अपनी -अपनी स्वीकृतिया .....


लिव- इन रिलेशन शिप को दाखिल हुए कई साल हो गये है .....नए जमाने की इमरजेंसी कांट्रासेप्टिव पिल भी है, 3 जी टेक्नोलोजी लांच हो चुकी है .... चंडीगढ़ की उस बिल्डिंग के बाहर लम्बी कतारों में लड़के लड़किया एम् टीवी के रोडीस के अगले संस्करण के लिए होने वाले इंटरव्यू के लिए खड़े है...जिसमे " वर्जिनिटी खोने के अनुभव से जुड़े सवाल है... फक यू" संवाद में दोहराया गया एक शब्द भर .... अपने पिता से लड़कर आया हुआ वो लड़का भद्दी गलिया ...ओर अपने व्यक्तित्व पर तल्ख़ व्यंग्य सर झुका कर सुनता है...फ़िर बाहर आकर फीकी हँसी हँसता है...उसे अपने इंटरव्यू के ख़राब होने का अफ़सोस है...पर वो कहता है अगले ओडिशन में जो किसी दूसरे शहर में है वो अपनी मोटरसाइकिल से जायेगा....
अपनी सफलता का श्रेय अपने नाम की स्पेलिंग में जुड़े एक ओर "आई "को देता वो अभिनेता है ओर उसे मन्त्र-मुग्ध सुनती टी.वी एंकर ....ये महत्व्कान्शाओ की लडाई है जो मंजिलो का फासला महीनो ...घंटो में तय करना चाहती है ..,जिसके अपने चरित्र है.....अपने तर्क है.... अपने अपने हस्तक्षेप है .जहाँ वे आप से बड़ी है ...समझौतों का गणित अब ओर जटिल हो गया है..... ख्वाहिशे वर्षो के बीच इस कदर उकडूं होकर बैठी है की..... बचपन की उम्र छोटी हो रही है ..... जमीर खेल के मैदानों में छूटने लगा है ....या अब दूसरी शक्ल इख्तियार करने लगा है.....
उस रेड लाईट के उस पार खड़े घोडे- टाँगे पर रखे सिलंडर ओर घोडे को हांकता वो सूखे चेहरे वाला बूढा...सूरज ठीक उसके कंधे पर डूब रहा है ...जैसे पूरा दिन ढोया है उसने ..... मुझे अर्जुन सेन गुप्ता की अपने आंकडे देती एक रिपोर्ट याद आती है...२००४ में इस देश में ४ अरबपति थे ....अब बढ़कर छप्पन हो गये है .करीना ऍफ़ एम् में चिल्ला कर कह रही है "तू साला काम से गया "



आज की त्रिवेणी--------- ख़त

देर सवेर मां की दुआये किसी कोने पर पड़ी मिल जाती थी
पोस्टमन घंटी बजाता गली से गुजरा तो जाने क्यों दिल भर आया ..........

मुआ मोबाइल का एस.एम् .एस सिर्फ़ गिनी चुनी बात करता है


चलते चलते ...संसद पर हमले में शहीद एक जवान के परिवार को पेट्रोल पम्प के वादे के लिए अब भी उतराखंड सरकार ओर केन्द्र सरकार के दफ्तरों में हाजिरी लगानी पड़ रही है.....शायद अब शहीदों का भी बँटवारा होगा .

70 टिप्पणियाँ:

अजित वडनेरकर ने कहा…

अनुराग भाई...उथली-पिलपिली दुनिया का सही खाका खींचा है...

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बचपन की उम्र छोटी हो रही है ..... जमीर खेल के मैदानों में छूटने लगा है
कितनी सच्ची बात कही है आपने...और त्रिवेणी...हमेशा की तरह लाजवाब....
नीरज

दिगम्बर नासवा ने कहा…

अभी तो शुरुआत है
आगे आगे देखिये होता है क्या
ये तो समय की रफ़्तार है
और कहाँ कहाँ ले जायेगी पता नही

त्रिवेणी हमेशा की तरह बहुत बहुत लाजवाब
तीसरी लाइन पढ़ कर हंसी तो आई, पर वो शुरूआती २ लाइनों का महत्व कम नही कर सकी

mehek ने कहा…

बचपन की उम्र छोटी हो रही है ..... जमीर खेल के मैदानों में छूटने लगा है
bahut sahi baat kahi,aaj bachpan jaldi bda ho raha hai,har baar ki tarah shandar triveni.

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

आजके वक्त के लिए सही शब्द हैं यह ....बेहतरीन है यह

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत बढिया पोस्ट लिखी है। बधाई स्वीकारें।

Vidhu ने कहा…

भाई अनुराग जी ,ये जो दुनिया है , इसमें लोग इस कदर डूब चुकें है की अब उसी में मरना इनकी नियति बन चुकी है ...हम आप बस लिखते रहेंगे ..टीवी फिल्म और पर्दे की इस झूटी चकाचौंध मैं कितनी आपको अपने आस -पास की तस्वीर मिलती है ...हाँ लेकिन इस आजाद वातावरण मैं ज़माने के साथ बहुत कुछ बिगड़ गया है ,जिसका खामियाजा भी इस पीढी को भुगतना पड़ेगा ..आपने इतना अच्छा वर्णन किया इस सच्चाई का की शब्द हलके पड़ गए हैं ...दिल से बधाई लेखन को ..शुक्रिया ...आँखे खोलने वाले लेख का इन्तजार रहेगा ..आज का दिन शुभ हो आपको

विनय ने कहा…

haiku mein jo kah rahe ho baat sahe hai zyaada paise aur kam baat warna 25ps ke postcard mein jaane kyaa-2 likh dete the...

मीत ने कहा…

बचपन की उम्र छोटी हो रही है ..... जमीर खेल के मैदानों में छूटने लगा है ....या अब दूसरी शक्ल इख्तियार करने लगा है.....
यही तो सच है...और ऐसे हजारो ना जाने कितने ही सच...
----मीत

रंजन ने कहा…

यही त्रासदी है.. हमारे देश की आबादी युवा है.. पर इन युवाओं का मार्गदर्श्न करने वाले?

Kumar sambhav ने कहा…

आप ने जो कहा वो तो हर दशक में होता है . हम और जादा विकास करते हैं, सुविधा भोगी होते हैं, हमारी समझ बढती है. और आपने जो कहा वो होता है, कहते हैं सबसे ऊपर पहुँचने के बाद नीचे आना पड़ता है. और नहीं आए तो आप गिर जावोगे .

डा. अमर कुमार ने कहा…


तुमने तो भाई मेरे दिमाग को एकदम ही उलझा दिया..
तत्काल कुछ लिख पाना मेरे बूते में नहीं है !
पर, विषय बहुत ही मौलिक है !

डा. अमर कुमार ने कहा…

.

cmpershad ने कहा…

लिव इन रिलेशनशिप की नियति नीना गुप्ता से पूछिए जिसने हाल ही में अपनी ‘पुत्री’ की रज़ामंदी से पुनः किसी और से शादी कर ली है!!!

विवेक सिंह ने कहा…

चलते चलते बहुत कठिन सवाल पूछ गए आप !

बवाल ने कहा…

एकदम सत्य चित्र दर्ज किया जी आपनी डा. साहब. बचपन में बचपन मुर्झा रहा है. दुख़द है.
त्रिवेणी भी अच्छी है, हमेशा की तरह.

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

बचपन की उम्र छोटी हो रही है ..... जमीर खेल के मैदानों में छूटने लगा है ....या अब दूसरी शक्ल इख्तियार करने लगा है.....

आज का खाका पेश कर दिया जी आपने, यह सच हैं हम भटक रहे हैं। अपने ही बनाए रास्तों पर। क्योंकि हमने सही रास्ते चुने ही नहीं। उसी रोडीज में एक बंदा कह रहा था वह ल... को use and throw ......| शायद उसे पता भी नही कि वह क्या प्रयोग कर रहा हैं और क्या फैंक रहा हैं? खैर.....। एक दो दिन पहले एक किताब " अपना मोर्चा" (लेखक- काशीनाथ सिंह जी) लाया था तो उसमें इसी त्रासदी का बहुत अच्छे से जिक्र हैं।
और हाँ आखिर बहुत गम्भीर सवाल छोड़ गए आप।

seema gupta ने कहा…

"duniya hai, kaun jane kaun kb khan phunche, sach kha jaise jaise zmana badal rha hai, bhut kuch badal rha hai....

देर सवेर मां की दुआये किसी कोने पर पड़ी मिल जाती थी
पोस्टमन घंटी बजाता गली से गुजरा तो जाने क्यों दिल भर आया ..........
bhut bhavuk kr gye ye trivani..."

regards

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

कोई माने या ना माने, आज के साश्वत सत्य तो यहीं है ! कुछ जवाब नही है मेरे पास तो !

राम राम !

COMMON MAN ने कहा…

पता नहीं किस ठौर जा कर रुकेगा यह दौर, शायद कुछ दिनों बाद बाप अपनी बेटी से पूछेगा कि कैसी रही हनीमून की रात.

श्रुति अग्रवाल ने कहा…

फक! लंदन की कैच में मेरे बेटे का सीखा और बोला पहला शब्द था। इस शब्द पर पहली बार मैंने आयुष को थप्पड़ मारा था। फिर दो घंटे तक रोई थी। सिर्फ दो साल कुछ महीनों का था वो। उसी दिन तय कर लिया था वापस भारत आऊँगी...एफआरसीएस कर रहे पति को छोड़कर, बीबीसी की नौकरी का मोह त्यागकर मैं दोनों माओं के पास इंदौर आ गई। लेकिन यहाँ आकर देखा...माहौल जुदा नहीं...तेज भागने की रफ्तार में संस्कार पीछे छूट गए हैं।

vineeta ने कहा…

i like ur way of thinking. gooooood.

अल्पना वर्मा ने कहा…

यही सार है और जवाब भी-आप के लेख का--कि
-ये महत्वाकंषाओं की लडाई है जो मंजिलो का फासला महीनो ...घंटो में तय करना चाहती है ..
-जमीर खेल के मैदानों में छूटने लगा है-
'मोबाइल का एस.एम् .एस'-culture -भी इसी होड़ की देन है .
*चलते चलते - नयी बात नहीं या भारतीय सरकारी कामकाजी प्रक्रिया का हिस्सा है.
मगर हाँ शहीदों का बंटवारा तो हो ही रहा है...कुछ उदहारण तो अभी हाल ही में देखे गए हैं.
-बहुत गंभीर बातें कह गए हैं इस लेख में आप.

neelima sukhija arora ने कहा…

सच ही कहा आपने, महत्वकांक्षाएं इतनी बड़ी हो चुकी हैं कि उनके बीच अब असल में जिंदगी जीने के लिए वक्त बचा ही नहीं है।

अभिषेक ओझा ने कहा…

एमटीवी वाली बाद के बात कुछ दिमाग में आया था टिपियाने को लेकिन इस लाइन के बाद सच में दिल भर आया:
"देर सवेर मां की दुआये किसी कोने पर पड़ी मिल जाती थी,
पोस्टमन घंटी बजाता गली से गुजरा तो जाने क्यों दिल भर आया"
बहुत करीब से छुआ इस अहसास ने !

संगीता मनराल ने कहा…

ये तो सही फरमाया आपने महत्वकाशाओं के पीछे भागते हुये हम कई चीज़े पीछे छोङते जा रहे है जो शायद कईयों के लिये आउट डेटिड या ओल्ड फैशनड हो|

Jyotsna Pandey ने कहा…

बहुत अच्छा प्रयास ..........लिखते रहिये

आपको मेरी शुभ-कामनाएं

Gyan Dutt Pandey ने कहा…

अब क्या कहें। क्या स्वीकारें, क्या नकारें।

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

ये करीना जी का "तू स्साला काम से गया"....किसी एक आदमी के लिए कहा गया है?...शायद नहीं.
शानदार पोस्ट है.
और जैसा कि ज्योत्सना जी ने कहा है....प्रयास अच्छा है....:-)

poemsnpuja ने कहा…

aisi insights par kya kahun?! daur ki baarikiyon par dhyan kheenchti ek post...kamal ki nazar hai aapki.

neelima ने कहा…

एम् टी वी के इंटरव्यू देख सच में कोफ्त होती है की लड़के लड़किया इतनी बेईज्ज़ती बर्दाश्त क्यों करते है ?मेरा छोटा भाई कहता है की नाम ओर पैसे के लिए सब साम्झौता करते है ,आज आपकी लेखकीय भाषा में वही बात पढ़ी ,सच में लोग अपने जमीर का अलग अलग जगह अलग अलग इस्तेमाल करते है ,देश में कितने ही अरबपति हो जाए पर कुछ बुधे फ़िर भी टाँगे पर दिखेगे क्यूंकि पैसा सिर्फ़ कुछ लोगो के पास है ,वैसे एक बात कहूँ फ़िर भी युवा पीढी बूढे होते लोगो से कम भरष्ट ,ज्यादा ईमानदार ,ज्यादा देश के लिए सोचने वाली है ,मै जानती हूँ आपने सिर्फ़ एक ही हिस्से का सवाल रखा है ,ख़ुद आप भी ३५ के है तो युवा ही है .
आख़िर में त्रिवेणी -हमेशा की तरह लाजवाब ,ओर रहा
**चलते चलते ***अब इस देश में शहीदों का बंटवारा भी होने लगा है ये भी सच है ,खिलाडियों की तरह जिसमे राज्य सरकार अलग से इनाम की घोषणा करती है .वैसे आपको बधाई इंडिया ने टेस्ट मैच जीत लिया है

makrand ने कहा…

bahut smayik lekh

tanu sharmaa ने कहा…

सब कुछ ऐसा ही है....फर्क सिर्फ एक्सेपटेंस का है..

सुप्रतिम बनर्जी ने कहा…

जब भी नई पीढ़ी का ये चेहरा देखता हूं, तो ठगा सा महसूस करता हूं। उम्र मेरी भी बहुत ज़्यादा नहीं है... लेकिन जब मैं अपने से कम उम्र के लड़के-लड़कियों (चार-पांच साल छोटे) के ज़रूरत से ज़्यादा मॉर्डन और छिछले विचार सुनता हूं, तो हैरानी होती है। लगता है, सचमुच जेनरेशन गैप कुछ इतनी तेज़ी से बढ़ रहा है कि अब साल छह महीने की उम्र का फ़र्क भी आपको दूसरी नस्ल में पहुंचा देगा। वैसे इन हालात से ज़्यादा इससे निबटा कैसे जाए, इस पर चर्चा होनी चाहिए। आख़िर बच्चों में अच्छे संस्कार डाले कैसे जाएं, ये जानना और सीखना ज़्यादा ज़रूरी है।

indianrj ने कहा…

ऍम टीवी के रोडीज़ के प्रतियोगियों को देखकर तो ऐसा लगता है की अपने स्वाभिमान और पारिवारिक मूल्यों को दांव पर लगाने से भी नहीं चूकते आज के युवा.

meeta ने कहा…

main bhi rodies dekhti hu aur is baar ke uske auditions bhi.....kai sare ladke aur ladkiyo ko dekhkar ...unki baate sunkar un logo par bas daya aati hai....

गौतम राजरिशी ने कहा…

स्तब्ध हूँ डाक्टर साब ...त्रिवेणी के मोड़ से...आलेख की भाव-व्हिहलता से...आपके शब्दों की आँच से

और शहीद महज अब जिक्र के काबिल रह गये हैं...गाहे-बगाहे बस याद कर लेने के लिये...अखबारों की आबिच्यूरी में जगह घेरने के लिये ...बस!

Manish Kumar ने कहा…

MTV के इन शोज को देखकर कोफ़्त सी होती है। पर इन्हें बनाने वाले बहुत सारे लोग हमारी आपकी आयु वाले हैं। अति युवाओं के घटते नैतिक मूल्यों के पीछे हमारी पीढ़ी के लोगों का भी हाथ रहा है जिसने युवाओं को पतन का रास्ता दिखाया है

काश इनका ज़मीर मरा नहीं होता तो ये दिन देखने ना पड़ते..

"अर्श" ने कहा…

आपने बहोत खूब लिखा है जी ... ढेरो बधाई स्वीकारें....

अर्श

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

जब हमारी सरकार कंn... का भोडा प्रचार कर रही है , टी. वी पर हर घंटे अनवानटेड ७२ का प्रचार हो रहा है तो डर कायेका

लवली कुमारी / Lovely kumari ने कहा…

सवाल है किस - किस बात पर रोयेंगे हम भारतवाशी ..जय हो आधुनिकता की इस परिभाषा की

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

अब नई पीढी क्या गुल खिलाती है वो भी देखिये -
पूरे आलेख मेँ कई बातेँ सँजीदगी से उभारने का शुक्रिया
उत्तर सूझेँ तो बताइयेगा

राज भाटिय़ा ने कहा…

बचपन की उम्र छोटी हो रही है ..... जमीर खेल के मैदानों में छूटने लगा है ....या अब दूसरी शक्ल इख्तियार करने लगा है.....

यही तो है नया जमाना.... हमारे बच्चो की भोर...
धन्यवाद

neera ने कहा…

क्या लिखा है? बहुत सुंदर! एक-एक शब्द हिला देता है उनको जिनके पास थोड़ा-बहुत जमीर अभी भी बाकी है.

" ये महत्व्कान्शाओ की लडाई है जो मंजिलो का फासला महीनो ...घंटो में तय करना चाहती है ..,जिसके अपने चरित्र है.....अपने तर्क है.... अपने अपने हस्तक्षेप है .जहाँ वे आप से बड़ी है ...समझौतों का गणित अब ओर जटिल हो गया है..... ख्वाहिशे वर्षो के बीच इस कदर उकडूं होकर बैठी है की..... बचपन की उम्र छोटी हो रही है ..... जमीर खेल के मैदानों में छूटने लगा है ....या अब दूसरी शक्ल इख्तियार करने लगा है.....
उस रेड लाईट के उस पार खड़े घोडे- टाँगे पर रखे सिलंडर ओर घोडे को हांकता वो सूखे चेहरे वाला बूढा...सूरज ठीक उसके कंधे पर डूब रहा है ...जैसे पूरा दिन ढोया है उसने "

वाह!...

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

भारतीय टी वी के पतन की इस गति के बारे में जान कर काफी धक्का लगा.

Roopesh Singhare ने कहा…

वृहद् रूप में - ये संस्कार पिछली पीढी से ही इस पीढी को मिले हैं. हम लोगों के लिए थोड़ा सा मुश्किल है - केबल कल्चर कहूँ तो फिर भी - कॉलेज जाते तक सारे चैनल आ चुके थे ! हिन्दुस्तान में आज भी जिसने अच्छी अंगरेजी बोली, दस अच्छे अंगरेजी उपन्यासों का जिक्र किया, कहने का मतलब जिसने अपने आप को english या americanized साबित किया वही आज की दौड़ में आगे है. गौर तलब बात ये भी है - पूरी की पूरी young generation इसमें अपनी शान समझ रहे है...ये भी ऐसे ही अपनी भडास निकालेंगे..क्यूंकि ये पीढी दर पीढी का ह्रास है..शुक्र है हम वो नहीं देखेंगे जो ये देखेंगे.

ग़ुस्ताख़ ने कहा…

सिर्फ एमटीवी रोडीज़ को गरियाना ठीक नहीं.. हमारे ज्यादातर टीवी चैनल यहां तक कि न्यूज़ चैनल यही सब कुछ दिखा रहे हैं, युवाओं को लुभाने के वास्ते। उनके लिए भूख खबर नहीं होती, उनके लिए सस्कृति की घटनाएं भी खबर नहीं होती जो खबर होती है तो वह कि किसी मॉडल का कपड़ा सरक जाए, कहीं किसी पत्थर की मूरत की आंख में कोई पानी की बूंद दिख जाए, इंसानों के आंसू मानो कम हो गए हों... जहां मैं काम करता हूं, मीडिया में.. कुछ लड़कियां इंटर्नशिप कर रही हैं मेरे साथ.. लड़के भी हैं। लेकिन पहले ही दिन उन्होंने मुझसे एंकर बनने के बापरे में पूछा कायदे से जिन्हें जर्नलिज्म का ककहरा नहीं आता नौकरी पाने से पहले ही बिना कुछ जाने एंकरिग पाना चाहती हैं। पूछा ये जा सकता है कि इसमें बुरा क्या है। डॉक्टर साहब बुरा ये है कि ये पी चिदंबरम् को नहीं जानती.. ये नहीं जानती कि जिस गृहमंत्री ने इस्तीफा सौंपा उसका नाम क्या था। इन्हें लाला अमरनाथ और ध्यानचंद का पता नहीं, अमजद अली खान के बारे में कहती हैं कि उसी ने शोले में गब्बर का किरदार निभाया था। ये सारे प्रश्न असली हैं और उनके इंटरव्यू के दौरान मैंने ही पूछे थे। और छद्म-महत्वाकांक्षा ऐसी कि सीधे टीवी पर मनमोहन सिंह को इंटरव्यू करना चाहती हैं। क्या कहा जाए... मंजिले क्या एक दिन में ही तय हो जाती हैं? पढ़ना लिखना बोरिंग काम लगता है.. सिर्फ मीडिया की बात कर रहा हू, दूसरे क्षेत्रों में क्या हाल है पता नहीं।

pintu ने कहा…

bahut sundar achchi bat kahi!dhanyvad

कुश ने कहा…

एम टी वी की ग़लती भी नही वो लोग भी वही दिखाते है.. जो लोग देखते है.

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

लंदन में रह रहे अपने प्रिय ममेरे भईया से मैने पूँछा "मामा जी जाने वाले हैं ना वहाँ..पासपोर्ट का क्या हुआ"

"हाँ रे! लेकिन पापा मम्मी का मैरिज़ सर्टिफिकेट नही है न, तो अभी यहाँ आने के लिये ये प्रूफ ज़रूरी है।"

मै हँस दी " हे भगवान अब और क्या क्या दिन दिखाओगे उन्हे तुम..! अब इस उम्र में उन्हे ये प्रूफ देना पड़ेगा कि वो पति पत्नी है।"

भईया ने भी उसी मूड में जवाब दिया " अरे यहाँ इतने तरह से साथ रहने का रिवाज़ है कि शादी का प्रूफ देना तो ज़रूरी ही है। ये हमारा इण्डिया नही है रे।"

मैं बस हँस दी, " चिंता मत करो भईया, जब तक आओगे, तब तक यहाँ भी हम लंदन बना देंगे। सरकार सब कुछ लीगल करने वाली है।"

किसी भी चीज का विरोध करना मतलब नही है मेरा। लिव इन रिलेशनशिप की बात हुई नही कि लोग अमृता प्रीतम और इमरोज़ का उदाहरण देने लगते हैं, प्रेम की बात हुई नही कि लोग राधा कृष्ण का नाम लेने लगते हैं।..इन बड़े बड़े नामों का नाम लेने के पहले इनकी ऊँचाइयाँ तो खुद में लाई जायें। तुच्छ कामों के लिये ये महान नाम बदनाम करना अच्छा तो नही।

देर सवेर मां की दुआये किसी कोने पर पड़ी मिल जाती थी
पोस्टमन घंटी बजाता गली से गुजरा तो जाने क्यों दिल भर आया ..........

मुआ मोबाइल का एस.एम् .एस सिर्फ़ गिनी चुनी बात करता है


और माँ तो एसएमएस की औपचारिकता में विश्वास भी नही रखती न...!

Zakir Ali 'Rajneesh' ने कहा…

सही कह रहे हैं मित्रवर, आजका युवा काम से जाए, इसके लिए भरपूर इंतजाम हैं।

ज़ाकिर हुसैन ने कहा…

उस रेड लाईट के उस पार खड़े घोडे- टाँगे पर रखे सिलंडर ओर घोडे को हांकता वो सूखे चेहरे वाला बूढा...सूरज ठीक उसके कंधे पर डूब रहा है ...जैसे पूरा दिन ढोया है उसने .....


जिंदगी का क्या शानदार चित्र खींचा है आपने!
लाजवाब हूँ !

अनूप शुक्ल ने कहा…

हंस में छपी आत्मस्वीकृतियां श्रंखला की तरह ही यह कोई सीरीज चलेगी क्या भाई। इस बार की त्रिवेणी की सबने बड़ी तारीफ़ की है सो तो है। लेकिन मुझे लगता है कि दूसरी लाइन पढ़ने में कुछ अटकती है।

'ताइर' ने कहा…

sir g...sachin ki tarah aap ne bhi khub vapsi ki hain...aap se gehrai bhari soch ki...jazbat bhare alfaz ki ummid rehti hain...aur is baar...aap ne shatak laga diya...

RC ने कहा…

Triveni is good. Last one was better.

Rakhee ने कहा…

ख्वाहिशे वर्षो के बीच इस कदर उकडूं होकर बैठी है की..... बचपन की उम्र छोटी हो रही है .....

sach hai....zindagi ki daud mein aage nikalne ke liye bachhe apni umr peeche choddte jaa rahe hain...chotte chotte haathon mein hi computer ka mouse aa jaata hai...aur aankhon pe chashma....

chhote se deemag mein khawahishon ka dher hai...jise kum paise kamane wala baap tou kabhi poora kar hi na paayega shayad....insaan ki khawahishein bhi kabhi khatam hoti hain kya?

kuch lines yaad aa raha hain....

Tamanna ne zindagi ke aanchal mein sar rakh kar poocha...."Main poori kab houngi?"
Zindagi ne has kar jawab diya..."jo poori ho jaaye wo tamanna hi kya"

दीपक ने कहा…

हर जगह ग्लैमर और स्वार्थ प्रभावी है !!

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

kya baat hai anuraag g
waqt ki nabz ko tatol diya aapne....

नरेश सिह राठौङ ने कहा…

"ये महत्व्कान्शाओ की लडाई है" चार लाइनो मे बहुत कुछ कह डाला । लगता है आप चमडी के डा० नही है समाजिक मूल्यों के डोक्टर है ।

Abhijit ने कहा…

aapki triveniman ko choo gayi.


baki jo aaj ke samaj me kisi keemat parlimelight me aane ki hod hai, chahe wo roadies me gaali khaakar hi kyon na ho, iske baare me bhi hame sochna hoga. kya is tarah ki pravritti maanasik taur par swasth hai?

रंजना ने कहा…

बचपन की उम्र छोटी हो रही है ..... जमीर खेल के मैदानों में छूटने लगा है
एकदम सही कहा आपने. पूर्णतः सहमत हूँ.
लाजवाब पोस्ट है हमेशा की तरह,सोचने को मजबूर करती हुई......
और त्रिवेणी...हमेशा की तरह लाजवाब....

रूपाली मिश्रा ने कहा…

इतने कमेंट्स की निचे स्क्राल करते हुए ऊँगली दुखने लग जाय :-)
एक चीज पूछनी थी आप बुरा मत मानना प्लीज
ये जो त्रिवेणी आप लिखते हैं वो किसकी होती है

rewa ने कहा…

'ye desh hai veer zawanon ka' ko ab modify karna chahiye... :-)

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

भाई अनुराग जी,

हम स्वयं को कितना भी आधुनिक, पढ़ा-लिखा कहें पर जो चित्र , कथानक, शब्द--युग्म, वाक्य आपने अपने लेख में प्रस्तुत किए हैं वो स्वयं में ऐसे लोगों के अज्ञान से भरी अधजल गगरी को झलकते-चहकते हुए ही दिखाता है.
थोथा चना ही घाना बजता है, ज्ञानी कभी अपने ज्ञान को नही बघारता है.
समय ही सबको सही रह पर लाता है पर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है, पछताने के सिवा कुछ नही बचता.

बहुत से छिछले विषयों पर एक साथ आघात करने हेतु आपका हार्दिक आभार.

चन्द्र मोहन गुप्त

प्रकाश बादल ने कहा…

कमाल करते हैं आप इतना खूब बी कोई लिखता है क्या! इतना बढिया मत लिखा कीजिए ज़्यादा लोगों को टिप्पणी देने पर मजबूर होना पडता है।

डॉ साह्ब हम आपके मरीज़ हो गए हैं

प्रदीप मानोरिया ने कहा…

याथार्थ परक सुंदर आलेख

अखिलेश सिंह ने कहा…

शानदार बहुत खूब! अनुराग जी चलते चलते में काफी गंभीर और सोचनीय मुद्दा उठाया है...

कार्तिकेय ने कहा…

यही तो है खोखली, बनावटी दुनिया का ताना-बाना. हर पल सच्चाई के गुमान में जीते हुए,लेकिन हर कहीं मात खाये हुए. बात सिर्फ़ रोडीज की नहीं, बल्कि खोखले हो रहे उसूलों की है. किसी ने सच ही कहा था--

"दिल से नूर-ए-खुदा के दिन गये,
अब तो हड्डियों में भी फ़ास्फ़ोरस ढूंढ्ते हैं"


बाकी फ़ुर्सत में. अभी तो ज्यादा कह पाने की स्थिति में नहीं हूं.

और हां,त्रिवेनी हमेशा की तरह संजीदा रही. अब तो ई-डाक आकर हफ़्तों तक पडी रहती है, कोई खबर ही नहीं मिलती.

Pyaasa Sajal ने कहा…

Sir Ji..aapne to audition dete dekha hai to ye keh rahe hai,mujhse poochiye ki poora poora college inhi auditions aur fu ke rang me kaise rangaa jaa raha hai...mujhe ye lekh yaad rahega

vyang mein meri pehli koshish ko yahaan padhe:

http://pyasasajal.blogspot.com/2008/12/blog-post_26.html

Tapati ने कहा…

देर सवेर मां की दुआये किसी कोने पर पड़ी मिल जाती थी
पोस्टमन घंटी बजाता गली से गुजरा तो जाने क्यों दिल भर आया ..........
and I thought in todays era I am the only fool who missess letters from parents;and is still practicing communication through letters.

You write well ..;read many of your posts,thought of sharing a direct compliment today

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