2009-06-21

'मिडिल क्लास का कोकटेल युग "


'इस इश्तेहारी जमाने में जब तक आप अपने कारनामो के पम्पलेट छपवा कर नहीं बाँटेंगे .आप पिछडो की जमात में शामिल रहेगे ..."वे किसी को कह रहे है...गोल्डन फ्रेम ओर फ्रेंच कट दाढ़ी में दूर से पहचाने जाते है ..मुझे देख बगल वाली कुर्सी में बैठने का इशारा करते है .......बकोल उनके इस फ्रेंच कट से उनकी पर्सनेल्टी में सीरियसनेस का टच आया है .. बचपन से ही उनमे हर इंसान में छिपे संभावनाओं के दरवाजे देखने की इनोवेटिव प्रतिभा है.ऐसे कई सही दरवाजे सही वक़्त पे खटखटा के आज वे यहाँ पहुंचे है …उनकी क्वालिफिकेशन तो हमें ठीक ठाक नहीं पता पर हाँ इन दिनों एजुकेशन इंडस्ट्री में उन्होंने मखसूस जगह बनायीं है ,उम्र से मुझसे पंद्रह साल बढे है....पर बिना 'डॉ -साहब 'लगाये बात नहीं करते है .इन दिनों एक डोनेशन वाले कॉलेज में डायरेक्टर के पद पर है .....भीड़ में ..कई जाने पहचाने चेहरे है ..मंत्रो के उच्चारण के बीच तेरहवी की रस्म जारी है ...जोशी जी धोती पहनकर पंडित जी के साथ बैठे है...ऊपर कंधे पे सफ़ेद चादर .....पीछे सफ़ेद शामियाने पे उनके पिता की तस्वीर लटकी है ....एक ओर खाने का इंतजाम है ..कोई साहब लगातार दौड़ भाग कर रहे है.....सभी इंतजामात देखते..नंगे पैर सफ़ेद कुरते पजामे में .हाथ में काला मोबाइल ..उन्हें देख डायरेक्टर साहब कुछ बुदबुदाये है ...जिसका कुछ अपरिहार्य कारणों से मूल अनुवाद नहीं दे सकता .लिप मूवमेन्ट से अलबत्ता आप आईडिया लगा सकते है.....फिर वे फ्री होकर मुझसे मुखातिब हुए है ...बताते है बड़े जोशी का इंतज़ार है ..अमेरिका से आ रहे है ..एयरपोर्ट से निकले ढाई घंटा हो चूका है .फिलहाल रास्ते में कही है अब पहुंचे की तब पहुंचे .... एक ओर महिला है ....गहरी लिपस्टिक ओर डिजायनर सफ़ेद साडी में लिपटी आकर्षक देह यष्टि से पूरे माहोल को थ्री -डी इफेक्ट दे रही है ... सबसे छोटे जोशी छोटा मोटा बिसनेस सँभालते है ..... इसलिए सामने होते हुए भी कही बेकग्राउंड में है...
डायरेक्टर साहब मेरे कान में बुदबुदा रहे है . 'हर बाप अपने प्रतिभाहीन बेटे को सेट कराने की जुगाड़ में है ...कई भौंडे संस्करण मार्केट में उतरने को तैयार है.. ...अब जमाना इनपुट और आउट -पुट का है ....जितना डालोगे उतना मिलेगा ..मंत्रो के उच्चारण में मुझे फिजिक्स के टीचर भोपाल सिंह याद आते है .....वे कहते थे .." मिडिल क्लास लोगो के लिए दिमाग की एकमात्र सम्पदा है..'….अच्छी जिंदगी हासिल करना चाहते हो तो मेहनत करो…...मोर्डन वक़्त के व्यापारीकरण ने उनके इस फंडे को आउट डेटेड कर दिया है .... .अब लगता है मिडिल क्लास केवल अमेरिकी बेस्ट सेलर लिखने के लिए रह गयी है
… इतने में डॉ अवस्थी नजदीक आकर बैठ गये है ...डायरेक्टर साहब के मुंह में मुंह डालकर कुछ बतिया रहे है ... पिछले साल हार्ट ट्रबुल होने के बाद से प्रेक्टिस में कम टाइम देते है .सुबह केवल दस मरीज ही देखते है.....इसलिए फीस बढा दी है .बड़ा बेटा साउथ के किसी मेडिकल कॉलेज से आकर पहले ही कुनबे का गौरव बढा रहा है .फिलहाल यहाँ छोटे की पी. जी डील तय हो रही है.....उन्हें थोडा ओर स्पेस देने के लिए मै कुर्सी थोडा एक ओर खींच लेता हूँ.......अचानक चहल पहल बढ़ गयी है .....काले मोबाइल वाले जैसे रास्ता बना रहे है ....बड़े जोशी जी ने सपत्नीक एंट्री ली है.....
.पीछे बिसलेरी के बोतल पकडे दो बच्चे .....देवरानी -जिठानी का खामोशी से मिलन द्रश्य है.....हमें ननिहाल का गाँव याद आता है .ऐसे अवसरों पे दरवाजे से रोने की आवाज शुरू होती थी....फिर सामूहिक रुदन की फ्रीक्वेंसी अचानक बढती थी......दो चार मिनट बजकर एडजस्ट हो जाती थी...ऐसे कई रुदन ओर फ्रीक्वेंसी की सेटिंग आगंतुको की घर में इम्पोर्टेंस बताती थी........अगले आधे घंटे में सभी काम तुंरत फुरंत होते है.....बड़े जोशी जी की सुना है शाम को दिल्ली में कोई इम्पोटेंट मीटिंग है ......
जोशी भाइयो से भी हाथ जोड़कर विदा लेता हूँ ...डॉ अवस्थी अभी भी डायरेक्टर साहब के मुंह में घुसे हुए है ...मै दूर से ही उन्हें नमस्कार कर ...बाहर गाडियों की लम्बी कतार ने सड़क के ट्रेफिक को भी डिस्टर्ब कर रखा है .....गाडी बेक करता हूँ तो काले मोबाइल वाले साहब इशारा कर रहे है ....उन्हें बिठाता हूँ ..बताते है उनकी गाडी रास्ते में ही पंक्चर हो गयी थी ..... सोच रहा हूँ जोशी जी के कोई खास रिश्तेदार मालूम पड़ते है ...उस एक घंटे में काफी भाग दौड़ की है...इन्होने ...'बस -बस "वे एक जगह रुकने को कहते है ...स्टेपनी भी चेक करनी होगी .वो क्या है कि ..आजकल ईमानदारी बड़ी रेयर चीज है .....वे मुस्कराते हुए कहते है.....उतारते हुए वे शुक्रिया अदा करते है ....
कभी जरुरत हो हमें याद कीजियेगा डॉ साहब....वे कार्ड पकडा देते है .... तनेजा इवेंट ओर्गानाज़र ....कार्ड के ऊपर दाहिनी ओर शेरा वाली माता की तस्वीर बनी हुई है....



कहते है वक़्त अब बदल गया है , सारी मिडिल क्लास लड़किया अब सन्डे को राजमा मसाला छौंक कर बालो में मेहंदी लगाकर रविवारी संस्करण के मेट्रोमोनियल एड के पन्नो में सुन्द र सुशील गोरी ओर गृहकार्यो में दक्ष जैसो में अपनी प्रोफाइल सेट करके नहीं देखती …अब …शादी डॉट .कॉम ओर .जीवन साथी डॉट कॉम के एक क्लिक ने उनकी पहुँच बढा दी है .कोकटेल युग में जीने के फायदे भी है



76 टिप्‍पणियां:

  1. इश्तेहारी ज़माना...
    फ्रेंच कट दाढ़ी...
    थ्री डी इफेक्ट....
    रुदन फ्रीक्वेंसी...
    काले मोबाइल की वॉर...
    मॉर्डन वक्त का व्यापारीकरण....
    और
    रेयर चीज़ ईमानदारी....
    सबकुछ आम ज़िंदगी से जुड़ा हुआ...लेकिन अद्भुत और रोचक फिल्म दिखाता सा....

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  2. कॉकटेल युग....रह गया था...!!

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  3. aaj sameer jee ka post toranto men kisi sajjan ke divangat hone aur wahan ki emotionless riwaj ke baare men padh kar maine likha ki ye sab development ke side effects hain. aur aapne yeh post kar dikha diya ki ham viksit ho rahe hain. jaldi hin ham terhavi se neeche aakar chauthi aadi pe hin sab kuch samapt kar liya karenge. utna intezar bhi kaun kare. hai ke nahi.

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  4. आपने तो आँखों के सामने पूरा दृष्य ही ला दिया।
    घु्घूती बासूती

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  5. कुछ ऐसी ही तस्वीर आजकल मैंने अपने ऑरकुट अकाउंट पर लगाया हुआ है...

    ... हमारा दिमाग फिर से कोसा हमको-
    'साले पहले कहे नही लिखे यह सब' पर क्या करें साहेब मज़बूरी का नाम ...... समझते ही होंगे...

    यह सुखद है अनुराग भाई. की इतनी विविधता से आप लिखते है... यह एक महाजाल और मायाजाल सा लगता है...
    अभी हमारे पडोसी ने मंदी से बचने के लिए (सिनेमाहाल जाने से बेहतर है की एल.सी.डी खरीदी है.) ...

    ऐसे नमूने से समाज पटा पड़ा है... नज़र घुमाइए... शर्मा जी, माथुर जी, वर्मा जी, ठाकुर जी. और ना जाने कितने जी... जी... जी हुजूरी करते-करते डिप्लोमेट हो जाते है...

    कंटेंट भी अच्छा है और लेखन शैली माशा अल्लाह...

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  6. अब लगता है मिडिल क्लास केवल अमेरिकी बेस्ट सेलर लिखने के लिए रह गयी है....सही फरमाया है आपने ...आपका लिखा लगा जैसे कोई वाकया आँखों -सामने गुजरा ...क्या कहें बेहद सटीक भी है और सच भी ,

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  7. ".ऐसे अवसरों पे दरवाजे से रोने की आवाज शुरू होती थी....फिर सामूहिक रुदन की फ्रीक्वेंसी अचानक बढती थी......दो चार मिनट बजकर ...." जब हम बच्चे थे इस मि-लाप को समझ नहीं पाते थे....इतना रुधन करने के बाद सामान्य बातचीत...अजीब सा लगता था..!!:)

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  8. हमेशा की तरह आपकी शैली ने पूरे घटनाक्रम को हमारे सामने चलायमान कर दिया ....और ये तो अब समाज का..विकसित समाज का आईना बनता जा रहा है.......हाँ कार्ड उड़नतश्तरी जी को भिजवा दीजिये..वो उस महिला को दे देंगे..जिसे इवेंट मेनेजमेंट के लिए मैनेजर मिल जाएगा..और शायद इससे खुश होकर उड़नतश्तरी जी को निमंत्रण भी मिल जाए ..अजी इवेंट ऐटेंद करने का

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  9. अपुन का खोपडी तेरा ब्लॉग पोस्ट पढ़ के भन्ना गया रेला है...क्या लिखता है रे बाप...अपुन भी क्या है कभी कभी किसी को टपकाने के बाद सॉरी बोलता है...अपुन का टपकाना धंदा है रे...लेकिन अपुन का सीने में भी बोले तो दिल है...लेकिन साला ये बड़ी सोसाईटी का लोग दिल रख्ताईच नहीं है.

    एक बात बोलूं तू मेरा ब्लॉग बना ना...अभी नीरज का ब्लॉग तेरे सामने एक दम फालतू है रे...बोल बनाता क्या?
    डॉन

    (नीरज)

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  10. ऐसे अवसरों पे दरवाजे से रोने की आवाज शुरू होती थी....फिर सामूहिक रुदन की फ्रीक्वेंसी अचानक बढती थी......दो चार मिनट बजकर एडजस्ट हो जाती थी...ऐसे कई रुदन ओर फ्रीक्वेंसी की सेटिंग आगंतुको की घर में इम्पोर्टेंस बताती थी.......


    EKDAM SATEEK.

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  11. रोज़ मर्रा की भाषा......... आस पास बिखरे हुवे किस्सों को समेत कर ....... चलचित्र की भाँती पढ़ गया आपकी रचना ...... सुन्दर लिखा है

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  12. दुखद है की ये दुनिया और लोग अब ऐसे ही हो चले हैं !

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  13. तस्‍वीर दर तस्‍वीर और आखिर में इवेंट मैनेजर का कार्ड। क्‍या क्‍लाइमेक्‍स है। आप सोचते हुए लिखते हैं या लिखते हुए सोचते रहते हैं। या तस्‍वीरें खुद लिखा लेती हैं। :)

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  14. इस ब्लोग की दूसरी पोस्ट के समान ये भी झक्कास है ।

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  15. कॉकटेल युग के अपने फायदे तो हैं ही. वर्ना इतना पोपुलर क्यों होता जा रहा है !

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  16. 'हर बाप अपने प्रतिभाहीन बेटे को सेट कराने की जुगाड़ में है ...कई भौंडे संस्करण मार्केट में उतरने को तैयार है.. ...अब जमाना इनपुट और आउट -पुट का है ....जितना डालोगे उतना मिलेगा

    यह बिलकुल सटीक बात है...
    उम्दा लेख के लिए धन्यवाद...
    मीत

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  17. यह सब, अपने आस - पास, हम सभी मौन और अन्धें दर्शक बन घटता हुआ देखते हैं और आप उसके मर्म को इंसानियत से धोकर और संवेदनाओं से सुखाकर हमारे समक्ष कर हमे आँखे खोलने को मजबूर करते हैं...

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  18. शुक्र है बड़े जोशी जी ने वीडियो कोंफ्रेसिंग के जरिये दुःख प्रकट नहीं किया.. तमाम व्यस्तताओ के बावजूद आये तो सही..

    किसके पीछे क्या छुपा है कुछ नहीं पता ? सबने अपने अपने चेहरे पर चन्दन का लेप लगा रखा है.. पता नहीं एपिडर्मिस ही बदल गयी हो शायद.. आपका वार करार है..

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  19. अनुराग जी आप ने तो इस समाज के ऊपर पडी चदार को एक झटके से ही हटा दिया......
    बहुत सुंदर.
    धन्यवाद

    मुझे शिकायत है
    पराया देश
    छोटी छोटी बातें
    नन्हे मुन्हे

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  20. अच्छी जिंदगी हासिल करना चाहते हो तो मेहनत करो ...मॉडर्न वक़्त की वापारीकरण ने उनके इस फंडे को आउट डेट कर दिया है.....बिल्कुल सही कहा आपने ...आज मेहनत करने वालों का नही जुगाड़ करने वालों का जमाना है....और फिर किसी भी रस्म, जन्म हो या मरण, के लिए ईवेंट ओरगेनाइज़र्स हैं ना......कॉकटेल युग की बात भी सही है .....जीन्स के साथ देसी कुर्ते का कॉकटेल....प्योर् हिन्दी मे इंग्लिश का कॉकटेल.....दूध और सोडे कॉकटेल .....तहरवीं की रसम मे सफेद साड़ी के साथ गहरी लिपस्टिक का कॉकटेल .... इसी का ज़माना है भाई.....

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  21. ऐसा लगा फ्रेम डर फ्रेम कोई शोट है किसी मूवी का .मिडिल क्लास ही तो है जो सालो से इस देश का आधा बोझ अपने कांधो पे उठाये बैठी है .सच ही तो कहा 'मिडिल क्लास लोगो के लिए दिमाग की एकमात्र सम्पदा है..'….
    पर अब इन " भौंडे संस्करण "ने सब कुछ आउट डेटेड कर दिया है .सब कुछ .
    शिक्षा का व्यापारीकरण जितना एक आम आदमी के लिए नुकसानदेह है उतना अमीर आदमी के लिए .विकल्प की कमी तो हमेशा मिडिल क्लास को रही है .
    .."अच्छी जिंदगी हासिल करना चाहते हो तो मेहनत करो…...अब गेम एकतरफा है जिसके पास पैसा उसके पास सब कुछ ,शिक्षा ताकत .मिडिल क्लास के पास इतराने के लिए एक शिक्षा ही थी तो वो भी गई.
    'रुदन ओर फ्रीक्वेंसी 'से रुदाली फ़िल्म याद आ गई ,वैसे हमारे शहर में अब भी ऐसे ही रोते है .ओर हाँ कोकटेल युग में सन्डे के मेत्रोमेनियल एड अभी भी वल्यु रखते है .girls होस्टल में भी अलग अलग जातियों के .

    कभी कभी सोचती हूँ की आपको एक अवार्ड दे दूँ .लीजिये तीन सितारे ***

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  22. मिडिल क्लास हमेशा ही कॉकटेल युग में जीता है।

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  23. चित्रावली चलती रही: वाकई कॉकटेल युग में जीने के अपने फायदे हैं मगर है तो यह सी फूड की तरह ही एक एक्यार्ड टेस्ट ही. बड़ा रियाज चाहिये ऐसे जीने के लिए.

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  24. 'कॉकटेल युग-'यह टाइटल ही अनूठा लगा और self-explanatory है .
    माध्यम वर्ग की त्रासदी यह है ki- वह confuse हो गया है..और यह वर्तमान स्वरूप उसी का परिणाम है.

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  25. डाक्टर साब इस पोस्ट के हेड लाइन को पढ़ के ही लगा के कुछ गज़ब करने वाले हो आप और बस पढ़ते पढ़ते बस इसमें उतारते गया सही कहा है आपने माध्यम वर्गीय बातों को साथ में ये बहोत सही कहा है के बाप का प्रतिभाविहीं पुत्र के लिए वो जुगाड़ की खोज में रहता है बहोत सही बात है ये ... इस उम्दा लेखन के लिए ढेरो बधाई साहिब...


    अर्श

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  26. kaktel yug...//
    kahte he iska swaad aour kick dono jordaar hoti he.../ bas yahee saar he/

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  27. वे शुक्रिया अदा करते है ....
    कभी जरुरत हो हमें याद कीजियेगा डॉ साहब....वे कार्ड पकडा देते है .... तनेजा इवेंट ओर्गानाज़र ....कार्ड के ऊपर दाहिनी ओर शेरा वाली माता की तस्वीर बनी हुई है....

    बहुत सुंदर कॉकटेल युग

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  28. सटीक चित्रण -बेहतरीन प्रस्तुतिकरण .

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  29. इस इश्तेहारी जमाने में जब तक आप अपने कारनामो के पम्पलेट छपवा कर नहीं बाँटेंगे .आप पिछडो की जमात में शामिल रहेगे .

    .आजकल ईमानदारी बड़ी रेयर चीज है .

    बहुत खूब लिखा है आपने ।
    अच्छा लगा ।

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  30. मिडिल क्लास इन अपर क्लास के चक्कर में अपना सुख को इंजॉय नहीं कर पा रहा है . मर्ग मरीचिका कहाँ तक दौड़ आयेगी हम मिडिल क्लास को

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  31. बीच वलों का काकटेली आचरण........... अच्छा अनुराग जी ये बेचारे हीनग्रंथी के मारे ये ना करें तो और क्या करें....?

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  32. समीर जी से सहमत हूं...बड़ा रियाज़ चाहिए ऐसे जीने के लिए, मुद्राओं को साधने में और फिर एक-एक बाद पैंतरेबाज़ी, नक्शेबाज़ी के बेहिसाब कोट करने में। मूल रंग और असली तत्व क्या था...ये तो शायद बनाने वाला ईश्वर भी न जान पाए

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  33. *****
    Five Stars ! ( 4 your post )
    विषय मातम का होते हुए भी समाज का सच छिप न सका आपने बखूबी दर्शाया
    after all,
    Man is a Social animal.

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  34. हिला कर रख दिया डाक्साब आपने।दो दिनो से लगातार श्मशान जाना पड़ा।वंहा जो देखा सोचा लिखू मगर हिम्मत ही नही हुई।सच बहुत बुरा हाल है।आपका लिखा देखकर मेरी भी हिम्मत बढी है।गज़ब का तमाचा जड़ा है आंख मूंद कर दौड़ रहे लोगो के मुंह पर्।

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  35. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  36. माफ़ करिएगा अनुराग जी गलती से आपकी पोस्ट पर चली गई .. हरकीरत जी की कविता पर की गई टिप्पणी ... आप डिलीट कर दें तो बेहतर है धन्यवाद

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  37. आप भी समाज के चेहरे की परतें तह दर तह प्याज के छिलके की तरह उधेडते हैं बहुत बडिया पोस्ट आभार्

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  38. bahut hi badhiya....dil ko choo gyi appki ye post....kamaal ka likhte ho aap anuraag bhai...
    vinita

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  39. शीर्षक बहुत कमाल का लगा .. सही तस्वीर दिखा दी है आपके लफ्जों ने मध्यम वर्ग की ..

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  40. मृत्यु शायद अब उतनी कठिन नही रह गई, या हम ने गीता को आत्मसात कर लिया पता नही...! इस विषय को संवेदनशीलता के साथ आप पहले भी उठा चुके हैं...! कुश ने भी इस विषय पर लिखा...! मैं अक्सर सोचती हूँ लिखने को इस विषय पर लेकिन सब कुछ अधिकतर आपकी पोस्ट पर मिल ही जाता है।

    पहले अजीब लगा था ये gathering atmosphere देख कर ... पर अब तो सामान्य सी बात है।

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  41. प्रिय कंचन .....यहाँ मूल विषय दूसरा है .म्रत्यु नहीं...इससे पूर्व म्रत्यु पर मैंने अलग अलग विचार दिए थे ..पहला
    मोरल ऑफ़ दी स्टोरी
    दूसरा म्रत्यु के बहाने अनिश्चितताओ पर ...
    जिंदगी की कोई स्क्रिप्ट नहीं होती

    तीसरा इच्छा म्रत्यु पर ....
    एक सबब जीने का ..एक सबब मरने का

    यहाँ बहुत सारे दूसरे मुद्दे थे ...कुछ ओर लोगो की टिप्पणी के बाद ..शायद कुछ नए द्रश्य खुले,,,,

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  42. डाक्टर अनुराग, धन्यवाद जो आपने मेरी किस्सागोई को पसंद किया, अलबत्ता असलियत यह है कि मैं आपके अंदाज-ऐ-बयां का कायल हूँ. मुझे ग़लतफ़हमी यही थी कि मैंने ही अपनी किस्सागोई के चलते प्रोफेशन बदला है, हुज़ूर तो नाचीज़ के गुरु निकले...!!

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  43. जहां योरोपीय देशों में मध्यम वर्ग नए विचारों और क्रांति का सूत्रधार रहा है और आज़ादी से पहले कमोबेश ऐसा ही काम भारतीय मिडल क्लास ने भी किया था, आज यही वर्ग एक अजीब से वैचारिक और जीवन शैली के घाल मेल में जीता नज़र आता है.
    आपने कॉकटेल से इसे सही व्याख्याइत किया है. यहाँ हर अवसर एक इवेंट है और हर इवेंट अपना काम निकालने का अवसर.राजेन्द्र यादव अक्सर ऐसे समाज को 'लद्धड' की संज्ञा देते है.

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  44. Bohot dinon baad aapko apne blogpe dekha..!
    Aapka lekhan padhne ke baad meree hameshahee bolti band ho jatee hai..!

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  45. Aur gar, pita ke baare me kuchh poochhen to maine apne Dada ko unke sthaan pe paya..unheen ke baareme phir ek baar "Pitajee" blog pe likh diya..."Royeen aankhen magar..."

    http://lalitlekh.blogspot.com

    http://kavitasbyshama.blogspot.com

    http://aajtakyahantak-thelightbyalonelypath.com

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  46. मौत तू इसतरह आ !!

    इस तरह आ..
    सुन मौत!तू इसतरह आ
    हवाका झोंका बन,धीरेसे आ!
    ज़र्रे की तरह मुझे उठा ले जा
    कोई आवाज़ हो ना
    पत्ता कोई बजे ना
    चट्टानें लाँघ के दूर लेजा !
    किसीको पता लगे ना
    डाली कोई हिले ना
    आ,मेरे पास आ,
    एक सखी बन के आ,
    थाम ले मुझे
    सीनेसे लगा ले,
    गोदीमे सुला दे,
    थक गयी हूँ बोहोत,
    मीठी सी लोरी,
    गुनगुना के सुना दे!
    मेरी माँ बन के आ ,
    आँचल मे छुपा ले !

    Is rachnaa pe mujhe ekbaar tippanee milee thee,ki, mai, nirashawaadee na banun...lekin, mujhe lagta ye to zabardast aashawad hai! Aisee maut harek chahegaa...sirf chahnese kuchh nahee hota...phirbhi...aur" Life is exception, death is the rule!"
    Jis din paida hote hain, is atal saty ko saath pate hain..!

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  47. "अब लगता है मिडिल क्लास केवल अमेरिकी बेस्ट सेलर लिखने के लिए रह गयी है..."
    सही है.

    तनेजा इवेंट ऑर्गनाइजर...देखिये कितने ईमानदार हैं कि जोशी जी के रिश्तेदार लगने लगे थे. जय माता दी.

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  48. आपके शब्द आइसे बाँध देते हैं कि बहुत लम्बे समय तक के लिए शब्द हीन कर दिया करते हैं.......क्या कहूँ.....बेजोड़ !!!
    सिम्पली ग्रेट डॉक्टर साहब !!!

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  49. जहाँ देखिये कोई मर रहा है. मैंने भी अपनी पहली कहानी में किसान को मार दिया.

    कितना crystalised चित्रण है आपका.

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  50. is coktel yug me aapne sare samaj ki tasveer dikha di .lajvab sheeli .

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  51. आपको नहीं लगता हम मध्यम वर्ग वाले लोग ये कोकटेल कुछ दिन तो pee लेते हैं पर बाद में याद अपनी देशी ही आती है| क्या करें हम ठहरे देशी? आजतक बॉम्बे में इसी समस्या से जूझ रहा हूँ, कोकटेल ज़िन्दगी नहीं जी जाती अनुराग जी... आप खुद को ही देखें उस पार्टी को आपने किस नज़रिए से देखा है..


    लेकिन सच है, अब लगता है मिडिल क्लास केवल अमेरिकी बेस्ट सेलर लिखने के लिए रह गयी है||

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  52. Your posts r very interesting !!!

    Aap Leh jane ke apne pakke irade par kayam rahiyega ...its a life time achievement ...agli post main kuch aur likhungi ..

    my jiju also in army is posted dr, so mauka haath se jane nahi diya :))n visiting throu army is simply wow!!!

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  53. आपने आज के काकटेल युग की सही तस्वीर की है !
    आपकी पोस्ट पढ़कर कितनी ही बातें जहन में कुलबुलाने लगती हैं !

    आज न तो भाड़ की कोई कीमत है और न ही किसी भाड़-प्रोडक्ट की ! अंकल चिप्स का ज़माना है ! जिन्दगी का भाड़ झोंकने वाले भड़भूजों की कोई कदर नहीं ! ईमानदार पैदा होना मजबूरी हो सकती है ... ईमानदार बने रहना गंभीर बीमारी है !

    दो ही लाईनों का तो हमारा पूरा फलसफा है ! पहली लाईन यह है की हम अपने लिए हैं जी ; दूसरों के लिए नहीं ! और बाकी दुनिया ? वह तो हमारे लिए है ही, वाश्शाहों ! दूसरी लाईन पढ़ कर सुनानी पड़ेगी क्या ?

    लेट अस इंज्वाय लाईफ ! बाकी पब्लिक, जो हमारे मना करने के बावजूद जबरदस्ती पैदा होती जा रही है, वह जाने, उसका काम जाने !

    जी हाँ,,,, यही है हमारा आज का जीवन दर्शन ! एकदम लेटेस्ट ! हमने इसको मान्यता दे दी है ! दो तिहाई बहुमत से पास हुआ था ! इसी पर अमल कर रहे हैं !!!

    आज की आवाज

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  54. पता नही चंद सालों में क्या क्या परिवर्तन आ गया। एक परिवर्तन की झाँकी आपने दिखा दी। कभी कभी सोचता हूँ जहाँ परिवर्तन आना चाहिए था वहाँ आज भी कोई परिवर्तन नही आया है। खैर आपकी पोस्ट हमेशा की तरह शानदार और जानदार है।

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  55. my god!!!!! iske liye bhi event manager!!! had hai!!!

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  56. एक तो आपकी इस बात ने 'गहरी लिपस्टिक ओर डिजायनर सफ़ेद साडी में लिपटी आकर्षक देह यष्टि से पूरे माहोल को थ्री -डी इफेक्ट दे रही है ...' बहुत हँसाया , दूसरे रुदन और फ्रीकेंसी ने लोट-पोट कर दिया | सचमुच ये हर किसी के बस की बात नहीं है जो ऐसे मौकों और ऐसे माहौल में भी बनावट को उजाले में ला सके |
    और आपके ब्लॉग पर आकर पोस्ट और टिप्पणियाँ इतनी दिलचस्प होती हैं कि एक बार में आधा घंटा तो लेकर आना ही पड़ता है , पढ़ कर साथ साथ मनन भी करना होता है |

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  57. आप का ब्लाग अच्छा लगा....बहुत बहुत बधाई....

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  58. थ्री डी वाली बात अनोखी रही.

    किसी मौत पर ना जाने क्या क्या देखा है.मगर ये तो एक दम ओरिजिनल रहा!!!

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  59. hi anurag ji ,
    aapane to dhajjiyan hi udhed kar rakh deen hai .
    samaj ka nanga such to yahi hai .
    renu sharma ...

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  60. आपका ब्लॉग नित नई पोस्ट/ रचनाओं से सुवासित हो रहा है ..बधाई !!
    __________________________________
    आयें मेरे "शब्द सृजन की ओर" भी और कुछ कहें भी....

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  61. पोस्ट अच्छा था, मगर एक सुझाव है, जो आपके सभी पोस्टों पर देना चाहूँगा,
    अगर आप अंग्रेज़ी के शब्द अंग्रेज़ी की वर्णमाला इस्तेमाल कर के करें तो ज़्यादा आसानी होगी पढ़ने में
    जैसे कि

    सीरियसनेस -- seriousness
    क्वालिफिकेशन -- qualification
    इनोवेटिव -- innovative
    इन्डसट्री -- industry
    हार्ट ट्रबुल -- heart trouble

    आपका क्या खयाल है डा साहब

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  62. अब जबकि मिडिल क्लास इस कोकटेल को आसानी से आत्मसात कर रहा है ..जाहिर है इसकी कमिया भी है ओर खूबिया भी ....पहले केवल मिडिल क्लास होता था .उसके बाद ऊपर ओर लोअर आया .अब लगता है एक मिडिल मिडिल क्लास भी आयेगा ....
    शिक्षा का व्यवसायी करण लेकिन शायद इस मिडिल क्लास को ख़त्म कर देगा....पिछले कुछ सालो में इस कोकटेल युग में इसी वाइरस का खतरा मिडिल क्लास कॉम को है....वैसे मै इसे देश के लिए भी खतरा मानता हूँ...
    @योगेश जी
    दरअसल इन शब्दों का इस्तेमाल जानबूझ कर किया गया है... हिंदी लेखको से प्रभावित होकर ...
    सभी का शुक्रिया ...

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  63. अभी कल ही बस में एक महोदय ३ लाख में डोनेशन देकर एडमिशन की बात करवा रहे थे...बोले तो सेटिंग करा रहे थे
    उफ्फ ये मिडिल क्लास लोग भी ..... अब तो देसी बीट और देसी गर्ल पर नाचने भी लगे हैं लोग :)

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  64. अगर ब्लाग लेखन में कभी गुणवत्ता की जांच होने लगी, और नये प्रतीको, और स्टाइल को लिखने वालों की सर्च हुयी, तो बिना शक कि आपका नाम उस रजिस्टर में जरूर मिलेगा। अच्छा एक मजे की बात ये है कि आपकी पोस्टों को लोग अपने-अपने ढंग से समझते है।

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  65. सत्य का यह एक और ऐसा नमूना है, जिस पर यदि पढ़ते हुए हंसी आती है तो मन आत्मग्लानि से भी भर जाता है.
    सत्य कहूं तो आज के पढ़े-लिखे किस संस्कृति की संरचना में मशगूल हैं शायद उन्हें भी नहीं पता.
    आदर्श पुरुष के दर्शन आज के युग में दुर्लभ हो गए, अब तो आदर्श जो बनते हैं, जो बनाते हैं.....उनकी सोंच और धारणा वही जाने....
    भाषा ही नहीं हर चीज़ काकटेल हो कर रह गई है....
    शुद्ध के लिए युद्ध करने का सहस अब कितनों में बचा है.......
    पाठशालाएं "कोचिंग संस्थान" के रूप में ओद्योगिक संस्थान के रूप लेते जा रहे हैं, गुणवत्ता का गुणगान हो रहा है और मानवता कही भी दिख नहीं रही है, हाय कैसी अच्छी गुणवत्ता की पढाई हो रही है.......
    जुगाडू की औलादों को अच्छी नौकरियां और मेधावी, मेहनती को खटने की चाकरी............
    सत्य ही है "पढ़े फारसी, बेचें तेल, ये देखो दुनिया का खेल'..........
    लिखने को बहुत कुछ है पर और कितना लिखूं, कोई सुधर थोड़ो न जायेगा, काकटेली का नशा है की उतरने का नाम ही नहीं लेता, अब तो नशा - मुक्ति केंद्र भी .............

    चन्द्र मोहन गुप्त

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  66. ये मिडिल-क्लास है क्या बला डाक्टर साब....अपने आस-पास वालों के, जिनके संग घूमा-फिरा करता था सोच कर कि अपने क्लास वाले हैं..सबके सब होंडा सिटी और फोर्ड फिस्टा में घूमते नजर आते हैं...और फिर इस कथित इवेंट-मैनेजमेंट पे फिकरा महज मिडिल-क्लास के लिये ही क्यों?
    मिडिल-क्लास का स्तर बढ़ गया है या हम लुढ़क कर लोअर क्लास में आ गये हैं?

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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