2009-05-10

इनडिफाईनेबेल उर्फ़ अपरिभाषित उर्फ़ " मिस्कास्टिंग" का एक ओर दिन


जिंदगी कोई "हिचकॉक" की फिल्म नहीं है जहाँ संस्पेंस मुख्य पात्र है ..न ही मनमोहन देसाई का "खोया -पाया" फार्मूला ..इसका अधिकतर फुटेज स्टीरियो टाइप ही है ...कलात्मक सिनेमा संस्करण की बची खुची उम्मीद शर्मा जैसे "मिसकास्ट" लोग सुबह सुबह तोड़ते है ....भंगन की लड़की जींस पहनकर कर सड़क पे झाडू लगा रही है ...मिसेस शरमा मुंह फाड़े गेट पे कोहनी टिकाये "संस्क्रति" की ऐसी तेसी होते देख रहे है .....शर्मा जी" प्रगतिशीलता के इस लिबास पे " बख्त ख़राब है "का अपना पेटेंट बोर्ड टाँगे खड़े है.......सड़क पे पड़े दो कागजो के टुकड़े देखकर ये हफ्ते में दो बार कामचोरी पे "गोल मेज सम्मलेन" बुलवा लेते है ..पर महीने के पहले हफ्ते ... शर्मा जी के पास जब कालोनी का चौकीदार डेड सौ रुपये लेने पहुंचेगा .तो उसे दस मिनट गेट पे खडा करने के बाद ये अपने पजामे में से सौ रुपये निकल कर कहेंगे" हमारे पास तो इतने ही है जी "....फिर हो हो करके हँसेंगे ...ऐसे में मन करता है शाप दे दूँ ....पुराना बख्त ठीक था जहाँ मूड ऑफ़ हुआ ...शाप दे दिया .सुना है ऋषि दुर्वासा इसके सबसे बड़े शेयर होल्डर थे ....तभी इन्द्र हलकान हुए रहते थे ...वैसे इन्द्र का सिहांसन जरूर किसी खुन्नस खाये बढ़ई ने बनाया था जो बात बात पे डोलता था .... .
ऐसे में किसी 'डिफरेंट "सुबह की उम्मीद करना बेमानी है ….तो गोया हम भी काम पे निकलने से पहले अपने मुखौटे की झाड़ पोंछ करते है .उसके नट -बोल्ट कसते है …. इस सदी के ….हर आदमी के पास अपना अपना मुखौटा है ...पहनने को.... मजाल जो .किसी की . असली सूरत दिखे ..कुछ मुखोटो में अप- ग्रेड होने की सुविधा भी है ..तो ...उसी रास्ते की .उसी सड़क के ..उसी चौराहइ पे आप रेड लाईट पे रूककर रेडियो के कान उमेठते है ... ट्रेफिक न हुआ कोई" रिले -रेस" हो गयी .जिसे देखो दौड़ रिया है.....आगे लाल स्कूटी पे बैठी लड़की ने सबकी आँखों की एक्स रे मशीन ऑन कर दी है ..एक साहबजादे अपनी मोटरसाइकिल पे ऐसे लटक हुए है मानो ,अलग अलग एंगलो से कोई स्क्रीन टेस्ट ले रहे हो ...ओर ..मोड़ पे खड़े पुलिस वाले अपनी मोटी तोंद ओर लटकी बेल्ट के साथ सी टी स्केन कर रिये है........ये चरित्र प्रमाण- पत्र हर महीने मे रिवियु होने चाहिए ...........वैसे गर हर लड़की के हाथ मे एक बंदूक दे दी जाये के घूर कर देखने वाले को .....धाँय... धांय …...
रूटीन कितना बोरिंग है ना ……अधजगा लिफ्टमेन .जिसकी वर्दी से गंध के भभके छूटते है ..आप निसंकोच शर्त लगा सकते है इसे जरूर फंगल इन्फेक्शन होगा.... ...पान मसाला से रंगे दातो को चमकाता ऑफिस का चपरासी बहादुर .या रामू .....आप का मन करता है ऑफिस के बीच गलियारे में खड़े होकर बॉस को गली देसाले “….सारा स्टाफ ब्रेवो कहकर खड़े होकर ताली बजायेपर मुखौटे के पीछे से आप स्वर में मिश्री की तीन क्यूब मिला कर गुड मोर्निंग सर कहकर अपने अन्दर के इंकलाबी को समझौता परस्त बनाते है ... शुक्र है अपने साथ कोई बॉस का लफडा नहीं है
.....क्लीनिक पहुँचता हूँ....पिछले एक हफ्ते से मेडिकल -स्टोर वाला किसी दूर दराज वाले गंवई बूढे की फ़िक्र में है . ….इशारों इशारो में वो रोज उसकी आमद की तारीख पूछना चाह रहा है .....रिसेप्शिनिस्ट उसकी चिंता का असल कारण बताती है ……उसे 235 रुपियो की फ़िक्र है …जो उसने दवायों पे उधार के छोड़े थे ....
पहले मरीज एक साहब है .. जिनके भीतर का बुद्दिजीवी केवल पी कर जागता है....कोकेटेलो पे वे कल्चरल क्रान्ति के कई विशुद्ध चिंतको का जमावडा करते है ..ओर रात भर बहसियाते है.... ....पर अफ़सोस अल्कोहल से इन्हें एलर्जी है ......बुद्दिजीवी को ये देश हित में जरूरी मानते है ...इसलिए एक पखवाडे हमारी सेवा ले लेते है ....यूँ तो मै इन्टेलेकच्युँलो की मै बहुत इज्ज़त करता हूँ पर ज्यादा इज्ज़त देने से कभी कभी वे बहुत बोर करते है...
दोपहर का लंच ब्रेक .......गंवई बूढा अपने साथ कच्चे आम की बोरी दूर से ढोकर लाया है...डॉ साहब के आम के अचार के वास्ते ..... सामने एक बोरी मेडिकल स्टोर पे भी पड़ी है......अपुन को इदरीच ही रहने होगा ..... इसी स्टेरियो टाइप लाइफ में.....कच्चे आम की खुशबु गाडी में फ़ैल गयी है.....किसी की लाइफ में अपुन भी तो मिसकास्ट होगा ......



आपको याद है वो जिन ….जो चिराग के घिसने पे प्रकट होकर कहता था .क्या हुक्म है मेरे आका “.क्या .मस्त जिन था ना ?कुछ आईडिया ,आजकल किधर ?
fikirfikir

87 टिप्‍पणियां:

  1. डॉ साहेब.. यही है कतरा कतरा जिन्दगी... जगजीत सिहं की एक गजल याद आ गई.. इतने हिस्सों में बंट गया हुँ मैं, मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं.."

    पता नहीं कहीं ्ये लाईन भी मिसफिट नहीं हो गई हो?..:)

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  2. क्या खींच कर थप्पड़ मारा है आपने दुनिया को.. मिसेज शर्मा जैसी औरते इन्ही फिक्रो में अपना बी पी बढाये हुए है अपनी बीमारी को फोन पर और भी मसालेदार बताती होगी..

    वैसे अगर घूरने वाले पर गोलिया चलने लगी तो 1000 पुरुषों पे 900 औरतो का जो आंकडा है वो 900 औरतो पे 90 आदमियों का बचेगा..

    आम की टोकरी तो लाएगा ही.. बेचारा आम आदमी जो है..

    पोस्ट के बीच बीच में लिखी बोल्ड लाइंस, क्लीन बोल्ड कर देती है.. एक और शानदार पोस्ट आपके खाते में...

    अरे हा जिन्न बेचारा किसी जिन की खाली बोतल में पड़ा स्लिप डिस्क का इलाज करवा रहा है.. पहले लोगो की इच्छाए कम होती थी तो पूरी कर देता था.. अब इच्छाए इतनी बढ़ गयी कि बेचारे की कमर ही टूट गयी.. देखे! कभी मिला तो बताएँगे कहा है आजकल ?

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  3. बहुत दिनों बाद एक मस्त पोस्ट...कहाँ रहते हैं डाक्टर साहेब...आपने पाठकों के सब्र का अब इतना भी इम्तिहान मत लिया कीजिये...चलिए रोज़ न सही हफ्ते बाद तो आ ही जाया कीजिये...
    क्या लिखा है आपने इस बार...वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह वाह ..... एक दम नयी स्टाईल और धाँसू विषय...आप के नाम का जयकारा लगाने का मन कर रहा है...लगा दूं..." बोल डाक्टर अनुराग की.....जय"
    नीरज

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  4. abhi kuch likhna hi chahta tha ki Ranjan bhai saheb ne comment kar mujeh murli ki "dusra" bannne par majboor kar diya. humne bhi samjhouta kar liya. misfit ho gaya. anyway...

    yeh jo aap likhte hai naa ek film ki tareh lagti hai. Raw meterial ke baad editing table sa blog hai. Shaap dene wali baat mere sath bhi hai.

    Red scooter wali se Shard Joshi ka khyal aaya "jo bhi aankhon mein thori bahut jot bachi hai ehne niharne se hi hai"...

    haan maine reference diya hai warna ab sahitya mein yeh ranniti bhi hai ki sandarbh do magar naam nikal do.

    Shukriya Anurag Ji,

    Saagar

    Creative writing ka behatareen namuna. bikhari yaadein jaise kabhi university ke campus se gujro notes dene aur ukiliptus se chuti hue hawayen le jaye woh sare safhe...

    manodsha ho yaa ehsaas. woh bhi dotarfa. andaz-e-bayan aacha hai.

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  5. कच्‍चे आम की खुशबू कुछ हम तक भी पहुंच रही है।

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  6. किसी दिन ये मुखौटा उतर गया तो कई दोस्त दुश्मन बन जायेंगे हुज़ूर.....! और हम पूरी दुनिया के लिये मिसकास्ट....!

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  7. आज इस बन्दूक पर हमारा दिल आ गया...बस परमिशन मिल जाए ऐसे धांय से मारने की तो इन घूरने वालों की आँखें सुधर जायेंगी. ये चिराग मिल जाए तो कुछ दिन इस्तेमाल करके भाड़े पर दीजियेगा...कतार में हम सबसे पहले खड़े हैं.

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  8. मेरी तो हंसी ही नहीं रुक रही है...हंस हंस के लोटपोट हो गयी...माफ करिएगा...अगर अच्छा नहीं लगे...पर क्या करुं...दुनिया को देखते-बूझते इतनी आदत सी हो गयी है...सिवाए हंसी के कोई प्रतिक्रिया ही नहीं आती...!!

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  9. सभी मुखोटे पहने हुए घूम रहे हैं जी यहाँ ..बेहतरीन पोस्ट बहुत कुछ कह रही है यह ..

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  10. Chehro ki peeche cheepe chehro ko kya khub andaaz mai apne samne la diya hai...maza aa gaya...

    behtreen post...

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  11. जय हो
    जिन्न तो ज़िन में घुस गये डाक्टर साहब
    आपका बेलाग (ब्लाग नहीं) लेखन धारा सा फिसलता है.... साधुवाद.

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  12. शुक्र है कि जनाब आये तो ....!!
    अभी पिछली पोस्ट भी सूनी है ...!!

    पहले तो तस्वीर के भूतों को देख कर ही दिल बैठ गया .....और उसके बाद आपकी ये पोस्ट ......

    जिंदगी कोई "हिचकॉक" की फिल्म नहीं है जहाँ संस्पेंस मुख्य पात्र है ..न ही मनमोहन देसाई का "खोया -पाया" फार्मूला ..इसका अधिकतर फुटेज स्टीरियो टाइप ही है ...कलात्मक सिनेमा संस्करण की बची खुची उम्मीद शर्मा जैसे "मिसकास्ट" लोग सुबह सुबह तोड़ते है ....

    ...............!!!!!????????!!!!!!

    ....पुराना बख्त ठीक था जहाँ मूड ऑफ़ हुआ ...शाप दे दिया .सुना है ऋषि दुर्वासा इसके सबसे बड़े शेयर होल्डर थे ....तभी इन्द्र हलकान हुए रहते थे ...वैसे इन्द्र का सिहांसन जरूर किसी खुन्नस खाये बढ़ई ने बनाया था जो बात बात पे डोलता था .... .

    हैरान हूँ आपको किस बढ़ई ने बनाया.......???

    आप निसंकोच शर्त लगा सकते है इसे जरूर फंगल इन्फेक्शन होगा.... ...पान मसाला से रंगे दातो को चमकाता ऑफिस का चपरासी बहादुर .या रामू .....आप का मन करता है ऑफिस के बीच गलियारे में खड़े होकर बॉस को गली दे “साले “….सारा स्टाफ ब्रेवो कहकर खड़े होकर ताली बजाये …

    फंगल इन्फेक्शन ....हा...हा...हा....!!!

    पर मुखौटे के पीछे से आप स्वर में मिश्री की तीन क्यूब मिला कर गुड मोर्निंग सर कहकर अपने अन्दर के इंकलाबी को समझौता परस्त बनाते है ... शुक्र है अपने साथ कोई बॉस का लफडा नहीं है ......

    सच कहूँ ....?? अपना कोई मुखौटा नहीं ....और इसी मुखौटे से आपको नमन....!!

    सामने एक बोरी मेडिकल स्टोर पे भी पड़ी है......अपुन को इदरीच ही रहने होगा ..... इसी स्टेरियो टाइप लाइफ में.....कच्चे आम की खुशबु गाडी में फ़ैल गयी है.....किसी की लाइफ में अपुन भी तो मिसकास्ट होगा ......

    मैंने भी आचार डाला है आज ही ....!!

    लाजवाब पोस्ट ......!!!!

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  13. आपको याद है वो जिन ….जो चिराग के घिसने पे प्रकट होकर कहता था .क्या हुक्म है मेरे आका “.क्या .मस्त जिन था ना ?कुछ आईडिया ,आजकल किधर ?
    "kash vo jinn ek baar mil jaye..... bhut hi sanjida aalekh aabhar jindgi ke anek rango se prichy krane ka"

    regards

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  14. जिंदगी कोई "हिचकॉक" की फिल्म नहीं है ...magar suspense jarur hai tabhi to hum jiye jate hai or zindgee pe hi ahsan kiye jate hai.yeh sahi baat hai ki 'डिफरेंट "सुबह की उम्मीद करना बेमानी है subh hoti hai sham hoti hai zindgee yuhi tmam hotee hai...hum sab kahi na kahi kabhi na kabhi makhota pahan lete hai...or apna chehra bhi ayne me nahi dekh pate.apni life me hi miscaste ho jate hai....wonderful post....

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  15. apki post to h hi kamal bahoot achha likha apne or chehra ke mukhote to etne jayada h ki us ensaan ko bhi yad nahi ki asli konsa h, or shyad jinn bhi kahi mukhoto m betha h kahi mile to milvaiyga yahi par ........

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  16. आज कल आपने लिखना जैसे की कम कर दिया है.....हफ्ते भर में रोज़ आके देखा की कुछ लिखा है आपने या नही .... लगा की मेरठ में भी गर्मी बढ़ गई है ...तभी आप ठंडी हवा का ज़ायक़ा लेने कही चले गये होंगे...... पर आज आपका लिखा पढ़के लगा की गर्मी ने सिर्फ़ लोगो को नही आपकी कलम को भी छुआ है ..

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  17. यूँ तो मै इन्टेलेकच्युँलो की मै बहुत इज्ज़त करता हूँ पर ज्यादा इज्ज़त देने से कभी कभी वे बहुत बोर करते है...
    ***********

    वैसे आप कोई कम इंटेलैक्चुअल हैं क्या !

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  18. अगर इस दुनिया में ऐसे पात्र न होते तो डाक्टर साहब,आप की कलम से ऐसे सुन्दर चरित्र चित्रण कैसे होते??

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  19. Amazing picture to go with the title of your article ..
    but again .. where's my dose of Triveni?

    :-)

    RC

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  20. बहुत ही उम्दा पोस्ट ,मज़ा आ गया .आपकी शैली -एकदम अनूठी -एकदम अलग .

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  21. मुखोटे उतारने का अंदाज़ हमेशा की तरह निराला!
    एक ही धाएँ में दुनिया खलास!
    धाएँ! धाएँ!

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  22. .पुराना बख्त ठीक था जहाँ मूड ऑफ़ हुआ ...शाप दे दिया .सुना है ऋषि दुर्वासा इसके सबसे बड़े शेयर होल्डर थे ....तभी इन्द्र हलकान हुए रहते थे ...वैसे इन्द्र का सिहांसन जरूर किसी खुन्नस खाये बढ़ई ने बनाया था जो बात बात पे डोलता था .... .
    ऐसे में किसी 'डिफरेंट "सुबह की उम्मीद करना बेमानी है ….

    वाकई बहुत ही धरातल पर टिकी पोस्ट, जिससे रोज रुबरु होना पडता है. बहुत शुभकामनाएं.

    आपको याद है वो जिन ….जो चिराग के घिसने पे प्रकट होकर कहता था .क्या हुक्म है मेरे आका “.क्या .मस्त जिन था ना ?कुछ आईडिया ,आजकल किधर ?हां हमको पता है उसका..पर मुफ़्त मे क्यों किसी का पता बतायें..जबरन बिचारे के पीछे ये जिंदा भूत पड जायेंगे.

    रामराम.

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  23. ...वैसे गर हर लड़की के हाथ मे एक बंदूक दे दी जाये के घूर कर देखने वाले को .....धाँय... धांय …...
    एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेट हैं लोग...
    उम्दा लेख...
    मीत

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  24. वाह!

    एक-दो लाइन कोट करने का क्या फायदा. पूरी पोस्ट ही याद रहने लायक है. डॉक्टर अनुराग हमेशा याद रहते हैं. हमेशा याद रहेंगे.

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  25. अनुराग जी मुखोटो की इस दुनिया इंसानी चेहरा ढूढना बडा ही मुश्किल हो गया है। अगर कही जिन भी मिल जाए तो वो भी कहेगे कि यार कोई और काम हो तो वो बताओ ये काम तो मेरे से नही होगा। और हाँ मैं भी कहूँ कि ये कच्चे आम की खूश्बू क्यों आ रही है पोस्ट से भी।

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  26. अनुराग जी
    आपकी कलम के तो हम कायल हैं ही..........आपकी दुनियादारी की सोच भी लाजवाब है..............सो काल्ड समाज को आइना दिखलाने में कोई कसार नहीं छोड़ी है आपने..............लाजवाब

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  27. वाकई कई बार तो इच्छा होती है कि बैंड बजा दी जाये पर अपनी मजबूरी के कारण चुप बैठना पड़ता है।

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  28. आपका हास्य बोध भी आपके गंभीरता की तरह है मुझे याद है जब आपने ब्लॉग लिखना शुरू किया था तो ऐसी ही पोस्ट लिखा करते थे .
    ऋषि दुर्वासा !
    बख्त ख़राब है का पेटेंट बोर्ड !
    इन्द्र का सिहाशन !
    अप ग्रेड मुखोटे !
    ओर आखिरी पंच लाइन
    .".किसी की लाइफ में अपुन भी तो मिसकास्ट होगा ......"

    इसे कहते है धांय धांय पोस्ट

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  29. चिराग का जिन्न आज भी सेवा करने को तैयार है लेकिन पहले मेवा की शर्त पर ....... तो क्या हुक्म है मेरे आका

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  30. अनुराग जी, आपके नए- नए प्रयोग बेहद दिलचस्प होते हैं, आपकी त्रिवेणी काफी संजीदा. मैं बहुत बार कमेन्ट नहीं करता, क्यूंकि सब लिखा जा चुका होता है. और फिर इतने सरे फैन्स हैं जो इतना कुछ लिख देते हैं कि एक आध कमेन्ट दब भी जाए तो मेरे ख्याल से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता होगा. आश्चर्य होता है कि एक डॉक्टर इतना अच्छा राईटर भी है, कमाल है ! खैर, मेरे इस स्वीकारोक्ति को सकारात्मकता से लीजियेगा और मैं करून न करून, आप जरूर टिपण्णी करते रहें, क्यूँ कि आप करते हैं तो लगता है कि जरूर कुछ अच्छा होगा कविता में. और हाँ, अच्छा लगे तभी करें, नाहक में करके परेशान न होवें. और दुआ है कि देनेवाला आपकी लेखनी में जोर देता रहे. शुक्रिया.

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  31. हा हा हा डाक्‍टर साहब बहुत खूब

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  32. आप का मन करता है ऑफिस के बीच गलियारे में खड़े होकर बॉस को गली दे “साले “…

    .... कभी कभी तो मन ऐसा ही करता है साहब... पर......


    जानदार पोस्ट हमेशा की तरह... आपने तो हमें अपना मुरीद बना लिया है.

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  33. शुक्र है अपने साथ कोई बॉस का लफडा नहीं है , सच है हमारे साथ भी एसा कोई लफडा नही है ।

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  34. आप कह सकते हैं ,मैं कोई ऐसा वैसा ब्लाँगर नहीं कि लोग मुझे पढ़े ना, इतना ही नहीं पढ़ने के बाद सोचे कि क्या खूब मंथन किया है फिर हम सब ब्लागर कहें ड़ा. अनुराग के कलम को ही मत देखो उसकी धार को भी देखो .....

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  35. अनुराग बाबू आपने जिस तरह से समाज के हर पहलू के गन्दगी को उभारा है वो काबिले तारीफ़ है... लोग अगर सोचे तो बहोत खुछ है आपके इस लेख में ,क्या कमाल की लेखनी चली है मजा आगया,शर्मा जी ,रामू,स्कूटी,गोली,तोंद वाले पुलिस ,ट्राफिक सब कुछ कितने करीने से आपने सजाया है ब्यंगा के रूप में ... ढेरो बधाई ...

    अर्श

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  36. वाह, डॉ. अनुराग ,भाई हम तो आपकी लेखन-शैली के कायल हो गए ... क्या लिखते हैं आप ? मेरे पास आपकी तारीफ़ के शब्द ही नहीं हैं .

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  37. जिन को लगा होगा कि वो इस डबल स्टॅंडर्ड वाली
    दुनिया मे मिस्कास्ट है सो बोतल मे रहना ही
    बेहतर है..... वैसे भी अब कोई सस्पेंस तो है नही
    जिसे सुलझाने बोतल से बाहर आना पड़े...भले ही
    अंदर पड़े पड़े स्लिप डिस्क हो जाए पर रहूँगा तो यहीं ...
    सो कोई वर्दी मे घूरे या बिना वर्दी के ...क्या फ़र्क पड़ता
    है ......ये है यंगीस्तान मेरी जान .....

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  38. क्या बात कही है आपने। एकदम आईना दिखा दिया है। यही दुनिया है जो दोहरे जीवन को जीती है।

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  39. दिल से निकली है ये बात तो दूर तलक जायेगी ..मिस्कास्ट हुए तो क्या हुआ, कास्ट तो हुए ना ! अजी, जम के लिखते रहीये यूँ ही ..हमेँ पढकर बहुत मज़ा आया ..ना जाने कितने पात्र सजीव हो उठे ..हिचकोक की नहीँ तो राम गोपाल वर्मा की फिल्म ही सही ..जहाँ बीग - बी भी डटे हुए हैँ लाइफ मेँ कुच्च तो होना डाग्डर बाबू ..जीते रहो ..खुश रहो ..
    - लावण्या

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  40. बहुत खूब... किसी जमाने ज़हर वाली सुइयों की बेल्ट लगाकर घूमने का सपना देखते थे..बुरी नज़र वाले पर बिना आवाज़ सुई का निशाना... सुई अन्दर जान बाहर..

    बिना मुखोटे जीने का कोई उपाय है ????

    आपका लेखन हमेशा से ही प्रभावित करता रहा है..

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  41. ज़िन्दगी की विद्रूपताओं, नकलीपन,एकरसता और इन सब के साथ हर वक़्त तारी ऊब को लेकर शब्दों का बेहतरीन कोलाज

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  42. सच कह रहे हैं डाक्साब वाकई लाईफ़ मोनोटोनस हो गई है और मुखौटो के पीछे के चेहरे…………….……………उफ़ दिमाग खराब हो जाता है जब लाल स्कूटी पर बैठी लडकी और उस्के पीछे के लोगो की शुरू होती एक्स-रे…………………चौकीदार को जेब से सौ रूपये निकाल कर हमारे पास तो इतने ही है कह्ते लोग,सड़क झाडती लडती और उसे घूरते भद्रपुरूष… इक बार मे ही सब को नं……………………। छोडो सब को आप तो कच्चे आमो की खुश्बू लिजिये कुछ दिनो बाद मिट्टी की सोंधी खुश्बू उडेगी फ़िर देखेंगे किस का आनंद लेना है।बहुत सही विश्लेषण एकदम डाक्टरी परिक्षण कर डाला आपने ।

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  43. ये चरित्र प्रमाण- पत्र हर ६ महीने मे रिवियु होने चाहिए ...........वैसे गर हर लड़की के हाथ मे एक बंदूक दे दी जाये के घूर कर देखने वाले को .....धाँय... धांय …...

    kaash aisa hota...duniya ki thodi bahut safayi ho jaati...aur phir har ladka kisi ladki ki taraf nazar uthhane se pehle hazaar baar sochta... :D

    par sir aapki trivenis ki kami si aajkal aapki posts mein....post ke baad agar triveni bhi paddne ko mile tou wo aisa hoga jaise kisi baddiya dinner ke baad sweet dish. :D

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  44. .यूँ तो मै इन्टेलेकच्युँलो की मै बहुत इज्ज़त करता हूँ पर ज्यादा इज्ज़त देने से...

    एक समय था जब मैं नियमितर रूप से कुछ बुद्धिजीवीयों की सेवा में उपस्थित हुआ करता था। तब खूब आइडिया मिलते। दिमाग भोजन मिलता रहता। बाद में व्‍यस्‍तता बढ़ी तो जाने की आवृति और बैठने का समय कम हुआ। तो भोजन मिलने की मात्रा भी कम हो गई। मैंने एक बुद्धिजीवी को बताया कि यह समस्‍या है तो वे बोले बिना इन्‍वेस्‍ट किए इस क्षेत्र में कम हासिल होता है। यहां समय ही है जिसे निवेश किया जा सकता है।

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  45. bhiyaa , aapka likha padhkar man bahut dino tak kahin khoya rahata hai .. apne phone number , pata dijiye ,, ab to aakar milna honga ..

    main ab kya badhai doon .. jai ho aapke lekhan ki

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  46. दरअसल यह एक व्यंग्यद्रष्टि का नमूना है जो प्रति दिन के सामान्य जीवन को देखने का कोण बदल कर हमें झकझोरता है . बधाई !

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  47. ग़जब का अन्दाज़े-बयां है भाई. मैं सोच रहा हूं अगर दुर्वासा ऋषि वाली क्षमता मुझे मिल जाए तो क्या हो?

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  48. सोबर और सूथिंग दृश्यों के पीछे भागते हुए विलंबित में कुछ भी देखना गवारा नही है हमें. आँखों को भी इसी प्रकार दीक्षित किया हुआ है कि गाईडेंस के अतिरिक्त कुछ दर्ज न किया जाये. ज़िन्दगी को यन्त्र की शक्ल में तब्दील करने की ख्वाहिशों के लिए मुखौटों का उत्पादन अनिवार्य शर्त है. आपका मिस और तदन्तर इसके उपयोग से बने तमाम शब्दों के प्रति आकर्षण ही उस दुनिया में लौटा लाने की कोशिश है जिसमे लड़की को घूरती है सामाजिक वर्जना ... धायं धायं से गोली वहीं दागी जानी चाहिए, आदिम रूढी पर... पोस्ट निसंदेह बढ़िया है जींस वाली से ले कर लाईफ में मिसकास्ट होने तक.

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  49. मुखौटे शायद आज की मजबूरी भी हैं और कहीं कहीं अपरिहार्य भी.

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  50. .भंगन की लड़की जींस पहनकर कर सड़क पे झाडू लगा रही है ...
    bhut hi mjedar post sach ko apne bhut hi rochak andaz me pesh kar diya .vaise abhi abhi teen mhine phile mai mathura gai thi to vha par ak ldki jeens phnkar hand pump se sir par balti me pani bharkar la rhi thi tab mujhe filmo ke sare pnghat yad aye the .
    bhut achhi post ke liye badhai.

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  51. कच्चे आंमों की खुशबू गाड़ी में फैल जाती है और ये सोचने पर मजबूर कर देती है कि हम भी किसी की लाइफ में मिसफिट होंगे। आय थिंक हम सब भी कहीं न कहीं मिसफिट होंगे ही , आखिर जिंदगी मनमोहन देसाई की खोया-पाया टाइप फिल्म तो नहीं ही है

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  52. kisi din mukauata utar kar dekhiye. dus minut men hee shamat aajayegi so ise rehane dena hee aaj kee jaroorat hai.
    Badhiya post.

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  53. मिसकास्ट होने का खतरा तो हर वक्त मँडाराता रहता है और उस भय को छिपाने के वास्ते एक और मुखोटा...एक मुखोटे पर दूसरा!! जीना इसी का नाम है, भाई!!!

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  54. सुंदर साक्षात् चि‍त्र खि‍चा है आपने, कुछ सपने भी आकार लेते दि‍ख रहे हैं...

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  55. आप तो हमारे खाने और दिखाने - दोनो प्रकार के दांत उजागर कर दे रहे हैं।

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  56. पोस्ट पढ़कर अपने वाले चंद मुखौटों की साफ-सफाई में लग गया...ये ऐसे क्रूयेल सच्चाईयों से वास्ता करवाने की आपकी ये आदत न डाक्टर साब जान ले लेगी एक दिन किसी ब्लौगर का
    और त्रिवेणियां कहाँ गुम हैं आजकल।
    एक जिन के दर्शन तो करवा दिये न मैंने कल ही अपनी ग़ज़ल में...

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  57. क्या खूब लिखा आपने,मज़ा आ गया.....

    मिस्कास्टिंग लोग हर जगह देखने को मिल जाते है,
    काँटे भी फुलो का मुखौटा,लिए खिल जाते है.
    सामाजिक पहलुओं पर,इस कदर फोकस करते है आप,
    की शब्द और हँसी की फुहार दोनो घुल जाते है.

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  58. janaab, aam ka achaar jab tayyar ho jaaye to gin ke haath bhej deejiyega!
    apki lekhni mein poorn -viraam lagaane ko dil hi nahin karta!...yeh to koi sangeet ki mehfil sa samaa bandhte hain aap, ji chahta hai aap kehte(gaate) rahein aur hum (sunte)padhte rahein... goya yeh bhi ek mukhota hua aapka!

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  59. हम्म..बात तो सही कही डॉक्टर साहब लेकिन बिना मुखौटा लगाये काम भी तो नहीं चलता! जाने कितने लोगो से मिलते वक्त चेहरे पर एक मुस्कराहट चिपका लेते हैं और अन्दर ही अन्दर गालियों का रिवीज़न हो रहा होता है........खैर ऐसी ही है दुनिया और ऐसे ही हसीन है!

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  60. उस जिन्न को पाने की लालसा तो हर आदमी रखता है……
    अगर वो जिन्न मुझे मिल जाये तो मज़ा आ जाये

    वैसे लड़कियां देखने में खराबी क्या है, आखिर eye-tonic भी तो चाहिये होता है न।

    मखौटे वाली बात बहुत सही कही आपने, अभी परसों की ही बात है, वैसे ही मेरे मन में खयाल आया, कि अगर मेरे पास ऐसी कोई शक्ति हो जिस से मैं ये जान सकूँ कि सामने वाला क्या सोच रहा है, तो कैसा हो। तभी अपने आस पास के मौजूद लोगों को झाँकता हु, तो पाता हूँ कि मां पास बैठी है और फिर सोचने लगता हूँ कि और किस के बारे में जानना चाहूँगा। तो ये सूची तो बढ़ती ही जा रही है।

    काफी मज़ेदार आविष्कार होगा, अगर हुआ तो

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  61. **वैसे इन्द्र का सिहांसन जरूर किसी खुन्नस खाये बढ़ई ने बनाया था जो बात बात पे डोलता था ....

    **पर ज्यादा इज्ज़त देने से कभी कभी वे बहुत बोर करते है...
    **आँखें..स्क्रीन टेस्ट...लाल स्कूटी...और बंदूकें..
    **और वो जिन्न!
    जिन्न आज कल शायद 'लम्बे अवकाश पर है..और शायद आप की त्रिवेणी की diary भी साथ ही ले गया है.
    खोज करवाते हैं...
    आज की पोस्ट हमेशा की तरह ही अच्छी है..कोई दो राय नहीं..

    साथ दी गयी तस्वीर पूरी तरह से पोस्ट को कोम्प्लिमेंट कर रही है.

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  62. बिना मुखौटे वाला खोजना एक श्रमसाघ्‍य कार्य है।

    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  63. "....पुराना बख्त ठीक था जहाँ मूड ऑफ़ हुआ ...शाप दे दिया .सुना है ऋषि दुर्वासा इसके सबसे बड़े शेयर होल्डर थे ....तभी इन्द्र हलकान हुए रहते थे ...वैसे इन्द्र का सिहांसन जरूर किसी खुन्नस खाये बढ़ई ने बनाया था जो बात बात पे डोलता था .... ."

    उपरोक्त तो आपकी पोस्ट का एक चावल व्यंगात्मक कमेन्ट के रूप में है जी. इसी तरह आपने अपनी धरा प्रवाह चुटीली पोस्ट में कहीं किसी को नहीं छोडा अपने व्यंगात्मक कमेंटों से.

    आपने अपनी पोस्ट में इतने सारे कमेन्ट दे डाले हैं कि अब और कोई कमेन्ट देने की हिमाकत कम से कम मैं तो नहीं कर सकता.

    अब आपको तो व्यंग का कोई पुरस्कार मिलना ही चाहिए.

    वैसे आज मेरे जहाँ में एक बात आपके पेशे "डरमेटोलोजिस्ट" को लेकर आयी.
    अंगरेजी का उस्ताद तो नहीं पर हिन्दी में तो हमें यह कुछ यूँ समझ आया...........

    "डर में तोलो जी ईष्ट"

    हा! हा !! हा !!!

    चन्द्र मोहन गुप्त

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  64. U hve successed in capturing life in its true spirit. cheers !!!
    (and i dont have allergy)

    उत्तर देंहटाएं
  65. मुझे लगता है कि लोगों की बिमारियाँ ठीक करने के साथ साथ अब समाज की बिमारियों पर रि्सर्च् कर्नी शुरू की है लाजवाब्

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  66. डॉ साहब आप जिस प्रकार के व्यंग्य को आज की ज़िन्दगी से जोड़ कर प्रस्तुत करते हैं कोई आप लेखक नहीं कर सकता है। आपकी यही लेखन कला मुझे आपका दीवाना बना देती है। आपने जो उदाहरण दिये हैं बहुत ही सटीक और जो अतीत के प्रसंग जोड़े हैं वो भी बहुत ही कलात्मक तरीके से अपनी बात कहते नज़र आते हैं बहुत खूब वाह!

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  67. अनुराग साहब काफी दिनों के बाद ये स्टोरी आपने पेस्ट की है । इस स्टोरी के जरिये आपने जो लिखा है वाकई काबिलेतारिफ है । लेकिन क्या किया जाए यही तो जिन्दगी है । शुक्रिया

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  68. मेरी एक दोस्त मजाक में कहती थी हिन्दुस्तान का मर्द अपनी जिंदगी का पांच प्रतिशत भाग लड़कियों को घूरने में बिताता है....कभी कभी सोचता हूँ कैसे कब कहाँ सीख जाती है लड़किया इन नजरो को अवोइड करना ...यानी आम भाग दौड़ ओर दूसरी मशक्कतो के अलावा उन्हें एक ओर चीज से रोज लड़ना पड़ता है वे है नजरे....
    ..शर्मा जी कोई काल्पनिक चरित्र नहीं है....हम सब के पास मुखोटे है ..उनके पीछे असल को कौन कितना पीछे धकेलता है .बस यही फर्क है ...ये ओर बात है उम्र के साथ साथ हम इंच दर इंच पीछे छिपते चले जाते है ...
    @ओम जी
    टिप्पणियों को मै संवाद प्रक्रिया का आवश्यक हिस्सा मानता हूँ.....ओर अपनी सहमति- असहमति जताने का जरिया भी...हम सब क्यों लिखते है..ताकि जो हम सोच रहे है वे दूसरे पढ़े .....हर लिखने वाला यही चाहता है की वो पढ़ा जाये .,मै भी..........जानते है कई बार मेरे मन में विचार आया की मै कुछ टिप्पणियों को लेकर ही पोस्ट करूँ...क्यूंकि कुछ ऐसी टिप्पणिया थी .....,है .....ओर रहेगी .जो कई बार पोस्ट से भी सार्थक हुई है ,होती आयी है ....ओर रहेगी

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  69. 7 ये अभी तक रहस्य बना हुआ है कि ये अपना अधिकांशत समय ब्लॉगिंग को देते है या अपने मरीजों को। डा. अनुराग आर्य (दिल की बात)

    इरशाद जी (इरशादनामा ) के ब्लॉग से चुरा कर लाई हूँ आपके लिए ....अब आप जवाब दे आयें ...!!

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  70. Anurag ji
    Aapne jis tarah zindgi ko likha hai majak majak mein bahut likh gaye...... sabhi mukhota pahne hai koi dukh chhipane ko koi khushi chhipane ko
    koi hamdardi jutaane ko koi paisa kamane ko
    shayad duniya mein ye zaruri bhi hai asli chehra koi dekh hi nahi paayega

    soch kar dekhe to kitna jhoot bolte hai
    ro rahe ho to aur koi aa jaaye hans kar kahenge nahi ji hum badiya ......

    ek sher aapki is post ki nazar

    Hans kar fareb do Jaha.N ko apni khushi ka
    Dastoor puraane to nibhaya karo Shrddha

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  71. हम तो शब्द दर शब्द ऐसे बंध गए कि अपने को ही खो बैठे....अब तो बाहर निकलने का रास्ता खोज रहे हैं.....अब अलग से और क्या कहें..............

    लाजवाब सुपर्ब ग्रेट...वाह !!!!!!!

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  72. वाह! वाह !बहुत ही ज्यादा पसंद आई ये पोस्ट....

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  73. यत्र तत्र सर्वत्र को क्या खूब लपेटा है आपने

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  74. मैं भी आपकी ब्लॉगर साथी हूं शिफाली, भोपाल से...लेकिन लाजवाब लेखक अनुराग से नहीं डॉ अनुराग से मुखातिब होना चाहती हूँ...अनुरागजी मेरे पिता सेप्टीसीमिया से जूझ रहे हैं...उस पर उनकी कॉन्शसनेस भी चली गई है...सेमीकॉन्शस स्टेज में हैं...क्या आपकी मदद से पापा के बेहतर इलाज के लिये किसी जानकार डॉक्टर की राय मिल सकेगी। पापा भोपाल में नेशनल अस्पताल में भर्ती हैं...माफ कीजियेगा मैंने टिप्पणी के रास्ते का इस्तेमाल मदद की दरख्वास्त लगाने कि लिये किया। शिफाली।

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  75. @shefali ji
    i am a dermatologist...septicemia is serious condition.. required some physician...mail me in detail...lets find someone in bhopal....

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  76. पोस्ट के लिये वाह .

    और शेफाली जी की मदद के लिये भगवान आपको सामर्थ्य दे .

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  77. काश पीकर भी बुद्धि जाग जाती; इधर तो बुद्धि जाती रहती है भाई।

    उत्तर देंहटाएं
  78. .......................
    ..........................
    .........................
    ..........................

    आपकी dots मे कुछ अज़ीब बात है। गज़ब का ठहराव देती है। मेरी dots का मतलब है कि मुझे पता नही कि क्या बोलू? ….

    उत्तर देंहटाएं

कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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