2009-08-26

क़त्ल !!!!!!!

सुबह से छेनी हथौडे खोल रहे है
उसके जिस्म की तहे …।
जिद्दी है मगर रूह उसकी
ना कोई आह है ,ना दर्द की शिकन चेहरे पर
बस इक हवा है
जों दबी दबी सी सिसकिया भरती है
मायूस सी धूप भी
बेसबब चहलकदमी करती है
कोनो पे खामोश खड़े दो खंभे
कुछ गमजदा से लगते है
दूर उस बुत की आंखे भी
सुबह से इस जानिब तकती है
जख्मी बदन से
बेतरतीब सी कुछ दुनिया
बाहर निकली है
कितने वाकये ,कितने हादसे
शिरकत करने आये है
क़त्ल मे शामिल
कुछ लोग भी सर झुकाये है
मुफलिसी दोस्त थी उसकी ,
वो मुफलिसों का दोस्त था
आओं इस फुटपाथ को दफ़न कर आये !

वक़्त के उस लम्हे के बतोर गवाह कई थे .....एक मै , ....मेरी कार ..एक बूढा भिखारी .दो स्कूली बच्चे ..एक अधजली सिगरेट ओर दो बैचेन परिंदे ...जो अपनी जबान में शायद कुछ नाराजगी जाहिर कर रहे थे ... ...
सड़क की छाती अब पांच फीट चौडी है...किनारों पे उसने रंग बिरंगे नये लिबास पहने है ..दो नये खंभे... तिकोने लेम्प सर पे डाले इतराये हुए आते जाते मुसाफिरों को घूरा करते है ... वो मूरत ......वो मूरत मगर अब भी उस जानिब ही देखा किया करती है ...

65 टिप्‍पणियां:

  1. एक बार नहीं तीन चार बार पढी आपकी रचना सच कहूँ तो एक बार मे समझ नहीं पाई और जब समझी तो सत्ब्ध रह गयी कहां तक सोच जाते हैं आप मुझे लगता है ये सब से बेह्तरीन लाजवाब प्रस्तुति है आपकी संवेदनाओं का जवाब नहीं बहुत बहुत बधाई और आशीर्वाद्

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  2. जख्मी बदन से
    बेतरतीब सी कुछ दुनिया
    बाहर निकली है
    कितने वाकये ,कितने हादसे
    शिरकत करने आये है
    क़त्ल मे शामिल
    कुछ लोग भी सर झुकाये है

    जख्मी बदन से
    बेतरतीब सी कुछ दुनिया
    बाहर निकली है
    कितने वाकये ,कितने हादसे
    शिरकत करने आये है
    क़त्ल मे शामिल
    कुछ लोग भी सर झुकाये है

    अल्टीमेट,
    अनुराग जी,
    अल्टीमेट,

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  3. आपकी पोस्ट हमेशा ही बोलती बंद कर देती है...पढ़ कर कुछ शब्द ही नहीं फूटते जेहन में...चुप सी लग जाती है...कमाल का लेखन...जिंदाबाद अनुराग जी...
    नीरज

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  4. आपने जो सोच और देख कर लिखी होगी मैंने पढ़ कर कुछ अलग सोचा है देखा है
    यही एक बेहतरीन रचना की पहचान है...

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  5. थक गया है सालों से चलते चलते हमारे साथ ये रास्ता भी...क्या क्या हादसे गुजरे हैं इसपर...ठीक ही तो है...चलो इस फुटपाथ को दफन कर आयें.

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  6. hamesha ki tarah jaandaar, shaandaar aur dil pa maar karti hui...

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  7. jaane anjaane aise kitne haadso ke ek goonge se gawaah bante rahenge hum log ?

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  8. पढ़ते पढ़ते न जाने कितनी तस्वीरें घूम गईं आँखों के सामने:

    चलो इस फुटपाथ को दफन कर आयें.

    गज़ब की संवेदनाऐं प्रकट होती है, साधुवाद!

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  9. फुटपाथ तो दफ़्न हो रहे हैं
    वे तब्दील होते जा रहे हैं,
    सड़कों में
    जिन्हें फुटपाथों ने शरण दी थी
    वे फिर बेघर हैं।

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  10. आज बहुत दिन बाद आया आपके दरवाजे पर और हमेशा की तरह भारी होकर लौट रहा हूं।

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  11. हमेशा की तरह ...बिल्कुल स्तब्ध कर देने वाली

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  12. क़त्ल मे शामिल
    कुछ लोग भी सर झुकाये है
    सन्नाटे को चीरती हुई आपकी रचना ---
    वाह

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  13. ऐसी अब्स्त्रैक्त रचनाओं समझने में मुश्किल होती है -शब्द चित्र अच्छे हैं !

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  14. शुक्रिया एक नज़्म देने के लिए ,यूँ फुटपाथ टूटना कितनी आम बात है पर उसपे एक नज़्म लिखना ,देखिये ये लफ्ज़ कैसे उस मंजर को ब्यान करते है

    मायूस सी धूप भी
    बेसबब चहलकदमी करती है
    कोनो पे खामोश खड़े दो खंभे
    कुछ गमजदा से लगते है
    दूर उस बुत की आंखे भी
    सुबह से इस जानिब तकती है

    ओर चूंकि फुटपाथ कई मामलो का गवाह है

    कितने वाकये ,कितने हादसे
    शिरकत करने आये है

    आखिरी लाइन पंच लाइन है

    "आओं इस फुटपाथ को दफ़न कर आये "

    ओर हाँ यहाँ आपका अंदाजे बयाँ किसी नज़्म को उसका लिबास दे जाता है
    ..एक अधजली सिगरेट ओर दो बैचेन परिंदे ...जो अपनी जबान में शायद कुछ नाराजगी जाहिर कर रहे थे ... ...
    दो नये खंभे... तिकोने लेम्प सर पे डाले इतराये हुए आते जाते मुसाफिरों को घूरा करते है ...


    बस यही कहूँगी कभी कभी नज़्म हम सरफिरो के लिए लिख दिया कीजिये

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  15. बहुत गहरे भावों को शब्द दिये है। अक्सर कुछ चीजें पढकर मुझे शब्द नही मिलते। वैसे हमसे कहते हो कि काहे ये सब लिखते हो और फिर खुद लिख जाते हो। सच तो यही है कब तक दूरी बनाए इन सबसे। उंगलियाँ चलने लगती है अपने आप।
    मुफलिसी दोस्त थी उसकी ,
    वो मुफलिसों का दोस्त था

    आओं इस फुटपाथ को दफ़न कर आये

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  16. कल ही ज्ञान दा के ब्लॉग पर सड़क के हाशियों पर चलती- बसती एक दुनिया समानांतर पर कुछ लिख आया था. ये हाशिये हाशियों पर जीते लोगों का घर, रोज़गार सब कुछ हुआ करते थे.मेरे अपने कई दृश्य उस दुनिया के अभी भी सुरक्षित है,जो आबाद होती थी कान और दांत से कीड़े निकालने वालों, बेहद तंग और ठंडी गुफाओं से शिलाजीत निकाल ले आने वालों, परस्पर भूमिकाएं बदलते बंदरों और मदारियों और न जाने किन किन लोगों से.
    सच में ये अपराध कत्ल का है.

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  17. मूक कर देने वाली पोस्ट है अनुराग जी ...फुटपाथ के साथ साथ न जाने क्या क्या दफ़न होना याद हो आया ..बेहतरीन

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  18. संजय जी नज़्म तकरीबन एक साल पहले लिखी थी ...किसी वाकये का गवाह था .जानता था किसी अदालत में गवाही नहीं देनी होगी .....ज्ञान जी ठेठ या यूँ कहिये असल ब्लोगर है जो अपने अंदाज में चीजो को देखते है ..यूँ तो कल ही मै भी इसे पोस्ट करने वाला था .पर जाने क्यों कुछ ओर जिम्मेदारियों में उलझ गया .....
    @नीलिमा
    शुक्रिया इस नज़्म को समझने के लिए ....अफ़सोस कोई र्रुमानी नज़्म नहीं पोस्ट की ...पर फिर भी उम्मीद है महक जी को भी कुछ सकूं मिलेगा ....यूँ भी हम गुलज़ार भक्त है ....बड़े वाले पंखे ....पर जब भी कभी नज़्म लिखता हूँ .अपनी एक पुरानी पाठक याद आती है ....रक्ष्नंदा .जाने वो कहाँ होगी .वो नज्मो को जीती थी.....

    ओर हाँ ये चित्र भी उधार का है .फ्लिकर से

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  19. जख्मी बदन से
    बेतरतीब सी कुछ दुनिया
    बाहर निकली है
    कितने वाकये ,कितने हादसे
    शिरकत करने आये है
    क़त्ल मे शामिल
    कुछ लोग भी सर झुकाये है
    प्रभावशाली रचना,बधाई

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  20. "सुबह होती है शाम होती है,
    कुछ जिंदगी यूँ ही तमाम होती है"

    ... हमें कहीं गवाही देने नहीं जाना, और खुद में ही घुटना है... हमारा यही हाल है...

    शब्दों को जिस खूबसूरती से आपने प्लेस किया है बिलकुल वोहीं का वोहीं की पूरे नज़्म का दुर्ग अभेध्य लगता है... अगर शतरंज बिछी है तो घेराबंदी मुस्तैद है, वजीर, प्यादे से लेकर राजा तक चौकन्नी ड्यूटी बजा रहे हैं...

    उत्तर देंहटाएं
  21. डाक्टर साहिब क्या आप दिल के डाक्टर हो... फिर हम दिल फरेब इंसानों की बात भाषा को कैसे समझ लेते हो... बहुत ही खुबसूरत नज़्म निकली है आपके कलम से ... आवो इस फूटपाथ को दफन कर आयें... उसकी गहरी बेदना को किस अदब से समझा है आपने वो भी नहीं जीना चाहती ... सही सभी कह रहे हैं.. निशब्द करदेने वाली रचना है ... सलाम आपकी लिखनी को हुजूर...

    अर्श

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  22. सच है, मुफ़लिसों की दुनिया ही है, यह फ़ुटपाथ ।
    इसके वज़ूद को छेड़ना, मुफ़लिसों को कब्रिस्तान दिखलाने जैसा ही है ।
    एक अप्रासँगिक से लगने वाले मँज़र की पोस्टमार्टम करती हुई सी नज़रों की साफ़बयानी है यह नज़्म !

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  23. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  24. एक और दिल को छूती हुई रचना ...बधाई आपको इतने सुन्दर भावों को शब्दों में पिरोने के लिए

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  25. सुबह से छेनी हथौडे खोल रहे है
    उसके जिस्म की तहे …।
    जिद्दी है मगर रूह उसकी

    दिलोदिमाग पर हावी एक शुन्यता को छू कर गुजर गयी यह कविता और मैं सोचता था यह शून्यता मेरी निजी है

    उत्तर देंहटाएं
  26. मैं तो सोच रही थी आप और कुश दोनों एक ही मूड में हैं आजकल .........लेकिन आपकी टिपण्णी पढ़ी तो जाना यह पहले की कृति है...
    जैसे आजतक की आपकी पोस्ट बोलती बंद करने वाली हुई हैं,इस पोस्ट ने भी उस परंपरा को नहीं तोडा है.....

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  27. खूबसूरत!!!
    फुटपाथ खत्म हुआ और सड़क की छाती ५ फीट और चौड़ी हो गई...लेकिन कितनी चौड़ी होंगी सड़कें ?
    हो सकता है एक दिन वो भी आये कि सड़कों की भी जरुरत न रहे..

    उत्तर देंहटाएं
  28. तस्वीर देखी तो कुछ कुछ खलनायक प्राण की याद आ गयी ...मिलती-जुलती तस्वीर ......

    बस इक हवा है
    जों दबी दबी सी सिसकिया भरती है
    मायूस सी धूप भी
    बेसबब चहलकदमी करती है
    कोनो पे खामोश खड़े दो खंभे
    कुछ गमजदा से लगते है

    सुभानाल्लाह .......आप नज्में क्यों नहीं लिखते .....???

    जख्मी बदन से
    बेतरतीब सी कुछ दुनिया
    बाहर निकली है

    बस निशब्द कर दिया आपने तो .......भले ही एक साल पहले लिखी हो हमने तो आज पढ़ी ...और अपने स्थान से खड़े हो गए हैं .....!!

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  29. फुटपाथ खत्म हुआ और सड़क की छाती ५ फीट और चौड़ी हो गई...


    सुन्दर ..बेहतरीन अभिव्यक्ति. बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  30. हरेक की अपनी समझनदानी होती है। मेरी छोटी है। नहीं समझ में आई सो नहीं आई। पूरी कथा लिखें तो समझ में आएगा कि फुटपाथ क्‍या है।

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  31. आप की गहरी संवेदनशीलता !!!!!!!!
    -न जाने कितने हादसों के गवाह होते हैं कई लोग ,मगर भावों को कलमबद्ध करना आप बखूबी जानते हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  32. हमेशा की तरह देर से आया। पोस्ट का मज़ दुगना करने के लिए ऐसा करना ज़रूरी है। आपके मुरीदों की टिप्पणियां भी तो दिल से निकलती हैं आपके शब्दों की तरह डाक्टसाब!!!

    बहुत खूब। विकास के मायने अभी हमें जानने बाकी हैं। विकास शब्द में क्या संवेदना नहीं है? या फिर विकास माने छेना, हथोड़ी, सीमेंट, कंक्रीट ही है ? संभव हो तो जवाब दें...

    बधाई...

    उत्तर देंहटाएं
  33. क्या-क्या खुराफ़ात करते रहते हो डाक्साब! बेचारे फ़ुटपाथ को उड़ा दिया सबके साथ मिलकर!

    उत्तर देंहटाएं
  34. फुटपाथ को पोस्टमार्टम करेंगे तो जाने कितनी ही साँसे अन्दर दफ़न मिलेगी..

    सोचता हु शायर की रूहे अगर जिन्दा नहीं हो तो इतनी संजीदा नज्मे कैसे बनेगी.. शुक्रिया कि आपने अपने अन्दर की रूह को जिन्दा रखा है.. इस बार की पोस्ट कुछ लोगो के लिए तोहफा ही साबित होगी...

    उत्तर देंहटाएं
  35. आप या कोई भी जब ऐसा लिखता है कि पढ़ने के बाद मन के अंदर इतना शोर हो जाता है कि की बोर्ड पर टाइप करते नही बनता तो मै सच में बहुत परेशान हो जाती हूँ...! क्योंकि आप जैसे कुछ लोगो को पढ़ने के बाद खूब लंबा चौड़ा लिखने का मन रहता है।

    आप जो भी लिखते हैं, वो कम से कम मैं तो नही ही भूलती, इसलिये याद है कि ये नज़्म पहले पढ़ चुकी हूँ। मगर खूबसूरत नज़्म तो इशक़ की तरह वो चीज है जो हर बार नई लगती है।

    रक्षंदा को तो मै भी परसो रात से याद कर रही हूँ...! वीर जी गवाह हैं..!

    उत्तर देंहटाएं
  36. बहुत कुछ कह रही है तुम्हारी नज़्म....इसके बाद किसी चित्र , किसी और शब्द की ज़रूरत ही नहीं बच जाती है!

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  37. माशा अल्लाह क्या कहूँ इस रचना के लिए...
    बेहतरीन लिखा है....
    इतनी बेमिसाल पोस्ट से रु-ब-रु करने के लिए आभार...
    मीत

    उत्तर देंहटाएं
  38. बहुत खूब अनुरागा जी, बहुत खूब
    फुटपाथ खत्म हुआ और सड़क की छाती ५ फीट और चौड़ी हो गई..। सबसे बेहतरीन

    उत्तर देंहटाएं
  39. जख्मी बदन से
    बेतरतीब सी कुछ दुनिया
    बाहर निकली है
    कितने वाकये ,कितने हादसे
    शिरकत करने आये है
    क़त्ल मे शामिल
    कुछ लोग भी सर झुकाये है

    मुफलिसी दोस्त थी उसकी ,
    वो मुफलिसों का दोस्त था

    kya khub likha apne...mujhe ye line आओं इस फुटपाथ को दफ़न कर आये ! khaas taur pe bahut achhi lagi...

    उत्तर देंहटाएं
  40. आपका लिखा सोच पैदा करता है और फिर सीन सामने चलने लगता है....यही ख़ास पहचान है ...लाजवाब

    उत्तर देंहटाएं
  41. जख्मी बदन से
    बेतरतीब सी कुछ दुनिया
    बाहर निकली है
    कितने वाकये ,कितने हादसे
    शिरकत करने आये है
    क़त्ल मे शामिल
    कुछ लोग भी सर झुकाये है

    मुफलिसी दोस्त थी उसकी ,
    वो मुफलिसों का दोस्त था

    Main Nirmala ji ki baat se sahamat hoon maine bhi do baar padhi

    sadhak ki chaati ...........bahut gahri

    उत्तर देंहटाएं
  42. ये ग़ज़ब का संयोग था...आपकी नज़्म पढ़ते हुए कंचन का फोन आया,,,और फिर नीचे टिप्पणियों पे पहुँचा तो वहाँ पे उसने भी मेरा जिक्र किया था।

    और बीच-बीच में यूँ ही पुराना लिखा भी पेश करते रहिये..कि हम जैसे पढ़ सकें।

    हाँ, कंचन की बात से इत्तेफ़ाक है...बात चली थी खूबसूरती की तो उनका जिक्र आया था।

    अक्टूबर का प्लान पक्का है ना इस वादी-भमण का?

    आपकी लेखनी हमारा सलाम ले-ले कर तह तो नहीं गयी?

    उत्तर देंहटाएं
  43. हादसों के शहर से गुजर गया यारों
    सुना है फिर एक शख्स मर गया यारों

    आपकी नज़्म हमेशा की तरह दिल से हो कर गुजर गयी ...कुछ है ख़ास जो ...
    मुफलिसी दोस्त थी उसकी
    वो मुफलिसों का दोस्त था
    आओ इस फुटपाथ को दफ़न कर आयें ...और
    सड़क की छाती अब पांच फीट चौडी है...किनारों पे उसने रंग बिरंगे नये लिबास पहने है ..दो नये खंभे... तिकोने लेम्प सर पे डाले इतराये हुए आते जाते मुसाफिरों को घूरा करते है ... वो मूरत ......वो मूरत मगर अब भी उस जानिब ही देखा किया करती है ...

    उत्तर देंहटाएं
  44. Eh itanee sanjeedagee se likhte hain ki ankhon ke samane tasweer bana dete hain. man udas ho gaya.

    उत्तर देंहटाएं
  45. मुफलिसी दोस्त थी उसकी ,
    वो मुफलिसों का दोस्त था

    आओं इस फुटपाथ को दफ़न कर आये

    सरकारें स्वयं ही दफ़न करवा रही हैं, अवैध कब्जे द्वारा.
    सीधी-सादी, सुन्दर नज़्म द्वारा, हजूरेआला, आप वो बात कह गए, जो लोग सोंच भी नहीं सकते.
    बधाई स्वीकार करें.
    चन्द्र मोहन गुप्त
    www.cmgupta.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  46. अपनी एक बहुत पुरानी गज़ल याद आ रही है..."हम जिये फुटपाथ पर सर पर कोई साया न था /ख्वाब महलों का मगर हम्को कभी आया न था । क्या बतायें नीन्द में क्यों रोटी हमें दिखती रही ,हमने तो गम के सिवा और कुछ खाया न था ।" अद्भुत चित्र खींचा है आपने ।

    उत्तर देंहटाएं
  47. अनुराग सर.. बस.. शायद कुछ लिख पा नहीं रहा.. शायद कुछ लिख नहीं सकता अब..

    उत्तर देंहटाएं
  48. sir jee ye lajwab thi.. kyunki jab padha to laga ki aap kuch batakar ke bhi nahi bata rahe hain.. phir laga ki main agyaani hoon, kuch miss ker raha hoon..dubara bhi wahi..

    achha hua aapne comments ke reply mein bata diya ki aap kisi hadse ke gavaah rahe hain..nahi to aaj apna confidence kharab ho gaya hota.. :)

    bahut hi maarmik aur hamesha ki tarah lajwaab..

    उत्तर देंहटाएं
  49. 'मुफलिसी दोस्त थी उसकी ,
    वो मुफलिसों का दोस्त था'
    - वह फुटपाथ था या कोई गरीबों का मसीहा !

    उत्तर देंहटाएं
  50. जब बात समझ मे ही नही आयी तो क्या टिप्पणी करू ।

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  51. अनुराग जी ,आपकी पोस्ट पर हमेशा ही देर से आती हूँ ...दो दिन पहले सरसरी तौर पर पढ़ ली थी बाद में फिर पढ़ी ....आज मेरे आँगन में चिडियों का एक झुंड था और बेहद शौर भी ....ये संकेत भी होता है ,ख़ुशी का ....की कोई सुचना होगी...दुःख में भी अज्ञात ख़ुशी की ।

    ....खैर...आपकी लेखनी का मुरीद होना ही होता है ...पढ़कर बस दुःख और ख़ुशी दोनों महसूस हुई....इन खूबसूरत मानवीय पंक्तियों के लिए आभार

    उत्तर देंहटाएं
  52. गजब लिखे हैं डॉक् साब, आप गुरुदेव हैं. सादर दंडवत्

    उत्तर देंहटाएं
  53. अनुराग सर,
    मुझे तो मालूम भी नहीं ऊपर जो रचना लिखी गयी है... उसे गजल कहते हैं, कविता कहते हैं, गीत या फिर रचना ही कहते हैं...

    लेकिन उसे पढ़कर वाकई आनंद आ गया, एक नाजुबान की जुबान बनी इन लाईनों ने वाकई एक दर्द की रेखा खींच दी है...

    उत्तर देंहटाएं
  54. नज़रों की साफ़बयानी है यह नज़्म
    लिखते रहो ...खुश रहो ...डा. सा'ब ..

    फ़ुट पाथ -- समाज का सच निगले हुए अजगर ही तो है !!
    बहुत स्नेह के साथ
    - लावण्या

    उत्तर देंहटाएं
  55. खूबसूरत नज़्म है और कहने को कुछ ख़ास नहीं कि अभिवादन स्वीकार कीजिये !

    उत्तर देंहटाएं
  56. धीरे धीरे आप भी मशरुफ़ हो रहे है..काफ़ि दिनो बाद आप कि नज़्म ....पर अच्छा है आप का शायर दिल अभी तक जिन्दा है.... :)

    उत्तर देंहटाएं
  57. गजब का पैनापन है आपकी कलम मे..सिरिंज की नोक से भी ज्यादा नुकीली..सीधी दिल मे उतर जाने वाली..रोज्मर्रा के खास-ओ-आम कारोबार को एक wide azimuth से नये और संवेदनशील नजरिये से सामने रखना आपकी कलम का कमाल है..कवि होने और कवि-हृदय होने मे यही फ़र्क है..कुछ और बार पढ़्नी होगी आपकी कविता..फिर इंतजार करना होगा नशा उतरने का..बधाई!!

    उत्तर देंहटाएं
  58. बेहद खूबसूरत नज्म, बहुत दिनों बाद आज शायर अनुराग से मुलाकात हुई

    बेतरतीब सी कुछ दुनिया
    बाहर निकली है
    कितने वाकये ,कितने हादसे
    शिरकत करने आये है
    क़त्ल मे शामिल
    कुछ लोग भी सर झुकाये है
    मुफलिसी दोस्त थी उसकी ,
    वो मुफलिसों का दोस्त था
    आओं इस फुटपाथ को दफ़न कर आये !

    उत्तर देंहटाएं

कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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