इक सबब जीने का ….इक सबब मरने का


भागते दौड़ते उस घर के किसी कोने में ..एक कमरे की अपनी दुनिया में .पेशाब की गन्धो में .किराये पे रखे हुए तीमारदारों के साथ ...जो हर बारह घंटे के बाद बदल जाते है..मशीनों के बीच .एक जिंदगी थमी सी रहती है....कमरे के बाहर दुनिया अपनी नैसर्गिक गति से बिना अवरोध के चलती है..घर का कोई प्राणी आपकी आमद से ठहरता नहीं .....किसी आँखों में कोई जिज्ञासा नहीं...कोई प्रश्न नहीं.....आपकी विजिट के पैसो पर कोई जिरह नहीं होती.... नर्सिंग असिस्टेंट ही आपको दरवाजे तक छोड़ने आता है.....६५ साल की उन आँखों में एक अजीब सी उदासी है जो देर तक आपके साथ तक चली आती है .....
छह साल की आयशा पेराप्लेज़िक है .ओर मै उसके डॉ की भीड़ में शुमार एक नया अस्थायी डॉ...बस एक फर्क से वो मुझे उनसे अलग करती है मेरी मूंछे नहीं है.....दूसरी विजिट में वो मुझे अपनी ड्राइंग दिखाती है ...तीसरी में उसमे रंग भरके ......पिछले दो सालो से वो बिस्तर पर है...दवाई की शीशीया उसके खिलोने है ..एक्स रे ...के कवर से वो डाईगनोस्टिक सेंटर का नाम पढ़कर सुनाती है...दो साल पहले स्कूल बस के एक्सीडेंट में उसकी स्पाइन इंजर्ड हुई है...निचला हिस्सा ???.........उसके पेरेंट्स को प्रोग्नोसिस एक्सप्लेंड है...फिर भी जाने कौन सी शक्ति है जिससे वे उसके जीवन को इन हालातो में बेहतर बनाने के लिए प्रतिबद्ध है बावजूद तमाम प्रतिरोधो के जिनमे आर्थिक पहलू भी है ......
पिछले नौ सालो की पेशेवर जिंदगी के कुछ अनुभव जीवन के एक ओर यथार्थ को सामने रख इसके भीतर मौजूद अनदेखी रिक्तता का भेद खोलते है ..अस्वस्थ शरीर के साथ दूसरे पर निर्भर रहने का अहसास ..आत्मग्लानि ओर कुंठित होता मन.....सामने वाले की आँखों में गुजरते समय के साथ दरकती संघर्ष भावना , टूटती उम्मीदे .....रोज धकेले से गये दिन ... ऐसा मौन विलाप है .....जहाँ रिश्तो की आँखों में म्रत्यु के लिए एक मौन सहमति है ओर निर्णायक सिर्फ ओर सिर्फ वक़्त है... ....हालात से लड़ने के लिए अनदेखे ईश्वर का .....एकमात्र सहारा
पर जब कोई मरीज ऐसी गुहार लगता है“मै अपना ऐसा वजूद नहीं चाहता जिसे होने के लिए ड्रिप दवा,ओर डायलेसिस की जरुरत हो .. मै डिग्निटी के साथ मरना चाहता हूँ मुझे मेरी म्रत्यु चुनने का भी अधिकार दीजिये ... ठीक ऐसे ही जैसे मुझे जीने का अधिकार है... ” तो इच्छा म्रत्यु अथवा यूथनेसिया पर समाज में अपने अपने तर्कों के साथ बहस छिड जाती है.... एक ओर सफरर ओर दूसरी ओर समाज ....याधिपी सफरिंग की कोई डेफिनेशन नहीं होती ...ओर ना दर्द की कोई डाइमेंशन ….. तर्क ...विज्ञानं ..से अलग अपनी अपनी नैतिकता , बची हुई .मानवता . लिए. डॉ एक अनजाने अपराधबोध ओर अपने कर्तव्य बोध की पशोपेश से गुजरते है....... हमारे समाज में भले ही इस पर सार्वजानिक बहस ना के बराबर हुई है पर इस देश की मेडिकल फेटरनिटी भी अक्सर ऐसी बहसे अपने अपने दायरे में चलाती रही है...

इंडियन जर्नल ऑफ़ मेडिकल एथिक्स में डॉ ए के थेरियन का अनुभव आँखों को जैसे एक नयी दृष्टि देता है .... की लन्दन के उनके हॉस्पिटल में जब इमरजेंसी में एक वृद्ध महिला को वे पुन रिसक्सीटेट करने की कोशिश कर रहे थे जिसके सिमटम उसके ब्रेन डेमेज की पुष्टि कर रहे थे .तो वहां मौजूद उनके सर्जरी के हेड जो खुद एक डिवोटेड क्रिश्यन थे ने उनसे कहा "मै तुम्हारी किसी कोशिश में बाधा नहीं डालना चाहता पर यदि इनकी जगह मेरी मां होती तो मै वो सब नहीं करता जो तुम कर रहे हो ...मै उन्हें शांति से म्रत्यु में जाने देता '"
ये दुविधा अक्सर कई डॉ को होती है .क्या वे जीने की प्रक्रिया को बढा कर ओर तकलीफदेह नहीं बना रहे है जहाँ वे जानते है म्रत्यु तय है .या हम जिसे वास्तविक जीवन कहते है वो ख़त्म हो चूका है .मोर्डन साइंस टेक्नोलोजी में में जब हमारे पास आदमी को मशीन के सहारे जिंदा रखने के अनेको हथियार है ..आर्टिफिसियल फीडिंग , डायलिसिस , कंट्रोल्ड रेस्पिरेशन , पम्प सर्कुलेशन ...शायद कुछ मामलो में दर्द से भरे .अमानवीय भी....
कुछ महीनो पूर्व हमारे देश में भी एक सवाल उठा था .. क्या गर्भ में रहे शिशु की जन्म से पूर्व विकलांग होने या किसी असाध्य रोग होने की जानकारी उसके जीने का अधिकार छीन लेती है ?मेडिकल भाषा में सेरेबरल डेथ को म्रत्यु कहा गया ..बावजूद दिल ओर फेफडो के काम करने के ....डॉ थेरियन इस बहस को अपने दो अनुभव से उस दिशा में मोड़ते है जहाँ उम्मीद है जीवन के प्रति आशा ओर किसी दुःख के पीछे कारण ढूँढने की कोशिश...
मेरे दोस्त के एक ऐसा ही असामान्य बच्चा पैदा हुआ तो उसने ईश्वर से पूछा क्यों ?पर जवाब फ़ौरन नहीं मिला ..उसने बच्चे को उसी शिद्दत ओर जतन से चाहा..पर बच्चा उनके प्यार को उस तरह से रिस्पोंड नहीं करता था .जैसे सामान्य बच्चे बढ़ते हुए करते है...उन्होंने जाना की कैसे ईश्वर भी मनुष्य से बिना प्यार लिए वैसे ही स्नेह करता है ......
दूसरा दंपत्ति डॉ था....बच्चे के पैदा होने के तुंरत बाद मुश्किल हालात हुए ..खून चढाने की जरुरत पर उनके कुलीग्स ने उन्हें भावनाओं से उबरने की सलाह दी...वे दोनों हालात से लड़े ...बच्चा ठीक हुआ ...ओर ४ महीने के बाद उसकी म्रत्यु हुई..उनका मानना था ईश्वर ने उन्हें जीवन में एक नया कारण दिया है ...दोनों ने नौकरी छोडी ओर ऐसी सोसाइटी की स्थापना की जिसमे इस तरह के बच्चो की विशेष देखभाल हो सके .जिंदगी का वो दुखद अनुभव उन्हें जिंदगी का एक नया उद्देश्य दे गया .

पर स्थितियों के आगे असहाय होने का अहसास ओर किसी अपने के एक अधूरे जीवन को अपनी आँखों के सामने तिल तिल मरते देखना आसान है ...तब क्या सारी बहसे अर्थहीन ओर सारे ढाढस कोरी लफ्फाजी महसूस होते है ? जीवन -म्रत्यु अनेको अनुतरित प्रश्न सामने लिए खड़े है उनमे से एक प्रश्न ये भी है....
केवल संवेदना ही मनुष्य को दूसरी प्रजातियों से अलग करती है ... ओर इस समाज की लुप्त होती सवेदनशीलता को कैसे कायम रखा जाये वर्तमान में इंसान के लिए ये भी एक चुनौती है..
दो साल या उससे अधिक से कोमा में पड़े हुए इंसान की चमत्कारिक वापसी क्या विज्ञानं को मानव शरीर के अनसुलझे रहस्यों की एक लम्बी यात्रा तय करने को प्रेरित करती है या .......इस बहाने ईश्वर अपने अस्तित्व के कोई संकेत देता है.?

72 टिप्पणियाँ:

seema gupta ने कहा…

दो साल या उससे अधिक से कोमा में पड़े हुए इंसान की चमत्कारिक वापसी क्या विज्ञानं को मानव शरीर के अनसुलझे रहस्यों की एक लम्बी यात्रा तय करने को प्रेरित करती है या .......इस बहाने ईश्वर अपने अस्तित्व के कोई संकेत देता है.?
" इश्वर अपने अस्तित्व का एहसास यदा कदा ऐसे भी करता रहता है......."
छह साल की आयशा के बारे में जान कर दिल दुखी हो गया है....., किसी भी तरह की विकलांगता जो साधारण जीवन को जीने में बाधित करती हो हर तरह से दुःख का कारन बनती है और मन में नीरसता को बदावा देती है ....फिर से जीवन के सत्य लाचारी विवशता को jakhjorta लेख .."

Regards

Udan Tashtari ने कहा…

डॉ ए के थेरियन और आपके अनुभव पढ़े. निश्चित एक विराम पर इश्वर अपने होने का सिर्फ संकेत ही नहीं, विश्वास करा जाता है. लोग उसे मिराकल कहें या कुछ और, क्या फरक पड़ता है.

अनिल कान्त : ने कहा…

कोई कहता है ईश्वर है तो कोई ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानता ...और तीसरा वर्ग है जो इस पशोपेश में है की है या नहीं पता नहीं ....जब तक मुझे उसके होने का एहसास नहीं होता मैं कैसे मान लूं की वो है ....हाँ तब तक मैं ये भी नहीं कह सकता कि वो नहीं है

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

शायद जहां हमारी दुनियां खत्म होती है उसके आगे ईश्वर की दुनियां शुरु होती होगी.

लाख हम ना माने पर पल पल चमत्कार तो रोज ही दिखते हैं. अब कोई संवेदना हीन हो तो उसको नही दिखाई देंगे. बहुत मा्र्मिक आलेख. शुभकामनाएं.

रामराम.

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) ने कहा…

बिल्कुल सही कहा आपने.. इस बहाने ईश्वर अपने अस्तित्व के कोई संकेत देता है...

वर्षा ने कहा…

ईश्वर का तो पता नहीं पर इच्छा मृत्यु, मौत को दवाओं से टालते रहना, कई बार स्थिति भयावह हो जाती है। इसीलिए मुझे लगता है कि इच्छा मृत्यु पर भी बहस होनी चाहिए।

डा. अमर कुमार ने कहा…


मानव शरीर की जटिला संरचना के अध्ययन के समय से ही मैं स्वयं ही चमत्कृत रहा करता हूँ, इस बनावट की अबूझ पहेली से !
लिवर की कोशिका एकड़ में फैले बड़े सुगर फ़ैक्टरी और फ़ूड प्रोसेसिंग प्लांट को जिस तरह चिढ़ाती है, क्या किसी को आश्चर्य नहीं होता ? मष्तिष्क की कोशिकायें डाटा स्टोरेज और सिगनल एनालिसिस कितनी बख़ूबी करती हैं.. अनायास ही मन नतमस्तक हो जाता है । प्रजजन जारी रखने हेतु संसर्ग-प्रलोभन के मायाजाल क्या सिद्ध करते हैं ?
इसे संचालित करने वाली शक्तियों को अपने सुविधानुसार कोई भी नाम दे दो... यहाँ संता बंता भी बगले झाँकते दिखते है, शायद कह भी उठते हों.. " हरि अनंत हरि कथा अनंता "
ज़िन्दे रह पुत्तर, बहुत पसंद आयी यह पोस्ट !

डा. अमर कुमार ने कहा…


एक बार फिर से पढूँगा !

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

एक बार फिर से पढूंगा, फिर भी शायद वह टिप्पणी न दे पाउंगा जो देना चाहता हूँ ।
धन्यवाद ।

मीत ने कहा…

बहुत ही मर्म से भरा लेख है आपका पर कहीं न कहीं तो चमत्कार है ही...
मीत

कुश ने कहा…

इस विषय में कई बार सोच चूका हु.. कुछ ऐसे जवाब नहीं मिला जिस पर अडिग रह सकू.. परिस्थितिया हमें मजबूर करती है कोई भी निर्णय लेने के लिए.. अगर किसी ऑर के बारे में बात हो तो मेरा निर्णय कोई मायने नहीं रखता.. मुझे लगता है हर केस में मन अलग अलग राय देता होगा... मैं कभी ऐसे निर्णय ले तो नहींपाउँगा.. पर आज की आपकी इस पोस्ट ने बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया..

संवेदनाये क्या किसी अपने के जाने पर ही जागती है.. क्यों न हम बिना किसी वजह के संवेदनशील हो जाये.. ईश्वर को इशारा करने की जरुरत ही न पड़े..

पर शायद अब हमारी सोच स्व केन्द्रित रह गयी है.. पता नहीं इसका कोई हल कभी निकलेगा भी या नहीं.. एक अजीब सी फीलिंग आ रही है अभी तो..

neeshoo ने कहा…

अनुराग जी अनिल भाई की बात मैं सहमत हूँ । मैं भी नहीं मानता ऐसा कुछ ।

अल्पना वर्मा ने कहा…

'इज्ज़त से मरने का अधिकार 'हर इंसान को होना चाहिये.लेकिन कितना उस इच्छुक व्यक्ति के हाथ में हो?और कितना परमपिता के?कितना इलाज कर रहे डॉक्टर को दिया जाये?सवाल और बहस इसी बात पर है.
कोई भी वह मरीज जो बिस्तर से लग गया है..कहिये bedridden है.उस का प्रोग्नोसिस positive नहीं है.उस को यह अधिकार चुनने की आजादी होनी चाहिये.निर्भरता ,लाचारी में हर पल घुटते और शारीरिक तकलीफों में रहने से बेहतर है मृत्यु .
अविकसित भ्रूण - संभावित handicapped शिशु को दुनिया में आने से रोकना गलत नहीं है.ऐसा व्यक्ति जिस की आमाद के लिए कोई नहीं होता,सब बीमारी की वजह से ठुकरा गए होते हैं.कोई उस की 'सफाई ' के लिए भी उस के पास नहीं फटकता .. उस से कभी पूछ कर देखीये?
बेहोश इंसान की भी सुनने की क्षमता सब से देर में जाती हैं.. यहाँ तक की एक कोमा में पड़ा व्यक्ति आप को सुन सकता है..कभी बातें करीए और उसकी आँखों से निकलते आंसुओं को देख कर क्याकहेंगे?अंतिम स्टेज के कैंसर का मरीज ,सब से ज्यादा स्किन के कैंसर के मरीज़ से ही दुर्गन्ध आती है.कौन उस के पास रूक पाता है..उन से पूछीये. वह क्या चाहेंगे?
इच्छा मृत्यु के अधिकार को कितना जायज ठहराया जायेगा..कह नहीं सकती.लेकिन हर इंसान यही चाहता है कि
आराम ही मृत्यु मिले..कभी bedridden न रहना पडे.
एक बेहद संवेदनशील विषय उठाया है आज आप ने.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत ही अच्छे विषय को अपने ही तरीके से रखा है आपने ..............इस बात का जवाब इतना आसान होगा..........समझ से परे है.........
मृत्यु का अधिकार इंसान के हाथों होना चाहिए या नहीं............वो भी अपनी मृत्यु का

अल्पना वर्मा ने कहा…

पिछली टिप्पणी से आगे--
आप ने लिखा-ईश्वर अपने अस्तित्व के कोई संकेत देता है.? -

बिलकुल सही...ईश्वर तो है ही..इसी लिए अपने अपनों के लिए दुआ करने ,हम हमेशा उसी अनदेखी शक्ति के पास पहुंचते हैं.मेरा तो बहुत विश्वास है प्रार्थना में /ईश्वरीय शक्ति में.
इस लिए कभी उम्मीद का दामन हाथों से नहीं जाने देना चाहिये.कई बार कुछ खोने के बाद कुछ पाने का अहसास भी वक़्त करा जाता है.इस लिए जो होता है उस के होने में भी कुछ न कुछ कारण होता है.

अल्पना वर्मा ने कहा…

अंत में-
मन व्यथित कर गयी आप की यह पोस्ट.
spinal cord injury centre या कैंसर रोगियों या ICU mein अंतिम साँसें गिन रहे उन मरीजों से मिलें तो दुनिया का अलग कोना और उस में जीवन का सच-' मौत 'की डरावनी शकल से परिचय होता है.

Syed Akbar ने कहा…

दो साल या उससे अधिक से कोमा में पड़े हुए इंसान की चमत्कारिक वापसी क्या विज्ञानं को मानव शरीर के अनसुलझे रहस्यों की एक लम्बी यात्रा तय करने को प्रेरित करती है या .......इस बहाने ईश्वर अपने अस्तित्व के कोई संकेत देता है.?

--- कहीं पढ़ा था.... "ईश्वर तो है. तुम हो या नहीं ये तर्क का विषय है."

और ये बात कम से कम मुझे तो सही जान पड़ती है.

Hari Joshi ने कहा…

उलझा दिया आपने। फिर लौटूंगा तब तक शायद दिमाग काम कर करना शुरु कर दे।

Vineeta Yashswi ने कहा…

दो साल या उससे अधिक से कोमा में पड़े हुए इंसान की चमत्कारिक वापसी क्या विज्ञानं को मानव शरीर के अनसुलझे रहस्यों की एक लम्बी यात्रा तय करने को प्रेरित करती है या .......इस बहाने ईश्वर अपने अस्तित्व के कोई संकेत देता है.?

kabhi kabhi ISHWAR ki upsthiti ka ahsas hota to hai...

neelima ने कहा…

शायद आप ही इस पोस्ट को लिख सकते थे ,ओर इतनी देर क्यों लगी ये समझ नही पायी .अक्सर लम्बी पोस्ट लिखना लोग नही चाहते है पर अगर आप इसे भी अपने अंदाज में संक्षिप्त में समेट देते तो शायद कही अधूरापन सा महसूस होता .आपके दोनों अनुभव रिश्तेदारो की इच्छा शक्ति को दिखाते है पहले में जहाँ शुन्य है दूसरे में जीने की आशा कूट कूट कर भरी हुई है .यही स्थितिया शायद इंसान को किसी सोच पे निर्भर करती है .आपके शब्द
"टूटती उम्मीदे .....रोज धकेले से गये दिन ... ऐसा मौन विलाप है .....जहाँ रिश्तो की आँखों में म्रत्यु के लिए एक मौन सहमति है ओर निर्णायक सिर्फ ओर सिर्फ वक़्त है... ."
बहुत कुछ कह जाते है.जहाँ तक डॉ कुरियन का सवाल है मानती हूँ की वे एक नया विशवास दे रहे है पर सच कहूँ तो मै भी एक परजीवी जीवन नही चाहती .इस विषय पर व्यापक बहस की आवश्यकता है जहाँ आदर्श शब्दों के जाल से अलग सीधी सच्ची बात जो महसूस की जाए वो कही जाए .....क्यूंकि जब इन्सान अपने शरीर से लाचार होता है तब ये सारी दुनिया खोखली ओर अर्थहीन लगती है.

prabhat gopal ने कहा…

dard se bhara aalekh

kanchan ने कहा…

अनुराग जी आपकी इस पोस्ट पर बहुत बहुत लिख सकती हूँ, बोल सकती हूँ.....! या फिर बहुत कुछ मन ही मन बोल भी रही हूँ...! मगर....! कुछ बातें कहने से ज्यादा आसान उन्हे सहना होता है...!

Arvind Mishra ने कहा…

स्तब्ध सा हूँ क्या लिखूं ?

रंजना ने कहा…

पढने के बाद इतनी सारी बातें दिमाग पर छा गयी हैं कि, किसी एक पर फोकस कर कुछ कह पाना,कठिन लग रहा है....

एक दृश्य आँखों के सामने घूम गया है.....अभी पिछले वर्ष मैं कुछ महीने दिल्ली में रही थी और मेरे साथ ही वह लड़की जो मेरा यहाँ घर सम्हालती है,वह भी थी...उसका पूरा परिवार यहीं जमशेदपुर में रहता है..यहीं उसकी माँ की तबियत खराब हुई और फोन करने पर घरवाले यही बताते कि उसे लू लग गया है...जब ५-६ दिन तक यही स्थिति रही तो मैंने वहीँ से उन्हें डांट डपटकर डॉक्टर के पास भेजा..डॉक्टर भी ऐसे निकले कि उसे ४ बोतल पानी चढ़वाकर वापस घर भेज दिया...दो दिन ठीक रहकर उसे फिर से बुखार हो गया और अगले दो दिन बाद पता चला कि उसे ब्रेन मलेरिया हो गया है...किसी तरह वहीँ से व्यवस्था कर मैंने उसे बड़े अस्पताल में दाखिल करवाया लेकिन तबतक वह कोमा में चली गयी थी..
अगले एक आठ दिन तक वह लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर सी सी यू में रही जहाँ हर चौबीस घंटे का बिल पचीस हज़ार रुपये का आ रहा था....सी सी यू में डालने के अगले दिन से ही उसके परिवार वाले मेरे पीछे पड़ गए कि अब उसका कोई अंग काम नहीं कर रहा सो उसे आराम से जाने दीजिये,नाहक आपका इतना पैसा बर्बाद हो रहा है....पर मेरा मन नहीं मान रहा था,इसके लिए....लेकिन उनके जिद के आगे झुक कर आठवें दिन मुझे मानना ही पड़ा और लाइफ सपोर्ट हटाने के बीस घंटे बाद तक वह जीवित रही....
मैं जीवन भर इस अपराधबोध से नहीं उबार पाउंगी कि ....संभवतः यदि मैं उनकी बात न मान हाथ न खींचती तो वह कुछ और जी जाती....

आँखों के सामने जब भी सपोर्ट सिस्टम पर झूलता उसका शरीर याद आता है तो....अन्दर तक हिल जाती हूँ...

आँखों के सामने इस तरह घोर कष्ट में जीते देखना और कुछ न कर पाने कि स्थिति में असहाय महसूस करना कैसा लगता होगा....यह बड़ी सरलता से समझा जा सकता है....
आप लोगों के धर्य को नमन करना होगा.......सचमुच रोज इन सब के बीच रहना कितना डिप्रेसिंग लगता होगा....

mehek ने कहा…

in uljhano aur umeedon ki galiyon se gujarna,jahan na jaane kitani nigahen aapse chamatkar hone ka intazar karti hai,jab ki wo bhi jante hai ke hum sadharan insaan hai,bahut bahut mushkil hai na doc sab.सफरिंग की कोई डेफिनेशन नहीं होती ...ओर ना दर्द की कोई डाइमेंशन ….
sau fi sadi sahi baat kahi,dil mein ajeeb hulchul paida ki hai lekh ne,ab aur iska asar bade der tak rahega.

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

हम अंत तक अपनी किसी आशा को ख़त्म नहीं होने देते ..ईश्वर से किसी चमत्कार की उम्मीद करते हैं ..बहुत कुछ ऐसा है जो घटता है वह हमारी सोच से परे होता है ....आपने इस विषय पर बाखूबी लिखा है ..बहुत कुछ सोचने लायक है इस में ..

Science Bloggers Association ने कहा…

ये सब अपनी अपनी सोच का मामला है, जो जैसी भावना रखता है, वह वैसा ही सोच लेता है।

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तस्‍लीम
साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

neera ने कहा…

बहूत सारे प्रश्न उछलता, सोचने को मजबूर करता आपका यह लेख, शायद आखरी वाक्य में ही सारे प्रश्नों का जवाब है ...

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

मैं लगभग नास्तिक हूं, लेकिन दो घटनाओं ने मुझे झकझोरा, एक थी कि आठ वर्षों बाद एक व्यक्ति कोमा से सामान्य हुआ और दूसरा एक बच्चे का पुनर्जन्म, जो मेरा खुद का परिचित है. हो सकता है कि आने वाले दस-बीस-पचास सालों में इसका भी कोई वैज्ञानिक आधार या कारण निकल आये. लेकिन यह भी सत्य है कि आदमी की अगर मौत न होती तो पूरा हैवान बन जाता.

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

केवल संवेदना ही मनुष्य को दूसरी प्रजातियों से अलग करती है ... ओर इस समाज की लुप्त होती सवेदनशीलता को कैसे कायम रखा जाये वर्तमान में इंसान के लिए ये भी एक चुनौती है....
पूरा पोस्ट बहुत मार्मिक है .इस पर क्या कहा जाय समझ में नहीं आता ,एक तरफ तो आप्त वाणी है कि -प्रकृति तुम्हे नियोजित करती है (प्रक्रिस्त्वाम नियोक्ष्यति ) और दूसरी ओर है -एकं सद् विप्राः बहुधा बदंति ,अग्निम ,यमं .....)सत्य क्या है कोई नहीं कह सकता जैसा कि शास्त्रों में भी वर्णित है कि -यही अंतिम है ऐसा कोई नहीं कह सकता .

संध्या आर्य ने कहा…

इच्छा मृत्यु पर बहस का आधार सिर्फ शारीरिक नही बल्कि मानसिक भी होनी चाहिये!

ईश्वर का अस्तित्व है इसका प्रमाण होनेवाले चमत्कारे है !

मृत्यु के बाद सिर्फ भागवान की ही सत्ता है !

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

ईश्वर है भी और नहीं भी। एक ईश्वर है, अनेक नहीं हैं। कई व्याख्याएं हो गई हैं। सब से बड़ी बात है कि इंसान है, आँखों के सामने उसे नहीं समझ पाए। अब ईश्वर को कैसे समझें?

बेनामी ने कहा…

आपके चित्र में ठूंठ की कोख से फूटा पत्ता जीवन की निशानी है .हमें हर हाल में उम्मीद ओर आशा का दामन थामे रखना चाहिये तभी हम आगे बढ़ पाएंगे वरना हार मानने से हम रुक जायेंगे .

ओम आर्य ने कहा…

आप कितने और भावुक होते अगर डॉक्टर नहीं होते

raj ने कहा…

agar wishwash hai to chamtkaar hai....

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

अनुराग जी आपकी आज की पोस्ट पढकर नि:शब्द नही हूँ पर कुछ लिख भी नही पा रहा हूँ। फिर किसी दिन दूँगा इस झकझोर करती पोस्ट पर कमेंट। अभी खुद ही जिदंगी के झमेलों में उलझा हूँ। इसलिए कमेट देने में न्याय ना कर पाऊँ। मुआफी ।

रौशन ने कहा…

पढने के बाद बहुत कुछ कहने का मन हुआ इसलिए सुबह रुक गए ,
सुबह से शाम हो गयी खुद को अभी तक समेत नहीं पाए
शायद कुश ने जो कुछ कह दिया वैसा ही कुछ कहने का मन था

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

:-( दुखद है ..जीवन पर मृत्यु को हावी होते देखना ..परँतु चिरँतन सत्य भी है जिस्के प्रकाश को हम ईश्वर कहते हैँ !
आपकी सवेदना यूँ ही बनी रहे ..यही आशा है ..
- लावण्या

नरेश सिह राठौङ ने कहा…

मेरे छोटे से दिमाग मे कुछ घुसता ही नही है । दुबारा से पढ़ कर टिप्याना पडेगा

vijaymaudgill ने कहा…

डा. साहब नमस्कार
आपकी पोस्ट पढ़ी बहुत ही अच्छा लगा। बहुत भारी विषय है। और ऐसा विषय शायद जिस पर जाने कितने दशकों तक बहस की जा सकती है। मगर मैं सिर्फ़ एक बात कहना चाहता हूं कि जब इंसान आता अपनी मर्ज़ी से नहीं तो जाए क्यों अपनी मर्ज़ी से। इंसान को सिर्फ़ और सिर्फ़ जीने का ही अधिकार है। न अपनी मर्ज़ी से आने का और न जाने का।

vijaymaudgill ने कहा…

और बाकी रही बात ईश्वर की।
मानों तो सब कुछ है न मानों तो कुछ भी नहीं।

Manish Kumar ने कहा…

कष्ट सहते रहने और परोक्ष रूप से परिवार को आर्थिक विपन्नता की कगार पर पहुँचा देने से तो मुझे मृत्यु का वरण करना ही उचित लगता है।

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

भाई अनुराग जी,

गज़ब की है आपकी मानवीय अनुभूति उससे भी गज़ब है सम्बंधित दर्शिनिकता के प्रस्तुतीकरण का नायब ढंग, भाई हम ही क्या कई आपके मुरीद हो गए.

आपने लिख मारा है कि......
" केवल संवेदना ही मनुष्य को दूसरी प्रजातियों से अलग करती है ... ओर इस समाज की लुप्त होती सवेदनशीलता को कैसे कायम रखा जाये वर्तमान में इंसान के लिए ये भी एक चुनौती है."

इस मामले में कुछ अंशों के लिए तो मेरे विचार थोडा जुदा है, अगर बुरा न माने तो अर्ज़ करुँ, वैसे भी डाक्टर को तो मरीज़ की बात सुननी ही पड़ती है, सो बताये देता हूँ......

१. "केवल संवेदना ही मनुष्य को दूसरी प्रजातियों से अलग करती है" इस बात से मैं १००% सहमत हूँ, यदि इसमें आप मनुष्य की जगह इन्सान शब्द का प्रयोग करें तो, क्योंकि हैवान में संवेदना या इंसानियत होती ही नहीं जबकि वह भी मनुष्य प्रजाति का है.

२. "... ओर इस समाज की लुप्त होती सवेदनशीलता को कैसे कायम रखा जाये वर्तमान में इंसान के लिए ये भी एक चुनौती है." इससे भी मैं सहमत नहीं, क्योकि इन्सान कितना भी कुछ क्यों न करे, सरे हैवानों में संवेदनशीलता या इंसानियत नहीं भर सकता, वह तो आज के दौर में अपनी इंसानियत , संवेदनशीलता ही बचाए रखने में कामयाब हो जाये, यही बहुत है.

वैसे कुल मिला कर आपका विचार, प्रयास सदा ही काबिलेतारीफ रहा है और इस बार भी है, पर मेरे अपने विचार रखने से आप को नयी सोंच, नयी दर्शिकनता के आयाम मिलेगे, ऐसी आशा है..................

अगर मैं कुछ गलत हूँ तो इलाज वास्ते एक कड़वी दवा जरूर दीजियेगा.

चन्द्र मोहन गुप्त

नीरज गोस्वामी ने कहा…

डा.अमर जी ने जो कहा उस से अतिरिक्त कुछ कहने को है नहीं....बेहद उम्दा पोस्ट....जीवन की विषमताओं को आपकी कलम जो जुबान देती है वो कमाल है...
नीरज

कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee ने कहा…

"कितनी बार गगरियाँ फूटीं, शिकन न आई पनघट पर
कितनी बार कश्तियाँ डूबीं, चहल-पहल वो ही है तट पर"

Mired Mirage ने कहा…

एक सीमा के बाद मनुष्य को जबर्दस्ती जिलाए रखना भी अन्याय ही है। मेरे विचार से सबको इस विषय में अपना विल बना लेना चाहिए कि किस स्थिति में उन्हें लाइफ सपोर्ट सिस्टम से हटा दिया जाए। वैसे रोगी व उसके परिवार दोनों की ही स्थिति कठिन होती है। यदि रोग असाध्य हो तब तो स्थिति और भी बुरी होती है। भारत में तो खर्चा भी एक बहुत बड़ी समस्या होती है।
घुघूती बासूती

Anil Pusadkar ने कहा…

कई बार आप को पढ कर सिवाय स्तब्ध रहने के कुछ नही कर पाता।अपने आपको कुछ कहने लाय्क तो बिल्कुल भी नही पाता।मेरे भी बहुत से दोस्त डाक्टर हैं इसलिये अस्पताल और मरीज़ो को बहुत करीब से देखा है।पत्रकारिता की शुरूआत मे भी सरकारी अस्पताल बहुत जाया करता था।मेरे एक बहुत ही करीबी सीनियर ने भी अंतिम समय मे कुछ कहा था लेकिन वो जीना चाहता था,मरना नही,आपकी प्रेरणा से उस पर लिखूंगा कभी। आपका लेख सच मे ईश्वर की सत्ता के बारे मे सोचने पर मज़बूर कर देता हैं।और हां मैने पहले भी कहा है कि आप एक अच्छे डा से ज्यादा अच्छे एक इंसान है।सलाम करता हूं आप्को।

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey ने कहा…

यह पोस्ट तो बहुत से कोणों से बहुत से मुद्दों पर सोचने को बाध्य करती है। पेराप्लेगिक के जीवन और इच्छा-मृत्यु पर मुझे अपने विचार पुष्ट करने हैं।
बहुत धन्यवाद इस विचारोत्तेजक पोस्ट के लिये।

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

अनुराग जी कल रात को काफी देर तक सोचता रहा आपकी इस पोस्ट के बारें में। उन लोगो के बारें में, उन सवालों के बारे में। वो व्यक्ति भी याद आने लगे जिनको मैंने अपनी आँखो से जीवन से लड़ते देखा है। पर हर बार की तरह इस बार भी सवालों के धागों में उलझ कर रह गया। और फिर यही सोचने लगा कि कुछ सवालों के जवाब नही मिलते है अगर मिलते भी है तो वो वक्त के आगे धुधले पड जाते है। कोई घटना उन जवाबों को झुठला देती है। और हम फिर से सवालों में उलझ जाते है। मेरे सर कहते है जब दर्द का इलाज ना हो तो उस दर्द के साथ जीना सीखना चाहिए। पर यहाँ पर भी पर आ गया। वो लोग क्या करें जो मृत्यु के नजदीक है पर जी रहे है। मैंने अभी जनवरी में एक लड़के को देखा जो एक कार्यक्रम को देखने आया था व्हीलचेयर पर । मुझे उसमें सांसे नजर आती थी बस। पर वो देखे जा रहा था। एक सपाट सा चेहरा लिए। कोई हरकत नही। पर उसने हर चीज का आनंद लिया पोस्टर भी देखे। ये क्या है? समझ नही आता। और रही भगवान की बात। इस बात से फर्क नही पडता कि वो है या नही है। पर वह कुछ लोगो का सहारा बन जाता है जब कोई इंसान दर्द से घिरा होता है और उसके पास कोई नही होता तो वह इसी भ्रम के सहारे ही सही जी लेता है। उन्हें वहाँ सुकून मिलता है।

जितेन्द़ भगत ने कहा…

मर्मस्‍पर्शी लेख। यर्थाथ और संवेदनशील।

मोहन वशिष्‍ठ ने कहा…

ओए होए काफी मर्मस्‍पर्शी लेख लिखा हे आपने डाक्‍टर साहब
ईश्‍वर सत्‍य हे

मीनाक्षी ने कहा…

यह बड़ा जटिल विषय है जिसके बारे मे अक्सर चर्चा होती रहती है.. बहस का नतीजा न निकलने पर समय पर छोड देने की बात करके
चुप हो जाना ही बेहतर लगने लगता है. आपका हर आलेख दिल की गहराइयो को छू जाता है.

naresh khinchi ने कहा…

Bahut Badhiya Docter saheb...

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

ईश्वर के अपने दोष भी कर्म की आड़ में छुप जाते है . क्या दोष है अबोध बच्चो का जो मौत के आगोश में सिमट जाते है .

Rakhee ने कहा…

सफरिंग की कोई डेफिनेशन नहीं होती ...ओर ना दर्द की कोई डाइमेंशन …..

Awesum post....
aapki ye post bahut kuch sochne pe majboor karti hai.
par ek baat poochne chahungi...aapki bahut saari posts mein aap bhagwaan par ek question laga dete hain...aakhir kyun??

future mantra ने कहा…

Nice blog. Only the willingness to debate and respect each other’s views keeps the spirit of democracy and freedom alive. Keep up the good work. Hey, by the way, do you mind taking a look at this new website www.indianewsupdates.com . It has various interesting sections. You can also participate in the OPINION POLL in this website. There is one OPINION POLL for each section. You can also comment on our news and feature articles.

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sanjaygrover ने कहा…

हमारे सामने आएशा है जो इंसान है। हमारे सामने डा. अनुराग हैं जो इंसान हैं। हमारे सामने डा. थेरियन और दूसरे लोग हैं और वे सब भी इंसान हैं। ऐसे में ईश्वर है या नहीं है, इससे क्या फर्क पड़ता है !

गौतम राजरिशी ने कहा…

विगत नौ सालों में मौत को कई बार करीब से देखा है...आस-पास से गुजरते महसूस किया...कई बार करीब से छूकर भी...
आज आपकी भावनाओं ने अजीब सा मन कर दिया..
पापा डाक्टर थे, हैं...रिटायर्ड...अपने वक्त के और आस-पास पूजे जाते थे...
ईश्वर सब जगह नहीं जा पाते तो डाक्टर बना दिया..

Harkirat Haqeer ने कहा…

क्षमा... क्षमा .... क्षमा ...आने में देर हुई... क्या करूँ ...चोरी की वजह से सारा सामान बिखरा पडा था (मन का )....आप सब की सान्तवना ने बहुत राहत दी .....!!

इस बार की आपकी ये पोस्ट बेहद ही संवेदनशील anubhvon पर आधारित अपने अन्दर कईअनसुलझे अनुतरित प्रश्नों को समेटे हुए है ....'इच्छा मृत्यु' एक बहस वाला प्रश्न रहा है ...हाँ अगर मेरा जवाब पूछा जाता तो 'हाँ' में ही होता .....अल्पना जी ने भी इस बात पर काफी खुलासा किया है .....!!

दो साल या उससे अधिक से कोमा में पड़े हुए इंसान की चमत्कारिक वापसी क्या विज्ञानं को मानव शरीर के अनसुलझे रहस्यों की एक लम्बी यात्रा तय करने को प्रेरित करती है या .......इस बहाने ईश्वर अपने अस्तित्व के कोई संकेत देता है.?

सच कहूँ तो मैंने खुद कई बार अनुभव किया है कि दुआ में बहोत बड़ी ताकत है ....हाँ उसमें सच्चाई, ईमानदारी और ईश्वर पर आसक्ति होनी चाहिए ....!!

बेनामी ने कहा…

अनुराग जी
इच्छा म्रत्यु पर बहस अनंतकाल तक हो सकती है .निसंदेह पीडा को सिर्फ भोगने वाला ही जान सकता है .आपने ब्लॉग के जरिये अक्सर विविध विषयों को उठाया है कुछ लिंक छोड़ रही हूँ ,यहाँ नजर डालियेगा



RIGHT TO DIE

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Diary of terminally ill women

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बेहद उम्दा मर्मस्‍पर्शी लेख ...

Vidhu ने कहा…

...मै डिग्निटी के साथ मरना चाहता हूँ ...ये बिल्कुल सच है मौत जिन्दगी से छोटी है ...इतनी शिद्दत से चीजों को बटोरना -बारीकी से उन्हें महसूस करना सब के बूते की बात नही ..आप जो भी लिखतें हैं ..दिल से और काबिले तारीफ ,,,,डॉ.थेरियन को पढ़ना ...एक सबक कीतरह ...हम जिन्दगी में क्या एसा कभी भी कर पायेंगे....किसी को सुख ही देना चाहे आदमी तो ...बिना बहाने बहुत कुछ दिया जा सकता है ....लेकिन तय शुदा मौत ...से मरीज को बचाने का कोई मतलब नही ....मानवीयता के दोनों रूप में भी ...इस पोस्ट को दुबारा पढूंगी ...फिर से लिखना भी ...

मोना परसाई "प्रदक्षिणा" ने कहा…

जीवन -म्रत्यु के तमाम अनसुलझेरहस्य अन्ततः धर्म -आध्यात्म की शरणागति ही पातेहै . इच्छा -म्रत्यु काफी समय से चर्चा में है . आपने एक सम्वेदनशील विषय को कुशलता से उठाया है .

kumar Dheeraj ने कहा…

अनुराग जी आपकी बातो से सहमत हूं । बिल्कुल सही बात कही है आपने शुक्रिया

pallavi trivedi ने कहा…

समय ,परिस्थिति और हर वाकये के साथ विचार भी बदलते हैं! जब असहनीय कष्ट सहते असाध्य रोगों से जूझते लोगों के बारे में पढ़ती सुनती हूँ तो मर्सी डैथ ठीक लगती है! लेकिन जब उन लोगो के बारे में पढ़ती सुनती हूँ जिन्होंने विकलांग होते हुए भी दुनिया के सबसे ऊंचे पहाडों की चढाई की या अपनी इच्छा शक्ति से मौत को हराया तो लगता है की किसी भी सूरत में जीने की इच्छा नहीं छोड़नी चाहिए! ईश्वरीय चमत्कारों पर मुझे भरोसा नहीं....ये सब हमारे अन्दर की ताकतें ही हैं जिन्हें हम चमत्कार का नाम देते हैं! खैर ये सब पढ़ा सुना है....खुद पर बीतेगी तब मन में क्या विचार आयेंगे ये वक्त ही बताएगा!

renu ने कहा…

इच्छा म्रत्यु का विशय सच मे विचारणीय है . मुझे याद है , जब मेरी दादी
एक साल से पूरी तरहा बिस्तर पर ही थी . बार बार मम्मी का फोन आता था
बेटा आ कर देख जाओ , अम्मा का आख़िरी समय है . हम उनसे मिलने जाते .
फिर कुछ ही दिन मे उनके ठीक होने की खबर ...जाने ईश्वर को क्या मंजूर था
फिर मेरी चाची ने एकादशी के व्रत किए ...कहते हैं की इससे इंसान के अटके
हुए प्राण आसानी से छूट जाते हैं ...और सच इतनी तकलीफो के बाद आख़िर
वो आत्मा परमात्मा मे विलीन हो गयी ...
क्या इससे प्रमाणित नही होता ...कि हम सब चाहते हैं ...कि हे ईश्वर! इतनी
तकलीफ़ प्राणी को देने से अच्छा है उसे म्रत्यु दे दे ....

दिलीप कवठेकर ने कहा…

एक डॊक्टर होने के बावजूद इतने संवेदनशील मन के मालिक हैं आप, कि जो भी मेहसूस करते हैं , हमें भी आपके इस अंतर्मन में शामिल कर लेते है, और पूरे अंतरजाल पर ये मर्मस्पर्षी विचार हम सभी के विचारशक्ति को उद्वेलित कर देता है.

आप जैसे डॊक्टर और ईश्वर , बाकि क्या चाहिये?

अभिषेक ओझा ने कहा…

इस पोस्ट से मन में द्वंद्व है... इस पर क्या टिपण्णी की जाय !

Reality Bytes ने कहा…

मै डिग्निटी के साथ मरना चाहता हूँ

प्रकाश गोविन्द ने कहा…

मर्सी किलिंग या ईक्षित म्रत्यु या याचना म्रत्यु या गरिमामय म्रत्यु या और कोई भी नाम दिया जाए, इसका अभिप्राय 'सरल एवं कष्टरहित म्रत्यु' तक पहुँचने का उपाय है ! मर्सी किलिंग की अवधारणा कोई नयी बात नहीं है ! बहुत अरसे से इसके पक्ष-विपक्ष में बहसें होती रही हैं ! पुणे की "सोसाइटी फाँर राइट टू डाय विद डिगनिटी" नामक संस्था वर्ष 1981 से आंदोलनरत है ! मर्सी किलिंग को वैधानिक मान्यता देने वाला दुनिया का पहला देश नीदरलैंड (हॉलैंड) है !

भारतीय दर्शन में "मर्सी किलिंग" जैसे कृत्य के लिए कोई जगह नहीं है, क्योंकि धर्म ग्रंथों, वेदों-पुरानों में लिखा है कि जीवन और म्रत्यु ईश्वर की इच्छा पर निर्भर है, अतः इसमें मानवीय हस्तक्षेप अनुचित है ! इसके विपरीत यूरोपीय उदार चिंतन मर्सीकिलिंग को उचित ठहराने लगा है ! अपने कथन के पक्ष में वो तर्क रखते हैं कि स्थायी रूप से बीमार होकर बिस्तर पर पड़े निष्क्रिय जीवन बिताना किसी के लिए भी अत्यंत पीडादायक है ! अगर इस पीडा से मुक्ति का इकलौता उपाय जीवन का अंत है तो उसको मरने की स्वतंत्रता मिलनी ही चाहिए !

उपरोक्त तर्क में सरसरी तौर पर अथवा सैधांतिक रूप से कोई गडबडी नजर नहीं आती, किन्तु इसमें अनेक व्यवहारिक अड़चनें हैं और आगे भविष्य में इसके दुरूपयोग की आशंकाएं भी बहुत हैं क्योंकि मर्सीकिलिंग को कानूनी स्वीकृति मिल जाने के बाद इसका दुरूपयोग संपत्ति के साथ-साथ किडनी एवं लीवर जैसे मानव अंगों के लिए भी किया जा सकता है ! स्थायी रूप से बीमार अथवा कोमा में पड़े मरीज के विचार जानना भी मुश्किल है !

एक अहम् प्रश्न यह बी ही है कि क्या चिकित्सा विज्ञान अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया है ? आज चिकित्सा जगत में नित नए प्रयोग हो रहे हैं , नयी-नयी खोजें हो रही हैं, अनेक चिकित्सा पद्धतियाँ निरंतर विकसित हो रही हैं ! तो फिर क्या इन सब तथ्यों को नजरअंदाज करके किसी डाक्टर का मरीज को इस तरह का सार्टिफिकेट देना उचित होगा कि फलाना व्यक्ति का रोग असाध्य है, उसका इलाज संभव नहीं है ! हमें याद रखना होगा कि किसी समय मलेरिया, हैजा, टी०वी० इत्यादि रोग असाध्य थे ! आज कैंसर जैसे रोग से भी सामना किया जा सकता है !

दरअसल आवश्यकता आज इस बात की है कि धरा 309 की विवेचना नए द्रष्टिकोण से होनी चाहिए ! सभी प्रसंगों में कानूनी नजरिया एक जैसा नहीं होना चाहिए ! हॉलैंड की तरह इसका प्राविधान सिर्फ ऐसे मरीज पर लागू होना चाहिए, जो असहनीय कष्ट भोग रहा हो लेकिन कानून के मुताबिक ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय लेने से पहले तीन लोगों की कमेटी (एक डाक्टर, एक वकील और एक चिकित्सा नीति विशेषज्ञ) पूर्ण रूप से समीक्षा करे!

जानना चाहता हूँ कि भावुकता से परे रहकर आपकी क्या राय है इस गंभीर विषय पर ?

डॉ .अनुराग ने कहा…

ऑस्ट्रेलिया के एडिलेड में पिछले दस सालो से बतोर सर्जन मेरे नाम अनुराग ..जब अचानक मिलते है तो स्कुल की यादो से अलग हमारी बातचीत स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर भी होती है ,उनके मुताबिक ऑस्ट्रेलिया में बेहद कुख्यात डॉ डेथ को भीतर भीतर कई लोगो का समर्थन है .उसने ये भी बताया की दुनिया के दो देशो में इस बाबत कानून है ,वहां ये वैध है बशर्ते फॅमिली डॉ से अलग दो अन्य डॉ भी इसके सहमत हो....जैसा की @प्रकाश जी कहते है इसमें कई पेचिदगिया है ,सबसे पहले मेडिकल साइंस के नाकाम होने के बावजूद कुछ लोगो का वापस जीवन में लौटना ...शायद ये बताता है अभी मानव विज्ञानं अधूरा है ...जैसे की इस जवाब को लिखते लिखते मालूम हुआ की हाल फिलहाल में स्टेम सेल प्रत्यारोपण द्वारा अधरंग के रोगियों में एक नयी आशा जागी है .....
मेरे मित्र डॉ अनुराग गुप्ता अपना एक अनुहाव बताते है की ऑस्ट्रेलिया में एक पति पत्नी आये जिसमे पत्नी को रेक्टल कैंसर डाईग्नोस हुआ ,पति अलूपेथिक में विशवास नहीं करते थे ,उन्होंने कही पढ़ा काफी का एनेमा इसमें मदद करता है ,जिद पर अडे रहे ओर एक सल् तक स्वय एनेमा देते रहे .अंत में मेटास्टेसिस स्टेज पर वापस लाये ,यानि इतने विकसित देश में भी धर्म ओर कुछ पारंपरिक चिकत्सा से जुड़े विशवास लोगो में मान्य है ,....

पोस्ट के दो उदाराहान अपने आप में स्पष्ट है की कब किन परिस्थितियों में क्या उपयुक्त है .
@राखी
सच तो ये है जब हम किसी मुश्किल में फंसते है तो इश्वर पर जाने क्यों विशवास करने लगते है ओर कही न कही अपने आप में परिवर्तन लाने की कसम खाते है यानि अन्दर से हम महसूस करते है की हम इस भागती दौड़ती जिंदगी में इश्वर से स्वंय ही दूर होते चले जा रहे है ...यानी हम इश्वर को ग्रांटेड मान लेते है ओर इश्वर बिना हमारे स्नेह वापस मिले तब भी हमें प्यार करता है .सच मानो तो इस दुनिया में बहुत से लोगो को देखता हूँ जो अछे भले इन्सान होते हुए भी जीवन की तमाम मुश्किलों से गुजर रहे है .जबकि लोभी ,या धर्ष्ट लोग एश से अपनी जिंदगी बसर कर रहे है तब कई बार इश्वर पे शक होता है .की क्या ओवरलोड है ?उसके गणित में कही कुछ गडबडी है या कुछ ऐसा है जो हम समझ नहीं प् रहे है .....मुझे इश्वर पे शक नहीं है .मै आस्तिक हूँ बस कभी कभी उससे कहता हूँ हिंट दो अपने होने का ताकि विशवास ओर दरद हो ओर शायद बेहतर इन्सान होने का सबब भी
@रंजना जी
सच मानिए कई बार कुछ टिप्पणिया ऐसी होती है की लगता है अभिव्यक्ति यही है ...आपस में बहुत कुछ बांटना ,,कहना जो हम कही किसी कारन किसी से कह नहीं पाए ..उलीच दो ...आपकी टिपण्णी में आपका अनुभव मुझे हौसला देता है...ओर कही न कही ये मानने को बाध्य भी करता है की कुछ तो कही ऐसा है जो अभी भी मनुष्य के भीतर की सवेदना को जीवित रखे हुए है ...जिस दिन ये संवेदना ख़तम हो जायेगी शायद दुनिया का पतन होना शुरू हो जायेगा ....

हमारे यहाँ लोग कई बार कुछ विचारो से डरते है ,शायद धार्मिक या उन संस्कारों की वजह से जिनमे हम पले बढे है पर कई बार भावनाये किसी निर्णय को सही या गलत कर देती है ..मैंने बहुत से ऐसे परिवारों को देखा है जिन्होंने इच्छा मर्त्यु की कामना की है पर सार्वजनिक तौर पे इसे स्वीकारा नहीं ...शायद उन्हें पापी कहलाने से दर लगता हो...या अमानव ?
सच तो ये है की मै खुद डिग्निटी से मरना चाहता हूँ.....मै खुद !

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण गद्य रचना! क्या कहना!
मैं अपने तीनों ब्लाग पर हर रविवार को
ग़ज़ल,गीत डालता हूँ,जरूर देखें।मुझे पूरा यकीन
है कि आप को ये पसंद आयेंगे।

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उस संवाद के रास्ते को खोलती है ,जिन्हें लेखक शायद देख नही पाया .....