2008-04-02

यूं ही

जब किसी शाम
तेज बारिश मे ,
किसी शेड के नीचे ,
तुम अपना दुप्पटा
सर से ढके
शरीर हवायो से
जूझती नजर आती हो
तब एक ही बात सोचता हूँ
कि
इश्क के मौसम मे......
ये बरिशे कितनी लाजिमी है

16 टिप्‍पणियां:

  1. hme jra vistar se btayen ki aapki achchhi kvitayen itni chhoti keon hoti hai

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  2. very nice lines............................good luck . i m also writing a blog please see it

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  4. irony jise kehte hain...woh is kavita me bahut umda tareeke se istemaal huyi hai...aakhiri line bahut sundar lagi. Is kavita par badhaai

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  5. आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया....

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  6. बहुत ही दिल को छू लेने वाली कविता है ..

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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