2010-07-30

सुन जिंदगी!! किसी-किसी रोज तेरी बहुत तलब लगती है


आवारा !!

होठ  खुश्क रहते है..... तपा तपा सा चेहरा
जैसे कोई नशा किया हो
सुबह जल्द आकर .उन

 रिक्शा वालो ...खोमचे वालो ...की संगत में

.देर तक बैठा रहता   है

 इन गर्मियों में फिर 
दिन को
  उगने का सलीका नहीं  आया ...


 मेसेज की आमद.!!!.....

अच्छा हुआ

जो तुमने तोड़ दिया

उस इकरारनामे को

जिसके मुताबिक ना हमें मिलना था

ना बात करनी थी

पिछले आधे घंटे से

 दरअसल .......
मै तुमको ही सोच रहा था

पिछले आधे घंटे से
........
मेरे शहर में भी बारिश है

टचवुड !!!!





जुदाई ....

दिल किसी मुंशी सा......
 कब से

रोज दिन को ...पलट कर

उन पे मार्क लगा रहा है

पिछले शुक्रवार की  रात किसी ने एब्सेंट लगायी थी .....




  कारोबारी दुनिया में प्रेसेंट  .. रोज दर्ज करनी होती है ....जरूरी ....गैर-जरूरी  कितने मसले है .......कुछ  उलझाते है ...कुछ को फलांगता हूं  ..घडी   अपनी दोनों बांहे   आहिस्ता  आहिस्ता   फैलाती    है .......  .मोबाइल की . कोंटेक्ट लिस्ट में नाम को स्क्रोल करते  करते किसी  नाम पे रुक गया  हूं......

जिंदगी माने !

 .
अक्सर बांट कर या टुकडो में ही पी है
 
एक्स- रे दिल को धब्बो को कहां
  दिखाता है 
 किसी-किसी  रोज तेरी बहुत तलब लगती है जिंदगी!!







75 टिप्‍पणियां:

  1. लौटकर आने का शुक्रिया हुज़ूर...!
    टचवुड टच कर गया आज तो.. कोंटेक्ट लिस्ट के नाम पर आकर रुकना.. ओह इसे पढ़कर जो मैं ठिठका हूँ..
    पुरानी शराब का और नशा आपका कभी कम नहीं होता... ढेंन ट ढेंन..

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  2. अच्छा हुआ
    जो तुमने तोड़ दिया
    उस इकरारनामे को
    जिसके मुताबिक ना हमें मिलना था
    ना बात करनी थी
    पिछले आधे घंटे से
    दरअसल .......
    मै तुमको ही सोच रहा था
    पिछले आधे घंटे से ........
    मेरे शहर में भी बारिश है
    टचवुड !!!!

    Splendid...realy.

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  3. क्या बात है डॉक्टर साहब,
    किसी-किसी रोज तेरी बहुत तलब लगती है जिंदगी!!

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  4. dil ki baat..dil se nikali hai..aur dil tak aayi hai...ye..vo kuch nahi kehna hai ..bas inmein hi kahin chuchap rehna hai ...badhai aapko :)

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  5. "इन गर्मियों में फिर दिन को उगने का सलीका नहीं आया ..."

    शुक्रगुजार हूँ ऐ दिन, वरना ये मिस हो जाता...वैसे कुछ चीजें बेतरतीब न हों तो सूनापन नहीं लगता?

    टचवुड !!!!... जाने कितने ही भूरे-काले बादलों का पानी संभाले है ये टचवुड..बस कमाल है साहब.

    किसी-किसी रोज तेरी बहुत तलब लगती है जिंदगी!!............ उफ़,अनकही जाने कितनी रातें, बारिश की बूंदों को धोती शामों के कितने आँसू, .. कोई गाढ़ा सा गोंद..जो न हो के भी पसीने से तर हाथों पर पेंट की परतें चिपका देता है... वाकई वैसे दिन बहुत तलब लगती है जिन्दगी की... दो शब्द कहूँ डाक्टर साहब.."टू गुड"

    जुदाई... पर नहीं कहूँगा, अभी नाप रहा हूँ, कुछ मिले, फिर लौटूँगा...जादू उतरे तो फिर पढूँ उसे...

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  6. अक्सर बांट कर या टुकडो में ही पी है
    एक्स- रे दिल को धब्बो को कहां दिखाता है
    किसी-किसी रोज तेरी बहुत तलब लगती है जिंदगी!!

    वाह्…………………कितनी गहरी बात कह दी…………………बहुत सुन्दर्।

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  7. टचवुड डाक्टर साहब आप इतने दिनों बाद लौटे तो हैं, और लौटे भी पूरे मूड में है, एक पूरी डाक्टर अनुराग स्टाइल पोस्ट पढ़कर इन बारिशों का मजा दुगुना हो गया।

    अच्छा हुआ
    जो तुमने तोड़ दिया
    उस इकरारनामे को
    जिसके मुताबिक ना हमें मिलना था
    ना बात करनी थी
    पिछले आधे घंटे से
    दरअसल .......
    मै तुमको ही सोच रहा था
    पिछले आधे घंटे से ........
    मेरे शहर में भी बारिश है
    टचवुड !!!!

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  8. बहुत कॉम्प्लेक्स सोचते और लिखते हो भाई ।
    क्या ये ज़टिलता जिंदगी ने है सिखाई ?

    अक्सर बांट कर या टुकडो में ही पी है
    एक्स- रे दिल को धब्बो को कहां दिखाता है
    किसी-किसी रोज तेरी बहुत तलब लगती है जिंदगी!!

    अब तक तो इस वेदना की आदत पड़ गई होगी ।

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  9. इन गर्मियों में फिर
    दिन को उगने का सलीका नहीं आया ...

    बेहतरीन पंक्तियाँ।

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  10. बरसाती मौसम में दिल दिमाग और कलम सब आशिकाना हो गया है आपका....

    टू गुड !!!

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  11. व्व्व्व्वाऽऽऽऽह....! ये है खालिस अनुरागाना मूड....! जिसमें सभी बह रंग जाते हैं...!

    कमेंट बाद में कर रही हूँ, फोन पहले किया, लोगो को सुनाने को कि क्या बात कह दी डॉ० साब ने...!

    अच्छा हुआ जो तुमने खुद ही....

    सोच रही हूँ कि सबको वही नज़्म क्यों पसंद आई जो मुझे आनी थी...!

    सेंटी हो गये हम और नॉस्टेलजिक भी....!

    अभी तो इतनी आह्लादित हूँ कि कमेंट में शब्द भी नही बढ़िया ढूढ़ पा रही...!

    फिर आऊँगी.. फिर, फिर आऊँगी...!

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  12. "इन गर्मियों में फिर
    दिन को उगने का सलीका नहीं आया ..."


    हर दिन सलीकेदार हो,
    यह भी कोई बात है भला

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  13. लिस्ट में किसी एक नाम पर रुकना...फोन में, ऑरकुट में, फेसबुक में या गूगल में...

    शब्दों को इतनी खूबसूरती से ढालते हैं आप कि दिल बस उफ्फ्फ्फ़ करके रह जाता है.

    आपकी लेखनी...टचवुड

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  14. अनुराग जी ! आपकी लेखनी इतना अनुराग बरसाती है कि बस टचवुड ही कहना पड़ता है सचमुच ! लगता है किसी खूबसूरत वादी मे पहुँच गए हों .....और कोई गुनगुना रहा हो दूर से ....या फिर पत्तों ने ही सरगोशी की हो....,गुलजार जी याद हो आते हैं बरबस ।

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  15. सभी एक बढ़कर एक हैं. कुच पंक्तियँ, कुछ शब्द बेहतरीन हैं...

    दिन को उगने का सलीका नहीं आया ..

    टचवुड !!!!

    घडी अपनी दोनों बांहे आहिस्ता आहिस्ता फैलाती है .

    एक्स- रे दिल को धब्बो को कहां दिखाता है
    ..उम्दा पोस्ट.
    ..आभार.

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  16. डूब गये है डॉक्टर साहब दोपहर से डूबे पड़े है
    टचवुड !!!!

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  17. ओर त्रिवेणी खास तौर से इसकी पंच लाइन


    "किसी-किसी रोज तेरी बहुत तलब लगती है जिंदगी!!'

    दिल की तलब को ओर बढ़ा देती है


    टचवुड !!!!

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  18. एक्स- रे दिल के धब्बो को नहीं देखा पाता ... डाक्टर शब्दों की टोर्च से उन्हे उघाड़ कर दिखाता है...

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  19. इन गर्मियों में फिर
    दिन को उगने का सलीका नहीं आया ...

    पिछले आधे घंटे से ........
    मेरे शहर में भी बारिश है
    टचवुड !!!!

    आपको पढ़ना किसी रूमानियत से भरी शाम में किसी पहाड़ के व्यू प्वाइंट पर बैठकर चोटियों के पीछे डूबते सूरज को निहारना है.
    शराब तो कभी चखी नहीं, लेकिन कुश की इस बात से सहमत " पुरानी शराब का और नशा आपका कभी कम नहीं होता... ढेंन ट ढेंन.."

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  20. सुंदर एहसासों को सुंदर शब्दों से सजाया हें.

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  21. aapake observations aur abhivyakti kamal ki ahi. aap film director ban sakte hai!!!!

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  22. रिक्शा वालो ...खोमचे वालो ...की संगत में
    .देर तक बैठा रहता है
    इन गर्मियों में फिर
    दिन को उगने का सलीका नहीं आया ...
    क्या बात है अनुराग जी, जिन्दगी को महसूसना तो कोई आपसे सीखे ।
    पूरा लेख कवितामय और सारी कविताएँ एक टीस का अनुभव देती सी ।

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  23. रोज़मर्रा की बातों से ज़िंदगी को निकाल लाए हैं ....बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति

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  24. बहुत उम्दा ...
    लाजवाब प्रस्तुती ||

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  25. क्या कहें....
    हमें भी लगता है
    कभी खुद से किया
    वो इकरारनामा तोड़ दें.....
    एलबम अब नहीं पलटते
    हर बार नजर एक ही जगह रुकती है
    कमबख्त बारिश भी हर बार भिंगोती है
    आपके ही शब्दों में कहूं तो एक्सरे में भी दिल के धब्बे नहीं दिखते......

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  26. किसी ने खुदा से पूछा की ये दुनिया क्या बना दिए हैं आप ! जवाब था रंगमंच है ! फिर भी इस दुनिया का सच देखिये कि उसे ही अवतार आदि विधानों से यहाँ आना पड़ता है , कितना यथार्थ है ! दिल के मुंशी को पता है कि एब्सेंट को लाल नहीं हरी कलम से लिखा जाय , पर दिल तो बना ही लाल से हैं , कैसे बच सकेगा !

    जिन पंक्तियों से गुजरा हूँ इस पोस्ट पर , उसका कवि ठहरा हुआ है , ऐसी स्थिति में सहज ही घड़ी , दिन , ,,, आदि समय के बँटवार कचोट से रहे हैं , पर आगे तो चलता ही होगा भले ही 'किसी दिन जिन्दगी की कितनी ही तलब' क्यों न लगी हो ! हमारा रुकना भी नियत है , उसी में वेदना-वेदित हो लें जितना चाहें ... आगे फिर गति !

    और यह आप लोग गुलजार की 'तेरे उतारे हुए दिन' देकर बड़ा बढ़िया करते हैं , चप से एक बार यू-ट्यूब पर चला जाता हूँ ! ३ मिनट की यह पीस एक काव्य की यात्रा सी करा देती है ! आभार !

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  27. लिस्ट में रुकना... और घंटी जाने के पहले फ़ोन काट देना...

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  28. एक्स- रे दिल को धब्बो को कहां दिखाता है
    अल्ट्रासाउंड बारे क्या विचार है जी
    सुंदर वाह !

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  29. आपके ब्लॉग पर देर में पहुँचो , तो ज्यादा टिप्पणियों के नीचे जाकर कमेन्ट करने में काफी देर लगती है ...जिन्दगी की तलब ...ये अन्दर का संवेदन शील मन ही तो बोल रहा है ...आपकी भाषा ही बोलूंगी ...आज सफ्हे पे उदासी है ...

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  30. एक्सरे में भी दिल के धब्बे नहीं दिखते......
    हम तो बस यहीं ठहरे हैं ...!

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  31. अगरचे तुम न तोडती तो......शायद .....................कभी -कभी यूं भी होता है.......... के सुबह सुबह मोबाइल सिर्फ वक़्त देखने की खातिर नहीं उठाया जाता .....

    'दिन सलीके से उगा रात ठिकाने से रही
    दोस्ती अपनी भी कुछ रोज ज़माने से रही "......

    ..निदा फ़ाज़िल........गुलज़ार .... ..बारिश .....ओर लफंगे......

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  32. आज दिनांक 31 जुलाई 2010 के दैनिक जनसत्‍ता में संपादकीय पेज 6 पर समांतर स्‍तंभ में आपकी यह पोस्‍ट कहानी का सबक शीर्षक से प्रकाशित हुई है, बधाई। स्‍कैनबिम्‍ब देखने के लिए जनसत्‍ता पर क्लिक कर सकते हैं। कोई कठिनाई आने पर मुझसे संपर्क कर लें।

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  33. इस डॉक्टर को किसी गुलज़ार की नज़र ना लगे .....जों हो सकता तो ब्लॉग चुरा लेती ...जिसे सिर्फ हम पढ़ते .....यहाँ ब्लॉग में तारीफ का चलन है ..तो कर दूं क्या ...टचवुड नहीं करती
    गोया दिन उगा करते है ....आप पौधों पे सितम करते हैं ....जिंदगी.....हाँ मुलाकाते अक्सर होती हैं....एक बात और...ये मोज़िला हमारा तो दुश्मन नहीं ...आप कन्फर्म करिए ..ना माने तो इंजेक्शन ठोक दीजिये .....क्या पता सुधर जाए :-)

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  34. कमोबेश सबके जीवन में कुछ मेल आई डी, फोन नो. या खतों वाली फाइल में कुछ ख़त ऐसे होते ही होंगे जो ठिठक कर आपका कुछ वक़्त जाया करते हैं. हैरत की बात तो यह है की हमें खुद को उन पलों में जाया करना अच्छा भी लगता है और हम उनसे उबते भी नहीं...

    दिल से चले थे हम हर मुआमला साफ़ करके,
    कहने में उनके सामने बात बदल बदल गयी...

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  35. कहने को कुछ भी नही है... कुछ भी नही.. बार बार पढने के बाद ’सिर्फ़’ लाईक करके जा रहा हू...

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  36. ना दिन को उगने का सलीका आया... ना बारिशों ने वक़्त बे-वक़्त बरसना छोड़ा... एक्स-रे आज भी दिल के धब्बे नहीं दिखता... सब कुछ वैसा ही है... हाँ वो भी... वो जिसकी प्रेसेंस नक्श है अब तक ज़हन में... के जिसका नाम पढ़ के गुज़रते लम्हें आज भी ठिठक जाते हैं... एक बार फिर ज़िन्दगी की तलब लगती है... तो लगता है दिल के किसी कोने में "ज़िन्दा" होने का एहसास आज भी जीवित है... मरा नहीं... टचवुड...

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  37. डाक्टर साहब हम तो दीवाने हैं आपके...जैसे आप शब्दों से खेलते हैं वैसे किसी और को खेलते नहीं देखा या पढ़ा...भाई कमाल करते हैं आप...सच...अब कितनी तारीफ़ करें और क्या तारीफ़ करें...गज़ब का लिखते हैं आप गज़ब का...वाह..
    नीरज

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  38. कुछ तो नाजुक मिजाज हैं हम भी
    और ये चोट भी नयी है अभी..

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  39. कुछ तो नाजुक मिजाज हैं हम भी
    और ये चोट भी नयी है अभी..

    उत्तर देंहटाएं
  40. bahut khoob.... mazaa aa gaya...

    S O R R Y
    mazaa to aana hi tha...
    har baar ki tarah khoobsurat post)

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  41. डॉक्टर साब आप तो डरमैटौलजिस्ट हैं ना, ये दिल में चीरा लगाना कहां से सीख लिया हुजूर। छा गए..टचवुड

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  42. ,तेरे उतारे हुए दिन पहन के अब भी ,तेरी महक में अब भी कई रोज काट देता हूँ..
    .........................
    किसी-किसी रोज तेरी बहुत तलब लगती है जिंदगी!!
    ....................
    कुछ और कहने की ज़रूरत अब नहीं शायद.

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  43. वैसे ये वीडिओ बहुत परफेक्ट लगाया है ....कई बार देखा है इसे ....फिर से एक बार दोहराता हूँ :)
    और हाँ, पढना और डूब जाना .....यही तो हुआ है पिछली दफा.....देखें इस बार क्या हो

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  44. ओह अनुराग जी
    अब समझी आपकी पहली नज़्म का मतलब आप दिन को सूरज के जरिये रिक्शा वालो ओर खोमचे वालो के सर पे खड़ा रहने की वजह से बोल रहे है सलीका नहीं आया .

    उत्तर देंहटाएं
  45. इस बार बहुत दिनों के बाद नज़्में पढ़ने को मिली. तीनों अलग मूड की और अपने अपने अंदाज में लाजवाब. दूसरे वाली ख़ास पसंद आने का कारण है कि इन दिनों के मौसम का इम्प्रेशन इस नज़्म में घुल रहा है. और इसमें कुछ बेहद फीलिंग्स के छोटे छोटे हिस्से मुस्कुराते हैं.

    अक्सर बांट कर या टुकडो में ही पी है
    एक्स रे दिल के धब्बो को कहां दिखाता है

    किसी-किसी रोज तेरी बहुत तलब लगती है जिंदगी!!

    त्रिवेणी बढ़िया है.

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  46. कल रात ही आपकी पोस्ट के बारे में और आपके कॉल के बारे में बहन कंचन से बातें हो रही थी... दिल बेचैन था के कब पढूंगा इस पोस्ट को जब सुना के आपने खालिस नज़्म लगाई है , कुछ बातें नहीं बताऊंगा लोगों की नज़र लग जाएगी हमारी दोस्ती पर ... आज के दिन की भी मुबारक बाद देता चलूँ...


    अर्श

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  47. एक बेहद सिंपल सा मगर उतना ही पसंदींदा शेर याद आता है किन्ही कबीर साब का..

    जिंदगी एक आँसुओं का जाम है
    पी गये कुछ और कुछ छलका गये

    कुछ यही फ़ीलिंग आती रहती है..आपकी पोस्ट्स से गुजरते हुए..’छोटे’ लोगों की संगत का असर होता है दिन पर कि सलीका नही आता है..नशे मे लुढ़का रहता है किसी भीड़ भरे रास्ते के कोने मे...दिन का अपना आदिम दर्द है..बरसता रहता है..रात भर भी..
    ..हमारे समझदार दिमाग के किसी अँधेरे कोने मे कोई भूला हुआ अनपढ़ सा खयाल छुपा रहता है..हमारी बेखबरी के बीच..जो दिमाग के झूठेपन की गवाही देता है..दिमाग के अँधेरे कोनों मे हमारी छुपी हुई ख्वाहिशें बरहना हो जाती है..वहाँ पर समझ की आँच, नैतिकता की टार्च नही पहुँच पाती है..मगर यही एक चीज है जो जिंदगी को आगे बढ़ाये जाती है..ख्याल कैलेंडर की सात लेनों मे खड़ी जिंदगी की उँगली छुड़ा कर चुपके से भाग जाते है..उन भूली हुई गलियों की ओर..मगर दिल की अपनी मजबूरियाँ भी रहती हैं, अपनी हदें...कि उंगलियाँ मोबाइल के किसी नंबर पर ठिठकी रहती हैं देर तक..फिर आगे बढ़ जाती हैं..कुछ सांसे और गारत हो जाती है..तलब कम नही होती बढ़ती जाती है..दिल के धब्बों की तरह....
    आँसुओं के जाम जिंदगी के ओठ और नमकीन कर जाते हैं...
    बस यही कुछ..

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  48. अपूर्व जी की टिप्पणी पोस्ट को और सार्थक बनाती है। कहने से रोक ना पाई खुद को....

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  49. दिल मुंशी तो ख़ास पसंद आई, ऐसा लगता है बहुत आहिस्ता और मुलायमियत के साथ आप बड़ी गहरी बातें कर-कह जाते हैं आप।

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  50. खनकते शब्दों से जिंदगी की सच्ची बातों को बडे दिल से लिख दिया आपने। कम शब्दों से बहुत कुछ बयान करता है आपका लेखन। "दिल को उगने का सलीका नहीं आया...... टचवुड.....पिछले शुक्रवार की रात किसी ने एब्सेंट लगायी थी........मोबाइल की . कोंटेक्ट लिस्ट में नाम को स्क्रोल करते करते किसी नाम पे रुक गया हूं......किसी रोज तेरी बहुत तलब लगती है जिंदगी!..... क्या कहूँ इन शब्दों के जादू के बारें में....... जो एक अलग सा अहसास पैदा करते हैं।.... गाना नहीं सुन पाया बहुत रुक रुक कर चल रहा। आपकी हर पोस्ट संजोकर रखने के लिए लायक होती है।

    उत्तर देंहटाएं
  51. अच्छा हुआ
    जो तुमने तोड़ दिया
    उस इकरारनामे को
    जिसके मुताबिक ना हमें मिलना था
    ना बात करनी थी
    पिछले आधे घंटे से
    दरअसल .......
    मै तुमको ही सोच रहा था
    पिछले आधे घंटे से ........
    मेरे शहर में भी बारिश है
    टचवुड !!!!

    अभी ठहरी हूँ इन पंक्तियों पे ......टचवुड....!!

    उत्तर देंहटाएं
  52. कहाँ हो डा० साब? गज़ब मिस किया है आपको...विगत एक-डेढ़ घंटे से। खुद घोषणा करते हो कि मोबाइल स्विच आफ करना सामाजिक अपराध है और खुद ही ये अपराध कर रहे हो। मन सेंटियाया हुआ है कि कई रातों की भटकन के बाद एक रात मिली है लैपटाप के संग...कि मेजर सूरी बेतरह याद आ रहा है...कि आपके संग ली रेड लेबल की खुमारी अब भी होठों पे बदस्तुर बैठी हुई है..कि दरअसल "इस पिछले आधे घंटे से से किसी को सोचने" की जोहमत में "बारिश का शहर में" टपकना एक किसी विचित्र संयोग का भान दिलाता है...कि जिंदगी के चंद आखिरी क्षणों में मोबाइल के कांटेक्ट लिस्ट से कुछ नामों को डिलिट करने का ख्याल आखिरी ख्याल था...कि ऐसे हर लम्हों में कमबख्त जिंदगी की बहुत तलब लगती है।

    ऐसी नज़्में न लिखा करो कि...मन बस दीवानावार घूमने का मूड बना ले,सुलगती वादी जब कुछ और माँग रही हो कर्तव्य के नाम पर ।

    उधर किसी सरफिरे के स्वांग भरे पोस्ट पर आपके शब्द आपकी टिप्पणी अजब-सा भरोसा दिलाती है दोस्तों पर फिर से तो इधर इस "एक्स-रे दिल के धब्बों को कहाँ दिखाता है" का ऐलान फिर्र-फिर सी उसी भरोसे पर मुस्कुराने को विवश करता है।

    आज जब फुरसत मिली, मूड बना आपसे बतियाना को तो जाने क्यों सूरी बड़ा याद आया।

    hey, dont write such nazms....you are driving so many people crazy at the same time!

    ...और हाँ इस लफंगे की बाबत एक कड़क सैल्युट!

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  53. मेसेज की आमद:
    वो कहती है "तुम खुद कभी सॉरी नहीं कहते. सब दरवाज़े बंद कर देते हो. एक अच्छी बात ये है कि दरवाज़े के नज़दीक ही (और कभी कभी दरवाज़े का हेंडल पकड़ के) खड़े रहेते हो. कोई आये और खटखटाए और तुम लपक के दरवाज़ा खोल लो."
    टच वूड शोना आज तुमने फिर दरवाज़ा खटखटाया.

    उत्तर देंहटाएं
  54. मेसेज की आमद:
    वो कहती है "तुम खुद कभी सॉरी नहीं कहते. सब दरवाज़े बंद कर देते हो. एक अच्छी बात ये है कि दरवाज़े के नज़दीक ही (और कभी कभी दरवाज़े का हेंडल पकड़ के) खड़े रहेते हो. कोई आये और खटखटाए और तुम लपक के दरवाज़ा खोल लो."
    टच वूड शोना आज तुमने फिर दरवाज़ा खटखटाया.

    उत्तर देंहटाएं
  55. फिर आई थी .....

    अच्छा हुआ
    जो तुमने तोड़ दिया
    उस इकरारनामे को
    जिसके मुताबिक ना हमें मिलना था
    ना बात करनी थी
    पिछले आधे घंटे से
    दरअसल .......
    मै तुमको ही सोच रहा था
    पिछले आधे घंटे से ........

    पर नज़रें फिर यहीं अटकी रहीं .....

    और ये नाना पाटेकर की दिलकश आवाज़ ...कहीं भीतर तक उतरती है .......!!


    hey, dont write such nazms....you are driving so many people crazy at the same time!..(चोरी के हैं )

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  56. आवारा !!
    एक पेरेंटीयल एड्वाएज़:
    सर अगर दिन को सलीके सिखाने हैं तो उसे सुबह किसी सोफ़ेसटिकेटेड पार्क में अपनी बीच की ऊँगली पकड़ के घुमाएं. दिन को बचपन से ही बिगाड़ रहे हो आप.
    ...क्यूंकि जिनकी संगत में आप सुबह सवेरे हो लेते हो वो "दिन के भविष्य के लिए" खतरनाक है.देख लेना यही दिन एक दिन बड़ा होकर...

    ...उन सालों के लिए तो जिंदगी ही जीने को कम पड़ जाती है. सलीका तो सपनों का भी एक्सटेंशन है वहाँ.

    उत्तर देंहटाएं
  57. आपकी त्रिवेणी और हेड-लाइन पढकर जिंदगी को उलहाने देने का मन होता है...
    सबको आती है सबकी बारी से,
    मौत मुंसिफ है कमोबेश नहीं.
    जिंदगी (तू) सबको क्यूँ नहीं आती.

    उत्तर देंहटाएं
  58. उदासी के किसी मौसम से बरसी हुई सी लगी ये नज्में... कुछ भीगा सा कुछ धुला सा अहसास लिए पत्तों की कनखियो से टपकती नज्में....
    अच्छा हुआ
    जो तुमने तोड़ दिया
    उस इकरारनामे को
    जिसके मुताबिक ना हमें मिलना था
    ना बात करनी थी
    नहीं मिलते न मिले,कोई मर न जायेगा खुदा का शुक्र है पहले मोहब्बत आप ने कम की..

    दिल मुंशी ऐनक के ऊपर से वही खाते सा हिसाब किताब देखता रहता है.अभी दिन का हिसाब करता है फिर किसी का वादाए शब् याद आ जाता है.

    मोबाइल की . कोंटेक्ट लिस्ट में नाम को स्क्रोल करते करते किसी नाम पे रुक गया हूं......

    न जाने कब वो पलट आये दर खुला रखना.
    गये हुओ के लिए दिल में कुछ जगह रखना.

    उत्तर देंहटाएं
  59. कोंटेक्ट लिस्ट में नाम को स्क्रोल करते करते किसी नाम पे रुक गया हूं......
    9463244(zindagi)-143
    एक बार तेरा नाम डिलीट किया था तुझसे (और खुद से ) झूठ मूठ नाराज़ होकर, तब से तेरा फोन भी नहीं आया.मोबाइल तब से ही अभिशप्त है.
    ...अब अपने पुराने दूध वाले का कॉन्टेक्ट भी डिलीट नहीं करता. दूध का जला जो हूँ...

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  60. डॉ. अनुराग जी
    नमस्कार !
    पहली बार आपके यहां आना हुआ ।
    आया तो पता चला , आप तो नज़्म लेखन में ख़ास महारत रखते हैं ।
    पिछले आधे घंटे से
    दरअस्ल …
    मै तुमको ही सोच रहा था
    पिछले आधे घंटे से …
    मेरे शहर में भी बारिश है

    सच , अंदर तक पहुंचती नज़्में !

    बधाई !

    शस्वरं पर भी आपका हार्दिक स्वागत है , आइएगा कभी …

    - राजेन्द्र स्वर्णकार
    शस्वरं

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  61. आपकी बाकी पोस्ट्स के मिज़ाज से बहुत अलग नहीं हैं नज्में.आपका विशिष्ट अंदाज़ यहाँ भी झलकता है.शब्द बेहद अनौपचारिक भाव से, ज़ाहिर तौर पर निर्भार,स्फूर्त.पर किसी गहन को बुनते हुए.

    सिर्फ इतना कि 'वाह'निकलती है और एक 'आह'मन में छूट जाती है.

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  62. पिछले आधे घंटे से
    दरअसल .......
    मै तुमको ही सोच रहा था
    पिछले आधे घंटे से ........
    मेरे शहर में भी बारिश है
    टचवुड !!!!


    जम गयी बात ...टच वुड

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  63. @दर्पण
    दिन के साथ यही प्रोब्लम है भई..हम दिन को दुनिया के मंहगे कान्वेंट मे सुबह भर्ती कराते है..कि जिंदगी के सलीके सीख कर दिन सक्सेसफ़ुल की डेफ़िनीशन पर खरा उतर पाये..एक चतुर शिकारी की मानिंद..मगर यही कम्बख्त दिन वक्त जैसे कठोर वार्डेन से नजरें बचा कर तहजीब के तमाम किताबी क्लास बंक कर देता है..और स्कूल से भाग कर किसी तीसरे दर्जे के सिनेमाघर मे लगी चौथे दर्जे की फ़िल्म मे दोपहर गारत कर देता है..या अपनी टाई को जेब के हवाले कर..जा कर बैठा रहता है रिक्शे खोमचे वालों के बीच शाम की बारिश के नशे जैसा..दुनिया की भीड़ भरी राहों से दिन चुपके से गुजर जाता है..जिंदगी की शिकायत बढ़ती जाती है...मगर कुछ दिन ऐसे भी होते है..सहमे हुए..जो उसी जेल मे सलीकों की क्लास के बीच खिड़की की सींखचों को भींच कर खड़ा रहता है..हाथ बढ़ कर छूने की कोशिश करता है बाहर के आसमाँ के उस हिस्से को जो थोड़ा और दिलकश और नीला दिखता है..हाथ पहुंचता नही कभी वहाँ..हार कर जिंदगी की स्याही के नीलेपन से ही उँगलियों को रंगता है..क्या जानते हो कि उस दिन को स्लीपवाकिंग की बीमारी होती है...अक्सर रात मे नींद मे चलता है..भागता रहता है किसी से..

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  64. touchwood,sach dil ko c doc saab.chu gaya.bahut dino baad aapko padhne ka sukun mila hai.wo moral of the story wala post bhi behtarin laga.sab par tippani nahi kar paa rahi ,sorry.magar padha sab kuch.sadar mehek

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  65. डॉ साहब ,आपको पढ़ा है,,लेकिन ऐसे भी नहीं कि
    ज़िंदगी ही की तलब होने लगे.....
    और
    पिछले आधे घंटे से ...
    मेरे शहर में भी बारिश है
    वाह !!
    अन्दर सब धुल-सा गया है पढ़ कर , वाह !!

    अभिवादन स्वीकारें

    उत्तर देंहटाएं
  66. bahut hi khoob.... bahut acha laga pad kar....likhte rahiye...

    Meri Nayi Kavita par aapke Comments ka intzar rahega.....

    A Silent Silence : Naani ki sunaai wo kahani..

    Banned Area News : Kim Kardashian confirms dating football player

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  67. कारोबारी दुनिया में प्रेसेंट .. रोज दर्ज करनी होती है ....जरूरी ....गैर-जरूरी कितने मसले है .......कुछ उलझाते है ...कुछ को फलांगता हूं ..घडी अपनी दोनों बांहे आहिस्ता आहिस्ता फैलाती है ....... .मोबाइल की . कोंटेक्ट लिस्ट में नाम को स्क्रोल करते करते किसी नाम पे रुक गया हूं......


    the bitter truth of our daily routine and this busy{for other's} life...
    thank you for writing which is felt by everyone...

    उत्तर देंहटाएं
  68. आज मौसम का कसूर है या फिर कुछ और बस आज गीतों में डूबा हूँ। बस अभी याद आया कि विडियों लगाया था आपने अपनी पोस्ट में वो नही सुन पाया था सो आज चला आया। पहली बार सुना है। अच्छा लगा सुनकर। नाना जी की आवाज दमदार हैं। और शब्दों की तो बात ही कुछ ओर है। गुलजार जी के है ना।

    उत्तर देंहटाएं
  69. सुन ज़िन्दगी, किसी किसी रोज़ तेरी बहुत तलब लगती है! ३-४ दिनों से टुकड़ा टुकड़ा कर के आप के ब्लॉग के सारे पोस्ट्स पढ़ रहा हूँ - यह एक लाइन पढ़ कर मतलब जो भर रहा था वो छलक गया. क्या लिखते हो आप! बस और ज्यादा कुछ नहीं कहूँगा अभी, आगे पढता हूँ!

    उत्तर देंहटाएं

कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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