2010-08-15

"चिरकुटाई की डेमोक्रेसी'

गुप्ता जी सुबह  सुबह अपनी नयी गाडी दिखाते है ..." सेक्सी" ....मै कहता हूँ ... उनका सत्रह साल का लड़का मुझे हैरानी से देखता है ...दस बारह साल हॉस्टल में रहने के बाद हर शानदार चीज़ को सेक्सी कहने का आदत को डीज़ोल्व  होने  में काफी  वक़्त लगता है .........सभ्य  समाज  की अपनी शिष्ट  भाषाये  है ... उन दिनों   ढाबे की तड़का दाल से लेकर ....  अलेन सोली की व्हाईट  शर्ट  सेक्सी होती थी.....
फिर तुम लोग "असल" से कैसे डिफरेनशियेट करते हो .... उन दिनों  लडकिया पूछती ...
हो जाता है..यार .....
सभ्य समाज की कई अजीब सी मुश्किलें भी है ....पुणे के उस पांच सितारा होटल में मेरे साथ ठहरे डॉ साहब फ्लाईट के  उतरने के बाद से  ही  परेशान है ...उम्र में मुझसे पंद्रह साल बढे वे कमरे में चहलकदमी कर रहे है ....क्या हुआ बॉस  ?मै पूछता हूँ......
यू पी में मेडिकल में सीनियर को बॉस कहा जाता है
इतना बड़ा होटल है  ...ओर एक भी इन्डियन टोइलेट नहीं... है.
आख़िरकार अगली सुबह
   कोंफ्रेस  हौल के ऑडीटोरियम के पीछे एक इन्डियन टोइलेट मिल जाता है   ओर उनकी जीवन में दिलचस्पी पुनः जाग जाती हैवे अक्सर कोंफ्रेस में मेरे रूम मेट रहते है ....इंदोर की उस यात्रा में भी वो मेरे साथ है. डॉ साहब इंदोर के  सियाजी होटल में रिसेप्शन पर इंडियन टोइलेट की बाबत सुझाव पुस्तिका में अपनी राय दर्ज करते है .... ...........इस देश के उन सभी होटले में जहाँ जहाँ वे ठहरे  सुझाव पुस्तिका  पर उनकी इस बाबत राय दर्ज है .....
ऊपर कमरे में पहुंचकर सूटकेस खोलते ही ..मै जान जाता हूँ एक बहुत आवश्यक चीज़ पेक करनी भूल गया हूँ .....अंडरवियर!!
...कांग्रेंस हौल से लौटते  वक़्त ..रास्ते में ले लेगे .वे सुझाव देते है .....
वापसी में वो ड्राइवर को
वेस्ट साइड के आगे रोकने पर मुझे  हैरानी से   कहते है .... यहाँ
डिजायनर  यही मिलते है ..
डिजायनर?

तो आपके ज़माने में भी तो होते थे ....अलग अलग पट्टियों वाले ....मै कंधे उचका  देता हूँ
पंद्रह मिनट  से ज्यादा वक़्त लगने पर वे हैरान होते है ...इसमें इतना क्या सोचना भाई?कोई भी  उठायो ओर चल दो …..
रचनात्मक दृष्टिकोण से देखे तो ये विचारो  में परिवर्तन है.......ओर आम भाषा में कहे .....जाने दे...हर चीज़ को कहना जरूरी  तो  नहीं है....
बिल की लाइन में  ठीक हमारे  आगे सफ़ेद शर्ट ओर जींस पहने एक  सेक्सी .कन्या खड़ी है .....कुछ सेकण्ड बीतते  ही  वे  इतनी  जोर  से  डकार लेती  है  के  हम थोडा पीछे हट जाते है ..सोचते है शायद "एक्सम्यूस-  मी कहेगी...पर लगता है किसी सरकारी स्कूल की पढ़ी हुई है .जहाँ ये कहना नहीं सिखाया जाता......

  सी कोंफ्रेंस के कुछ ओर संभावित खतरे भी है . …... .....साइड इफेक्ट्स .....ऐसे ही एक  बड़े खतरे हमें लिफ्ट  में टकराते है .... हमारे  एक सीनियर ... चिरकुटाई के भी वीर होते है ..... ये उन लोगो में से है…. जिनको सामने देख आप ऊपर वाले से कहते है ..".ये क्या . खुदा अब भी. बिना चेतावनी के फायर..." .... 
  उनके .मुंह में कुछ  है.. ..पिछले नौ सालो से  उनके मुंह को कभी  खाली नहीं देखा है.... उनका मानना है  के गाली एक तरह की अप्रत्यक्ष श्रदांजलि   है ......भरी भीड़ में भी वे आपको श्रदा के सुमन जोर से अर्पित करते है ..... लिफ्ट बड़ी जालिम  शै  है ...हमें उस दिन अहसास होता हैछिपाने की.तमाम कोशिशो के बावजूद हमारे हाथ में  किताब पर उनकी निगाह गयी है.
"#**साले अभी भी कविता लिखते हो.....
 गोया  कविता  लिखना  कितनी  फिजूल  बात  है .हाउ बोरिंग ! हम आत्म ग्लानि सी महसूस करते है
"#** 'इता टाइम कहाँ से निकाल लेते हो "...उनका अगला सवाल है  
जिसका  सीधा  सा  हिंदी  तजुर्मा  ये   है  के  आप   इत्ते  ठलुवे   है  .
"#** देखे कौन सी किताब है "....वे जबरिया किताब हथिया लेते है ....मोहन दास ए  ट्रू स्टोरी ऑफ़ ए मेन,हिज़ पीपुल एंड हिज़ एम्पायर -राजमोहन गांधी ......पीछे पलटकर प्राइस टेग देखते है .
". #**गांधी  पे साडे  छह  सौ रुपये  खर्च  करते हो...."
साथ में उनकी पत्नी यूँ हमें देखती है जैसे कृषि दर्शन देख रही  हो ..
. ये  पान आप लाये कहाँ से  ..इस एरिया में तो मिलता नहीं .हम पूछना  चाहते है.पर पूछते  नहीं .इससे  वार्तालाप आगे बढ़ने का खतरा है .. .....
१६ सालो .. ने उन्हें अब भी नहीं बदला है....चिरकुटई उम्र की पाबन्दी नहीं मानती है ...न लिंग भेद में विश्वास रखती है ....उनकी पत्नी को गौर से देख हम सोचते है के क्या ये कंटाजीयस भी होती है .... हम अब भी  सोच रहे के कौन से सूत्रों से इसके कंटाजीयस होने की तस्दीक की जाए ….यूँ भी इश्क के एक्सपर्ट  हमारे  शुक्ला जी कहते थे ..जब आपकी प्रेमिका आपकी नजरो से दुनिया को देखने लगे तो  प्यार की थ्योरी  को कन्फर्म मान कर नीचे हेंस प्रूव्ड लिखा जा सकता है.....वैसे  हिन्दुस्तान  एक ऐसा देश है  जिसमे ....शादी के बाद  प्यार का प्रतिशत सबसे ज्यादा है ....
मुफ्त की दारु को सूंघने की उनके भीतर विरल शक्ति थी....गोंड गिफ्टेड .. . सूंघते हुए पहुँच जाते  ...फिर इत्ती पीते  . के स्टोक कम पड़ जाता .. रायता फैलाने के कई अवार्ड लगातार उनकी झोली में थे .... कितने वाश बेसिन उनकी गंध से आज भी गंधा रहे है कई पार्टियों के  वे  निर्विवाद  ' क्यूरेटर' रहे ….उनका मानना  था के कोई भी पार्टी  उनकी गैरमौजूदगी में फीकी सी रहती है ...अपनी रचनात्मक भूमिका के लिए वे सदैव आश्वस्तकारी रहे .मुद्राये जुटाकर पार्टी में योगदान को उन्होंने गतिरोध का हिस्सा माना………सामूहिक  अनुभव में  आनंद लेने की इस प्रक्रिया को लेकर उनका मौलिक द्रष्टिकोण अब भी बचा हुआ है .....
किसी ने कहा था के हमें अपने सदगुणों का पता अपने दोस्तों से चलता है ओर दुर्गणों का अपने दुश्मनों से ...वक़्त के मुताबिक  इसे मोडिफाई करने की जरुरत  है 
"#**कहाँ ठहरे हो?" ....वे पूछते है
हम हालात को  तकाजे में तौल कर झूठ का दरवाजे को पकड़ते है ....झूठ  बोलने का सबस बड़ा फायदा ये है की   ये बड़ी स्ट्रेचेबल   चीज़ है ....कितना खीच लो ...बस नुकसान ये  है के  याद  रखना पड़ता है ..... कहाँ कितना खींचा था ……
लिफ्ट रुकी है ...
वे नजदीक आते है .......फिर
  धीरे से फुसफुसाते है ..."#**कोई प्रोग्राम  हो तो  बताना ...."
दरवाजे को पकड़ कर वे फिर मुड़े है
...वैसे ये#** राजमोहन गांधी कौन है..कोई रिलेटिव लगते है गांधी के
 उस रात   हमारे साथ वाले डॉ साहब  अगले दिन  वहां के रजवाड़ा बाज़ार में  कुछ चीज़े देखते है .....ओर मै नब्ज़ देखकर रोग बताने वाली दुकान को ...... सोचता हूँ जाकर ट्राई  कर आयूं पर वे डपट देते है….
ख्यालो  की डेमोक्रेसी देश में भले ही न हो पर  चिरकुटई की कई  दुकाने खुली हुई है ......


पुनश्च : १ ५ अगस्त की रात जब देशभक्ति का ओवर फ्लो हो रहा है मै ऐसा क्यों लिख रहा हूँ......कारण ...नयी तकनीक  के भी कुछ साइड इफेक्ट्स है ...  फेस बुक . ..  अपने मेसेज बॉक्स में  मुंह में मसाले भरी उनकी सूरत का दीदार कराती है .दाई ओर लिखा हुआ है." #**  साले फ्रेंड रिक्वेस्ट  भेजी  है ...एक्सेप्ट क्यों नहीं करते ! खुदा ने अपनी गन फिर लोड कर ली है ... डिशकयूं ...........

नोट- चिरकुट इस देश की नेशनल गाली का शिष्ट अनुवाद है

63 टिप्‍पणियां:

  1. दिलचस्प ! ऐसे चिरकुट हर प्रोफेशन में मौज़ूद हैं। ज्यादा मुँह लगने से अपना मिज़ाज ही खराब होता है, इसलिए इन जैसों को इग्नोर किए बिना कोई चारा नहीं।

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  2. sir... honestly... can't stop myself by smiling continuously, even lil laughed too... and its like everything is just in front of my eyes... awesome... thank you so much for writing on this "sabhya samaj" and else...

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  3. चिरकुटई त्रस्त करने का बड़ा सरल माध्यम है .....और गालियों को सुभाषित की तरह प्रयोग करने वालों की कमी नहीं ... महिला होने के नाते ऐसे लोगों को झेलना और त्रासद हो जाता है.
    इतनी इमानदारी और सरलता से लिखते है की ...कुछ किरदार आसपास खड़े मिल जाते है ...

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  4. "एक्सम्यूस- मी कहेगी...पर लगता है किसी सरकारी स्कूल की पढ़ी हुई है .जहाँ ये कहना नहीं सिखाया जाता...... आपत्तिजनक। अगर नहीं तो क्या यह सिद्ध माना जाये कि जो कन्या डकार लेने के पहले एक्सम्यूस मी कह दे उसका स्कूल गैर सरकारी हो जायेगा। डायलाग में बेहतरी की संभावनायें हैं।

    शुक्ला जी वाली पोस्ट का जनहित में लगाया जाये।

    चिरकुट इस देश की नेशनल गाली का शिष्ट अनुवाद है विस्तार से जानने के लिये चिरकुट चिंतन पढिये:चिरकुटई किसी तर्क की भी मोहताज नहीं है। दूसरा भले की कितना अकल की बात करे लेकिन किसी को चिरकुट कहने का सर्वाधिकार चिरकुट की उपाधि देने वाले के हाथ में रहता है।

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  5. ..और हमें लगा था कि ’कृषि-दर्शन’ से अब तक दूरदर्शन ने भी छुटकारा पा लिया था.. :-)

    वैसे ’लाइफ़’ बड़ी काम्प्लीकेटेड चीज है..कम्बख्त हर चीज, हर इंसीडेंट के लिये एक ठो रियक्शन रहती है..हर आदमी के लिये एक साँचा और हर बात के लिये एक #** ...दुनिया बेसिकली एक बड़े कोल्हू की तरह लगती है..जिसे पेरते हुए नकेलदार बैलों की जमात ही सबसे सक्सेजफ़ुल इंसान की डेफ़िनीशन भी..पुरानी थ्योरी के हिसाब से पृथ्वी ऐसे बैलों के नुकीले सींग पर ही टिकी भी है...जाहिर है जो बिदकने की कोशिश करेगा..आउट ऑव बाक्स होगा..तो उसे देखने को टिकट तो लगेगा है..आउटडेटेड चीजों/आदमियों की कहानियों मे साढ़े छै सौ खर्च करने वाले को लोग शक की निगाहों से तो देखेंगे ही..इतने मे तो एक ठीक-ठाक बोतल आ जाती..रात कायदे से खर्च होती..मगर जब कबीरदास की किस्मत मे ’रात’ भर जागना और रोना ही बदा है तो बेचारे सुखिया संसार का क्या कुसूर है..खुद को बोले ’स्ट्रेचेबल झूठ’ अपनी नींद को भी स्ट्रेच करते रहते हैं बस..

    डॉक्टर हैं..सो निगाहेँ कहीं भी हों..हाथ तो नब्ज़ पर ही रहता है..हमारी!!

    और हाँ ’असल’ से डिफ़रेंशिएट कैसे करते हैं..बताया नही आपने? ;-)

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  6. कुछ लोग कभी नहीं बदलते..स्थान,शिक्षा,अनुभव,उम्र सब उनके आगे पराजित..ये भी उसी समूह से हैं.बल्कि उनके साथ रहने वाले भी उनके जैसे ही हो जायेंगे...कई जगह लगा खूब बढ़िया कटाक्ष किया है ..इस बार चलचित्र नहीं लगा ये विवरण लगा कि कोमिक्स पढ़ रही हूँ ..'मनमें सोचे हुए वाक्यों के साथ जगह' छोटे से बड़े होते हुए बुलबुले 'नज़र आये...:)
    ****माननीय अनूप शुक्ल जी की बात पर गौर किया जाये ...'शुक्ला जी वाली पोस्ट का जनहित में लगाया जाये।'...उन्होंने लिफाफा देख कर जान लिया है कि भीतर क्या लिखा होगा..-----------शुक्ला की पोस्ट से कई नयी जानकारियां मिलने की संभावनाएं हैं .

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  7. कितना भी कोशिश कर लीजिए......बात के साथ *्@.* पहले कई लोग ऐसे लगाते हैं जैसे श्रीमंत कहा जाता है....खासकर दिल्ली में.....यहां तो मुसीबत ये है कि कोई भी हो..कैसा भी हो...अगर बिन स्वाहा वचनों के बात ही नहीं शुरु करता। एक बार अनौपचारिक हुए नहीं कि बिना गाली बात करना बीमारी का लक्षण माना जाता है।

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  8. बढ़िया है डाक्टर साहब.. :)

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  9. Objectionable


    पर लगता है किसी सरकारी स्कूल की पढ़ी हुई है .जहाँ ये कहना नहीं सिखाया जाता....

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  10. 'तुम लोग किसी भी चीज या बात को सेक्सी कह देते हो न'... ये बात २-३ बार कही है लोगों ने. बाकी @#$% इतने दिखे कि बस कई चहरे आँखों के सामने घूमते रहे...

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  11. @अनूप जी .@Abhishek srivastav......हमें लगा आप विरोध का साइन बोर्ड पट्टे वाली बात पे लेकर खड़े होगे ........आपका ओब्जेक्शन सर आँखों पे......पर .दरअसल एक मोहतरमा थी ..इतनी लम्बी डकारे लेती थी ..दिखने में ठीक ठाक थी .......एक दो परपोज़ल(शादी के नहीं प्रेम पत्र के ) इसलिए बीच में रुक गए ..एक बार किसी सहेली ने उनसे कह दिया ...एक्स्क्युस मी तो कह दिया करो....भोले पन से बोली क्या करे सरकारी स्कूल में पढ़े है वहां ये चोंचले नहीं सिखाये जाते .......
    शुक्ल जी की पोस्ट का भी लिंक लगा दिया है ...ओर देसी दारु के साइड इफेक्ट्स का भी ......
    @मनीष ,@सोनल@ पूजा@ अल्पना जी @संदीप @आशीष @पी डी.......

    दुनिया चिरकुटई के वीरो से भरी पड़ी है ....कभी कभी शक भी होने लगता है के भगवान् ने कोई डिसकायूंट ऑफर शायद भारत को दे रखा है .एक ओर वीर है…. वो भी अपनी प्रजाति के ख़ास किस्म के प्राणी है…वे उन लोगो में थे जिन्होंने बचपन में सिखाई गयी बात के वे हाथ देकर कही भी मुड सकते है ...को बहुत ज्यादा सीरियसली ले लिया है ...
    हमें पक्का यकीन था के अपने हर फेरे में मुड़ने से पहले उन्होंने हाथ दिया होगा
    , उनके पास एक स्कूटर है ,जिसे वो अक्सर रोड किनारे खड़े मिल . जाते है.... पूछने पर बताते है वो किसी पीछे आते ट्रक तो रास्ता देने के लिए रुके हुए है ........ कई मिनटों इंतज़ार के बाद जब दूरबीन लगा कर देखेंगे तो दूर एक ट्रक आता दिखायी देगा …..किसी पार्किंग मे वे पहले स्कूटर स्टॅंड पर खड़ा . करेगे.... ... पता नही क्या माप –तौल करने पीछे जायेगे..... फिर अलग अलग कोनो से स्कूटर का शोट लेंगे .. ऐन्गल ठीक करगे .....फिर तसल्ली करके निकलेगे ..…. शहर में कई बार किसी जगह ट्रॅफिक जाम मिले या अस्त व्यस्त तो समझ जाये की वे अभी अभी यहाँ से गुजरे है ….जिस दिन वे अपनी कार निकल लेंगे पूरे मोहल्ले में सनसनी फ़ैल जायेगी ,लोग रास्ते बदल कर गुज़रते, है एक बार एक चोराहे पर वे हमे ट्रॅफिक जाम करे अपनी कार मे मिले.”क्या हुआ” हमने पूछा. “ अपना लाइसेन्स स्कूटर मे भूल गये थे वही लेने वापस मूड रहे थे”…..उन्होने गाड़ी तिरछी कर का रोड ब्लॉक कर रखी थी.


    @अभिषेक ojha ....@अपूर्व

    सेक्सी हमारे हॉस्टल में शायद दिन में कई बार बोले जाना वाला शब्द था जिसके अर्थ भिन्न भिन्न जगह पर भिन्न होते थे ....मसलन.....टी वी रूम में

    ".अबे जडेजा क्या सेक्सी खेल रहा है बैठ जा वर्ना आउट हो जाएगा...."

    मसलन ......ढाबे पे ....."..अबे क्या सेक्सी दाल बनायीं है यार एक काम कर एक दल ओर ले आ ....ऐसा ही तड़का मार के लेना ......"

    मसलन.....सीडियो पे ....".अबे साले बड़ी सेक्सी शर्ट है कहाँ से लाया '

    मसलन खामखाँ बैठे हुए..... बाय गोड़ बड़ी सेक्सी बाइक है तू चला के देखेगा तो.......

    असल’ से डिफ़रेंशिएट हो जाता है अपने आप ...

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  12. ऐसे कई किरदार आँखों के सामने घूम गए। बस शुद्ध आनन्‍द आ गया और लगा कि अपने पतिदेव के दोस्‍तों की महफिल में फिर आ गए हैं।

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  13. ओ ले ख़त्म हो गयी पोस्ट...? हमने तो सोचा डा. साहब आज मूड में आ गए लगता है..
    जब फेसबुक पे साहब मिल ही गए है तो उन्हें इस पोस्ट का लिंक पकड़ा दिया जाए.. एक आध @#$% और झेल लेना साहब..

    सरकारी स्कूलों की बेइजत्ती तो इतनी आपने भी नहीं की जितनी खुद सरकार ने कर रखी है..

    पोस्ट बड़ी सेक्सी है बॉस

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  14. “...वैसे ये#** राजमोहन गांधी कौन है..कोई रिलेटिव लगते है गांधी के”

    कितनी निरपेक्ष चिरकुटई है. पोस्ट आदि से अंत तक एक सिनेमा है.

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  15. भाई कैमरे का हर एन्गल है.. लगता है जैसे एक फिलिम देख रहा हूँ - मेरठ [लाईव]..

    ब्लैक कोमेडी है... हँस भी रहा हूँ और सारे कैरेक्टर्स आँखों के सामने भिनभिना भी रहे हैं...

    मेरे हॉस्टल में सेक्सी का एक देशज शब्द था - ’खतरा’.. उडिया भाई लोग हर चीज को खतरा मानते थे.. खतरा शॉट, खतरा डांस और खतरा लडकियाँ.. दारूयें भी खतरा ही होती थीं और एसएमएस भी...

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  16. नज्मो के बाद हमें ये वाले अनुराग बहुत पसंद है फ्रेश मूड हो गया सुबह सुबह .
    चिरकुटाई के भी वीर होते है
    श्रदा के सुमन
    आप इत्ते ठलुवे है .
    चिरकुटई उम्र की पाबन्दी नहीं मानती है
    निर्विवाद ' क्यूरेटर
    .झूठ बोलने का सबस बड़ा फायदा ये है की ये बड़ी स्ट्रेचेबल चीज़ है .

    कई "अनुरागीय "झलकी है पोस्ट में लेकिन आखिर वाली कमाल की है
    खुदा ने अपनी गन फिर लोड कर ली है ... डिशकयूं ...........

    एक ही बात कहूँगी आप गलत पेशे में है .
    हेंस प्रूव्ड .

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  17. साथ में उनकी पत्नी यूँ हमें देखती है जैसे कृषि दर्शन देख रही हो...

    हमेशा की तरह लाजवाब....हँसते रहे, आपकी सोच और लेखनी को सलाम करते रहे...ये काम करते हैं हमेशा आपको पढ़ते हुए...और कुछ करने का मौका ही कहाँ देती है आपकी पोस्ट...गुप्ता जी मिलें तो हमारा सलाम ठोक देना...**## ने नयी गाडी खरीदी और मिठाई भी नहीं खिलाई...वर्ना ***##
    को बधाई दे देते....
    नीरज

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  18. हँसते-हँसते पढ़ा..बहुत लाजवाब पोस्ट.
    हमें किसी बात पर आपत्ति नहीं है.:-)

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  19. कितने वाश बेसिन उनकी गंध से आज भी गंधा रहे है कई पार्टियों के वे निर्विवाद ' क्यूरेटर' रहे …

    नाक बंद कर के और जी कड़ा कर के पढ़ गये। जैसे पीपली लाइव, ओंकारा (शुद्ध हिंदी की बिंदास गालियों के बावज़ूद)थ्री ईडियट (जन्म लेने की प्रक्रिया के लाईव टेलीकॉस्ट के बावजूद) देख आये थे कि इनसे हो के गुजरे बिना आप असली रसास्वादन नही कर सकते। :)

    मध्य में आये #** को धन्यवाद दिया (कि इन चिह्नो ने शब्द का भी रूप धर लिया होता तो क्या कर पाते:) )

    साथ ही साथ परसो रात का एक किस्सा भी याद आ गया जब हम रात १० बजे दीदी के घर से अपने घर की ओर प्रस्थान कर रहे थे। पिंकू मुझे लेफ्ट साइड छोड़ सड़क पार राइट हैंड पर सेव लेने चला गया। मैं एक महिला के ठेले परे मैगेज़ीन देख रही थी। वो बिना मुझ पर ध्यान दिये किसी पड़ोसी दुकानदार से कुछ सामूहिक समस्य डिसकस कर रही थी। बीच के किसी पड़ोसी दुकानदार के कुछ टॉंट पर उसे बढ़िया सी गाली दे कर उसके मुँह तक लात पहुँचाई गई। फिर थोड़ी देर में बगल के तीन चार दुकान दारों की तरफ मुखातिब हो के समस्या पर सामूहिक वार्तालाप चला जिसमें मुख्य भूमिका वही महिला निभा रही थी। क्या विशिष्ट विशिष्ट (या विचित्र विचित्र)गालियाँ निकली, जिनसे मैं जाने कैसे अब तक वंचित थी। मैने अपने अंदर के कलाकार को जागृत कर के सोचा कि इस जगह पर रह कर, सड़क के किनारे,इस माहौल में जहाँ चारों तरफ इस स्तर की पुरुष बिरादरी है,रात के ११.०० बजे तक इस चलते, फिरते चौराहे पर रहना है, वहाँ यह महिला अगर ऐसा स्वभाव नही बनायेगी तो जियेगी कैसे... ? खैर अपने अंदर की संवेदनाओं ने मुस्कुराहट का रूप तब लिया जब स्कूटी स्टार्ट के बिलकुल पहले उसका वाक्य आया "अरे ऊ #**... वाकी बात तो करो नई, ऊ #** अईस खुली गाली देत है कि दंग रहि जईयो।" मैने गाड़ी स्टार्ट करते हुए सोचा "खूदा जब जी०के० कंप्लीट ही करा रहा था आज, तो इतना ही क्यों छोड़ दिया जिससे हम दंग रह जाते।" :)

    और आखिर
    डॉ साहब इंदोर के सियाजी होटल में रिसेप्शन पर इंडियन टोइलेट की बाबत सुझाव पुस्तिका में अपनी राय दर्ज करते है .... ..........

    रचनात्मक दृष्टिकोण से देखे तो ये विचारो में परिवर्तन है.......ओर आम भाषा में कहे .....जाने दे...हर चीज़ को कहना जरूरी तो नहीं है....

    ". #**गांधी पे साडे छह सौ रुपये खर्च करते हो...."

    .झूठ बोलने का सबस बड़ा फायदा ये है की ये बड़ी स्ट्रेचेबल चीज़ है ....कितना खीच लो ...बस नुकसान ये है के याद रखना पड़ता है ..... कहाँ कितना खींचा था


    इन वाक्यों का रस्स्वादन किया..

    सरकारी स्कूल में तो खैर हम नही पढ़े, मगर जहाँ पढ़े उस हिंदी मीडियम स्कूल में भी ये एक्सक्यूज़ मी नही सिखाया गया था। छीकने के बाद एक्सक्यूज़ मी कहना तो अगल बगल से सीख लिया था... ये डकारने के बाद वाला....?? अब प्रैक्टिस कर लूँगी....! :)

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  20. कितने वाश बेसिन उनकी गंध से आज भी गंधा रहे है कई पार्टियों के वे निर्विवाद ' क्यूरेटर' रहे …

    नाक बंद कर के और जी कड़ा कर के पढ़ गये। जैसे पीपली लाइव, ओंकारा (शुद्ध हिंदी की बिंदास गालियों के बावज़ूद)थ्री ईडियट (जन्म लेने की प्रक्रिया के लाईव टेलीकॉस्ट के बावजूद) देख आये थे कि इनसे हो के गुजरे बिना आप असली रसास्वादन नही कर सकते। :)

    मध्य में आये #** को धन्यवाद दिया (कि इन चिह्नो ने शब्द का भी रूप धर लिया होता तो क्या कर पाते:) )

    साथ ही साथ परसो रात का एक किस्सा भी याद आ गया जब हम रात १० बजे दीदी के घर से अपने घर की ओर प्रस्थान कर रहे थे। पिंकू मुझे लेफ्ट साइड छोड़ सड़क पार राइट हैंड पर सेव लेने चला गया। मैं एक महिला के ठेले परे मैगेज़ीन देख रही थी। वो बिना मुझ पर ध्यान दिये किसी पड़ोसी दुकानदार से कुछ सामूहिक समस्य डिसकस कर रही थी। बीच के किसी पड़ोसी दुकानदार के कुछ टॉंट पर उसे बढ़िया सी गाली दे कर उसके मुँह तक लात पहुँचाई गई। फिर थोड़ी देर में बगल के तीन चार दुकान दारों की तरफ मुखातिब हो के समस्या पर सामूहिक वार्तालाप चला जिसमें मुख्य भूमिका वही महिला निभा रही थी। क्या विशिष्ट विशिष्ट (या विचित्र विचित्र)गालियाँ निकली, जिनसे मैं जाने कैसे अब तक वंचित थी। मैने अपने अंदर के कलाकार को जागृत कर के सोचा कि इस जगह पर रह कर, सड़क के किनारे,इस माहौल में जहाँ चारों तरफ इस स्तर की पुरुष बिरादरी है,रात के ११.०० बजे तक इस चलते, फिरते चौराहे पर रहना है, वहाँ यह महिला अगर ऐसा स्वभाव नही बनायेगी तो जियेगी कैसे... ? खैर अपने अंदर की संवेदनाओं ने मुस्कुराहट का रूप तब लिया जब स्कूटी स्टार्ट के बिलकुल पहले उसका वाक्य आया "अरे ऊ #**... वाकी बात तो करो नई, ऊ #** अईस खुली गाली देत है कि दंग रहि जईयो।" मैने गाड़ी स्टार्ट करते हुए सोचा "खूदा जब जी०के० कंप्लीट ही करा रहा था आज, तो इतना ही क्यों छोड़ दिया जिससे हम दंग रह जाते।" :)
    और आखिर
    डॉ साहब इंदोर के सियाजी होटल में रिसेप्शन पर इंडियन टोइलेट की बाबत सुझाव पुस्तिका में अपनी राय दर्ज करते है .... ..........
    रचनात्मक दृष्टिकोण से देखे तो ये विचारो में परिवर्तन है.......ओर आम भाषा में कहे .....जाने दे...हर चीज़ को कहना जरूरी तो नहीं है....
    ". #**गांधी पे साडे छह सौ रुपये खर्च करते हो...."
    .झूठ बोलने का सबस बड़ा फायदा ये है की ये बड़ी स्ट्रेचेबल चीज़ है ....कितना खीच लो ...बस नुकसान ये है के याद रखना पड़ता है ..... कहाँ कितना खींचा था

    इन वाक्यों का रस्स्वादन किया..

    सरकारी स्कूल में तो खैर हम नही पढ़े, मगर जहाँ पढ़े उस हिंदी मीडियम स्कूल में भी ये एक्सक्यूज़ मी नही सिखाया गया था। छीकने के बाद एक्सक्यूज़ मी कहना तो अगल बगल से सीख लिया था... ये डकारने के बाद वाला....?? अब प्रैक्टिस कर लूँगी....! :)

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  21. क्या करे सरकारी स्कूल में पढ़े है वहां ये चोंचले नहीं सिखाये जाते

    क्या ब्लॉगर मोहतरमा की बात से सहमत है कि ये सब चोंचले हैं और गैर सरकारी स्कूलों में ही सिखाये जाते हैं?

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  22. भई वाह! सेक्सी...........
    कमेंट में भी साइड एफ़ेक्ट देखने को मिले :)

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  23. मुस्कराहट में कैद नहीं रह रहा पोस्ट का इफ्फेक्ट.....
    लाजवाब डाक्टर साहब..... लाजवाब...

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  24. अच्छे खासे संस्मरण हैं ....
    स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामना...

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  25. दरअसल #*...% का अपना मतलब होता है, यह जिस ताल, सुर, रिदम, लय में बोला जाता है हम उसके कायल हैं, आजकल हम भी प्रयासरत हैं, जो इसमें माहिर हैं उनसे सीख रहा हूँ. यह बोलने में यूँ तो कुछ नहीं है पर सलीके से बोलने में भी एक कला है.... हम तो बाकायदा इसे इस्तेमाल भी कर देते हैं...

    एक हसरत थी रेणु की एक कहानी आप सब से शेयर करने की आपने शायद पढ़ी हो की ना पढ़ी हो ... हमारे पाठ्यक्रम में था
    "आदिम रात्रि की महक" एक बानगी :-

    ""गोपाल बाबू डाकते थे, सिंह जी भारी पुजेगरी, जहाँ कुछ छुओ -"ऊँ, हूँ, हूँ, हूँ, छु दिया ना जानकी माता का कमरा, नंगे पाँव चले आये" अब कौन ठंढ में भी ८ बार पैर धोये और १० बार नहाये..... पैट्मान जी फुफकारते थे, पुलिसिया बाबू तो भगत थे, वही घोष बाबू की गाली देने की आदत बहुत ख़राब थी, उनकी को मान -बहेन होती तो उनको भी पता चलता कि गाली-गलौज सुनकर कितना बुरा लगता है.... कुछ हुआ नहीं कि "की रे करीमा, आज कल कहाँ है रे मारदर्च***"""

    कमेन्ट थोडा अश्लील हो गया, अगर बुरा हो गया तो मिटा दीजियेगा, मुझे बुरा नहीं लगेगा... रेणु की यह कहानी मेरी पसंदीदा है.

    मजा तो तब आता था जब कोलेज में इसका सस्वर पाठ किया जाता था... रेणु वर्ण विशेष पर रुक भी जाते थे, हम तो पाठन के वक़्त आग में घी भी डालने में यकीन रखते थे...

    आज कल यह रिकॉर्ड भी तोड़ रहे हैं.... कुछ लिखूंगा इसके बारे में कभी.

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  26. मैं यह सोच रहा हूँ.... कि इतनी शानदार पोस्ट पर क्या कमेन्ट दूं? इतने क्रियेटिव थोट्स हैं कि पूछो मत... कई लाइंस तो बड़ी ही ग़ज़ब की हैं... बीच बीच में ऐनाग्रैम्ज़ का यूज़ तो और भी चार चाँद लगा दे रहा है राईटिंग को... बिलकुल ऐसा लग रहहि कि जैसे किसी फिल्म की स्क्रिप्ट हो... देशभक्ति का ओवरफ्लो .... यह तो ग़ज़ब का कहा... आज सब भूल गए हैं.... कि कल इंडिपेंडेंस डे था...

    मैं फिर से आता हूँ.... बार बार पढने का मन कर रहा है.... क्या पता फिर कोई नया थोट हो ऐप्रैज़ल में....इस पोस्ट के लिए...

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  27. इतना कुछ कैसे ठेल जाते हो यार ।
    हम तो एक आध बात मस्ती भरी लिख दें तो लोग परेशां हो जाते हैं ।

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  28. चिरकुट जहुँ ओर मिलेंगे। एक ढूढ़ो मिलते हैं हजारों।

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  29. डा. साहब आपके लिखे को क्या कहे . सेक्सी

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  30. just sexy yaar !

    इसके बाद कुछो कहने को बचता है क्या .....बहुत दिन बाद एक अनुराग मार्का पोस्ट पढें हैं .......तो मन में सैक्सी फ़ीलिंग हो रही है ।

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  31. there is got to be one more book...the third one in the triology, after "anurag's triweni" and "anurag's nazm"...and that will be "anurag's quotes"...

    such jumlaas like "झूठ बोलने का सबस बड़ा फायदा ये है की ये बड़ी स्ट्रेचेबल चीज़ है,कितना खीच लो,बस नुकसान ये है के याद रखना पड़ता है कहाँ कितना खींचा था" are collectors' item boss.

    thought i will comment in english, just to prove anoop shukl ji is right... :-)

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  32. आपका लेखन ऐसा है जैसे कहीं दो चार दोस्त आपस में बैठ कर बात कर रहे हों ....काफी कुछ कहा जा चुका है ...

    बहुत मस्त पोस्ट है....मुझे लगता है कहीं आप मेरठ के तो नहीं हैं ?

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  33. डाक्टर साब, क्या कहें बिलकुल दिल की बात कही है आपने।

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  34. रोचक पोस्ट । आप भी तो कमाल करते हैं आज के जमाने मे साढे छ सौ रुपये गान्धी पर खर्च करते हो तो खुद ही तो गालियाँ आमन्त्रित करते हो? भला आज के सभय समाज मे गान्धी आप्रसांगिक नहीं। बढिया पोस्ट। शुभकामनायें।

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  35. @kanchan.....
    वैसे कई ओर भी चिरकुट होते है वेज टाइप......नॉन ड्रिंकर... नॉन स्मोकर ..... नॉन मसाला खायू.....पर इतने ही 'इन्फेकशिएस '....सबसे कमाल की बात के की उम्र गुजर जाती है....ओर वे जान नहीं पाते के समाज में उन्होंने कितना योगदान दे दिया है ....

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  36. इस बार कमेंट आपकी पोस्ट पर नहीं देंगे डाक्टर साहब , आपकी पोस्ट की कमेंट्स और इन कमेंट्स के कमेंट्स पर देंगे। बाप रे पहले तो हैट्स आफ टू यु कि हमारे जैसे कितने लोयल रीडर्स हैं आपके पास जो आपको जरूर पढ़ते हैं, पढ़ते ही नहीं दिल से पढ़ते हैं और सिर्फ दिल से नहीं पढ़ते बल्कि बहुत पंसद भी करते हैं, हमारी तरह :-)

    खैर पोस्ट की हर लाइन ही रीडेबल थी, सेक्सी कार और शर्ट से लेकर...चिरकुट दोस्तों की, गांधी पर 650 रुपए बहा देने से लेकर कृषि दर्शन के लेटेस्ट एडिशन तक। जिसको कमेंट्स में सबने लपेट लिया है, लेकिन आपका अपना कमेंट सब कमेंट्स से सबसे लंबा है, होना भी चाहिए, आखिर सूत्रधार की जिम्मेदारी भी तो किसी न किसी को लेनी ही पड़ती है।

    शुक्ल जी और श्रीवास्तव जी गवर्नमेंट स्कूल वाली थ्योरी पर थोड़ी सेंटिया गए थे, ठीक है, लोकप्रयिता के साइडइफेक्ट्स , इतनी भी आपत्तियां न आएं तो लिखने का क्या मजा। आपके बहाने सब ने अपने अपने चिरकुटों को याद कर लिया।

    लास्ट बट नाट द लीस्ट हर बार की तरह पढने में उतना ही मजा आया। हैंस प्रूव्ड

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  37. bharat ki swatantrta pe aapki to gulami shuru hone waali hai Dr. sahab .. request accept to karni hi padegi :) ..
    Nice kah kar post ki bakhiya nahi udhadna chahta :) ..
    maja aa gaya

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  38. डॉक्टर साब, चिरकुटई इस देश का शाश्वत शगल है। पान की दुकान से संसद के भीतर तक यही चिरकुटई हमारे देश के चरित्र् को प्रतिध्वनित करती है। हम इसके लिए एक दूसरा शब्द लिखते हैं जो तोड़ा असंसदीय है।

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  39. सेक्सी कहने की बुरी लत के कुछ दिनों तक हम भी शिकार हो गए थे। सबसे खराब हालत तब होती थी जब घर जाना होता था। डर लगता था कि कहीं घर मं किसी के सामने मुंह से न निकल जाए कि यार आज तो गलब सेक्सी दाल बनी है। विश्वनीय सूत्रों के मुताबिक कुछ मोहतरमाएं भी इस बीमारी की शिकार थीं। घर जाने पर उनका हाले दिल क्या होता होगा वही जानंे ??

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  40. पढ़ भये .का बोलें .
    हम तो सरकारी इस्कूलवा के उत्पाद हैं सो ....... !
    बाकी पर लोग बोल ही चुके हैं !
    वार्ता सुख ही लेते रहे ! आभार !

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  41. इतनी जल्दी दूसरी पोस्ट ....?
    सोचा न था ...अक्सर आप इतनी जल्दी नहीं बदलते ....यही सोच नहीं आई थी ...
    क्या कहूँ इस लाजवाब लेखन पर .....?
    ये लम्बी लम्बी टिप्पणियाँ ही सब कुछ कह रही हैं .......

    इस अद्भुत लेखन की वजह पुनश्च :पर आकर समझ आती है .....
    यहाँ तो लोग दूसरों के घरों में घुस अपनी तसवीरें तक लगा देते हैं ...ये फ्रेंड रिक्वेस्ट तो मामूली बात है .....

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  42. bahut dino baad, kal bhi nahi ,parso bhi nahi...thodaa vyst hoon ...lekin kuch likhti hoon ...phursat se ...laajwaab lekhan ...

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  43. गज़ब का टाइमिंग रहा इस पोस्ट का.वैसे इस पर पोस्ट कभी भी आती तो उतनी ही शानदार निकलती पर ऐसे मौके पर ओर भी मारक प्रभाव के साथ आई.
    नीचे ' जारी' लिखा जाय.

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  44. कभी कभी चिरकुटई की भी हद कर देते हो डाक्टर साब ये आपके लिए शब्द इस्तेमाल करूँ कि उस खाकसार के लिए ..... समझ नहीं पता ... दो दिन पहले आपके फेस बुक प्रोफाइल पे था आपकी पुरानी तस्वीरें देख रहा था .... बहुत सारी बातें सिर्फ फोटो देख कर ही लग जाती है ...... हा हा हा ... मजा आया ... और इस लेख ने एक अलग डाक्टर साब से मिलवाया यही कहूँगा .....

    अर्श

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  45. हम तो सरकारी...गैर सरकारी दोनों स्कूलों में पढ़े पर ये तहजीब कहीं नहीं सिखाई गयी...बहुत सी बातें इंसान बड़े होते होते खुद ही सीख लेता है वैसे ही सीख गए. वैसे भी ये चीज़ें स्कूल से ज्यादा घर में सीखने की होती हैं! हर बात पे सेक्सी कहने की आदत....आप होस्टल में रहे इसलिए जबान पे चढ़ पाई वरना मुझे याद है मम्मी पापा से कभी झुंझलाहट में "अरे यार " भी निकल जाता था तो खूब बत्ती पड़ती थी! उसी का फल है की आज इस प्रोफेशन में दस साल से रहकर भी कभी "साला" से आगे की गाली मुंह से नहीं बोल पाते....पर एम टी.वी. देखकर लगता है ..गालियाँ न देने वाला बेचारा आउट डेटेड हो गया है!

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  46. कल भी आए थे। और आज भी आ गए। कल कुछ सूझा नहीं कि क्या कमेंट करें। पर पढने और सुनने का मूड इसलिए आ गए। और खूबसूरत चीजों को बार बार मन होता है देखने का सो ........ जिन गलियों से गुजरते हुए आप बिल्कुल हूबहू आप लिख देते है। पढकर लगता है कि हम भी उस गली से गुजर लिए। ब्लोगिग का यही तो फायदा जहाँ आप जा नही पाते है वहाँ भी ब्लोगिग में चले जाते है। वैसे मुझे आज तक ये नही समझ आया जो आपने भी लिखा है कि लिखना पढना क्या इतना खराब है लोग आपको तिरक्षी निगाह से देखते है। हमेशा की तरह अच्छी पोस्ट लिखी है। हमारा कहना मानो इन सब पोस्टो की एक किताब छपवा डालो। कम से कम जब दिल हुआ तो दिल की बात पढ लिया करेगे। और वो किताबो की अलमारी में नही हमारी मेज पर रहा करेगी। और किताब में पढने का आनंद ही कुछ और होता है, ये तो आपको भी पता है।

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  47. आखरी में आई इसीसे इतना ही कहती हूँ, पोस्ट पढ कर मजा आया । आप जिस तरह सेक्सी का इस्तेमाल करते हैं वैसे ही दिल्ली में लोग सही कहते हैं या धांसू ।

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  48. देर से आई हूँ और गौतमजी मेरे दिल की बात बिलकुल सही और सुंदर शब्दों में कह चुके हैं मैं उनसे बिलकुल सहमत हूँ
    कौनसा लेंस लगा है आँखों पर जो उतार देता है जिंदगी को शब्दों में और कटाक्ष को होंठों की मुस्कराहट में...

    Post full of superb deadly quotes!!
    "झूठ बोलने का सबस बड़ा फायदा ये है की ये बड़ी स्ट्रेचेबल चीज़ है ....कितना खीच लो ...बस नुकसान ये है के याद रखना पड़ता है ..... कहाँ कितना खींचा था ..."

    LETHAL :-)

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  49. 'चिरकुटों' और 'चिरकुटाई' के बारे में हमारा 'ज्ञानवर्धन' करने के लिए आभार.

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  50. कुछ शब्द ऐसे होते जो अपने साथ पूरा का पूरा "स्क्रीन प्ले" लेकर चलते हैं। उसमें से यह "चिरकुट" या "चिरकुटाई" विशेष स्थान समेटे हुए है और यही वजह है कि इसकी अपनी डेमोक्रेसी है। आप क्या कर सकते हैं सिवा इसके कि 'इससे वार्तालाप आगे बढ़ने का खतरा है .. .....'मान अपने को अपने में खींच लिया जाये। इस संसदीय शिष्ट शब्द के साथ पुता हुआ वाक्या वाकई 'करारा' है।

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  51. aare waah doc saab,chirkutai aur sabhya samaaj par ye lekh behad achha laga,hothon ke side mein khili muskan sab kuch bayan kar rahi hai,har ehsaas:).

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  52. "#**साले अभी भी कविता लिखते हो......क्या कहने इस वाक्य के ,आपके किरदार हर दम जीते-जिलाते जिन्दगी की तंग राह में एक खुशनुमा माहौल रच जाते हें आपकी भाषा क्या कहने यहाँ शब्दों की लफ्फाजी नहीं बिना लाग-लपेट कर जिन्दगी की बात है शुक्रिया

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  53. सब सही, टिप्पणियों सहित, मज़ा दे गए।
    मगर एक असहमति - चिरकुटई इस देश की किसी गाली का शिष्ट अनुवाद नहीं है।
    उतना ही मौलिक है जितने मौलिक ये उल्लिखित सज्जन आपकी पोस्ट वाले।
    वाकई, जन्मसिद्ध अधिकार लगता है इनका तो इस मानद उपाधि पर!

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  54. चिरकुट चिंतन से उपजी एक बेहतरीन कमेन्ट्री..
    दरअसल इस मुल्क को भगवान ने ख़ास तौर पर चिरकुटई का कोटा ऍलाट किया है,
    और.. सच तो यह है कि इन चिरकुटों ने इसके लिये अपने हिसाब से ऑर्डर पर भगवान तैयार कराया है ।
    ~~~अ कस्टॅमाइज़्ड गॉड फ़ुलफिलिंग दॅयर सेक्सी डिज़ॉयर्स, ===वॉऔ, व्हाट अ सेक्सी गड़ेंशा इन शॉकिंग रेड फ़ॅर कार-डैशबोर्ड.. गड़ेंशा नेंईं बेबी, इट स्पेल्ड गनेशा ! व्हाटेवर इट इज़... आय एम डाइंग टू हैव दिस पीस ऑफ़ गनेशा डियर हॅनी ! यह पढ़ कर हँसों मत चिरकुट, ऍप्लाज़ इट विद अ सेक्सी स्माइल !
    अगर आप चीजों के सेक्सी होने में विश्वास नहीं करते, और ज़मीन से जुड़ा यथार्थ ढूँढ़ते फिरते हैं तो आप निरे दरज़े के चुगद और हारे हुये सटोरिये के पिद्दी लगते हैं । हद है यार, मुल्क व क़ौम के रोटी की चिन्ता में लोग दुबले होते हुये बिल्डिंगें खड़ी कर रहे हैं, और दो अदद ए.सी. रखने के अपराधबोध को ढोते हुये आप अपने लिये रोटी तलाश रहे हैं ?
    रखिये अपने बगल में साढ़े छः सौ रुपिये के राजमोहन गाँधी को...
    हद है, डॉक्टर अनुराग, जाने आप किस सदी के हैं, जो लोगों के सेक्सी सोच पर अपना भेज़ा ख़राब करते हुये तबाह हुये जा रहे हैं ? मौज़ूदा समय के ट्रेन्डी शब्दावली में कहूँ, तो... ( not to be moderated.. it kills the soul of the expression ! ) क्या पोस्ट लिखी है, पार्टनर । आपने तो फाड़ कर रख दी..


    वैसे मेरा एक चिरकुट आग्रह भी है, ई-मेल सब्सक्रिप्शन विकल्प लगा लें, मुझे यह पोस्ट आज पढ़ने को मिली है !..

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  55. अब देखिये न.. मुझे यह पता ही नहीं चल पा रहा है, मेरी टिप्पणी पोस्ट हो भी रही है, या नहीं !
    देखा जायेगा, अब जैसी चिरकुट हरि-इच्छा !

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  56. "मुझे आपके नए पोस्ट पर टिप्पणी करनी है.................

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  57. I wanted to comment on your latest post..and also I forget the blog I visited a while back where you had commented. What I do remember is that it was touching - what you wrote - on many levels..

    Having recently lost my dad, and seeing the callous attitude of some doctors its like a breath of fresh air to come across 'a doc who feels/empathises like you..

    keep ur feelings alive, dont let them die

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  58. आपने 'शेष दुनिया के लोगो' से कमेंट ऑप्शन क्यों हटा दिया?
    आपने सिर्फ सच का वर्णन किया है, इसमें डर कैसा?

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  59. शायद सबसे आखिर में मै ही पढूंगी ये पोस्ट और आनन्द अ गया पोस्ट पढ़कर और टिप्पणियाँ पढ़कर |जब इंदौर का नाम आया तो और आनन्द अ गया वैसे ऐसे चिरकुट बहुतायत में यहाँ मिलते है |खासकर" राजवाडा "पर खरीददारी करते वक्त और सराफे की चाट ,कचोरी और साबूदाने की खिचड़ी खाते वक्त |

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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