2008-06-27

खामोशी
















जी
चाहता है
हल्के से हाथो की जुम्बिश से
उस लम्स को
जो ठहरा हुआ है
तेरी चूड़ियो के काँच पर,
गिरा दूं ,
धड़कनो क़ी चादर को उठाकर
दिल मे गहरे तक
उतर जाउ
ओँधी पड़ी हसरतो को
खींच कर बाहर निकालू
ओर
उठाकर रख दूं
तेरी गोद मे
शायद
तेरे लबो पर
फिर कोई सदा आये

39 टिप्‍पणियां:

  1. "ओँधी पड़ी हसरतो को
    खींच कर बाहर निकालू"
    क्या बात है सरजी, आपके जज्बात की इन्तेहांको भी पार कर गये हैं।
    इस मौलिक सोच को सलाम करता हूँ।

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  2. आपकी नज़मो का तो जवाब नही डा. साहब.. एक से एक लाजवाब

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  3. धड़कनो क़ी चादर को उठाकर
    दिल मे गहरे तक
    उतर जाऊं

    वाह उतर गए यह लफ्ज़ दिल तक ..बहुत ही मीठी सी यह रचना ..लगता है मौसम असर करता है :)

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  4. डाक्टर साहब आप तो सचिन से भी अच्छे हैं, सचिन हर मैच में शतक नही लगा पता लेकिन आप तो हर पोस्ट में.... बधाई

    दिल की बात दिल तक उतर गई

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  5. लबों पर आने वाली सदा पर हम भी कुर्बान।

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  6. ओँधी पड़ी हसरतो को
    खींच कर बाहर निकालू
    ओर
    उठाकर रख दूं
    तेरी गोद मे
    शायद
    तेरे लबो पर
    फिर कोई सदा आये
    bhut sundar. vakai aapki rachanaon ka to koi javab hi nhi hai.

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  7. बहुत शानदार..सदा की तरह.

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  8. आप की ही एक खूबसूरत नज्म और पढ़ी थी..... इन आवारा नज्मों की उमऱ मगर बहुत लम्बी होती है। लगता है आपकी नज्मों की उमऱ भी काफी लम्बी होगी। एक और अच्छा ख्याल और उतना ही अच्छा उसका विस्तार।

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  9. kisi kisi ki khamoshi ..................bolti bahot hai jab...............tab lafz yu bol dete hai ............

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  10. Dr.sahab .....jab bhi aapko padha hai hamesh ek hi khayal aata hai ki .......kya sach mein lafz itne khubsurt hote hain ..;Hamesha ki tarah ek aur khubsurt nazam

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  11. bahut hi khoobsoorat poem..

    please likhte rahe aur ham padhte rahe :)

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  12. उठाकर रख दूं
    तेरी गोद मे
    शायद
    तेरे लबो पर
    फिर कोई सदा आये
    bahut khubsurat doc saab,ehsaason ke gulab khile hai,sada mehekte rahe,sundar.

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  13. गुलाब की तरह कोमल है कविता मित्र!

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  14. एक सदा ही है
    यह रचना.
    ==============
    डा.चन्द्रकुमार जैन

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  15. आपके लेखन की तारीफ के लिए मुझे हिंदी शब्दकोश उठाना ही पडेगा। इन अहसासो को कहाँ से लाते हो। आपका लेखन हमारी कमजोरी बन रहा है। खैर ये काला फूल क्यों लगाया कोई विशेष कारण है।

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  16. रूमानी गजल
    यूं लगा दिल के अहसालों को लफ्जों की शक्ल दे दी।

    ओँधी पड़ी हसरतो को
    खींच कर बाहर निकालू
    ओर
    उठाकर रख दूं
    तेरी गोद मे
    शायद
    तेरे लबो पर
    फिर कोई सदा आये

    उत्तर देंहटाएं
  17. रूमानी गजल
    यूं लगा दिल के अहसालों को लफ्जों की शक्ल दे दी।

    ओँधी पड़ी हसरतो को
    खींच कर बाहर निकालू
    ओर
    उठाकर रख दूं
    तेरी गोद मे
    शायद
    तेरे लबो पर
    फिर कोई सदा आये

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  18. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  19. ऒऎ, सदके जावाँ...की गल्ल कित्ती ऎ !
    ज़िन्दे रह पुत्तर !

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  20. हाँ,दिल तो बहुत कुछ चाहता है लेकिन क्या उसे करने की हिम्मत भी की है कभी,नही न,क्योंकि दिल जो चाहता है वो जाने इतना मुश्किल क्यों होता है,समझ नही आता कि दिल वही कुछ क्यों चाहता है जिसे नही करना चाहिए...मुझे तो लगता है दिल की सुनने वाले ही बेवकूफ होते हैं....वही करना चाहिए ना जो सही हो,जिस में आगे चल कर किसी नुकसान का अंदेशा ना हो,पता नही आप शायर लोग ये क्यों नही समझते...बस दिल की सुनते रहते हैं...

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  21. बहुत गहरे उतर गये बंधु आप...बहुत शानदार..बधाई.

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  22. bahut hi pyari si nazm hai nazuk si khwahish liye hue--
    -yehi kahenge--INSHA-ALLAH!

    ***lekin kuchh khamoshiyon ko khamosh hi rahne dena chaheeye.waise bhi har kahmoshi zuban nahin kholti.

    **bahut bahut badhayee itni sundar rachna ke liye.

    **Khilta hua gulab -MAGAR--kuchh andhere mein hai aur thodi roshni bhi---- bahut hi nirali tasveer post ki hai---

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  23. बहुत सुन्दर ! परन्तु उर्दु के कठिन शब्दों का अरथथ भी बता दिया करें।
    घुघूती बासूती

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  24. pehli baar mein to samaj nahi paya...dubara padh to samja kitni gehri baat hain...bahot khub...

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  25. अब उन लबों पर आने वाली सदाओं का इन्तज़ार है। …आपके नाज़ुक ख़याल सुनकर उन्हें आना ही पड़ेगा।

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  26. narm,nazuk,makhmali ehsaason ko achchi terah piroya hai aapne is nazm mein..

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  27. wah kya baat hai Anurag ji
    naram si komal si aur bhavuk bhi hai aapki nazm
    bolti hui, jara dolti hui man main ras gholti hui aapki nazm

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  28. "धड़कनो क़ी चादर को उठाकर
    दिल मे गहरे तक
    उतर जाउ
    ओँधी पड़ी हसरतो को
    खींच कर बाहर निकालू"

    बहुत खूब !

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  29. Apni ek kavita likhneki jurrat kar rahi hun...aur maafi chahti hun..


    Pehlese Ujale...

    Chhod diya dekhna kabse
    Apna aaeena hamne!
    Bada bedard ho gaya hai,
    Palatke poochhta hai hamse,
    Kaun ho?ho kaun tum?
    Pehchana nahi tumhe!
    Jo kho chukee hun mai,
    Wahee dhoondata hai mujhme!
    Kahanse laau wo pehlese ujale,
    Bujhe hue chehrepe apne?
    Aaya tha koyi chaand banke,
    Chandanee failee thi manme,
    Jab gaya to gharse mere
    Le gaya sooraj saath apne....

    Shama

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  30. aap sabhi ka shukriya kai bar bas lafz bante chale jate hai.....aor nazm mukammal ho jati hai....

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  31. lagta hai ki Gulzar Parul ki taraf se uth kar thodi der ko idhar aa gaye the... Bahut hi sundar

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  32. धड़कनो क़ी चादर को उठाकर
    दिल मे गहरे तक
    उतर जाउ..
    दिल में गहरे उतर गयी..

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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