक जमीन थी .बहुत ज्यादा नही थी ...केवल ५ लाख मे बिकी ...माँ ओर दोनों बड़े भाई ओर बहन के अलावा छोटे भाई का भी हिस्सा मिलाकर सबके हिस्से १ लाख आया ,तुझे मालूम है छोटा कैसा है....मैं सर हिलाता हूँ.. जानता हूँ उसके छोटे के हालात ठीक नही है ..
सोचता था की इन पैसो से उसे कोई छोटा मोटा बिजनेस करवा दूंगा.... .....उसने सिगरेट सुलगा ली है ..
'भाइयो से कुछ डिसकस करने की सोच ही रहा था कि वहां से वापस घर लौटते वक़्त गाड़ी मे ही मालूम चला ..दोनों भाइयो ने पहले से तय कर रखा था 'कहाँ इन्वेस्ट करना है ....बहन ने भी.....ठंडी सांस .... 'ये बहुत ज्यादा पैसा तो नही था अनुराग......
उसकी आँखे गीली सी है... ८ सालो ने रिश्तो के चेहरे बदल दिए है . .
'जानते हो ..... बीच वाले भैया तो मेरे हीरो हुआ करते थे ' उसकी आवाज भी गीली सी है ....क्या कहूँ ....मै खामोश हूँ ..वे मेरे भी हीरो थे ... ''होटल केलिफोर्निया' ' अब भी बज रहा है .