2008-06-04

हर स्त्री के भीतर होती है एक लड़की .......

हर स्त्री के भीतर होती है
एक लड़की..........

बेमौसम की बारिश मे
वो अक्सर भीग जाती है,
उबले हुए भुट्टो को
देख रुक जाती है
अपने नन्हे के साथ

मुन्दी आँखो से ,
उनीदे तारो से
देर तक बतियाती है

मैके मे जामुन के पेड़
पर चढ़ जामुन खाती है ,
बीती हुई जगहो को
स्नेह से थपथपाती है.
पिता की बाँहो मे

चिड़िया के बच्चे सी
छिप जाती है
ढेर सारा प्यार

हथेलियों मे भर
माँ पर उडेल आती है .....

रोज़ कई सपनो को,
वक़्त के कोनो पर ,

जहाँ- तहाँ सजाती है ....
सचिन के चौके पे
आटे से सने हाथो से
सीटी बजाती है

छत पर दौड़
पतंग लूट लाती है......

हर स्त्री के भीतर
होती है एक लड़की ..........


है ना?


43 टिप्‍पणियां:

  1. bilkul sahi bola doctor sahab!! is post ne dil ko choo liya!!

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  2. इस लड़की से हम तो अक्सर मिलते रहते हैं पर आपको ये लड़की कहाँ मिल गई? कितना सादा सा सच है यह. बधाई...कविता बहुत अच्छी लगी.

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  3. होता एकदम होता है
    लेकिन यह सब मायके में ही होता है
    ससुराल में नही?

    है ना?

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  4. सिर्फ़ स्त्री में ही नही पुरुष में भी होती है एक प्यारी सी लड़की.. कुछ लोग ज़ाहिर नही करते.. बहुत खूबसूरत बात कही डा. साहब आपने.. बधाई

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  5. मेरे ख्याल से तो वो लड़की नहीं कोई छोटा सा बच्चा था जिसे दुनियादारी की समझ नहीं थी..

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  6. सौ फीसदी सही। मेरी बिटिया विवाहित है। पर घरमें होती है तो यह सब रंग दिखा देती है लड़कपन के।

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  7. जी हाँ होती तो है, पर क्या ऐसा नहीं है की ज्यादातर सोयी रहती है? पर आपने जिन क्षणों को उकेरा है उनमें तो लड़की जगी हुई होती ही है, चंचल... प्यारी सी.

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  8. आपके दिल से निकली बात हमारे दिल में उतर गई। इस खूबसूरत प्रस्तुति के लिए बधाई।

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  9. हर स्त्री के भीतर होती है
    एक लड़की..........

    जो कसकर पकड़े रखती है
    गुजरा समय
    नज़रे चुरा कर
    रोज़ उसकी छाँव में
    बैठ आती है
    जो मासूम निगाहों से
    उलटपुलट कर देखती है
    संजीदगी की सिफारिश
    अपनी आँखों की नमी में
    एक पूरी बारिश छिपा कर रखती है
    नींद में अपनी
    पसंदीदा गुड़िया पकड़ कर सोती है
    और जाग कर
    उस लड़की को भगा देती है

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  10. कभी कभी खो जाती भी है...
    फिर जुगत से उस खोई लड़की को तलाशना भी पड़ता है .. कितनी बार मिसिंग वाले इश्तहार में मिल भी जाती है , खोई हुई लड़की ..पर तकलीफदेह बात तब होती है कि मिल जाने पर कई कई बार सोचती है स्त्री ..कौन है ये जिसे मैं अब जानती तक नहीं ..होगी कोई खोई हुई , और कोई लड़की..

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  11. "मैके मे जामुन के पेड़
    पर चढ़ जामुन खाती है ,
    पिता की बाँहो मे
    चिड़िया के बच्चे सी
    छिप जाती है"

    सर सौ फीसदी सच.
    जब भी आपको पढता हूँ एक अजब सी सुखद अनुभूति होती है.
    बहुत-बहुत आभार.

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  12. bahut bahut bahut hi achchee kavita-ek dum sach likha hai--waise to har vyakti mein ek bachcha hamesha hota hai--haan stri mein hamesha ek ladki hoti hai--aur wah na jaane kab kab hamen over power kar leti hai---aur nateeza???:D.....
    Rajesh ji aap ki bat mein kaat ti hun---mere liye to azaadi mayake se kuchh adheek sasural mein hai---isliye maine to kabhi apne andar ki ladki ko marne nahin diya.....:)

    Anuraag ji kitna sundar likha hai aapne -wah!!bhi kam hai...badhayee

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  13. अनुराग जी
    बेहद खूबसूरत रचना के लिए बधाई...ऐसी रचना है जिसे बार बार पढने को जी चाहता है...वाह.
    नीरज

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  14. बेमौसम की बारिश मे
    वो अक्सर भीग जाती है,
    उबले हुए भुट्टो को
    देख रुक जाती है
    अपने नन्हे के साथ
    मुन्दी आँखो से ,
    उनीदे तारो से
    देर तक बतियाती है

    हाँ सही कहा अनुराग जी आपने

    हर स्त्री में यह लड़की
    हर पल जिंदा रहती है
    पर बाबुल के घर में
    हर पल चहकती यह गुडिया
    पिया के घर में कहीं
    अपने ही रचे संसार में खो जाती है
    पर जब वह
    अकेली बातें करती है
    अपनी भूली हुई यादों से
    यूं ही कुछ पढ़ते पढ़ते
    मिलती है कुछ लिखे हुए लफ्जों से
    और तब वह जाग के
    वही चंचल नदी सी बन जाती है
    हाँ सही कहा हर स्त्री में होती है एक लड़की
    जो बीतते वक्त के साथ भी बड़ी नही हो पाती है ...

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  15. हर स्त्री के भीतर होती है एक छोटी सी बच्ची जो सारी दुनिया के सामने धीर-गंभीर बनी रहती है कैसी वो अपनी सहेलियों और मां-पापा के साथ खिलखिलाती है।

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  16. doc saab,bilkul sahi sach baat,har nari ke andar wo allad si ladki chipi hoti hai:);),waqt bewaqt machal jati hai,tussi tho great ho sir,ye kaha kaha sundar jagahon ki sair karva di kavita mein,aaj har ladki ki dua aapko lagegi,amen

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  17. एक बहुत ही अलग सी सुन्दर, हृदय को छूती हुई रचना। बहुत ही कम पुरुष अपनी पत्नी, माँ या स्त्री मित्र के अन्दर छिपी इस लड़की से मिल पाते हैं, कम इसलिए नहीं क्योंकि वह उससे मिलवाना नहीं चाहती, अपितु इसलिए कि उसे देखने के लिए विशेष दृष्टि की आवश्यकता होती है। आपमें न केवल यह दृष्टि है अपितु उसके भाव पढ़कर उन्हें कविता में सजाने की भी संवेदना है जानकर अच्छा लगा।
    ऐसे ही लिखते रहिए।
    घुघूती बासूती

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  18. घुघूति जी की बात से शत प्रतिशत सहमत हूँ।

    वैसे ये बताएँ ये आपके घर का सीन है क्या..:)

    सचिन के चौके पे
    आटे से सने हाथो से
    सीटी बजाती है

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  19. खूबसूरत कविता के लिए बधाई।

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  20. अनुराग जी
    एकदम सही कहा-
    बेमौसम की बारिश मे
    वो अक्सर भीग जाती है,
    उबले हुए भुट्टो को
    देख रुक जाती है
    अपने नन्हे के साथ
    मुन्दी आँखो से ,
    उनीदे तारो से
    देर तक बतियाती है
    बस कोशिश यही रहनी चाहिए कि वह ज़िन्दा रहे। मनोवैग्यानिक विश्लेषण पूर्ण रचना के लिए बधाई।

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  21. dobara aap ke blog par isee kavita ko padhne aayee.....ab isey sahez kar rakha hai....

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  22. Samply said ..simply beautiful --

    Keep on writing , more power to you.

    Peace ~~

    L

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  23. क्या बात है डाक्टर साहब?इस कविता को पढ कर मेरी स्थिति गूंगे का गुड जैसी हो गई है.ना चुप बैठा जा रहा है और ना ही कुछ बोल पा रही हूं.आपकी बाकी सारी पोस्ट भी आज ही बिना रुके पढ गई.ईश्वर ने आपको एक निराली दृष्टि दी है, साथ ही लिखने का वरदान भी.आपके ब्लौग पर आते रहना होगा.आपको बहुत बहुत बधाई.

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  24. anurag....sach kahte ho. aur mere andar ki ladki to kuch jyada hi jaagrat rahti hai...kai baar embaraase bhi karwa deti hai.

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  25. डाक्टर साहब कमाल कर दिया इतनी प्यारी रचना लिखके बधाई स्वीकार करे। अति सुन्दर। राजेश जी ससुराल में भी होता है।

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  26. आप सभी का शुक्रिया..बेजी जी ओर प्र्ताय्क्षा जी की कविताये मुझसे भी बेहतर है....शायद वे अपने आप को ज्यादा बेहतर बयान कर सकती है..ओर रंजना जी पास भी ढेर सारी कविताये उनकी झोली मे छिपी है ...अल्पना जी दूर रहते हुए भी कही नजदीक से जुड़ी नजर आती है..आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया....
    मनीष जी आप ठीक कह रहे है.....ये मेरे घर का ही द्रश्य है....

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  27. हां अनुराग,
    बिल्कुल होती है एक लड़की... कहीं अंदर कोने में छिपी, उस कोने को छूते ही बाहर आने को आतुर। चाहे जितनी मजबूत और दृढ़ निश्चयी स्त्री हो, एक लड़कपन उसके अंदर जरूर होता है... जो उम्मीद करता है कि उसे बिल्कुल एक बच्चे की तरह सहलाया और स्नेह दिया जाए। बहुत अच्छा लिखा है आपने, पढ़ कर एकदम मन के अंदर जैसे कुछ उछला...बाहर आने के लिए। शायद वो ही लड़की हो जो कोने की अचानक छुअन से बाहर आने को आतुर हो गई।

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  28. Anuraagji,
    Aapki is kavitane andartak chhoo liya...aapse ek guzaarish karna chahti hun....meri ek kavya rachna hai,mere blogpe,"Dhoonde nahi milega"...ya ho sakta hai,uska blogme sheershak ho"Wo ghar bulata hai"....zaroor padhiyega..apko ek "nanhi ladki" wahan milegi,"jise aarzoon thee bade honeki!"

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  29. Meri"Wo ghar bulata hai..."ye kaavyarachna post kar rahi hun....jaiseki maine kaha,mai chhandme nahi likhti...jaise,jaise manme khayal aate hain,likh detee hun....aasha hai aapko pasand aayegi!!Isme"wo ghar" istarah likha hai...iski khaas wajeh hai...itna to yahan vivran nahi de sakti!!
    Kavyarachnayen june 2007 ke archives me aapko milengi!!

    जब,जब पुरानी तस्वीरे
    कुछ यांदें ताज़ा करती हैं ,
    हंसते हसतेंभी मेरी
    आँखें भर आती हैं!
    वो गांव निगाहोंमे बसता है
    फिर सबकुछ ओझल होता है,
    घर बचपन का मुझे बुलाता है,
    जिसका पिछला दरवाज़ा
    खालिहानोमें खुलता था ,
    हमेशा खुलाही रहता था
    वो पेड नीमका आंगन मे,
    जिसपे झूला पड़ता था!
    सपनोंमे शहज़ादी आती थी ,
    माँ जो कहानी सुनाती थी!
    वो घर जो अब "वो घर"नही,
    अब भी ख्वाबोमे आता है
    बिलकुल वैसाही दिखता है,
    जैसाकी वो अब नही!
    लकड़ी का चूल्हाभी दिखता है,
    दिलसे धुआँसा उठता है,
    चूल्हातो ठंडा पड़ गया
    सीना धीरे धीरे सुलगता है,
    बरसती बदरीको मै
    बंद खिड्कीसे देखती हूँ
    भीगनेसे बचती हूँ
    "भिगो मत"कहेनेवाले
    कोयीभी मेरे पास नही
    तो भीगनेभी मज़ाभी नही।
    जब दिन अँधेरे होते हैं
    मै रौशन दान जलाती हूँ
    अँधेरेसे कतराती हूँ
    पास मेरे वो गोदी नही
    जहाँ मै सिर छुपा लूँ
    वो हाथभी पास नही
    जो बालोंपे फिरता था
    डरको दूर भगाता था।
    खुशबू अब भी है आती
    जब पुराने कपड़ों मे पडी
    सूखी मोलश्री मिल जाती
    हर सूनीसी दोपहरमे
    मेरी संसोंमें भर जाती,
    कितना याद दिला जाती ,
    नन्ही लडकी सामने आती
    जिसे आरज़ू थी बडे होनेके
    जब दिन छोटे लगते थे,
    जब परछाई लम्बी होती थी,
    यें यादे कैसी होती?
    कडी धूपमे ताजी रहती है !
    ये कैसे नही सूखती?
    ये कैसे नही मुरझाती ?
    ये क्या चमत्कार है?
    पर ठीक ही है जोभी है,
    चाहे वो रुला जाती है,
    दिलको सुकूनभी पहुँचाती,
    बांते पुरानी होकेभी,
    लगती हैं कलहीकी
    जब पीली तसवीरें,
    मेरे सीनेसे चिपकती हैं,
    जब होठोंपे मुस्कान खिलती है
    जब आँखें रिमझिम झरती हैं
    जो खो गया ढूंढें नही मिलेगा,
    बात पतेकी मुझहीसे कहती हैं!

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  30. ये लड़की बिल्कुल होती है। मगर खुलकर सामने क्यों नहीं आती? ये सवाल लिये मैं कब से भटक रहा हूँ।

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  31. बेहद खूबसूरत लिखा है शमा जी ....कहाँ छुपी थी आप ? ऐसे ही दिल से लिखती रहे..... महेन जी आपका भी शुक्रिया...

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  32. आपने सही कहा. इंसान बाहर से बड़ा होता है पर अन्दर से बच्चा रहता है.

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  33. sach kaha aapne, har stri ke andar ek ladki hoti hai..lagta hai aapke aas paas ka hee chitran kar dalaa yahan..:)
    badhai

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  34. Bahut hi acha likhte hain Anurag ji aap...aisa laga jaise apne aas pas ki hi bat ho rahi hai..aur stri ke bheetar hoti hai ek ladki mein to apne jaise stri mann ki bahut nape tule aur sahi shabdon mein vyakhya kar di ...wakai dil ko chu liya apki kavita ne....

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  35. :)
    har waqt bas yehi darr rehta hai ke wo ladki kahin kho na jaaye mujhse......zindagi bahut hi be-rang ho jaayegi phir shayad.

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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