2008-07-16

बेघर ?


कभी कभी मन करता है सूरज को वापस बादलो में धकेल दूँ ओर रात को आसमान से खींचकर ओर लंबा कर दूँ.....ओर किसी दिन पर बड़ा बड़ा सा 'सन्डे " लिख दूँ......















रोज सुबह उठते है कई ख़्याल
दिन के साथ-साथ
कि
शायद कुछ लफ्ज़ मिले उन्हे
कि
शायद कुछ सफ्हो पर
अपना घर बसा ले वे भी.........
कि
शायद आज़ पूरा कर ले ये दिन
अपना वादा.........
सैकड़ो ज़रूरते अपने मुज्तरिब सर
उठा कर
झाँकती है उस दरीचे से
ओर
आवाज़ देती है दिन को
दिन मसलसल भागता है
शफक होने तक.......

ज़ेहन के फ़र्श पर
बैचन चहल-कदमी करते है
वे दिन के इंतज़ार मे....
थका-झुंझलाया सा दिन
जब लौटकर आता है
फिर
रात की बाँह पकड़ कर सो जाता है.

कितने ख़याल बेघर है यूँ ही कितने रोज़ से?

36 टिप्‍पणियां:

  1. दिन के इंतज़ार मे....
    थका-झुंझलाया सा दिन
    जब लौटकर आता है
    फिर
    रात की बाँह पकड़ कर सो जाता है.

    बहुत खूब .जिंदगी की भागम भाग और तलाश कुछ फुर्सत के पलों की ..बहुत सुंदर पिरोया आपने इस ख्याल को इन पंक्तियों में ....

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  2. Dr. saab....ek baar phir se bahut khoob. kai din vyast raha, aapka blog nahi padh paya. par aaj sari rachnayein padhi.

    aap bahut sundar imagery ka istemaal karte hain. padhkar bahut sii tasveerein ubhartii hain aakhon ke saamne.

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  3. किसी दिन पर बड़ा बड़ा सा संडे लिख दूँ .. बहुत बड़ा सा ..

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  4. सूरज को वापस बादलो में धकेल दूँ ओर रात को आसमान से खींचकर ओर लंबा कर दूँ.....ओर किसी दिन पर बड़ा बड़ा सा 'सन्डे " लिख दूँ......

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  5. Dr. Saab bahut badhiya rachna hai .
    aur din raat ke aagosh main samakar , tarotaaza ho phir chahal kadmi karne nikal padta hai .

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  6. एक ऑर उम्दा नज़्म.. डा साहब वो खुराक हमे भी बता दीजिए जिसे खाकर आप यू लिखते है

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  7. अनुराग जी आपकी रचना पढकर एक गाना याद आया पता नही गाना है भी ये या फिर बस एक लाईन जो जहन में आई। "दिल ढूढता हैं फुरसत के रात दिन"।

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  8. दिन के इंतज़ार मे....
    थका-झुंझलाया सा दिन
    जब लौटकर आता है
    फिर
    रात की बाँह पकड़ कर सो जाता है.

    someone above has praised your art of imaginary writing and i am yet again an admirer of your art. though i have little knowledge of what i m trying to say..your way of writing resembles the way lyrics of "O Saathi Re - Omkara" have been written. Very beautifully written..

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  9. "कभी कभी मन करता है सूरज को वापस बादलो में धकेल दूँ ओर रात को आसमान से खींचकर ओर लंबा कर दूँ.....ओर किसी दिन पर बड़ा बड़ा सा 'सन्डे " लिख दूँ."

    मेरा तो रोज़ सुबह यही मन करता है.

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  10. sir g...gulzar saab ka sher yaad aa gaya...

    waqt rukta nahi, kahin tik kar,
    iski aadat bhi, aadmi si hain...

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  11. डाक्टर आपको कल तीन मर्तबा ट्राई किया फ़ोन ही नही मिला.....

    यार ये सब जब लिखते हो तो कई बार सोचता हु की आपको स्किन का डाक्टर नही नेरुरोसेर्गेओं होना चाहिए....मन की बातो को आप ऐसे ही समझ लेते हो तो इसकी पढ़ाई करते तो शायद और बेहतर.... वैसे बहुत ही उम्दा लिखा है....हमेशा की तरह

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  12. ज़ेहन के फ़र्श पर
    बैचन चहल-कदमी करते है
    वे दिन के इंतज़ार मे....
    थका-झुंझलाया सा दिन
    जब लौटकर आता है
    फिर
    रात की बाँह पकड़ कर सो जाता है.
    "comendable liked it'

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  13. अनुराग जी
    सच में । कभी-कभी ऐसा ही ख्याल आता है-
    रोज सुबह उठते है कई ख़्याल
    दिन के साथ-साथ
    कि
    शायद कुछ लफ्ज़ मिले उन्हे
    कि
    शायद कुछ सफ्हो पर
    अपना घर बसा ले वे भी.........
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति। बधाई स्वीकारें।

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  14. गंभीरता एक बड़ा रहस्य है! कोई ख़ास बात?

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  15. कभी कभी मन करता है सूरज को वापस बादलो में धकेल दूँ ओर रात को आसमान से खींचकर ओर लंबा कर दूँ.....ओर किसी दिन पर बड़ा बड़ा सा 'सन्डे " लिख दूँ......

    :

    ye bhi koi kavita se kam nahi....

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  16. आपके खयाल
    साफ और सही बयाँ होते हैँ
    और नज़्म को जिँदा कर देते हैँ
    स्नेह,
    -लावण्या

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  17. किसी दिन पर बड़ा बड़ा सा 'सन्डे " लिख दूँ.....काश, हम लिख पाते. बहुत सुन्दर!!बधाई!!

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  18. kaash aisa sunday ham likh pate...bahut pyaara khayal aur usse bhi pyari nazm..

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  19. mast!!
    U know Anuragji ..i too was having similar thoughts..par sabd aapke beemisaal hey..
    Bahut bahut accha!!

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  20. इत्ता बड़ा सन्डे, बल्कि इस से भी बड़ा चाहिए मुझे। संडे को भी दफ्तर करना पड़ता है भाई। उसी दिन सारे मवक्किलों को फुरसत होती है।

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  21. संण्डे क्या कुछ अलग होता है मित्र?

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  22. अनुराग जी हमेशा की तरह खुब सुरत कविता,लेकिन कही सण्डे ना लिख देना, प्लीज हर रोज उठने की ऎसी आदत पड गई हे कि कमबख्त रोजाना नीदं नही खुलती, शनि ओर इतवार को सुबह सुबह आंख खुल जाती हे,मेरी अकेले की नही दोनो लडको की भी, ओर बीबी भुन भुनाती रहती हे,छुट्टी वाले दिन भी नही सो सकते, मजा तो तब हे काम करो या ना तन्खा मिलती रहे फ़िर सण्डे हो या मण्डे सानू कि

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  23. आपने तो म्हारे मन की बात लिख दी ! सही मै इब्बी तक जी नही भरया सै !
    मुझे लगता है जनमत आपकी बात का ही समर्थन करेगा !
    व्यस्तताए तो बढ़ती ही जायेंगी ! पर ख्याल पे तो कोई पाबंदी नही है |
    बहुत खूबसूरत ख्याल है आपका !

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  24. बहुत शानदार! एक सन्डे की तलाश सब को है.

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  25. सैकड़ो ज़रूरते अपने मुज्तरिब सर
    उठा कर
    झाँकती है उस दरीचे से
    ओर
    आवाज़ देती है दिन को
    दिन मसलसल भागता है
    शफक होने तक.

    आपने बहुत सारे लोगों की ख्वाहिश को लफ्ज़ पहनाये हैं....वाकई अकसर दिल ये करता है कि कोई दिन ऐसा हो जब हम वो सब कुछ कर सकें जो करना चाहते हैं...लेकिन हमेशा ये ख्वाहिश ख्वाहिश ही रह जाती है....
    बहुत खूबसूरती से कह गए अपनी ये छोटी सी ख्वाहिश....

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  26. 'bahut khoob' shabd chhota hai aapki rachnaaon ke liye...

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  27. bahut khoob. ham log to 6 din kaam karte-2 beemar pad jaate hain, saturday ka intjaar rahta hai.

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  28. क्या बात है....भाई वाह...एक ऐसी रचना जिसे रूह से महसूस ही किया जा सकता है...कुछ कहा नहीं जा सकता.
    नीरज

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  29. तू चीज क्या है, यार ?
    कभी तुझको..कभी तेरी शायरी को देखता हूँ ।
    अब तल 32 जन तेरी तारीफ़ करके जा चुके ,
    मैं आज केवल प्रसंशा ही करूँगा !

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  30. Meri comment 34th hee kyun na ho main to kah kar rahungi such kflvs Khayal yun hi beghar se ghoomate hain.. behatareen.

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  31. आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया.......

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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