बेतरतीब सी कई सौ ख्वाहिशे है ...वाजिब -गैरवाजिब कई सौ सवाल. है....कई सौ शुबहे है...एक आध कन्फेशन भी है ...सबको सकेर कर यहां जमा कर रहा हूं..ताकि गुजरे वक़्त में खुद को शनाख्त करने में सहूलियत रहे ...

2010-02-05

पिछली तारीख के आइनों का डीप फ्रीजर

चिरकुट" दरअसल हमारे देश की एक नेशनल गाली का शिष्ट अनुवाद है ...हम इसके अविष्कारक को रोज मन ही मन सैल्यूट ठोक देते है ..कितना आसान है न गला फाड़ कर चिल्लाकर कहना ..."अबे चिरकुट"....कोई बुरा मानने से पहले पडोसी से पूछेगा "चिरकुट माने "?
कल रात हम उंघियाये से  हम वैसे ही  सिल्वेस्टर इस्टालिन  की एक मूवी देख रहे थे ..."डिमोलीशन मेन"  कई सालो बाद फ्रीज करके रखा पोलिस वाला ओपन किया  जाता है ..उस नए युग में  .जहां गाली देना अपराध है ......एक ठो गाली. पे फ़ौरन मशीन हरकत में आ जाती है .ओर आप पे जुर्माने की पर्ची कट जाती है ....सोचता हूं  गर हमारे यू. पी में वो मशीन आ जाये .तो ओवर लोड  से कुछ ही घंटे में क्रेश हो जायेगी...जहां दिन की शुरुआत ही...भेन ###...से होती है .....अगर पेशेंस  का  भी  कोई  नोबेल  प्राइज़  होता  तो यक़ीनन   हिन्दुस्तान के बस  ड्राईवरो  के पास कई ट्रोफी  जमा  होती ... ..कोई भी कही से निकल जाता है ...
एक ओर हाई -वे होता है ...दुनिया दारी का .....जिस  पे  चलने   के  लिए वैसे भी  जमीर को   स्टेपनी के टायर सा लटका  कर चलना पड़ता   है ..खुदा  भी  कोई  इंडिकेटर नहीं   देता ......कम ही लोग होते है ...जो अपनी  गड्डी  के पीछे लिखते  है "आपां तो ऐसे ही चलेगे "....
.खैर ......यूँ भी  साला  आदमी इच्छायो का डिवाइस है ....एक अभी ख़त्म नहीं होती के दूसरी सर उठाने लगती है .....शुक्र है ..यादो  का हैंगओवर  हेडेक  नहीं  करता ....पर  जल्दी नहीं उतरता .... 
आज वही है...... मारी लोबी के  ठीक बीचों बीच मुस्कराती हुई  बड़ी मेहनत से पैंट की हुई एक रिंग बेल थी .... , जिस पर ये लिखा था.... ‘.
keep your finger here and say loudly “ding-dong”…
मैं  अब भी  अक्सर उसे  दबा देता हूँ…....

ससे पहले मुलाकात कब हुई थी याद नही ,दोस्ती कैसी हुई .....ये भी याद नही वो मुझसे ४ साल सीनियर थे  उसके मुताबिक हम मे दो चीजे कॉमन थी एक तो नॉर्थ इंडियन होना दूसरा एरियन  होना ,मैं मार्च के आखिरी हफ्ते की पैदाइश हूँ ओर वो अप्रिल के पहले हफ्ते की.... बाकी हम दोनों में ओर कई बड़े अंतर थे मसलन के iq मे ….वो १४४ का लेकर पैदा हुए थे ओर हम सामान्य …खैर हमारी दोस्ती हुई ओर हमने उनसे उधार मांग कर खूब अंग्रेजी नोवल पढे ओर अंग्रेजी की जुदा -जुदा किस्मों की गालिया सीखी ....जब कभी हमारा फोरेन की सिगरेट पीने का मन होता हम उनके उपरी मंजिल के  कमरे में जा धमकते ..वे न केवल हमें एक ठो विदेसी सिगरेट पिलाते बल्कि हमारी बेहूदा कविताएं भी बड़ी तसल्ली से सुनते .....कहते है वक़्त ने सबकी स्क्रिप्ट लिख रखी है....हम  खामखाँ ही इतराते फिरते  है ...एक ही होस्टल की एक ही कॉलेज की अपनी अपनी जुदा दुनिया  होती है ..फिर उसकी .जुदा गलिया..अपनी अपनी गलियों में रुकते -गिरते- भागते -दौड़ते कुछ साल गुजर गये..........

न्होंने उन हालात ओर उन वक्तों मे “ओर्थोपेडिक “ मे पी. जी मे ज्वाइन लिया ......जब इस ब्रांच मे जाना इराक मे युद्ध पर जाने जैसा ही था ,काम का बोझ ,सीनियरों की मार ,मानसिक प्रताड़ना ......नींद की कमी ,ओर तमाम अनगिनत दूसरे कारण थे जिसके मद्देनजर बहुत से लोग बीच मे ही डिपार्टमेंट छोड़ भाग जाते थे या अगले साल किसी दूसरी ब्रांच मे एडमिशन लेते थे । हम सब को लगा की ये दुबला पतला लड़का दम तोड़ देगा या भाग जायेगा.....कुछ महीनो की खामोशी के बाद ... अब आधी रात को होस्टल का फोन बजता (तब हॉस्पिटल ओर होस्टल के दरमियाँ इंटर कनेक्टेड फोन हुआ करता था..........

फोन पर उनकी फुसफुसाती हुई आवाज होती “ ,बहुत भूख लगी है ..... इतनी रातो को सूरत शहर मे दो ही जगह कुछ खाने को मिल सकता था या तो शहर के 5 सितारा होटल मे या रेलवे स्टेशन मे ...... तो  औकात के मुताबिक ५ किलोमीटर दूर रेलवे स्टेशन चुना जाता ..मेनू में सिर्फ अंडे की वेरायटी होती ......कोई भी दो जने कुछ लेकर आते , हॉस्पिटल की चोथी मंजिल पे सुनसान से गलियारे मे या किसी कोने मे वो पाव ओर ओम्लेट ठूस ठूस के खाते ओर गोल्ड -फ्लेक के इतने लंबे कश लेकर पीते.....जैसे फांसी पे चढ़े किसी कैदी को आखिरी सिगरेट दी जा राही हो....... तब उनके बदन से एक अजीब सी गंध आती.....यूँ भी हर वार्ड की अपनी एक गंध होती है उसके जिस्म मे भी वही होती ,...... ,उस दौरान भी उसका सेंस ऑफ़ ह्यूमर जिंदा रहता । “कोई शेर है इस मौके पे आर्या ? उन्होंने मुझे कभी अनुराग नही कहा आज भी नही बुलाते ..... फ़िर वे अंधेरे मे तेजी से घूम हो जाते.................

होस्टल के कमरों की चभिया या तो बाथरूम की दीवारों  पे ओंधी पड़ी मिलती है ..  .या खास कोनो  मे उंघती ...... दोस्तो को ठियो की ख़बर रहती.है .. ......कई बार जब हम कोई लेट मूवी देखकर लौटते तो फर्श पे एक गंधाई शर्ट मुंह चिडाती मिलती ...ओर अलमारी  से  कोई खाली हेंगर बिस्तर पर ...  ....ये वर्मा जी की आमद का साइन होता.......ओर ..मुश्किलों के ऐसे कई दौर  पी जी के जो  से गुजरने के बाद ....वे सीनियर हुए ...... फ़िर पास भी...हो गये ...... ओर नजदीक के कम आबादी  वाले उस शहर दमन के एक  हॉस्पिटल से जुड़ गये  … "ड्राई  -स्टेट" में रहने  के कारण   हम दोस्तों ने   उसे   "वेट सिटी "का  तक्खलुस  भी  दिया था ..... दिलजले ओर प्यार  में टूटे  आशिक वहां के दरिया में अक्सर अपना गम उड़ेल आते ..अलबत्ता गम में  अपनी अपनी केपिसिटी के मुताबिक किसी ओर चीज को भी मिक्स करते ......खैर

क़्त ने  फिर  पहिया  घुमाया .... ओर हमने पी .जी ज्वाइन की , इधर पिताश्री रोज हमे कोई नया रिश्ता बताते ओर हम रोज उसमे कोई नुक्स निकालकर मना कर देते ,  जब हम में ओर पिताश्री मे  फोनिया कोल्ड- वार शुरू होकर लम्बी खिंची तो एज यूजवल माताश्री ने  संधि दूत के  अपने रोल  में एंट्री ली ... .....ओर हमने उस शान्ति -प्रक्रिया के तहत एक लड़की से मिलने की हामी भर दी.....पता लगा लड़की दमन में है....... …. …..हमें लड़की से ज्यादा वर्मा जी से मिलने की उत्सुकता थी.....वर्मा जी होटल की उस औपचारिक मुलाकात में हमारे साथ रहे .....  ...  
वापसी में हम दोनों डगमगाते हुए उनकी फटफटिया पे उनके नए नए खरीदे फ्लेट पे पहुंचे....चूंकि भाभी श्री अपनी पी. जी के सिलसिले मे कही ओर  थी , तो वर्मा जी भी" बेचुलराई- जीवन" का आनंद ले रहे थे ..  ,उन्होंने महँगी वाइन खोली ....फर्श पे गद्दा डाला..ओर होस्टल की पुरानी रवायत के मुताबिक .जगजीत सिंह  भी महफ़िल में शरीक हुए ....कुछ पुरानी ओर नयी यादो के कोकटेल बना....गोल्ड फ्लेक  की फेक्ट्री से निकले  धुंए फेफड़ो में भीतर  गये ...  ...फ़िर अचानक हमारे वर्मा जी उठे ओर बोले “चल “.....वे आगे आगे हम उनके पीछे -पीछे .....वे दूसरे कमरे के दरवाजे पे खड़े हुए..एक बड़ा ताला हमारे ओर  कमरे के दरमियां था ...कुछ देर ताले से जूझने के बाद  दरवाजा खुला  ..पूरा कमरा खाली ..  बीचों-बीच एक काले रंग का बड़ा सा सूटकेस.......उन्होंने उसे खोला ..वही हरे कागज जो  दुनिया चलाते है .....
"आर्या जितने चाहिए ले ले "मैं हंस पड़ा था ,...वर्मा जी सेंटिया गये थे .....
.बकोल उनके  "सेंटियाना" एरियन  के   जींस  में  होता  है ...ओर उसके जन्म प्रमाण पत्र में बोल्ड अक्षरों से लिखा हुआ ...... 
ब्रेकेट  में .कहूं तो  .....हम दोनों   एरियन  है  
वो किसी फ़िल्मी शोट के माफिक था ....पर बिलकुल सच्चा ....खालिस सच्चा .....
वर्मा जी मेहनती थे ,अपनी काबिलयत के कारण जल्दी ही ख्याति पा गए ओर अच्छी खासी प्रक्टिस भी अर्जित कर ली...पर जैसा की अक्सर होता है
यरपोर्ट से फोन करना उनकी फितरत है ....खास तौर से तब जब वे देश छोड़कर परदेस जा रहे होते है ..
एक  दिन  मोबाइल बज उठा
“यार बाहर जा रहा हूँ
“क्यों ?इतनी अच्छी प्रक्टिस छोड़ कर ?
बस कुछ ओर करना  है
कुछ लोग  लोग मूडी होते है ओर बैचेन भी....   ."आपां तो ऐसे ही चलेगे " .वाले .ओर वर्मा जी उड़ लिए ...“,........कुछ साल वहां बिताकर अहमदाबाद के अपोलो मे ज्वाइन किया ही था की ...
फिर एक रोज उनका फोन आया “जा रहा हूँ”
कहाँ पूछना.. सवाल को पूरा करने की रस्म भर  होता है ....
ओर वर्मा जी ब्रिटेन उड़ लिए .अब सुना है  ..... परमानेंटली वही बसने जा रहे है ...
 
न हाल -चाल पूछा ना सलाम किया
जाने क्या बदल गया मेरी सूरत मे ......

पिछली तारीख के आइने बेखबर हो गये

2010-01-23

सरवाइवल ऑफ़ फिटेस्ट उर्फ़ नैतिकता के मेनिफेस्टो .....


कैसे  रहते है लोग यहाँ "?....एक्सामिन टेबल पर लेटी सेक्स वोर्केर को एक्सामिन ...करते -करते ...मेरी कुलिग़ ने अंग्रेजी मे मुझसे कहा था ...."सेक्स वर्कर ".....सभ्य समाज की डिक्शनरी बदल रही है ..सूरत के रेड लाइट एरिया की उस बस्ती मे दो कमरों को फेरबदल करके बनाया हुआ वो "अस्थायी जांच -केन्द्र "था , जिसके एक कमरे के बीचों -बीच परदा डाल कर आधे हिस्से मे छोटी सी पेथोलोजी लैब का सेट अप था ,ओर एक हिस्से मे एक्सामिन रूम......  ३ महीने मे एक बार  तीन चार डिपार्टमेंट का मिलजुल कर  उन्ही के एरिया मे आकर कैम्प लगाना ....नाको .के  उस  प्रोजेक्ट  मे  शामिल  था ........
अगली  लड़की  तकरीबन  कोई  १७  साल  की  थी  पहाडी  नैन  नक्श . .चेहरे पर छोटे छोटे चेचक के दाग... .मेरी मौजूदगी से वो थोडी असहज दिखी है   तो मैं कमरे से बाहर निकल आया .हूँ ........
बाहर  सड़क के कोने मे  खड़ा   एक बूढा पीपल का पेड़  ओर  शिव   को  बैठा कर बनाया  गया  एक मन्दिर ...मूर्ति के आगे पड़े कुछ फूल .....मूर्तिया कभी  शिकायत नहीं करती ...कही भी बैठ जाती है ..... आँख मूँद कर कुछ बुदबुदाती एक सात -आठ साल की बच्ची ....दो चुटिया ,फूलों वाला फ्राक,सांवला रंग .. कुछ भी ऐसा नही जो उसे दूसरे बच्चो से अलग करे .....जन्म एक एक्सीडेंटल प्रोसेस है ...ओर कभी कभी पैदा होने का अपराध अक्षम्य होता .है ... .
उस एरिया मे कई वर्षो से एक एन .जी .ओ संस्था चला रही मनीषा जी 
बताती है 
बच्ची का नाम सोनिया है ....."पोसिटिव "है ....४ महीने पहले ही  उसकी .माँ   एड्स की भेट चढी है ,.....फिलहाल बाकी तमाम सेक्स वोर्कर इसे पाल रही है ...... माँ  के डाइग्नोसिस   के बाद   इसका भी टेस्ट कराया गया .....
सोनिया .
अपनी पूजा ख़त्म
..करके मनीषा जी के  पास आयी है ...उत्सुकता   भरी  ....निगाह  बेल्ट   पर  लटके  हुए   मोबाइल  केस  पर .है .....जिंदगी की रील में कुछ  रोल की फुटेज किसी एक्स्ट्रा सी होती  है
  तकरीबन  एक  घंटा
  एक्सामिन का दौर  चला है कि ..... बाहर शोर गुल हुआ .है.......तकरीबन 40-5-५० लोग .है .. बदन पे    सफ़ेद कुरता पजामा .गले में सोने की  मोटी चैन ..... रुद्राक्ष  की माला से गुंथी हुई है .भारी भरकम  शरीर ...सबसे आगे वही है .शायद उनके लीडर..
..".कंडोम नही बांटने का ........ मुफ्त मे इलाज मिलेगा तो ओर धंधा करेंगी ''

 पीछे दर्जनों हँसते लड़के है ...आँखों   में एक्स-  रे  लिए  ...कई जोड़ी निगाहें .....नारे लगाती  आवाजे ...
  लीडर की  आवाज फिर बुलंद होती है " हमे इन्हे शहर से बाहर निकालना है ओर यहाँ कंडोम  बंट  रहे है .....'
  किसी  ने  पास  की  पुलिस  चौकी  को  इत्तिला  दी  है  ,पोलिस वाले आ गए है .....एक  हवलदार हमसे सामान समेटने को कहता है......
'आप लोग निकलिये साहेब '....एक सिपाही  हमे इशारा  करता है
आनन -फानन मे समान समेटा गया .है ..वैन मे चढ़ते वक़्त पीछे मुड़ कर  .देखता   हूँ .एक ओर भीड़ खड़ी  है .दूसरी ओर मनीषा बेन का हाथ थामे सोनिया ..अपनी दूसरी बंद मुट्ठी में फूल लिए ....
साल २००० ....नेशनल एड्स कंट्रोल  सोसायटी  (नाको) ,ब्रिटिश गवर्मेंट ओर गुजरात सरकार के साझा प्रयास से  एच  आई .वी के  लिए  चले   प्रोजेक्ट फॉर सेक्सुअल हैल्थ " जिसमे कई N.G.O भी  जुड़े .......उसी दौरान  हुए  कुछ  अनुभवों में  से   एक.......


किसी पगले कवि ने पुजारी को “धार्मिक दिहाड़ी मजदूर “कहा है...मेरा   ओर्थोपेडिक दोस्त  अक्सर बहक कर अकेले में   हमारे तबके को" पॉलिश्ड कमीनो   की जमात " कहता है...भरे पेट की थ्योरी अलग होती है ……..”.हम साले  स्वेच्छा से हिप्नोटाइज लोगो का समूह है “... डिक्शनरी ऐसे शब्द एक्सेप्ट नहीं करती ...ये "ऑफ दी  रिकोर्ड"...... शब्द  है ....वैसी आधी दुनिया ऑफ दी रिकोर्ड ही चलती है ....नैतिकता का मेनिफेस्टो ऐसा ही है ....कोई भी इसे हाइजेक कर सकता है  ...यू भी  कृत्रिम नैतिकताओं" के डाइमेंशन  बड़े फ्लेक्सेबल है ...किस दरो-दीवार की ऊंचाई कितनी रखनी है कब किसको खींच कर  बड़ा करना है ..   सारे ऑप्शन   खुले   है ....



2010-01-02

एबस्ट्रेक्ट सा कुछ !!!!


धूप पिछले दो दिनों से छुट्टी पे है ..परिंदे भी....सर्दियों का आफती धुंया नीचे उतर कर उंघती स्ट्रीट लाइटों  को दिन की शिफ्टों में काम करा रहा है   . ...  ... हर आधे घंटे  में अब भी कोई एस. एम् एस नए साल की बाबत इन-बॉक्स में दाखिल होता है ... मन करता है ..कोने में  खड़े उस आदमी से बस  दो कश मांग लूं....ऐसे मौसम में पोशीदा हुई कई छोटी छोटी ख्वाहिशो की  तलब बार बार  उठती है . .. .कुछ ख्याल किसी सफ्हे की तन्हाई को डिस्टर्ब करते है.... ..

(१)"अल्ट्रेशन "
उधेड़ के पुराने किस्सों को
रंग बिरंगे धागों से
मन माफिक जगह रख देता है .....
बड़ा हुनर है उसके हाथ में !!

(२)"इन्वर्सली पर्पोशनल"
मै उम्र का पैमाना
हाथ में लिए
जब भी
मापने बैठा हूँ
"आदमियत"....
हर बार पहले से छोटी मिली  है!!



(३)"औरत


पल्टो रवायतो के कुछ ओर सफ्हे
गिरायो इक ओर रूह
दफ़न कर दो एक ओर लाश
तहज़ीब के लबादे मे.........
ख़ामोश रहकर भी किस कदर डराती है.




ओर अब मोहब्बत !!
ग्यारह बजने में  दस मिनट थे

ट्रेन ने "व्हिसल" दी थी तब
प्लेटफोर्म नंबर एक पर
भरी भीड़ में
मेरे नजदीक आकर 
कानो पे  तुमने
"आई मिस यू" रखा  था ......
ग्यारह बजने में दस मिनट है
तुम्हे हिचकी  आयी होगी !!


टुकड़ा- ए -त्रिवेणी



घर लौटने से पहले उस रात जलाये थे  कागज के कुछ टुकड़े
वो डायरी का पन्ना भी लिपस्टिक लगाकर अपने होठ दिए थे जिसमे  तुमने .....

उस रात  मेरी  छत  ने  सुर्ख  लाल  रंग  से  होली  खेली  थी












2009-12-23

हर दिन साहूकार सा,...हर लम्हे का कुछ मोल है .



"सुन तू पापा से बात कर  ना .....मुझे अभी शादी नहीं करनी ...मुझे अभी पढना है यार ....वो  रुआंसी   हो उठी   दी  को देखता   है ...
अचानक दी छोटी हो उठी  है ....८ साल   की दी....स्कर्ट पहने उसका हाथ पकडे ...उसका स्कूल में पहला दिन है ..उम्र  तकरीबन .तीन साल   ....
"मैडम मै अपने पास बिठा लूं  इसे? .....रोयेगा "...दी मैडम से विनती सी कर रही है ...मैडम  उसे प्री नर्सरी में बैठा कर आने को कह रही  है ...दी उसे  बैठा रही  है ..
"मै यही हूं  इस दीवार के पार "...उसके बाल ठीक करके दी जा रही है .....
वो अपने आस पास के बच्चो को देखता है ...फिर दरवाजे को....दी वही खड़ी  है दरवाजे पे....
"तू सुन रहा है "...दी उसे आवाज  . दे रही है ........दी अब भी दरवाजे  पे है ....
..."वो मुस्कराता है ... चिंता   मत  कर ... अपुन दोनों फाइट करेगे ....


"जाने क्या निस्बत है कि शब जाते जाते
रोज याद का कासा छोड़ जाती है .....
हर सुबह एक लम्हा पड़ा मिलता है"

2009-12-07

यथार्थ का क्रॉस वेरिफिकेशन !


बॉम्बे एयरपोर्ट में घुसने के बाद आगे समय काटने की बाबत मै  एक अख़बार उठाकर दाम पूछता हूं तो स्टाल वाला मुस्कराकर बतलाता है .कम्प्लीमेंटरी है .....शुरूआती एडिशन है ... .कोने पे एक महिला खड़ी है कुछ परेशान सी ..उम्र पचास के नजदीक .स्थूलकाय शरीर .ट्रोली पर ढेरो सामान .... हाथ में ई- टिकट का कागज ...पहली बार एयरपोर्ट आयी है ...केरला जाना है .......एयरपोर्ट की औपचारिकताओ से नावाकिफ ...मै उन्हें समझाता हूं....
औपचारिकताओ से निबट ...मै अखबार के पन्नो में उतरता हूं..वे वापस दिखाई दी है ..मेरा चेहरा परिचित लगने लगा है इसलिए मेरे पास आकर बैठी है ....बताती  है .बेटी दामाद के पास जा रही है .....दोनों नौकरी पेशा है .....बेटी की डिलीवरी होनी है  ..बेटा बहु के पास बोम्बे रहती है .पति को गुजरे दो साल हुए है ......
माँ के कर्तव्य ख़त्म नहीं होते ....मै सोचता हूं ...........मेरी मां तो ट्रेन में भी अकेले सफ़र नहीं कर सकती ....वे अब भी टिकट हाथ में संभाले बैठी है ......बैचेन सी ...
"अनुराग भाई "....कोई आवाज दे रहा है.......
लम्बा चौड़ा शरीर ..सफ़ेद कुरते पजामे के साथ गले में कोई रेशमी कपडा  .अंगूठियों से भरे हुए हाथ उसके .पीछे मुस्कराते दो चेहरे .
कैसे है ....
पहचानने की कोशिश कामयाब नहीं होती ........
नहीं पहचाना ....परेश पटेल .... अनुराग भाई ...सूरत जेल..
पीछे वाले अब भी इस्माइल दे रहे है ...
दिमाग का एक टूल फ्लेश्बेक से उठाकर उधना दरवाजे के पास की सब जेल का एक फोटो फ्लेश करता है.....मै चेहरे पे जबरन मुस्कान लाता हूँ..
आप अभी भी वही है सिविल हॉस्पिटल में ...वो पूछता है  ..
मै उसे अपने शहर का नाम बताता हूं ...
"तो गांव वापस जा रहे है "...गुजरात में घर को लोग गांव ही कहते है ...मै हामी भरता हूं....
"इधर का कोई काम-वाम हो तो बोलने का" ....परेश   की आवाज में एक कोंफिड़ेंस है.....
"भाई अपने इलाके का एम्. एल. ए है "...पीछे एक चेहरा गौरवान्वित होकर इस कोंफिड़ेंस की वजह बताता है....
"सब आपकी दुआ है अनुराग भाई...गांधी नगर में अपनी थोड़ी बहुत जान पहचान है....कोई भी काम हो तो बोलने का ."..
मेरी फ्लाईट का एनाउसमेंट हुआ है ...मै आंटी को देखता हूं वे अब भी पर्स को खोल बंद कर रही है ...परेश से विदा लेते वक़्त वो अपना कार्ड मेरे हाथ में दे देता है.....उम्र की  कुछ गलिया   वन वे  होती है .......ओर हर उम्र  के कुछ एजेंडे .......जिंदगी एक वृत्त है ...किसी बिंदु पे आपके अतीत को दुबारा तो मिलना है ...किसी यार    की  फिलोसफी  याद   आती  है.... ...
सीट पर  बैठे बैठे  फ्लेश्बेक  की खिड़की से कुछ धुन्धलाये चेहरे झांकते है......सब जेल .....जहां समय स्थिर था.... रुका सा ... भावुकता अविवेकी  ..मन की असुलझी गुत्थियों में चुभती.. यथार्थ  की कई किरचे है ...शाब्दिक जुगालियो ओर लफ्फाजियों से इतर असल दुनिया के किरदार ... ... छह सौ रुपये चुराने के इलज़ाम में पिछले चार महीने से जेल में अपनी पहली पेशी का इंतज़ार कर रहा बीस साल का उड़िया लड़का   ..  अपने आधे अधूरे बचे कम्प्रोमाइज़ फेफड़ो में टी बी ओर खून में एच आई वी लिए हुए.. पेंतालिस साल का भुवन.. जो रिहाई नहीं चाहता ... .. .उसकी दवा का जिम्मा सरकार पे जो   है ....ओर कई  चेहरे है ...
कार्ड  हाथ  से नीचे गिर गया है ......कोई  आवाज दे रहा है ......एयर होस्टेस है......

सन २000 में   सिविल हॉस्पिटल सूरत   से जुड़े  नाको प्रोजेक्ट (नेशनल एड्स कंट्रोल ओर्गनाइज़ेशन   ) के तहत हर पंद्रह दिन के एक बुधवार मुझे दोपहर के एक दो घंटे जेल में देने पड़ते थे .....पास के इलाके के .किसी रईस. बड़े नेता का सुपुत्र ...परेश उन दिनों किसी मर्डर चार्ज में अन्दर था

...



  • त्रिवेणी .....


    "6 दिसम्बर "

तवारीख़ के पन्ने पलटते है हर साल
अपने -अपने मज़हब का टीका लगा जाते है...


हर घंटे धर्म बदल जाता है बेचारी का

आदमियों की इस दुनिया में.... जहाँ .जमीर के कई “लिलीपुटीय संस्करण “ बिना अपराधबोध के अपने अपने क्षेत्रफल को हालात के मुताबिक घटा बढ़ा कर रोज  नयी दुनिया में फिनिक्स पक्षी की भांति मर कर पुनर्जन्म  ले रहे है ....घर के सामने खाली पड़े प्लाट में...दिसंबर की ठण्ड में ...  दो कुतियाये इत्तिफाक से एक ही समय में आठ पिल्लो को जन्म देती है  ...जिनमे से .एक असमय दम तोड़ देता है ...उन दोनों के बीच एक अबोला समझौता ...जिसमे वे बारी बारी से बाकी बचे सात पिल्लो को अपना अपना  दूध पिलाती है ...चकित करता है .....ओर आदमी की शर्मिंदा
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