सुबह से छेनी हथौडे खोल रहे है
उसके जिस्म की तहे …
जिद्दी है मगर रूह उसकी
ना कोई आह है ,ना दर्द की शिकन है चेहरे पर
बस इक हवा है
जों कभी कभी दबी सी सिसकिया भरती है
खामोश खडी है धूप भी
गमजदा सी लगती है ।
जख्मी बदन से
बेतरतीब सी कुछ दुनिया
बाहर निकली है
कोनो पे खडी कुछ बेबस आंखो मे
थोडी नमी भी उभरी है
कितने वाकये ,कितने हादसे
शिरकत करने आये है
क़त्ल मे शामिल
कुछ लोग भी सर झुकाये है
मुफलिसी दोस्त थी उसकी ,
वो मुफलिसों का दोस्त था
आओं इस फुटपाथ को दफ़न कर आये .
(२)
रहने दो चन्द ख़ुशनुमा यादे
वक़्त क़ी तहो मे,
ज़िंदगी हमेशा मन- मुताबिक़ नही होती
अब जब ,
मिलते है बचपन के दोस्त,
ना वो फ़ुरसत होती
ना वो पहले सी ख़ुशी होती
आज की त्रिवेणी कासिद बनकर आया है बादल कुछ पुराने रिश्ते साथ लाया है ..... आसमान से आज कई यादे गिरेंगी |
54 टिप्पणियाँ:
अनुराग जी आपकी दोनों ही नज़्म एक से बढ़कर एक है ,क्या अभिब्यक्ति डाली है आपने बहोत खूब ऊपर से वो त्रिवेणी कसम से मसाल्लाह ...आपको ढेरो बधाई ..
रहने दो चन्द ख़ुशनुमा यादे
वक़्त क़ी तहो मे,
बहुत लाजवाब हैं दोनों ही रचनाएं ! बहुत शुभकामनाएं !
कितने वाकये ,कितने हादसे
शिरकत करने आये है
क़त्ल मे शामिल
कुछ लोग भी सर झुकाये है
मुफलिसी दोस्त थी उसकी ,
वो मुफलिसों का दोस्त था
आओं इस फुटपाथ को दफ़न कर आये .
bahut gehra dard liye hai nazm magar dil ko kahi sochne par majboor karti hai,bahut marmik aur sundar.
triveni bhi khubsurat,aasman se aaj kai yadein girengi,bahut khub.
दोनों ही नज़में बहुत ही बेहतरीन हैं..कहीं भीतर तक उतर गई. त्रिवेणी भी जबरदस्त!! बधाई!!
यथार्थ और उस का अहसास अभिव्यक्त करती हैं तीनों रचनाएं।
नज़्में भी सुंदर, त्रिवेणी की बूंदें भी सुहानी
रहने दो चन्द ख़ुशनुमा यादे
वक़्त क़ी तहो मे,
ज़िंदगी हमेशा मन- मुताबिक़ नही होती
दोनों ही एक से बढ़ कर एक ..और उस पर त्रिवेणी बोनस है .बहुत बढ़िया
रहने दो चन्द ख़ुशनुमा यादे
वक़्त क़ी तहो मे,
ज़िंदगी हमेशा मन- मुताबिक़ नही होती
yae panktiya bahut sunder haen nazam ki
बड़ी हैरानी है कि एक डॉक्टर इतना बढ़िया लिखने लगे, बधाई।
prakashbadal.blogspot.com
शुक्र है आपकी नज्मे अभी साँस ले रही है ......त्रिवेणी तो माशा अलाह लाजवाब है.. कभी लावयन्या दी की बात पर गौर फरमाये किताब लिखने की.
मुफलिसी दोस्त थी उसकी ,
वो मुफलिसों का दोस्त था
मुझे आपके डाक्टर होने पर शक है
दोनों ही नज्म खूब है।
आप बेहद खूबसूरत लिखते हैं...शुक्रिया इतनी खूबसूरत नज्म पढ़ाने का।
खामोश खडी है धूप भी
गमजदा सी लगती है...
सुंदर कविता है
रहने दो चन्द ख़ुशनुमा यादे
वक़्त क़ी तहो मे,
ज़िंदगी हमेशा मन- मुताबिक़ नही होती
अब जब ,
मिलते है बचपन के दोस्त,
ना वो फ़ुरसत होती
ना वो पहले सी ख़ुशी होती
सुंदर कविता है
सुंदर कविता।
bahut acchi panktiyan
regards
बहुत खूब तीनोँ अभिव्यक्तियाँ -
जीवन के यथार्थ को
उकेरतीँ हुईँ
पसँद आईँ ..
अब किताब के बारे मेँ
"श्री गणेश"( Shuruat)
कर ही दीजिये -
व्यस्तता के बावजूद ..
ये एक जरुरी काम होगा -
स्नेह,
- लावण्या
आसमान से आज कई यादे गिरेंगी....
sahi mein aapki rachnaayen paddkar dil ke aangan mein yaadein barasne lagti hain....aur mann bheeg jaata hai...
zindagi hamesha mann mutabik nahi hoti.......sach kaha aapne....but we dont have any other option...we have to accept whtevr comes our way....chahe has ke ya ro kar...ye apne pe hai. gulzar sahib ki ek ghazal ki kuch lines baar baar khayaalon mein aati hain...
aadhure se rishton mein jalte raho..
adhuri si saanson mein palte raho...
magar jiye jaane ka dastoor hai
magar jiye jaane ka dastoor hai
hai lau zindagi, zindagi noor hai...magar isme jalne ka dastoor hai...
वाह डाक्टर साहेब...वाह
एक दम निराला अंदाज
दोनों नज़्मों का उन्वान सीने को चीरता भीतर तक
और त्रिवेणी तो-वही कातिलाना
कोई संकलन वगैरह निकालने का इरादा है कि नहीं इन्का?
शिरकत करने आये है
क़त्ल मे शामिल
कुछ लोग भी सर झुकाये है
sabse badi takleef bhe yahi baat deti hai doctor saab,jab jindagi marne pe tuli ho aur katil ko rahem aa jaye,Khuda na kare ye kise aur ke sath bhi ho, jisne jhela hai uska dil hi bas samajh sakta hai is dard ko.
रहने दो चन्द ख़ुशनुमा यादे
वक़्त क़ी तहो मे,
ज़िंदगी हमेशा मन- मुताबिक़ नही होती
Beautiful lines!
बहुत ही लाजावाव .
धन्यवाद
दोनों नज्मों में आप की गहरी संवेदनशीलता दिखायी देती है.
त्रिवेणी हमेशा की तरह लाजवाब है----लेकिन--
'-आसमान से गिरती यादों
को समेट लेना अपने दामन में क्यूँ कि न जाने कब
-ये ही चंद मुस्कराहटों का सबब बन जायें!
आओं इस फुटपाथ को दफ़न कर आये
दर्द में खुशबू और खुशबू का दर्द!
लाज़बाब अभिव्यक्ति सुंदर भावः अतिसुन्दर हब्द संयोजन हमेशा की तरह ...
बहुत लंबे अरसे तक ब्लॉग जगत से गायब रहने के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ अब पुन: अपनी कलम के साथ हाज़िर हूँ |
रहने दो चन्द ख़ुशनुमा यादे
वक़्त क़ी तहो मे,
ज़िंदगी हमेशा मन- मुताबिक़ नही होती
कितना सही कहा है आपने...वाकई यादों को यूँ ही छोड़ देना अच्छा होता है शायद, कुरेदने पर कई बार चुभती भी तो हैं यादें. पर इन आसमान से गिरती यादों का कोई क्या करे...ये तो भिगा ही जाती हैं जाने कितने अहसासों में.
आपको पढ़ना जाने अनजाने यादों में ही ले जाता है. खूबसूरत हैं दोनों कवितायेँ और त्रिवेणी तो बस लाजवाब कर गई.
मुफलिसी दोस्त थी उसकी ,
वो मुफलिसों का दोस्त था
आओं इस फुटपाथ को दफ़न मुफलिसी दोस्त थी उसकी ,
वो मुफलिसों का दोस्त था
आओं इस फुटपाथ को दफ़न कर आये .
कर आये .
और
मिलते है बचपन के दोस्त,
ना वो फ़ुरसत होती
ना वो पहले सी ख़ुशी होती
सही कहा...मिजाज़ दोनो का अलग अलग, लेकिन आपका अंदाज़ दोनो में निराला ....!
बहुत दिनो बाद आपकी नज़मो से मुलाकात हुई.. सुकून दायक रहा..
मन में दबे मनोभाव कुरेदती नज़्म सुन्दर लगी!
Aaj ki Triveni zabardast hai!! Badhaii!
RC
itni aasani se itni gahari baat kahna koi aapse seekhe....
shabdon ka chayan bahut hi maakool !!! padhkar achchaa lagaa bahut....
बाहर निकली है
कोनो पे खडी कुछ बेबस आंखो मे
थोडी नमी भी उभरी है
कितने वाकये ,कितने हादसे
शिरकत करने आये है
क़त्ल मे शामिल
कुछ लोग भी सर झुकाये है
" so emotional and real and near to life.."
regards
काश फैसला कर पाता कि दोनों में से कौन ज्यादा पसंद आई !
ये वाली आज तक नहीं भुला:
धौंकते सीनो से, पेशानी के पसीनो से
लड़ -लड़कर सूरज से जो जमा किया था.
एक गिलास मे भरकर पी गया पूरा दिन.
आज की पहली वाली भी बहुत पसंद आई.
और ये:
"ना वो फ़ुरसत होती
ना वो पहले सी ख़ुशी होती"
कहने को बचा ही क्या है !
Good Job
visit my site
www.discobhangra.com
bahot dino baad aapki nazme padhne ko mili....achcha lagta hai aapka likha padhna ye to purani baat hai.... :)
जख्मी बदन से
बेतरतीब सी कुछ दुनिया
बाहर निकली है
कोनो पे खडी कुछ बेबस आंखो मे
थोडी नमी भी उभरी है
aasmaan se aaj kai yaaden girengi...khyaal achchaa hai ,badhai
वाह बहुत सुन्दर।
अभी मैंने अपने ब्लाग पर कविता डाली ही थी कि आप हाजिर हो गए...? शुक्रिया कमेन्ट के लिए।
और शुक्रिया इतनी अच्छी कविताएं लिखने के लिए.। शब्द नहीं हैं मेरे पास तारीफ के लिए...
ना कोई आह है ,ना दर्द की शिकन है चेहरे पर
बस इक हवा है
जों कभी कभी दबी सी सिसकिया भरती है
खामोश खडी है धूप भी
गमजदा सी लगती है ।
वाह...!
त्रिवेनी ने तो लाजवाब कर दिया...बधाई!
मिलते है बचपन के दोस्त,
ना वो फ़ुरसत होती
ना वो पहले सी ख़ुशी होती
कुछ इसी तरह की भावनाओं वाला एक एस एम एस कल मेरे पास आया था...इसे पढ़कर याद आ गया! भेजती हूँ तुमको ! पहली नज़्म पढ़कर अन्दर कुछ दरक सा गया!
बहुत ख़ूब। कविता की ज़्यादा तमीज़ होने के बावजूद आपकी रचनाएं दिल में उतर गईं।
ढेर सारे लोग तारीफ कर चुके हैं .
सब शब्द इस्तेमाल हो चुके हैं .
मेरे मन में आया कि ;
कासिद बनकर आया है बादल
कुछ पुराने रिश्ते साथ लाया है .....
आसमां से छनकर आया है बादल
यूं कुछ फ़रिश्ते साथ लाया है
आसमान से आज कई यादे गिरेंगी
पूरी होती हुई फरियादें गिरेंगी
आपकी त्रिवेणी गजब है...
आपकी किवता में िजंदगी के यथाथॆ को प्रभावशाली ढंग से अिभव्यक्त िकया गया है । अच्छा िलखा है आपने ।
http://www.ashokvichar.blogspot.com
रहने दो चन्द ख़ुशनुमा यादे
वक़्त क़ी तहो मे,
ज़िंदगी हमेशा मन- मुताबिक़ नही होती
क्या बात है!
जिंदगी तो कभी कभी ही मन मुताबिक होती है.
anurag ji
bahut achi kavita likhi hai
badhai
सुंदर रचनाएं। त्रिवेणी में काफी गहरी बात है।
अनुराग जी
बहुत ही खूबसूरत कवितायें
यथार्त लेखन
काफ़ी समय तक याद रहेगा
मज़ा आ गया
क्या बात कही आपने !! बहुत बढिया !!
आप सभी का तहे दिलसे शुक्रिया ......नज्म पुरानी थी ओर मन भी कुछ ऐसा था सो लिख दी .....@अभिषेक आपने उस त्रिवेणी को अब तक याद रखा मुझे सम्मान दिया है.....कुछ अनुभव कर ही वह लिखी थी .
Aapkee triveni padhne khaas kar baa, baar aatee hun ! "Rehne do kuchh khushnuma yaden,waqtki tahonme.." dardse sisktee panktiyan lagtee hain yaa phir mere apne halat aise hain, ki mujhe inme itna dard samaya lagta hai, keh nahee saktee. Par itna zaroor kahungee ke kash, mujhpebhee maa saraswateekee itnee aseem kripa hotee !
Aur pyar andha nahee, goognga behrabhee ho jaata hai...gar halat waise hon to !Jaise ki mere the ! Ek or khaee doosaree or kua ! Kya chayan kartee ?
दोनों ही रचनाएँ दिल को छु गयी.
triveni lajavab hai ...badhai svikariyega....
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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उस संवाद के रास्ते को खोलती है ,जिन्हें लेखक शायद देख नही पाया .....