2010-10-12

हकीक़तो के क्रोस फर्टीलाइजेशन

तब दुनिया भली थी

सुबह सुबह सिगरेट नहीं पीनी चाहिए सीधी फेफड़ो तक जाती है ......वो सुबह सुबह सिगरेट पीते हुए रोज ये बात कहता ....ओर रोज एक सिगरेट पीता ....
जय सर्जरी का रेसिडेंट है.....आल इंडिया इक्जाम क्लियर करके आया है ... मै बतोर  इन्टरन हूँ......जय की यूनिट   में पोस्टेड...मेरी पहली पोस्टिंग.. ऑफिशियली .हमें मिले हुए  तीन दिन ही हुए है  ...फिर भी हम दोनों में बनने लगी है  ...
.उससे पहले एक बार  कुछ घंटे  की  औपचारिक  सी मुलाकात  थी ... ....किसी  पार्टी में ....  हॉस्टल के कमरों की  पार्टिया .. ....गांधी के राज्य में एडलट्रेडेट मिलती थी ... या बहुत   महंगी ...
साला उस आदमी को नोबेल प्राइज़
  मिलना चाहिए जिसने दारु  का आविष्कार किया ......सब बायस लोग है  प्राइज़ देने वाले ....उसने दूसरा पेग पीने के बाद  कहा था .....मुझे वो तभी जंच गया था
उस रोज सिगरेट का कोटा ख़त्म होने पर हम दोनों मोटरसाइकिल पे लेने निकले थे तब उसका कुछ कुछ ओर  समझ आया था
भाई मत बोलना ...उसने मोटरसाइकिल पे बैठते ही कहा था ....गुजरात में सीनियर को भाई कहते है
पिता बड़े देशभक्त थे ... किसी बम   के नजदीक से फटने  पर  आर्मी से अपने दोनों कान ख़राब करके आये तो भी जनून जारी था.....जब बड़ा भाई श्रीलंका शांति सेना से बिना पैरो के वापस लौटा ....तो मां ने बगावत कर दी ..हमें साला ये व्हाईट एप्रन बहुत अच्छा लगता था .....सो आ गये....
तेरा कोई है आर्मी में
?
मेरे सर हिलाने पर वो हंसा था ....अपनी जमेगी ..
 तीन साल ओर ...बस फिर बाहर की  दुनिया से आज़माइश करेगे….. उसने ठंडी सांस ली
अबे  सुन  तू जिसके साथ केन्टीन में बैठा रहता है वो तेरी गर्ल फ्रेंड है ....
नहीं

पक्का

क्यों

नहीं .....सेक्सी है  इसलिए .........
मैंने उसे नहीं बताया वो भी उसे पसंद करती है….. पीने के बावजूद मै सेन्स में था
एक मिनट गुजरता है ..मोटर साइकिल पे .....
पर तुम्हारी तो गर्ल फ्रेंड है ..... मै उससे पूछता हूँ
तो...तुझे वो सेक्सी लगती है ....

नहीं....... मै झूठ बोलता हूं

वक़्त ने  कई उमरे अपने  भीतर रखी है ....
 य के  गोरे चेहरे पे दाढ़ी अच्छी लगती है ... बेतरतीब से उसके बाल ....लडकिया उसे पसंद करती है ....पर उसे निवेदिता पसंद है ......उनका चल रहा है ...निवेदिता …  ..उसमे दिल छोड़कर सब कुछ खूबसूरत हैपीडियाट्रीकस में रेसिड़ेंशी कर रही है......कोलेज  ओर हॉस्पिटल .दो अलग इमारते थी......दोनों को जोड़ता  एक पुल सा गलियारा ..शाम होते होते .कोलेज  एक दम  खामोश हो जाता   ...पर हॉस्पिटल  वैसे ही  जगा  रहता
"हॉस्पिटल अपने आप को दोहराता है .....बस  हम है .....जो सोचते है के वे नायाब है .."
.किसी सर्जरी की पहली ड्रेसिंग  खोलते वक़्त उसके डायलोग होते ...खास तौर से जब  स्टिच  नीट निकलते  .....उसके हाथ में हुनर था ....ऐसा सब बोलते थे ....मनोज ओर वो गहरे यार हो गए थे ....मनोज मेरा बेडमिन्टन  पार्टनर ओर मेडिसिन में रेज़ीडेंट ...
. पास होने के बाद की सोच के फटती है .... इस चारदीवारी के बाहर की दुनिया बड़ी कमीनी है
. क्यों यहाँ क्या नेकी का थोक बाजार है.?मै उससे कहता ....
ये भी अजीब बात थी के मनोज ओर निवेदिता की पूरे पांच सालो में  कभी नहीं बनी........अजीब दोस्त थे साले........दोनों की पसंदे अलग थी......जिंदगी की  फिलोसफी अलग.....फिर भी दोस्ती थी....ओर खूब निभ रही  थी....अजीब दौर था जिंदगी का .थोडा इंकलाबी ....थोडा रूमानी....जिंदगी के हाथ में भी कभी हंटर होता ....कभी गुलाब ......ओर दिल साला खुद से डबल क्रोस करता...बेवकूफियो पर नाज करने के दिन अब उतरने लगे थे ....मुश्किलों पर प्रोटेस्ट पर वाक् आउट  नहीं उनसे रूबरू होने का हौसला होने लगा था .....

 दुनिया कभी  भी  भली नहीं होती
मरजेंसी वाला दिन था ....बड़े भीड़ -भड़क्के वाला ....तकरीबन  दोपहर ढाई  बजे ....ओ.पी .डी में…. चाकूबाजी के केस आये है ..........दोनों पार्टियों के लोग है...दो ओ टी एक साथ है......ओर एक ए .पी  पटेल आज छुट्टी पे है ...... मै बजे उसे ओ टी के बाहर के गलियारे में  पाँव में ऑमलेट रोल कर  पकडाता हूँ सुबह से वो दो चाय ओर तीन सिगरेट पे है .........३  मिनट में वो दो पाँव ओर एक ऑमलेट  फटाफट ठूंसता है…  उसे वार्ड में जाना है …. नीचे आकर मुझे याद आता है ....आज जय का जन्मदिन है...!!!!!!!!!
 केजूवलटी   की   रात है .......ये ड्यूटी  कम्पलसरी नहीं   है......केजविलटी  की एक अलग दुनिया है ....जहाँ रात में एक अजीब कंटीन्यूटी  है  ...एक किस्म का शोर वहां का स्थायी बाशिंदा है .....जब आप थके होते है आपका शरीर जान जाता है उसे कितनी आवाजो में कैसे झपकी लेनी है... वो कल रात से केवल तीन घंटे सोया है ओर उसका बर्थ डे भी .......इसलिए .सोचा है मेस की घटिया दाल  को छोड़कर   कुछ अच्छा खायेगे .....बहुत नजदीक है होटल ..मुझे सिर्फ जाकर लेकर आना है
.अच्छे कपडे पहने दो कम उम्र है ......लड़की अर्ध मूर्छित सी .... अच्छे कपडे पहने लोग सरकारी अस्पतालों में कम दिखते है ....जल्दी की इसका कारण पता चलता है
दीदी है ...लड़का कहता है .....नींद
  की गोलिया खा ली है ... केस मेडिसन का है
कितनी ......ओर फिर कुछ सवाल जवाब
......
कोई बात नहीं....मरेगी नहीं.....मनोज
कहता है ......वो उसकी आँखों पर टोर्च मारता कहता है
"मरेगी "मुझे चुभता है ...मुझे लगा मनोज पूछेगा क्यों खायी....पर मनोज पूछता नहीं है .....
 सिस्टर  स्टोमक वाश ....
दस पंद्रह मिनट गुजरते है .....
लड़का मनोज के पास मंडराता है ....
सुबह पापा मम्मी आ जायेगे ....बाहर
गए हुए है ....मै उससे पहले दीदी को ले जाना चाहता हूँ......
मनोज अपने चश्मे को ठीक करके उसे
देखता है ....
ओफिशियाली ले जा नहीं सकते.....पर
तुम्हे कोई रोकेगा नहीं......
मै वापस जय के पास आ गया हूँ.....जय ने आँखे बंद की है ......पर सोया नहीं है .....आधे घंटे  बाद मनोज अन्दर  आया है ....
बाहर कुछ हलचल हुई है
दो लोग
है........मोटरसाइकिल  से गिरे है ....आगे वाला का पैर का मांस फटा है ...
इसका एक्स रे ....करवा कर के
आना....सन्तु.....उलटे हाथ के कमरे के बाजू में   स्प्रिट पीकर पड़ा होगा.....चार पांच बार आवाजे मरना ...साला उठेगा नहीं......
संतू रेडिओलोजी
  विभाग का नुमाइंदा है .....जो अँधेरा होते ही दूसरी दुनिया में पहुँच जाता है ....
संतू वही पड़ा मिला ......बमुश्किल
.....एक्स रे करा कर मै वापस लौटा........गीली फिल्म बताती है ....कोई हड्डी नहीं टूटी.है..
जय टाँके लगा कर ड्रेसिंग कर रहा है
...मुझे प्रेस्क्रिप्शन लिखने को कहता है......फोन है .......इतने में सिस्टर ने आवाज दी है ....हमें चाय पीने के लिए गेट के आगे लारी तक जाना है ...सो मै एक किनारे खड़ा हूँ....
य फोन पर है ......स्टेब वुंड का
केस आ गया था सर.....दोनों पार्टी के लोग थे ....इमरजेंसी ....
उधर से तेज आवाजे.......

जी......

**********
येस सर

  अभी वही होकर  आता  हूँ...सर....
********
सर...........

उधर से आवाजे   तेज है
......उसके चेहरे के एक्सप्रेशन बताते है .....दूसरी ओर से कुछ अच्छा नहीं कहा जा रहा है.......
चाय की लारी तक वो
  चलते चलते खामोश हो गया है ......
साहेब का
  फोन था ....मनोज पूछता है
हम...पटेल साहब का ...... बरोदा
 गए हुए है
क्या हुआ .....

कोई रिलेटिव है उनके बाहर
.....ओपरेशन हुआ है.....उनकी ड्रेसिंग  करके आनी थी......पर साला यहाँ से फुर्सत मिलती तो जाता न ....तीन इमरजेंसी आ गयी
तुम कहो तो मै हो आयूँ......मै कहता हूँ......
नहीं वो साला .जयेश को बोल दिया है
...वो कहाँ मौका छोड़ेगा....उलटे सेम्पल की   दवा  भी ले जायेगा
जयेश जय का सीनियर
  है ........
चल चाय पी कर आते है ....चाय की लारी अन्दर ही हॉस्पिटल के गेट में ....
...   .....चाय की   लारी   पे निवेदिता की एंट्री हुई है ....... इन दिनों उनके बीच कुछ तनाव है ...जय कुछ बताता नहीं.....पर बहुत सी बाते बिना बताये पता चलती है ....  ...वो  सिगरेट के साथ    उठ खड़ा हुआ   है....कुछ दूरी  पे ....वे दोनों बैठे है .......
मुझे सिगरेट का अफ़सोस  है ...मेरा पूरी पीने का मन नहीं है ...ओर .मनोज बाँट कर नहीं पीता
   ......"हमें तुमसे प्यार कितना रेडियो पे "बज रहा है .....
प्यार की
  भी अपनी जरूरते है ........मनोज चाय  का एक घूँट भरते हुए  उन दोनों की ओर देखते हुए कहता है .....जहाँ   कुछ आरग्यूमेंट  शुरू हुए है .....       .....
बीच बीच में कुछ जुमले तेज आवाज़ में
सुनाई  देते है ...
मेरे घर वाले मेरे शादी कर
देगे........ वो  खड़ी हो गयी है   ....बैचैनी में   कुछ ओर चहलकदमी .....फिर  अंग्रेजी   के   कुछ शब्द ..जय धीमे से कुछ कह रहा  है ...
 ........फिर अंग्रेजी के कुछ ओर शब्द .......
.  ...  मनोज  फेफड़ो में गोल्ड फ्लेक  आराम से   भर   रहा है .... ...  उसकी आँखों में झांकना चाहता हूँ ...पर  चश्मा  पहनने वालो के साथ ये सहूलियत  है ...  उनके  एक्सप्रेशन  आप पढ़ नहीं सकते.....चाय ओर सिगरेट  होस्टल में इस  कोकटेल के आपके फेफड़े ओर आंत दोनों आदी  हो जाते है ....
 रेडियो   पे ....हमें तुमसे प्यार कितना ख़त्म हो गया है!
 उधर फिर कुछ आवाजे है......सिर्फ निवेदिता की........निवेदिता पैर पटकती वापस गयी है .... जय  वापस हमारे पास आकर बैठा है ....चाय की लारी वाला दूसरी चाय लेकर आया है ...कुछ देर की ख़ामोशी.....
अच्छा हेप्पी बर्थ डे है ..जिसे देखो वही बजा रहा है ... जय बुदबुदाया है
तो घर पे बात क्यों नहीं करते ......मनोज 
एक महीने पहले फोन पे  बस इतना कहा था जरूरी है बिरादरी में शादी करना.....तब से बातचीत बंद है हम  बाप बेटे में .....
.
केज्युवलटी
   के गेट के बाहर कुछ हलचल हुई है.....
पेशेंट छे  जय भाई….. का सर्वेंट बुलाने आया है
डेड साल का छोटा बच्चा है ...खूनम खून.....सर पे चोट है.....मां रो रही है ....बाप बदहवास......कोई ऑटो वाला टक्कर मार के गया है .....शुक्र है कोशीयास है ..थोडा गहरा घाव है ..
जय
  वाश करके टाँके लगा ने की तैयारी में  है ....
फिर शोर मचता है ...मै बाहर
   निकलता हूं........सफ़ेद कुरते पजामे  मे कोई नेता जी है ..पीछे  चार पांच चेले ....घुटने के पास से पजामा फटा  है  .थोडा खून भी......
जगह दो भाई को.........उनके चेले एक बिस्तर कब्ज़ा लेते है ......डॉ कौन है

जय
  रूम में ....बच्चे  का घाव  क्लीन कर रहा है ....मै   वापस  उसके पास जाता हूं............ब्लीडिंग बहुत है ....
डॉ कौन है .......फिर आवाज आती है .अरे सिस्टर.......

इस बार नेता जी खुद
  है......सिस्टर भी वही  है
टाँके लगाने से पहले बच्चे के बाल काटने जरूरी है .....

तुम डॉ हो....कोई दो चेले अन्दर घुस आये है .....आगे वाला
 
साहेब
  जयेश भाई को  देखना .....चोट लगी है ...
जय उसे
  घूरता है .....फिर बाल काटने लगा है ...बच्चा अभी भी भी रो रहा है .मां भी......
साहेब....
थोडा वेट करोगे भाई....जय फिर उसे घूरता   है .....
साहेब ..
देखो लो कही आपको वेट नहीं करना पड़ जाये ....जयेश भाई भट साहेब  के खास  है  ......भट्ट गुजरात के स्वास्थ्य मंत्री है .....
दो मिनट बाहर बैठगा ......

साहेब..

.जय ने टांका लगाना शुरू किया है.....बच्चे ने हाथ  पैर फेंकना ...."कस के पकड़ इसे "
जय मुझे डांटता है .....

बाहर नेता जी शुरू हो गए है ......सुपरिडेंट कौन है ...अस्पताल का..बुलायो.....

टाँके लग रहे है ....तकरीबन ७ टाँके है .......
बाहर निकले तो नेता जी नहीं थे ....मनोज बोला सुपरिडेंट के घर को गए है ....
तू खाना ला यार...जय मुझसे बोला ....
साढ़े  दस  बज रहे है ....मै खाना लेने अपनी मोटरसाइकिल पे   निकल  गया   हूँ.......ग्यारह बजे रेस्टोरेंट बंद हो जाएगा .......सुगर एंड स्पाइस हॉस्पिटल के नजदीक है ....मै  चाइनीज़  लेकर आता  हूँ......फेवरेट खाने   के साथ भूख  तेज हो गयी   है ....  अन्दर केजव्यूलटी  में माहोल  अपेक्षा कृत शांत है ..सिक्स्थ  सेन्स के वास्ते  . मै खाने का पोलीथिन    बाहर सिस्टर को देता हूँ   .
साहेब आधे घंटे से अन्दर है .....
... अन्दर साहब है.......ओर नेता जी.....ओर दो उनके चेले ... यानि मै क्लाइमेक्स सीन पर पहुंचा हूँ .....मनोज  एक कोने में है......मै  उसके  साथ   वाली जगह  में  एडजस्ट होता हूँ........ ओर जय हाथ बांधे खड़ा  है...सुप्रीडेंट साहब  भले आदमी है ..मेल जोल वाले .....मुंह में हमेशा पान दबाये रखते है ..... खैर ...जो हुआ ..जाने दीजिये बच्चा है ...इस उम्र में अक्सर ऐसा होता है .....
अब मांफी मांगो नेता जी से ....
 मै ओर मनोज जय की ओर देखते है .....वो थोडा सा नेता जी ओर टर्न होता है .....
I am sorry asshole


57 टिप्‍पणियां:

  1. hahahaaaaaaaa...am sorry asshole.. mere ek bhai hai doctor aaj kal Boston mein hai...bhabhi bhi doctor hain... wo jab hostel se ghar aate to hum dono baith jaate... aisi hi baate hoti thi... aaj yaaden taza ho gayi...

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  2. मिस मट्टू का केस आ रहा था टाइम्स नाऊ पे. बात हो रही थी सेलेक्टिव जजमेंट की. "क्या अगर किसी नेता की लड़की होती तो भी इतना ही समय लगता?"
    "तटस्थता की हिप्पोक्रेटिक ओथ" को पोजिटिव मायने दिए जय ने....
    ...जय हो !
    सवाल ये कि क्या जय अब भी वही काम करता है? या किसी बीहड़ में तबादला?

    बहरहाल कई वन लाइनर अद्भुत हैं.

    जब आप थके होते है आपका शरीर जान जाता है उसे कितनी आवाजो में कैसे झपकी लेनी है.

    चश्मा पहनने वालो के साथ ये सहूलियत है ... उनके एक्सप्रेशन आप पढ़ नहीं सकते

    कुछ युवा वर्ग कि टाईम प्रूफ मानसिकता का मास-प्रतिनिधित्व करते हैं.(कल भी था,आज भी है और कल भी रहेगा...)
    पास होने के बाद की सोच के फटती है .... इस चारदीवारी के बाहर की दुनिया बड़ी कमीनी है

    साला उस आदमी को नोबेल प्राइज़ मिलना चाहिए जिसने दारु का आविष्कार किया
    --

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  3. अस्पताल की गतिविधियों का अच्छा नक्षा उतारा है ।
    आज का आपका केवल शीर्षक पुरानी स्टाइल का है , लेख बिलकुल अलग ।

    लेकिन दोस्त हमने काफी पहले सीखा था कि निजी दोस्तों और पब्लिक में बात करने का तरीका अलग अलग होता है । जो बातें आप दोस्तों में कर सकते हैं , वे ज़रूरी नहीं कि पब्लिक में भी की जा सकें ।

    यादें अच्छी हैं । लेकिन सिल्वर जुबली तो अभी दूर होगी शायद ।

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  4. Let's wait for the day when every Indian be in a position to greet such assholes with the words uttered by Jay.

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  5. Let's wait for the day when every Indian will be in a position to greet such assholes with the words uttered by Jay.

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  6. सच पूछिए तो जिन्होंने आपको शुरू से पढ़ा है वे कभी कभी इसी अनुराग को मिस करते होगे जिसके पास ढेर सारे किस्से है ओर किस्सा गोई का एक अंदाज , जब कभी आप गंभीर होते है तो बहुत गंभीर हो जाते है पर सच मानिये मुझे लम्बे पोस्ट पढने से ऐतराज नहीं है आपके कहने से मैंने लपुझुन्ना को कई बार घोट डाला है ,
    इस पोस्ट को पढ़ती हूँ तो उस दुनिया की एक झलक दिखती है लम्बे लगातार काम ओर अवसाद के क्षण ,पर्सनल लाइफ के फ्रस्ट्रेशन .तीसरा पैर पढने से पहले फिर शीर्षक को देखती हूँ दुनिया कभी भी भली नहीं होती
    पर मेरे वन लाइनर कुछ ओर है
    निवेदिता … ..उसमे दिल छोड़कर सब कुछ खूबसूरत है
    हॉस्पिटल अपने आप को दोहराता है .....बस हम है .....जो सोचते है के वे नायाब है .."
    क्यों यहाँ क्या नेकी का थोक बाजार है.?
    .जिंदगी के हाथ में भी कभी हंटर होता ....कभी गुलाब ......ओर दिल साला खुद से डबल क्रोस करता...

    चाय ओर सिगरेट होस्टल में इस कोकटेल के आपके फेफड़े ओर आंत दोनों आदी हो जाते है ....
    एक महीने पहले फोन पे बस इतना कहा था जरूरी है बिरादरी में शादी करना.....तब से बातचीत बंद है हम बाप बेटे में

    अगर वाकई कोई जय है तो उससे कहियेगा उसके कई दीवाने पैदा हो गए है

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  7. ओर हाँ मैंने इस पोस्ट को एन्जॉय किया ये मूड बनाये रखिये

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  8. यादों की गलियाँ सुहानी होती ही हैं .. आपके साथ इन गलियों की सैर हम भी कर आते हैं ...खुशामदीद ..
    पर अपने तोहफे का इंतज़ार करते करते कहीं ये भी किस्सा ही बन कर न रह जाए ...

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  9. अभी पटना मेडिकल कॉलेज में इन्टर्न हूँ और कुछ दिन पहले ही सर्जरी की ड्यूटी ख़त्म हुई है. कैज्वलटी का बीलकुल सही चित्रण है आपके पोस्ट में...........पढ़ कर मजा आ गया............हॉस्टल के वो दिन, अस्पताल में वो नाईट ड्यूटी................उफ़.............सबकुछ!!!
    http://draashu.blogspot.com

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  10. निवेदिता और मनोज...चुम्बक के दो सिरे ..एक पोसिटिव और एक नेगेटिव चार्ज लिए होते हैं लेकिन रहते एक में ही हैं ..

    ----------------
    --------आखिरी घटना के लिए--
    अस्पताल/कचहरी/थाने/सरकारी दफ्तरों में ऐसी कड़वी हकीकत के दर्शन अक्सर होते हैं.

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  11. आपकी कहानियों की भाषा पढ़कर कुछ अलग तरह का अह्सास होता है । मेरा एक कथाकार मित्र है मनोज रूपड़ा , मुझे बार बार यह लगता है कि आप का व्यक्तित्व कुछ उसी तरह का होगा । पता नहीं आपने मनोज रूपड़ा की कहानियाँ पढ़ी हैं या नहीं ?

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  12. वक़्त ने कई उमरे अपने भीतर रखी है ....
    दुनिया कभी भी भली नहीं होती...
    बस बात कहने का ढंग ही आपको दुनिया से जुदा बता रहा है , अजीब सी दार्शनिकता है .
    वही बातें हैं , मगर अंदाज़ जुदा है .
    अनुराग जी , ब्लॉग की दुनिया अपने अन्दर का सब उजागर कर जाती है .

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  13. तो हमें रियल अनुराग मिल ही गए.. वाक्क्त लगा पर दुरुस्त रहा.. फिर इस लाईन को पढ़ते ही मुझे अपने नाटक की शुरूआती पंक्ति मिल गयी.. और इसे स्टेज पर इमेजिन भी कर लिया..

    "जिंदगी के हाथ में भी कभी हंटर होता ....कभी गुलाब ......ओर दिल साला खुद से डबल क्रोस करता..."

    वो जो खतरनाक टाईप के वन लाईनर जो आपके बाये हाथ का खेल है वो कुछ रोज़ तक गुमशुदा थे.. लौट आये तो राहत मिली.. वैसे पोस्ट मुझे लम्बी नहीं लगी.. बल्कि लगा की छोटी थी पढना तो और भी था.. वैसे ये जय कई बार कई जगहों पर मिला है.. ऐसे जय तटस्थ दुनिया में अभी भी अपनी हलचल बरकरार रखे है..

    उत्तर देंहटाएं
  14. aap jis mode mein likhte hain..usko puri had tak samjhne mein mujhe waqt lagega :)

    उत्तर देंहटाएं
  15. दिमाग जब तक चूक नहीं जाता ख़त्म नहीं होता. आरोह अवरोह चलता रहता है.

    डॉ. अनुराग खुशकिस्मत हैं जो ऐसे विलक्षण घटनाओं और व्यक्तियों से घिरे हैं लेकिन यह थोडा ज्यादा कह गया बल्कि यह कहना उचित होगा कि डॉ. अनुराग उन घटनाओं को शब्द देना जानते हैं जहाँ हद दर्जे की बोरियत भी मौजूद हो. वर्ना जिंदगी तो हम भी जीते हैं.

    और नीलिमा से यह एक शिकायत है कुछ हमारे कहने के लिए रहने दिया करें तब तक इन बातों के आगे उन्ही कि बात मेरी ओरे से भी दोहराई जाए...

    "चाय ओर सिगरेट होस्टल में इस कोकटेल के आपके फेफड़े ओर आंत दोनों आदी हो जाते है" --- इस पर तफसील से कुछ कहना है, एक्सटेंड करूँगा कभी.

    उत्तर देंहटाएं
  16. आपके सच झूठ को पढ़ के..(कभी हाँ कभी नहीं..कभी सर हिलाना भर) आंखे हंसी से भर जाती है..

    हमें तुमसे प्यार कितना ख़त्म हो गया है!अजीब बात है..मगर है..

    हम्म..
    सही में हॉस्पिटल कभी नहीं सोता...

    उत्तर देंहटाएं
  17. पहले ही बहुत कुछ कहा जा चुका है....अतः मैं चुप से खिसक रहा हूँ क्योंकि 'वाह, 'लाजवाब', 'आनंद आ गया' जैसे शब्द कहना पोस्ट के लिए अच्छी बात नहीं है

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  18. kabhi lappujhanna ke bare bataiega..

    dil ki baat ko dil se salam.

    pranam

    उत्तर देंहटाएं
  19. `सुबह सुबह सिगरेट नहीं पीनी चाहिए सीधी फेफड़ो तक जाती है ......वो सुबह सुबह सिगरेट पीते हुए रोज ये बात कहता ..'

    फिल्म शराबी में भी अमिताभ यही तो दोहराते हैं- शराब पीना अच्छी चीज़ नहीं है, फेफडे खराब हो जाते हैं... और शराब पीते हैं :)

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  20. इतनी मुद्दत बाद मिले हो
    किन सोचों में गुम रहते हो

    हम सोच ही रहे थे आप इनदिनों हैं कहाँ फिर याद आया आप एक बहुत महत्वपूर्ण मिशन को पूरा करने में लगे हैं इसलिए दिल पर आपकी पोस्ट के इन्तेज़ार का पत्थर रख लिया वो आज हटा...
    आपके जुमले आपका ट्रेड मार्क हैं...गज़ब हैं...जी करता है बस पढते जाओ पढते ही जाओ...

    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  21. हॉस्पिटल अपने आप को दोहराता है .....बस हम है .....जो सोचते है के वे नायाब है ..

    जादू है डॉक्टर साहब...जादू!
    जबरदस्ती कमेन्ट नहीं होगा क्यूंकि वो सब ऊपर कहा जा चुका है, जहाँ तक मैं सोच सकता हूँ.

    हाँ, वक़्त की उम्रें बेहद नायाब लगीं.

    उत्तर देंहटाएं
  22. कुछ लोगों को पढ़ने मे तो बड़ा आनंद आता है, मगर पढ़ कर उस पर प्रतिक्रिया देने के नाम पर बहुत कष्ट होता है। उसी लेवेल पर जा कर कुछ लिख सको तो लिखो, वर्ना जबर्दस्ती स्पेस काला कर के घेरने का क्या फायदा ??

    हर बार निःशब्द करते हैं आप। इस बात से भी इत्तिफाक़ रखती हूँ कि शीर्षक भले डॉ० अनुराग की कॉमन स्टाइल का था, पोस्ट अनुरागीय स्टाईल की होते हुए भी नयी नयी सी और रोचक थी।

    अंत तक पढ़ना और फिर से पढ़ना ये वो प्रक्रिया थी, जो हम हमेशा ही करते हैं दिल की बात सुन कर।

    "अबे सुन तू जिसके साथ केन्टीन में बैठा रहता है वो तेरी गर्ल फ्रेंड हैसे नहीं....... मै झूठ बोलता हूं" तक :) :) :)

    निवेदिता ..उसमे दिल छोड़कर सब कुछ खूबसूरत है फिर भी किसी के साथ पाँच साल निभा ले गई और खूब निभा ले गई ?????? या फिर मनोज हों या जय सब एकतरफा निभा रहे थे उससे ? कोई रजिस्टर्ड कोई नान रजिस्टर्ड :)

    अजीब दौर था जिंदगी का .थोडा इंकलाबी ....थोडा रूमानी....जिंदगी के हाथ में भी कभी हंटर होता ....कभी गुलाब ......ओर दिल साला खुद से डबल क्रोस करता...बेवकूफियो पर नाज करने के दिन अब उतरने लगे थे ....मुश्किलों पर प्रोटेस्ट पर वाक् आउट नहीं उनसे रूबरू होने का हौसला होने लगा था .....

    केजविलटी की एक अलग दुनिया है ....जहाँ रात में एक अजीब कंटीन्यूटी है ...एक किस्म का शोर वहां का स्थायी बाशिंदा है .....जब आप थके होते है आपका शरीर जान जाता है उसे कितनी आवाजो में कैसे झपकी लेनी है...

    सुबह पापा मम्मी आ जायेगे ....बाहर गए हुए है ....मै उससे पहले दीदी को ले जाना चाहता हूँ......
    मनोज अपने चश्मे को ठीक करके उसे देखता है ....
    ओफिशियाली ले जा नहीं सकते.....पर तुम्हे कोई रोकेगा नहीं......

    नहीं वो साला .जयेश को बोल दिया है ...वो कहाँ मौका छोड़ेगा....उलटे सेम्पल की दवा भी ले जायेगा

    मुझे सिगरेट का अफ़सोस है ...मेरा पूरी पीने का मन नहीं है ...ओर .मनोज बाँट कर नहीं पीता

    I am sorry asshole


    ये वो जगहें हैं जहाँ लौट के फिर आना पड़ेगा अभी।

    और हाँ दर्पण ! साला उस आदमी को नोबेल प्राइज़ मिलना चाहिए जिसने दारु का आविष्कार किया ......सब बायस लोग है प्राइज़ देने वाले .... इसमें तुम्हे क्या भला लगा

    @ @
    @

    by the way ये मेरी तरेरती आखें हैं, दर्शन तुम्हारे लिये...!!!

    उत्तर देंहटाएं
  23. वैसे इस देश के अलग अलग राज्य के एम् .ल. ए का औसत एजुकेशनल आंकड़ा क्या है ? जानियेगा मत वर्ना चौक जायेगे .....
    ओर asshole अंग्रेजी गाली है .......
    वाजपयी साहब भले आदमी थे ....सुपरिडेंट थे ओर फार्मा के हेड भी .मुंह में हमेशा पान दबाये रखते थे .हम अक्सर मजाक में कहते जब वे रिटायर होगे .हॉस्पिटल के गेट के बाहर के कोने वाला पान वाला बुक्के मार के रोयेगा ....तो अक्सर हॉस्पिटल में मुठभेडे होती ओर उनके कार्यकाल में शांति पूर्वक निबटाई जाती ..कई किस्से है....सुनाने बैठूँगा तो बकोल डॉ दलाल ब्रीच ऑफ़ कंडक्ट हो जाएगा .......सो कंट्रोल करे बैठा हूँ .....
    u .k में रहने वाली मेरे बेस्ट फ्रेंड इस बात पे हैरान होती है के पांच साल की ड्रग रियक्शन की शिकार बच्ची को उसका बाप i .c u .में न रखकर जर्नल वार्ड में शिफ्ट करवा देता है k ........घर की औरते अपनी बीमारी को डॉ के पास लेकर तब पहुँचती है जब उनके बर्दाश्त से बाहर होती है ...क्यों ???/ वही साला पैसा ....अब उसकी कहानी को भी कितनी बार दोहराए जाए ...... .ये इंडिया है ..
    जिस शहर में रहता हूँ वहां पांच किलोमीटर चलने के बाद ही दुनिया बदल जाती है ....एक ही सड़क पे बुग्गी ओर सिटी होंडा चलती है ...यहाँ इम्यूनिटी का एपिडेमिक केवल गरीबी रेखा से नीचे वालो में फैलता है ..... सरकारी दवाइयों के सहारे भी स्वस्थ हो जाते है .. .खैर छोडिये मै फिर विषय से भटकने लगा.....
    ....
    मनोज मेडिसिन के बाद दिल्ली के किसी फेमस हॉस्पिटल में डी एम् करने गए .... आगे संजय गांधी पोस्ट ग्रेज्युट कोलेज लखनऊ कुछ दिन बिताने ......वहां एक मोहतरमा से उन्हें इश्क हुआ.......ओर उन्ही से शादी से ठीक दो रात पहले उन्होंने रात को एक बजे हमें सूचना दी.....के भाई रे शादी है पहुँच जाना .....

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  24. aapke lekh padh ke dimaag sachmuch thori der ke liye kisi aur hi duniya mein chale jaata hai...umda..1 bahut hi chota shabd hai lekh ki sarahna karne ke liye...:)...aise hi likhte rahiye...

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  25. थोडा कंट्रोल ही सही है , डॉ अनुराग ।
    कुछ बातें डॉक्टर मित्रों के लिए भी छोड़ दीजिये । :)

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  26. यहाँ माडरेटर लगाना लोकहित की दृष्टि में अपराध है....

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  27. neta ji wale kisse hamare yaha bhi bahut hote rahte hain...koi maafi maang leta hai...aur kisi ka transfer ho jata hai. achchi hai ya buri par hakeekat aisi hi hai.

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  28. ये टिपण्णी का बक्सा बड़ा जालिम है. ऐसी पोत पढने के बाद इतनी बातें दिमाग में चलती हैं कि समझ में नहीं आता क्या क्या लिखें... कितने द्वंद्व, कितनी यादें... आँखों के सामने नाचती हैं. अलग परिदृश्य, अलग लोग पर फिर भी पढ़ते हुए कई जाने से चेहरे सामने आते हैं. कुछ फ्लैशबैक सा...

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  29. शब्दों के प्रवाह ने हमेशा की तरह किस्से को ख़ूबसूरती से क़ैद किया है और वन लाइनर आह भरने वाले हैं ...किन्तु विराम और अनकही में जिंदगी कूट -कूट कर भरी है जो पात्रों के साथ-साथ पाठक के भी भीतर सुलगती है.. ...

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  30. "जब आप थके होते है आपका शरीर जान जाता है उसे कितनी आवाजो में कैसे झपकी लेनी है."

    वाह!

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  31. ..जिंदगी के हाथ में भी कभी हंटर होता ....कभी गुलाब ......ओर दिल साला खुद से डबल क्रोस करता...बेवकूफियो पर नाज करने के दिन अब उतरने लगे थे ....मुश्किलों पर प्रोटेस्ट पर वाक् आउट नहीं उनसे रूबरू होने का हौसला होने लगा था .....
    वाकई जय के किस्से तो यही बताते हैं और हर साल ऐसे ही घटिया नेताजियों के कारण जो उन्हें अपना गुलाम समझते हैं स्ट्राइक पर जाने वाले डॉक्टरों का अनुभव भी.

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  32. सारे वन लाइनर लोगों ने पहले कोट कर रखे हैं...अब हम क्या कहें. आपकी पोस्ट देर से पढ़ने का यही फल होता है, कुछ लिखने को बचता ही नहीं.
    जिंदगी को आते जाते डबल क्रोस करते ये किस्से और ऊपर से आपकी किस्सागोई...बस ठहर के रह जाते हैं आपके इस फिल्म के परदे पर.

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  33. "ओर दिल साला खुद से डबल क्रोस करता."

    कब तक करेगा...... कह नहीं सकते.....

    अब एक पुख्ता सबूत मिलता है...... अपनी भावनाओं को प्रस्तुत करने के लिए डाक्टरी या फिर इंजिनयरिंग जरूरी है....... (पढाई)


    दिमाग ख़ामोशी से केजविलटी में घूमता है.......

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  34. पढ कर जो महसूस हुआ उसके लिये शब्द नही .मुझे आज भी शक है कोई डाक्टर ऎसा कैसे लिख सकता है

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  35. यह तो तय है कि दुनिया बहुत कमीनी है। आप एक उपन्यास लिखें, एक डॉक्टर (ज्ञान चतुर्वेदी) शानदार लेखकों से भी ज्यादा शानदार लिख रहे हैं और आप कई पेशेवर लिक्खाडों को मात देते हैं। आपसे अनुराग हो गया है दद्दा..।

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  36. आपकी किस्सागोई का तो कोई जवाब ही नही है.

    छोटी छोटी सी क्षणिकायें बडे़ बडे़ मूल्यों को रेखांकित कर जाती हैं.

    अगर आप फ़िल्मों में जायें तो स्क्रीन प्ले लेखक के रूप में आपकी फ़िल्म में जो जीवंतता रहेगी, वह बेमिसाल होगे. आप निर्देशन की भी किमया रखते हैं.

    विजया दशमी की शुभ कामनायें. बडे दिनों बाद ब्लोगिंग पर आया तो आना सफ़ल हो गया.

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  37. रेडियो पे ....हमें तुमसे प्यार कितना ख़त्म हो गया है!

    पाँच साल का वक्त बहुत होता है!..खासकर तब जब चारदीवारी से बाहर जिंदगी हाथ मे धुनकी लिये इंतजार मे बैठी रहती है..हमे रुई की तरह धुनने के लिये..जिससे सर्दियों के लिये एक अच्छी रजाई तैयार की जा सके..फ़ैमिली ईटीसी!..अच्छे अच्छे पान सिंह तोमरों की शक्ले बिगड़ जाती हैं..लहरों के थपेड़े खाते हुए..जय अहमक रहा होगा..जो लाइफ़ की शर्तों के आगे सर झुकाने के बजाय बगावत करने की हिमाकत कर सका..सच कहते हैं सिगरेट और शराब बिगाड़ देती हैं लोगों को..मगर नेता जी जैसे लोग इसी लिये होते हैं जमाने मे..जो लीक छोड़ने वालों को हकीकत की तल्खी समझा सकें..वरना फिर जिंदगी के हाथ का हंटर हो है ही..खासे बिगड़े घोड़ों को भी अपनी ट्यून पे नाचना सिखा देता है..निवेदिता समझदार थी..कि सच से कम्प्रोमाइज करने की अक्ल रखती थी..जय कहीं हो लड़ रहा होगा अभी भी..जिंदगी की नाशुकरेदारी से..
    घर से निकलते वक्त एक नकाब थमाया जाता है हमारे हाथ मे..परवरिश का, पारिवारिक विरासत का..दूसरा अच्छी एजुकेशन का मास्क यूनिवर्सिटी मे मिलता है..और तीसरा चेहरा एक अच्छे प्रोफ़ेशनल होने का अपने जॉब पर..इन तीन नकाबों से बैलेंस बिठा पाने का नाम ही एक अच्छी और ’सफ़ल’ जिंदगी होता है..मगर हमारा अपना खुद का चेहरा इन सबके बीच कब कहाँ खो जाता है..हमे खुद नही पता चलता..हम भी आदी हो जाते है इस बनावटी जिंदगी के..कि आइना भी नकाब पहन कर ही देखते हैं..खुश होते रहते हैं..हमारी उसी नकली खुशी पर कहीं हमारा असली चेहरा हँसता होगा..सच कहें तो दूसरों की नजरों मे झाँकने पर भी हमारी अपनी सूरत कभी दिखाई नही देती..बस अपनी ओढ़ी नकाबें दिखती हैं..खुशी एक अनॉल्जेसिक सिडेटिव होती है..एक मैसेंजर-किलर..और अंदर का मवाद भरता रहता है..किसी स्लीपिंग-पिल्स के ओवरडोज या टॉप-फ़्लोर से जंप मारने के एड्रिनिलीन-रश के इंतजार मे..मगर उस मोमेंट मे नकाबें साथ नही देतीं हमारा..
    एक ही कमी होती है आपकी पोस्ट्स की..बहुत जल्द खत्म हो जाती हैं कम्बख्त..डूबने का मौका नही देतीं..
    गुस्ताख साब और दिलीप साब की सलाह पर ध्यान दें..

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  38. 5/10


    अंदाज-ए-बयां सलीकेदार है
    इत्तेफाक से पिछली चार-पांच पोस्ट पे नजर डाली हैं
    उनके मुकाबले हलकी है
    ये पोस्ट बोझिल है, एडिटिंग चाहती है

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  39. उस्ताद जी ....सच कहूं तो मै भी यही महसूस कर रहा हूं .... तकरीबन दो साल पुरानी लिखी हुई है ..कंप्यूटर में पड़ी हुई थी ....कशमकश में था पोस्ट करूँ या नहीं....

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  40. मै इसे बोझिल तो बिलकुल नहीं कहूँगी हो सकता है एक विशाल पाठक वर्ग होने के कारण आपने अपने कुछ मानक तय कर लिए हो पर कभी कभी आम बोलचाल की भाषा में भी लिखा होंना चाहिए जरूरी नहीं के आप हमेशा संक्षिप्त में ओर कम शब्दों में अपनी बात कहे .आपकी शुरूआती पोस्टे ऐसी ही थी सरल ओर दिल से निकली हुई उन्हें लिखने वाला कोई लेखक नहीं था एक प्रोफेशनल इन्सान था जिसका जिंदगी को देखने का अपना नजरिया मुझे पसंद है .

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  41. ..दस साधे, पूरा पढ़ गया। अभी भी वही दृष्य आँखों के सामने है।

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  42. aअस्पताल के कुछ घन्टों का चित्रण इस तरह किया है जैसे हम खुद उसे साक्षात देख रहे हैं। एक क्षण मे इतनी बडी कहानी मे कथ्य,शिल्प, शैली मे तारतम्य रहाकि प्रवाह देखते ही बनता है। आप शायद इस अस्पताल की ज़िन्दगी पर एक बहुत बडा उपन्यास लिख सकते है। मुझे वीर बहुटी की तस्वीरें भेजने के लिये धन्यवाद। आपकी सुहृदयता और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता की दाद देनी पडेगा। शुभकामनाये और आशीर्वाद।

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  43. तब दुनिया भली थी...
    साला उस आदमी को नोबेल प्राइज़ मिलना चाहिए जिसने दारु का आविष्कार किया ......

    बहुत खूब। व्‍यंग के साथ काफी संदेश दे डाला आपने तो..

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  44. हाई अनुराग |

    आपके लेखन में कुछ और ना भी पढो , तो भी वन-लाइनर अपने आप ही जेहन पे स्ट्राइक कर जाते हैं | चिट्ठा-चर्चा में भी आपका लेख 'सस्ते पैनो से भी लिखी जा सकती है अच्छी कविता.......' अच्छा लगा |

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  45. अस्पताल की गतिविधियों का अच्छा नक्षा उतारा है ।
    आज का आपका केवल शीर्षक पुरानी स्टाइल का है , लेख बिलकुल अलग ।

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  46. नमस्कार अनुराग जी,
    काफी दिनों के बाद आपके ब्लॉग पर आ पाया और ये पोस्ट जैसे दिवाली का तोहफा मिल गयी |
    जैसा की आपके कई पुराने पाठकों ने कहा है, ये ही असली अनुराग हैं | ये सारी तकलीफें, जद्दो जहद हम सब देखते हैं किन्तु इतनी सटीकता से लिखना बस आपके हाथ के बस का है |
    ये तो आज कई बार पढना होगा अब |
    काश आप कभी दिल्ली आयें और मिलने का संयोग बने |

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  47. फीड में कुछ प्रॉब्लम है जब तक कारीगर ठीक करे बैरंग देखिये... पोस्ट करते वक़्त ज़ेहन में सबसे बड़ा बुलबुला aapke चेहरे का फूट रहा था :)

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  48. वाह वाह.
    कहानी पड़कर ऐसे लगता है की कहानी का हरेक पात्र सामने बैठा हुआ लगता है चाहे वो निवेदिता हो या जय.......!
    अच्छे क्राफ्ट में ढली मर्मस्पर्शी कहानी
    डॉ तुसी ग्रेट हो.....!

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  49. अब तो बेचारा गधा भी अपने होल पर शर्मिंदा होने लगा होगा, हस्ताक्षर किये जा रहे हैं ताकि सनद रहे लेट लतीफी का रिकार्ड बरकरार है और इसे तोड़कर नया बनाने की कवायद जारी है।

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  50. पहली बार आया हूँ इस ब्लॉग पर . अच्छी शैली है आपके पास किस्सागोई की. किस्सों में रोचकता भी.
    डर्मेटॉलॉजिस्ट मन के डाक्टर को तो नहीं कहते !!!

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  51. देर से सही, दूर से सही, जय को जन्मदिन की बधाई!

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  52. कुछ अलग ही मज़ा आया सुबह के इस् वक्त इसे पढकर.
    इस् बिलकुल अलहदा माहौल का सर्रियल सा लगने वाला पर वस्तुतः बेहद प्रामाणिक और दिलकश विवरण.

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  53. मेरे पास कहने को शब्द ही नही है
    बहुत खूब कभी यहाँ भी आइये
    www.deepti09sharma.blogspot.com

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  54. मैंने यह कहानी थोड़ी देर से पढ़ी, तो क्या पढ़ी तो....इतना ही कहुंगा कि आप हिन्दी ब्लाग की खास उपलब्धि हैं।

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  55. "Father and Son".
    Its too good. Had come here just to have a quick look on new posts (dont have time, have to go somewhere) but didnt realise when I read the whole page. I think that's what is called as "writing"!
    God bless
    RC

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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