2008-05-10

माँ को .

कुछ देर बस पास बैठ जाऊँ
माँ अब ओर कुछ नही चाहती हैं





22 टिप्‍पणियां:

  1. वक्त कैसे कब बदल जाता है
    माँ का साया खुदा सा नज़र आता है
    मूक रह कर भी वह कितनी बातें कर जाती है
    माँ है न दिल की हर बात समझ जाती है ....

    उत्तर देंहटाएं
  2. कुछ देर बस पास बैठ जाऊँ
    मैं भी कुछ और माँ से नहीं चाहता हूँ..

    उत्तर देंहटाएं
  3. आह!!! आपने मुझे रुआसा कर दिया. अब मैं क्या कहू....

    उत्तर देंहटाएं
  4. मेरी माँ तुने मुझे ज़िन्दगी दी,
    और मैं तुझसे ही दूर भागता रहा,
    एक तेरे ही प्यार थे मेरी माँ,
    जो मुझे हर मुश्किल से उबारता रहा.

    उत्तर देंहटाएं
  5. इससे बेहतर कविता नहीं पढी..


    ***राजीव रंजन प्रसाद

    उत्तर देंहटाएं
  6. अनुराग जी
    आपने इतने कम शब्दों में माँ की सारी पीड़ा को अभिव्यक्ति दे दी। वाह

    उत्तर देंहटाएं
  7. maa ke pure jazbaat apne keh diye doc sab aur senti bana diya,bahut sundar,maa sa koi nahi hota.

    उत्तर देंहटाएं
  8. अनुराग जी सच मे आप ने बहुत सही बात कही हे, जब भी घर जाता हु मां अपने पास बिठा लेती हे कभी मुझे, कभी मेरे बच्चो को, कभी मेरी वीवी को ओर फ़िर लगता हे उसे दुनिया की सारी खुशिया मिल गई हो,
    आप का धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  9. बस १३ शब्दों में प्राण हर लिए...गजब भाई, हद कर दी!!!

    उत्तर देंहटाएं
  10. जय श्री गुरुवे नमःसोचो जिसने तुम्हें सुंदर सृष्टि दी , जो किसी भी प्रकार से स्वर्ग से कम नहीं है , आश्चर्य ! वहां नर्क (Hell) भी है । क्यों ? नर्क हमारी कृतियों का प्रतिफलन है । हमारी स्वार्थ भरी क्रियाओं मैं नर्क को जन्म दिया है । हमने अवांछित कार्यों के द्वारा अपने लिए अभिशाप की स्थिति उत्पन्न की है । स्पष्ट है कि नर्क जब हमारी उपज है , तोइसे मिटाना भी हमें ही पड़ेगा । सुनो कलियुग में पाप की मात्रा पुण्य से अधिक है जबकि अन्य युगों में पाप तो था किंतु सत्य इतना व्यापक था कि पापी भी उत्तमतरंगों को आत्मसात करने की स्थिति में थे । अतः नर्क कलियुग के पहले केवल विचार रूप में था , बीज रूप में था । कलियुग में यह वैचारिक नर्क के बीजों को अनुकूल और आदर्श परिस्थितियां आज के मानव में प्रदान कीं। शनै : शनैः जैसे - जैसे पाप का बोल-बालहोता गया ,नर्क का क्षेत्र विस्तारित होता गया । देखो । आज धरती पर क्या हो रहा है ? आधुनिक मनुष्यों वैचारिक प्रदूषण की मात्रा में वृद्धि हुयी है । हमारे दूषित विचार से उत्पन्न दूषित ऊर्जा ( destructive energy ) , पाप - वृत्तियों की वृद्धि एवं इसके फलस्वरूप आत्मा के संकुचन द्वारा उत्त्पन्न संपीडन से अवमुक्त ऊर्जा , जो निरंतर शून्य (space) में जा रही है , यही ऊर्जा नर्क का सृजन कर रही है , जिससे हम असहाय होकर स्वयं भी झुलस रहे हैं और दूसरो को भी झुलसा रहे हें । ज्ञान की अनुपस्थिति मैं विज्ञान के प्रसार से , सृष्टि और प्रकृति की बहुत छति मनुष्य कर चुका है । उससे पहले की प्रकृति छति पूर्ति के लिए उद्यत हो जाए हमें अपने- आपको बदलना होगा । उत्तम कर्मों के द्वारा आत्मा के संकुचन को रोकना होगा , विचारों में पवित्रता का समावेश करना होगा । आत्मा की उर्जा जो आत्मा के संपीडन के द्वारा नष्ट होकर नर्क विकसित कर रही है उसको सही दिशा देने का गुरुतर कर्तव्य तुम्हारे समक्ष है ताकि यह ऊर्जा विकास मैं सहयोगी सिद्ध हो सके । आत्मा की सृजनात्मक ऊर्जा को जनहित के लिए प्रयोग करो । कल्याण का मार्ग प्रशस्त होगा । नर्क की उष्मा मद्धिम पड़ेगी और व्याकुल सृष्टि को त्राण हासिल होगा । आत्म - दर्शन (स्वयं का ज्ञान ) और आत्मा के प्रकाश द्वारा अपना रास्ता निर्धारित करना होगा । आसान नहीं है यह सब लेकिन सृष्टि ने क्या तुम्हें आसन कार्यों के लिए सृजित किया है ? सरीर की जय के साथ - साथ आत्मा की जयजयकार गुंजायमान करो । सफलता मिलेगी । सृष्टि और सृष्टि कर्ता सदैव तुम्हारे साथ है । प्रकृति का आशीर्वाद तुम्हारे ऊपर बरसेगा । *****************जय शरीर । जय आत्मा । । ******************

    उत्तर देंहटाएं
  11. छोटे मे सारा मर्म समेट दिया आपने।

    उत्तर देंहटाएं
  12. अनुराग जी, आप की इतनी मार्मिक और गहरी बातों से भई मुझे तो आप की डाक्टरी पर शक होने लगा है...इतने कम शब्दों में इतना मर्म.....।

    उत्तर देंहटाएं
  13. माँ पर तो आज कईयों को पढ़ा, पर आपकी दो लाइनों में दिल की बात मिल गई. सच में माँ को और कुछ नहीं चाहिए. ये बातें मैंने भी महसूस की है... और शायद मैं भी यही चाहता हूँ... पर माँ तो हमेशा है ही हमारे लिए.

    उत्तर देंहटाएं
  14. aaaahh Anurag ji..... do panktiyo.n me kya kuchh bator idya...maa ki pida...bachchho.n ki majburi bhi...! samay kahan maa ki ye chhoti si mang puri karne deta hai.

    उत्तर देंहटाएं
  15. आप ने क्या मन पढने में महारत हासिल की है ?अब तो हर बार दूसरों के मन पर लेखनी भी चला देते है !

    उत्तर देंहटाएं
  16. दो पंक्तियों में सारी दुनिया समेट दी

    उत्तर देंहटाएं
  17. बहुत सुन्दर लिखा है आप् ने. पिछले हफ्ते माँ से मिलकर आयी हू और बस आपकी कविता जैसा ही एहसास माँ की आँखों से मिला.आप की कविता दिल को छू गयी..

    उत्तर देंहटाएं
  18. bahut sundar...kuchh panktiyan kitna gahara asar karti hain----ek saboot hai aap ki yah kavita...

    उत्तर देंहटाएं

कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails