रिश्ता ??


एडीयो से उचककर
जब तुमने
उस रिश्ते के लबो पर
अपने होठ रखे थे,
उफक का सूरज
सुर्ख़ हो कर भभका था,
पिघली आग फैल गयी थी.
इक छोर से जिस्म के....
रूह के मुहाने तक

इक लौ सी फड्फडाती है वक़्त के सफ्हो मे कही.......

38 टिप्पणियाँ:

P. C. Rampuria ने कहा…

इक लौ सी फड्फडाती है वक़्त के सफ्हो मे कही.......
बहुत खूब !

कुश एक खूबसूरत ख्याल ने कहा…

आह! मेरी तरह जाने कितनो की आह निकलेगी ये नज़्म आपकी

siddharth ने कहा…

डॉक्टर साहब, एड़ियों पर उचक-उचक कर मैने इस ‘पिघलती आग’ टाइप नज़्म को छूने की कोशिश की लेकिन सिर के ऊपर से निकल गयी। माफ़ करिएगा। हिंदी में कहते तो शायद समझ जाता।… अगली पोस्ट की प्रतीक्षा रहेगी।

Manish Kumar ने कहा…

bhaiya aap hain ya Gulzar kabhie kabhie samajh nahin aata. Par bade achche shagird banenge aap unke.

राज भाटिय़ा ने कहा…

इक लौ सी फड्फडाती है वक़्त के सफ्हो मे कही.......
क्या बात हे , भाई अब आदत सी हो गई हे आप की जली मे आने की, ना आओ तो लगता हे दिन ही नही निकला

शोभा ने कहा…

बहुत सुन्दर कल्पना है। सस्नेह

रश्मि प्रभा ने कहा…

ise mahsus karwa diya apni abhivyakti se......khubsurat

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

बहुत खूब अनुराग जी,

एडीयो से उचककर
जब तुमने
उस रिश्ते के लबो पर
अपने होठ रखे थे,

महेंद्र मिश्रा ने कहा…

एडीयो से उचककर
जब तुमने
उस रिश्ते के लबो पर
अपने होठ रखे थे,

bahut joradaar abhivyakti . bhai aaj apne to kamaal kar diya yah ek sachchai bhi hai jisaka abhash kabhi n kabhi sabhi ko hota hai . bahut badhiya .

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

एडीयो से उचककर
जब तुमने
उस रिश्ते के लबो पर
अपने होठ रखे थे,
;
;

इक छोर से जिस्म के....
रूह के मुहाने तक

क्या अदा है यह भी कहने की .!!.बहुत खूब ...बेहद खुबसूरत एहसास है इस में

Parul ने कहा…

fir vahi halat hai....ki kya kahen....?

विनय प्रजापति 'नज़र' ने कहा…

इक और ग़ज़ब कलाम, क्या बात है!

दिनेशराय द्विवेदी ने कहा…

ये आफताब को गुस्सा क्यों आया?

Lavanyam - Antarman ने कहा…

"उष्मा"
जीवन का अनुराग है
और उसकी पहचान भी है !

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा.आनन्द आ गया.

Pragya ने कहा…

एडीयो से उचककर
जब तुमने
उस रिश्ते के लबो पर
अपने होठ रखे थे,

bahut original abhivyakti hai... bahut khoob

neelima ने कहा…

siddarth ji
anurag ji ne jo likha hai use "azad nazm"kahte hai ,gulzar,amrita pretam,praveen shakir jaisi shyara is fan me khoob mahir hai.
jahan ak mai samjhi hun yahan ve ye kahna chahte hai ki "US ROJ JAB TUMNE AIDIYA UCHAKAR MUJHE CHOOMKAR IS RISHTE KO EK NAYA NAM DIYA THA EK LAPAT AATMA TAK PAHUNCHI THI ,JO AB BHI GUJRE VAQT KE PANNO ME DIKHTI HAI"
umed hai aap samjh gaye hoge.

'ताइर' ने कहा…

sach kahun to pehli baar mein nahi samaj paya...par fir samja...aur khubsurti dil mein utar gayi...

Ila's world, in and out ने कहा…

खूबसूरत नज़्म से रू-ब-रू करवाने का शुक्रिया.कमाल है! डक्टर साहब आप तो छाते जा रहे हैं.कम्बख्त,एक एक लफ़्ज़ दिल को छूता है.

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

bahut khub ji
maza aa gaya

Rukaiya ने कहा…

Kya kahe Dr sahab !! aapke kalam ke liye ... lafz hi nahi .... lafzon ki jadugari to bas aap hi kar sakte hain ..........waqiy bahut hi khubsurat nazam

Priyesh ने कहा…

इक लौ सी फड्फडाती है वक़्त के सफ्हो मे कही.......


Uff !!!!!!!

अभिषेक ओझा ने कहा…

क्या कल्पना है ! कुछ-कुछ तो ऊपर से भी निकल गई :-) पर दो-तीन बार पढ़ा तो जाके कुछ समझ में आई.

meeta ने कहा…

aisa laga ki gulzar ko padh rahi hu....

Life is ने कहा…
यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई है.
neelima sukhija arora ने कहा…

एडीयो से उचककर
जब तुमने
उस रिश्ते के लबो पर
अपने होठ रखे थे,
............

पिघली आग फैल गयी थी.
इक छोर से जिस्म के....
रूह के मुहाने तक

अकसर सोचती हूं आपकी कलम कैसे आपके 'दिल की बात' को इतने खूबसूरत शब्द दे देती है?

rakhshanda ने कहा…

एडीयो से उचककर
जब तुमने
उस रिश्ते के लबो पर
अपने होठ रखे थे,
उफक का सूरज
सुर्ख़ हो कर भभका था,
पिघली आग फैल गयी थी.
इक छोर से जिस्म के....
रूह के मुहाने तक

इक लौ सी फड्फडाती है वक़्त के सफ्हो मे कही.......


कोई एक दो लाइन नही, पूरी नज़्म दिल और रूह की गहराइयों में समां जाने वाली है,ये चाँद लाईनें इतनी बातें कह जाती हैं अनुराग जी जो हम लाख चाहें भी तो कह नही सकते,यही तो आपका जादू है....बहुत खूबसूरत

Anil Pusadkar ने कहा…

shabd nahi mil rahe hain taareef ke liye,

नीरज गोस्वामी ने कहा…

विलक्षण शब्द प्रयोग है अनुराग जी....अति संवेदनशील रचना...प्रेम का गहरा एहसास कराने वाली...वाह.
नीरज

vipinkizindagi ने कहा…

इक लौ सी फड्फडाती है वक़्त के सफ्हो मे कही

बहुत उम्दा

pallavi trivedi ने कहा…

ultimate as usual...ab kitni taareef kare koi. :)

डा० अमर कुमार ने कहा…

ऒहः..ज़ज़्बों का रेला है, यहाँ तो !
डर है कि, चलो मुझे डुबोये तो न सही,
पर बहा न ले जाये मेरी रूह को, उस ज़ानिब
जो कहीं बहुत पीछे छूट गया है याकि मैं ख़ुद ही छोड़ आया ..

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

khoobsurat.

Suresh Chandra Gupta ने कहा…

बहुत अच्छी कविता है.

seema gupta ने कहा…

इक लौ सी फड्फडाती है वक़्त के सफ्हो मे कही..
"comendable"

bavaal ने कहा…

Dr, Sahebje aapke paas achchhaa vala ek aadh khanjar nahin hai kya ? Please bhej dijiye na. Taaki aapke in gamza-oishvao-andaaz par mar miTain jee. Aap jab bhee humain miliyega to hum aapko bade zor se gale lagaayenge. Aur aapne aitraaz kiya na to aapkee khair nahin. Bahut khoob Dr. Bahut Khoob. Aapka dost.

अनुराग ने कहा…

आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया.......

अल्पना वर्मा ने कहा…

एक नज़्म बहुत भली सी ..मगर उस शोख हसीना सी चंचल लगी..जो अपनी मासूमियत से दिल पे निशान बना जातीहै!

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