कुछ नज्मो से आपको मुहब्बत होती है ओर कुछ नज्मो को आपसे ..ऐसा रिश्ता बेख्याली के दिनों मे शायद ओर मजबूत होता है ..पिछले दिनों कुछ मसरूफियत भी रही ओर बेख्याली भी......एक नज़्म ने आज सुबह दरवाजा खटखटाया .....
हर शब
सफ़र करती है
कई रगो का,
कई मोडो पे ठहरती है
जमा करती है
कुछ लफ्ज़
और
रखकर "मायनो" को
अपनी पीठ पर
सीने दर सीने फिरती है
आवाज दे देकर
जब ढूंढता है शायर
थकी हुई
किसी स्याही से लिपटी हुई
किसी सफ्हे पे सोयी मिलती है
थामो हाथ तो ........
नब्ज़ रुकी रुकी सी मिलती है
इन आवारा नज्मो की उम्र मगर बहुत लंबी होती है
(एक साल पहले लिखी गयी )
40 टिप्पणियाँ:
जब ढूंढता है शायर
थकी हुई
किसी स्याही से लिपटी हुई
किसी सफ्हे पे सोयी मिलती है
थामो हाथ तो ........
नब्ज़ रुकी रुकी सी मिलती है
इन आवारा नज्मो की उम्र मगर बहुत लंबी होती है
wah doc saab bahut sundar,haath thamo nazm ruki si milti hai,magar umar bahut lambe nazmon ki bahut hi khubsurat badhai
किसी स्याही से लिपटी हुई
किसी सफ्हे पे सोयी मिलती है
थामो हाथ तो ........
नब्ज़ रुकी रुकी सी मिलती है
नज्म जैसे खुबसूरत लफ्ज़ में ढल गई ..बहुत खूब अनुराग जी
थामो हाथ तो ........
नब्ज़ रुकी रुकी सी मिलती है
vah bhai...bhaut khoob.
थामो हाथ तो ........
नब्ज़ रुकी रुकी सी मिलती है
waah...bahut khoob. khallis aapka andaaz khalakta hai...
जब ढूंढता है शायर
थकी हुई
किसी स्याही से लिपटी हुई
किसी सफ्हे पे सोयी मिलती है.
बहुत सुंदर नज़्म तबियत खुश हो गई पढ़कर भाई क्या कहने फ़िर सुबह सुबह की नज़्म कुछ खास अच्छी होती ही है . धन्यवाद.
इन आवारा नज्मो की उम्र मगर बहुत लंबी होती है
Bahut khoob dr. sahab ~~
Likhte rahiye eesi andaaz mein ...
थामो हाथ तो ........
नब्ज़ रुकी रुकी सी मिलती है
bahut khoobasurat !!!!
बहुत सुन्दर !
घुघूती बासूती
नब्ज़ रुकी रुकी सी मिलती है
इन आवारा नज्मो की उम्र मगर बहुत लंबी होती है
वाह.. तुस्सी छा गये जी.. :)
bahut khoob ....ye shayad ek doctor ki kalam se hi nikal sakta tha
itni khoobsoorat nazm ki tarif bhi kuch waisi hi honi chahiye, par kuch aa nahin raha hai waisa...wah! wah! kah ke kaam chala lete hain :)
जब ढूंढता है शायर
थकी हुई
किसी स्याही से लिपटी हुई
किसी सफ्हे पे सोयी मिलती है
थामो हाथ तो ........
नब्ज़ रुकी रुकी सी मिलती है
इन आवारा नज्मो की उम्र मगर बहुत लंबी होती है
बहुत ही बढ़िया डाक्टर साहब। सच में रूह तक पहुंची है आपकी रचना। और हां आप सब लेखकों ने तो मुझे बिगाड़ा दिया है। काम ही नहीं करने देते हो यार। सारा दिन आप ही लोगों को पढ़ता रहता हूं। पर अच्छा लगता है पढ़कर। क्योंकि आप सब लोग सच में अच्छा लिखते हो। इतनी अच्छी नज़्म के लिए बधाई स्वीकार करें।
ऊपर वाली टिपण्णी की तरह मैं भी बिगड़ने लगा हूँ !
भई, मश़रूफ़ रहो, मंज़ूर है
पर मग़रूरियत में बेख़्याल ना हुआ करो ।
थामो हाथ तो ........
नब्ज़ रुकी रुकी सी मिलती है
इन आवारा नज्मो की उम्र मगर बहुत लंबी होती है
क्या कहे अनुराग जी, बहुत खूब वाह।
हर शब
सफ़र करती है
कई रगो का,
कई मोडो पे ठहरती है
जमा करती है
कुछ लफ्ज़
और
रखकर "मायनो" को
अपनी पीठ पर
सीने दर सीने फिरती है
------आगे सुनिये--कुछ यूँ भी हुआ होगा-
ये आप की इस नज़्म की देन है---यकायक लिखने को मन हुआ---
'मैंने देखा है-
रोती हैं लिपट कर
हर बार कलम से ,
कहती हैं अब मायनो को ढोने की
ताकत नहीं उन में---
मैं दोनों हाथों में उठा कर ,
बहुत प्यार से उन को--
मायनो को हटा 'बेफिक्र' कर देती हूँ
और छोड़ देती हूँ आवारा हवाओं में--
क्यूँ कि आवारा नज्मों की उमर लम्बी होती है...
हर शब
सफ़र करती है
कई रगो का,
कई मोडो पे ठहरती है
जमा करती है
कुछ लफ्ज़
Ati sunder!!!
Note: aapne mere karwan wale blog per likha hai ki main apne www.rewa.wordpress.com per kuch nahi likh rahi.....aapne dhyan hi nahi diya hai:-(
बहुत खूब...वाह
थामो हाथ तो ........
नब्ज़ रुकी रुकी सी मिलती है
bahut acchhi hai...poori ki poori
ye hamne padhi hai pahle bhi "baat niklegi to" mein... aaj bhi wahi taajgi basaye hai apne mein ye nazm. Badhayi
किसी स्याही से लिपटी हुई
किसी सफ्हे पे सोयी मिलती है
थामो हाथ तो ........
नब्ज़ रुकी रुकी सी मिलती है
bhut sundar paktiya.
थामो हाथ तो ........
नब्ज़ रुकी रुकी सी मिलती है
sir g...khub kaha...
kya baat hai Anurag ji
aapne bahut sunder sabdon main nazm likhi hai
ki thaki hui ji milti hai jab jab shayar dhoondhta hai
bahut achha laga aapke khyaalon se milna
इन आवारा नज्मो की उम्र मगर बहुत लंबी होती है
--बहुत खूब कहा है...खूबसूरत रचना.,,,वाह!!
थामो हाथ तो ........
नब्ज़ रुकी रुकी सी मिलती है
इन आवारा नज्मो की उम्र मगर बहुत लंबी होती है
Awesum :)
इन आवारा नज़्मों की उम्र बहुत लम्बी होती है… अब इसी को ले लीजिए। यह हमारे दिल में ऐसा बस गयी है कि हमेशा जिन्दा रहेगी।
आप शब्दों से वृत्त-चित्र बना देते हैं। क़माल की कलम पायी है आपने।
वाह! यही आवारगी तो जीवन्तता है और सतत कायम रहनी चाहिये डाक्टर साहब।
बहुत सुन्दर
चाहे एक साल पहले लिखी हो या सौ साल पहले… बात तो सोलह आने सच है।
"…इन आवारा नज़्मों की उम्र बहुत लम्बी होती है…"
क्या खूब कहा है।
गुलज़ारी छाप स्पष्ट है आपकी नज़्मों में..बहुत खूब !
sundar...hamesha ki tarah...aur yaad reh jaane wali
aap sabhi logo ka tahe dil se shukriya...
अरे रुकिए! शुक्रिया इतनी जल्दी... मैं अभी कतार में हू.
कल और परसो कही व्यस्त था पढ़ नही पाया... आज इन्फक्ट अभी मेरी एक सहयोगी ने कहा डाक्टर ने कुछ लिखा है तुमने पढ़ा क्या... वो ब्लॉग नही लिखती... टिपण्णी भी नही देती... बस आपको पढ़ती है...
उसी का कहा कमेन्ट दे रहा हू... गजब लिखा है
कुछ मैं भी कह दू....आपके हर लिखे के साथ होता है....पढने के साथ ही उत्सुकता बढ़ जाती है. और जैसे ही अन्तिम पंक्ति पर होता हू एक धक् सा लगता है. और फ़िर.... वही बार बार.... बहुत ही बढ़िया प्रति ध्वनि...बारम्बार...
http://anuragarya.blogspot.com/2008/06/blog-post_26.html पर <एक दिन हास्पिटल से क्यों नहीं दिख रहा है, बंधु ?
aadrniy amar ji kuch problem aa rahi hai ,meri post blogvani me nahi a rahi hai..isliye hata kar repost karne ki koshish kar raha hun....shukriya rajesh aapko bhi aor aapki sahyogi ko bhi....
purane panne palTane ka maza kuchh aur hii hai... wah!
किसी स्याही से लिपटी हुई
किसी सफ्हे पे सोयी मिलती है
थामो हाथ तो ........
नब्ज़ रुकी रुकी सी मिलती है
इन आवारा नज्मो की उम्र मगर बहुत लंबी होती है
अब मैं क्या कहूँ, ये बात इतनी सच है जितनी हमारी सांसों का चलना....
इन आवारा नज्मों की उम्र बहुत लम्बी होती है..जब भी दिल उदास हो, जब दिल खिलखिलाने को चाहे...बस ये दिल में ख़ुद बखुद आ बस्ती हैं....
बहुत खूबसूरत , समंदर की गहराई सी समेट लाये हैं आप इस में....मैं बस यही कह सकती हूँ...
बहुत खूबसूरत नज़्म।
anurag kya mujhe aap ki wo hostel life cigarate wali kavita ki link de sakte hai
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