2008-07-08

अच्छा लिखने से कही बेहतर है अच्छा इन्सान होना

क्या आपने कभी उस रिक्शा वाले को " टिप" दी है जो ..आपको मंजिल पर पहुंचाकर अपना पसीना पोछ रहा हो ? ढेर सारे बच्चो को लेकर कही ढलान पर अटक कर रिक्शा वाले की मदद करने को जो बच्चे रिक्शा से उतर कर धक्का लगाते है …. बड़े होने पर वही बच्चे किसी ठेले पर भारी सामान ले जाते मजदूर के लिए अपनी गाड़ी धीमी नही करते ….ये जानते हुए की उनके पास गियर है …वे जब चाहे अपनी रफ़्तार कम या ज्यादा कर सकते है …..हम आप सब शायद वही बच्चे है जो बड़े हो गए है ।ऐसा क्यों है कि शिक्षा पाकर पढ़ लिख कर हम ओर ज्यादा आत्म - केंद्रित होते जाते है फ़िर उसे ‘यही दुनिया है ” के नारे के पीछे छिपा देते है .पढ़ लिख कर हम अपनी चालाकियों को ओर पैना करते है ओर अपनी कमियों को ज्यादा अच्छे तरीके से छिपाना सीख जाते है ….हम ढेरो आंसू किसी मूवी को देखकर बहा देते है ..पर अपनी संवेदना उसी हॉल कि सीट पर मूवी ख़तम होने के साथ छोड़ आते है . हर इन्सान अपने परिवार के लिए संवेद्नानायो से भरा है पर वही दिल एक अजनबी या मजलूम के लिये दर्द महसूस नही करता ?हो सकता है वो अच्छा पिता हो ?शायद अच्छा बेटा भी, पर क्या ये काफ़ी है ?
जिंदगी बहुत तेज रफ़्तार से भाग रही है ओर हम भी.... वक़्त के साथ शायद हमारे भीतर ढेरो भूले जमा हो जाती है ,ढेरो ऐसे शब्द जो कहे नही गये ,ढेरो ऐसे काम जो करे नही गये ..हमारे दिल का एक कोना ऐसी कई चीजो से भरा रहता है....कभी सोचा है आपने इन्हे उलीचना ?

चरित्र दो वस्तुयों से बनता है ,आप की विचारधारा से ओर आप के समय बिताने के ढंग से ..धारणाये बदल सकती है लेकिन चरित्र का केवल विकास होता है ।२१ साल के जो आप होते है 31 मे वही नही रहते …तजुर्बे सिर्फ़ गुजरने के लिये नही होते ,क्या क्या आपने उनमे से समेटा है ये महतवपूर्ण है .....जीना भी एक कला है कुछ लोग सारे भोग भोगकर भी उनसे मुक्त रहते है ओर कुछ लोग अध्यात्म की शरण मे जाकर भी इस संसार से मुक्त नही हो पाते ॥
मेरा एक सीनियर था कॉलेज मे जिससे मैं बहुत प्रभावित था ,वो दिखने मे अच्छा था ,पढने मे अच्छा था ,ढेरो लड़किया उसकी दोस्त थी ,अच्छा पहनता था ..एक दिन मैंने उससे पूछा ऐसा कैसे ?उसने कहा "आजकल की दुनिया मे "नोर्मल" रहना ही असाधारहण होना है,आप अपने वो काम वक़्त पर करते रहिये जिन्हें उसी वक़्त करना है ,सब चीजे अपने आप होती जायेगी ......
कई बार जब हम मेडिकल प्रोफेशन के दोमिलते है तो अपने पेशे के सुख दुःख भी बांटते है मेरा एक दोस्त ऐसे ही कई बार कहता है 'कई बार ऐसे ऐसे मरीज जिनके बचने की संभावना हम भी नही करते जाने किस चमत्कार से ठीक हो जाते है ओर वे हमें ढेरो आभार ओर आशीर्वाद देकर चले जाते है ,जानते हो कभी कभी जब मैं किसी मरीज के परिवार वालो I.C U मे कहता हूँ की चिंता मत करो सब ठीक हो जाएगा तो ऐसा लगता है की किसी खिड़की पे बैठा भगवान् हंस रहा है.....कही कोई ईश्वर है ......जिसके भय या श्रद्धा से हम अनुशासन मे रहते है
वक़्त बड़ा ही बलवान है इसके एक पन्ने पर जो मनुष्य आपको देवता सा दिख रहा है शायद अगले कुछ पन्नो मे वही आपको साधाहरण से भी गया गुजरे लगा...परिस्थितिया ओर हालात आपके मुताबिक नही चलते ...मेरी कालोनी में,मेरी गली में एक पति पत्नी पता नही कौन सी कुमारियों के बाबा से प्रभावित होकर अपने घर के ऊपर एक आश्रम सा बना लिया है कई बार इन पति को अपनी ऐ।सी गाड़ी में इन कुमारियों को उनके बाबा के साथ ढोते देखा है ॥सुबह उनके ७७ साल के पिता को रिक्शा के इंतज़ार में खड़े देखा॥वे दिल के मरीज़ है ।किसी डॉ को दिखाने जा रहे थे ..ऐसा भक्ति का क्या मूल्य जब आपने रोजमर्रा के कर्तव्य पूरा नही कर रहे ?
हो सकता है उसके घर में कोई किताबो की शेल्फ न हो ..किसी लेखक का नाम उसने न सुना हो , कोई शेर उसे मुह जबानी भी याद न हो ,..किसी मंच पर उसने दो शब्द न बोले हो लेकिन अक्सर शाम को वो बच्चो के साथ पार्क में फूटबाल खेलता दिख जाता है , कभी ऑफिस से लौटी अपनी पत्नी के लिए उसे चाय बनाने में कोई हिचक न होती है .....अपने बूढे माँ बाप की डांट वो अब भी सर झुका कर खाता है , दोस्तों के लिए वो अब भी अपनी ऍफ़ डी तुड़वा देता है ..उसका चेहरा इतना आम है कि उसे याद करने के लिए आपको दिमाग पर जोर देना पड़ता है ..पर यकीन जानिये वो हम आप से कही बेहतर इन्सान है

46 टिप्‍पणियां:

  1. Truly said! And very well written. Keep up the good work.

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  2. आप अच्छा लिखते हैं यह तो आपके लेख से जाहिर है. आप अच्छे इंसान भी होंगे ऐसा मुझे यकीन है. कारण कि एक अच्छे इंसान के मन में ही अच्छे विचार होते हैं. लिखते रहिये.

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  3. अब क्या कहें डाक्टर साहब, आपकी बात ने झकझोर दिया है. सचमुच अच्छा इंसान बने रहना कितना मुश्किल है। अच्छी नौकरी अच्छा घर अच्छा पैसा तो सब कमा लेते हैं पर थोड़ी सी अच्छाई कमा पाना कितना मुश्किल है।

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  4. सही कहा अच्छा इंसान बनना बहुत ही मुश्किल है ...कोशिश तो रहती है अपनी तरफ से पर शायद कोई कमी रह ही जाती है
    जिंदगी के पहलू पर आपका लिखा बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है

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  5. शीर्षक से लगा की धर्मवीर भारती वाली बात से ये पोस्ट लिखी है आपने... पर पढ़ा तो बहुत काम की बात मिल गई... वैसे लेखक होने और अच्छा होने में तो कोई रिश्ता ही नहीं है... हाँ अच्छा आदमी अच्छा लेखक हो सकता है, अच्छा लेखक भी अच्छा आदमी हो जरूरी नहीं...[ये बात अलग है कि निराला जैसे लोग हो तो विवाद ही रह जाए की अच्छा इंसान या लेखक!]

    और दोस्तों के लिए एफडी तुडवाने वाले लोग साधारनतया लेखक नहीं होते...

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  6. aapne bilkul sahi likha hai. ek accha insan hona jada jaruri hai. bhut sundar lekh. badhai ho.

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  7. bilkul sahi kaha doc saab ek accha insaan bana bahut mushkil hai,aksar hum koi achhi baat dusro ko nasihat dete hai magar wahi baat hum nahi apnate,hamari baat kahu to,i always say smile smile:) zindagi baut khushiyon se bhari,sada muskurna,magar hum khud thodi si thokar se murjha bhi jate hai,kyon itna aasan nahi kuch apna pana .phir bhi har halat ka samna muskurake kigiye:):)

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  8. anuraag ji ....ab to words bhi nahi milte aapko kuch kahne ke liye....

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  9. अद्भुत...आपका सवाल बिल्कुल ठीक है. मैंने बीयर पीये लोगों को रिक्शा वाले से झगड़ते देखा है. पैसे कम देने के लिए रिक्शा वाले से झगड़ रहे थे. बिना ये सोचे हुए कि ११ बजे रात को उसी रिक्शा वाले ने महाशय को घर पहुंचाया था.

    अच्छा इंसान बनने के लिए किसी रॉकेट साइंस को पढने की जरूरत नहीं.

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  10. अनुराग हर बार आपका लिखा बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर जाता है। आहिस्ता-आहिस्ता कुछ मरता जा रहा है ........ शायद हमारी संवेदनायें ।

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  11. हमेशा की तरह बहुत अच्हा लिखा.. लेख पढ़ कर बहुत अच्हा और सचा लगा लेकिन फिर मैंने सोचा की क्या मै इसे अपने अन्दर ढाल पाउगा? क्या इस लेख से प्रेरणा लेकर मै एक अच्हा इंसान बन पाउगा.. यकीन मानिये मै बनना चाहुगा लेकिन मुझे पता है की मै बन ना पाउगा...... यह लोग जो ऊपर अच्हे और बड़े बडे कमेंट्स लिखकर गए है यह भी नहीं बन पायेगे.. लेकिन जैसा की आपके लेख का शीर्षक ही कहता है की " अच्हा लिखने वाला अच्हा इंसान हो जरुरी तो नहीं" यह शब्द आपके लिए नहीं है क्योंकि मुझे पता है की आप अच्हा लिखते है और अच्हे इंसान भी है... लेकिन इन कमेन्ट करने वालो का क्या.. आपको पता है एक बार एक बडे हिन्दी ब्लॉगर ने मुझसे ही अनुमति लेकर मेरे ऊपर एक पोस्ट लिखा था और इन लोगो ने मेरी जो उडाई थी की मै क्या कहू.. और जो काम मैंने किया था वही काम कुछ ही दिनों के बाद इन लोगो ने भी शुरू कर दिया लेकिन इन्हें किसी ने भी कुछ नहीं कहा क्योंकि यह लोग तो बडे लेखक है ना
    http://rohittripathi.blogspot.com

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  12. aaj aapki baat padh kar muskara uthi
    ki koi to hai jisne is baat ko socha
    koi hai jisne likha
    nahi to maine logon ko 5000 rs kardo par hotel main khrach karte dekha
    aur 5-5 Rs ke liye sabzi wale aur rikshe wale se ladhte
    kuli jo pasina baha raha hai aapka bhojha utha raha hai use 50Rs dena bhari lagta hai

    aur to aur agar kisi ne de diye to
    uska majak ban jata hai samjhdaar log use buddhu tak kahe dete hain

    khair maine yahi sikha hai khud ke liye jiyo wo karo ki khud se nazren mila sako

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  13. bilkul sachchi aur khari baat kahi aapne!!! aur ye bhi sach hai ki aap kabhI aadamI se insaan ban kar kisi ki madad karen aur phir apne aap ko dekhen. bahut sukoon aur shaaNti milati hai aatma ko. ye sach hai ki aaj ki tez bhaagati zindagi mein khud ke imaan se samjhaute karne padte hain lekin phir bhi kuchh palon ke liye hi sahi, hum insaan ban sakte hain.

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  14. आपका हरेक पोस्ट वैचारिक चिंतन से लबरेज होते है, डाक्टर साहब, आभार

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  15. आप ने जो कुछ बेहतर बताया वही इंन्सान हैं। बाकी लोग तो इंन्सान भी नहीं। रामचरित मानस में तुलसी बाबा ने संतों और असंतों के चरित्र का बखान किया है। आप के इस आलेख के संदर्भ में मुझे वही स्मरण आया।

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  16. अनुराग जी,
    आपने लिखा तो ठीक है" अच्छा लिखने से कंही बेहतर है अच्छा इंसान होना?" पर अनुराग जी बनेगा कौन? यही सवाल बना रहेगा? उन लिखड़ के लिए।
    भावुक आदमी मिला तो इस्तेमाल कर लेंगे
    चालाक आदमी मिला तो सलाम कर देंगे
    ये दुनिया वाले चेहरो पर मुखौटे लगाते मिलेगे।

    साथ ही एक घटना का भी जिक्र करना चाहूँगा।
    एक बार की बात मै और मेरा दोस्त लाईब्रेरी के बाहर खडे थे । एक लड्का आया बोला कि एक रुपया दे दो भूख लगी है। पहले सोचा ना दू फिर दो रुपये का सिक्का दे दिया, उसने लिया और चला गया। कुछ देर बाद आया हाथ में ब्रेड थी । आकर बोला लो अंक्ल। और एक रुप्ये का सिक्का मेरे हाथ पर रख दिया। सात आठ साल का लड्का था कपडे फटे हुए थे उसके। स्कूल तो शायद ही गया होगा। और वही दूसरी तरफ ये बडे बडे लेखक है। मै यहाँ सभी की बात नही कर रहा। पर इनकी सख्या कम ना होगी।

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  17. अनुराग जी
    इसमें कोई संदेह नहीं की आप एक बहुत अच्छे इंसान हैं और उतने ही अच्छे लेखक भी.बहुत संवेदनशील इंसान हैं और खुश भी रहते हैं...वो भी आज के युग में...आप एक अजूबे से कम नहीं...इतनी समझदारी से भरी बातें काश कुछ नासमझ भी पढ़ कर समझ जाते.
    नीरज

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  18. लिखने वाला शातिर हो, पर लिखे सरलता और इन्सानियत की बात; तो भी गनीमत है! जब लेखन में आत्मप्रदर्शन मात्र हो, तब बन्दा फ्रॉड लगता है, होता है ही।
    पर बहुत से ब्लॉग बड़ा सरल लिख रहे हैं। और वह लेखन की कमजोरियों के बावजूद अच्छे लगते हैं।

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  19. यह तो ठीक है, अनुराग..पर
    एक अच्छा इंसान बने रहने की ज़द्दो-ज़हद में क्या मुश्किलें आती हैं ..
    इस विषय भी एक पोस्ट की प्रतीक्षा रहेगी ।
    निश्चय ही तुम जोरदार लिखोगे, जैसे कि यह पोस्ट !

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  20. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  21. accha banane ke liye koi jaho jahad nahi karni parti..sirf jitna bachpan me sikahya jata hai utna hi admi bade ho kar palan kar le to apne aap accha manusya bun jayega....

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  22. सही कहा आप ने एक सफ़ल इंसान होने के बदले एक अच्छा इंसान होना ज्यादा जरूरी है और उसके लिए संवेदनशील होना बहुत जरूरी है। एक डाक्टर के लिए भी ज्ञान और संवेदनशीलता दोनों होना बहुत जरूरी है,इस हिसाब से मुझे पक्का यकीन है कि आप एक अच्छे डाक्टर होगें।

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  23. मानवीय सरोकार का
    बेहद सुलझा हुआ पड़ाव है
    यह पोस्ट डाक्टर साहब.
    बड़ों की दुनिया से
    छोटे-छोटे दर्द का रिश्ता
    क्यों टूटता जाता है ?
    इस सवाल के मद्देनज़र आपकी
    पड़ताल का सार व संदेश अंत में है.
    डा.अमरकुमार जी ने भी मुद्दे की बात कही है.
    ===================================
    शुक्रिया
    डा.चन्द्रकुमार जैन

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  24. जय हो अनुराग महाराज की!!

    बिल्कुल सही चिंतन किया है और लिखते आप हमेशा ही अच्छा है.

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  25. pehli line se hi bhaav samaj aaya tha....par aap ki peshi ko padhna bhi to lazmi tha....

    main to bas sayeed qadri saab ki tarah itna hi kahunga...

    kahan kisi ke liye hai mumkin,sabke liye ek sa hona,
    thoda sa dil mera bura hain, thoda bhala hai sine mein....

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  26. सुन्दर।

    एक शेर भी है शायद,

    फ़रिश्ते से बेहतर एक इंसान होना/लेकिन उसमें लगती है मेहनत ज्यादा।

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  27. भले इँसान मेँ,
    खुद "वो " ( GOD )
    मुस्कुराता है -

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  28. Anurag, bahut sunder likha hai, aur bahut sahi baat bhi kahi hai.

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  29. "oh very rightly said, its really very diffecult to be a nice human being, but its not impossible also"

    loved reading it ya.

    Regards

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  30. अनुराग जी, आप जो कह रहे हैं वह बेशक सोचने पर मज़बूर करता है। लेकिन अच्छा इंसान होना आसान नहीं है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के पुरुषार्थ अर्जित करने के चक्कर में भटकता मनुष्य निपट स्वार्थी, जघन्य, उन्मादी और लोलुप हो जाता है क्योंकि ईमानदारी का रास्ता उसे दुश्वार नज़र आता है। ईमानदारी अपने आप से नहीं हो पाती, दूसरों से भला क्या होगी?

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  31. पढ़ लिख कर हम अपनी चालाकियों को ओर पैना करते है ओर अपनी कमियों को ज्यादा अच्छे तरीके से छिपाना सीख जाते है ......
    ______________

    एक मर्मभेदी पोस्ट ! बहुत् सही लिखा आपने ।

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  32. tabiyat kharab hone ke karan aane me der huyi.hamesa ki tarah dil ko chhu lene wali post...waise sach hai achchha insan hona jyada muskil hai.

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  33. It was a good reading material.... but after completing the text, it made me think twice what duties we should perform and how important are the basic manners in life.
    main aap ka fan aise hi nahin hun, jab aap ek kaagaz ke tukde per likhte the tab bhi main aap ka fan tha aur jab aap is platform per likhte hain... ab bhi main aap ka fan hun....

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  34. पढ़ लिख कर हम अपनी चालाकियों को ओर पैना करते है ओर अपनी कमियों को ज्यादा अच्छे तरीके से छिपाना सीख जाते है... क्या बात है..

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  35. "good will hunting."ये मूवी स्टार मूवी पर देखते देखते ये ख्याल आये थे ...अभिषेक का कहना ठीक हैकि लेखक होना ओर अच्छा होना दो अलग अलग बात है पर सच कहूँ मै एक ऐसे लेखक से मिला जिसका परिवार घुटन भरी जिंदगी जी रहा था उसके फ़ौरन बाद एक ओर शख्स नजर आया जो अनजान है पर बेहतर इंसान है.....बस वही सब कागज पर धेकेल दिया.......आप सभी का शुक्रिया....

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  36. Bahut khoob kaha hai aapne "चरित्र दो वस्तुयों से बनता है ,आप की विचारधारा से ओर आप के समय बिताने के ढंग से .."

    aur ek baat to itni sach likh di hai - aisa lagta hai maano mere liye hi likh di ho "आजकल की दुनिया मे "नोर्मल" रहना ही असाधारहण होना है" kaash yeh baat sab samajh paate. koi insaan agar zada dikhawati jeewan nahi jee sakta to log use abnormal hi samajhte hain. kabhi kabhi to mujhe bhi yahi lagta hai..kaash aaj bhi 'down to earth' log zada mile. dikhwati logon se to dost na hona bhala hai

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  37. kya kahein.. kahan sahmat nahi aapse.. sach hai. Shayad acha banne ki kimat kai baat bahut bhari padti hai. abhi abhi hamne dekha hai kisi ko kimat chukate... shayad bahut himmat chahiye acha bane rahne ke liye!!
    shayad main kahin negative sound kar rahi hongi, par kisi azij ke sath jo hote dekha usko baant nahi sakte par uska dard bakhoobi mahsoos karte hain!
    bahut dino baad aaj thoda waqt mila ke kuch padhein..
    sach maniye.. aapko padhna hamesha acha lagta hai!
    arey haan, wo aapke shahar se gujarte hue ham bypass se nial gaye they... haha..
    ye shikayat to hamein bhi rahi waise... aap suna hai aksar dilli aate hai!!! :)

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  38. Har achhee cheezki duniyaame qeemat chukaaneehi padtee hai...usee tarah achha insaan bane rehnekeebhee. Merabhi yahee man naa hai ki sabse pehle ek achha insaan ban naa zarooree banisbatke aur kuchhbhi...chahe achhaa wyawsayik ho ya aur kuchh.Hame dunayame hanseekeebhi qeemat chukaani padtee hai!!Mai poorn sehmat hun aapse Anuraagji.
    shama

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  39. क़दम-क़दम पे फ़रिश्तों की भीड़ मिलती है;
    कभी, कहीं तो, कोई आदमी नज़र आये।

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  40. ऐसा लगा ये मैं कह रहा हूँ !इत्ते सारे लोगों को भी तो ऐसा ही लगा होगा.... जो आपको अपनी टिप्पिनियों का पुरस्कार देने आए .... पुरस्कार तो यह होता है कि
    अच्छी बातों को हम अपनी जिन्दगी में शामिल कर लें .....है ना !!

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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