2008-07-12

एक लम्हा मेरे माज़ी का मुझे आइना दिखाता है

रोजमर्रा के दिन की तरह सर ने पूछा था कितने रेफेरेंस है? ओ पी डी के बाद अमूमन सर प्रोफेसर लेवल के या ए.पी लेवल के रफेरेंस दोपहर में ही देखते थे ओर बतोर सीनियर रेसिडेंट मै उनके साथ जाता था ,मेरे जूनियर ने लिस्ट मुझे दी....तीन रेफेरेंस थे ,एक फिमेल वार्ड का था चूँकि वो सेकंड फ्लोर पे था तो ये तय हुआ की उससे सबसे आख़िर में देखा जायेगा...फिमेल वार्ड तक पहुँचते पहुँचते आधा घंटा बीत गया वहां जब हम पहुंचे तो ...सिस्टर से पूछा ...
एक स्किन रेफेरेंस था सिस्टर ....'
एक मिनट आप बैठे साहेब ' सिस्टर बोली.
सिस्टर टाइम नही है
पेशेंट  किस बाजू है सर बोले...
.साहेब एक मिनट बैठिये  सिस्टर फ़िर बोली.
हेड सिस्टर ने भी कुर्सी खिसका ली .अमूमन ऐसा होता नही था.
कया नाम था उस patient का ?
सर ने मुझसे पूछा ओर वार्ड के दाहिने तरफ़ जहाँ बेड लगे हुए थे बढ़ गये 'दया ' मैंने जेब से में कागज निकाल कर कहा .
दया कौन है ?फ़िर मैंने जोर से पूछा .
साहेब साहेब कहती सिस्टर हमारे पीछे दौडी थी.
दया कौन है . एक मरीज ने कोने की तरफ़ इशारा किया १४ सल् की एक लड़की मैले कुचेले कपड़ो में सिमटी उकडू बैठी थी ,काँप रही थी
.दया ..मैंने उसे पुकारा .उसका शरीर जोर से हिलने लगा .आँखे उलट गयी ओर फ़िर वो बेहोश हो गयी.
"साहेब तभी तो मै आपको मना कर रही थी".सिस्टर बोली.
"आप एक मिनट बाहर जाइये .उसकी माँ जो शायद बाहर कुछ चाय लेने गयी थी दौड़ कर आ गयी थी.पता नही क्यों सर ओर मै बाहर आ गये थे .बाहर रखी कुर्सी पर सर बैठ गये मै खड़ा रहा .तीन मिनट बाद हेड सिस्टर आ गयी थी .
सॉरी साहेब, इस बच्ची के साथ दो दिन पहले ४ लोगो ने जबरदस्ती की है .किसी मर्द को पास आते देखती है तो दौरे पड़ने लगते है .हमने रेफेरेंस में भी लिखा था किसी फिमेल रेसिडेंट को या आपकी मैडम के लिए .शायद आपने पढ़ा नही.psychiatry डिपार्टमेन्ट में शिफ्ट की भी बात चल रही है साहेब....
"सॉरी सिस्टर" सर बोले ,धीमे से उठे ओर हम दोनों बाहर चल दिये ...मर्द होने का गुनाह भरा अहसास लिये .


36 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत दर्दनाक लगता है यह सब पढ़ना ...पर हम गूंगे बहरे हो कर बस इन्हे देखते हैं पढ़ते हैं ऐसे हादसे और फ़िर शायद किसी ने हादसे का इंतज़ार करने लगते हैं ..??

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  2. कुछ लोग पूरे पुरुष वर्ग के नाम को धब्बा लगा जाते हैं, इस क़दर कि डाक्टर एक पुरुष होने के नाते एक सीमा में सिमटकर रह जाते हैं।
    पीड़ादायक होती हैं ऐसी बातें।

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  3. अनुराग जी, बडा दर्दनाक वाक्या बताया आपने। ऐसे ही एक बार पल्लवी जी ने भी एक दर्दनाक वाक्या बताया था। समझ नही पाता ऐसा होता क्यूँ है? यह हमारे समाज पर एक कंलक हैं।

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  4. अत्यंत कारुणिक और शर्मनाक वाकया!कविता बहुत ही हृदयस्पर्शी.

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  5. उफ़....... मंटो की कहानी "खोल दो" याद आगयी. अगर नहीं पढ़ी तो जरूर पढिये.
    नीरज

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  6. दुखद...घटना के चित्रण से लगा सचमुच मंटो की कहानी - खोल दो- सामने ही आ गई है।

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  7. बिल्कुल नीरज भाई से सहमत-मंटो की कहानी ’खोल दो’ एकाएक आंखों के सामने तैर गई.

    छोटी हो या बड़ी,
    दिन ढले जब घर वापस आती है लड़किया
    तो अपने साथ लाती है

    दिन भर से चिपकी
    जवान ,बूढ़ी, ओर कुछ अधेड़ सी
    तेरी-मेरी ......उसकी
    और ना जाने
    किस -किसकी नज़रे


    --कचोटती है हर पंक्ति. अति दुखद.

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  8. सचमुच ये किसी भी समाज का सबसे काला धब्बा है...जिसे सुनकर आँखें नम भी होती हैं और शर्म से नीचे भी!

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  9. अनुराग जी क्या इस का इलाज नही हे ? जरुर हे, इन दोषियो को जल्द से जल्द सजा दी जाये, सिर्फ़ अफ़्सोस करने से कुछ नही होगा, ओर एसे केसो मे हम सब को उस पीडिता का साथ देना चाहिये,कभी सोचो अगर हमारी बेटी या बहिन होती तो.. ऎसे कमीनो को नही छोडना चाहिये. चाहे वह कोई भी क्यो ना हो, सच मे बहुत ही दर्द नायक हे. लेकिन मुझे दया की जगह गुस्सा आ रहा हे,

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  10. अनुराग जी, आप तो चिकित्सक हैं। मैं भी जीव विज्ञान, आयुर्वेद और होमियोपैथी का विद्यार्थी रहा हूँ। जन्तु की जिजीविषा ही उसे विपरीत लिंगी की और धकेलती है। लेकिन इस तरह के वाकये तो मनुष्य के सिवा कभी किसी प्राणी के बारे में सुनने को नहीं मिले आप या अन्य किसी जन्तु विज्ञानी की नजर में आया हो तो जरूर बताए। मुझे लगता है मनुष्य की जिस जेहनियत ने उसे जानवरों से अलग किया है वही जेहनियत ही इस वहशियाना दरिंदगी का कारण भी है। जब शरीर की जैविक आवश्यकता नहीं बल्कि उस की जेहनियत ही आदमी को इस ओर धकेलती है। इस जेहनियत का इलाज तो किया जाना ही चाहिए। इस तरह की जेहनियत के विकसित होने के खिलाफ भी मानव जाति को उपाय अपनाने की ओर आगे बढ़ना चाहिए।

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  11. छोटी हो या बड़ी,
    दिन ढले जब घर वापस आती है लड़किया
    तो अपने साथ लाती है

    दिन भर से चिपकी
    जवान ,बूढ़ी, ओर कुछ अधेड़ सी
    तेरी-मेरी ......उसकी
    और ना जाने
    किस -किसकी नज़रे



    सच हैं, लेकिन बहुत बुरा सच है

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  12. आपके अनुभव ने आपको बे वजह कटघरे में खडा कर दिया लेकिन आपकी कविता ने लडकियों के जिंदगी की हकीकत बयाँ कर दी है । यह हर लडकी का भोगा हुआ यथार्थ है ।

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  13. बहुत ही ईमानदारी से लिखते हो, भाई !
    किंतु, यह क्या वास्तव में ' हर लडकी का भोगा हुआ यथार्थ है ' श्रीमती जोगलेकर ?

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  14. भाई डाग्दर साहब , यो ही सै म्हारे समाज की "कोढ मे खुजली" !
    आपके लेख की लडकी से हम रोज सुबह अखबारों मे मिलते हैं ! और ये सिर्फ खबर भर बन पाती है ! सवाल तो आपने सामने रख दिया पर शायद अनुतरित ही रहेगा ! काश हम सब मिल बैठ कर इसका हल सोच पाते !

    मैं डाक्टर अमर कुमार जी से कहना चाहूंगा कि
    अभी इतनी अंधेर भी नही हुई है कि हर लडकी का ऐसा यथार्थ हो ? शायद श्रीमती जोगलेकर यह कमेंट किसी कविता पर कर रही होंगी जो गल्ती से इस जगह हो गया होगा ! क्योंकी यहा उन्होने कविता शब्द का इस्तेमाल किया है ! और अगर उनका आशय इसी से है तो डाक्टर साहब यकिन
    मानिये फिर हम लोग इस तरह टिपियाते नही दीखेंगे ! पर साहब आपकी नजर यानि कमाल की नजर !

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  15. छोटी हो या बड़ी,
    दिन ढले जब घर वापस आती है लड़किया
    तो अपने साथ लाती है
    दिन भर से चिपकी
    जवान ,बूढ़ी, ओर कुछ अधेड़ सी
    तेरी-मेरी ......उसकी
    और ना जाने
    किस -किसकी नज़रे


    कितना भयानक सच है ये, और किस कदर घिनावना, ऐसी लड़कियों पर जो बीतती है वो हम जैसे लोग नही समझ सकते, मर्द ऐसा क्यों होते हैं?
    क्यों एक लड़की का जीना मुश्किल कर देते हैं?
    काश...कोई उन्हें समझा सके वो दर्द का अहसास वो जिल्लत का अहसास जो ऐसी लड़कियां दिल रात भोगने पर मजबूर हो जाती हैं...सच अनुराग जी, आंसू आ गए मेरी आंखों में...अब क्या कहूँ...

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  16. कारुणिक और शर्मनाक वाकया.कितना भयानक सच है ये..

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  17. is tarah ki ghatnaaon ko sunkar naari-muktivaad aadi sab bemaani lagta hai.
    aise logon ko bilkul saja-e-maut honi chahiye. hamare desh ka kanoon!! ehsaas ho jaata hai aurat sirf aurat hai, chahe naina sahani ho, shivani bhatnagar ho ya koi aur garib!!! aurat sirf aurat hai... afsos hai...

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  18. ek chingari si daud gayi...4-5 din pehle hi apni colleague se discuss kar raha tha...ki receptionist ki job karnewali ladkiyon ko sach mein din bhar kitne logo ki gandi nazron ka shikar hona padta hain...sach mein ghinn aati hain...jab ye sab dekhte aur sunte hain...

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  19. बहुत अच्छा लिखा है आपने | सीधा दिल को छूती हुई |
    लिखते रहिये |

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  20. poori ghatna ka nicod apni nazm mein bareeki se utaar liya aapne.

    baki kuch kahne ko kya rah jata hai sharmindagi ke siwa...

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  21. काश ऐसा हो जाये कि बुरा सोचने वाले के दिल के हज़ारोँ टुकडे हो जायेँ -
    --लावण्या

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  22. दुखद घटना, सत्य नज़्म.

    ek बार पढ़ना चालु करो तो पाठक खो ही जाता है आपकी पोस्ट में. लेकिन एक सुझाव है... बर्तालाप वाली बातों में इंटर मार दिया करें... इस पोस्ट में तो ठीक है पर लम्बी पोस्ट में पढने में आसानी हो जाती है.

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  23. मनाई , बंदिश और नियम

    जहाँ भी मनाई हों
    लड़कियों के जाने की
    लड़को के जाने पर
    बंदिश लगा दो वहाँ
    फिर ना होगा कोई
    रेड लाइट एरिया
    ना होगी कोई
    कॉल गर्ल
    ना होगा रेप
    ना होगी कोई
    नाजायज़ औलाद
    होगा एक
    साफ सुथरा समाज
    जहाँ बराबर होगे
    हमारे नियम
    हमारे पुत्र , पुत्री
    के लिये

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  24. Shabd samapt ho gaye isse padhne ke baad. sach kitna ghinouna hai yeh samaz aur inke log aur unhi ka ek hissa mai bhi :-(

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  25. सोमवार १४ जुलाइ सुबह ८ बजे
    नॉएडा से आयी अपनी कसिन सिस्टर को बस स्टेंड छोड़ने आया हूँ , आगे गली ट्रेफिक की भीड़ को नियंत्रित करने के लिये सिर्फ़ दोपहिया वाहन के लिये बनाई गयी है मै गाड़ी वही छोड़कर कुछ कदम उसके साथ पैदल चलता हूँ ,सामने से एक ५५ साल के महाशय स्कूटर से आ रहे है ,एकटक ओर अपलक वे निहायत ही बेशर्मी से मेरी कसिन को घूर रहे है ॥"अंकल सीधे भी देख लो "मै उनसे कहता हूँ... इतने में १२ साल का एक लड़का मैगजीन हाथ में लिये आता है ...मंगल ग्रह पर जीवन....उसकी हेड लाइंस है.."आदमी मंगल पर "मै सोचता हूँ पर उसकी सोच का दायरा अभी भी जिस्म ही है..... ।

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  26. Ye sab padhkar to ab ankhon se ashq hi nahi nikalta hai....wo bhi barf ke tarah jam gaye he....!


    Anuragji ye to aise dekhte hein ki ab hame sharm ati hai aur hamari nazren neeche jhuk jati hai.

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  27. छोटी हो या बड़ी,
    दिन ढले जब घर वापस आती है लड़किया
    तो अपने साथ लाती है

    दिन भर से चिपकी
    जवान ,बूढ़ी, ओर कुछ अधेड़ सी
    तेरी-मेरी ......उसकी
    और ना जाने
    किस -किसकी नज़रे
    "so true and painful to read"

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  28. दिन भर से चिपकी
    जवान ,बूढ़ी, ओर कुछ अधेड़ सी
    तेरी-मेरी ......उसकी
    और ना जाने
    किस -किसकी नज़रे

    are aap ko kaise pataa, ham to ye baat kisi ko bataate bhi nahii, kyoki dosh fir hamare hi sar aanaah hota hai

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  29. kam shabdon mein badi baat likhi hai aapne. man vyathit ho gaya.
    mein nahi kahunga ki acha likha hai.. likhte rahiye.. kash aisa kuchh ho jaye ki aapko is tarah ka koi matter hi na mile likhne ko.. kash sab kuchh achcha ho jaye...

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  30. मासूम बच्ची का दर्द जैसे खुद में उतर आया हो.. एक पल के लिए साँस थम सी गई...

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  31. Theek kaha jee Dr. Saheb, par iskee jaD main jane ki kisee ne koshish nahin kee. Yah pahloo us se bee dukhad hai. Vahshat ko janm hamaara samaaj hee deta hai aur badle main keval thothe gaal bajaataa hai. Khedjanak. Haulnaak.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं

कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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