2008-05-07

बस यूं ही ......

वो खामोशी.......
जिसे ना जाने कौन खीच लाता था
हम दोनों के ....दरमियाँ
आज सुबह..... मुंह अंधेरे
मेरे आँगन मे
ढेरों लफ्ज़ छोड़ गयी है...
अपने हिस्से के ......मैंने समेट लिये है
तुम भी 

अपने हिस्से के उठा लो     ....."सोनां"

कम्प्लेन!!!!
बरसों बाद
जब
अपने  माजी की गलियों के
उस जाने -पहचाने मोड़ पे
रुकता हूँ
बेहिस पड़े उदास से कुछ रिश्ते
आँख मल के हैरां से
मुझे देखते है
फ़िर
फुसफुसा कर कहते है
" एक बार ओर तो कहा होता "


कांच का चांद !!!!
कई बार दबे पाँव खामोश रातो मे
इन चमकती यादो को
फलक से उतार के
दूर साहिल के दूसरे कोने मे
डूबो कर आया हूँ
मेरी आंखो को अब ये 
मुआ चाँद चुभता है......


 



 जब बेख्याली पहलू में सोती है ओर जिंदगी रोज वही दिन   रीवाइंड" करके  आपकी हथेली में दे देती है .....उस जानिब से  नज्मे ऐसे ही किसी सफ़्हे पे आहिस्ता  से उतर आती है


30 टिप्‍पणियां:

  1. अनुराग जी
    आप बहुत अच्छा लिखते हैं । दिल की अनुभूतियों को बहुत सुन्दर रूप में व्यक्त किया गया है।एक सुन्दर और कोमल रचना के लिए बधाई।

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  2. bahut hi khubsurat,kuch juda sa andaaz,kuch teh mein dabe alfaz ubhare hai doc saab,wah,kch bemani se khayal jab nazm ka rukh itkhtiyaar karte hai,to vahi aapki kalam se kamaal banke chalakte hai.

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  3. अनुराग जी हम तो कुछ यु कहे गे...
    कई नज्मे ऐसे ही दिल मे चुपचाप उतर आती है....

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  4. शांत लेकिन बहुत ही कुछ कहने वाली कविता

    उत्तर देंहटाएं
  5. शिकायत -----

    बरसों बाद
    जब
    अपने माझी की गलियों के
    उस जाने -पहचाने मोड़ पे
    रुकता हूँ
    बेहिस पड़े उदास से कुछ रिश्ते
    आँख मल के हैरां से
    मुझे देखते है
    फ़िर
    फुसफुसा कर कहते है
    "दुबारा तो कहा होता "


    निशब्द कर देते हैं आपके लिखे लफ़ज़
    और चुपके से जैसे दिल पर कोई आहट
    थपथपा के बहुत कुछ अनकहा सा जाती है
    आपको लिखने के साथ साथ इन लफ्जों से पढने वालों को बांधना भी आता है .बहुत ही सुंदर अनुराग जी ..बेहद सुंदर लगी यह ..!!

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  6. अनुराग शब्द माझी की जगह क्या माज़ी यानी बीता हुआ नहीं होगा ?
    लिखा आपने हमेशा की तरह खूबसूरत है।

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  7. सुन्दर और सागर की तरह शांत रचना.

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  8. इतनी सुँदर नज्म आप यूँ ही लिखते रहिये, हमेँ भी सुनवाने का शुक्रिया
    स स्नेह्,
    -लावण्या

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  9. बहुत बहुत खूबसूरत
    अल्फाज़ नही मिलते कि कौन से अल्फाज़ में तारीफ करूँ,
    कहीं पढ़ा था कि कुछ हुस्न ऐसे होते हैं कि उन्हें बस दिल में सराहा जाए,लबों पर उनकी शान में कहने को जुमले नही बन पाते,बन भी जाएं तो वो नही कह पाते जो दिल कहना चाहता है,आपकी ये नज्म बस वैसी ही है.

    कई बार दबे पाँव खामोश रातो मे
    इन चमकती यादो को
    फलक से उतार के
    दूर साहिल के दूसरे कोने मे
    डुबो कर आया हूँ

    मेरी आंखो को अब ये चाँद चुभता है......

    ये सिर्फ़ आपके दिल की आवाज़ नही है,जाने कितने दिलों की आवाज़ है,कई बार जो हम महसूस करते हैं,कह नही पाते,आप शायर लोग भी बड़े लकी होते हैं...चाँद अल्फाज़ में हजारों दिलों की दास्ताँ सुना देते हैं....
    काश मैं भी शायर होती
    एक बात और ...हो सकता है किसी को बुरी भी लगे लेकिन हकीकत यही है कि शायरी की खूबसूरती बस उर्दू से शुरू होती है और उर्दू पर ही ख़त्म हो जाती है...प्लीज़ इस खूबसूरती को खोने न दें.

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  10. kya kahoon dr.saab....prashansa ke shabd kehna ek baat hai, par ise padhkar man nishabd ho jaata hai...antarman stabdh hokar kuch pehchani aur bhooli huyi cheezon ko dobara dekhta hai.
    Yahi nishabd avastha aapki kavitaon ki prashansa hai.

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  11. मैने ऐसी नज़्म अब तक नही पढ़ी.. आपकी लिखी पहले भी नही.. तीनो नज़्म अपने आप में बहुत सुंदर है.. पर मुझे शिकायत भा गयी.. बेहिस पड़े उदास से कुछ रिश्ते
    आँख मल के हैरां से
    मुझे देखते है.. कितनी खूबसूरती से लिखी है ये नज़्म आपने.. और पहली नज़्म में सोना का इस्तेमाल जो किया है आपने उसने इस नज़्म में चार चाँद लगा दिए..

    उत्तर देंहटाएं
  12. बरसों बाद
    जब
    अपने माझी की गलियों के
    उस जाने -पहचाने मोड़ पे
    रुकता हूँ
    बेहिस पड़े उदास से कुछ रिश्ते
    आँख मल के हैरां से
    मुझे देखते है
    फ़िर
    फुसफुसा कर कहते है
    "दुबारा तो कहा होता "


    aur kuchh kahne ke layak nahi chhora aapne..

    उत्तर देंहटाएं
  13. खुद को सहला्ने के लिये-"रिवायींड" बटन ज़िंन्दगी मे बहुत ज़रूरी है--आप्का आसमान बहुत कुछ बदला हुआ सा है इन दिनो-खुशी होती है पढ़कर--शुभकामनाएं--

    उत्तर देंहटाएं
  14. आपके अपने अंदाज़ की बहुत प्यारी नज्में हैं...तस्वीरें भी बहुत अच्छी हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  15. वो खामोशी
    जिसे ना जाने कौन खीच लाता था
    हम दोनों के दरमियाँ
    आज सुबह मुंह अंधेरे
    मेरे आँगन मे
    ढेरों लफ्ज़ छोड़ गयी है

    बेहिस पड़े उदास से कुछ रिश्ते
    आँख मल के हैरां से
    मुझे देखते है
    फ़िर
    फुसफुसा कर कहते है
    "दुबारा तो कहा होता "

    waah bahut khoob....!

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  16. अनुराग जी
    रचना पढ़ कर चुप हूँ...और कुछ किया भी नहीं जा सकता क्यों की शब्द मन के भाव प्रदर्शित कर पाने में असमर्थ होंगे...
    नीरज

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  17. हमेशा की तरह एक जज़्बाती खयाल.
    अच्छा लगा.

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  18. ओह, मैं महसूस कर सकता हूं इस पोस्ट को।

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  19. बहुत बढ़िया कविता चित्रण भी अच्छा है बधाई

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  20. आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया........

    उत्तर देंहटाएं
  21. वो खामोशी
    जिसे ना जाने कौन खीच लाता था
    हम दोनों के दरमियाँ
    आज सुबह मुंह अंधेरे
    मेरे आँगन मे
    ढेरों लफ्ज़ छोड़ गयी है
    अपने हिस्से के मैंने समेट लिये है
    तुम भी अपने हिस्से के उठा लो "सोनां

    वाह क्या बात है, अब इस खूबसूरत नज्म के बाद क्या कहें।

    उत्तर देंहटाएं
  22. 'मेरी आंखो को अब ये चाँद चुभता है......'

    hmmmm......bahut sahi..

    behad khuubsurat nazm hai..

    उत्तर देंहटाएं
  23. बरसों बाद
    जब
    अपने माझी की गलियों के
    उस जाने -पहचाने मोड़ पे
    रुकता हूँ
    बेहिस पड़े उदास से कुछ रिश्ते
    आँख मल के हैरां से
    मुझे देखते है
    फ़िर
    फुसफुसा कर कहते है
    "दुबारा तो कहा होता "



    bahut khuuub!
    aapne kya likha hai!!! gazab hai---kayee baar padha!!!aur note kiya...

    उत्तर देंहटाएं
  24. कई बार दबे पाँव खामोश रातो मे
    इन चमकती यादो को
    फलक से उतार के
    दूर साहिल के दूसरे कोने मे
    डुबो कर आया हूँ
    साहिल तो सबको पार लगायेगा
    यादों को फलक से उतार लायेगा

    उत्तर देंहटाएं
  25. कई बार दबे पाँव खामोश रातो मे
    इन चमकती यादो को
    फलक से उतार के
    दूर साहिल के दूसरे कोने मे
    डुबो कर आया हूँ
    साहिल तो सबको पार लगायेगा
    यादों को फलक से उतार लायेगा

    उत्तर देंहटाएं
  26. डियर डॉक्टर, बहुत सुन्दर !!!
    बहुत ही खामोशी से शिक़ायत कर दी !
    आज कुछ उदासी दिखती है, और शब्दों से महसूस भी होती है.
    सच में दिल को छू जाने वाली रचना है.
    साधुवाद.

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  27. bahut uttam kavya mantra mukta kar diya.... aanand se bhar diya....

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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