2010-10-03

तटस्थता की हिप्पोक्रेटिक ओथ ......




Thank you god for the world so sweet 


सार्दियो में शाम जैसे कम्पलीमेंटरी मिलती है, दिन का मूड हुआ तो दे दी. उस रोज शाम की अब्सेंट दर्ज है. जनवरी की कोई  रात है. रेफेरेंस देखकर लौटते वक़्त मोबाइल बजा है. मेडिकल कॉलेज के बाहर  अपनी  गाडी में मेरा दोस्त है .अमूमन एक शहर   में होकर भी  आप  कम  मिलते  है .अपने- अपने हिस्से  की  मसरूफियत के वास्ते .उस दिन  इत्तेफाक से मिले है . शायद वो भी कोई रेफरेंस देखकर लौट रहा है . उसकी गाडी में हमेशा एक सिगरेट रहती है .पिछले कुछ सालो से मेरी छूट गयी है .गाहे बगाहे होती है .गेट से थोडा हटकर  एक कोने में हम  दोनों किसी पेशेंट के मुताल्लिक गुफ्तगू में उलझे है.

सकी पीठ पीछे  मेडिकल  से  एक स्ट्रेचर  बाहर रहा है  .दो लोग हाथ में उठाने वाले स्ट्रेचर पर किसी शरीर को ला रहे है . पीछे वाला एक आंख से आंसू पोछता है. फिर स्ट्रेचर संभालता है  साथ में कम्बल लपेटे एक बूढ़ा. है  सर झुकाए  रोती बिलखती दो औरते ,पीछे  नंगे पैरो चलते  दो बच्चे  नज़दीक ,नज़दीक . आगे वाले की आंखे लाल है .कोई सूखा नशा है शायद ,स्वेटर के नीचे से झांकती .शर्ट अस्पताल का नुमाइंदा है .एक बैलगाड़ी में डली चारपाई शरीर को वहां लिटा दिया गया है  औरतो का रोना  जारी है.
 सड़क  पर कोई  बारात  है  .बाराते  आहिस्ता   -आहिस्ता चलती  है , लगभग एक सी शक्ल लिए . सूखे  नशे वाला रुक गया है ,जाने क्यों  शरीर को देखता है ,फिर  बूढ़े को फिर .एक  ओर कोने में  जाकर अपने हाथो में कुछ मलने लगा है . पीछे वाला  कुछ देर उसे देखता है  फिर खाली स्ट्रेचर धकेलता आंसू पोछता वापस अस्पताल की ओर जा रहा है.शायद जमा करने .बूढ़ा वही   घुटनों में सर डाले बैठ गया है  .बारात  ओर नजदीक आ गयी है. आहिस्ता -आहिस्ता सड़क  पर एक्सपेंड हो गयी है . हम दोनों  के बीच संवाद में जैसे पॉज़ आ गया है .उसने सिगरेट सुलगा ली है .साथ चलते जनरेटर के शोर में सिक्के हवा में उछालते है ,फिर छन्न से सड़क पे बिखर जाते है  ,अनजाने चेहरों का समूह उठाने के लिए टूट पड़ा  है उनकी नज़र बचाकर अपनी मस्त चाल से चलता हुआ एक सिक्का ठीक बुग्गी के पहिये के पास  कुछ  देर घूम कर ठहरा है. बुग्गी पे  बैठा  बच्चा एक नज़र बारात की ओर देखता है. दूसरी बूढ़े की ओर ,बूढ़े   का सर अब भी घुटनों में है ,कुछ  सेकण्ड ......
 वो नीचे झुक कर सिक्का उठाता है.
 
"सिगरेट पियेगा' ...मेरा दोस्त मुझसे पूछ रहा है .
बैंड का वाल्यूम  बढ़ गया है .....







33 टिप्‍पणियां:

  1. zindagi ke saare hisaab kitaab ek panne par utaar diya ...bahut khoob

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  2. अमूमन एक शहर में होकर भी आप कम मिलते है ...अपने - अपने हिस्से की मसरूफियत के वास्ते ...उस दिन इत्तेफाक से मिले
    ज़िन्दगी के ऐसे निर्वातों को लिखने का हुनर कम ही लेखनियों में है.

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  3. बड़े दिनों बाद आमद... हमलोग बात जोह रहे थे कि इस गली के जानिब भी तो कुछ हो रहा होगा... और हुआ भी तो वही ढाक के तीन पात ... कुल मिला कर वही कहीं चैन नहीं .. बिलखते हुए उधर जाओ तो वही नज़ारा बस शक्लों ने पैरहन बदले हैं..

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  4. APKE LIKHNE KA STYLE PADHTE WAQT ....
    ROOKNE NAHE DETA.....


    PRANAM

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  5. अंतर में उलझती सी चली गयी पोस्ट....मार्मिक!

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  6. शीर्षक क्रूर है बिलकुल आपकी हिप्पोक्रेटिक ओथ्स सा. काश उदासी सिक्के की चाल की तरह होती जिसे रोका जा सकता .

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  7. तटस्थता अब सफ़ेद पोशो में शामिल हो चली है.. दिनकर जी तक पैगाम पहुंचे कि अब इसे अपराध नहीं माना जाता..

    बड़े दिनों बाद की आमद में लगा था जो वाट लगी हुई है उसके बारे में चार बाते होगी.. ये बाते अब इतनी इम्पोर्टेंट कहाँ रही

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  8. हाय अनुराग,

    मंटो को बहुत तो नहीं पढ़ा, लेकिन जितना पढ़ा था वो मेरी 'हकीकत' के लिए काफी था| पढ़ते वक़्त वही अहसास जेहन में है| उम्मीद है कि आपने "खोल दो " पढ़ी होगी | पाठक को आप शुरू से ही अपने रंगमंच का हिस्सा बना लेते है |

    सार्दियो में शाम जैसे कम्पलीमेंटरी मिलती है.....दिन का मूड हुआ तो दे दी.....उस रोज शाम की अब्सेंट दर्ज है....

    हर तरफ देखता हुआ वो अपनी समझ के हिसाब से चीजो को छोड़ता , समेटता ... उस बच्चे की तरह|

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  9. सड़क पर कोई बारात है ….बाराते आहिस्ता -आहिस्ता चलती है ..... लगभग एक सी शक्ल लिए ...
    पूरा परिवेश समां गया इस पंक्तियों में .

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  10. आपके लिखने का ढंग विस्मित कर देता है.....जैसे कोई रूह मे उतर कर बोल रहा हो ! आपको उपन्यास लिखना चाहिए ....!!!

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  11. हमेशा की तरह मूक कर देने वाला लेखन ...बहुत दिनों बाद आपका लिखा पढ़ा

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  12. थोड़ी अब्सट्रैक्ट सी पोस्ट... मल्टी डाइमेंशनल.

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  13. ऐसे ही द्वन्द्वों के बीच ज़िन्दगी घटित होती है ।

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  14. दो अलग अलग दृश्यों को एक जगह समेटना ...पढ़ने वाले के सामने एक साथ दृश्य उपस्थित हो गया ...और अंत ..एक सोच छोड़ जाती है ...यही है ज़िंदगी

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  15. लम्हों में से जिंदगी निचोड़ लाना... पाठकों की रूह तक पहुंचा देना.. पढ़ कर हमेशा एक खामोशी घेर लेती है...

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  16. दुनिया में विसंगतियाँ तो हैं ही । और रहेंगी भी । पर ऐसे चित्रण कम देखने को मिलते हैं ।

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  17. जहां बजती है शहनाई वहां मातम भी होते हैं :(

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  18. अनुराग...एक फरमाइश है.! अगली पोस्ट में जिंदगी की एक मुस्कुराती तस्वीर चाहिए और आखिरी में एक रोमांटिक सी नज़्म...

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  19. 'खुशी 'यह नज़ारा देख खुद भी परेशान हुई होगी.
    ज़िंदगी के ये दो पहलु सिक्के की दो साइड ही तो हैं.
    दोनों बैलेंस रहें तो सिक्का चलता रहता है .
    बहुत कुछ बयाँ करती लघु कथा की तरह लगी यह घटना..
    वैसे भी आस पास बहुत कुछ होता रहता है लेकिन ऐसे ही बहुत कुछ को शब्दों के चल चित्रों बना कर बखान कर देना आप की खूबी है.

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  20. जि़दगी का एक सच जिसे पेंटर चित्रित नहीं कर सकता, फोटोग्राफर कैमरे में उतार नहीं सकता।

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  21. कफ़न के माधव और घीसू याद हो आये..बुधिया की मौत का दुःख और दोनों का नाच गाना...ऐसे ही सुख दुःख.. विरोधाभास ...आपकी पोस्ट में किसी तूफ़ान की तरह छाते है और फिर सब शांत...

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  22. ANURAG JI , ye mera comment ravishji ki post Ram ab legal ho gaye par likhe aapke comment ke liye hain...am happy at least someone is there who think alike.aapko message karne ka koi jariya nahi mila isliye yahan likh raha hoon...kash aisa sab sochte ye jhagda hi khatam ho jaata... kitne masle hain... lekin dharm ke aage insaan dikhta hi nahi..

    jo dikhta hai usse bura kahte hain..
    jo dikhta hi nahi usse khuda kahte hain...

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  23. जिदगी यूं ही चलती रहती है.. जिंदगी और मौत से अनजान .. सुन्दर पोस्ट..

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  24. सबसे जरूरी चीज ने अपनी जगह पा ली... अर्थ शायद सबसे महत्वपूर्ण है... हमेशा...

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  25. अनुराग जी,, पिछले दिनों आपका ब्लॉग पढ़ा,,इतना अच्छा लगा कि मैंने पूरा ही पढ़ डाला...तारीफ के लिए शब्द ही नहीं है,,लिखूं कैसे,,m just speechless ......आप नज़्म क्या,,कहानियां भी बिलकुल दिल में उतरने वाले स्टाइल में लिखते हैं,,आखिर तक बांध कर रखते है और ये हर किसी के बस की बात नहीं होती... कलम में कलाम की खुशबू यूँ ही बरकरार रहे...आपकी अगली पोस्ट्स का इंतज़ार रहेगा..all d veryyy best...take care :)

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  26. पोस्ट अपने छोटे कलेवर मे कितनी जटिलतायें समाये हुए है..सूक्ष्म मगर गहन!

    बारात और शवयात्रा के बहाने मानवीय संवेदनाओं का एक जटिल सा और स्टार्क कॉन्ट्रास्ट सामने रख दिया है आपने..जो उस सूखे नशे वाले बंदे और बुग्गी पर बैठे बच्चे के दरमियाँ है..एक जो मौत को इतने करीब से समझता है कि उसे नियति मान कर कलेजे पर पत्थर और हथेली पर तम्बाकू रख लेता है..और दूसरा इतना मासूम कि मौत की हकीकत से अनभिज्ञ..कि दिल बार बार वापस वहीं उछलते सिक्कों की चमक मे उलझ जाता है....और देखें तो ऐसा सबका अपना एस्केप-रूट है..सामने मुँह फाड़े हकीकत की तल्खी से भागने का..अपना मुँह चुराने का...सूखे नशे की हथेली की तम्बाकू..बूढ़े का घुटने मे छुपा सर..बच्चे के लिये पहिये तले पड़े सिक्कों के खनक..और..और आपके दोस्त की सिगरेट की तलब....और यह बैंड का वाल्यूम बढ़ जाना अनायास नही होता..हम सब हकीकत को ट्रिवियलाइज कर उसे इग्नोर करना चाहते हैं..जैसे हम पाठ्कों का इसे ’बढ़िया पोस्ट’ कह कर खिसक लेना..इस्केप रूट..!

    बढ़िया पोस्ट!!

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  27. अजय जी,
    आपकी भाषा की प्रवहमानता क़ाबिले-ग़ौर है।
    क़िस्सागोई की परिपक्व कला के दर्शन हो रहे हैं आपमें। संगीता पुरी ने सही ही कहा है- मैं भी कह रहा हूँ कि उपन्यास लिखिए आप... सफल होंगे!

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  28. भूलतः ‘अजय’ लिख गया हूँ। उसकी जगह कृपया ‘अनुराग’ पढ़ें।

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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