उससे पहली मुलाकात सी। ऍम.ओ ऑफिस के बाहर हुई थी जहाँ हम medial चेकअप की लाइन मी खड़े थे ,चूँकिहम all india entrance examanition वाले १५ लोग थे ओर उसमे भी कुछ लोग नदारद थे इसलिए लाइन छोटीथी ,वो बाहर निकला ओर मैं लाइन मे सबसे आगे खड़ा था 'पूरे कपड़े उतरवा लेगे ' मुझे देखकर वो बोला तो आगेकी कल्पना करके मेरे होश उड़ गए ओर मेरे पीछे खड़ी लड़की तो लगभग बेहोश सी हो गई....अन्दर ओंपचारिकताभर थी.....हम बाहर निकले तो जाट मुस्करा रहा था हमने देखा हमारे बाद लड़की को लगभग घसीटते हुए उसके माँबाप अन्दर ले गये....बाद मे यही जाट हमारे रूम पार्टनर तय हुये....ओर शुरू के कुछ दिन हमे हरियाणवी भाषा केअभ्यस्त होने मे लगे ....वो अक्सर कहते "तैने बेरा है " कई दिनों बाद हमे पता चला की बेरा का मतलब "पता " यामालूम होना है ....जाट अपने हरयानवी चुटकुले सुनाता ओर उसमे कई खास लड़को वाले चुटकले होते एक बार हमलड़कियों के साथ केन्टीन बैठे हुए थे ओर जाट शुरू हुआ "एक चूहा भाजा जा रहा था ........भाजा का हरियाणवी मेमतलब भागना होता है......हम लड़के बैचैन हो उठे ......जाट क्या सुना रहा है ...कल ही तो हमे सुनाया था ॥जाट काध्यान हमने तोडा .जाट .ने अनसुना किया फ़िर शुरू हुआ "एक चूहा जंगल मे भाजा जा रहा था ".......जाट ...किसीने आवाज दी जाट ने फ़िर अनसुना कर दिया....चूहा .....जाट किसी ने आवाज दी "क्या कर रहा है ' के कर रहा हूँचुटकुला सुनाने लग रिया हूँ ." जाट लड़किया .....कोई फुसफुसाया .....अबे यो दूसरा चूहा है ............................जाटगुस्से मे खड़ा हो गया ....
गर्मी हो या सर्दी जाट गर्म पानी मे ही नहाता ,हॉस्टल के गीजर ठीक होने से पहले उसके पास अपनी एक रोड थी जिसे उसने एक लकड़ी के चारो ओर लपेट कर बनाया हुआ था ,उसे वो अक्सर बाल्टी मे डालता ओर पानी जब खौलने लगता तब जाट नहाने की बाल्टी ले कर चलता ....रोज मैं उम्मीद करता की अभी बाथरूम से उसके चीखने की आवाज आयेगी पर कभी नही आयी ....एक दिन सुबह जब वइवा की तैयारी मे मैं किताब हाथ मे लिए इधर से उधर उस कमरे मे दाल रहा था "देख पानी गर्म हुआ के ना"?जाट बोला .....मैंने पानी मे हाथ डाला ओर एक झटके से दूर जा गिरा .....जाट के ठहाका गूंज उठा ,उसके बाद मैंने कभी उसे गर्म पानी पर नही टोका ।हमारे ठीक नीचे एक मैस हुआ करती थी ओर गर्मियों मे उसकी बालकनी मे उसका महाराज अक्सर मुह खोल कर खर्राटे मार कर सोता था .जाट भाई को रात रात को बहुत लगती थी ओर वे बाथरूम से बचते हुए कई बार बालकनी से ही अपनी शंका का निवारण कर लिया करते थे .....उनकी इस आदत के कारन हम कई बार कहते की उसे prostate enlargement हो गई है........खैर उस दिन वो उठे ओर नीचे से गुजराती मे गलिया आनी शुरू हुई ओर जाट भाई अपनी चद्दर ओड के लाईट बुझा के लेट गये ओर ....हमारी कुछ समझ मे आता उससे पहले ही गेट जोर जोर से खटखटाया जाने लगा ॥हम उठे ओर दरवाजा खोला ...महाराज को जब तस्सली हुई की हमारी बालकनी से कोई कार्य नही हुआ है .....तब वे रवाना हुए ..
जाट भाई के पास एक रंगीन कम्बल हुआ करता था जिसके वे अक्सर नाराज हो जाने के बाद ओड कर लेट जाया करते ....ओर आवाजे देने पर भी अपना मुह उसमे से बाहर नही निकालते ......उन दिनों नये नये ताले फिट हुये थे जिनकी तीन चभिया दी गई थी जिसमे से एक चाभी हमारे लोकल दोस्तो के पास थी ओर उस ताले मे ये खासियत थी की आप उसकी एक क्नोब घुमा कर जोर से बंद करो तो वो लाक हो जाता था......तो एक सुबह हम आराम से उठे तो जाट गायब था हम होस्टल केन्टीन गये चाय -वाय पी वापस लौटे तो जाट कमरे मे नही था ,हम तैयार होकर कॉलेज के लिए रवाना हो गये ,पहली क्लास मे जाट नदारद .......पूरे किसी लेक्चर मे जाट नही दिखा ......ये साला जाट गया कहाँ .....उन दिनों हमारा एक घंटे का लंच ब्रेक होता .....मेस मे भी जाट नही दिखा ......शाम को हम कशमकश मे होस्टल लौटे तो जाट खाली अंडर वियर मे सुलगे हुए खड़े थे....दरअसल वो बाथरूम मे अपने कपड़े धो रहे थे नहाने के साथ साथ ओर हम ताला लगा कर चल दिए ,दूसरी चाभी अन्दर रह गई ओर पुरी लोबी मे बदकिस्मती से उस रोज कोई नही आया ......हम उस रोज आगे आगे थे ओर जाट हमारे पीछे .......कई दिनों तक वे उस कम्बल को ओडे रहे ......
जाट को अक्सर पहली नजर का प्यार होता उन्हें पहला एक मोडेर्ण गुजराती लड़की से हुआ ,दूसरा एक ठेठ गुज्रातन से ......तीसरा ६ साल बड़ी सीनियर से उसके बाद हमने गिनना छोड़ दिया .....जाट की डाइट बहुत अच्छी थी इसलिए अक्सर पार्टियों मे वो देर तक खाना खाता मिलता .....एक बार पहली बार हमारे एक लोकल दोस्त ने हमे खाने पर बुलाया जिसकी मम्मी को हिन्दी लगभग ना के बराबर आती थी,खैर पहुँचने के थोडी देर बाद गोल गप्पे मेज पर बैठा कर सर्व किए गये ....१०-१२ खाने के बाद .....जब हम इस इंतज़ार मे थे कि नया कुछ आएगा ....हमे हाथ धोने को पूछा गया तो हम परेशान से हाथ धोकर बैठ गये .....वही हमारा डिनर था ......जाट ओर मैंने फ़िर लौटते वक़्त एक लारी पर खड़े होकर केले खाये.......
14 hours ago




27 टिप्पणियाँ:
जाट तो जाट होते हैं। वैसे ये लोग खुशमिजाज होते हैं इसलिये इनकी उम्र काफी होती है। जाटों के और किस्सों का इंतजार रहेगा।
डा. साहब आप तो.. रोचक क़िस्सो की ख़ान है.. जाट भाई के बारे में और बताएगा
जाट तो जाट. देख इसके ठाट।
जाट पुराण शानदार चल रहा है डाक्टर साहब, लेकिन मानना पड़ेगा आपका दोस्त जरूर बहुत खास रहा होगा जो उसे आज तक याद करते हैं।
:) जाट के ठाठ ....अच्छा किस्सा है ..वैसे जाट सीधे साफ दिल के होते हैं....हमारी तो जन्मभूमि ही जाट वाली है :) हरियाणा .....
अच्छा लगा किस्सा सुन कर..
लगभग हर होस्टक में ऐसे लोग मिल ही जाते हैं.. मेरे होस्टल में भी थे.. सभी की याद दिला दी..
तुम दोनो की शक्ल याद आ रही है और उसका अंदाज़ याद कर के हँसी भी......कभी बात हो तो याद देना...।
ha ha ha
sahi hai doctor sahab :-)
आर्य सहब म्हारा भी राम राम सैं. आपके संस्मरण काफी रोचक हैं. मैं एक बात कहना चाहता हूं. जिस दोस्त को आप जाट कह कर पुकारते है वह आपकी कहानी का चरित्र है पर जिसे आप जात सभ्यता या भांषा के रूप में बता रहे हैं वह एक लोक सभ्यता है इस क्षेत्र का ब्रहमण भी ऐसे ही होता है. खैर मैं आपसे व्यक्तिगत रूप से प्रभावित हुआ हूं आपको पत्र लिखूंगा.
योगेश समदर्शी
rochak prasang.aur likhiye hm intizar me hain :-)
What a nice flash back. धारा प्रवाह. मजेदार है. वैसे सच बताता हू जब इसकी हेडिंग देखी तो लगा कि आप जाट के साथ क्या कर रहे थे और जब यह पता चला कि होस्टल में तब तो और भी आश्चर्य हुआ कि डाक्टरी कि पढ़ाई में भी जाट... क्या गुल खिलता होगा... वैसे इनका Sense Of Humor जबरदस्त होता है
बहुत आनंद आया आपका ये प्रसंग पढ़कर...आपकी यादों का संदूक ऐसे ही खुलता रहे.
अनुराग जी जाटो मे मे भी रह हू , मेरे उपर भी लगता हे जाट का असर हे, जो गर्मियो ओर सर्दियो मे हमेशा गर्म पानी से ही नहाता हू, (हमारे यहां सर्दी ही रहती हे,)बहुत मजा आया हमारे जाट भाई की बात पढ कर , कुछ साल पहले हमारे जहा भी कुछ बच्चे भारत से आए IIT मे उन मे एक जाट भी था, अब सब बाहर बियार पीने गये मे तो पुराना था सब जानता था, तो किसी बात पर एक लडका बोला भाटिया जी अगर लडाई हो गई तो, तो मेने कहा फ़िक्र मत करो लडने के लिये इस जाट को आगे कर देना.
अनुराग जी, बहुत बढिया संस्मरण लिखा है ....हमें भी अपने होस्टल के दिनों की कितनी ही यादें ताज़ा हो आईं। और उस दिन जब गोल-गप्पे का डिनर कर के आप उस लोकल दोस्त के घर से निकले तो रास्ते में आप और आपके जाट दोस्त में क्या बढ़िया वार्तालाप हुया हमें तो भई उस का अगली पोस्ट में बेसब्री से इंतज़ार रहेगा।
भाई डागदर मन्ने मलूम न था के तू सुई के अलावा किस्से देना भी जाने है...इब के तो पढ़ के भोत मजा आया से...ऐसे ही किस्से देता जा भाई ..
नीरज
बहुत सही सम्स्मरण निकाला है. जाट का किस्सा. और किस्से लाईये इनके. :)
:-) जाट को किसी भी जाति/प्रजाति से रिप्लेस कर सकते हैं!
ज्ञान दत्त जी ने सही कहा: जाट को किसी भी प्रजाति से और इन किस्सों को किसी भी होस्टल से रिप्लेस कर सकते हैं.
bahut mazedaar kissa...aapka locals ke saath interaction hote hue koi kissa ho to sunaiyega..waise Jat bhai ke baare mei aur sun ne ke liey utsuk hai..
likhte rahe..
मज़ेदार किस्सा ! अगली कड़ी का इंतजार है।
achcha laga.
बेजी जी जरूर आपकी याद देंगे ...पर आपको शैली ने अपनी याद भिजवाई है...उससे कबूल करे ,वो आजकल usa मे है ,नीलिमा जी दोस्त ही मेरे जीवन भर की कमाई है....आप सभी का शुक्रिया......जाट के इतने किस्से है की पूरा नोवल .लिखा जा सकता है....
आपका यह मित्र-प्रसंग रोचक और रोमांचक है .
राजस्थान के शेखावाटी अंचल(सीकर-झुन्झुनू-चुरू) में पढाई-लिखाई के दौरान जाट सहपाठियों-मित्रों के साथ लम्बा समय बिताया है और उन्हें यारों का यार,बेहद बिंदास, निडर , मुश्किल समय में साथ खड़े होने वाला और कभी हार न मानने वाला पाया है . अपनी मिट्टी की खुशबू हमेशा उनके साथ होती है .
आज आपके साथ मैंने भी अपने सभी मित्रों को याद किया . आज भी वह समय -- वे क्षण --जब-तब स्मृति में झिलमिलाने लगते हैं और लगता है हम समय के उसी बिंदु पर पहुंच गए हैं .
आपका संस्मरण पढ़कर मुझे वो सारी कहावतें याद आ गईं जो मेरे पड़ोस के जाट अंकल सुनाते थे। हमारा घर मेरठ कॉलेज के सामने था और वहां से जाट हॉस्टल साफ नजर आया करता था। कभी अशोक की लाट, राधे की चाट और आरजी कॉलेज के सामने की बात भी सुनाइए,,
अगर हो सके तो।
मजेदार संस्मरण है। जाट भाई के।
दो कॉफी हो चुकी हैं...अब यहाँ तो आपके जाट मित्र से मिलते वक्त लस्सी का गिलास हाथ में होना चाहिए... खैर बाद में... अभी तो आपके प्यारे दोस्त के बारे में पढ़ कर हरयाणा नानी के घर जाते तो वहाँ के अपने जाट दोस्त याद आ रहें हैं... दोस्ती के रिश्ते का तो कोई मोल ही नही है.... आपको पढ़ना मन को बाँध लेता है...
रे यो तो मैं पढ़्या ही नहीं।
पहाड़ियों की कालोनी और जाटों के स्कूल में पढ़कर न तीन में रहा न तेरह में। आजतक जाटों से पीछा नहीं छूटा। एक जाता है तो दूसरा कहीं न कहीं से आ ही जाता है। सच… जितने दिलदार जाट होते हैं दूसरे क्या ही होते होंगे। मज़ेदार रहा यह किस्सा। अब ऐसा कीजिये कि नावेल नहीं तो तीन चार एपिसोड्स में जाट भाई पर कुछ और हो जाये।
शुभम।
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