2009-03-29

नेपथ्य का स्केच ??


उसके एक हाथ में किताब है ,दूसरे में चाय का डिसपोसेबल ग्लास ..रुकी ट्रेन में से वो परदे हटाकर बाहर देखता है प्लेटफोर्म पर बीडी फूंकते कुली के पीछे अर्धविक्षिप्त सा कोई बूढा है ...उसके बराबर में हांफता कुत्ता . ... वो बूढे को गौर से देखता है ओर उसकी दुनिया को .........जहाँ हर दिन एक दुस्हास है ....शीशे के पार गंध नहीं आती पर वो जानता है हर प्लेटफॉर्म की एक सी गंध होती है .... समाज का मेटामोरफोसिस नहीं होता ?,वो सोचता है .....
चाय का घूँट भरते हुए वो फिर किताब के पन्नो से होता हुआ इतिहास में विचरता है .इतिहास कभी कन्फेस नहीं करता .....पर उसके कुछ आरक्षित पन्ने मानो उससे जिरह करते है .अलिखित सा कुछ झांकता है ..... ये महज संयोग है ,किसी युग पुरूष या महान व्यक्ति के नेपथ्य में उसके किसी अपने का ही चेहरा दिखता है .गांधी के पीछे कस्तूरबा .राम के पीछे सीता .लक्ष्मण के पीछे उर्मिला ..बुद्ध . या . विज्ञान का कोई महान ज्ञाता .... ...ऐसे कितने चेहरे है ..जो बिना अपनी हिस्सेदारी मांगे खामोशी से हमें इतिहास का एक उजला पक्ष दे गये है ....क्या नेपथ्य अनिवार्य शर्त है विधान की ......इस नेपथ्य के बिना इतिहास का चेहरा कैसा होता ? वो सोचता है ......पर एक आहट उसे वापस खींचकर वर्तमान में लाती है ...बूढा शीशे पर हाथ टिकाये ट्रेन के भीतर झाकने की कोशिश कर रहा है ....अन्दर कोई उसे भगाने की कोशिश ......ट्रेन चल पड़ी है ...बूढे के हाथो ने जैसे कोई तस्वीर कांच पे छोडी है ...क्या ये भी वर्तमान के नेपथ्य के किसी हिस्से का स्केच है ?




"सूखा"

एक आहट ओर उम्मीद की कई आँखे जाग जाती है
फलक के रास्ते पर कब से बैठा है पूरा गाँव......

लगता है इस साल फिर "बेईमानी "कर गया बादल

79 टिप्‍पणियां:

  1. यही जद्दोजहद है इंसान और जिंदगी के बीच । गजब का चित्र उकेरा है जीवन के सच का ।

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  2. अनुराग जी, नेपथ्य एक तरह से बैक ग्राउंड है। मेरे विचार में जहां फोरग्राउंड होगा वहां बैकग्राउंड भी होगा। लेकिन फोरग्राउंड का मतलब बैक ग्राउंड का अभाव नहीं है। नेपथ्य हर जगह है, बिलकुल सही कहा लेकिन कैमरे का एंगल बदलते ही नेपथ्य भी बदल जाएगा। कोण से ही दृष्टिकोण बदलेगा..। वैसे शानदार विचारणीय पोस्ट.. बधाई

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  3. इतिहास कभी कन्फेस नहीं करता ....YE WAKYA HI APNE AAP ME SAMRIDH HAI ,JIS TARAH SE AAPKI LEKHNI NE AAPKO SAMRIDH BANA RAKHA HAI ASIM KRIPYA HAI LEKHNI KA AAPKE UPAR... AAPKE LEKHAN ME AJIB SI BAAT HOTI HAI JISE BYKT KARNE KE LIYE MERE PAS SHABD NAHI HAI... YE LEKH BHI BAHOT KHUB RAHI...


    ARSH

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  4. आप का कहना सही है............हर सफल या अगर मैं कहूँ किसी भी व्यक्ति के नेपथ्य में कोई न कोई होता है तो अतिशयोक्ति न होगी. किसी न किसी के साथ जी जीवन बढ़ता है, कोई न कोई होता है जो मानसिक, सामाजिक टूर पर संबल बनता है.

    बहुत ही सुन्दर और सार्थक लिखा है

    त्रिवेणी भी खूब है........लाजवाब

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  5. एक आहट ओर उम्मीद की कई आँखे जाग जाती है
    फलक के रास्ते पर कब से बैठा है पूरा गाँव......

    लगता है इस साल फिर hamari kismat dikha gaya badal :)

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  6. चित्त के गाँव को इंजोर कर गया बादल

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  7. उम्मीद की जानी चाहिए कि कांच पे छोड़ी गई बूढ़े के हाथों की छाप मुसाफ़िर के इस सफ़र और ज़िंदगी के बाक़ी के सफ़र में इतिहास को कन्फ़ेस करने लायक़ बना पाएगी। और शायद इतिहास को तय करने की हिम्मत भी देदे !

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  8. ऐसे कितने चेहरे है ..जो बिना अपनी हिस्सेदारी मांगे खामोशी से हमें इतिहास का एक उजला पक्ष दे गये है ..

    बहुत सशक्त अभि्व्यकति.

    रामराम.

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  9. गांधी के पीछे कस्तूरबा .राम के पीछे सीता .लक्ष्मण के पीछे उर्मिला ..बुद्ध . या . विज्ञान का कोई महान ज्ञाता .... ...ऐसे कितने चेहरे है ..जो बिना अपनी हिस्सेदारी मांगे खामोशी से हमें इतिहास का एक उजला पक्ष दे गये है ....क्या नेपथ्य अनिवार्य शर्त है विधान की ......इस नेपथ्य के बिना इतिहास का चेहरा कैसा होता ? वो सोचता है ......पर एक आहट उसे वापस खींचकर वर्तमान में लाती है ...बूढा शीशे पर हाथ टिकाये ट्रेन के भीतर झाकने की कोशिश कर रहा है ....अन्दर कोई उसे भगाने की कोशिश ......ट्रेन चल पड़ी है ...बूढे के हाथो ने जैसे कोई तस्वीर कांच पे छोडी है ...क्या ये भी वर्तमान के नेपथ्य के किसी हिस्से का स्केच है ?
    Adbhut! Chhoti lekin bahut mahatvpurn post.
    Aapne bhi ek Tasveer chhorh di hai net par...

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  10. वर्तमान किसी पीछे बीती बात पर ही टिका है ....बेहतरीन पोस्ट

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  11. एक आहट ओर उम्मीद की कई आँखे जाग जाती है
    फलक के रास्ते पर कब से बैठा है पूरा गाँव......


    Zindagi ke sach ko bahut saral shabdo mai samne la diya hai apne...

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  12. कुछ आरक्षित पन्ने मानो उससे जिरह करते है .अलिखित सा कुछ झांकता है .....
    शायद ये कुछ पीछे छूटे पन्नों का शाश्वत सा सच है....

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  13. एक ही प्रश्न की इस सुन्दर लेखनी के नेपथ्य में कोन है ?

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  14. आपका लेख बहुत अच्छा लगा बधाई...

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  15. ऐसे कई किरदार हमे अपनी ही ज़िंदगी में मिल जाते है.. जो कभी शायद अपना हक भी ना माँगे.. पर ज़िंदगी को अनमोल बना जाते है.. इतिहास कभी कंफेशन नही करता.. और हम उस पर चढ़ चुकी चुने क़ी परत को देखकर ही जीते जाते है.. कोई भी परते कुरेदना नही चाहता.. क्या पता असली रंग बहुत घिनौना हो और पहचाना ही ना जाए..

    त्रिवेणी हमेशा क़ी तरह लाजवाब है..

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  16. सभी कुछ तो कालसापेक्ष है,सब कुछ एक दूसरे से इस प्रकार गुँथा, कि तागों को सुलझा कर देखने से पहले ही पूर्वापर का अनुमान भी केवल कुछ ही लोगों को होता है। कोई-कोई ही सतह से नीचे तल तक देखने जाता है.

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  17. बहुत खूब.. वाकई यह यक्ष प्रश्न है कि- क्या ये भी वर्तमान के नेपथ्य के किसी हिस्से का स्केच है ?

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  18. गांधी के पीछे कस्तूरबा .राम के पीछे सीता .लक्ष्मण के पीछे उर्मिला ..बुद्ध . या . विज्ञान का कोई महान ज्ञाता ...कितना सही लिखा है आपने अनुराग भाई. संवेदना के शिखर पर ले जाते हैं आप.....

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  19. doctor ke baare mein aamfahm ray hoti hai ki wo peshe ke chalte asamvedansheel hote hai...par aapka nepthya ka skech aapke dil-dimag ki spandit-tantu vrind ki numayandgi karta hai.

    aur bhi behtar post ki ummeed mein..aik blogger saathi

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  20. वाह बहुत सुन्दर लिखा है।

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  21. .इतिहास कभी कन्फेस नहीं करता .....hmm..sochati hu.n ki itihaas ka alikhit panna banane ke pahale un sare nepathyo.n ko baar baar dhanyavaad de lu.n जो बिना अपनी हिस्सेदारी मांगे खामोशी से हमें इतिहास का एक उजला पक्ष दे गये है ....vahi pareshani jo meri post me logo ko hui thi ki.. kis ka, kis ka aur kitna zikra kare.n...! unki hisse daari ka pratishat kaise nirdharit kare.n..! umhe variyata kram me sthan kaise de.n.

    fir ek baar bahut sare sketch ban gaye zehan me aap ki post padhane ke baad..!

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  22. भाई अनुराग जी,
    आपकी लेखन शैली और विचार शक्ति का जवाब नहीं. मामूली सी लगने वाली बातों को भी इतनी सुघड़ता से गढ़ देते हैं कि वह स्वतः आकर्षण का केंद्र बन जाती है. नमूना भी पेश है .......

    "पर एक आहट उसे वापस खींचकर वर्तमान में लाती है ...बूढा शीशे पर हाथ टिकाये ट्रेन के भीतर झाकने की कोशिश कर रहा है ....अन्दर कोई उसे भगाने की कोशिश ......ट्रेन चल पड़ी है ...बूढे के हाथो ने जैसे कोई तस्वीर कांच पे छोडी है ...क्या ये भी वर्तमान के नेपथ्य के किसी हिस्से का स्केच है ?"

    ज़ाहिर है डिब्बे में कांच है तो कोच ऐसी ही होगा, अन्दर वाला या तो पैसे वाला या कोई बड़ा तथाकथित बुद्धजीवी
    रहा होगा. अन्दर-बाहर के दोनों व्यक्तियों की वर्तमान मनोदशा.... बाहर वाले वृद्ध व्यक्ति की पाने की या कुछ बताने की या कुछ देने की, पर अन्दर वाले की सिर्फ और सिर्फ एक मनोदशा भागने की. अज्ञात भाव निशान उकेर कर वर्तमान का वह नेपथ्य लिख जाता है जो भविष्य तय करेगा पर ज्ञात भाव कोई निशान नहीं उकेर पाता. किन्तु भविष्य जब अन्दर वाले को वस्तुस्थिति का अहसास कराएगा तो ही यह नेपथ्य सभी को समझ में आएगा या फिर भाई अनुराग जी यदि आपने वृद्ध व्यक्ति से वस्तुस्थिति जानी है तो इस नेपथ्य से आप ही पर्दा उठा सकते हैं............

    चन्द्र मोहन गुप्त

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  23. एक आहट ओर उम्मीद की कई आँखे जाग जाती है
    फलक के रास्ते पर कब से बैठा है पूरा गाँव......

    लगता है इस साल फिर "बेईमानी "कर गया बादल

    waah sunder triveni.

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  24. हमेशा की तरह बेहतरीन पोस्ट और लाजवाब त्रिवेणी ।

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  25. नेपथ्य एक अनिवार्य शर्त है विधान की --शायद हाँ!
    त्रिवेणी लाजवाब है हमेशा की तरह .

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  26. "इस नेपथ्य के बिना इतिहास का चेहरा कैसा होता ?"...
    किसी के लिए खूबसूरत तो किसी के लिए बदसूरत...
    इसीलिए शायद
    'नेपथ्य विधान की अनिवार्य शर्त है'

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  27. सच, इस बार बादल फिर धोखा दे गए। पर बिन आए नहीं, आकर, खड़ी फसल बरबाद हो गई है कई जगह। आपके द्वारा उकेरा दृष्य, पर सच्चा जरूर है।

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  28. वाह डाक्टर साहब वाह !!! क्या बात कही...

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  29. एक आहट ओर उम्मीद की कई आँखे जाग जाती है
    फलक के रास्ते पर कब से बैठा है पूरा गाँव......

    अनुराग जी आपकी लिखने की जो कला है उसके हम कायल हैं बहुत ही बेहतर ढंग से आप बात को निकालते हो शब्‍दों के साथ उचित न्‍याय करते हो
    बेहतरीन

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  30. यह किसने नेपथ्य उठाया - वर्तमान, विधान और इतिहास साफ़ नज़र आये ...

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  31. नेपथ्य के पीछे यदि कोई साथ देने वाला न हो तो शायद मंच पर आसीन व्यक्ति विशेष की अभिव्यक्ति भी पूर्ण सार्थकता नहीं पाती, फिर भी लोंग उन्हें भूल जाते हैं ,उनके प्रयास गौड़ हो जाते हैं ........
    आप उन्हें महत्त्व देते हैं ये आपके लेखन की सार्थकता है .

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  32. इस बार आपने अद्भुत पोस्ट लिखी है...पढ़ कर स्तब्ध कर देने वाली...आप सच में बेमिसाल हैं...
    नीरज

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  33. इतिहास के अनसंग हीरोज और हीरोईन को नमन ! परदे का कारोबार तो नेपथ्य से ही संचालित होने का ही विधान ही रहा है -यह एक understood बात है इसे इतिहास में लिखा ही क्यों जाय ! इतिहास में वह होता है जो रूलर चाहता है ! विजेता नेपथ्य की चर्चा करेगा तो उसका शौर्य -दंभ नहीं पराजित हो जायेगा ? अनुराग भाई यह जानबूझ कर चर्चा छेड़ी है आपने ! बोले तो deliberate !

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  34. जहाँ हर दिन एक दुस्हास है ....and night too.समाज का मेटामोरफोसिस नहीं होता ?its rather degrading day bay day.इतिहास कभी कन्फेस नहीं करता .....पर उसके कुछ आरक्षित पन्ने मानो उससे जिरह करते है not with everyone.for that there will be a vision ,vision like you...ऐसे कितने चेहरे है ..जो बिना अपनी हिस्सेदारी मांगे खामोशी से हमें इतिहास का एक उजला पक्ष दे गये है ....sad but true.some people recognize them ,some not may be its called destiny may be nature ask something in return from those people who are near dear to them.AND LAST
    YOUR TRIVENI "उम्मीद की कई आँखे "superb again.

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  35. ऐसे कितने चेहरे है ..जो बिना अपनी हिस्सेदारी मांगे खामोशी से हमें इतिहास का एक उजला पक्ष दे गये है ....क्या नेपथ्य अनिवार्य शर्त है विधान की ......इस नेपथ्य के बिना इतिहास का चेहरा कैसा होता ?
    एक और अद्भुत आलेख। आपकी रचनाएं सोचने को मजबूर करती हैं।

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  36. शीशे के पार गंध नहीं आती पर वो जानता है हर प्लेटफॉर्म की एक सी गंध होती है .... समाज का मेटामोरफोसिस नहीं होता ?

    बहुत ही मौलिक खयाल.... एक एक सफ़ जैसे कि अलग अलग जीवनीयों के अलग अलग फ़लसफ़े...

    एक डॊक्टर को क्या इतना संवेदनशील होना चाहिये? शायद हां, क्योंकि उसके अंतरंग का प्रकाश ही तमस को भगा सकता है. आज हमें ऐसे ही लोगों से ज़्यादा पाला पड रहा है, जो मुकम्मल डॊक्टर तो है, मगर नीम इन्सान...

    आपके मासूम हंसी में शायद मरीज़ के अच्छे होने का निदान छुपा है.

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  37. डॉ साहेब ,शानदार और निःसंदेह विचारणीय पोस्ट.. इसके लेखन के लिए आपको बधाई.

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  38. नेपथ्य के बिना, जो भी दीखता है वो अधुरा है.
    पर संसार सिर्फ सामने दिखने वाले को हीं सारा क्रडिट देता है.

    हलाँकि,आजकल साउंड इंजिनीयर, और स्क्रिप्ट रायटर को भी अवार्ड मिलते हैं, पर फिर भी कम हीं लोग जान पाते हैं, जैसे यहाँ आपके लेख में इतिहास पढने वाला जान पा रहा है .

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  39. .....!!!!!
    wah
    बादलों का तो स्वभाव ही धोखा है .....................

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  40. शब्द दर शब्द बांध लेते हैं आप........क्या कहूं कुछ और सार्थक बचा ही नहीं कहने को बस आप की भाषा में रंग कर आप की तरह लिखने के लिए लिखे जा रहा हूँ............

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  41. पेशा बदल लीजिये अभी भी वक़्त है :)

    जरूर नेपथ्य ही महत्वपूर्ण हो जाता होगा
    जब अनुराग और कौतुक जुड़ जाता होगा

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  42. शब्दों की इन अजब भंगिमाओं पर आपकी इस एकछत्र "तानाशाही" को सलाम डाक्टर साब...

    त्रिवेणी में बादल की बेइमानी का जिक्र मोह गया मन

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  43. एक आहट ओर उम्मीद की कई आँखे जाग जाती है
    फलक के रास्ते पर कब से बैठा है पूरा गाँव......
    जिन्दगी इसी का नाम है....
    पता नही कोन किस रुप मै मिल जाये.
    धन्यवाद

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  44. आपकी लिखी पोस्ट को पढकर लगता है जैसे कोई जिदंग़ी ही पढ ली हो। हमेशा की तरह बेहतरीन और सुन्दर।
    ऐसे कितने चेहरे है ..जो बिना अपनी हिस्सेदारी मांगे खामोशी से हमें इतिहास का एक उजला पक्ष दे गये है .
    जी बिल्कुल सही कहा। ये मैंने भी महसूस किया है। और आपकी त्रिवेणी तो बहुत ही उम्दा होती है। पर इस बार की त्रिवेणी पढकर वो खेत नजर आने लगे जिनको बारिश ने जमीन पर लेटा दिया है और किसान के चेहरे पर चिंता की एक लकीर आ चुकी है। रविवार को गाँव गया था जब देखा।

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  45. ऐसे कितने चेहरे है ..जो बिना अपनी हिस्सेदारी मांगे खामोशी से हमें इतिहास का एक उजला पक्ष दे गये है इस स्तब्ध कर देने वाली संवेदनशीलता के नेपथ्य में कौन है यह कौन बतायेगा? कब बतायेगा?

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  46. बूढा शीशे पर हाथ टिकाये ट्रेन के भीतर झाकने की कोशिश कर रहा है ....अन्दर कोई उसे भगाने की कोशिश
    यही तो आज की हकीकत है...
    सुंदर लेख से परिचय करने के लिए बधाई...
    मीत

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  47. समाज का मेटामोरफोसिस नहीं होता ?,.इतिहास कभी कन्फेस नहीं करता ...आपके सूत्र -वाक्य गहरी व्याख्या के सिरे छोड़ते है ,इनको पढ़ कर आचार्य रामचंद्र शुक्ल के निबन्धों में उल्लेखित सूत्र -वाक्य याद आते है .

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  48. स्केच बना है या आईना दिखा है... बहुत खुब..

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  49. नेपथ्य की शक्ति के बूते ही संसार चल रहा है.एक गंभीर विषय को रोचक तरीके से सुन्दर शैली में प्रस्तुत करने के लिए साधुवाद.

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  50. मुझे तो चित्र अब कहीं अधिक पसन्द आने लगे हैं. लेख से कहीं अधिक कह जाते हैं. पहेली की तरह उत्तर खोजते रहिये. कहीं दूर ले जाते हैं ये चित्र.

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  51. "सत्ता" इतिहास को भी
    अपनी बोली बोलने पर मजबूर कर देती है
    ..और हाशिये पर ठहरे इन्सान शीशे के पार देखते रह जाते हैँ :-(
    -
    सँवेदना सँसार यूँ ही बनाये रखियेगा .
    .इसी तरा लिखते रहियेगा
    - लावण्या

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  52. आपने बड़े गंभीर मूड में ये पोस्ट लिखी है!किसी गहरी सोच में डूबकर....ऐसा लगता है!त्रिवेणी पढ़कर वो लाइने याद आ गयी-
    बरसात का बादल तो आवारा है क्या जाने
    किस मोड़ पे रुकना है, किस छत पे बरसना है

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  53. आपकी बात सचमुच दिल से ही निकलती है। शायद इसीलिए लोग पसंद भी करते हैं।

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  54. bahoot achha bas yahi likh pati hu or trivani bhi bahoot achhi ha par sahyd badal dokha nahi dete bas vo to apna kam karte or sab ki tarah............

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  55. anuraag ji पिछली पाँच पोस्ट मैं सर्वश्रेष्ठ पोस्ट है ये आपकी....आपकी लेखनी पर दिलो जान से फिदा हम ,खुदा बुरी नजर से बचाए आपको यूँ ही लिखते रहें....एक बात ....पहचान से कतराना अंधे होने की निशानी है ...आँखे हैं तो लक्षणों को समझना ही होगा ...इतिहास गवाही देगा जरूर....आमीन

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  56. ऐसे कितने चेहरे है ..जो बिना अपनी हिस्सेदारी मांगे खामोशी से हमें इतिहास का एक उजला पक्ष दे गये है ...
    great!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!1

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  57. समाज का मेटामोरफोसिस नहीं होता ?,.इतिहास कभी कन्फेस नहीं करता ...

    सच है, इतिहास में तो बस वही दर्ज होता है जो उजला है, स्याह तो सब कहीं दफन कर दिया जाता है। पर फिर भी कहीं उम्मीद है समाज भी बदलता है पर वो बदलाव इतना धीमा होता है जहां कई जिन्दगियां गुजर जाती हैं।

    त्रिवेणी हमेशा की तरह लाजवाब है

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  58. हर इक लाईन....हर इक शब्द लाज़वाब कर गया इस बार......मगर साढ़ ही कई सवाल भी अनुतरित्त छोड़ गया हम सबके ही लिए....जीवन का सच बड़ा मार्मिक है....है ना.....मगर जीवन में सच बचा भी रहे....और जीवन मार्मिक भी ना बने....ऐसी ही हम सबकी चेष्टा होनी चाहिए....हैं ना.....आपने जिन शब्दों में इस मार्मिकता को उकेरा...वो शाद तो वही आम से थे....मगर आज जैसे उनका अर्थ ही बदल गया था जैसे....सच....आज आपको बहुत-बहुत बधाई........!!यूँ ही लिखते रहें.....दिल को बड़ा सुकून मिलता है....!!

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  59. एक आहट ओर उम्मीद की कई आँखे जाग जाती है
    फलक के रास्ते पर कब से बैठा है पूरा गाँव......
    लगता है इस साल फिर "बेईमानी "कर गया बादल


    कौन भर पाया मुट्ठी में बादल को
    आज यहाँ कल कहीं और बरसेगा
    रेगिस्तान की तपती रेत को
    यूँ ही प्यासी छोड़ जायेगा ....!!

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  60. लेख पढ़कर खुद को टिपण्णी के लायक नहीं पा रहा हूँ . एक महान रचनाकार का evolution होता दिखाई दे रहा है. मानव "जीवन" की बारीक समझ रखने वाला शख्स ही ऐसे भावों को उकेर सकता है.

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  61. अरे, इसी बीच दो बेहतरीन पोस्ट ?
    दोनों एक दूसरे को मात देने के फ़िराक़ में ?
    चँद पँक्तियों में जैसे पूरा जीवन दर्शन समाया है..
    निश्चय ही नेपथ्य एक अदृश्य स्लेट है, विधाता या प्रकृति के हाथों में..
    शाश्वत समय के स्लेट पर बनती और पोंछ दी जाती रेखायें एक अनिवार्य शर्त है, जीवन की !
    बिना किसी आग्रह के इतिहास में उज़ाला करने वालों ने कभी अपनी हिस्सेदारी माँगी या पूछी भी नहीं !

    कंज़ूस शब्दों में भी एक नावलेट का एहसास दिला रही है, यह पोस्ट !
    पढ़ कर आज का दिन सार्थक हुआ सा लगता है, अ पेनेट्रेटिंग आब्ज़र्वेशन... जस्ट अदर दैन बेहतरीन !

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  62. अब तक जैसे अंदर तक गोद रहा है , यह अस्फुट चिंतन !
    वाह तो नहीं बल्कि आह निकल रही है, दिल से !

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  63. what is nepathaya, I know pathya but I got no clue about nepathaya

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  64. I think, I have figured it out. I think it means shadow. But, probably there is one point which could be argued upon " samaj ka metamorphosis" I think hota hai, as it also changes faces and features. Indian samaj jo aaj hai, wo das saal pehle nahin the, so froth, so on..

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  65. kaha jaata hai ki kisi imarat ko jitna uncha banana ho utna hi use jamin ke ander gadna padta hai ... kya pata jo itihaas dikh raha hai .... uske piche bhi na jaane kitne chahre honge!!! shayad hamare aas paas jinda bhi ho abhi !! vo bhi kya pata???

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  66. Bade dinon baad tippanee denekee himmat juta payi hun...70 ke baad, naya to kya kahungi...wo qabiliyat nahee ye baat to kayi baar qubool kar chukee hun...
    Aur gar kaheen koyi khata huee ho to maafeebhi chahti hun....aaj yaa uske pehlebhi..

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  67. Apni ek chhoti-si kavita aapko arpit kar sakti hun?
    Mujhe nahee maloom ke ye aapko jurrat lagegee ya nahee...!

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  68. Saturday, April 4, 2009
    भटकी हुई बदरी....
    हूँ भटकती हुई एक बदरी,
    अपनेही बंद आसमानोंकी,
    जिसे बरसनेकी इजाज़त नही....

    वैसेतो मुझमे, नीरभी नही,
    बिजुरीभी नही,युगोंसे हूँ सूखी,
    पीछे छुपा कोई चांदभी नही....

    चाहत एक बूँद नूरकी,
    आदी हूँ अन्धेरोंकी,फिरभी,
    सदियोंसे वो मिली नही....

    के मै हूँ भटकी हुई एक बदरी,
    अपनेही बंद आसमानोंकी....
    मेरे लिए तमन्नाएँ लाज़िम नही....

    शमा।

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  69. I hav posted 3-4 post after I miss you post but aapke blog pe update hi nahi ho rahi hai ? na jane kya karan :-(

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  70. इतने दि‍नों बाद पढ़ रहा हूँ ब्‍लॉग। हमेशा की तरह वि‍चार और भावनाओं का अच्‍छी संगत।

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  71. बूढा शीशे पर हाथ टिकाये ट्रेन के भीतर झाकने की कोशिश कर रहा है ....अन्दर कोई उसे भगाने की कोशिश ......ट्रेन चल पड़ी है ...बूढे के हाथो ने जैसे कोई तस्वीर कांच पे छोडी है ...

    बहुत अच्छा लिखा, अंतिम त्रिवेणी में मज़ा आ गया....

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  72. शाम गुज़री है बहुत पास से होकर लेकिन
    सर पे मंडलाती हुई रात से जी डरता है

    सर चढ़े दिन की इसी बात से जी डरता है

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  73. Aap behad wyast rehte hain..mujhe nahee pata ki, itnee tippaniyon ke baad meree tippanee nazarbhi aayegi yaa nahi...!
    Is baarkee triveni mujhe mere Dadajiki yaad dila gayee...
    Hamara zila aksar sookha grast rehta..aur barishke mausam me Dada-dadee, aasmaanki or taktaki lagaye baith jaate....tatha aisehee alfaaz,udaas, umasbhari, khamoshime mere kanope takra jaate..."Fatima,(meree Daadiammaka naam) lagta is saalbhi apnee fasalke naseeb sookhe hain...is saalbhi abr aayenge aur unhen tez hawayen uda le jayengi..."
    Ek ijazat lene aayee hun...iltija hai,kya is triveni ko mai apne "Kavita" blogpe, aapkehi naamse copy,paste karke daal sakti hoon?
    Jawab de sake to shukrguzaar rahungi...gar aapki naheebhi ichha ho to koyi baat nahee...mujhe qatayi bura nahee lagega...

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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