2008-06-07

तू बता जिंदगी किस मोड़ मुड़े ?

मेरठ फरवरी २००१
आबूलेन के एक चौराहे पर खडे हम दोनों कोल्ड-ड्रिंक पी रहे है ,मैं असमंजस मे हूँ की मेरठ शहर मे वापस आयूँ या सूरत वापस चला जायूं,मेरी जेब मे डॉ मेहता की चिठ्ठी पड़ी है ...जिसमे उन्होंने मारीशस मेडिकल कॉलेज को ज्वाइन करने का ऑफर दिया है..मेरी wife को भी microbiology मे एडजस्ट कर दिया जायेगा...मुझे मेरठ बड़ा अव्यस्थित सा लगता है ,कोई डिसिप्लिन नही ..यहाँ के लोग बात बात मे गुस्सा हो जाते है...."यार वहां गुजरात मे पैसा बहुत है ..यहाँ up मे लोग पैसा कमा के फ़िर जोड़ के रखते है ..वहां हर आदमी खर्च करता है इसलिए पैसे का फ्लो बना रहता है ..मैं अपना तर्क देता हूँ,..दस मिनट यहाँ खड़ा रह ...देख कितनी गडिया यहाँ से गुजरती है ....अब मेरठ वो नही रहा १० साल मे ये भी बदल गया है.....साला गाँव है....मैं बुदबुदाता हूँ..हैरान हूँ कि कोई गुजरात मे u.p या मेरठ को कुछ कह देता था तो मैं बिफर जाता था फ़िर मैं ऐसा सोच रहा हूँ.."बेटे ऐसी गाँव ने तुझे पाल पोस कर बड़ा किया है....उसने ओर मैंने अपने सपने साथ ही बोये थे ,साथ साथ ही उन्हें सीचा ओर साथ साथ ही उन्हें बड़ा होते देखा ओर गाहे बगाहे हौसलों की कुछ बूंदे एक दूसरे की मिटटी मे डालते रहे अलबत्ता दोनों की जमीन अलग अलग थी.....बाद के कुछ सालो मे मैं मेडिकल मे एडमिशन लेकर बाहर चला गया ...वो I.A.S के प्री मे तीन बार सेलेक्ट हुआ फ़िर अचानक घर मे पिता के आकस्मिक निधन की वजह से जॉब ज्वाइन कर ली..excise मे काफ़ी अच्छी पोस्ट पर है........."
लेकिन मैं अब शहर मे किसको जानता हूँ..मैं उससे कहता हूँ...सब यार दोस्त बाहर गये...
जब तू यहाँ से गया था तो उस शहर मे किसको जानता था ?अब वहां बहुत से लोग है ना...ये तो तेरा अपना शहर है....कितने दिन लगेंगे...मैं सड़क पर चलती गाडियों के देखता हूँ.......

नवम्बर २००० सूरत ....

यार माँ बाप अकेले पड़ जायेंगे ....छोटा भी बाहर है ..मैं कहता हूँ..
तुम साले शायरों का यही होता है...हर फ़ैसला किताबो के पन्नों से जोड़ कर लेते हो या ..दिल से... 'मेरे सूरत वाले दोस्त कहते है...दोनों बाहर जा रहे है ..एक U.K तो दूसरा हावर्ड..एक opthalmologist है ,दूसरा सोशल मेडीसिन वाला..दूसरे के पिता I.A.S.है इसलिए उसकी सोच भी W.H.O या किसी रिसर्च मे जाने की है...ऐसा नही है की वो ग़लत सोच वाले इंसान है...."सबके हालात जुदा होते है "मैं कहता हूँ...फ़िर शेर पढने लगा ..मेरा दोस्त कह रहा है... ' जिंदगी के गंभीर फैसले जज्बातों से नही लिए जाते '.... अजीब उलझन है......मैं सोचता हूँ...
पहले सोचते थे की बस डिग्री मिले तो छू लेंगे आसमान ....अब यहाँ कोई छोर नही मिल रहा है..इस शहर मे रहकर ढेर सारे सम्बन्ध बन गये है ,एक मन यहाँ भी खींच रहा है......

फरवरी २००१ मेरठ ....
डॉ श्रीवास्तव की .चिट्ठी पापा के आगे रखता हूँ....तुम जाना चाहते हो तो देख लो हमारी चिंता ना करो अभी इस शरीर मे बहुत जान है.....वे कहते है ....मैं उनका चेहरा गौर से देखने लगा हूँ..वे बूढे हो चले है ...चिट्ठी को भी नजदीक से ले जाकर पढ़ रहे है ,एक आँख मे मोतिया आ चुका है ..कई बार कह चुका हूँ की ऑपरेशन करवा लो ....बस तू आ जा फ़िर करवाते है... वो कई महीनों से टालते आ रहे है..... क्या उनका गला रुंधा सा है या मुझे वहम है ,वे अपना गला खंखारते है ... मम्मी चाय लेकर आयी है ..शुगर ओर ब्लड प्रेशर की मरीज है ...मोबाइल बज उठा है...सूरत से देवांग का फोन है....रानदेर रोड पर जगह final कर ली है ....तुने कुछ सोचा की नही ?वो भी opthamlologist है बता ....यहाँ एक दो जगह खाली है... ..मैं चाय पीता पीता बाहर आ गया हूँ....बताता हूँ....
बिना वजह गाड़ी उठाकर बाहर निकल गया हूँ.....आगे एक रिक्शा जा रहा है .हार्न देता हूँ, रिक्शा वाला सुन नही रहा है...देखता हूँ उसमे दो बूढे बुढिया बैठे हुए है ,बुढिया ने कमर का सहारा बूढे को दे रखा है ...बूढा शायद बीमार है....कुछ खांस भी रहा है....हार्न की आवाज सुनकर पीछे देखता है....उसकी शक्ल पापा से मिलती सी लगती है....
जून २००८
शुक्रवार का रात का खाना मेरे साथ खाना है ,उस दिन जरा जल्दी फ्री हो जाना ,मेरा excise वाला दोस्त फोन पर है...मैं समझ जाता हूँ कोई बात है ...वो आजकल गजिअबाद पोस्टेड है..रात को हम साथ बैठे है...उसके चेहरे पर गहरी उदासी है .....वो बोलना शुरू करता है ...
गाँव मे एक जमीन थी .बहुत ज्यादा नही थी ...केवल ५ लाख मे बिकी ...माँ ओर दोनों बड़े भाई के अलावा छोटे भाई बहन का भी हिस्सा मिलाकर सबके हिस्से १ लाख आता ,तुझे मालूम है छोटा कैसा है....मैं सर हिलाता हूँ.. जानता हूँ उसके छोटे के हालात ठीक नही है .सोचता था की इन पैसो से कोई व्यापार करवा दूंगा....पर .....वो खामोश हो जाता है.. भाइयो से कुछ डिसकस करने की सोच ही रहा था कि उससे पहले ही गाड़ी मे रस्ते मे ही मालूम चला दोनों भाइयो ने पहले से तय कर रखा था कहाँ इन्वेस्ट करना है ....बहन ने भी......ये बहुत ज्यादा पैसा तो नही था अनुराग....
उसकी आँखे भर आयी है...८ सालो ने रिश्तो के चेहरे बदल दिए है .. उसके बीच वाले भैय्या उसके हीरो हुआ करते थे ,मैं जानता हूँ... मेरे भी थे ....मैं क्या कहूँ .मैं खामोशी से सुनता हूँ... उसने सिगरेट सुलगा ली है ...

७ जून २००८ शनिवार शाम ६ बजे

क्लिनिक मे घुसता हूँ ..तो एक आदमी अपने बेटे ओर एक अपनी पत्नी से साथ बैठा हुआ है ....उसकी पत्नी कि एक बांह नही है.डॉ साहब ४ बजे से आपका इंतज़ार कर रहा हूँ...वो कहता है ..दूर से आए थे आपका टाइम मालूम नही था ...तो सोचा मिल कर जायेंगे ...उसके ५ साल के बेटे को सफ़ेद दाग है....क्या काम करते हो ?मैं पूछता हूँ...मजदूरी करता हूँ साहब .६० रुपये रोज......१५० रुपिया मेरी फीस देकर वो मुझे दिखाने आया है ...सरकारी अस्पताल मे उसे विश्वास नही है.....साहब मेरा बेटा ठीक तो हो जायेगा ना..उसकी बीवी मुझसे पूछती है....


दर्द है कि कम्बख्त ख़त्म होता नही..........रूह को चैन मिलता नही ....

25 टिप्‍पणियां:

  1. दर्द है तो मोहब्बत है, संवेदनाएँ हैं..अगर दर्द से छुटकारा पा लें तो क्या रह जाएगा फिर.. आपकी पोस्ट पढ़ कर इब्ने इंशा जी की वो नज़्म याद आ रही है..इसलिए यहाँ पूरी ही पोस्ट कर रहा हूँ

    दर्द रुसवा ना था ज़माने में
    दिल की तन्हाईयों में बसता था
    हर्फ-ए-नागुफ्तां था फ़साना-ए- दिल

    एक दिन जो उन्हें खयाल आया
    पूछ बैठे उदास क्यूँ हो तुम
    यूँ ही ..! मुस्कुरा के मैंने कहा
    देखते देखते, सर-ए-मिज़हगाँ*
    एक आंसू मगर ढ़लक आया...

    (पलकों की कोरों से*)

    इश्क नीरस था, ख़ामक़ार था दिल
    बात कुछ भी ना थी मगर हमदम
    अब मोहब्बत का वो नहीं आलम

    आप ही आप सोचता हूँ मैं
    दिल को इल्जाम दे रहा हूँ मैं
    दर्द बेवक़्त हो गया रुसवा
    एक आँसू था पी लिया होता...

    इश्क़ तौक़ीर* खो गया उस दिन
    हुस्न मुहतात** हो गया उस दिन
    हाए क्यूँ बेक़रार था दिल...

    (*सम्मान, **बेफिक्री खो देना )

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  2. दर्द है कि कम्बख्त ख़त्म होता नही..........रूह को चैन मिलता नही ....सही कहा आपने अनुराग जी ..बहुत ही अच्छा लिखते हैं आप ..ज़िंदगी का सच है यही ..मनीष जी की पोस्ट की हुई नज्म बेहद खूबसूरत है

    आप ही आप सोचता हूँ मैं
    दिल को इल्जाम दे रहा हूँ मैं
    दर्द बेवक़्त हो गया रुसवा
    एक आँसू था पी लिया होता...

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  3. मोस्‍ट प्‍लांड और व्‍यवस्थित शहर में रहते हुए आज अपना शहर बहुत आया। वो शहर जो बहुत अव्‍यवस्थित है, जहां लोग बात-बात पर गु़स्‍सा करते हैं, और भी बहुत कुछ। हां दर्द है कि कम्बख्त ख़त्म होता नही..........रूह को चैन मिलता नही ....। आप जारी रखें।

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  4. आरंभ से अंत तक प्रेम ही प्रेम की गंगा बहाई है अनुराग साहब आपने, शव्द शव्द भाव भरे हैं । धन्यवाद ।

    आरंभ

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  5. एक खास तरह की स्वाभाविकता आपकी डायरी के इन पन्नॊं में मौजूद है, जो आपके अन्तर्मन को खोल कर रख देती है. पढना अच्छा लगता रहा. ऎसी सादगी और स्वाभाविकता ही उम्दा लेखन की पहचान है. स्थितियों की सहजता में फ़िर न तो भाषा बनावटी रहती है और न शिल्प गढने की जरूरत होती है. बहुत बहुत बधाई.

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  6. hmmm seems it was good idea u remained in india,rishton se badhkar paisa to nahi,khair kuch kismat ke bhi khel hote hai,jo hota hai achhe ke liye hi,bahut hi marmsprashi lekh hai doc saab,aakhari wala sher bilkul sahi kaha,ruh ko kabhi chain nahi aata,dard ki dawa bhi bata dete saath mein,kuch tho baichainiyan kaam hoti.itne dil kash lekh ke liye bahut badhai.

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  7. सहज, ज़िँदगी के जैसा !
    थोडे सुख तो ढेर सारे दुखोँ से बना --
    आप इसी तरह लिखते रहेँ ..अच्छा लगता है आपकी बातोँ को पढना
    आपके ममी और पापा जी को मेरे नमस्ते कहियेगा -
    क्या होनहार बेटा है उनका !!
    स स्नेह्,
    - लावण्या

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  8. pata nahi zindgi aisi kyo hai...ek pal man bahut khush hota hai fir jaise koi channel badal deta hai...aapki daastan mein jaise apni zindgi ka aks bhi dikh jata hai.

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  9. आह!! वाह!! बहुत बेहतरीन प्रवाह में चली पूरी भावनायें. बहुत उत्तम.

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  10. पूरी पोस्ट आसू की एक बूँद की तरह है. ऊपर से नीचे आ रही है और चेहरा रुआसा हुआ जा रहा है.

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  11. आज पढ़ कर बहुत अच्छा भी लगा और मन उदास भी हुआ ... लिखते रहें ...
    "उसकी शक्ल पापा से मिलती सी लगती है" ऐसा मुझे भी कई बार लगता है ..अब और ज़्यादा ..

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  12. ज़िंदगी एक कड़वा घूँट है .. मगर क्या करे पीना भी पड़ता है..
    एक और खूबसूरत पोस्ट डा. साहब

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  13. मुझे यह पढ़ कर बरबस पर्ल बक के उपन्यास "द टाउन्समैन" की याद आ रही है।

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  14. अपना अनुभव है सर कि
    "दर्द कमबख्त ख़त्म नहीं होता बल्कि कभी कम या कभी अधिक हो जाता है. हमे इसी दर्द के साथ जीना होगा."
    बहुत ही मार्मिक लिखा आपने.
    बहुत कुछ याद आगया.

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  15. डॉक्टर साब आपकी हर पोस्ट अच्छी लगती है क्योंकि कहीं ना कहीं उसे अपने आप से जोड़ पाता हूँ. साल के कुछ दिनों को छोड़ दूँ तो ऐसा लगता है कि वास्तविकता से दूर होता जा रहा हूँ... आपकी पोस्ट ख़ुद की याद दिलाते रहती है... शुक्रिया आपका.

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  16. Dr saab....agar kisi achche lekh ki pehchaan ye hai ki padhnewala usme khud ko khoj paaye to aapka lekh bahut hi achcha hai.

    Abhilasha aur paisa...yahii do cheezein videsh laayi thi mujhe. Ab lagta hai ki apne shahar ki woh relam-pel, bheed-bhaad, shor shayad inse behtar tha. Sach kahoon, ye post padhkar gala kuch rundh saa aaya hai.

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  17. Aap dil ki hi likhate hai,Doc,
    Ghar se door her insan ko ghar ke kareeb le aate hai,rishto ki garmahut ko mahsus karwate hua,

    God bless you.Take care and keep writing.Good luck...

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  18. ek bar padhna shuru kiya to padhti chali gayi.bhawnaye nadi ki tarh bahti rahe aur ham usme dubte rahe.agle post ka intzar rahega.

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  19. ek baar phir se dil ko chu liya aapke is lekh ne,Dr sahab kya kabiliyat paayi hai aapne likhne ki. shabd kalam se nikalte hai aapki aur seedha hriday mein utar jate hai... aakhe gili ho Gayi lekh padhkar. likhterahiye kahi to yeh Dard ka silsila khatam hoga :-)

    Rohit Tripathi

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  20. Anuragji,
    aapne bilkul sahi likha hai.apne shahar ko sabhi miss karte hai.mei bhi karti hun.jari rakhiye.

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  21. kai dino bad achanak aapko padha..maloom chala ek savendansheel insan bhi is choge ke peeche hai.likhte rahiye,comment bhale hi na kar payun par aapko padhti rahungi.

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  22. Sir, please read my new poem abt Meera bai on my blog n give ur valuable comments on it.
    Neelima

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  23. आपने तो आँखें भिगो दीं डाक्टर साहेब. ईश्वर की कृपा रही, यह दौराहा मेरे जीवन में नहीं आया.

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  24. hamesha ki hi tarah iss baar bhi padhaa aur khud ko aapki kahaani se relate karne se bach nahi paaya...
    aapke shabd bol rahe hain...

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  25. 'गाहे बगाहे हौसलों की कुछ बूंदे एक दूसरे की मिटटी मे डालते रहे '

    दर्द है कि कम्बख्त ख़त्म होता नही..........रूह को चैन मिलता नही ....

    bahut hi sundar abhivayakti hai...

    yah post bhi shabd shabd ko padh kar padhne wali hai....sar sari taur par padhi jaane wali nahin.....itne sopano se ho kar gujarati hai zindagi...ki kayee baar steps utar kar chadhna padhta hai---priorities changes with time...
    pita ji operation ke liye bete ke aane ka wait karte hain--ye shayad har kisi ke saath hai...last year meri mother in law ke [sirf]cataract operation ke liye mujhe india jaana padha tha[kyun ki husband nahin jaa sakte they]---nahin to wo operation ke liye ready hi nahin thin-

    -aisa hota hai..kayee baar old people depend so much on us..and it gives u a feeling of belongingness.Thats really touching!
    nahin??

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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