2008-04-15

कभी कभी


कभी कभी मन करता है
होस्टल के उस कमरे मे
वापस -जाऊँ
वहाँ जहाँ -तहाँ
बिखरे लम्हों को
ठूंस ठूंस कर
अपनी जेबों मे भर लाऊँ
कुछ सिगरेट के ,
कुछ कागज के टुकड़े
उठा लाऊँ
कुछ आँसुओ से,
कुछ मुस्कानों से
अपनी हथेलिया भर आऊँ
यार मेरे मैं लौट जाऊँ

वो अल्ल्हड़ दिन, वो बेफिक्र शामे
दोस्ती की उन लम्बी रातो को
आसमां के सीने से खींच लाऊँ
सीडियों के पास  मिलेगी गिरी हुई
टेनिस की कुछ गेंदे ,
वोलिवोल के उस मैदान की
मिटटी उठा लाऊँ
यार मेरे मैं लौट जाऊँ

हर कमरे मे
है कुछ अधूरी दास्ताँ
कुछ देर ठहर ,सबसे मिल आऊँ
फेफ्डो मे वो हवा भर लाऊँ
कोने के उस पनवारी का
केन्टीन का बिल...... चुका आऊँ
यार मेरे मैं लौट जाऊँ

लौकर रूम के तालो मे
रखे है कुछ अधूरे ख़त ,
उन्हें उठा लाऊँ
उसका भी
दिल धड़कता होगा कभी
बचपन के उस प्यार से
मिल आऊँ
यार मेरे मैं लौट जाऊँ

बिन चिटकनी वाले
उस बाथ- रूम मे नहा आऊँ
जिस्म पे पड़ी
समय की ये गर्द उतार आऊँ
इस तनहा रईसी से
उन दिनों की
मुफलिसी खरीद लाऊँ
उन रस्तो, उन मोडो पे
इस दुनियादारी को फेंक आऊँ
इस बेहिस दिल को छोड़
बचपन के उस दिल को
उठा लाऊँ
सो गयी है मेरी रूह
आओं उसे जिला लाऊँ
यार मेरे मैं अब लौट जाऊँ










उन दिनों  को  जब वक़्त के पायदान   में दोस्ती   फेरहिस्त   में सबसे ऊँची थी ....जब हर हसीन से इश्क  हो जाता था ....ओर इश्क का समंदर    मीठा हुआ करता  था ....जब आसमां इतना छोटा  था के उचक कर छू ले ....उन दिनों को ....... जब जिंदगी की बड़ी  बड़ी मुश्किलें एक बंटी  सिगरेट ओर आधी प्याली चाय में डूब जाती थी ....जब दुनिया    के चारो ओर सिर्फ  एक चाहरदीवारी थी ....एक सीमा  रेखा .. ..    उन दिनों को..... जब  वक़्त के किसी मोड़ पे ठहरा नहीं जाता था .....जब कच्चे उधडे  रास्ते डराते नहीं थे ....   ..जब राते अपनी हथेलियों में फलसफे लिए होस्टलो में दाखिल  होती  थी ......जब राते दिन से  छोटी   थी .... जिंदगी तब रूमानी थी .....

12 टिप्‍पणियां:

  1. 'जब आस्मान इतना छोटा लगता था की उचक कर छू ले ,

    bilkul sahi anuraag ji,
    kahan se layen puraane din-'wo kagaz ki kashti wo darya ka paani!'

    उत्तर देंहटाएं
  2. लौकर रूम के तालो मे
    रखे है कुछ अधूरे ख़त ,
    उन्हें उठा लायूं
    उसका भी
    दिल धड़कता होगा कभी
    बचपन के उस प्यार से
    मिल आयूँ

    bahut khub anuraag ji ..puraane din yaad dila diye :)

    उत्तर देंहटाएं
  3. क्या बात है आज में ....जो कल यूँ याद आ रहा है...कोई काम की चीज़ कहीं पीछे छूट गई क्या?!

    उत्तर देंहटाएं
  4. डॉक्टर साहब,
    आपको हमेशा की तरह एक अच्छी कविता के लिये बधाई. पर आज थोड़ा पढ़ना uncomfortable लगा.
    लायूं... जाय़ून.. ये क्या है? आप इसे इस तरह लिखें.. लाऊँ.. जाऊँ..
    और भी कहीं कहीं edit करने की जरूरत है. कविताओं में इस तरह की वर्तनी की अशुद्धियाँ सारा भाव छीन लेती हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  5. यादों के समन्दर में छलांग लगाना अच्छा लगता है!

    उत्तर देंहटाएं
  6. इसी लिए कहा गया है कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन !!

    उत्तर देंहटाएं
  7. अजित जी
    आप की बात बिल्कुल वाजिब है ,ख़ुद लिखते हुए मुझे भी अजीब सा लगा पर जब पोस्ट किया तब बहुत जल्दी मे था .कोशिश करूँगा इसे सुधार दूँ .
    बेजी जी ,बहुत कुछ पीछे छुट गया है ........

    उत्तर देंहटाएं
  8. yaadon ka varnan bahut sahi sundar hua hai doc saab,har line bemisaal.

    उत्तर देंहटाएं
  9. "उन दिनों को जब वक़्त के पायदान मे दोस्ती फेरहिस्त मे सबसे ऊँची थी ,जब हर हसीन से इश्क हो जाता था ओर जब इश्क का समंदर मीठा लगता था , जब आस्मान इतना छोटा लगता था की उचक कर छू ले , उन दिनों को जब जिंदगी की बड़ी से बड़ी मुश्किलें भी एक बंटी सिगरेट ओर आधी प्याली चाय मे डूब जाती थी . उन दिनों को जब भूखा पेट भी भरा लगता था ओर उन रातो को जो फलसफो को अपनी पीठ पे लिए होस्टल की छत पे डेरा डाला करती थी.....जिंदगी तब रूमानी थी ......"


    ये तो हमारे दिल की बात हो गई... बस एक सिगरेट ज्यादा हो गई :-)
    http://ojha-uwaach.blogspot.com/2007/06/blog-post.html

    उत्तर देंहटाएं

कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails