वो जब रोज थककर घर लौट कर आती है तो उसे अपनी थकान से ज्यादा इस बात की फिक्र रहती है की मेरे बेटे ने खाया की नही ?घर मे घुसते ही उसका पहला सवाल होता है ....उसने कुछ खाया है या नही.... ।वो दोपहर का पेट भर खाना सिर्फ़ छुट्टी वाले दिन खाती है ॥सुबह कभी कभी नाश्ता करती है कभी नही.....क्यूंकि जाते जाते भी उसे इस बात की चिंता रहती है कि नाश्ता ठीक बना या नही ? कई बार शायद रास्ते मे उसका भी मन होता है कि कही रुक कर कोल्ड ड्रिंक पी ले....पर ... उससे ज्यादा घर जल्दी पहुँचने की जल्दी....कितने सालो से वे एक सन्डे का इंतज़ार करती है कि उस रोज वो सिर्फ़ उसका संडे होगा.....पर सन्डे वो सुबह से ही जुट जाती है..... ऐसा लगता है सन्डे वो ज्यादा व्यस्त रहती है.....जब कभी छोटू भूखा सो जाता है या उसे कोई चोट लगती है तो वो रुआंसी हो जाती है....उससे लिपट कर रोती है ....."मैं नौकरी छोड़ दूँ?वो सवाल पूछती है ओर ना जाने किस "guilt " को अपने अन्दर सीचती राहती है.....कभी कभी साल मे एक दो दिन वो कहती है "सुनो चाय पिलायोगे ?"...ओर फ़िर थोडी देर मे ही गैस के पास आकर दूध मे पत्ती भी डाल देती है... एक गुलाब का फूल कई रोज तक संभाल कर रखती है ओर पानी से उसे कई रोज तक जिलाए रखती है...फ़िर बाद मे किसी किताब मे छुपा कर रख देती है.....बाज़ार मे किसी रोज अपने लिए खरीदने निकलती है ओर फ़िर किसी दूकान से छोटू के लिए टी शर्ट ले आती है.....तुम्हारा ?अगले सन्डे देख लेंगे.......
एक माँ की पाती
तुम क्या जानो ....
कितना मुश्किल होता है
इक नन्ही सी जान को
बहला -फुसला कर उठाना
छोटे से कंधो का
बस्ते का बोझ उठाना
छुट्टी की घंटी के संग
अपना चेहरा दिखाना
इक -इक निवाले मे
हाथी -घोड़े बिठाना
रोज़ कई शब्दो को
चुन कर इक कहानी बनाना
भरी दुपहरी झूठ-मूट
आँख मीच कर सो जाना
दिन भर की तल्खियो को
उसकी हँसी से मिटाना
तुम क्या जानो.....
कभी-कभी
अच्छा लगता है
बिखरा घर
तुम क्या जानो
कैसा लगता है
आँसू गाल पर रख कर सो जाना
तुमने देखा है कभी ,
सोया हुआ बचपन ?
हर रात
खिड़की से रात को उतारकर
टीका लगाती हूँ
तुम लिखो
चाँद तारो की बाते ,
मुश्किल लोगो की ,
उलझी उलझी सी बाते
मेरी दुनिया तो......
छोटी सी दुनिया है
जिसके सारे रिश्ते
इन्ही नन्हे हाथो से होकर गुज़रते है।
मन पछितैहै अवसर बीते
-
महाराष्ट्र में विधायक द्वारा हिन्दी में शपथ लेने पर उसकी पिटाई पर अलग-अलग
प्रतिक्रियायें देखने को मिलीं। धीरू सिंह मानते हैं कि वन्देमातरम ,मराठी
हिन्...
2 घंटे पहले
54 टिप्पणियाँ:
इसे पढ़कर कितने ही दृश्य आँखो में आ गये डा. साहब.. मेरी माँ भी कुछ ऐसी ही है.. मेरी क्या सबकी माए ऐसी ही होगी.. मैं इसे आपकी सबसे बेहतरीन रचना कहूँगा.. भाव विभोर कर दिया आपने.. बहुत सुंदर
मेरे सबसे करीबी मित्र की मां नहीं है.. मैंने आज तक बस एक बार इस बारे में उससे पूछा था जब शुरू में मुझे पता चला था कि आंटी नहीं हैं.. कभी मैंने उसे उदास नहीं देखा.. हमेशा सभी से उदासी छुपा कर रखा(मुझसे भी, जो कि हम एक दूसरे से कुछ भी नहीं छुपाते हैं) मगर परसों यूं ही किसी बात पर बहुत उदास होकर मुझसे बोल रहा था अपनी मां के बारे में.. पहली बार उसे उदास देखकर मैं इस सोच में था कि कैसे उसे खुश करूं.. मगर जीने कि कला में बहुत निपुण है.. एक घंटे बाद ही फिर से उसे वैसे ही हंसता पाया.. मगर मैं जान रहा था कि उसके भीतर क्या छुपा है..
पेशे से डरमेटॉलजिस्ट हूँ.
-------------------
विश्वास नहीं होता! यू आर आउट एण्ड आउट एन इमोशनल जेम - पूरी तरह एक संवेदनशील हीरा!
भावुक करने वाली रचना। बार बार पढता गया। क्या कहूँ शब्द नही मेरे पास।
बहुत बढिया लगा जी
आपकी इस पोस्ट और संवेदनशीलता को प्रणाम.
ज्ञान भइया की बात से सहमत हूँ.
माँ सच में ऐसी ही होती है ..वो पास हो या न हो पर उसका एहसास हमेशा पास ही रहता है ..बहुत ही खूबसूरती से आपने इस कविता में माँ के रूप को लिख दिया है ..
वाह....
कोई कमेंट नही.
आज से आप मेरे ब्लॉगरोल में अच्छे लोगो को पढे हिस्से में रहेंगे.... डाक्टरों की गलियों से आप आगे निकल गए.
Dr Sahab aaj se aap bhi hamare blog mein niwaas karege abhi aapko blogroll mein add karte hai.... kyonki kabhi kisi din aapke blog ka naam bhool gaye to phir ho gaya :-)
क्या कहूं? आंखें छलछला आयीं आपकी कविता पढ कर. कविता नहीं यह तो भावनाओं की नदी है जिसमें बह गई मैं.आप पेशे से चिकित्सक होते हुए भी इतने संवेदनशील है,इश्वर आपकी इस विषेशता को बनाये रखे.
डाक्टर साहेब
ऐसी मर्म स्पर्शी रचना के लिए आप को बारम्बार प्रणाम....बहुत खूब. संवेदन का ज्वार है आप की भाषा में.
नीरज
अनुराग जी आपने रुला दिया . पढ़ते हुए मम्मी बहुत याद आ रही है ।
Dr. Sahab aap dermotologist ki apeksha dil ke doctor jyada najar aate hai , itni sambedansheelta yah pradarshit karti hai . aapke sabdo ka sparsh man ko swasth aur bhala kar deta hai. ek maa ka is prakaar chitran wakai kabeele tareef hai . apko bahut badhaai.
नन्हे हाथों से गुज़रते हुए रिश्तों की मानिंद
मासूम कविता....ममत्व से लबरेज़.
शुक्रिया डाक्टर साहब !
=================
डा.चंद्रकुमार जैन
तुम लिखो
चाँद तारो की बाते ,
मुश्किल लोगो की ,
उलझी उलझी सी बाते
मेरी दुनिया तो......
छोटी सी दुनिया है
जिसके सारे रिश्ते
इन्ही नन्हे हाथो से होकर गुज़रते है।
bahut hi marmik,sawendanashil,dil ko chu lene wali doc saab hamare paas tariff ke liye aur shabd nahi bache,samjh ligiye aap khud hi ki kitni behtarin peshkash hai is nazm ki,ek maa ke dil ki baat likhkar hame rula hi diya,blog ratna ka puraskar aapko hi milna chahiye
sir ,aaj kuchh kaha nahi ja raha..bas rona aa raha hai.aapko dekhkar lagata hai swedanshilta mari nahi
सच कहते हो अनुराग....कितना मुश्किल है आसन होना!सारी माएं बिलकुल ऐसी ही होती हैं!मुझे गर्व होता है की मैं आप जैसे अच्छे इंसान के दोस्तों में शामिल हूँ!
It is true. People write about the complexities around but no one like you points out simplicity with such deep thoughts..I love your lines..
आँसू गाल पर रख कर सो जाना..
हर रात
खिड़की से रात को उतारकर
टीका लगाती हूँ
bahut khoobsoorat likha hai.
माँ तो होती ही ऐसी है... पर कितना मुश्किल है उसे शब्दों में ढालना... मैं तो सोचता 'था' की माँ को शब्दों में कभी ढाल ही नहीं सकते.
बेहद सुँदर शब्द चित्र खीँचा है आपने माँ का ..
इसी तरह लिखते रहियेगा.
- लावण्या
hriday bhavuk ho uTha!
मेरी दुनिया तो......
छोटी सी दुनिया है
जिसके सारे रिश्ते
इन्ही नन्हे हाथो से होकर गुज़रते है।
बहुत खूब!
चाँद तारों की बात में अक्सर हथेली मा के स्पर्श को भूल जाती हैं।
की कैसे यही तो उसके सब कुछ हैं।
उसे सितारों से क्या वास्ता जिसके सितारे यहीं उसकी राह देखते हों।
मेरी दुनिया तो......
छोटी सी दुनिया है
जिसके सारे रिश्ते
इन्ही नन्हे हाथो से होकर गुज़रते है।
बहुत खूब!
चाँद तारों की बात में अक्सर हथेली मा के स्पर्श को भूल जाती हैं।
की कैसे यही तो उसके सब कुछ हैं।
उसे सितारों से क्या वास्ता जिसके सितारे यहीं उसकी राह देखते हों।
भावुक कर दिया आपने. बहुत ही मर्मस्पर्शी गद्य भी और पद्य भी.
poori post padhi aur saath saath guzara bhi usake darmiyaan se...
bahut kuchh ghoom gaya aankhon ke samne se...
samvedanaon ko shabdon ki shakl denaa koi aapse seekhe...
आपकी कलम किसी तारीफ कि मोहताज नही हैं अनुराग सर ... एक बार फ़िर से दिखा दिया इंसानी एहसासों को आपसे बढ़कर कोई नही समझ पाता है ... शब्द नहीं हैं अपने भावों को व्यक्त करने के लिए ...
डा सहाब सुन्दर और मार्मिक है.
डाक्टसाब, बहुत अच्छा भावभीनी रचना थी।
आपका शब्दचित्र बे-जोड़ है। माँ की भूमिका जीवनदायिनी की है। उसका अपने निजी सुख का उत्सर्ग कर देना ही उसे महान बनाता है और शिशु को आजीवन ऋणी। हम सभी ऋणी हैं अपनी माँ के। माँ इसे वापस मांगती भी नहीं। यही विलक्षण है।
मेरे ब्लाग पर आने और टिपण्णी करने के लिए धन्यवाद. "ऐसे संस्कार के लिए दर्द इच्छाशक्ति ओर संकल्प के अलावा एक अच्छी माँ का होना भी बहुत जरूरी है", बहुत सही कहा आपने. अपने पति के भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाने वाली पत्नी ही एक अच्छी माँ बनेगी.
डाक्टर साहब पता नही कितनी बार पढ़ चुका एक बार टिप्पणी कर चुका जिसमे लिख दिया की कोई टिप्पणी नही, अब लग रहा है नही टिप्पणी तो करनी ही पड़ेगी, दुबारा ही सही....
रोज़ कई शब्दो को
चुन कर इक कहानी बनाना....
ऐसे ही शब्दों को चुन चुन कर आपने ये कविता लिखी, जितनी तारफ की जाए कम है. वाकई लाजवाब. आपको तहे दिल से बधाई
verse and poetry both were toching....! man kah utha.... "kitana mushkil hota hai maa hona" maa ke sath kahi.n khud ki bhi yaad aa gai.
सही कहा आपने, जिंदगी में आसान होना ही सबसे मुश्किल काम है।
बहुत ही सुन्दर कविता है।
Dr saheb...you are great as usual.i am in tears,my mother was standing with me she says i should thankyou for giving such poetry.
bhaav-vibhor kar diya!
bahut hi sanvedansheel hain aap -har baat ko bariki se dekhna aur us ko shbdon mein utar dena asan nahin hai...lekin aap 'mushkil' ko bhi asani se in bhavon ko shbdon ka ruup de dete hain----lekh ka title hi bahut achcha hai...lekh bhi ...
ishwar aap ki qalam par hamesha apna ashirawad rakhe-
sachi hi kha aapne ma to sirf maahi hoti hai.uski jaghe anmole hai.
Dr Saab.....bhaut khoob.
तुम लिखो
चाँद तारो की बाते ,
मुश्किल लोगो की ,
उलझी उलझी सी बाते
मेरी दुनिया तो......
छोटी सी दुनिया है
जिसके सारे रिश्ते
इन्ही नन्हे हाथो से होकर गुज़रते है।
in lines ko padhkar sab uljhan bemani si lagti hain. Bahut achcha laga ye rachna padhkar. Abhi kai baar aur padhoonga din bhar mein...shayad kai uljhano se nijaat mile
boss amazing....just amazing.....
being a father you have depicted a mother...not so easy task...:) esp all these small moments that you have captured in your words...
simply amazing :)
तुम लिखो
चाँद तारो की बाते ,
मुश्किल लोगो की ,
उलझी उलझी सी बाते
मेरी दुनिया तो......
छोटी सी दुनिया है
जिसके सारे रिश्ते
इन्ही नन्हे हाथो से होकर गुज़रते है।
Speechless...!
rgds
www.rewa.wordpress.com
samvedanasheel post ke liye abhaar .
बहुत खूब, कल पढ़कर लौट गई थी समझ नहीं आ रहा था क्या लिखूं मां के लिए कुछ लिखने बैठती हूं तो लगता है शब्द कम पड़ रहे हैं आज यूं ही घुमते फिरते दुबारा आपके ब्लाग पर आई और दुबारा पढा तो भावुक हो उठी।
आप कैसे अपने शब्दों से जादू करते हैं ये कला हमें भी सिखाइए
आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया....माँ ऐसी ही होती है....एक साधारण से इंसान को भी कवि जैसा बना देती
sach.. bahut mushkil hota hai aasaan hona..maan ke paas hote hee sab kuch kitna aasaan lagta hai.... marmsparshi
shukriya manisha...
ek maa kee samvedna ko kuch istarah piroya hai apne kee palke nam ho gayee......
bahut badhai..
अद्भुत। बेहतरीन कविता।
behtarin......!
laazawab..aur kutch nahi.
shukriya poonam ji,anup ji aor fightar sahab.....
संवेदनशील...............
shukriya anuradha.....
अत्यंत भावपूर्ण कविता , माँ क्या होती है इसका असली पता तो तब lagata है जब आप स्वयं abhibhavak बन जाते है ..
कभी कभी तो आश्चर्य होता होता है कि आप कैसे इतना मार्मिक लिख लेते हो।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उस संवाद के रास्ते को खोलती है ,जिन्हें लेखक शायद देख नही पाया .....