2009-02-16

जिंदगी की कोई स्क्रिप्ट नही होती


वो फ्लेट देखने आया है ,मै उसके साथ सलाहाकार के किरदार में हूँ ,बचपन का दोस्त है ,हम पेशा है ब्रांच अलग है ...५ फ्लोर की उस बिल्डिंग में घुसते ही पार्किंग में हमें अलग अलग नंबर बड़े बड़े लिखे दिखायी देते है .हमारे चेहरे पे उगे प्रशन वाचमेन जैसे पढ़ लेता है ...सब फ्लेट के नंबर से है ..वो जवाब देता है .मै घर आए मेहमानों के बारे में सोचता हूँ ,इतने में वो एक कोने पर बने ऑफिस की तरफ़ इशारा कर देता है ...दो बिल्डरों में से एक अपने आदमियों के साथ हमें फ्लेट दिखाने ले चलता है ...छोटी -छोटी बालकनियों में सूरज शायद तय समय पर हाजिरी देने आता है ...
आस पास कोई पार्क है ? अचानक मेरा दोस्त उससे प्रश्न पूछता है .
अच्छे घरो के बच्चे अब पार्क में कहाँ खेलते है ?फ़िर हो -हो करके हँसता है ...रंग बिरंगी दीवारों के बीच पान मसाले से रंगे उसके दांत मिल गये लगते है .स्कूल-घर -टूशन ...यही तो है .वो कह रहा है .
हम सीडिया उतर रहे है अच्छे घरो के बच्चे ?मै सोच रहा हूँ.... बाहर गाड़ी में बैठकर वो घड़ी देखता है
डॉ सक्सेना के वहां भी तो जाना है .वो कहता है ...डॉ सक्सेना का चेहरा मेरी आँखों के सामने आ जाता है .
८ साल पहले जब मुझे प्रेक्टिस शुरू करे कुछ साल ही हुए थे तब उन्होंने कहा था 'अमरोहा जायेगा ?हफ्ते में एक दिन ,मेरे समधी का हॉस्पिटल है ....जिंदगी में प्लानिंग जरूरी है बच्चे ..उनका पेट डाइलोग मिलने पर अक्सर यही होता ..आठ महीने पहले मिले थे नर्सिंग होम रिनोवेट कर रहा हूँ ... एक शानदार इन्फरटीलिटी सेंटर .शांतनु को भी बुला लूँगा .. ...छोटे की बहू गायनेक है ही .....शांतनु बड़ा बेटा ऑस्ट्रेलिया में ही है ...५ महीने पहले छोटा भी अपनी बहू के साथ यु एस शिफ्ट हो गया था ...सुना है उन्हें अपने साथ ले जाने की बहुत कोशिश करी थी उसने ...
शमशान के बाहर गाडियों की भीड़ है ..अन्दर एक कोने में हम दोनों जगह लेते है ..शांतनु आ नही पाया है...थोडी देर में किसी का मोबाइल बजता है ..५० -५१ साल के वे शहर के बड़े डॉ है ...मोबाइल पर उन्हें बात करते देख गुस्सा आता है .मन करता है हाथ से छीन लूँ ओर जोर से गाली दूँ "रस्स साले ये कोई जगह है ! पर सिर्फ़ बुदबुदाता हूँ ..उस भीड़ को देखकर सोचता हूँ कितने लोग इसमे है जो वाकई दुखी है ....खून के रिश्तेदार ?उनमे भी छटनी ! ३५ -३६ साल की उम्र में मैंने कितने लोग जुटाये है अब तक ?एक दो ...गिनतियों का जोड़ मुझमे सिरहन भर देता है.
डॉ सक्सेना लेटे हुए है .शांत ....छोटा पंडित के साथ मन्त्र का उच्चारण कर रहा है ....जिंदगी की कोई स्क्रिप्ट नही होती


आज की त्रिवेणी

कभी बग़ावत , कभी मुख़ालत , रोज़ का क़िस्सा था
अब ख़ामोशी सी है हम दोनो के दरमियाँ.......

एक मुद्दत हुई उस जमीर से मिले

80 टिप्‍पणियां:

  1. "जिंदगी की कोई स्क्रिप्ट नही होती....." और कुछ नहीं कहना हमको..

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  2. जिंदगी की कोई स्क्रिप्ट नही होती सच है फ़िर भी बिना स्क्रिप्ट के उम्र बा उम्र कितनी ही कहानियाँ जन्म ले लेती हैं और अपनी छाप छोड़ जाती है......चंद शब्दों मे जिन्दगी का नजरिया........बहुत खुब...

    कभी बग़ावत , कभी मुख़ालत , रोज़ का क़िस्सा था
    अब ख़ामोशी सी है हम दोनो के दरमियाँ.......
    एक मुद्दत हुई उस जमीर से मिले
    "जमीर .........पता नही कब सो जाता है और कब जाग जाता है.....कभी बताकर भी तो नही जाता......?"

    Regards

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  3. sach. bahut bhawuk post, Zindagi koi script nahi haoti.. triveni lajawab hai aur post bhi..

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  4. मेरी rss फीड में कोई गड़बड़ है, अपडेट ही नही हुआ, और हम एक दिन लेट हो गए पढने में...एक बात बताइए...ये लोग जुटाने की गिनती में ब्लॉग वाले लोगों की जगह भी है, या वर्चुअल होने का खामियाजा हमें उठाना होगा...आप पता नहीं कैसे देखते हैं जिंदगी को इतने डिटेल में...इतने करीब से...और उसी शिद्दत से लफ्जों में उतर भी देते हैं. उसपर आज की त्रिवेणी तो बस...चुप ही करा देती है.

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  6. Sai kaha, zindagi mein koi script nai hoti.. bas uske jawabon mein aur sawal hi hote hein..

    Triveni is just too good..

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  7. अनुराग जी,हम सभी दुनिया के इस रंगमंच की कठपुतलियां हैं..इस की डोर jis के हाथ में है..वो कभी दिखायी नहीं देता.उसी के पास hoti hai-जिंदगी की स्क्रिप्ट..हाँ मगर ,इंसान के पास नहीं है.
    हम स्क्रिप्ट' लिख भी नहीं सकते ..क्या प्लानिंग करें?मृत्यु एक सच है और सब से बड़ा आश्चर्य यही है कि यह जानते हुए भी..की आज हम यहाँ है..अगले किस पल..यहाँ हों या नहीं???कौन जाने?फिर भी कभी उस सच्चाई का आभास नहीं होता unless इस तरह की ख़बर न सुनें.
    घर से थोडी दूर एक जगह है....घर के सामने से जाता हुआ रास्ता एक ही रास्ता है..'मुत्तवा' के यहाँ जाने का ,
    हर दूसरे दिन कोई न कोई एंबुलेंस गुजरती है तो मालूम चल जाता है आज फिर कोई ईश्वर के घर गया है.[एंबुलेंस के पीछे जाती गाड़ियों की भीड़ और गाड़ियों की make से मालूम चल जाता है 'वह' कितना बड़ा आदमी था!]
    उस दिन याद आ जाता है -एक बार फिर उप्परवाला और सब की खैरियत के लिए हाथ जुड़ जाते हैं ख़ुद ब ख़ुद.

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  8. यही ज़िन्दगी की सच्चाई है ...सब इस सच को जानते हैं फ़िर भी न जाने किन उलझनों में उलझे रहते हैं ..त्रिवेणी ने बहुत कुछ कह दिया है आज आपकी

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  9. काश यह सबकी समझ में आ जाये तो स्वर्गवासी होने से पहले ही हमें स्वर्ग मिल जाये.

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  10. aaj ki baat aur Triveni, donoN hi dil ko chhu gayi.
    Baqi Uparwale ko aur uski script ko to aaj tak kisi ne dekha nahiN. Jo bhi ho jata hai, baad meN bade maze se kah diya jata hai ki bhaiyya yahi likha tha Qismat meN. Is virodhabhasi sthiti par antarvirodhoN se bhara, kisi ka ek sher bhi hai:-
    Zindgi jeene ko di, jee Maine,
    Qismat meN likha tha.. pee.. to pee Maine,
    MaiN na peeta to tera likhaa galat ho jata,
    Tere likhe ko nibhaaya, kya khataa ki Maine!?

    yaani jo bhi ho jaaye, use yahi likha tha, kah-kar justify bhi kar lo, khush bhi ho lo, dil ko tasalli bhi de lo.

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  11. आज सुबह से ही सोच रहा था की आप की पोस्ट पढ़े मुद्दत हो गयी है और देखिये आज ही आप को पढने का मौका मिला...सच्चे दिल से की गयी पुकार का असर है ये...
    बेहद खूबसूरत पोस्ट लिखी है आपने...शब्दों में क्या तारीफ करूँ...कभी व्यक्तिगत रूप से मिले तो जरूर पीठ पर थपकी दूँगा...पक्का...
    आज की त्रिवेणी भी...कमाल की है.

    नीरज

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  13. दो दिन से याद कर रही थी आपको ,आप भी लंबा pause लेने लगे है आजकल .कभी आपने अपनी किसी पोस्ट में लिखा था की इन दिनों अपने बच्चो को इन्सान पैसो से जो चाहे बना सकता है डॉ या इंजिनियर ,डोनेशन ने शिक्षा में घुसपैठ कर दी है ,मध्यम वर्ग के बच्चे कभी कभी डिप्रेस हो जाते है .आज आपकी ये पोस्ट पढ़कर जाने क्यों वाही याद आ गयी.
    मैदानों से सचमुच बच्चे गायब है ,हमारे पड़ोस के बच्चे दिन ढले बुझे बुझे घर लौटते है सिर्फ़ इतवार को दिखते है ,चश्मे चढ़े बच्चे . डॉ सक्सेना के माध्यम से फ़िर आपने आइना दिखा दिया है सच मच एक पल आपकी साड़ी प्लानिंग ख़राब कर सकता है .
    त्रिवेणी दिल ले गयी .डॉ साहब .

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  14. 'एक मुद्दत हुई उस जमीर से मिले' सच ही है... बहुत कुछ बदलता जा रहा है .... ! जिंदगी कहीं छूटती जा रही है, कोई स्क्रिप्ट नहीं फिर भी इतने कन्स्ट्रेन लगा रखे हैं हमने ख़ुद ही...

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  15. इतना सुनते थे कि डॉक्टर तो मौत को बस यूं ही हो जानेवाली चीज मानते हैं। लेकिन आपकी पोस्ट पढ़ने के बाद राय बदलनी पड़ रही है। दिलचस्प वणॆन है। वैसे मौत का क्या कहें, हम अभी इस पल हैं, उस पल नहीं। जिंदगी को जीते चले जाने और प्लानिंग करते रहने से तो अच्छा है कि जमकर जिया जाये हर पल को। सबकुछ तो उस ईश्वर के हाथ में है। हम तो सिर्फ कार के पीछे की सीट पर बैठे जिंदगी का मजा ले रहे हैं। गाड़ी का ड्राइवर तो वो (ईश्वर) है। वही जिधर चाहता है, ले जाता है। वैसे आपको पढ़ते-पढ़ते एक राय ये बन रही है कि अगर आप दशॆनशास्त्र के विद्वान होते, तो समाज को आपसे शायद काफी फायदा होता। और हम एक, दूसरे डॉ अनुराग को जानते होते, जो निश्चित रूप से दाशॆनिक तो होते, चिकित्सक नहीं। आपकी पोस्ट अच्छी लगी।

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  16. बहुत अच्छा लिखा है। जीवन में लगता तो ऐसा है कि हम बस जब जो आदेश कहीं से मिलता है वही करते चले जाते हैं। कभी कभी लगता है कि फ्री विल एक मिथक है। शायद बेहद असहाय से हम बिना सोचे समझे अपना अपना पात्र जीते चले जाते हैं।
    घुघूती बासूती

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  17. मौत का मतलब अब शायद वो नही होता अनुराग जी, जो हम समझते थे...! अब ये एक सच की तरह स्वीकारी जाती है और खुन के रिश्ते में भी उसकी अपनी व्यक्तिगत संवेदनशीलता का संबंध है, अन्यथा बीवी, पति, बेटा, बेटी को भी सामान्य रहते देखा है और एक अंजान से व्यक्ति को जिसका कभी किसी रिश्तेदारी में जिक्र नही होता उसको भी डिप्रेशन में जाते देखा है.....!

    त्रिवेणी फिर लाज़वाब...!

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  18. बहुत ही दार्शनिक पोस्ट है. और सही है.


    कभी बग़ावत , कभी मुख़ालत , रोज़ का क़िस्सा था
    अब ख़ामोशी सी है हम दोनो के दरमियाँ.......

    त्रिवेणी के लिये नमन.

    रामराम

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  19. इस पोस्ट से परे जाकर भी बहुत कुछ देख रहा हू.. कितनी बाते उमड़ घूमड़ कर मन मन में आ रही है.. सोच रहा हू रिश्तो से गाँठ बाँध लू.. ताकि कभी छूटे नही. पर कितना मुनासिब है ये नही जानता.. गिनती ठीक है.. बस चार लोग चाहिए जिन्हे अपना कह साकु.. आख़िर में शायद वे ही काम आए..

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  20. अनुराग जी,

    आपकी पोस्‍ट पढी सच मानो तो लगा कि शब्‍दों से खेलना तो को‍ई आपसे सीखे। बहुत ही सादगी से अपनी बात कह जाते हो बहुत बहुत अच्‍छी लगी मुझे और साथ में लगाया गया चित्र सोने पे सुहागा

    कभी बग़ावत , कभी मुख़ालत , रोज़ का क़िस्सा था
    अब ख़ामोशी सी है हम दोनो के दरमियाँ.......

    बेहतरीन त्रिवेणी का संगम

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  21. माफ करना त्रिवेणी की एक लाईन रह गयी

    कभी बग़ावत , कभी मुख़ालत , रोज़ का क़िस्सा था
    अब ख़ामोशी सी है हम दोनो के दरमियाँ.......

    एक मुद्दत हुई उस जमीर से मिले
    बेहतरीन त्रिवेणी संगम

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  22. जमीर अगर कहीं धोखे से मिल जाए तो उससे पीछा छुड़ाना, मुंह छिपाना भारी हो जाता है।

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  23. anurag ji...aajkal marte waqt tou phir bhi 4 log kandha dene aate hain, par jeete jee 1-2 ka bhi saath mil jaaye tou zindagi...zindagi lagne lagti hai.
    sahi keh rahi hoon na?

    is bheedd mein sabhi akele hain, bas itna hai ke hum sabki zindagi mein jhaankar dekh nahi paate.

    jitne bhi ye rishte hain, kaanch ke khilone hain
    ek pal ho jaaye koi jaane kab tanha
    dekhiye tou lagta hai zindagi ki raahon mein ek bheed chalti hai
    sochiye tou lagta hai bheedd mein hain sab tanha...

    anyways....aapne post ke saath jo pic lagayi hai wo bahut hi sahi hai...ek park hai...be-rang sa...soona sa....jaise sab rang kho diye hain usne...kyunki achhe gharon ke bachhe park mein khelne nahi jaate....aur badde logon ke paas itni fursat hi kahan...isliye ye park bhi tanha ho gaya hai....veeran sa...

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  24. वाकई जिन्दगी की कोई स्क्रिप्ट नहीं होती, बस कितनी साल कितने लोगों से हम मिलते ही रह जाते हैं। पर कितनों को दोस्त बना पाते हैं, कितनों से वाकई खुद को जोड़ पाते हैं या उन्हें खुद से।

    पर एक बात तो है
    यह शमशान सत्य सब सचों से परदे उठा देता है।

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  25. कल ही हमारे एक वरिष्ठ साथी ट्रेडमिल पर व्यायाम करते करते ह्रूदयाघात से चल बसे। कोई स्क्रिप्ट फॉलो न कर पाये।
    ऐसा ही है।

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  26. "जिंदगी की कोई स्क्रिप्ट नही होती"...लेकिन फिर भी सफर जारी रहता है.........सब कुछ जान कर भी ऐसे ही चलता रहेगा।अच्छी पोस्ट है।

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  27. "The world is a stage and we are all actors"
    (शायद Shakespeare का लिखा है)
    थोड़ा बहुत तो सच है ही

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  28. हां, आजकल अच्छे घर के बच्चे बगीचे में नहीं खेलते- टीवी से चिपके रहते हैं।
    >जब भी मैं ‘इनफ़र्टिलिटी’ का बोर्ड देखता हूं तो लगता है शब्द फर्टिलिटी होना चाहिए- पता नहीं क्यों!
    >शब्दकोश देखा तो उसमें ‘मुखालत’ शब्द नहीं मिला। हां, मुखा़लिफत शब्द है।
    >मन को छूने वाले लेख के लिए बधाई, डाक्टर साहब।

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  29. sahi kaha doc saab,zindagi ki koi script nahi hoti,humkuch aur sochte hai,ho kuch aur jaata hai,chillane se mann halka jarur ho sake,magar hum wo bhi nahi karte hai na,mann mein hi keh jate hai.
    chotisi balkani aur samay par suraj ki haaziri ,bahut khub line,aur us jamir se mile muddate huyi ek khubsurat triveni.

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  30. सही कहा आपने जिन्दगी की कोई स्क्रिप्ट नही होती ,हमेशा की तरह अच्छी पोस्ट ,और ये भी एकदम सच हैं की कब किसे चला जाना (ईश्वर के यहाँ )हैं यह कोई नही जानता .

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  31. बिलकुल सही कहा आपने। आदमी परिस्थितियों का दास है, जब जहाँ जैसी परिस्थिति हो, उसे वैसा ही निर्णय लेना होता है।

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  32. बिल्कुल कोई स्क्रिप्ट नही लाइव ड्रामा है जिन्दगी . कब क्या कैसे हो जाए किसी को पता नही . सपने सपने ही रह जाते है और इंसान अपनी ही औलादों के ही हाथो हारता है .
    और त्रिवेणी हमेशा की तरह लाजबाब

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  33. "अच्छे घरो के बच्चे..." से "प्लानिंग जरूरी है..." होते हुए "मन्त्र का उच्चारण" तक आते हुए अहसास हुआ, वाकई "जिंदगी की कोई स्क्रिप्ट नही होती"

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  34. एक मत़अला आपके नाम करता हूं अनुराग जी

    हाले-दिल इस तरह सुनाते हो
    जैसे कि आईना दिखाते हो

    साधुवाद अनुराग जी

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  35. अनोखी टेलीपैथी : पिछले ही महीने यहाँ एक वरिष्ठ चिकित्सक की मृत्यु के उपरांत कुछ अलग से ख़्याल मेरे ज़ेहन में चल रहे थे । पोस्ट न लिख सका, टाइमखोटीकार को टाइम का टोटा और.. उनके परिजनों के शांत होने पर उनकी अनुमति की प्रतीक्षा... पर अब मन डोल रहा है, इतना अच्छा न लिख सका तो ख़्वामख़ाह बे इज़्ज़ती ख़राब हो जायेगी ।
    ला अपना हाथ तो दे, तनिक चूम तो लूँ ।
    मेरे खुर माँगा करता है, तो यह भी निभा :)

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  36. छोटी -छोटी बालकनियों में सूरज शायद तय समय पर हाजिरी देने आता है ...
    :
    muje to ye sabse badhiya laga....bahut kuch kahta hai ye sentence aapka......

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  37. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  38. सच कह दिया अनुराग जी कि जिंदगी की कोई स्क्रिप्ट नही होती। रविवार को कई जिदंगियों को खामोश होते देखा था। आप लम्हों से जिदंगियाँ निकाल लाते है। और त्रिवेणी तो हर बार की तरह बहुत ही अच्छी हैं।
    कभी बग़ावत,कभी मुख़ालत,रोज़ का क़िस्सा था
    अब ख़ामोशी सी है हम दोनो के दरमियाँ.
    एक मुद्दत हुई उस जमीर से मिले

    अद्भुत।

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  39. है न ज़िन्दगी की एक स्क्रिप्ट। सबके लिए एक जैसी है। बस अपने हिस्से का कर्म करो और मोह माया में न फसों, जितना फसोगे उतना इससे बिछड़ने का दर्द होगा।
    दिल के रिश्ते कब बन जायेंगे आपको पता ही नही चलेगा। बस चलते रहिये मंजिल पर देखेंगे पूरा काफिला आपके साथ है।

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  40. बहुत सशक्त प्रस्तुति. शब्द-चित्रण ऐसा है कि घटनायें आंखों से समक्ष आ जाती हैं.

    जिन्दगी की कोई स्क्रिप्ट नहीं होती को औषधिशास्त्र की भाषा में कहा जाये तो जिंदगी की कोई "टिपिकल" स्क्रिप्ट नहीं होती. हर केस अपने आप में अनोखा होता है!!

    सस्नेह -- शास्त्री

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  41. ज़िंदगी की स्क्रिप्ट नहीं होती शायद इसीलिए ज़्यादातर इंसानी कहानियों का यहां एंटी क्लाइमैक्स हो जाता है! अच्छा लिखा है आपने।

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  42. यह बोध तो हमें उसी जगह होता है. फ़िर यथावत, जाला बुनते बैठ जाते हैं. सुंदर आलेख. आभार.

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  43. सही...सटीक है
    डाक्टर साहब
    ==============
    डॉ.चन्द्रकुमार जैन

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  44. छोटी -छोटी बालकनियों में सूरज शायद तय समय पर हाजिरी देने आता है ...
    आस पास कोई पार्क है ? अचानक मेरा दोस्त उससे प्रश्न पूछता है .
    अच्छे घरो के बच्चे अब पार्क में कहाँ खेलते है ?फ़िर हो -हो करके हँसता है ...रंग बिरंगी दीवारों के बीच पान मसाले से रंगे उसके दांत ......अनुराग जी ये है आपकी लेखनी का कमाल...! जिसे आम आदमी नजरअंदाज
    कर देता है...और त्रिवेणी तो माशा अल्‍लाह...!!

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  45. जुटाये लोग-वो भी एक से भी ज्यादा.अतिश्योक्ति सी लगती है. वाकई, जिन्दगी की कोई स्क्रिप्ट नही होती-बस, अंत में पढ़ी जा सकती है एक यथा कथा. दर्शनशास्त्र के अध्याय सा लगा यह आलेख.

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  46. एक मुद्दत हुई उस जमीर से मिले ???? लेकिन मुझे मुद्दत हुई किसी जमीर वाले से मिले...
    अनुराग जी भाई आप की पोस्ट पढ कर दिल बेचेन सा हो जाता है.
    धन्यवाद

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  47. अनुराग भाई ,आप मुझे माफ़ करेंगे, क्योंकि मैं मानता हूं कि ज़िंदगी की स्क्रिप्ट तो होती है. हम आप सभी रोज़ रोज़,एक छोटी छोटी सी कहानी बुनते रहते है, तो कभी बडी़.

    फ़र्क सिर्फ़ इतना है, कि हम इस स्क्रिप्ट के मात्र लेखक है, और अभिनय करने वाले पात्र, मगर हमारा डायरेक्टर वो ऊपर वाला है, जो पता नहीं कब हमारी स्क्रिप्ट में बदलाव कर अपने मन माफ़िक मंचन करता रहता है.

    तभी तो ये सही कहा गया है कि हम सब रंगमंच की कठपुतलीयां है.

    संक्षेप में हम हमारे प्लान को एक्ज़िक्युट कर पाने में अक्षम है.

    मुझे फिर क्षमा करेंगे क्योंकि मैंने बहाव के विरुद्ध तैरने की धृष्ट्ता की है, क्योंकि मैं आपके इस कहे में विश्वास रखता हूं कि हम एक संवाद के रास्ते को खोलते हैं, एक सार्थक निष्कर्ष पर पहुंचने के लिये..

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  48. बीच बहस में कूद पड़ने के लिये अनुराग कोई आपत्ति न करेंगे, यह मान कर..
    क्षमा करें, कवठेकर जी,
    मैं यहाँ अतिप्रचलित एक दो उदाहरण रखना चाहूँगा..
    Man proposes God disposes क्या है ?
    इसी "... पुरुषस्य भाग्यम, दैवं न जानोति.." में निहित संदेश को
    कवि प्रदीप ने " कोई लाख करे चतुराई, करमवा भेद न जाने भाई " से अनुवादित किया है ।

    और यह उदाहरण किन्हीं मोटी पोथियों से नहीं उठाया है...
    संदर्भग्रँथों की बारी तो बाद में आयेगी ।

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  49. जिंदगी की कोई स्क्रिप्ट नही होती

    पूरी पोस्ट पर भारी पड़ी ये लाईनें.....लाजवाब

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  50. dear anuraag ,

    I am speechless again.. meri apni ek poem yaad aa gayi " laash "

    aaj usi ko post kar doonga ..

    duniya bhi kya hai yaar..

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  51. aapki post padhkar bahooot alg or badhiya laga. ak jindgi ki apni etni kahiniya hoti h ki har ak script jesi h par sahi mayne m to end m hi pata chalta h ki sachhiya kya. bahoot achha likha apne....apno m bhi apno ki talash...

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  52. जिंदगी की स्क्रिप्ट तो होती है सिर्फ लेखक कोई और होता है । आपकी त्रिवेणी हमेशा की तरह जिंदगी का फलसफा पढाती हुई ।

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  53. आपसे मिला नहीं हूँ डाक्टर साब लेकिन लगता है कब से जानता हूँ......और जानने का ये जरिया शब्द है.......शब्दों से भी रिश्ते जुड़ते हैं
    "गिनतियों का जोड़ मुझमे सिरहन भर देता है..."
    पढ़ कर एक सिहरन अपने अंदर भी महसूस की

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  54. फिर से आया त्रिवेणी पे जो कुछ कहना भूल गया था.....आना महज कुछ कहने के लिये नहीं था-है.....बस यूं ही

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  55. डॉ सक्सेना लेटे हुए है .शांत ....छोटा पंडित के साथ मन्त्र का उच्चारण कर रहा है ....जिंदगी की कोई स्क्रिप्ट नही होती


    वाकई जिंदगी की कोई स्क्रिप्ट नही होती

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  56. कितनी अजीब बात है! हम आने वाले कई सालों की प्लानिंग करते रहते हैं जबकि हम अगले पल के बारे में भी नहीं जानते!मैंने ऐसे भी कई लोग देखे हैं जिनकी म्रत्यु पर बिन बुलाए लोग जुट जाते हैं और असली आंसू भी गिरते हैं!शायद रिश्ते कमाना इसी को कहते हैं!

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  57. जमीर से सामना आज कितने कर सकते है पैसा कमाना उसका प्रदर्शन करना आसन है उसी तरह त्रिवेणी को लोग कितना भी गन्दा क्यों न करार दे या प्रचारित करने का प्रयास करें किंतु "त्रिवेणी"
    रहेगी सदा की ही तरह पवित्र की पवित्र . आप की भी आज की त्रिवेणी भी जितनी पवित्र है उतनी ही कमाल की भी है.
    चन्द्र मोहन गुप्त

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  58. जीवन के निष्ठुर सत्य को बाखूबी लिखा है आपने...........ज़िन्दगी कोई स्क्रिप्ट नही होती.

    त्रिवणी सदा की तरह खिलती हुयी है

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  59. जिंदगी की स्क्रिप्‍ट तो होती है जी जरूर
    पर हम उसमें बदलाव नहीं कर सकते हुजूर।

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  60. वाह ।
    ज़िन्दगी के सबसे बड़े सच से इतने कम शब्दों
    मेँ परिचित कराती रचना

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  61. वाह ।
    ज़िन्दगी के सबसे बड़े सच से इतने कम शब्दों
    मेँ परिचित कराती रचना

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  62. इंसान की जिन्दगी मैं कुछ निर्मम क्षण होतें ही हें ,इसके पीछे समाज की ठोस सच्चाइयां मौजूद रहती हें,जो दिखाई देता है ..महसूस होता है ,उस सच के पीछे एक और सच होता है.....शायद कभी-कभी कोई मासूम मजबूरी.....मुझे नही मालूम बस इतनी पुख्ती से लिखा है आपने की उस शिद्दत को ज्यों का त्यों महसूस किया जा सकता है ..आपकी लेखनी की कायल हूँ सच्ची शुभकामना प्रेषित है ....

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  63. क्षमा करना अनुराग भाई देरी से आया, वाकई ज़िन्दगी की स्क्रिप्ट पहले से लिखी होती तो कितना अच्छा होता लेकिन ज़िन्दगी में तो सबकुछ् बिना रिहरसल के करना पड़ता है तैयारी किसी चीज़ की होती है करना कुछ और ही पड़ जाता है।
    आपकी ये पोस्ट पढ़ कर किसी की ग़ज़ल की ये पंक्तियाँ याद आ गयी।

    " देखिए मोड़ लेती है क्या ज़िन्दगी।
    भूल बैठी है अपना पता ज़िन्दगी।
    आपकी तरह ख़ूबसूरत बहुत,
    आपकी तरह बेवफा ज़िन्दगी।

    आपकी ये पोस्ट वाकई शानदार है।

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  64. Vaastav me zindagi ki koi script nahin hoti.
    Triveni bhi kaphi achchi lagi.

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  65. मौत से गुजर जिन्दगी के करीब लाने वाली पोस्ट..
    सच्चाई उगल चुप कर देने वाली त्रिवेणी...

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  66. ऐसा अक्सर होता है जब एक पल महज़ चंद मिनटों का सब कुछ तहस नहस कर देता है .खास तौर से उस वक़्त जब आप को लगता है अब सब कुछ ठीक जा रहा है....कभी कभी कुछ पल जैसे चेतावनी देते है आप कितने क्षण भंगुर है .जैसे आपकी औकात बताने या याद दिलाने के लिए आते है ..बहुत बार मन दार्शनिक हो उठता है ..जीवन सिर्फ एक बार मिला है .मानव जीवन..अब तक अपने लिए जिया है ..दूसरो के लिए क्या किया ....कभी कभी लगता है कितने लेखक ,कलाकार आज भी दिल में जगह बनाये बैठे है...किशोर को सुनता हूँ..लगता है अमर हो गए .उनकी आवाज का जादू हमेशा रहेगा....पर ऐसे विचार इस तेज रफ़्तार जिंदगी में आते है गुम हो जाते है फिर आते है ...सड़क किनारे किसी नन्हे पिल्लै को देख डर लगता है की शाम तक जीवित मिलेगा या नहीं.....जीवन बड़ा विचित्र है .ऊपर वाले का खेल भी....आस पास ऐसे ऐसे कई लोग है जो प्रतिभावान है मेहनती है पर जिंदगी के पैमाने पर पिछडे हुए है .जबकि उनसे कही कमतर ओर इंसान के तौर पर भी गलत लोग आगे है.तो सोचता हूँ ऐसी गड़बड़ क्यों है उसके हिसाब किताब में ?सवाल बड़े सारे है .जवाब मिलता नहीं....सवाल बढ़ते चले जाते है

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  67. anurag ji

    uske hisaab kitaab mein kuch gadbad nahi hai....farak itna hai ke wo hamare pichhle janmnon ke karmon ko jaanta hai par hum nahi jaante. hisaab tou hume chukaana hi hoga apne karmon ka....koi pehle achhe karam kar ke aaya hai aur ab aish kar raha hai...aur koi is zindagi mein achhe karmon ki kamayi kar raha hai aage ke liye, par abhi uska fal use nahi mil sakta coz pichhle karmon ka balance baaki hai :)

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  68. ज़िन्दगी है तो स्क्रिप्ट भी है लेकिन विचित्र है...कहीं आधी अधूरी है तो कहीं सम्पूर्ण और अमरत्त्व लिए है...

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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