2008-08-03

जीने की लौ कहाँ से जलती है ?



हम सब दरअसल गलतियों का पुलंदा भर है रोज सुबह कई मुखोटे डाल कर निकलते है ओर दिन को झूठो में लपेट उस पर सच का मुलम्मा चढाकर रात की ओर धकेल देते है उस पर "दुनियादारी ' का ग्लो साइन बोर्ड मजबूती से टिका देते है ,इस बोर्ड का साइज़ साल दर साल बढ़ रहा है


क्या आपने कभी सीढियों को . देखकर सोचा है कि . इनके माने किसी जिंदगी में भी होते है .....मैंने इन पर मायने बिछे देखे है.... जीते जागते मायने ..पहली बार उन्हें उसी हॉस्पिटल की पहली मंजिल पर देखा था( जो इन दिनों विस्फोट की वजह से चर्चा में है .).अहमदाबाद का सिविल हॉस्पिटल ..रेडियोलोजी डिपार्टमेन्ट ओर उसके ठीक ऊपर एक कमरा
एशिया के इस सबसे बड़े हॉस्पिटल की इमारत के एक कोने में गुजरात मेडिकल कौंसिल का एक दफ्तर भी है ,वही कुछ काम था हम दो लोग थे , जाट ने रेडियोलोजी डिपार्टमेन्ट ज्वाइन कर लिया था जाहिर था रात वही गुजरेगी...
रात को महफ़िल जिस कमरे में जमी उसका मालिक वही था ,अस्त व्यस्त उस कमरे में बिखरी ढेर सारी किताबे , एक कोने में रखा टेप रिकॉर्डर ...ओर कैसेटो में कैद जगजीत सिंह....मेहंदी हसन ...बीचों बीच इक पलंग उस पर कुछ अखबार के फैलाये हुए पन्ने ...जिसके इक कोने पर गोल्ड फ्लेक का पैकेट ओर दूसरे कोने पर इक इलेक्ट्रोनिक प्यानो . रखा था हवा से लड़ने को ... दो पैग के बाद प्यानो खुला ,टेप रेकॉर्डर बंद हुआ ...ओर कुछ गजले ..बाहर आयी वो गाता नही था पर सुनता बड़े गौर से था उसे मेहंदी हसन की एक एक गजल मुह जबानी याद थी ,कभी कोई लफ्ज़ या शेर भूल जाते तो वो फ़ौरन दुरस्त कर देता ,...देर रात तक हम बैठे ...... ये हमारी पहली मुलाकात थी.....
उसका असली नाम भारत भूषण था पर लोग उसे बी.बी बुलाते थे ओर इसी नाम से उसे इतना याद रखने लगे कि कभी कोई कुरियर वाला या कोई रजिस्ट्री उसके नाम से आती तो पहली बार मे वापस हो जाती या अस्पताल मे दर्जनों डिपार्टमेन्ट मे घूमती..बाद मे किसी को याद आता अरे अपना बी.बी...
उसके चेहरे में कोई असाधारण बात नही थी ,उसका चेहरा आम चेहरों जैसा था इतना आम की आप शायद एक बार मिलकर उसे याद न रख पाये पर उसके दिल के भीतर जिसके भीतर जाने के लिए आपको ढेरो दरवाजे पर करने होते थे एक लौ थी एक ऐसी लौ जो कई सालो से muscular dysdrophy नाम के अंधेरे से खामोशी से लड़ रही थी .( ऐसा रोग है जिसमे आपकी मसल्स की शक्तिया आहिस्ता आहिस्ता ख़त्म हो जाती है ओर एक अवस्था ऐसी आती है की आप की साँस लेने में मदद करने वाली मसल्स भी इसका शिकार हो जाती है )

उसके पिता साईकिल पर कपड़ो के गट्ठर रखकर जालंधर के इक गाँव में फेरी लगाते थे ,तीन बहनों का अकेला भाई उसे ओर उसकी छोटी बहन को इस अंधेरे ने घेर लिया था ....शायद बचपन के किसी मोड़ पर उसे लग गया था कि उसका बचपन आम बचपन नही है तभी उसने किताबो से दोस्ती कर ली.... पढने लिखने में आम बच्चो से कही बेहतर था ,शांत प्रकति का वो बच्चा 10 क्लास में वो अपनी बहन को साईकिल पे पीछे बैठाकर स्कूल जाता था ,12 क्लास तक आते आते उसने अकेले साईकिल से जाना शुरू किया ,अहमदाबाद के मेडिकल कॉलेज में जब उसने एडमिशन लिया तब उसका कमरा 2nd फ़लूर पर था ,दूसरे साल में वो 1st फ्लोर पर शिफ्ट हुआ ओर आखिरी साल में ग्राउंड फ्लोर पर …. रेडियोलोजी में एडमिशन मिलने पर वो पहले साल उसी कमरे में रहा उसके बाद ठीक  रेडियोलोजी डिपार्टमेन्ट के ऊपर चूँकि लिफ्ट थी …
वो इक बेहतरीन साकी था ..हर ब्रांड का जुगाड़ करता ...पूरी पार्टी का मेनेजमेंट करता ....नमकीन ,मूंगफली ..कोल्ड ड्रिंक्स ,सोडा सिगरेट .ओर खाना ..ओर . अगले रोज सुबह सुबह इक हिसाब का कागज मिलता ...की आपने इत्ते पैग पिये ,इत्ते बिखेरे ..इत्ती सिगरेट फेफडो में डाली .....इत्ते लोगो में आपका कुल जमा हिसाब ये है...उसकी ये  हिसाबी मशहूरी इतनी फैली की दूसरे डिपार्टमेन्ट के लोग भी पार्टियों की इत्तिला बी बी को देते .ओर अपनी फरमाइश उसके रजिस्टर में नोट कराते ...

उस डिपार्टमेन्ट में इक ब्लेक बोर्ड टंगा होता था रिपोर्टिंग रूम में(शायद अब भी हो ) ..जो उन रेसिडेंट डॉ की अपनी इक दीवार थी ...हॉस्पिटल से जुदा दीवार....... जिस पर वे फलसफे लिखते ....जो मन में आता वो लिखते ...कभी कभी क्रिकेट मैच का स्कोर भी.. बस इक अलिखित रूल था ...जो पहले आकर लिख देगा ..पूरा दिन वही लिखा रहेगा .बी बी अक्सर चोक की इस लडाई में फर्स्ट आता ...उसके फलसफे कभी उदासी में लिपटे नही होते ...
रेडियोलोजी डिपार्टमेन्ट में जिस किसी को छुट्टी लेनी होती थी .इक हाजिरी बी बी के पास भी लगाता था अपनी ड्यूटी को रिप्लेस करने के लिये..बी बी के यहाँ किसी की अर्जी कभी खारिज नही हुई...बाद के दिनों में लोग पहले प्रोग्राम बनते ओर बाद में बी बी को इत्तिला करते ..वो जब भी किसी से मिलता पूरा मिलता ,पूरा खर्च हो जाता पर फ़िर भी कुछ ऐसा अपने पास रख लेता जो सिर्फ़ उसका अपना था …यही उसकी अच्छाई थी ओर यही उसकी बुराई भी उसके बारे में ...लोग उतना ही जानते थे जितना वो बताता था

उसकी छोटी बहन उससे दो साल छोटी थी पर तीन साल पहले अपनी लडाई हार गयी थी ...जाट बताता है अमूमन घर न जाने वाला बी.बी उन दिनों जब घर से लौटकर आया तब कई दिनों तक खामोश रहा. ...उसके कमरे में महफिले बंद रही .हिसाब का रजिस्टर बंद रहा ...उधार के पैसो की भी जब दरकार नही हुई तब जाकर दोस्तों को चिंता हुई....चुचाप वो x रे की रिपोर्टिंग करता ,किसी के उकसाने से भी नही उलझता ....कई महीनो बाद जब उसने अपने दोस्तों को कमरे पे बुलाया .. दोस्तों को चैन मिला
.उसका शरीर धीरे धीरे उसका साथ छोड़ रहा था वो जानता था इसलिये ,PG ख़तम होने के बाद जालंधर के एक  रेडियोलोजी सेंटर में उसने इसलिए जॉब नही की क्यूंकि वहां भी ढेरो सीडिया उसके सामने थी ….
,जाट ने उसे अपने पास बुलाया ,यमुना नगर में अपने सेंटर पर … ९/११ सितम्बर वाले ऐतिहासिक दिन बी बी वहां आया ....कुछ दिन वहां रुक कर स्वाभिमानी बी बी नही रुका...उसने हिसार का एक सेंटर ज्वाइन किया ,जहाँ ऊपर ही सी टी स्केन था ओर ऊपर ही उसके रहने का कमरा … हिसार के उस सेंटर पर जब वे पहली बार गये तो बाहर से सीडिया देखकर बी बी बोला ..”.चल यार यहाँ से चलते है ...इधर भी साले कई सारे पहाड़ खड़े कर रखे है “,जाट के ये कहने पर की वे इतनी दूर से आये है इक बार मिल तो ले..फोन करने पर मालूम चला .पीछे से दूसरा रास्ता है...जिसमे लिफ्ट लगी है ..उन्होंने गाड़ी ऊपर चढाई फ़िर लिफ्ट से ऊपर गये ..लिफ्ट में बी बी बोला था ..अब ठीक है ...अपनी रोटी का जुगाड़ हो गया ... आखिरी वक्तों में .वो रात को कुण्डी लगाकर नही सोता था की कब वो हमेशा के लिए सो जाये शायद उसे अंदाजा हो गया था की . उसकी छाती तक बीमारी पहुँच रही है ओर किसी दिन साँस लेने की की उसकी कवायद मुश्किलों में पड़ने वाली है
30 september 2003 … उस रोज सोने के बाद वो नही उठा ...चुचाप लम्बी नींद ने आखिरकार उसे अपनी आगोशी में ले लिया .

गुलज़ार की एक नज़्म है लगता है उसी के लिए लिखी है

मुझे बस यूँ नही मरना है की सब मरते हुए देखे
की मेरा मुह खुला हो ,धौकनी चलती हो साँसों में
नाल इक नाक में नाक में अटकी हुई ,दो बाह की नस में
मशीनों की तरफ सब देखते हो ,धड़कने की लय
विलंबित है
ये कितनी मात्रा पे चल रही है
मुझे बस यूँ नही मरना
की एक्सीडेंट से कुछ यूँ गिरा जैसे किसी के हाथ से
चिल्लर बिखर जाये !
अठन्नी ,पैसे ,दस पैसे ,चवन्नी
बड़े गुस्से में पूरा नोट फाड़ के जैसे उडा देता
है पुर्जो में
मुझे बस यूँ नही मरना …..
मुझे कुछ ऐसे उड़ जाना है जैसे हिचकी लेकर ओस उड़ती है
की जैसे शेर कहते –कहते सकता पड़ गया .बस !
या लिखते लिखते अफसाना ,सियाही ख़त्म हो जाये !!


मै नही जानता की ऊपर कोई स्वर्ग या जन्नत जैसी कोई चीज़ है या नही कोई हमारे कामो का स्कोर कार्ड तैयार कर रहा है या नही …पर यदि वाकई कोई चित्रगुप्त है तो शेखर ,कृपा ओर बी बी जैसे लोगो को देखकर लगता है की कही हिसाब में गड़बड़ है .

51 टिप्‍पणियां:

  1. की जैसे शेर कहते –कहते सकता पड़ गया .बस !
    या लिखते लिखते अफसाना ,सियाही ख़त्म हो जाये !!

    सब कुछ कह दिया इन पंक्तियों ने .अब हम क्या कहे ..

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  2. आपकी ये पोस्ट भावुकता में बहा कर साथ ले चली है.
    बहुत ही मार्मिक.

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  3. वो जब भी किसी से मिलता पूरा मिलता ,पूरा खर्च हो जाता पर फ़िर भी कुछ ऐसा अपने पास रख लेता जो सिर्फ़ उसका अपना था …यही उसकी अच्छाई थी ओर यही उसकी बुराई भी
    :
    :
    एक छोटी पर पूरी जिन्दगी जीके गया है कोई ....

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  4. Shaayad upar waale ko bhee B. B saahab ki zaroorat pad gayi ho!! Hisaab gadbad ho rahe the naa...

    Par wo jahan bhi honge apni unhi adaao'n ke saath honge!! :)

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  5. बहुत गहराई तक बींध गई ये बात तो !
    बहुत ही मार्मिक !

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  6. ..वो जब भी किसी से मिलता पूरा मिलता ,पूरा खर्च हो जाता पर फ़िर भी कुछ ऐसा अपने पास रख लेता जो सिर्फ़ उसका अपना था …

    bahut bhavuk....ye lekh padhkar man kisi aur jagah pahunch gaya.
    kya kahoon....ye sab shabdo ke paar hai

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  7. वो जब भी किसी से मिलता पूरा मिलता ,पूरा खर्च हो जाता पर फ़िर भी कुछ ऐसा अपने पास रख लेता जो सिर्फ़ उसका अपना था …यही उसकी अच्छाई थी ओर यही उसकी बुराई भी

    डाक्टर कुछ सच्चाईयां ऐसी होती हैं कि वह बहती जाती हैं और हम उसमें डूबते जाते हैं जबकि हमें पता है कि वह बहाव एक दिन रूक जाएगी..इन्हीं सच्चाईयों का नाम जिंदगी है। बाकि रंजन गोरखपुरी जी भी शायद कुछ कह रहे हैं...

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  8. अजी आप का जाट जब तक जिया पुरी जिन्दगी,जिया, जिसे कहते हे जिन्दा दिली,सच मे उसे सलाम करने को दिल चाहता हे,लेकिन फ़िर भी काफ़ी दर्द ,यादे ओर आंसू छोड गया अपनो के लिये.. दुख हुआ एक दिल के बदशाह के जाने का
    धन्यवाद

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  9. .

    डा.अनुराग,
    अंदाज़े बयाँ वाक़ई काबिले तारीफ़ है..
    पर पता नहीं क्यों मैं भावुक नहीं हो पा रहा हूँ ।

    तुमने कोशिश तो ज़रूर की,
    लेकिन मुझे भी लगा करता है, हिसाब में गड़बड़ है ।
    ताज़्ज़ुब नहीं कि वहाँ भी सज़ा पाने के हक़दार बाइज़्ज़त बरी हो जाया करते हों ।
    दो राय नहीं कि लिखा भई तुमने ख़ूब है । तुम्हारा लिखा हमेशा अच्छा लगता है ।

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  10. आपसे बस एक बात पूछनी है.. आप पोस्ट लिखते हैं या शेर?? आपके हर पोस्ट में कुछ शेरो-शायरी जैसा गुमान होता है..(आप जो कवितायें लिखते हैं मैं उनकी बात नहीं कर रहा हूं..) :)

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  11. अनुराग जी, सबसे पहले इस यार जाट को,और उसकी जिंदादिली को सलाम। बहुत अफसोस होता हैं जब ऐसे जिंदादिल इंसान जल्दी चले जाते हैं।

    वो जब भी किसी से मिलता पूरा मिलता ,पूरा खर्च हो जाता पर फ़िर भी कुछ ऐसा अपने पास रख लेता जो सिर्फ़ उसका अपना था …यही उसकी अच्छाई थी ओर यही उसकी बुराई भी

    क्या कहूँ अनुराग जी पता नही आप कैसे लिख जाते हैं मैं तो भावुक होऐ बगैर रह नही सका।
    और क्या कहूँ अनुराग जी लिखा नही जाता।

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  12. आप लोग शायद ग़लती कर रहे है.. जाट नही, जिनकी मृत्यु हुई वे भारत भूषण उर्फ बी. बी. थे.. शायद आपने पोस्ट ठीक से पढ़ी नही है.. एक बार दोबारा पढ़े..

    और रही बात पोस्ट की तो अनुराग जी क्या कहु.. इन चाँद शब्दो में आपने एक जिंदादिली दिखा दी..

    वो जब भी किसी से मिलता पूरा मिलता ,पूरा खर्च हो जाता पर फ़िर भी कुछ ऐसा अपने पास रख लेता जो सिर्फ़ उसका अपना था

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  13. बहुत भावुक कर दिया डॉ अनुराग ने आज.

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  14. यही जीवन है दोस्त उअपर वाले का हिसाब लगता है जिस कम्प्यूटर मे लिखा जाता है वो हैक हो गया है.

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  15. अपने आसपास अपने से ज़्यादा दर्द में जीते लोगों की मुस्कान से जीने की लौ जलती है... और एक लौ अपने अन्दर जलती है जब तक साँसों की डोर है तब तक... अन्जाने में ही कितने ही लोग आपके लेखों से जीने की कला सीख रहे होंगे....शुभकामनाएँ

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  16. फ़िर एक कारुणिक गाथा, एक भावनात्मक बहाव. साहिल पर खड़े हम. देखने और दिल ही दिल मॆं कुछ गुनने को मजबूर.

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  17. "पर यदि वाकई कोई चित्रगुप्त है तो शेखर ,कृपा ओर बी बी जैसे लोगो को देखकर लगता है की कही हिसाब में गड़बड़ है."
    बहुत कुछ कह जाती हैं आपकी पंक्तियाँ...कई बार क्या ऐसा दिल नहीं करता की अगर कभी भगवान मिल जाए तो उसका कालर पकड़ के पूछें की क्यूँ ऐसा क्यूँ करते हो....ये दुनिया चलाने का कौनसा तरीका है...?????
    नीरज

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  18. क्या बन्धु, क्या मजा आता है आंखों में आंसू भरवा कर?

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  19. Anurag ji sirf itna kahungi ki mere 19 saal ke chote bhai ka accident hua hai aor pichle do maheene se bistar pa hai ,vaqt kaatne ke liye mere sath ek din aapka blog padh baiha ,mai bhale hi ab ek do din ke liye aapko adhne me chunk jayun par vo nahi chookta,meenakshi ji ne heek kaha hai kitne log aapki pos padhkar prena lete hai aap nahi jaante ?kai bar aapko adhkar man kiya ki aapse baat kar lun par na nambar maloom hai aor ek bhay sa bhi laga.halanki mere bhai ne aapke dost ki story adhkar aapko mail kiya tha haan usne ye bataya nahi tha ki vo mera bhai hai.

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  20. बी बी से मेरी मुलाकात कुल चार मर्तबा रूबरू हुई है ओर करीबन ५-६ बार फोन पर ...अक्सर मेरे कुछ दोस्त कहते है की ब्लोगिंग के नियमानुसार मुझे लम्बी पोस्ट नही लिखनी चाहिए ,पर बी बी को इतने कम शब्दों में समेटना मुश्किल था ...मैंने जाट से पूछा की क्या उसके पास कोई फोटो है बी बी की ?अजीब इत्तेफाक है की उन साढे तीन सालो में उनके पास कोई फोटो नही थी ,उसने कहा जब बी बी यहाँ रहा था ...तब उसका आई डी यहाँ रहा था सेल्लुलर नंबर के लिए ,उसे ढूंढता हूँ...उसने एक ओर दोस्त दीपक का नंबर दिया की शायद उसके पास फोटो हो ...नही मिली....
    आदरणीय गुरुवर डॉ अमर जी
    आपकी बात का ध्यान रखूँगा....ओर P D जी
    आपसे क्या कहूँ ?आजकल आप कोमिक्स ज्यादा पढ़ रहे है ...

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  21. मै नही जानता की ऊपर कोई स्वर्ग या जन्नत जैसी कोई चीज़ है या नही कोई हमारे कामो का स्कोर कार्ड तैयार कर रहा है या नही …पर यदि वाकई कोई चित्रगुप्त है तो शेखर ,कृपा ओर बी बी जैसे लोगो को देखकर लगता है की कही हिसाब में गड़बड़ है
    aapki is baat se main bhi ittfaq rakhti hoon.

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  22. हर दिन सुबह आकर आपका चिट्ठा खोल कर देखना की कुछ आया है या नहीं.. आज भी कुछ ऐसा ही किया.. कुछ जरूरी काम था सो पूरा नहीं पढा बस आधे ही पढकर सोचा की बाद में फुरसत मिलने पर फिर से पढूंगा..

    अभी जब पूरा पढा तो मन बहुत ही उदास हो उठा.. अपने एक मित्र की याद आ गई जिसकी मौत अभी महीने भर पहले ही हुई थी.. सांस रूक गई थी और दम घुट गया था.. अस्पताल पहूंचने से पहले ही सो चुका था वह.. सच कहूं तो आंखों में आसूं आ गये..

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  23. बेहद जानदार ढंग और समझदारी से
    समझ को दुरुस्त करती प्रस्तुति.
    आगाज़ ही शानदार किया है आपने.
    ===========================
    शुक्रिया डा.साहब
    चन्द्रकुमार

    उत्तर देंहटाएं
  24. kya kahen?? duniya me kitna dard hai aur kitne log ise hasate hasate jhelte hai... aur hum (main) chhoti chhoti baaton me pareshan ho jaate hain...
    aapki har rachna batati hain un logon ke baare me jinhone aakhiri samay tak haar nahi maani..

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  25. बहुत भावुक कर दिया-अति मार्मिक!! बस!! स्तब्ध हूँ.

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  26. डाक्टरों की जिंदगी के इन पहलुओं पर कभी विचार नहीं किया था। पिछली कई पोस्टों से ये आभास हुआ है कि कितनी जूझती जिंदगियों का खात्मा होते हुए देखा है आपने फिर भी संवेदनशून्य नही हो पाए।

    बड़ी सटीक नज़्म से अंत किया आपने इस पोस्ट को !

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  27. ऐसा लगा,
    मानोँ कोई
    बहुत अपना सा
    सामने ही चल बसा :-(
    दुख हुआ उसके जाने का -
    -लावण्या

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  28. जाट भाई से माफ़ी चाहते हे, बी बी भाई की आत्मा को शान्ति पहुचे, शुकर मे किसी ऎसे महकमे मे काम नही करता था, वरना अभी तक जाट भई के घर वालो ने मेरा तो क्रिया कर्म कर देना था.

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  29. कुछ कहने को नहीं है। कुछ लोग छोटे से जीवन को यूँ जीते हैं ज्यूँ लम्बा जीने वालों को जीना सिखाने भर को जी रहे हों।
    घुघूती बासूती

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  30. स्तब्ध कर देने की हद वाला शब्द चित्र.
    दीख नहीं रहा, कोई बात नहीं..
    बी बी महसूस हो रहा है.......
    खैर......

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  31. सच कहूँ तो कुछ लोग दुनियाँ में आते ही इसलिए हैं कि जब वो चले जातें हैं तो हम उन्हें ताउम्र कभी नही भूल पाते, वो हमारी यादों में हमेशा जिन्दा रहतें हैं..

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  32. मार्मिक......
    भावुक कर दिया.....

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  33. अभी आपकी पोस्ट पढूंगी, तब कमेन्ट करुँगी...

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  34. koi bhagwan nahi hota na koi swrg ya nrk.sab bekar ki baten hain..dil ko dilasha dene ke khyal hain.

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  35. sir ji...post padh kar anand film ka dilogue yaad aa gaya....

    zindagi lambi nahin, badi honi chahiye...

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  36. जिन्दगी और मौत तो ऊपरवाले के हाथ की कठपुतली है। इसे वो ही समझ सकता है। क्योंकि वही सब करता है। उसके लेखे-जोखे भी उसके अपने हैं, हमारे सवालों का जवाब दने के लिए भी वो बाध्य नहीं। पर इसका एक उत्तर जो हमसबने खोज रखा है मुझे वही ठीक मालूम पड़ता है।
    शायद ऊपर वाले को भी अच्छे लोगों की जरूरत जल्दी पड़ जाती है। इसीलिए बीबी और कृपा जैसे लोग पहले उसके पास चले जाते हैं और हमारे जैसे उन्हें याद करने के लिए रह जाते हैं।

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  37. आप सभी लोगो का शुक्रिया ..इस पोस्ट को लिखने के बाद असमंजस में रहा की इसे पोस्ट करूँ या नही लगा एक जैसा हो रहा हूँ .पर बी बी को लोगो तक पहुंचाना था ...मुंबई में एक परिवार के मुखिया ने अपने परिवार को ख़तम करके आत्महत्या कर ली ..क्यूंकि उसे कोई लाइलाज बीमारी थी ,डिप्रेसन में चल रहा था ...हिम्मत हार गया था ... ऐसे लोगो को हिम्मत नही हारनी चाहिए ...हम सबके पास कई हीरो है असल जिंदगी में भी ...उनकी कहानी सामने आयेगी तो शायद कही एक कोने में हौसला बढे

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  38. मै नही जानता की ऊपर कोई स्वर्ग या जन्नत जैसी कोई चीज़ है या नही कोई हमारे कामो का स्कोर कार्ड तैयार कर रहा है या नही …पर यदि वाकई कोई चित्रगुप्त है तो शेखर ,कृपा ओर बी बी जैसे लोगो को देखकर लगता है की कही हिसाब में गड़बड़ है .
    "very emotional article feeling like touched somewheer inside liked reading it"
    Regards

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  39. aapko jaise upar waale chitragupt ki baat lagti hai waise hi main sochta hoon ki kaash ye baatein sach na hoti... aapke kitane post aise mod par khatm hote hain... jahan na hone chahiye ! par kya karein !

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  40. aise kisse jinhe padhane ke baad anjaan ankho.n me bhi ansu aa jaye unke apno ka sochiye jinhe ye dard sahanaa bhi hai aur jinda rahanaa bhi hai

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  41. seema ji,abhishek ,and kanchan ....aap logo ka bhi tahe dil se shukriya....

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  42. zindagi shayad ise hi kehte hain...

    dil ko chhu gayi...

    उत्तर देंहटाएं
  43. Dr. Sahab...aap bahut hi achchha likhte hain...Really, har aaltoo faltoo banda apne apko lekhak kahne lagta hai...parantu aapka andaz e bayan....mere pass shabd nhi hai likhane ko...dher sari badhaiyan, shubhkamnayen...aapke lekh ka intezaar rahta hai...

    उत्तर देंहटाएं
  44. बहुत बहुत धन्यवाद जो आपने आज इसे फेसबुक पर साझा किया, आज आँख की कोर फिर गीली है मन फिर उदास है.. बी बी जैसे दोस्त और इंसान बहुत मुश्किल से मिलते हैं..

    मनोज खत्री

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  45. किसी के भी व्यक्तित्व के बारे में लिखना बहुत जटिल होता है जो आपने बहुत आसानी से कर दिया है..निसंदेह एक उम्दा लेखक की निशानी..गुलज़ार की नज़्म बहुत बढ़िया है..

    उत्तर देंहटाएं

कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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