2008-04-27

पाँच मंजिला ख्वाहिशों के दरमिया आधा दिन



दोपहर के सूरज भी अपनी दिहाड़ी करके जैसे सुस्ताने के मकाम पे था तब नॉएडा के ग्रेट इंडियन मॉल की बसेमेंट पार्किंग मे हम दाखिल हुए ,अन्दर घुसा तो ऐसा लगा उस   पांच मंजिला माल पे आपकी जुदा-जुदा  ख्वाहिशो को करीने से सजा कर रखा है..........लेडिस सेक्शन के किनारे पे एक कोफ़ी शॉप ..शीशे में चमकती पेस्ट्री ...मीनाक्षी शोपिंग में बिजी है  मैं ओर आर्यन वहां  कुर्सियों में बैठे है.. ,उन्ही कुर्सियों के पीछे किनारे पे दो सोफे पड़े थे ,जिन्हें शायद सुस्ताने के लिए रखा गया  है ,वे इस तरह से रखे गए  है की उस छोटी सी   कोफ़ी शॉप से थोड़ा बाहर  है .........,आर्यन ने दो मिन्टो मे मुझसे १५-१६ सवाल पूछे ओर तकरीबन उस पेस्ट्री को नकार दिया ,इसलिए मैंने सैंडविच का ऑर्डर दिया ओर इंतज़ार करने लगे ... फ़िर वो नजर आई ......पिंक ड्रेस मे ,नन्हें नन्हें पैरो मे आवाज करते हुए जूते पहनकर ,उन जूतों की आवाज पूरे शोपर स्टॉप मे गूंजती जब भी वो दौड़ती पर कानो को बहुत भली लगती ......गोरी चिट्टी ..बिल्कुल परी सी .उसके कंधे पे एक पानी की बोत्तल लटकी थी ओर माथे पे बिल्कुल नन्ही सी बिंदी ..एक दम बीचों बीच .वो आर्यन की तरफ़ बढ़ी ...."..मिष्टी "पीछे  से आवाज आई 
," लक्ष्मी मिष्टी को देखो "....
मैंने देखा ,एक उम्रदराज सी महिला ओर एक युवती ओर एक लगभग ३० -३५ के लपेटे मे महिला थी ,अंदाजा लगाया वही मिष्टी की माँ होंगी .उस किनारे पे रखी सोफे पे से एक १३ साल की दुबली पतली सांवले से भी कुछ गहरे रंग की एक लड़की उठी ओर मिष्टी को उठाकर गोद मे ले गई , ओर उसकी माँ के बराबर मे रखी खली कुर्सी पर उसे बिठा दिया मिष्टी की शरारती आंखो से ने जैसे आर्यन से कुछ बातें की ओर दो चार मिनट बैठने के बाद फ़िर उन्ही जूतों के परिचित से आवाज गुंजी ...
."मिष्टी " ...माँ ने फ़िर खीचकर बैठा लिया ,शायद तब तक उनका ऑर्डर आ चुका था वे कुछ खाने लगे थे .....लक्ष्मी तुम कुछ लोगी ?
उन उम्रदराज महिला ने उस १३ साल की लड़की से पूछा ....फ़िर उसका जवाब सुनने से पहले ही अपने प्याले को होठो से लगाकर बातचीत मे व्यस्त हो गई ..उस लड़की ने फुसफुसा कर कुछ अस्पष्ट सा कहा जो मेरी भी समझ नही आया ...कोफी अचानक कड़वी लगने लगी थी ..उसका एक घूँट भरकर .मैंने देखा मिष्टी अभी खाली प्लेट मे चम्मच बजा रही थी .....तीनो महिलाये बातचीत मे व्यस्त थी ,तभी वेटर मिष्टी का सैंडविच लेकर आया ....एक नजर अपनी प्लेट को देख उसकी आँखे सोफे पर गई ...".लक्ष्मी " उसने तोतले लफ्जों से पुकारा ,लक्ष्मी ने वही से उसे मुस्कान दी ."आराम से खायो ...."माँ ने अंग्रेजी मे हिदायत दी ,मिष्टी ने एक बार सोफे की ओर देखा फ़िर नीचे उतरी ओर अपनी सैंडविच वाली भारी सी प्लेट लेकर सोफे की तरफ़ बढ़ी ...."मिष्टी कम हियर"माँ ने पुकारा ...मिष्टी सीधी चलती हुई सोफे पे पहुँची .सोफा उसके कद से थोड़ा ऊँचा था,पहले प्लेट रखी......' मिष्टी कम हियर 'वापस वही आवाज ...मिष्टी ने अपने नन्हें पैर उचके ओर लगभग कसरत सी करती हुई सोफे पे चढ़ गई ..प्लेट मे से एक सैंडविच उठाया लक्ष्मी की दिया ओर एक अपने हाथो मे पकड़ खाने लगी....लक्ष्मी सहम गई थी ..'.खायो -खायो"मिष्टी ने लक्ष्मी से कहा फ़िर आर्यन की ओर मुस्कराते देख खाने लगी...






27 टिप्‍पणियां:

  1. दिल को छू गया लेख,पर नज्म ने तो दिल मोह लिया,बहुत बहुत खूबसूरत.शुक्रिया इतने अच्छी नज्म के लिए.

    उत्तर देंहटाएं
  2. आप की सह्दयता को व्यक्त करती पोस्ट ....

    उत्तर देंहटाएं
  3. दिल को छू गयी आपके दिल से निकली बात.. उम्दा लेखन..
    लगता है शॉपर स्टॉप से आपके पैसे मिल गये वापस

    उत्तर देंहटाएं
  4. Dr. saab...kya kahoon!!! Aapke lekhan me ek gahan anubhuti hai jo padhne wale ke man me kai sawal khade kar deti hai. Jeevan ke chiraag me chipe huye in andhere "blind-spots" ko aap bakhoobi pehchaante hain

    उत्तर देंहटाएं
  5. कभी कभी मैं सोचती हूँ , ऐसी क्या मजबूरी है हमारी कि हम सब एक दूसरे की तकलीफ समझ नही पाते ,,,,औरों का हमारे लिए महत्व या पहचान नही पाते ,,क्या ऐसे लोगों को कभी दूसरों के हाथों कोई तकलीफ नही पहुँचती कि ये औरों का मन कुचलने के लिए हमेशा तत्पर जान पड़ते हैं ? या कहें कि जो हमसे आर्थिक या शैक्षिक या किसी और दृष्टि से कमजोर हो ,तो हमे एक अदृश्य सा अधिकार मिल जाता है उसके मानसिक उत्पीडन का ??

    उत्तर देंहटाएं
  6. आप के लेख या संस्मरण या घटनाओं के विवरण सब में भावनाओं को प्राथमिकता रहती है.
    यहाँ भी एक छोटे से प्रकरण को दिल से देखा और दिल से ही व्यक्त किया गया है--और आप की काव्य रचना ने चार चाँद लगा दिए.
    बहुत खूब!

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत ही बढिया लगा.. सीधा दिल तक उतर गई ये पोस्ट भी..
    वैसे ग्रेट इंडिया मॉल से जुड़ा एक किस्सा मैं भी लिख चुका हूं, पर वो कुछ अलग सा है.. शायद आपके ब्लौगिंग में उतरने से पहले का है.. अगर समय मिले तो इसे पढियेगा.. पता है :

    http://prashant7aug.blogspot.com/2007/11/blog-post_23.html

    उत्तर देंहटाएं
  8. आपके लेखन की यह बहुत बड़ी खूबी है की यह एक साँस में पढी जाती है .और दिल को छु जाती है ..बच्चे सच में ईश्वर का रूप होते हैं .


    कितनी सर्द ओर ख़ामोश निगाहे
    जम जाती है उसके चेहरे पर
    घबरा कर आँखे बंद कर जाने क्या क्या बुदबुदाता है नज्म बेहद पसंद आई ..!!

    उत्तर देंहटाएं
  9. आपकी बात दिल को छू गई, सचमुच हम बड़ों से बच्चें कहीं ज्यादा सहृदय होते हैं, उनके लिए अपने पराए का कोई भेद नहीं

    उत्तर देंहटाएं
  10. तेरा नन्हा नमाज़ी कन्चे खेल रहा है।
    अनुराग जी
    एक सच्चा और अच्छा इंसान ही ऐसी पोस्ट लिख सकता है. बहुत खूब लिखा है आपने . बच्चा ही है जो इंसान इंसान में अन्तर नहीं कर पाता. बच्ची का नाम आपने मिष्टी लिखा है और हमारी मिष्टी भी बिल्कुल ऐसी ही है जैसी आप ने बताई. क्या नाम में इतना असर होता है? ऐसी पोस्ट के लिए मेरी हार्दिक बधाई.
    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  11. khuda tera nanha namazi kanche kel raha hai,badi masumiyat se sach darshati khubsurat nazm hai doc saab,aur misthi ki kahani bahut masum aur dil ko chu lene wali.
    is khubsurat ,masum se post ke liye bahut badhai.

    उत्तर देंहटाएं
  12. सच अनुराग जी आपकी इस पोस्ट ने दिल को छू लिया।
    आप अपने आस-पास हो रही घटनाओं को काफ़ी बारीकी से देखते है । ये बहुत अच्छी बात है। ये आपकी संवेदनशीलता को दर्शाती है।

    उत्तर देंहटाएं
  13. अनुराग जी ,
    बस इतना ही कहूँगा - सुभान अल्लाह !
    वरुण राय

    उत्तर देंहटाएं
  14. anurag....aapne s ghatna ko jis tarah se dekha, aap bahut achche insaan hain!kyoki ek nek dil hi in chhoti chhoti baaton ki gahraaiyon ko mahsoos kar sakta hai.....nazm bhi laajawaab.

    उत्तर देंहटाएं
  15. ये नज़्म आपकी सबसे खूबसूरत रचनाओं मे से एक है-मुझे सदा से बहुत पसंद रही है-शुभकामनाएँ

    उत्तर देंहटाएं
  16. अच्‍छा लगा आपका लेख और कविता भी.

    उत्तर देंहटाएं
  17. सच, बच्चे अच्छे होते हैं। उनपर कलई नहीं होती।

    उत्तर देंहटाएं
  18. बच्चे इसीलिये ईश्वर का रुप होते हैँ
    सुँदर नज़्म सुण्दर कथा और सुम्दर नायिका मिष्टी का भोलापन
    बहुत पसँद आया अनुराग भाई
    लिखते रहिये,
    स्नेह्,
    - लावण्या

    उत्तर देंहटाएं
  19. अनुराग जी,मिष्टी की मिष्ठान आप के लेख से भरपुर मिली ओर रही सही कसर कविता ने पुरी कर दी,आप के लेख पर मिठठाई के साथ थोडा नम्कीन भी मिला उस १२,१३ साल की मासुम बच्ची (शायद नोकरानी होगी) के नाम से ,बहुत धन्यवाद.

    उत्तर देंहटाएं
  20. बहुत उम्दा-बहुत गहरे उतर गई.

    उत्तर देंहटाएं
  21. आपकी यह पोस्ट पढ़कर बहुत सुखद अनूभूति हुयी। अच्छा लगा। शुक्रिया।

    उत्तर देंहटाएं
  22. क्या बात है, बेहतरीन नज़्म

    उत्तर देंहटाएं
  23. jo mujhe kahana tha vo sab to sab kah gaye ...mai kya kahu.n.... bas ..HEAD OFF TO YOU

    उत्तर देंहटाएं

कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails