2009-05-21

बुनियादी तौर से भावुक .......साले "इमोशनल इडियट"!!!!


त्मा भी साली टाइम नहीं देखती .कही भी खड़ी हो जाती है ......"इमोशनल इडियट "!.है ना ...वे मेरे कंधे पे हाथ रखकर कहते है ....तब गरीबी लिमिटिड थी ....दस बीस गुनाहों पे एक परोपकार एडजस्ट हो जाता था.....अब जमाना बदल गया है ...इस कम्पीटीशन के जमाने में सर्वाइवल ......यू क्नो "डार्विन"!!!!!!! .... साँस लेकर वाक्य अधूरा छोड़ते है ......... ग्लास में आइस की दो क्यूब डालते है ...उनके बही खाते में कई परोपकार जमा है .. वे समाज के बड़े खंभे है... ओर बूढे भी.....प्रेक्टिस में २५ साल से है.....एक ही सांस में वे सारी सटक जाते है ...पार्किंग तक जाते जाते वे मुड़ते है ओर पूछते है .तुम कौन से महीने की पैदाइश हो .?मार्च ....एरियन....फिर कुछ बुदबुदाते हुए निकल जाते है .....
रा के साडे ग्यारह बजे है ....मै गाडी में घुसता हुआ टाइम देखता हूँ....टाइम......सारा खेल कुछ सेकंडो का ही है........ आप दस बजकर २० मिनट ओर २५ सेकंड पे पैदा हुए है .... यदि सत्ताईसवे सेकेण्ड पे होते तो शायद किसी सरकारी अस्पताल के गलियारे में सीधे निकलते .......या बाइस्वे पे होते तो शायद खरबपति मित्तल के दामाद ...कुल मिलकर आपका योगदान सिफर है....इस जगह पे रहने का.......लक बाय चांस...!
...
मोबाइल का अलार्र्म जोर से सुबह की आमद की घोषणा करता है ... तो याद करने की कोशिश करता हूँ की वक़्त की फिलोसफी का सपना था ...? या कल रात इसकी भी कोई बात हुई है .....ब्रश करते हुए अंग्रेजी अखबार के पन्ने पलटता हूँ.....वे खुश है .कोई इंडियन फिमेल दस होटेस्ट सी .इ .ओ में से एक है.....
दोपहर एक बजे ....
बिजली अपनी मुंह दिखाई की रस्म अदायगी करने आयी है ....मै बराबर वाले डॉ आहूजा के पास हूँ....नजदीक के गाँव से ईट भट्टे पे काम करने वाला एक मजदूर परिवार अपने सवा साल के बच्चे को लेकर आया है....जो तीन दिन से चिडचिडा है .खा नहीं रहा ...सो नहीं रहा है......बुखार नहीं है..डॉ आहूजा उसे एक्सामिन करते है....बच्चा अब भी चिडचिडा है .कुछ उनींदा सा .......वे उसे नजदीक के अस्पताल की नर्सरी में एडमिट करने की सलाह देते है.....उनका मोबाइल बजा है ...कोई "डिलिवरी कॉल" है .....वे निकलते है ....वापसी में वे सीधे हॉस्पिटल जायंगे....
रात पौने नौ बजे ...
क्लीनिक से बाहर निकलता हूँ....डॉ आहूजा खड़े है......क्या था उसे ?मै उस बच्चे के बारे में पूछता हूँ...कुछ डाइग्नोसिस बना ? वे मुस्कराते है......बताते है कॉल से नर्सरी में लौटा तो बच्चा सो रहा था ....आराम से...
..फिर ???मै पूछता हूँ.....फिर क्या धूप ओर गर्मी से बेहाल था .. बस नर्सरी का .सी चाहिए था उसे...!










वक़्त .दो ढाई साल पहले का .. कडाके की सर्दिया ..जनवरी के शुरूआती दिन . .यू. पी का बांदा ...एक रिक्शा वाला चार बच्चो को पालने में हार मान लेता है . ... अपने .४ महीने के एक बच्चे को बेचने पे राजी ....मीडिया में "गरीबी "बड़ी खबर है ...ओर "बेचना "ओर भी सनसनी खेज...मीडिया की इस करुणाजनक तस्वीर पे हल्ला ...डी. एम् के ऑर्डर ..माँ के साथ ४ महीने का बच्चा भी थाने में ....कडाके की ठण्ड . ......निमोनिया ....अगली सुबह ...??? उसका नाम चन्दन था.....इन सालो में कुछ नहीं बदला है .गरीबी उत्ती ही बदचलन है ....चंदनो को मरने का अब भी सलीका नहीं आया ... ....


इक इक साँस की जद्दो-जेहद
फेफड़ो ने भी क़बूल किया अब....


मुफलिसी से बड़ा जुर्म नही कोई?



79 टिप्‍पणियां:

  1. इक इक साँस की जद्दो-जेहद
    फेफड़ो ने भी क़बूल किया अब....

    मुफलिसी से बड़ा जुर्म नही कोई?

    Bahut hi khubsurat andaz ke sath aap bhaut gahri baat kah dete hai...

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  2. इक इक साँस की जद्दो-जेहद
    फेफड़ो ने भी क़बूल किया अब....

    मुफलिसी से बड़ा जुर्म नही कोई?
    ..... सच है डोक्टर साहब ये तीन लाइन बहुत सी बात कह देती है ।

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  3. सारा खेल कुछ सेकंडो का ही है........ आप दस बजकर २० मिनट ओर २५ सेकंड पे पैदा हुए है .... यदि सत्ताईसवे होते तो शायद किसी सरकारी अस्पताल के गलियारे में सीधे निकलते .......या बाइस्वे पे होते तो शायद खरबपति मित्तल के दामाद ...कुल मिलकर आपका योगदान सिफर है....इस जगह पे रहने का.......लक बाय चांस.....

    गहरी तडप व्यक्त की है. शायद अनगिनत बच्चों को तो अस्पताल की नर्सरी का ए.सी. भी नही नसीब हो पाता.

    रामराम.

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  4. २४ मार्च ....!! एक कस्पिड नंबर जब पाइसन का फेमिनिन नेचर जा नही पाता और एरिअन का मैस्कुलिन नेचर आ जाता है। भावना एवं व्यवहारिकता का सही सामंजस्य...!मेरे पिता जी भी इसी के इर्द गिर्द के थे और मैं स्वयं २४ अंक की :) सच है जरूरी तो नही कि इस को धारण करने वाले सभी लोग अच्छे ही होते हों मगर मैं जब भी ये योग पाती हूँ पूर्वाग्रह से ग्रसित हो जाती हूँ...! Thank God..! मैने आपको पहले जाना ज़ोडिएक साइन को बाद में। वर्ना इस extreme liking में अगर मेरा पूर्वाग्रह भी जुड़ जाता, तो खुदा जाने क्या होता :) :)

    चंदन की घटना ने चित्रा मुद्गल की कहानी भूख की याद दिला दी।

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  5. चित्र अद्भुत है...! एक पोस्ट तो इस चित्र के विश्लेषण पर ही लिखी जा सकती है..! :) :)

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  6. मुफलिसी जुर्म नहीं है, असल में वह जुर्म का बाईप्रोडक्ट है। जुर्म करने वाले खुद कोतवाल,और जज बने बैठे हैं।

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  7. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  8. मुझे नहीं लगता कि वक्‍त इतना महत्‍वपूर्ण है कि बाइसवें और बीसवें मिनट में पैदा होने का फर्क पड़ता हो। :)

    हां प्रयास के स्‍तर में अन्‍तर आ सकता है।

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  9. क्या कहूँ....आपकी पोस्ट कुछ कह पाने कि स्थिति में छोड़ती कहाँ हैं......

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  10. गनीमत है कि बच्चे को अस्पताल तो नसीब हुआ ,शायद किसी अच्छे सेकेण्ड में पैदा होने कि खुशकिस्मती रही होगी वरना .............. .

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  11. समय का फेर है या हाथों की लकीरों का?
    किसी ने सच ही कहा है- गरीबी से बड़ा कोई अभिशाप नहीं.'
    चार महीने के चन्दन की तकदीर या गरमी से न सो पाने वाले बच्चे कीकिस्मत?तकदीर के तराजू में न जाने कितनी जिंदगियां रोज़ तुलती हैं यहाँ!
    मीडिया हो या नेता --सब इस को भुनाने में लगे रहते हैं.
    हमेशा की तरह सधा हुआ लेख.
    चित्र भी खुद में एक कविता है.

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  12. वाकई गरीब पैदा होना एक जुर्म के सिवाय कुछ नहीं ...

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  13. bahut....hi umda lekh...apka anurag...hamesha ki trah ek baar phir shada hua lekh...
    kya khoob likha hai...

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  14. सांस रोक के आपकी पोस्ट पढता हूँ और फिर उसके बाद रोकने की जरुरत नहीं पड़ती...वो अपने आप रूकती प्रतीत होती है...कैसे लिख लेते हैं इतनी गहरी बात इस सहजता से...उफ़...लाजवाब लेखन...
    नीरज

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  15. सुना है चन्दन बहुत महंगा होता है.. पर ये चन्दन..?

    अच्छा हुआ जो आज पोस्ट नहीं की वरना पोस्ट लिखना छोड़कर हिमालय चला जाता.. इस भीषण गर्मी पर आपने बच्चे के बारे में लिखा ऑर मैंने बुढ़िया के बारे में.. कल पोस्ट करूँगा..

    समय का ये हेर फेर अपने हिस्से कभी आया ही नहीं.. सही टाइम तो किसी को पता ही नहीं है.. मम्मी कहती है सुबह की आरती होने वाली मंदिर में बस.. अब क्या पता उस दिन आरती कब हुई हो..? वैसे भी फोरेन में कोई जन्मपत्री नहीं बनवाता.. सब जीते है..

    चित्र पर वाकई पोस्ट लिखी जा सकती है..

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  16. मुफलिसी से बड़ा जुर्म नही कोई?

    लाजवाब लेखन और उतना ही कुछ कहता हुवा चित्र................गरीबी एक अभिशाप है..........ये बात अपने आप ही सच हो जाती है,...................समय के फेर में पेंडुलम से भटकती जिंदगी.............आपका लिखा बहूत ही गहरा होता है.........

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  17. kya kahoon shabd nahin soojh rahe fir sochti hoon sooraj ko deepak dikhane se achha hai ki chup rahoon aap bata sakte hain ki aise samay me kya karna chahiye lajvab adbhut shubhkamnayen

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  18. भारतीय होने की नियति के साथ जीना और उसी के साथ मर जाना!!

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  19. एक समय था .... हम सभी रहते थे ऐ सी के बिना ... शायद बिना ऐ सी के हम ज्यादा खुश थे...
    आपकी पोस्ट हमेशा सोचने को मजबूर करती है ...आत्मा को पास बुला कर उसे फिर पाठकों का रास्ता दिखा दिया :-)

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  20. जी हाँ .कौन किस घर में पैदा होगा ये भगवान् का फैसला है ,ओर कैसे तय होता है ?ये भी रहस्यमय है, बुनियादी जरूरते जब पूरी होगी तो ही इंसान आगे हालातो से लड़ पायेगा
    तब गरीबी लिमिटिड थी ....अब ये स्कोप नहीं है .आज याहू भी सुबह से किसी इंडियन के होटेस्ट सी इ ओ होने की खबर दिखा रहा है .बच्चे के बहाने आपने ढेरो सवाल छोड़ दिए है .हर बार की तरह पोस्ट का असर कुछ देर तक रहना है .
    चन्दन के फेफडे आज भी जुर्म कबूलते महसूस होते है .

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  21. ओर हाँ "गरीबी उतनी ही बदचलन है" इस पोस्ट का महावाक्य लगा मुझे

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  22. इक इक साँस की जद्दो-जेहद
    फेफड़ो ने भी क़बूल किया अब....सब से बढ़िया लाईन तो यही है |

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  23. इक इक साँस की जद्दो-जेहद
    फेफड़ो ने भी क़बूल किया अब....

    मुफलिसी से बड़ा जुर्म नही कोई?

    --ये अपने आप में एक पूरी पोस्ट है, जनाब!! उम्दा त्रिवेणी.

    चंदनो को मरने का अब भी सलीका नहीं आया ... ....एक चंदन सीख भी जायेगा तो बीस चंदन और पैदा हो जायेंगे...इस जग में चंदनो का प्रोडक्शन नहीं बन्द होगा कभी.

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  24. आपको बताऊँ, एक दिन हम विकासशील से विकसित देश हो जायेंगे, पर गरीबी उतनी हिन् रहेगी, क्यूँ की जिन लोगों की स्थितियों को देख कर विकाश नापते हैं, उनमें गरीब लोग तो आते नहीं.

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  25. बिजली अपनी मुंह दिखाई की रस्म अदायगी करने आयी है ....मै बराबर वाले डॉ आहूजा के पास हूँ....नजदीक के गाँव से ईट भट्टे पे काम करने वाला एक मजदूर परिवार अपने सवा साल के बच्चे को लेकर आया है....जो तीन दिन से चिडचिडा है .खा नहीं रहा ...सो नहीं रहा है......बुखार नहीं है..डॉ आहूजा उसे एक्सामिन करते है....बच्चा अब भी चिडचिडा है .कुछ उनींदा सा .......वे उसे नजदीक के अस्पताल की नर्सरी में एडमिट करने की सलाह देते है.....

    रात पौने नौ बजे ... क्लीनिक से बाहर निकलता हूँ....डॉ आहूजा खड़े है......क्या था उसे ?मै उस बच्चे के बारे में पूछता हूँ...कुछ डाइग्नोसिस बना ? वे मुस्कराते है......बताते है कॉल से नर्सरी में लौटा तो बच्चा सो रहा था ....आराम से... फिर ???मै पूछता हूँ.....फिर क्या धूप ओर गर्मी से बेहाल था .. बस नर्सरी का ए.सी चाहिए था उसे........

    बहुत ही खूबसूरत लिखा है डॉक्टर साहब...

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  26. सच है अनुराग जी
    मुफलिसी से बड़ा जुर्म नही कोई?
    नर्सरी ke ए.सी ke sath-sath इस बार का चित्र भी बहुत kuchh kah raha hai....

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  27. उसी बाइसवें मिनट पर कहीं एक चन्दन पैदा लेता है और कहीं कोई चांदी का चम्मच लेकर पैदा होता है. कुछ चंदनों को तो पैदा होने का सलीका भी नही आया :( मरने का भी नहीं!

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  28. आपने गौर किया है डाक्टर साब- डाक्टर हैं आप? "संक्रमण" के लक्षण तो पहचान ही लेते होंगे...तो मैं कह रहा था कि आपने गौर किया कि किस तरह आपका हर पोस्ट, आपकी शैली, आपके शब्द-सारे-शब्द संक्रमण के वायरस लिये आते हैं कि हर ब्लौगर एकदम से आपकी ही शैली में टिप्पणी करने लग जाता है...
    इन्हीं ब्लौगरों की आप अन्य ब्लौग पे टिप्पणी पढ़ कर देखें और फिर अपने ब्लौग पर...
    ये क्या माया है? कौन-सा तिलिस्म? कैसा वायरस?

    बड़े दिनों बाद त्रिवेणी नजर आयी तो...

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  29. पोस्ट तो खूबसूरत है ही,
    इमेज मेरे को भा गयी, बीस मिनट तक इसी में टहलता रहा ।
    मुफ़लिसी..
    थोड़ा पाज़िटिव लिया कर, मेरे भाई
    मुफ़लिसी की अपनी टी.पी.आर. भी तो है,
    पाथेर पाँचाली हो या स्लमडाग, इन्दिरा गाँधी हों या अटलबिहारी,
    सभी तो मुफ़लिसी की टी.पी.आर. के बल पर ही अपनी वैतरणी पार कर गये !
    अच्छी पोस्ट !

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  30. गोया गरिबी ना हो तो ये दर्जन भर-भर के नेता समाज सेवी पत्रकार रिपोर्टर, कार्यकर्ता ,एक्टीविस्ट और ब्लागर सब बेकार हो जाये !!

    गरिबी से कितनो का रोजगार चल रहा है !!:)

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  31. वो सुबहा कभी तो आयेगी ..."
    जब हरेक बच्चा चैन की नीँद सो पायेगा -
    त्रिवेणी ज़बर्दस्त लगी ...
    डाक्टर के जीवन को
    नज़दीक से पढवाने का शुक्रिया
    भगवान जी से,:)
    मैँ तो यही कहूँगी..
    आपकी सँवेदनशीलता
    यूँ ही बकरार रखेँ
    - लावण्या

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  32. एक ज़रूरी मुद्दा जो इन दिनों तमाम बौद्धिक विमर्शों के गाढे विलयन में कहीं तलछट में चला गया था, आपके छेड़ने से सतह पर आ गया है. नव बौद्धिक इस पर बात करने में कतराते है, कहीं old-fashioned होने का टैग न लग जाय! वातानुकूलित मॉल्स की चौंध मारती रौशनी में ४० वाट के बल्ब के कातर प्रकाश ने यहाँ फिर सशक्त उपस्थिति दर्ज करवाई है. आपकी पंक्तियों में कई छवियाँ उभरती है जिनका कोलाहल महसूस करना हो तो between the lines पढना पड़ेगा.
    मारियो पूजो के god father के पहले पन्ने पर balzac की पंक्ति लिखी थी-
    "गरीबी हर अपराध की मां है"

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  33. आपको डॉक्टर बनाया किसने....और क्यों है आप इस प्रोफेशन में...मुझे तो बिल्कुल समझ नहीं आता....
    मैं हर पोस्ट पढ़ती हूं...और हर बार सिर्फ सोचने पर ही मजबूर हो जाती हूं....कुछ समझ ही नहीं आता....कि इस समंदर के लिए क्या और क्यों टिप्पणी की जाए...आप...बस आप ही हैं....
    इससे ज्यादा कुछ नहीं...और शायद इसीलिए चुपचाप वापस लौट जाती हूं...हर बार....!!!

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  34. पैसा न होना आज कल सबसे बड़ा अभिशाप है ....चंदन को मरने का सलीका भी भी नहीं आया ..यह बात कहीं बहुत गहरे तक असर कर गयी ...मुफलिसी से बड़ा जुर्म नही कोई? बहुत सच्ची बात ...

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  35. वाकई, मुफलिसी सबसे बडा जुर्म बन गयी है आजकल।

    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  36. इक इक साँस की जद्दो-जेहद
    फेफड़ो ने भी क़बूल किया अब....

    मुफलिसी से बड़ा जुर्म नही कोई?

    बेहतरीन रचना के लिए आभार...
    चित्र भी बहुत अलग सा है...
    मीत

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  37. जी मुफलिसी पर एक अच्छा व्यंग्य

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  38. aap to dhamal hai kamal hai...meri badnaseebi itne samay baad mila apse...

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  39. आप इतना सब देखकर, महसूस कर बर्दाश्‍त कैसे कर लेते हैं? आपकी पोस्‍ट पढ़कर बड़ा असहाय महसूस करता हूँ...

    - आनंद

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  40. वाह,चन्द लफ़्ज़ों मे आपने कितना कुछ बतला दिया,
    मजबूर आदमी की आत्मा का बढ़िया चित्र बना दिया.

    सच यही है,हर जगह इमोसनल एक्सरसाइज़ हो रहा है,
    और ग़रीबो का तो बस,एडवरटाईस हो रहा है.

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  41. वाकई में लाजवाब लिखते हैं डाक्टर साहब आप

    ये सब काल्पनिक लिखते हो, या सच में real life स्टोरी होती है? वैसे आपको पढ़ कर कुछ लिखने का सोच रहा हूं, देखो कब लिखता हूँ। वैसे मुझे काल्पनिक कहानियाँ तो बनाना नहीं आता, तो सोच रहा हुं, क्यों न अपने ही ज़िन्दगी के किसी एक वाक्य पर ही लिखा जाये।

    गरीबी बहुत ही दर्दनाक होती है, ख़ुदा किसी को ग़रीब न बनाये।

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  42. anauraag ji ,

    aapki lekhani ke baaren me ab kya kahun .. mera salaam hai..aapko..... sach hai ,garibi se bada abishaap koi nahi hai... aapne to bhavuk kar diya mujhko ...

    vijay
    www.poemsofvijay.blogspot.com

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  43. गरीबी कितनी बोरिंग है ना !मै भी रोज "अवोयड" करने की कोशिश करता हूँ पर क्या करूँ....जब अस्सी रुपये दिहाडी पे काम करने वाला हेर्पिस जोस्टर लेकर आता है ...सोचता हूँ...सताईस रुपये की एक गोली कैसे लिखूं.....या खरीदेगा कैसा ...प्रेक्टिस में इमोशनल काहे कू होने का ....ओर जब १२० रुपये दिहाडी पे घर पे काम करने वाले मजदूर को घर वाले डांटने को कहते है क्यूंकि उसने परफेक्ट काम नहीं किया ...तो सोचता हूँ १५० रुपये कंसल्टेशन लेने वाला मै कितना परफेक्ट काम करता हूँ..?अपने ऑफिस से पौने पॉँच बजे निकलने वाले हम मजदूर को ठीक पांच बजे तक काम करवाते है.....प्रेक्टिकल है ना.....इसलिए ...
    वो कौन सा लेखक था जो कहता था ..जब मनुष्य संपन्न होगा दुसरे मनुष्य का शोषण करना छोड़ देगा ....कित्ता गलत था न वो .बेचारा ज्यादा उम्मीदे पाल बैठा .....
    @विनोद पाण्डेय जी ठीक कहते है..."इमोसनल एक्सरसाइज़ "भी हम बाबा राम देव के योग की तरह करते है जैसे कोई काम निबटा रहे हो......
    @योगेश जी.....
    दुर्भाग्य से इसके दोनों पात्र ....मौलिक है..... बिलकुल सच्चे ......ओर तीसरे अपात्र वो बूढे डॉ साहब भी ओरिजनल है......ठेठ ओरिजनल .... अभी ये टिपण्णी लिखने से दस मिनट पहले एक ओर पात्र से मिला हूँ....जिस पर कई कहानिया लिखी जा सकती है ....पर वे भी बोरिंग होगी .....आर्ट फिल्मो की माफक....यथार्थ के प्रति इतना उत्साह भी ठीक नहीं है..ना.....
    दो टिप्पणिया बड़ी माकूल है....
    एक @दिनेश जी की.....मुफलिसी जुर्म नहीं है, असल में वह जुर्म का बाईप्रोडक्ट है
    दूसरी कोटेशन जो @ संजय व्यास जी ने मेरी फेवरेट GOD FATHER किताब में से एक से ली है ....
    "गरीबी हर अपराध की मां है"

    इमेज ....फ्लिकर से बिना धन्यवाद किये उधार ली हुई है ...इत्ती भायी की ....मुझे डालनी ही थी....

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  44. आपकी हर बात दिल को छू जाती है

    आपने बिलकुल सही कहा, कि हम पौने पांच बजे निकलने वाले मज़दूर से पांच बजे तक काम करवाते हैं

    और हां, बहुत अच्छा लगता है, कि आप जैसे डाकटर भी हैं जो मरीज़ की माली हालत के बारे में सोचते हैं

    मैने एक डाक्टर साहब के बारे में ऐसा भी सुना था, कि अगर उनके पास कोई गरीब मरीज़ आता है दवा के लिये, जिसके पास पैसे नहीं होते, तो वो अपनी जेब से पैसे दे कर कहते हैँ, ये लो 50/- और रिसेपशन पर जमा करवा देना, और ये बात किसी से कहना नहीं

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  45. सही में चन्दनो को मरने का सलीका नहीं आया . और मुफलिसी से बडा कोई जुर्म नहीं यह सच है और इसकी सजा उम्र भर मुफलिसी ही है

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  46. डियर डॉक्टर,
    जय हो.
    सारे मुद्दे के बाद इतनी भावुक सी त्रिवेणी बस ऐसे थी कि सोने में सुहागा.
    बहुत ही सुन्दर !!!

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  47. dimag karwaa ho jata hai jab jab asli duniya ki tasveer padhta hu apke lekh me...muzhe apne bhram wali duniya hi acchi lagti hai...kam se kam nind to acchi aa jati hai.

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  48. "साले इमोशनल इडियट" अक्सर कानों में गूँजता है। क्या कहूँ अनुराग जी पोस्ट पढकर कहने को कुछ सूझता नही है।.......... दुबारा आता हूँ।

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  49. आपने जिन शेड्स को केनवास पर उतारा है वे परिभाषित नहीं है उनको एक ही नाम दिया गया है ताकि अलग अलग जिम्मेदारियों से बचा जा सके. अभिव्यक्ति क्षमता जबरदस्त है.

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  50. आपका लिखा हुआ पढ़ते है तो लगता है की सामने बैठे है और देख रहे है...और तो और दिल में कही दूर तक महेसुस होता है ... इतने इमोशनल होके मत जियो आप..... मुश्किल हों जाती है फिर......

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  51. मार्मिक...गरीब की ए.सी. या तो अमराई थी या पनघट. दोनों को तथाकथित विकास का दानव निगल गया. अब सिर्फ त्रासदी...... रेखाचित्र प्रभावी है.

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  52. dil nahi hai woh or hi kuchh hai dard jisme nahi zmane ka....stone heart hone se emotional idiot hona jyada behater hai..diwali ki ek raat hum khub ptakhe chala rahe the or ek 7 ya 8 saal ka ladka khali ptakho ke dippe uthha raha tha.us din ke baad humne kabhi ptakhe nahi chalaye coz imotional idiot hona jyada behtar hai.greebi juram nahi shraap hai..

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  53. चंदनों को मरने का सलीका आए भी कहां से और कैसे? सलीका भी तब आता है जब या तो मुफलिसी न रहे।..सलीके और मुफलिसी में एक अजीब रिश्‍ता है।...लेकिन आप बहुत खराब आदमी हो डॉक्‍टर..

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  54. chaahe koi kitna bhi paksh le le jyotish ek aisi cheez hai jispe main kabhi yakeen nahi kar saktaa....ek baar mere parents mujhe zabardasti ek jyotish ke paas le gaye,usne mujhe chaunka diyaa tha jab mere baare me kai sahi baate bataa di..lekin main ise psychology zyada aur jyotish kam samajhta hoon :)

    ye taare,nakshatr,janm ka waqt...uff

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  55. भट्टी सी आग उगलतेदिन के बाद
    सुलगती रातों मे
    ठंडक पाने को
    वो देखो
    चाँद कूद गया पानी मे
    क्या रखा है अजी छोड़ो
    नानी की पुरानी कहानी मे
    एमोशनल ईडियत
    इस कॅंपटिशन के जमाने मे सरवाइवल....यू नो डार्विन.....
    good presentation....

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  56. हम अकेले में सोचते हैं कि हमारे अलावा सब मजे में हैं, लेकिन ऐसा है नहीं ! किसी का हाल-चाल पूछता हूँ तो बताता कुछ नहीं, बस रो पड़ता है ! जरा सोचिये कि इन आंसुओं का डिस्पोजल हम करें भी तो कैसे ?
    आजादी के बाद हमने तरक्की के नए दौर में कदम रखा ! तरक्की के मायने ऊंची-ऊंची इमारतें हों, बड़े-बड़े कारखाने ! चौड़ी-चौड़ी सड़कें हों ! साफ-सुथरे गाँव ! नागरिक कैसे भी हों चलेगा ! हर हाथ को काम मिले, हर पेट को रोटी ! फिर सब ठीक हो जाएगा ! सब के लिए रास्ते खुले हों ! बुलंदी पर पहुँचने वाले रास्ते आम हों , चोर रास्ते नहीं ! इसी तरह की तमाम बातें हमारे नेशनल एजेंडे पर थीं !

    तरक्की के नाम पर काफी कुछ हुआ ! अब भी हो रहा है, लेकिन लगता है कि कहीं कोई गलती हो गयी ! पुराने रास्तों को तोड़-फोड़ कर चौडा किया गया ! हमने रास्तों को तवज्जो दी, उन पर चलने वालों को नहीं ! नतीजा यह हुआ कि अब अवाम रास्ता भूल कर रास्ते में ही रह जाती है ! कहीं पहुँच नहीं पाती ! पहले की तरह रोटी, कपडा और मकान अवाम की मंजिल है ! तीनों तीन तरफ से हमला करते हैं ! बहादुरी से लड़ने के बावजूद अवाम हार जाती है ! आधी शताब्दी का हमारा इतिहास यही है !

    हिन्दुस्तान की मुश्किलें कुछ जुदा सी भी हैं ! आबादी ने फैलकर पूरा मुल्क घेर लिया ! जर्रे-जर्रे पर लोग काबिज हो गए ! कुछ जायज, कुछ नाजायज ! भले आदमियों से बात करो, तो लोग हंसकर टाल जाते हैं कि हम किसी को पैदा होने से तो रोक नहीं सकते !
    यह काम ऊपर वाले का है ! हम उसके काम में दखल नहीं देते ! वो तो एक मुंह और दो हाथ देकर जमीन पर भेजता है ! खाना कपडा चाहते हो, तो मेहनत से कमाओ ! कार-कोठी के मुरीद हो तो तब तो मेहनत की भी जरूरत नहीं ! फितरत से कमाओ ! उन लोगों को देखो जो कौड़ियों से खेलते हुए करोड़ों में खेल रहे हैं ! वे भी पहले वैसे ही थे, जैसे आज तुम हो ! कोशिश तो करो ! विश यूं आल द बेस्ट !

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  57. अनुराग जी ,
    बेहतर और सार्थक लिखा है ।

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  58. Thank you for posting a Triveni this time. Its as beautiful as ever!

    The article too, is great. The whole story and specially the end somewhere loses connect with the title "emotional fools"; it sounds more like a "diary". Your art of expression of incidents is great! I really liked the way you have described the conversation in first half of the excerpt.

    Keep writing
    God bless
    RC

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  59. उम्दा पोस्ट लिखी है डॉ साहेब आपने ,यही सच भी -यही नियति भी .

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  60. "इमोशनल इडियट " का सफिक्स और प्रेफिक्स क्या होगा कहना बड़ा मुश्किल काम है. ऐसे ही सवालों से कई आबाद है जब की कईयों को आपकी जुबान में मरने का सलीका भी नहीं आया.

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  61. saarthak post
    aabhaar gambheer post ke liye
    इक इक साँस की जद्दो-जेहद
    फेफड़ो ने भी क़बूल किया अब....

    मुफलिसी से बड़ा जुर्म नही कोई?

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  62. @पुखराज जी.....@प्रकाश जी .@डॉ दीपा
    ....हिन्दुस्तान की मुश्किलें जुदा है...भीड़ भी .ओर यहाँ रहने वाले बाशिंदे भी....कुछ वाक़ये कुछ लम्हों में सामने से गुजरते है .कुछ वाक़ये साल दर साल गुजर कर कहानिया बन जाते है ....

    'रोटी दाल की फ़िक्र में गुम गये
    मुफलिसी ने कितने हुनर जाया किये '

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  63. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  64. ऐसा क्यों लिखते है आप हर बार। मुड़-मुड़कर वापस आता हुँ और फिर एक उदासी लेकर चला जाता हुँ फिर वापस आने के लिए।

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  65. इक इक साँस की जद्दो-जेहद
    फेफड़ो ने भी क़बूल किया अब....

    मुफलिसी से बड़ा जुर्म नही कोई

    emotional

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  66. हिन्दी ब्लागिंग अपने अर्थो को जिस सृजनात्मक लेखन के जरिये खोज रही है, उनमे डा. अनुराग के कलम की स्याही का बहुत बड़ा हिस्सा होता हैं। ब्लागिंग में लेखन की नयी परिभाषाओं और जौहर को दिखाने वाला चितेरा एक डाक्टर होने के साथ-साथ इतनी सवेंदनशील सोच वाला व्यक्ति हो सकता है, ये शोध का विषय हैं।
    आप ना सिर्फ साहित्यिक सन्दर्भाे में बात को कहने का अंदाज जानते है बल्कि संतुलन और सार्थकता की कितनी मात्रा होनी चाहिये इसमंे भी दुरस्त नजर आते हैं। दुनियाभर के लिये मेरठ को देखने के लिये बहुत सारे कारण होते है, लेकिन डा. अनुराग भी एक कारण हो सकते है ये एक नयी वजह जरूर है।

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  67. मुफलिसी से बड़ा जुर्म नही कोई?हर तरफ इतनी बेबसी, बदनसीबी देखकर भी संगदिल रह पाने से बड़ा जुर्म क्या होगा?

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  68. सही कहा डॉ साहब., यह पेशा कभी कभी इमोशनल अत्याचारी बना देता है..फोटो सिंथेसाईजर का ट्यूब बदलना भी मुश्किल होता जा रहा है..

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  69. संवेदनहीनता और संवेदनशीलता के बीच के दृश्यों ने आपके लेखन में काफी स्थान पाया है. सम्यक दृष्टि के बिना आप घटनाओं को उस निगाह से नहीं देख पाते हैं सेंस को भी आपकी तरह खुली आँखों से देखने की जहमत उठानी ही पड़ती है और यही लेखन की खूबी है. दो तीन बार पढ़ चुका था कुछ समय ने साथ नहीं दिया फिर भी गनीमत है अगली पोस्ट अभी आई नहीं हैं . आपका उम्दा लेखन और उम्दा होता रहे और अनुराग ब्रांड मशहूर हो जाये.

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  70. कभी कभी सोचता हूं... आखिर कोई बहुत ग़रीब होता ही क्यों है? ऊपरवाले की इस दुनिया में इतनी "अनामली" क्यों है? लेकिन फिर जब इस समाज में ग़रीबों का योगदान देखता हूं, तो लगता है कि शायद ग़रीब नहीं होते तो ये दुनिया भी नहीं चलती। आपका धोबी, कामवाली बाई, दूधवाला, रिक्शावाला, सब्जीवाला सभी तो ग़रीब ही हैं... लेकिन इनके बगैर दुनिया नहीं चल सकती। पर कैसी विडंबना है कि ग़रीबों की ना तो कोई सुनता है और ना ही उन्हें वो इज्जत ही मिलती है, जो मिलनी चाहिए।

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  71. पहले तो लेट होने के लिए क्षमा....बहोत देर आपकी इस तस्वीर को देखती रही ....एक ke अन्दर कई तस्वीरें समेटे ...बिलकुल आपकी पोस्ट की तरह ....जो एक साथ कई - कई तस्वीरें लिए चलती है ....और आपकी पोस्ट के कई चेहरों में से मै एक ही चेहरा पकड़ पाती हूँ ....डॉ आहूजा का ...जो बताते है कि बच्चा धूप ओर गर्मी से बेहाल था .. बस नर्सरी का ए.सी चाहिए था उसे........पर क्या डॉ आहूजा का नर्सरी का ए.सी मुफ्त का था ....या अपने ओहदे की चालाकी भरी कमाई का साधन ...?



    [ एक शिकायत भी है ....न बधाई ...न दुआ .....सिर्फ नज़्म का वादा याद रहा जो मैंने किया ही नहीं था ....!!]

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  72. Bade dino baad aapke blogpe aayee hun...aur blogke alawa, saaree tippaniyan padhee...75 kramank ke baad khamosh rehna behtar hai...!Aur kya kahun...Irshad ji se to sehmat hunhee..!
    snehadar sahit
    shama

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  73. I'm waiting for new post. Please keep posting in minimum 1 week.

    Surya

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  74. padhte padhte itana kuch sochne lage ke kuch likha hi naa jaa raha,ranju ji sahi keh rahi hai,aapki har post dimaag ki tarango ko jhanjhod deti hai.hmm dr ahuja ke chote patient ko kya sahi mein nursing homeke AC ki jarurat thi? garibi ka koi ilaz nahi ,kash koi vaccine hota.triveni hamesha ki tarah lajawab.

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  75. anurag ji .. chhiil dene per jo peeda hoti hai usaka ehasaas her vaqt kerete hain aap... aisi samvedanaaon ki sakht zaroorat hai..
    mere blog per aapka comment ek taaze jhonke ki tarah lagaa. shukriya..

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  76. इक इक साँस की जद्दो-जेहद
    फेफड़ो ने भी क़बूल किया अब....

    मुफलिसी से बड़ा जुर्म नही कोई?


    ab to had hi ho gayi....

    ...apka blog hai ya bhnumati ka pitara time dekha pehli aur last tippani ka?

    ....blogging se bada koi rog hai kya.

    Bhagwan kare aap bahvishya main aisa na likhein.
    Kum se kum neend ko to chai aaiye.
    Aur bhagwan kare ki koi accha na likhe.
    Sab 'Darpan Sah' ho jaiyen....
    ..pata nahi main kya anp shanap comment kar raha hoon. shayad neend ka khumar hai.
    Haan magar khooj khoj ke padhi gayi treveniya chipak gayi hain
    :)

    उत्तर देंहटाएं

कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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