2008-06-14

इन दिनों तू कहाँ है जिंदगी ?...

गाड़ी चलाते फोन बजता है तो उठाता हूँ, "तुने सुना "उधर से मेरा दोस्त है.....
"नही यार अभी वक़्त नही मिल पाया "
... अमेरिका से उसने कोरियर करके एक सी .डी भेजी है .... साथ मे एक ख़त भी ...अब ख़त मिलना बहुत भला सा लगता है....लिखा है .रात के ३ बजे लिख रहा हूँ ...आज अचानक यहाँ एक स्टोरसे कुछ " रेयर" मिला है ... मालूम है तेरी पसंद के है "रंजिश ही सही .......मेहंदी हसन की आवाज मे भी है ओर अख्तर की भी.....slow वर्सन मे भी है ओर तेरा पसंदीदा "रात भर आपकी याद आती रही "भी है......मैं पढ़कर मुस्कराता हूँ उन दिनों मैं उसे लेकर कितना दौडा था इस गाने को ढूँढने के लिए अपनी यामहा पर ......
तब वो कैनी रोजर्स या दूसरे कंट्री सोंग्स   सुना करता था ...झुंझला गया था ,"क्या है इस गाने मे . ? अब  बदल गया है ...कितने किलोमीटर गाड़ी चला कर जगजीत का कन्सर्ट सुनने जाता है.....पिछले १० दिनों मे उसका तीसरा फोन है.....रात को १.३० बजे मोबाइल बज रहा है....... वही है...... "सुना "
मैं जवाब नही देता हूँ....
तू बदल गया है साले ...
वो फोन रख देता है....नाराज है......
वाकई जिंदगी हमे बदल रही है.....




मसलसल भागती ज़िंदगी मे
अहसान -फ़रामोश सा दिन
तजुर्बो को जब
शाम की ठंडी हथेली पर रखता है
ज़ेहन की जेब से
कुछ तसव्वुर फ़र्श पर बिछाता हूँ
फ़ुरसत की चादर खींचकर,
उसके तले पैर फैलाता हूँ
एक नज़्म गिरेबा पकड़ के मेरा
पूछती है मुझसे
"बता तो तू कहाँ था?




29 टिप्‍पणियां:

  1. सुशील कुमार15 जून 2008 को 12:09 am

    सच पता नही कहाँ खो गई है जिंदगी। डाक्टर साहब आप बड़े किस्मत वाले है जो ऐसे दोस्त पाऐ है।

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  2. कभी कभी लगता है कि जिन्दगी एक बड़ा केलिडोस्कोप है। बस उसे रोटेट कौन कर रहा है - यह तय नहीं है। सब बदल जाता है, पर रहता वही है - केलिडोस्कोप!

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  3. इसको पढ़कर अपनी लिखी एक पुरानी पोस्ट याद आ गई। मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है

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  4. सुंदर.... शब्दों से बड़ी खूबसूरती से खेल लेते हैं आप...

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  5. aapne bilkul sahi likha hai jindgi kha bhag rhi hai pta nhi.

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  6. कुछ तसव्वुर फ़र्श पर बिछाता हूँ
    फ़ुरसत की चादर खींचकर,
    उसके तले पैर फैलाता हूँ
    एक नज़्म गिरेबा पकड़ के मेरा
    पूछती है मुझसे
    "बता तो तू कहाँ था?

    bahut khubsrat nadaz hai nazm ka doc saab,sahi lucky to hv gud friends who still think about ur old wish to come true after long years,zindagi hi hame badal deti hai.

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  7. kaun kambakht kehtaa hai ki aap doktar hain mujhse poochein to kahungaa kaatil hain meri jaan kaatin hain, bas yun hee katl karte rahein.

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  8. sach anurag...ye ittefaak hi hai ki ham dono ne badlaav ke oopar ek saath likha ...par yahi to sach bhi hai na...peechhe mudkar dekho to lagta hai ki bahut kuch badla hai lekin kuch aisa bhi hai jo bachpan se aaj tak waisa ka waisa hi hai. hai na...?

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  9. aaj sunday aapki pichli teen post padh gayi,lagta hai aap galat peshe me hai aap ko to ek lekhak hona chahiye tha.nazm behad khoobsurat hai.

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  10. बहुत खूब अनुराग भाई ..
    गर मिल जाये ज़िँदगी,
    तो कह देते,
    औ ज़िदगी गले लगा ले ..
    - लावण्या

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  11. तजुर्बो को जब शाम की ठंडी हथेली पर रखता है

    badhiya abhivyakti .dhanyawaad.

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  12. ज़िंदगी को पुकारती
    और
    उसकी पुकार सुनती जीवंत पोस्ट.
    =========================
    बधाई डा. साहब.
    डा.चंद्रकुमार जैन

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  13. bahut badhiya nazm.....padhkar bada achcha laga. If I have to use an oxymoron to describe it, I would call it dramatically real.

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  14. आप बदल गए हैं... शायद में भी बदल रहा हूँ... तेजी से... पर अभी भी कम से कम सप्ताह के २ दिनों पिछली जिंदगी के जितने करीब जा सकता हूँ जाता हूँ, ४-५ दोस्त साथ ही हैं... पर न चाहते हुए भी बदलाव अपनी गति से जारी है !

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  15. ये बदलाव भी जिंदगी का ही एक रूप है।
    बहुत खूबसूरती से आपने इस बदलाव को अपनी नज्म के जरिये बताया है।

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  16. एक नज़्म गिरेबा पकड़ के मेरा
    पूछती है मुझसे
    "बता तो तू कहाँ था?

    मुझे तो अक्सर नज़्मो से ही पूँछना पड़ता है, कि आते आते कहाँ चली गई तुम और वो मुझपे बरस पड़ती हैं पुरानी सहेलियों की तरह..." खुद की खबर रहती नही और इल्जाम हमारे सर लगाती हो".... क्या करूँ सिर झूक के सुन लेती हूँ... गलती अपनी जो होती है...!

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  17. अनुराग जी
    किस्मत वाले होते हैं वो लोग जिनके दोस्त रात तीन बजे आप को गाली देकर नींद से उठा कर गप्पें मारते हैं. जितनी खूबसूरती से आपने पोस्ट लिखी है उतनी खूबसूरती से उसे अपनी नज्म से खत्म भी किया है. नज्म तो लाजवाब है...
    नीरज

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  18. क्या कभी यह कहा किसी ने तू मेरी ज़िन्दगी है? ज़रा ज़हन पर यादों का बोझ रखना तुम...

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  19. बस मित्र, यही जिन्दगी है जो आप बखूबी समझ पा रहे हैं:

    एक नज़्म गिरेबा पकड़ के मेरा
    पूछती है मुझसे
    "बता तो तू कहाँ था?

    -बहुत ऊँची बात कह गये हैं आप. बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  20. एक नज़्म गिरेबा पकड़ के मेरा
    पूछती है मुझसे
    "बता तो तू कहाँ था?


    Just speechless!
    Awesome!great!!

    [by the way taAjuuub hai ki aap se kisi ko shikayat bhi ho sakti hai???]

    उत्तर देंहटाएं
  21. मसलसल भागती ज़िंदगी मे
    अहसान -फ़रामोश सा दिन
    तजुर्बो को जब
    शाम की ठंडी हथेली पर रखता है
    ज़ेहन की जेब से
    कुछ तसव्वुर फ़र्श पर बिछाता हूँ
    फ़ुरसत की चादर खींचकर,
    उसके तले पैर फैलाता हूँ
    एक नज़्म गिरेबा पकड़ के मेरा
    पूछती है मुझसे
    "बता तो तू कहाँ था?

    o my god.....this is just awesum....kaise likhte hain aap itna achha....itni khoobsurti se shabdon ko pirote hain...alfaaz nahi hain mere paas tareef ke liye.

    and "in dino tu kahan hain zindagi" bahut hi umda tag line hai.

    उत्तर देंहटाएं
  22. मसलसल भागती ज़िंदगी मे
    अहसान -फ़रामोश सा दिन
    तजुर्बो को जब
    शाम की ठंडी हथेली पर रखता है
    ज़ेहन की जेब से
    कुछ तसव्वुर फ़र्श पर बिछाता हूँ
    फ़ुरसत की चादर खींचकर,
    उसके तले पैर फैलाता हूँ
    एक नज़्म गिरेबा पकड़ के मेरा
    पूछती है मुझसे
    "बता तो तू कहाँ था?

    o my god.....this is just awesum....kaise likhte hain aap itna achha....itni khoobsurti se shabdon ko pirote hain...alfaaz nahi hain mere paas tareef ke liye.

    and "in dino tu kahan hain zindagi" bahut hi umda tag line hai.

    उत्तर देंहटाएं
  23. मसलसल भागती ज़िंदगी मे
    अहसान -फ़रामोश सा दिन
    तजुर्बो को जब
    शाम की ठंडी हथेली पर रखता है
    ज़ेहन की जेब से
    कुछ तसव्वुर फ़र्श पर बिछाता हूँ
    फ़ुरसत की चादर खींचकर,
    उसके तले पैर फैलाता हूँ
    एक नज़्म गिरेबा पकड़ के मेरा
    पूछती है मुझसे
    "बता तो तू कहाँ था?

    o my god.....this is just awesum....kaise likhte hain aap itna achha....itni khoobsurti se shabdon ko pirote hain...alfaaz nahi hain mere paas tareef ke liye.

    and "in dino tu kahan hain zindagi" bahut hi umda tag line hai.

    उत्तर देंहटाएं
  24. मसलसल भागती ज़िंदगी मे
    अहसान -फ़रामोश सा दिन
    तजुर्बो को जब
    शाम की ठंडी हथेली पर रखता है
    ज़ेहन की जेब से
    कुछ तसव्वुर फ़र्श पर बिछाता हूँ
    फ़ुरसत की चादर खींचकर,
    उसके तले पैर फैलाता हूँ
    एक नज़्म गिरेबा पकड़ के मेरा
    पूछती है मुझसे
    "बता तो तू कहाँ था?

    o my god.....this is just awesum....kaise likhte hain aap itna achha....itni khoobsurti se shabdon ko pirote hain...alfaaz nahi hain mere paas tareef ke liye.

    and "in dino tu kahan hain zindagi" bahut hi umda tag line hai.

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  25. उफ़ कितनी कड़वी सच्चाई है
    रोजमर्रा की जीवन मैं हम क्या क्या खोदते हैं
    पता नही

    बहुत ही अच्छी नज़्म

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  26. एक नज़्म गिरेबा पकड़ के मेरा
    पूछती है मुझसे
    "बता तो तू कहाँ था?


    bahot dino se soch raha tha ki aap ke dil ki baat ko apne dil ki baat kahoon ya zindgi ke roop.....

    aapki lekhani jo bhi kahti hai bas mehsoos kar sakta hai insan aapki tarah bayaN karna mumkin nahii ..

    shyad bhagvaan iske liye kisi kuch khas insano ko hi chunta hai or yakinan aap unme se ek hai .

    ek doctor or ek kavi ka ek hi insan mai paya jana bhi kam hi dekhne ko milta hai.
    shobhay hai ki aap ko padhne or jaanne ka mauka mila.

    aapka ek prashanshak.

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  27. aapke dost ki tarah hi mai bhi thi kabhi..par kaafi waqt se purane hindi geet aur jagjit ji ki gazalon se behad prabhavit hu..aur un gehraiyon mein apni jagah mehsus karti hu.zindagi ne kaafi badlav dekhe par han jaise ki aap kehte hain insaan hain kuch par kab tak reh payenge, yeh malum nahi.. humesha ki tarah bahut acha likha hai aapne. shayad khud to na likh paati is baar ki kya bahut acha hai par Abhijit ji ne asaan kar diya..unke vyakt kiye vichar share karti hu. dhanyawad.

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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