2008-09-30

जिंदगी की गलियों से

सुबह सुबह जब उस हॉस्पिटल से एक रेफ़रन्स देखकर बाहर निकला तो कोरिडोर में ही कुछ भीड़ है ,भीड़ के बीच एक ३५ साल का गेहुये रंग का आदमी है ...मझोले सा कद ,बिखरे बाल ,हाथ में कुछ फाइल
तुम जानते नही मै कौन हूँ....मेनका गांधी की संस्था की कार्यकर्ता हूँ ..एक फोन घुमायूंगी तो मुश्किल में पड़ जायोगे तकरीबन ४० साल की औरत थी.....छोटे से बच्चे को रौंद देते तुम.....पूरी मोटरसाइकिल टूट गयी है
मेरा फोन बजता है ,मै उठाता हूँ पर मेरा ध्यान फोन में नही है ...वो आदमी अपने माथे का पसीना पोच रहा है..."देखिये बहन जी मै तो २५ की स्पीड से चल रहा था ,उसने पीछे से टक्कर मारी ...फ़िर रिक्शे से उलझ कर गिरा है '
भीड़ में करीब साथ -आठ लोग है ,इस भीड़ का कोई चेहरा नही है.... "अजी साहब गाड़ी चला रहे हो तो कोई अंधेर गर्दी है ...उनमे से एक बोला
"भैय्या गाड़ी में बैठकर तो हर आदमी यूँ सोच्चे की दूसरे की तो कोई कीमत नही ..हवा में उडे है ! एक ओर जुमला
मोटरसाइकिल का नुक्सान हो गया ,अस्पताल का बिल है ....वो औरत हाथ में मोबाइल से कोई नंबर डायल करते हुए बुदबदाती है
"अस्पताल वालो से मैंने कह दिया है .. बिल के लिए "मझोले कद वाला धीमे से कहता है....
अजी तो कोई अहसान कर दिया ?भीड़ से फ़िर एक जुमला निकलता है ....वो अपने माथे से पसीना पूछ रहा है ..की अचानक मेरे कंधे पर हाथ पड़ता है डॉ नवनीत है ",आ तुझे चाय पिलाता हूँ... मै कुछ हाँ या न का जवाब दूँ उससे पहले ही वे मेरा हाथ पकड़ कर डॉ रूम में ले चले ..तभी पीछे से आवाज आयी "डॉ साहब सी .टी .स्केन की जरुरत तो नही है ?
वही औरत है "अरे नही आपका बच्चा बिल्कुल ठीक है ,सर पे थोडी सी खरोच है ...हाथ में घिसट आयी है बस ..पट्टी कर दी है ,आप चाहे तो ले जा सकती है "
डॉ नवनीत मुझे पकड़ कर डॉ रूम में ले चले
क्या किस्सा है ?मैंने पूछा
कुछ नही ! एक एक्सीडेंट केस है ,एक लड़के को गाड़ी की साइड से हल्का सा धक्का लगा है ,मोटरसाइकिल स्लिप हो गई हालांकि लगता ऐसा है इस लड़के ने साइड से तेजी से निकलने की कोशिश की है...फ़िर एक रिक्शा वाले से टकरा गया .. . दोनों गिर पड़े ..गाड़ी वाला बेचारा उसे यहाँ ले आया भला मानसत में ...लड़के को मामूली सी चोट है
चाय के कुछ पल गुजरे ही थे की दरवाजे पर क्नोक हुआ ....वही मझोले कद वाला आदमी
चेहरे पर बैचेनी.... डॉ साहब ! आपको जो ठीक लगे करियेगा ..बिल का पेमेंट मुझसे ही कहियेगा अगर सी .टी .स्केन की जरुरत समझे तो ?
अरे नही ....निश्चित रहिये .सब ठीक है.........डॉ नवनीत उनसे कहते है ...
उसके चेहरे पर अब भी बैचेनी है.. डॉ नवनीत उसे बैठने को कहते है .कोई ओर दिक्कत है ?वे उससे पूछते है
"एक फेवर चाहिए आपसे "?वो हिचकिचाता है
कहिये ?
वो रिक्शे वाला मुझे नही मिल रहा है ,उसको भी थोडी चोट आयी थी यही कुछ पट्टी हुई है उसकी ,उसका एक टायर पूरा मुड गया था ..उसको अगर कुछ पैसे दे देता .... ?

50 टिप्‍पणियां:

  1. "डॉ साहब ! आपको जो ठीक लगे करियेगा ..बिल का पेमेंट मुझसे ही कहियेगा अगर सी .टी .स्केन की जरुरत समझे तो ?
    वो रिक्शे वाला मुझे नही मिल रहा है ,उसको भी थोडी चोट आयी थी यही कुछ पट्टी हुई है उसकी ,उसका एक टायर पूरा मुड गया था ..उसको अगर कुछ पैसे दे देता .... ?
    'iseko kehten hain kee abhee bhee honesty maree nahee hai, kayam hai or iseee rup mey kaheen na kaheen dekhne ko mil jatee hai. insaneeyt ka bhut accha nmuna paish kiya hai aapne, accha lga pdh kr'

    regards

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  2. जिंदगी में कितने अलग अलग तरह के लोग मिलते हैं न.....अच्छा लगता है जब दूसरों के लिए परेशान होने वाले इंसान मिलते हैं!वैसे अक्सर यही होता है की बड़ी गाडी में चलने वाला आदमी ही गाली खाता है, गलती न होने पर भी!

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  3. वाकई ज़िंदगी की गलिया बहुत पेचीदा होती है.. बात को कहने का आपका अंदाज़ लाजवाब है..

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  4. संस्थायें अच्छे इरादे के विस्तार/पोषण के लिये बनती हैं।
    फिर उनपर आसुरिक भावनायें और आसुरिक लोग कब्जा कर लेते हैं।

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  5. एक फेवर चाहिए आपसे "?वो हिचकिचाता है
    कहिये ?
    वो रिक्शे वाला मुझे नही मिल रहा है ,उसको भी थोडी चोट आयी थी यही कुछ पट्टी हुई है उसकी ,उसका एक टायर पूरा मुड गया था ..उसको अगर कुछ पैसे दे देता .... ?

    क्या इस दुनिया में इतने अच्छे लोग हैं और आप हर रोज ऐसे अच्छे-बुरे लोगों से मिलते हैं, उन्हें परखते हैं, ग्रेट।

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  6. kuch achche log bhi bache hai....shayad jarurat se jyada achche ...

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  7. हमेशा की तरह जीवंत चित्रण किया है और बहुत जिन्दगी बहुत पेचीदा है !
    शुभकामनाएं !

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  8. बहुत सजीव चित्रण है ! शायद यही आज के जीवन का सच है ?

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  9. आप हिन्दी की सेवा कर रहे हैं, इसके लिए साधुवाद। हिन्दुस्तानी एकेडेमी से जुड़कर हिन्दी के उन्नयन में अपना सक्रिय सहयोग करें।

    ***********************************
    सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
    शरण्ये त्रयम्बके गौरि नारायणी नमोस्तुते॥


    शारदीय नवरात्रारम्भ पर हार्दिक शुभकामनाएं!
    (हिन्दुस्तानी एकेडेमी)
    ***********************************

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  10. जब किसी के अंदर इंसान नजर आता है तो कितनी खुशी होती है?

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  11. यह जानकर बड़ा ही अच्छा लगा और खुशी मिली कि ऐसे भी इंसान है।

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  12. बहुत कम लोग बचे हैं इस तरह के अब दुनिया में ...आपकी कलम इस तरह के लिखे को और भी अधिक ज़िन्दगी के करीब ले आती है ..

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  13. इसे पढ़कर लगा कि अभी भी इंसानियत बाकी है ।

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  14. यानि की जिसको जरुरत है ,वो बेचारा अकेला है ओर जिसको नही वो धौंस दे रहा है ,बहुत अच्छे आजकल यही समाज है २०-२२ साल के लड़के तेजी से मोटरसाइकिल चलते हुए जहाँ कही भी हो वहां से निकलने की कोशिश करते है ..
    वैसे भी जिसकी लाठी उसकी भैंस है अब तो संकेतो में आपकी बात कहने की यही अदा आपको दूसरो से अलग करती है .

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  15. bahut bahut khoobsoorat dil ko chootee hui post,ek baar fir.
    man mugdh ho jata hai jab bhi kahin se insaniyat kee aisi misalen dekhn sunne ko milti hain.
    Aabhaar.

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  16. शानदार! डॉक्टर साहब, आपके किस्से ज़िंदगी को कितनी तरह से दिखाते हैं कि क्या कहूं.
    समूह की 'विवेकगाथा' ऐसी ही होती है. भीड़ में सच खोता जाता है.

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  17. ऐसे मंझोले लोग बहुत कम मिलते हैं...
    काश की दुनिया में बस ऐसे ही लोग हो...
    बहरहाल लेख बहुत उम्दा है..
    पढ़कर बहुत अच्छा लगा...

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  18. अक्‍सर यही होता है। कुछ करनेवाले ही गाली खाते हैं, जिन्‍हें कुछ नहीं करना वे तो कुछ भी बोलने के लिए स्‍वतंत्र हैं। खैर.. दुनिया है, यहां तरह तरह के लोग हैं।

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  19. आपका लिखा पढना मानोँ हम भी वहीँ हैँ ..
    और आजका वाकया आशा बँधवा गया
    समाज इन्हीँ अच्छाईयोँ पे कायम है !
    - लावण्या

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  20. कभी कभी लगता है की इंसानियत जिन्दा है अभी, भले ही चंद लोगों में ही सही. ऐसा एक वाकया पढ़ कर दिल में एक सुकून मिलता है, राहत सी लगती है. विश्वास जागने लगता है लोगों में, लगता है की दुनिया इतनी भी बुरी नहीं है. ऐसा फील गुड कही किसी अख़बार को पढ़ कर नहीं होता. बहुत शुक्रिया

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  21. बहुत खूबसूरत पोस्ट, एक बार मेरे साथ ऐसा हुआ था, हम लखनऊ स्टेशन जारहे थे..टाइम कम था..रिक्शे पर थे, तभी रिक्शा किसी bike से टकराया...हम गिरते गिरते बचे...थोडी खरोच आगई...स्टेशन आ गया था...जल्दी से उतरे...तभी मैंने देखा रिक्शे वाले की उँगलियों से खून बह रहा था...उधर बाकि लोग ट्रेन के लिए भागे लेकिन मैंने पर्स से ट्यूब निकाली, उसे दावा लगायी...और कुछ पैसे भी दिए...इस चक्कर में देर से पहुँचने पर पापा की दांत भी खायी...लेकिन शुक्र है ट्रेन मिस नही हुयी...बहुत अच्छा लगा पढ़ कर...

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  22. आपको ईद और नवरात्रि की बहुत बहुत मुबारकबाद

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  23. मेरा मानना है की टिपण्णी पढ़कर आप introspection भी कर सकते है की आप कहाँ ग़लत थे ?या आप से कहाँ "वैचारिक असहमति 'हो सकती है ...[[[[[[[[[टिपण्णी]]]]]]]]]]]] पढ़कर ये भी अंदाजा लग जाता है किसने आपका लेख पढ़ा है ओर किसने महज़ "लेन- देन की रस्म " निभायी है

    अनुराग जी टिप्पणी कर लें...

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  24. जिंदगी की राह में कई तरह के लोग मिलते है उनमे से कुछ
    तरह तरह के होते है सच्चे इंसान कम मिलते है .
    बढ़िया पोस्ट के लिए धन्यवाद्.
    नवरात्रि पर्व की हार्दिक शुभकामना

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  25. जीवंत चित्रण और रोचक वाकया.....अच्छा लगा।

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  26. क्या बात हे, एक वो मेनका की ... ओर एक यह साहिब दिल खुश हो गया, शायद भारत ऎसे लोगो से ही महान कहलाता हे, धन्यवाद

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  27. हमेशा की तरह दिल को छू लेने वाली लेखनी, जो आवाज बन कर कान में बहुत देर तक गुँजती रहती है. वाक्या पढ़कर लगा कि संवेदनशील लोग अभी भी हैं हर जगह..बढ़िया संस्मरण.

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  28. Bada achha laga padhke kee aisebhee insaan mil jaate hain...aise merebhi kuchh anubhav hai...badehee rhidaysparshi...kya mai aapke blogpe likh saktee hun...yaqeenan yahan zyada pathkontak pohonch paungee...bohot kuchh likhna hai, samay kam kam hai!

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  29. आपके लेखन में एक खास तरह की सहजता हमेशा मह्सूस करता हूं। दैनिक जीवन के आम किस्सों को पढना अच्छा लगता है। बिना किसी हो हल्ले के आप जिस खूबसूरती से लिखते हैं, उसका कायल तो हूं ही।

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  30. अक्सर दिमाग में सवाल आता है कहाँ गये वो लोग ? पर आपके लेक में जवाब मिल गया यहीं हैं यदा कदा मिल भी जाते हैं ।

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  31. डाक्‍टर साहब,
    बांटते रहिए ऐसे अनुभवों को। पढ़-सून कर बड़ी तसल्‍ली होती है मन को।

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  32. दोस्तों ये सिर्फ़ सोमवार की ताजा तारीन घटना है ,ये कोई पुराना संस्मरण नही है ....यहाँ मेरा उद्देश्य सिर्फ़ इतना है कि तमाम बुरे हालातो में भी उस इन्सान ने अपने भीतर एक अजीब सी इंसानियत बचाये रखी जो एक सामान्य घटना है पर आजकल सामान्य होना ही मुश्किल है

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  33. अच्छे लोग बहुत से है । कई बार मदद करना चाह कर भी नहीं कर पाते क्योंकि भीडतंत्र का कोई धर्म नहीं होता उन्हें तो हाथ आये व्यक्ति पर हाथ आज़माने का मौका जो मिलता है। दूसरा बडा कारण अनावश्यक पुलसिया दबाव होता है जिसकी वजह से लोग मन मार कर रह जाते हैं। वित्रण शैली प्रभावी है।

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  34. वो रिक्शे वाला मुझे नही मिल रहा है ,उसको भी थोडी चोट आयी थी यही कुछ पट्टी हुई है उसकी ,उसका एक टायर पूरा मुड गया था ..उसको अगर कुछ पैसे दे देता .... ?


    Manti hun unse galti ho gayi hai kintu mujhe inki sanvedna evam atmiyta ko dekhkar khushi hui. Kash aise hi log hon sab hamare desh mein.

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  35. shayad aapne har padhne wale ko is baar khud ke andar jhankhne pe majbur kar hi diya hoga...ek sawal ye hi utha man mein ki kya aise haalata mein koi itna bhi shant reh sakta hai?

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  36. सच्‍चा आदमी अक्‍सर ऐसी परि‍स्‍थि‍ति‍यों में घि‍र जाता है। अनावश्‍यक दबाव में फँसे ऐसे लोगों की मन:स्‍थि‍ति‍ का सही प्रस्‍तुति‍ की है आपने।

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  37. नर में नारायण की परिकल्पना इन्हीं दृष्टांतों से जीवंत होती है,
    भाई...
    आपने इस अनुभव को शब्द देकर हौंसला दिया है..
    साधुवाद...

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  38. Anurag ji bahut dino ke baad aa paayi hoon sabse pahile ko kashma prathi hoon

    aaj khanai padhi kash ki sab aise hote
    phir kaha khud se shrddha sapno ki duniya se bahar aa jina seekh

    aajkal log zinda kaha hai

    maine is par hi ek sher kaha tha aaj aapki nazar karti hoon

    kahate hain log wo hai zinda
    nafas mein aur hararat bhi nahi

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  39. anurag ji, sach likha hai apne aksar log kisi bhi chij ko lekar kho jaya karte hai, par sach mai es kahaani ke bad kam se kam mai apna soch jaroor badal dunga, dhnyabad..

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  40. भाई अनुराग जी,
    समस्या कुछ नही होती ये तो स्वार्थ वश बनाईं जाती है. स्वार्थ वाले घटना को कहाँ से कहाँ मोड़ दे देते हैं ये एक अच्छी मिसाल है पर इंसानियत से भरा वो आदमी, जो वास्तव में कुछ उचित करवा रहा था, शायद सबसे डरा हुआ था!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

    एक अच्छी सच्ची घटना को हम सभी तक पहचाने के लिए आपको हार्दिक धन्यवाद.

    चन्द्र मोहन गुप्त

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  41. डाक्टर साहब अच्छी लगी
    यह पेशकश भी.
    आपके तजुर्बे भी दिल को
    छूते और दिमाग को झकझोरते हैं.
    ==========================
    डॉ.चन्द्रकुमार जैन

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  42. अनुराग जी,

    क्या लिखते हैं आप, पढ़कर दिल द्रवित हो गया. सच है कि देश की रीढ़ ऐसे ही लोग हैं. जब तक यह लोग बचे हुए हैं, भारत की आत्मा ज़िंदा रहेगी - और मुझे पूरा यकीन है कि हमेशा रहेगी.

    शुभकामनाएं!

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  43. Dinesh Ji ki baaat se sahamat...Achchha lagta hai ab bhi insaaniyat hai ye jaan kar

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  44. Shayad aise logon ki wajah se he ye dharti bachi hai ab tak. Shukriya Dr. Navneet, By chance aapka blog mil gaya, aur man he nahin kar raha usse door hone ka.

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  45. Sach me. Dr. Anurag, aapka likhne ka andaaz lajawaab hai...

    especially last 2-3 lines, when he asks the doctor about that rickshaw wala...which I have never expected..

    Tooo Good......and very well ended.

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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