2008-07-28

हर परिंदा डाल पे सहमा हुआ के आसमां भी जात पूछकर रास्ता दे रहा


किसी घर के किसी बुझते हुए चूल्हे में ढूंढ उसको
जो चोटी ओर दाढ़ी तक रहे ,वो दीनदारी क्या -
निदा फाज़ली



उन दिनों सेकंड क्लास में बतियाते ,गप्पे हांकते १८ -२० घंटे हम यार दोस्त गुजार देते थे ,अक्सर टोलियों में चलते थे .सिगरेट से फेफडे जलाते ओर गाना गाकर गला बैठा लेते ....दिल्ली सुबह आता था ...नई दिल्ली उतरकर एक दूसरे से गले मिलते ..पंजाब ,हरियाणा वाले वापस डब्बे में चले जाते ,दिल्ली वालो के साथ हम ऑटो पकड़कर बस अड्डे पर....

पश्चिम एक्सप्रेस टाइम पर थी ,बस अड्डे तक पहुँचते पहुँचते १२ बज गये,थकान इतनी नही होती थी पर घर पहुचने की जल्दी जरूर होती थी ...दिल्ली से मेरठ का रास्ता चुभता था ..मेरठ वाली तख्ती के नीचे हम ५ मिनट खड़े हुए,दो बस गुजरी ,लोग भागे .ओर टूट पड़े .भीड़ देखकर .हमारी हिम्मत नही हुई . . सोचा अगली से चल देंगे....१० मिनट गुजरे कोई बस नही आयी...खैर एक बस पर मेरठ लिखा देख हम भी लपके .किसी ने सामान खिड़की से फेंका ,कोई पहले चढा तो रुमाल सीट पर रखकर हमें इत्तिला कर दिया की रिज़र्व है..आगे बढे दो लोगो की सीट पर जींस टी शर्ट में एक लड़की बैठी हुई थी ,कानो में वाकमैन की तारे ओर आँखों में चश्मा ..हम एक मिनट हिचकिचाये,इत्ते में पीछे वाले एक भाईसाहब अपना बैग पीछे से ही सीट पर धकेलने लगे तो हम बैठ गये ....दो चार मिनट गुजरे ओर लोगो का आने का सिलसिला जारी रहा ..हमसे ठीक आगे की सीट पर .कंडक्टर कानो में पेन्सिल दिये,कंधे पे बैग रखे 'मेरठ- मेरठ' का शोर मचा रहा था...पीछे मुड कर देखा तो सारी सीट फुल थी ..फ़िर किस बात का शोर मचा रहा है . एयर बेग को सीट के नीचे खिसकाया ..बस अड्डे से बाहर निकलते ही ड्राईवर ने फ़िर बस रोकी ,एक रेला भीड़ का चढा …ओर पूरी बस खड़े बैठे लोगो से भर गई ,एक तीखी सी गंध नथुनों में घुसी तो देखा एक 45-50 साल की शरीर से थोड़ा भारी औरत पूरी बाजू की सफ़ेद शर्ट जिसके बटन बंद थे उसके साथ एक मटमैली सी साड़ी पहने एक हाथ में कोई थैला दबाये ओर दूसरे में टीन का कनस्तर थामे थी उसके साथ कोई 4-5 साल की एक सांवली सी लड़की थी , पिंक कलर के फ्राक में ,बाल लगभग मुंडे हुए फ़िर भी बहुत प्यारे नैन नक्श लिए हुए थी .अपनी दादी (शयद दादी ही थी) की धोती को पकड़े ,इधर उधर ताकती हुई ,बस के हिचकोलों से इधर उधर झूलती सी ..एक अजीब सी कशमकश शुरू हुई थी कि इस बच्ची को बिठा लूँ ?या नही ?कुछ देर गुजरने के बाद जब कंडक्टर ने टिकट के आवाज लगानी शुरू की , लोगो के बार बार आगे पीछे होने कि वजह से उंघती बच्ची को परेशान देखकर ...मैंने बच्ची को इशारा किया .लेकिन बच्ची के साथ दादी भी आयी ओर गोद में लेकर बैठने लगी ..दो लोगो की सीट सो मरता क्या न करता अब खिसकाना लाजिमी था उस तरफ़ थोड़ा सा खिसका ही था कि बराबर वाली ने डपट दिया . " व्हाट इस् यूर प्रोब्लम मेन ?मै खड़ा हो गया .....३०-४० मिनट तक सिरके की गंध अपने फेफडो में भरता रहा ...कंडक्टर ने आवाज लगायी ....मोहन नगर वाले .......लड़की उठी ओर मुझे घूरती हुई उठ खड़ी हुई....मैंने अम्मा जी को उधर खिसकने को कहा ओर बैठकर आँखे मूँद ली .....की चलो अगला एक घंटा तो थोडी तसल्ली से कटेगा ..ऐ .लाल्ला तम् कौन हो ?मैंने आँखे खोली ..".मै समझा नही' ?मैंने अम्मा जी से पूछा ....मतलब थारी बिरादरी कौन सी है ? .बमाहन ,के बनिया ?


जब कभी भ्रम होने लगता है की सामजिक परिवेश बदल गया है ,कुछ वाक्यात इसे तोड़ देते है ,आर्यसमाजी परिवार से हूँ इसलिए दोनों भाइयो के नाम के आगे आर्य लगा हुआ है ,आज से तकरीबन ५ साल पहले मेरे क्लीनिक में एक साहेब धड धडाते घुस आये,उनके "अफसरशाही इगो" को दो चार मिनट का इंतज़ार बर्दाश्त नही हुआ (वे साहेब एक I.A.S ऑफिसर थे ),मेरे एक सीनियर डॉ के खासमखास थे ओर कुछ देर बाद मुझे एक procedure करना था इसलिए हम चुप लगा गये,उन्होंने अपनी wife को दिखाना था ,कुछ सवाल जवाब पूछने के बाद जब मै प्रेस्क्रिप्शन लिखने लगा ... बोले डॉ साहब आप कौन हो ?मैंने ऊपर से नीचे तक उन्हें देखा ,साले फीस के रुपये देने में जान जा रही है ओर उम्मीद ये भी लगाए बैठे है कि डॉ साहेब सैम्पल की कोई ट्यूब भी पकड़ा दे ...आपने डॉ साहेब से नहीं पूछा था क्या ?मैंने प्रेस्क्रिप्शन लिखते लिखते हुए कहा ...वे खिसिया गये ..नहीं डॉ साहेब दरअसल हमारे यहाँ कई तरह के लोग आर्य लिखते है "मन तो चाहा की . पूछ लूँ की अगर" वही "होता तो क्या प्रेस्क्रिप्शन फाड़ देते ?पर मुह पर एक मुस्कान चिपका कर मैंने उन्हें विदा कर दिया .......वे भारत की सबसे बड़ी प्रशासनिक सेवा में प्रतियोगिता से चुने गये एक योग्य व्यक्ति थे ,पर अपनी मानसिकता नही बदल पाये थे
मैंने ढेरो ऐसे लोगो को देखा है जिनकी शेल्फ बड़ी बड़ी किताबो से भरी है जो ढेरो ज्ञान इधर उधर बांटते है ,जिनकी व्यवहारिकता ओर वाक्पटुता के लोग कायल है ,जो समाज के बड़े खम्बो में से एक है पर जहाँ बिरादरी की बात आती है ,वे एक साधारहण आदमी हो जाते है ......


अंत में इस पोस्ट के लिये अभिषेक को खास शुक्रिया जिन्होंने मुझे टेबल बनाने में मदद की ...

49 टिप्‍पणियां:

  1. जब बिरादरी की बात आती है तो वे साधारण नहीं बल्कि अपराधी हो जाते हैं.
    आज के युग में भी ऐसी बातें अपराध नहीं तो और क्या है सरजी?
    आपने जो कुछ मन में सोचा वही एन वही उनके मुंह पर ही कह देना चाहिए था.
    वही ठीक होता.
    साथै साठ्यम समाचरेत.

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  2. जिनकी व्यवहारिकता ओर वाक्पटुता के लोग कायल है ,जो समाज के बड़े खम्बो में से एक है पर जहाँ बिरादरी की बात आती है ,वे एक साधारहण आदमी हो जाते है ......

    "sochne ko majbur kr daita hai aapka ye article.... or jhan tk manvtaa or insaneyt kee baat aate hai, uske samne beradree ka utna mehtv nahee hona chaheye...humkisse ke kaam aayen to kya frk pdtha hai kee kya beradree hai पूछ लूँ की अगर" वही "होता तो क्या प्रेस्क्रिप्शन फाड़ देते .... bhut shee question kiya aapne apne aap se...."

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  3. क्यों कोई ऐसे मुद्दो पर ब्लॉग नही बनाता.. जहा समाज की कुरीतीया मिटाने के प्रयास किए जाए न की किसी को उच्च या निम्न कहने की होड़ में फँसे रहे..
    आपका लेख वाकई सोचनीय है डा. साहब

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  4. mujhe accha ye laga ki dono logon ko aapne jawab nahin diya...dadi ko agar diya bhi hoga to aisa lag nahin raha padh ke.
    in sawalon ka jawab na dene se hi aise sawal karne wale log thak ke poochna band karenge. accha laga padh kar.

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  5. आज भी यह समस्या या कहे सामाजिक बुराई
    पुरी तरह मिटी नही है ! शहरों में तो काफी
    कुछ बदलाव है पर गाँव अभी भी उस स्तर
    से ज्यादा ऊपर नही उठ पाये हैं ! और ये
    शहरी अफसर जिनका आपने जिक्र किया है !
    इनका तो इतना निम्न स्तर है की आपने
    इनको सिर्फ़ एक ही लाइन
    "होता तो क्या प्रेस्क्रिप्शन फाड़ देते ? में
    छोड़ दिया है ! इनको और लानत की
    जरुरत है !
    आपने काफी ज्वलंत विषय पर जोरदार
    लेख लिखा है ! आपको अनेकों बधाईयाँ
    और शुभकामनाएं !

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  6. सही कहा ..बहुत से ऐसे लोग हैं जो आज भी जात बिरादरी के लिए अजीब सी बातें करते मिल जायेंगे ..एक सार्थक विचारणीय लेख लिखा है आपने ..

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  7. बात तो अनुराग जी सही उठाई। यहाँ आपको आपकी शक्ल से नही जात से पहचाना जाता है। ये बीमारी बहुत पुरानी है। धीरे धीरे जाऐगी। जब आप और हम जैसे उन्हें कोई जवाब नही देगे तब शायद यह दूर हो पाऐगी।

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  8. bhut sahi baat kahi hai aapne. shushilji thik kha rhe hai. ye to dhere dhere hi jayegi.

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  9. Anurag ji, thik baat. aesi baato ke bare me likhana hi bhut badi baat hai. bhut badhiya. likhte rhe.

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  10. सव्ह्मुच आज इस जात पात के चक्कर में इन्सानियत भूल बैठे हैं!मेरे घर में जो लड़की खाना बनती थी अनुसूचित जाती की थी!एक बार एक भद्र महिला घर आई और उसकी जाती जानने पर उन्होंने उसे निकालने को कहा और बोली की वो उसके हाथ का खाना नहीं खायेंगी!उन्होंने खाना नहीं खाया!दुःख होता है लोगों की ऐसी सोच पर...

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  11. biraadari ki baaton par hi to desh ki raajneeti chaal rahi hai.ab to shaheed,swatantrata senaniyon par bhi biradari ke log dawaa karne lage hai

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  12. बरसो से यही बात चलती आती है .... शायद सदीयो से .... हमेशा सुनती आई हु हर प्रॉब्लम का कोई न कोई सॉल्यूशन होता है ..... ये कैसा प्रॉब्लम है जिसका कोई सॉल्यूशन नहीं???

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  13. ये सवाल कई बार लोग मुझसे भी पूछते हैं... अपना भी नाम ही कुछ ऐसा है. और फिर लोग कारण भी देने लगते हैं सवाल पूछने का... यहाँ के ओझा ये होते हैं वहां के वो होते हैं .... ! और हाँ अच्छे बड़े लोग भी.

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  14. काफी रोचक संस्मरण है। पढ़कर अच्छा लगा। सस्नेह

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  15. "मैंने आँखे खोली ..".मै समझा नही' ?मैंने अम्मा जी से पूछा ....मतलब थारी बिरादरी कौन सी है ? .बमाहन ,के बनिया "
    अनुराग जी ये ही सब समस्या की जड़ है...तुम कों...हिंदू, मुसलमान, सिख, बनिया, ब्राह्मण, जैन, क्षत्रिये...फ़िर उनकी उप जातियां फ़िर उप की उप जातियाँ...मकड़ जाल है जो इंसान को इंसान से दूर करता है....मुझे तो जो लोग समाज बनाते हैं...जैसे जैन समाज, अगरवाल समाज, ब्राह्मण समाज, राजपूत समाज....आदि से भयंकर चिड है....बच्चों ने जब अपने से बाहर की जाती की लड़कियों को पसंद करके मेरे समक्ष अपनी शादी का प्रस्ताव रखा तो मुझे इतनी खुशी हुई की क्या कहूँ...
    सच कहूँ आईडिया का जो एड है जिसमें लोग नंबर से पहचाने जाते हैं मुझे बहुत सही लगा.
    नीरज

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  16. जो जितना बड़ा है उतना ही जात के इस जंगल में फंसा है। मुझ से लोग पूछते हैं आप यूपी वाले हैं क्या? मेरी हालत ये कि मुझे मेरे सहकर्मियों की जाति तक पता नहीं। कई लोग जजों के बारे में पूछते हैं किस जाति का है। अब किस को क्या कहें। ये रिजर्वेशन ने इस पूछताछ को और बढ़ाया है। समाज में खाँचे बना दिए हैं।

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  17. Jwalant topic hai bhai.... ek taraf aaj ki nai generation (chahe dhiire dhiire) ye farq mitati nazar aati hai...... doosri taraf politicians phoot daalne mein koi chook nahin karte.
    Maloom nahin K in dakyanoosi vichaar paalne waaloon ka kiya kya jaaye.
    Bas ye maloom hai ki humein Dr. Anuraag jaise social doctors ki bahut zaroorat hai....

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  18. aapke blog pe aana aor kuch padhna hamesha ek nayi anubhuti deta hai.mai jis pradesh se hun vahan jaativaad bahut hai,bade shaharo me shyad koi nahi pooche lekin kuch jagah ye bahut hai.aor rahi baat kuch kahne ki aapka javab dene ka tareeka apne aap me khoob tha

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  19. bahut sahi likha hai aapne... hum logon ki mansikta kab badal payenge.. kahate hue achha nahi lag raha par kai baar mere ghar me bhi aisa ho jaata hai... main ise apne badon ka bujurgpana samajh kar ignore karne ke alawa kuchh nahi kar paati...

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  20. ऑफिस के कंप्यूटर से केवल ब्लॉग ताकता रहता हु पढ़ तो पता नही..... अभी कमरे में आया तो ब्लॉग को पढ़ा और कमेन्ट भी....
    बिरादरी, जात, तबका... समाज.... ऐसा घालमेल है की अच्छे अच्छो का दिमाग घूम जाए.... अपनी झूटी मान मर्दन के खातिर लोग अपना नाम तक बदल लेते हैं.... सरनेम चेंज करा लेते हैं.... सिंह और शर्मा की भरमार हो जाती है... आयरलैंड में सरनेम पूछने में पाबन्दी है, कानून की नजर में जुर्म है... भारत में भी हो जाए..... ये जो लोग पूछते हैं की आप कहा के हैं कौन है.... पूरा नाम क्या है....समाज के यही लोग दुश्मन हैं.... चाहे यह कोई हो... आप या फ़िर मैं... आपका रिश्तेदार या फ़िर मेरा.... समाज को यही तोड़ते हैं.....

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  21. सही है जी, जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान!
    आदमी का वैल्युयेशन तो गुणों से होना चाहिये।

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  22. और अभिषेक तो निहायत हेल्पफुल बन्दे लगते हैं। क्या जात है जी उनकी! :-)

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  23. थम पैले अपनी जात बतओ जी हम बी तबी टिपियावेगे जी

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  24. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  25. बहुत गहरी ज़डें हैं इस समस्या की.... मगर आने वाले वक्त से पूरी उम्मीदें हैं!

    कम लोग लिखते हैं ऎसे संवेदनशील विषय पर... आपकी भूमिका बेशक काबिल-ए-तारीफ़ है!

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  26. हमारा सरनेम 'लाल' तो ऐसा है कि भारत में हमेशा ही इस प्रश्न से पाला पड़ता था. बड़ी कोफ्त होती है, इस मानसिकता पर मगर क्या करिये. हर दूसरे आदमी को तो पूछना है. बहुत उम्दा पोस्ट लिखी इस समस्या पर. बधाई.

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  27. बिहार तो जातिवाद का गढ़ है ही। पर जब पहली बार लखनऊ गया तो वहाँ घूमने के लिए आटो लिया। पैसे देते समय आटो वाले ने पूछा आप किस जाति के हैं। मैं हतप्रध रह गया कि जिससे दो घंटों की देखा देखी है और जिससे भविष्य में मिलने का कोई प्रयोजन नहीं वो भी जाति पूछने की आतुरता छिपा नहीं पा रहा।

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  28. जातिवाद की जडें इतनी गहरी हैं कि यदि idea के Ad को एक बार लागू कर दिया जाय जिसमें लोग नंबरों से जाने जाते हैं तो उसमें भी पूछा जाएगा - आप के नम्बर किस से शुरू होते हैं एक नंबर से...दो नंबर से या ......और जब जीरो से शुरू हो तो सामने वाला कहेगा आप तो जात बाहर हो जी :)

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  29. भारत के हरेक प्राँत को इस जातिवाद के दूषणसे ऊपर उठने की बहुत सख्त जरुरत है
    और उसके बाद, परदेस मेँ बसे भारतीयोँ को जाति या कौम से परे सोचने की भी आवश्यकता है -
    Good article.
    - लावण्या

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  30. सही है।
    जांत-पांत पूछे नहिं कोई,
    ब्लागिंग करे सो ब्लागर होई।

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  31. अनुराग यार,
    किशोर वय से ही मुझे इन बातों से चिढ़ होती रही है,
    जब कि मेरी समझ सारिका , नई कहानियाँ वगैरह पढ़ लेने तक ही सीमित थी । अभी भी इसपर बहसें चलाता रहता हूँ, लेख भी जाते रहते हैं ।

    पर भला हो इस जाति-व्यवस्था का कि इसने मेरा बसता हुआ घर उजड़ने से पहले ही बचा लिया ।

    अब तो राजनीति की धुरी ही यह व्यवस्था है ।

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  32. सही कहा हमें इन सब बातों से ऊपर उठना चाहिए, लेकिन एक करता है तो दूसरे को उत्तर स्वरूप प्रतिक्रिया करनी ही पड़ती है, यही समाज का असली रूप है!

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  33. अनुराग जी बहुत अपना सा लगा आज का लेख, धन्यवाद

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  34. अनुराग जी न तो यह ख़ुद बदले हैं और न ही अपने बच्चो को कुछ अच्छा सिखा रहे हैं. सच्चाई तो यह है कि जाति के अलावा उनके पास और है भी क्या जिसका गर्व कर सकें? मानवता, ईमानदारी, दरयादिली, कुछ भी तो नहीं है. आपकी पिछली पोस्ट्स भी पढीं, और काफी गहराई से मह्स्सोस किया जिंदगी की सच्चाई को. लिखते रहिये.

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  35. ह्म्म्म ऐसे ही लेखों की जरुरत है, सही है इनकी जड़ें काफी गहरी हैं हमारे समाज में, अभी समय लगेगा सब बदलने में, पर शुरुवात तो हो ....

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  36. डाक्टर साहब,
    इस पोस्ट का शीर्षक ही
    सच का समर्थ संदेशवाहक है.
    आपने मर्म को
    छूने वाली बात कही है.
    दोहरापन आज की
    ज़िंदगी की पहचान है
    और विडंबना भी !
    आपने उसे उजागर किया है.
    आप सचमुच सृजन को जीते हैं.
    =========================
    डा.चन्द्रकुमार जैन

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  37. 'जात न पूछो साधू की', शायद उस ने यह पढ़ा नहीं कि साधू या डाक्टर की जात नहीं पूछी जाती.

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  38. bahut achha topic hai,sach kahun to aaj bhi iski jaden vaisi hi hain...chhoti chhoti baaton se ye zaahir ho jata hai,or bahut dukh deta hai...sab se zyada dukh ki bat ye hai ki education bhi isko door karne kii vajah nahi ban rahi hai kyonki jab west mein rang or nasl ka rang ita gahra hai to sochiye ham to abhi duniya ko dekh hi rahe hian...lekin phir jaise bahut kuchh badla, shaayad ye bhi badal jaaye...bahut zabardast


    anurag ji, ab ek achhi si nazm likhiye na...

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  39. पोस्ट के पहले किसी विद्वान का कथन या शेर कोट करना, आपकी पोस्ट को सबसे अलग करता है। और रही बात आपकी कलम की, वह तो लाजवाब है ही।

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  40. आपके ब्लॉग पर पहली आया
    सच कहें तो ये जातिवाद तो हमें घुट्टी में ही पिला दिया जाता है
    बड़ा दुःख होता है जब बुद्धिजीवी कहे जाने वाले लोग भी जाति से चिपके नजर आते हैं
    कभी मेरे ब्लॉग पर भी पधारियेगा

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  41. सचमुच हम लोग जिनता आगे जा रहे हैं उतना ही पीछे हो रहे हैं । जयपुर में जब छह साल पहले आई थी, तो यहां हास्टलों के नाम जातियों के नाम पर हैं, ये देखकर जितनी हैरान थी उतनी दुखी भी। कोई जाट होस्टल है कोई गुर्जर कोई मीणा छात्रावास। लेकिन इंसानियत के लिए कोई छात्रावास क्यों नहीं है।

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  42. सचमुच हम लोग जिनता आगे जा रहे हैं उतना ही पीछे हो रहे हैं । जयपुर में जब छह साल पहले आई थी, तो यहां हास्टलों के नाम जातियों के नाम पर हैं, ये देखकर जितनी हैरान थी उतनी दुखी भी। कोई जाट होस्टल है कोई गुर्जर कोई मीणा छात्रावास। लेकिन इंसानियत के लिए कोई छात्रावास क्यों नहीं है।

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  43. Sahi mudda....sahi baten..
    Dhuen se din.. kalee raten..
    yahi hoon main
    yahi ho tum
    aao khoje
    yahan ghaaten
    magar fir bhi
    rahengi shesh
    baten. baten..
    baten. baten..

    उत्तर देंहटाएं
  44. Sansmaran bohot achhaa lagaa, ya ye kahun ke dilko choo gaya. Ham kitnee, kaisee ,kaisee daldalme fansen rehte hai!
    Shama

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  45. ham kaun hain.....manushya ne is darshanik prashna ka uttar dete dete itne kathin daayre bana liye jinhe ab woh khud hi nahii laangh pata. isiliye ab wo manushya nahi balki us daayre ka ek praani hai. chidiyaghar ke labelled pinjre ke praani ki tarah ho gaye hain. dekhnewale ko pata nahi ki kaun kya hai...par chidiyighar ka label kehta hai ki ye gadha hai to dekhnewale seengh wale ko bhi gadha maan lete hain aur manavta aise gayab hoti hai ...jaise gadhe ke sar se seengh......

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  46. kayi baar aisi buri paristhition se samana huya hai jab log bina wajah jati puchhten hai.main sochati hun aise logon ko apni jati likh ke pith pichhe tang leni chahiye

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  47. पहली बार आपके ब्‍लॉग पर आया। बहुत अच्‍छा लिखा है आपने। मेरी समझ में शिक्षा ही इस समस्‍या का समाधान कर सकती है।
    मथुरा कलौनी

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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