2009-02-23

एक सिक्के में जो देता था ढेरो दुआये ,मोड़ पे अब वो फ़कीर नही मिलता ..


कहते है रेलवे स्टेशन कभी नही सोते ...दिसम्बर की उन सर्द सर्दियों में उस रोज मुंह चिडाते कोहरे में ऐसे ही जगे दिल्ली रेलवे स्टेशन पे उस रात हम तीन दोस्त मौजूद थे ..एक ओर कुछ कागज -कबाड़ जला कर . कुलियों के बनाये हुए जुगाडू अलाव थे .दूसरी ओर किसी भी रेलवे प्लेटफोर्म पे होने वाली वही गतिविधिया , तीनो दोस्त वापस मेडिकल कॉलेज सूरत जा रहे थे . रात १० बजे की जम्मू-तवी मे रिज़र्वेशन ..कोहरे की वजह से अनिश्चित वक़्त में झूल रहा था .....तय हुआ की अब कुछ खाया जाये ...
दुनिया चाहे चाँद पे पहुंचे या मंगल ग्रह पर हिन्दुस्तानी माँ आज भी सफर पे अपने बेटे को आलू -पुरी ओर आचार की फांक रख कर देगी .आप चार कहेगे वो आठ रखेगी ...जाहिर है तीनो ने जब खाना खोला तो आलू पुरिया ही थी . सूटकेस को तिरछा करके अखबार बिछाया गया ,वैसे भी पिछले दो घंटो से सिगरेट ओर चाय पी-पी कर फेफडे ओर पेट दोनों गाली देने लगे थे ,एक हफ्ते से घर मे रहने से फेफडो को भी इस धुंये की आदत सी नही रही थी ,घर जाकर करिश्माई तौर पे जाने क्यों सिगरेट की तलब ख़त्म हो जाती थी ओर भूख बढ़ जाती थी ओर उस एक हफ्ते मे आलू के ,गोभी के ओर तमाम परांठे भी माँ देसी घी मे तिरा कर खिलाती थी जैसे एक हफ्ते मे ही हमे गामा पहलवान बना के वापस भेजेगी ....
"रॉबर्ट- लुड्लाम" के किसी नोवेल मे घुसे तीसरे दोस्त को पूरी मे आलू डाल के उसका रोल बनाके मैंने उसे पकडाया ही था कि नीचे जमीन पे लगभग घिसटता एक बारह -तेरह साल का लड़का ठीक सामने आकर रुका ,मैले - कुचले से कपड़ो मे उसने दो कमीजे अपने बदन से ठंड को रोकने के लिए लिपटा रखी थी ,उसके हाथ मे ब्रश था दूसरे मे बड़ा सा कपड़ा जिसकी कई तहे बनाकर वो शायद फर्श पे चलता था ,उसके कंधे पे एक खाकी रंग का मोटा सा बस्ता था जिसमे जूते- पालिश करने का सामान था । उसने एक नजर हमारी आलू-पुरी पे डाली फ़िर हमारे जूतों को घूरता हुआ बोला "पोलिश करवायेंगे ? मेरे दोस्त ने उसे आलू-पुरी का एक रोल ऑफर किया तो उसने अजीब से अंदाज में उसे घूरा "पोलिश करवानी है "?मेरे दोस्त ने हामी भरी ओर अपने जूते उतार दिये ,जब तक वो पोलिश करता रहा उसने आलू पूरी का वो रोल अपने हाथ में रखा ।हम दोने ने स्पोर्ट्स शूस पहने थे ....."कितने पैसे " मेरे दोस्त ने पूछा .तीन रुपया ?मेरे दोस्त ने दस रुपये का नोट निकाला ...."छुट्टा नही है साहेब"
मेरे पास भी नही है ,अभी ट्रेन जाने मे वक़्त है तू इधर उधर घूम ले जब हो तब दे देना .वो लड़का एक टक मेरे दोस्त को देखता रहा ......उसके घुंघराले लंबे बाल माथे पे गिरे ,उन्हें हटाते हुए वो कुछ देर तक ठिठका रहा फ़िर आलू पूरी पे एक निगाह मार के घिसटता हुआ आगे चला गया ...हमने आलू पूरी ख़त्म की ....हम दो लोग उठकर आगे जा के एक चाय के स्टाल पे खड़े हुए वहां तीन चाय का आर्डर दिया ....एक सिगरेट फ़िर जल गयी .कितने पैसे "?मैंने पूछा . तीस रुपया . मैंने जेब से सौ का नोट निकाला ,साहेब छुट्टा दो . मैंने पर्स टटोला तो उसमे छुट्टा नही था ,मेरे दोस्त ने अपने पर्स मे से कुछ पैसे निकाले तो ढेर सारे सिक्के छन छन करके उसके पोलिश किये हुए जूतों के पास गिर गये . . मैंने उसे देखा तो उसके चेहरे पे मुस्कान आ गयी.....हम दोनों चाय के कुल्हड़ हाथ मे लिए लौटे तो वहां वही लड़का हमारे . तीसरे दोस्त के पास उकडू हो के बैठा था .....
उसने हथेली मेरे दोस्त के आगे फैला दी "साहेब आपके बाकी पैसे ".

११ साल पहले .... दिल्ली के रेलवे स्टेशन की एक रात जो शायद अब तक हम तीनो के सीने में जगी हुई है


त्रिवेणी -


तुम चाहो तो कोरे काग़ज़ पर आडी तिरछी रेखाये खींच दो
कुछ रिश्तो को कभी लफ़्ज़ो की दरकार नही रहती.....

फ़ौजी की अनपढ़ माँ ख़त को सीने से लगाकर सोयी है

70 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूबसूरत लम्हे से वाकिफ करवाया है आपने....
    मीत

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  2. उसने हथेली मेरे दोस्त के आगे फैला दी "साहेब आपके बाकी पैसे ".
    " रेलवे स्टेशन का नज़ारा जैसे आँखों के सामने घूम गया....सुंदर संस्मरण.....छोटे से बच्चे की खुद्दारी और इमानदारी का जवाब नही....."
    तुम चाहो तो कोरे काग़ज़ पर आडी तिरछी रेखाये खींच दो
    कुछ रिश्तो को कभी लफ़्ज़ो की दरकार नही रहती.....
    फ़ौजी की अनपढ़ माँ ख़त को सीने से लगाकर सोयी है

    " इस त्रिवेणी ने निशब्द कर दिया...रिश्तो की अथा गहराई समेटे "

    Regards

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  3. Sansamaran ke baare mein kuch boloon to shabd nahin hain haan aapki 'bol' ki hui lines ne sach mein jadoo kiya

    "घर जाकर करिश्माई तौर पे जाने क्यों सिगरेट की तलब ख़त्म हो जाती थी ओर भूख बढ़ जाती थी ओर उस एक हफ्ते मे आलू के ,गोभी के ओर तमाम परांठे भी माँ देसी घी मे तिरा कर खिलाती थी जैसे एक हफ्ते मे ही हमे गामा पहलवान बना के वापस भेजेगी ...."

    Apna ghar jana yaad aa gaya aur maa ki rakhi puriyan. Wo sookh bhi jati hain tab bhi unhe phenkne ka dil nahin karta. Aur ghar jaker to main bhookha kutta ban jata hoon. Jo khane ko do ,sapaat!!

    Bahut bahut dhanywaad un puriyon ka swaad yaad dilane ke liye. holi main ghar ja raha hoon wasie lekin abhi se talab badh rahi hai ;)

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  4. अनुराग जी आज की पोस्ट पढ़कर ऐसा लगा कि शायद पहले भी पढी हुई है। या हो सकता है शायद भ्रम भी हो। वैसे कुछ इसी तरह की घटना मेरे साथ भी हुई थी।

    एक दोपहरी मैं लंच करके हरदयाल लाइब्रेरी के बाहर खडा था

    खाली रिक्शे ढाबे की तरफ दोडे चले जा रहे थे
    दो एक प्रेमी जोडे हाथो में टिफिन थामे बरगद के पेड की तरफ चले जा रहे थे
    तभी एक सात आठ साल का लडका फटी सी कमीज पहने मेरे पास आकर रुका
    एक हाथ बढा बोला अंकल एक रुपया दे दो भूख लगी है
    तभी जी किया कि बोल दू कि चले परे हट ये तुम जैसे बच्चो का रोज का धंधा है
    पर दिल नही माना उसने मेरी जुंबा पर हाथ धर दिया
    मैने जेब में हाथ डाल दो रुपया का सिक्का निकाल उसके हाथ पर रख दिया
    बच्चे का चेहरा फूल की तरह खिल उठा और उसके पैर दोड पडे
    मैं फिर से सडक की तरफ दोडती, भागती, रेंगती जिंदगीयों को देखने लगा
    अब सडक किनारे बैठे दर्जी भी काम छोड खाना खाने लगे थे
    चँद मिनट बाद ही वही लडका हाथ में ब्रेड थामे मेरी तरफ चला आ रहा था
    पास आकर एक हाथ आगे बढा कर बोला लो अंकल, एकदम मेरा भी एक हाथ आगे बढ गया
    देखा मेरे हाथ पर एक रुपया का सिक्का चमक रहा था
    मैं एकदम दंग रह गया, कभी चमकते सिक्के को और कभी लडके के चेहरे को देखता
    मैं एक रुपया थामे बुत की तरह खडा रहा , और वह ब्रेड खाते खाते चल दिया और मेरी आँखो से ओझल हो गया

    वैसे आपने त्रिवेणियों का जादू ऐसा चलाया है कि गुलजार जी की किताब "रात पश्मीने की" उठा लाया। आजकल उसी के साथ जी रहा हूँ। आज की त्रिवेणी की तो बात ही कुछ और है। एक अलग ही अहसास।

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  5. triveni is too good....

    तुम चाहो तो कोरे काग़ज़ पर आडी तिरछी रेखाये खींच दो
    कुछ रिश्तो को कभी लफ़्ज़ो की दरकार नही रहती.....

    par na jaane kyun mujhe is post ko paddkar aisa laga ke aisa hi incident maine shayad aapki kisi puraani post mein bhi padda hai. :)

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  6. जी हाँ एक पुरानी पोस्ट ही ठेली है आलसवश

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  7. हम जिन्‍हें छोटे लोग कहते हैं , वे अधिक ईमानदार होते है....बिल्‍कुल निश्‍छल व्‍यक्तित्‍व होता है उनका.....बहुत सुंदर संस्‍मरण....और आपकी त्रिवेणी का क्‍या कहना ?

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  8. लफ्जों की अपनी ही जुबान होती है तभी वह अनकहा भी कह देते हैं ..त्रिवेणी बहुत पसंद आई .

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  9. आप की अभिव्यक्ति जो बिना किसी बनावट के निर्दोष भाव से हमारे पास तक पहुंच जाती है और सूंघ लेती है उस संवेदना को जो प्रेरित करती है इस अनुभव के लिये, मुझे मुग्ध कर देती है.
    धन्यवाद इस प्रविष्टि के लिये.

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  10. बहुत लाजवाब त्रिवे्णी. शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  11. हाँ ऐसा भी होता रहता है। परन्तु आपके लिखने का ढंग हर बात को नया ही रूप दे देता है।
    घुघूती बासूती

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  12. Bahut saunder abhivyakti hai apki...

    triveni to baut hi lajwab rahi
    तुम चाहो तो कोरे काग़ज़ पर आडी तिरछी रेखाये खींच दो
    कुछ रिश्तो को कभी लफ़्ज़ो की दरकार नही रहती.....

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  13. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  14. Sach kahun to mere paas apke lekhan pe tippanee karneke liye kabhee bhee paryaapt shabd nahee hote aur yahan aadee tirchhee rakhayen bhee mujhse nahee kheenchee jaatee...!
    Itne halke haatse bane ye rekhachitr bohot bolte hain...

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  15. किसी बात में वजन उसको कहने के सलीके से ही आता है और आपकी कलम यह सलीका बखूबी जानती है। आपका संस्मरण हमें भी स्मरण रहेगा।

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  16. खूबसूरत अंदाज़ में ममता, मानवता के रूप..
    जगमगाते, छनछनाते, मुस्कुराते :-)...

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  17. ऐसी पोस्ट तो बार बार ठेली जा सकती है:)
    गरीब के पास आत्मसम्मान और इमानदारी की ही तो धरोहर है। छल कपट अपना लें तो वह भी अमीर बन सकता है ना!

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  18. बहुत सुंदर संस्‍मरण....और आपकी त्रिवेणी का क्‍या कहना ? किसी बात में वजन उसको कहने के सलीके से ही आता है और आपकी कलम यह सलीका बखूबी जानती है।

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  19. "साहेब आपके बाकी पैसे "+ ek comment bhi Anuraag saheb.

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  20. shayad kuch logon ki imandari itani majboot hoti hai ke kuch aise ka ehsaan bhi unhe gawara nahi hota,aur wo bachh bhi un achhe sachhe imandar logon mein se tha,bhavuk post,triveni bahut marmik,fauji ki ma aur uska khat ankhon ke samne chalak gaya.

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  21. संस्मरण बहुत ही सिलसिलेवार ढंग से प्रस्तुत किया गया है.हमेशा की तरह भावपूर्ण है..
    त्रिवेणी की 'तीन पंक्तियाँ 'तो अंत में रोके रखती हैं --
    'तुम चाहो तो कोरे काग़ज़ पर आडी तिरछी रेखाये खींच दो
    कुछ रिश्तो को कभी लफ़्ज़ो की दरकार नही रहती....'

    बेहद उम्दा!

    -[वैसे मैं भी कम पढ़ी पुरानी पोस्ट को पोस्ट करने की ही सोच रही थी..
    आप ने क्रियान्वित भी कर दिया..और मैं ने अब वह आईडिया बदल दिया.]
    :)

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  22. chitthajagat par title padh kar hi lag gaya, aap hi ka hoga aur is andaaj me to koi likh nahin sakta...triveni kamaal ki rahi...aakhiri line khas taur se...kuch rishton ko lafzon ki darkar nahin hoti.

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  23. आपकी त्रिवेणी हमेशा ही शानदार होती है।...वह बच्‍चा ही आपके बचे हुए पैसे वापस कर सकता था। अगर कारोबारी होता तो शायद ये भी कह सकता था कि आपने पैसे अभी दिए ही कहां हैं।
    बहुत अच्‍छी पोस्‍ट। हमेशा की तरह।

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  24. ईमानदारी और भोलापन कहीं भी मिल सकता है। हाँ आजकल बहुत कम मिलता है। सुन्दर प्रस्तुति।

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  25. जिंदगी के सफर में गुजर जाते हैं जो मकाम वो फ़िर नही आते ...वो फ़िर नही आते .....आपका संस्मरण पढ़ कर बहुत अच्छा लगा ....भोलापन और ईमानदारी ही बहुतों की सब कुछ होती है

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  26. gazab ka sasmaran ko abhi byakt kiya hai aapne...bejod andaaz me.... dhero badhai...


    arsh

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  27. बढ़िया! वैसे बारम्बार ठेलेबल है। मार्मिकता से भरपूर अच्छी पोस्ट।

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  28. पढ़ते वक्त ही लग रहा था की ये आपकी कोई पुरानी पोस्ट है...अब क्या करें...आप लिखते इतना अच्छा हैं की एक बार पढ़ कर बातें जेहन में पक्की हो जाती हैं...भूलती ही नहीं....फ़िर भी इसे दुबारा पढ़ा और उतना ही आनंद आया जितना पहली बार पढ़ कर आया था...आपके लेखन के इस हुनर के ही तो हम कायल हैं...और त्रिवेणी....सुभान अल्लाह...वाह.

    नीरज

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  29. आपको पढ़ना जैसे जिंदगी के उन मासूम हिस्सों को दोबारा देखना है उन छोटी छोटी चीजों के जरिये जो अक्सर सामने से नजरअंदाज गुजर जाती है.जागता हुआ रेलवे स्टेशन ,माँ की आल्लू पूरिया ओर आख़िर में त्रिवेणी .सच पूछिए मुझे तो बड़ी अच्छी लगी ये पोस्ट दुबारा पढने में ,पिता को पढ़वाई ,ओर माँ को भी .माँ ने आपको आशीर्वाद दिया है वही भेज रही हूँ

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  30. आपको पढना जीवन को भरपूर जानना है। आपके लेखन में जीवन पूरी तरह से धडकता हुआ होता है। बहुत छोटी-छोटी डिटेल्स उसे खूबसूरत बना रही होती है।

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  31. आपको पढना जीवन को भरपूर जानना है। आपके लेखन में जीवन पूरी तरह से धडकता हुआ होता है। बहुत छोटी-छोटी डिटेल्स उसे खूबसूरत बना रही होती है।

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  32. dr. saahab main to pehle hee kehta raha hoon ki aap katil hain shabdon se katl kar daalte hain , main khud na jane apke haathon kitnee baar katl hua hoon fir bhee marne kee ichha banee rahtee hai. aap mere liye ek saahitya shaliee hain.

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  33. बहुत ही सुंदर, मै तो बस एक बात कहूंगा, यह लडका उन अमीरो से लाख गुणे अच्छा है जो हा्राम की खा कर अपने आप को अमीर बनाते है, इस हराम मे वो सभीबाते है जिस से पेसा गलत ढंग से कमाया जाता है, ओर आप के दोस्त का यह झूठ एक सच से भी प्यारा लगा.
    धन्यवाद

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  34. इस संस्मरण को री-पोस्ट किया है आपने.. लेकिन सच्ची बात ये है कि इसे पढ़ते मन नहीं अकता... अद्भुत......

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  35. बहुत ही अच्छा संस्मरण. कई बातें सीधा दिल में उतरती हैं, ये भी उसमे से एक है.
    ऐसी खुद्दारी किसे याद नही रहेगी..........

    आपकी त्रिवेणी हमेशा की तरह अंजना एहसास लिए है, दिल को छूते हुवे

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  36. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  37. आप डाक्टर नही है । आप कुछ भी हो सकते है पर डोक्टर तो बिलकुल नही हो सकते है । आपकी लेखन शैली दिल मे उतर जाती है । मै फिर कहता हू आप हमे चकमा दे रहे है । हिन्दी ब्लोग जगत मे दो लोगो कि शैली मुझे बहुत पसंद है । एक आपकी दूसरी --------आप खुद अनुमान लगायें ।

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  38. खुद्दारी या सुसंस्कार धन की मुहताज नही होती.....

    आपकी छोटी छोटी बातों में बहुत बड़ी बातें छुपी होती हैं...

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  39. डॉ. साहब लिखने मे तो आप उस्ताद हो . त्रिवेणी तो कमाल है शब्द नहीं मिलते तारीफ करने को

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  40. आपकी पुरानी पोस्‍ट तो मैंने नहीं पढी इसलिये मेरे लिए तो ये नयी ही है...पुरानी हो या नयी आपकी लेखन शैली दिल मे उतर जाती है ....आपकी माँ ने भी आलू पुरी और अचार बांधा था...? और ये क्‍या आप डाक्‍टर होकर सिगरेट पीते हैं...?

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  41. दिल के करीब कुछ कह गई पोस्ट आपकी ...इस लेख मैं आत्मीयता और संवेदन शीलता की ऊंचाई को छुआ है आपने ...बेहद सम्मान के साथ आभार ...माँ के विषय मैं जो कहा गया बिल्कुल सच .....

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  42. त्रिवेणी के आखिरी मिस्‍रे ने......कहने वाली सारी बातें भिगो कर घुला डाली

    कई बार-आपके शब्द अपनी कोमलता में भी बड़े जालिमाने ढ़ंग से पेश आते हैं....

    लेकिन इन्हें आते रहने दें ऐसे ही-अनवरत

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  43. सचमुच में इंसानियत जिन्‍दा है।

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  44. कुछ यादें हमेशा ताज़ा रहती है।बहुत खूब पुरानी यादो को फ़िर से ताज़ा कराने के लिये।

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  45. इस सादगी पे कौन दिल ना हार जाये ? सुँदर ँस्मरण पढवाया आपने ..और माँ के हाथ की पूडी आलू और पराँठोँ की महक यहाँ तक आ रही है ...ooh I'm so jealous & full of nostalgia ...for such moments !!

    - लावण्या

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  46. पोस्ट दोबारा पढ़कर भी उतना ही अच्छा लगा....अपनी लिखी हुई कुछ लाइनें याद आ गयीं!
    " उस नन्हे से बच्चे की गैरत को है सलाम
    अभी अभी जो भीख को ठुकरा के आया है"

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  47. जानता हू दोबारा पढ़ रहा हू.. पर कितनी भी बार पढ़ लू सुकून मिलता रहेगा... आख़िर ये आपकी भी तो फ़ेवरेट पोस्ट है..

    त्रिवेणी तो बस कमाल है

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  48. बहुत अच्छा लिखा है आपने।

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  49. सही कहा आपने। अभी परसों की बात है, बाजार में रूक कर कुछ सामान ले रहा था। तब एक एक लडका आया और पैर छूकर भीख मांगने लगा। गैर से देखा, तो उसके होंठ लाल थे और मुंह में बनारसी बीडा शोभायमान हो रहा था। अब ऐसे भिखारियों को क्या कहा जाए।

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  50. ईमानदारी अभी भी ज़िन्दा है....


    बढिया संस्मरण

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  51. apka likha hua padhkar to shabd hi nahi hote kuch likhne k liya. ha sochne ko bahoot kuch miljata h . or

    तुम चाहो तो कोरे काग़ज़ पर आडी तिरछी रेखाये खींच दो
    कुछ रिश्तो को कभी लफ़्ज़ो की दरकार नही रहती.....
    kash har rishta m lafjo ki darkar na ho.........to jindgi bahoot khubsurat ho jay.....

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  52. कभी कभी बेख्याली अपना असर कई दिनों तक रखती है फिर ख्याल ऐसे टूट पड़ते है की उन्हें एक जगह समेटना मुश्किल होता है .पिछले दिनों कुछ ऐसा ही था इसलिए ये री ठेल हुआ ....
    @नरेश जी
    बदकिस्मती से खाकसार डॉ ही है....
    @हरकीरत हकीर
    सच कहा आपने ,सिगरेट पीना कोई गर्व की बात नहीं ....वैसे इन दिनों आप इसे छोडा हुआ कह सकते है ..महीने में कोई खास दोस्त मिल जाए तो कोई पुराना दोस्त तो कुछ मिल बाँट कर फेफडे आज भी काले कर लेते है ..अलबत्ता वैसे अब ये रोज का रूटीन नहीं रहा .शर्मिंदा हूँ...

    हम तीनो में से एक आजकल लुधियाना में है , ओर फिलहाल बाहर उड़ने की तैयारी है ,दूसरा हरियाणा में ...उस रात जितना असर हमने महसूस नहीं किया जितना उसके बाद की रातो में किया ...हमारा जब भी कभी दिल्ली आना होता .साथ साथ या अकेले ...हम उसे ही ढूंढते ..ओर कोशिश करते की ऐसे जूते पहने जिन पर पोलिश हो सके .पर अफ़सोस उससे दुबारा मिलना नहीं हो सका ..ऐसे कुछ खुद्दार लोगो से मिले अब कई कई साल गुजर .जाते है...
    आप सभी का शुक्रिया....

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  53. जमाने के साथ फकीरों का भी स्टैण्डर्ड बदल गया है।

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  54. http://www.youtube.com/watch?v=nlgrBNTgtsM

    lked it,,,have a look,,, yaha b koi emotions me duba hai,,,,, jane kyu har video bas ek nam me lipta hai,,, do anybdy know him ?

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  55. यूं तो आपको पढ़ना सदैव एक नया अनुभव होता है परन्तु आपका ये संस्मरण मन में एक टीस छोड़ गया है ................
    आपके लेखन को शुभकामनाएं.................

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  56. रोचक लेख लिखा है आपने । वैसे यह हमारे देश की हकीकत है जिससे इन्कार नही किया जा सकता । हमारे देश में यह घटना रोज रेलवे स्टेशनों पर दिखता है जिसे कोई नही देखनेवाला है शुक्रिया

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  57. टूट कर ये हर पल,

    मेरी जान लेते रहे...
    हमको भी प्यार था इनसे,
    ढेरों सपने हम भी संजोते रहे...
    सुन्दर लेख । भाई दिल की गहराई तक छुआ है धन्यवाद

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  58. Doctor....

    Aaj apka blog dekha padhkar dil khush ho gaya.. really jeewan k ye anmol chan koi kaise bhool sakta hai...

    chu gaye sir.

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  59. "उस एक हफ्ते मे आलू के ,गोभी के ओर तमाम परांठे भी माँ देसी घी मे तिरा कर खिलाती थी जैसे एक हफ्ते मे ही हमे गामा पहलवान बना के वापस भेजेगी ...."

    ये लाइनें पढ़ते पढ़ते अचानक बदन सिहर गया, आँखें थोड़ी नाम हो आईं
    ऐसा नहीं कि आपकी पंक्तियाँ कोई अनोखी या अलग थीं

    बस यूं ही पता नहीं क्यों मां याद आ गयी थी

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  60. very good observation sir.In our lives we ignore many such instances which can transform lives. by such feelings you surely would have become a more improved human being.

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  61. Anurag ji.
    Bahut hi achhi rachna..
    Mujhe bahut pasand aa rahaa hai aapka blog.
    Abhi tak to main poetry ka shaukeen tha...aapko dekh dekh kar, stories likhne ka bhi man ho raha hai..Pata nahi mujhme vo caliber hai ke nahi..Aaj tak to sirf kavitaayen hi likhi hain..

    Agar aap ko aapatti na ho, to main aapki ye post apne dosto ke saath share karna chaahoonga, (making sure that you get the due credit.)

    do tell me yogesh249@gmail.com

    http://tanhaaiyan.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  62. नमस्ते अनुराग जी!

    मेरी पोस्ट पर टिप्पणी मे शिव जी ने आपका जिक्र किया, तो आपके ब्लॊग की लिन्क खोजते मै यहां पहुंची!!
    और एक ही साथ इस पेज पर उपलब्ध सब पोस्ट पढ डाली.. हालांकि " आगे पढें" को क्लिक नही किया :)
    लेकिन आपकी लेखन शैली और विषय दिल को भा गये हैं, सो अब आया करूंगी आपके ’दिल की बात’ सुनने!

    उत्तर देंहटाएं
  63. आपका लेख पढ़ा....पढ़कर अच्छा लगा...वास्तव में आज भी खुद्दार लोगों की कौई कमी नहीं हैं बस उन्हे पहचानने की देर हैं। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था मैं गाजियाबाद से अपने घर लक्सर(हरिद्वार) जा रहा था कि ट्रेन में एक झांडू लगाने वाला लड़का आया...और पैसे मांगने लगा, मैने उसे एक रुपए का सिक्का दे दिया वो आगे बढ़ा, रुका, मुड़ा और फिर उसने मेरी सीट के नीचे गिरे मेरे मोबाइल को उठाकर मुझे देते हुए कहा ये लिजिए आपका मोबाइल नीचे गिरा था। मैं बहुत खुश हुआ और मैने जेब से 10 का नोट निकालकर उसे देने की कोशिश की तो, कुछ देर पहले मुझसे एक रुपया मांगने वाले उस लड़के ने ये नोट नहीं लिया। और तुरंत वहां से चला गया। और अपनी याद हमेशा के लिए मेरे साथ छोड़ गया...हैरत की बात है कि मैं आज भी उसी ट्रेन से आता-जाता हूं पर आज तक मुझे मेरा वो दोस्त दोबारा नहीं मिला।...
    गौरव कुमार प्रजापति, वॉयस ऑफ इंडिया (न्यूज़ चैनल) नोएडा।
    फोन- 099-1984-1083, मेल- gauravprajapati7@gmail.com

    उत्तर देंहटाएं
  64. अनुराग जी,
    आज मैं इत्मीनान से आपका ब्लॉग पढने बैठी हूँ. और आपकी हर एक पोस्ट मुझे पहले पढ़ी गयी से, बेहतर लग रही है. सोचा था सब ख़त्म कर लूँ फिर एक बार में कमेन्ट देती हूँ पर अब इस पोस्ट के बाद मुझसे रहा नहीं गया. जानती हूँ की आपके लेखन शैली के बहुत प्रशंसक हैं. ...पर मुझे जो चीज़ ज्यादा आकर्षित की वो है आपकी सोच ... words...reflect the kind of human you are.the way you see things...observe...understand..and interpret.and in your case..its awesome.
    एक ही पोस्ट में आप इतने रंग उकेर देते हैं...बहुत कम शब्दों में बहुत गहरी बातें...कुछ जगह रुक कर दोबारा पढना पढता है...कई बार..
    I even get to learn quite many things here.Though I'hv never met you,quite possible never will...but yes,I wish you or smone like you wud have been here around me.
    आजकल मुश्किल से ऐसे लोग टकराते हैं जिनको सच में respect देने का मन करता है.

    TC.

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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