2008-07-10

वक़्त के उन मोडो पर मैं अब भी ठहरता हूँ

तब वक़्त चुराकर लाते थे हम दोनों
अब जब मिलते है जब फुर्सत होती है --- जावेद अख्तर



अजीब बात है आदमी गुजरे वक़्त की खिड़की में गाहे बगाहे झांकना नहीं छोड़ता है ...इस वास्ते नहीं के आज की दुनिया में उसे बड़े दुःख है .इस वास्ते के इतने सुखो के बाद भी ...
 बेफिक्री ओर  अल्ल्हड़पन की वो दुनिया मीलो पीछे छूट गयी है.........
   रोज हम दोनों ने सुबह से ही ही तय किया था की रात का खाना  बाहर खायेंगे.... die hard पार्ट देखेगे 
यूँ भी जब आप हॉस्टल में रहते है ..फिल्मे आप की दुनिया का एक बड़ा हिस्सा होती है ..... शहर मे दो ही हॉल ऐसे थे जो हॉलीवुड मूवी दिखाते थे ओर वे हम होस्टल  मे खासे हिट थे.......
तब हमारे पास यामहा RX100 हुआ करती थी......हम सीडियो पर बैठे थे ओर जले भुने उनका इन्तजार किया उन साहब का एवेनिंग क्लीनिक था .वक़्त गुजर रहा था ओर वे लापता थे......
अचानक हमारे एक सीनियर को हमारी मोटरसाइकिल की दरकार हुई उनका नया नया अफेयर था ओर उन्हें डेटपर जाना था चलते चलते उन्होंने कुछ पैसे भी मांगे हमने अपने पास से (उन दिनों गिने चुने ही होते थे )निकालकर  कुछ दे दिये उन्होंने हमें अपनी हरे रंग की लूना पकडाई ओर फ़ुर्र हो गये अब हम ओर लूना दोनों इन्तजार करनेलगे ..खैर हमारे दोस्त प्रकट हुए हमने उन्हें ढेरो गाली दी ओर लूना दौड़ा दी की मूवी छूट जाये
न्दर हॉल मे पहुंचे अंधेरे मे किसी तरह सीट टोलते हम बैठे ,देखा अमिताभ साहब है,हमने सीट पर पैर फैलाएकी ट्रेलर ख़त्म हो ओर फ़िर ज़रा लुत्फ़ ले ...१० मिनट गुजरे .....वही कहानी ...हमने बराबर वाले से पुछा "भाईसाहेब पिक्चर कब शुरू होगी ?उसने हमें ख़ास नजरो से देखा "मियां ये क्या देख रहे हो ?
अबे तेरी...हॉल पर पुरानी डॉन दिखायी जा रही थी ओर die hard कल लगनी थी.....खैर हमने डॉन देखी ..बाहरनिकले तो भूख लग रही थी ओर लूना मे पेट्रोल ख़त्म ....साला ......उसे बारी बारी से घसीटते हूए हमें एक चय्नीसलारी दिखायी दी ,हमने फ़ौरन खाने का कुछ आर्डर दिया ,खाते खाते मैंने उससे पूछा जेब मे कितने पैसे है ?सौ सवासो होंगे ?अब दूसरी टेंशन शुरू हुई ...दोनों ने जेब टटोली कुल जमा १७० रुपये थे ..ज्यूँ त्यु खाना खाया ...बिल पूछा१६० रुपये ........
एक गोल्फ फ्लेक सिगरेट पे ओर आधा आधा मीठा पान खाया ओर लूना घसीटते हम होस्टल चल पड़े ......
तन्हाई भरे इस पर्स से मुफलिसी के वो सिक्के कितने अच्छे थे



....

27 टिप्‍पणियां:

  1. और आज जब जेब नोटों से पटी पड़ी हो तब भी मन यही कहता है, 'वे भी क्या दिन थे' !
    घुघूती बासूती

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  2. sahi kaha aapne..

    बडे उतावले थे यहा से जाने को,
    ज़िन्दगी का अगला पडाव पाने को...
    पर ना जाने क्यो..
    दिल मे आज कुछ और आता है,
    वक्त को रोकने को जी चाहता है.
    जिन बातो को लेकर रोते थे,
    आज उन पर हसी आती है...
    ना जाने क्यो आज उन पलो कि याद बहुत आती है...
    कहा करता था...
    बडी मुश्किल से तीन साल सह गया,
    पर आज क्यो लगता है कि कुछ पीछे रह गया...
    कही-अनकही हजारों बातें रह गई,
    ना भूलने वाली कुछ यादें रह गई...
    मेरी टांग अब कौन खीचा करेगा,
    सिर्फ़ मेरा सिर खाने कौन मेरा पीछा करेगा...
    जहां २००० का हिसाब नहीं वहा २ रूपये के लिये कौन लडेगा,
    कौन रात भर साथ जग कर पढेगा...
    कौन मेरी सामान मुझसे पूछे बिना ले जायेगा,
    कौन मेरे नये नये नाम बनायेगा...
    मै अब बिना मतलब किस से लडूगा,
    बिना topic के किस से फ़ालतू बात करूगा...
    कौन Fail होने पर दिलासा दिलायेगा,
    कौन गलती से Number आने पर गालियां सुनायेगा...
    ऐसे दोस्त कहा मिलेंगे,
    जो खाई मे भी धक्का दे आये,
    पर फिर तुम्हे बचाने खुद भी कूद जाये...
    मेरे गानो से परेशान कौन होगा,
    कभी मुझे किसी लडकी से बात करते देख हैरान कौन होगा...
    कौन कहेगा साले तेरे जोक पर हंसी नहीं आई,
    कौन पीछे से बुला के कहेगा... "आगे देख भाई..."
    Movies मै किसके साथ देखूगा,
    किसके साथ Boring Lectures झेलून्गा...
    मेरे फ़रजि Certificates को रद्दि केहने कि हिम्म्त कौन करेगा,
    बिना डरे सच्ची राय देने कि हिम्म्त कौन करेगा...
    Stage पर अब किस के साथ जाऊगा,
    Juniors को फ़ालतु के Lectures कैसे सुनाऊगा...
    अचानक बिन मतलब के किसी को भी देख कर पागलो कि तरह हंसना,
    ना जाने ये फ़िर कब होगा
    कह दो दोस्तो ये दुबारा से सब होगा?
    दोस्तो के लिये Professor से कब लड पायेंगे,
    क्या हम फिर ये कर पायेंगे...
    रात को २ बजे पोहा खाने कौन जायेगा,
    तेज गाड़ी चलाने कि शर्त कौन लगायेगा...
    कौन मुझे मेरी काबिलीयत पर भरोसा दिलायेगा,
    और ज्यादा हवा मे उड्ने पर जमीन पे लायेगा...
    मेरी खुशी मे सच मे खुश कौन होगा,
    मेरे गम मे मुझ से ज्यादा दुःखी कौन होगा...
    मेरी ये कविता कौन पढेगा,
    कौन इसे सच में समझेगा...
    बहुत कुछ लिख्नना अभी बाकी है,
    कुछ साथ शायद बाकी है...
    बस एक बात से डर लगता है,
    हम अजनबी ना बन जाये दोस्तो...
    जिन्दगी के रंगों मे दोस्ती के रंग फ़िके ना पड जाये कहीं,
    ऐसा ना हो दुसरे रिश्तो कि भीड़ मे दोस्ती दम तोड जाये...
    जिन्दगी मे मिलने कि फ़रियाद करते रहना,
    अगर ना मिल सके तो कम से कम याद करते रहना...
    चाहे जितना हसो आज मुझ पर,
    मै बुरा नहीं मानूगा,
    इस हंसी को अपने दिल मे बसा लूगा,
    और जब याद आयेगी तुम्हारी,
    यही हंसी लेकर थोडा मुस्कुरा लूगा...

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  3. वही दिन सबसे हसीन होते हैं जिंदगी के ...बेफिक्री का आलम और रुख वही का कर लिया जहाँ दिल ने कहा ..यादे खूब याद करते हैं आप साथ ही एहसास करवा देते हैं कि क्या लम्हे थे वो भी :)

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  4. वो फ़कड दिन भी बहुत प्यारे थे, चाय के दो कप के बदले दोस्तो से बहस, गालिया, फ़िर वही प्यार बही तकरार, ओर चाय वाले से उधार एक एक पेसे का हिसाब,
    अनुराग जी बहुत कुछ याद दिला दिया आप ने.

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  5. wo din yad aa gaye jab 50 rupaye mein apni dost ko party de diye karte the...sach wo bhi kya din the ,na koi tension na koi zimmedari...

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  6. तन्हाई भरे इस पर्स से मुफलिसी के वो सिक्के कितने अच्छे थे

    --Bus ab to yaad hi kar sakte hain. Sunder sansmaran.

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  7. बेहतरीन..बेहतरीन..एक वाक़ई बेहतरीन पोस्ट ।

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  8. wo muflisi ke din ab kahan aa sakte hain... aise kai baar ham bhi phase.

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  9. छात्र जीवन की याद दिला दी आपने। बहुत खूब…

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  10. Hello Anurag bhai,
    Good rememberance ..as usual good post !
    Please visit Sree Mahavir Sharmaji's BLOG -- Thanx !!
    तारीख याद रखें , जुलाई - १५ !! उनके ब्लॉग पर आजकल एक बढिया
    आत्म कथ्य या संस्मरण लिखा देखें --
    " यादों की वादियों में…"
    महावीर शर्मा http://mahavir.wordpress.com/2008/07/08/yadon-ki-vadiyon-mein/

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  11. Anuragbhai

    Nice writing.Enjoying yr blog.
    -Harshad Jangla
    Atlanta, USA

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  12. क्यों याद दिलाते हो, वो दिन, वो लमहे! जिन्हें विस्मृत कर चुके हैं, वर्षों पहले। याद करेंगे तो एक उपन्यास बनेगा। लिख भी डालते। मगर पहले ही, जब हम किशोर भी न हुए थे अमृता प्रीतम 'पाँच बरस लम्बी सड़क' लिख चुकी थीं। हमारा स्कोप खतम।

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  13. पर उसकेएवेज मे जिंदगी ने उससे बेफिक्री की कुरबानी ले ली है
    "these words are the assence of the whole article"
    wonderful....

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  14. सब से पहले तो आप से माफ़ी कि आपकी बाकि पोस्ट पढ़ नही सकी,
    क्या करूँ, चाह कर भी वक्त नही निकाल पाती,दिल तो यही चाहता है कि आपकी साडी पोस्ट का हर्फ़ हर्फ़ पढूं, और कमेन्ट भी वाही दूँ जो दिल से निकलता हो, लेकिन पता नही क्यों, ऐसा नही हो पाता
    सब से पहले तो ये बता दूँ कि आपके लिखने के अंदाज़ की मैं दीवानी हूँ, और ऐसा कहने में मुझे कोई हिचक नही है, वाकया या घटना चाहे कैसी भी जब वो आपके कलम से निकलती है तो वो ख़ास बन जाती है, अब ज़रा आपकी पोस्ट पर कुछ कहूँ....
    जो बेफिक्री कि खूबसूरत जिंदगी आप जिए हैं ना ...वो मेरे नसीब में ना आज है न शायेद कभी होगी...इसलिए इस का अहसास मैं शायेद उतनी अच्छी तरह नही कर सकती...लेकिन वो अहसास सचमुच खूबसूरत होगा...और याद आकर अक्सर मुस्कुराने पर मजबूर कर देता होगा....है ना...

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  15. दिल की बात है....बिकुल साफ़-साफ़ है. बहुत शानदार पोस्ट है, कितनी बार लिखेंगे. आज कुछ नया वाक्य बनायेंगे जो डॉक्टर अनुराग के पोस्ट के लिए टिपण्णी में लिख सकें.

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  16. तन्हाई भरे इस पर्स से मुफलिसी के वो सिक्के कितने अच्छे थे
    वाह जी वाह ।
    आपकी पोस्ट पढकर एक किस्सा मुझे भी याद आ गया। अपने लडकपन के दिनो का। अगर आपकी इजाजत हो तो सुना दूँ। एक बार मेरा दोस्त आया बोला चल यार मार्किट चलते है कुछ खा कर आते है। (हम दोनो अक्सर जाया करते खाने पीने। एक दिन वो खिलाता और एक दिन मैं। ) साथ में वो बोला कि यार पैसे रख लिओ। मेरे पास नही है। मैने सोचा कि आज तो इसकी बारी है। मजाक कर रहा होगा। मैने भी पैसे नही डाले। पहुँच गये टिक्की गोल गप्पे वाले के यहाँ। घर से दूर थी मार्किट। ओडर दिया कि दो प्लेट टिक्की की बना दो। खाई दोनो ने। अच्छी लगी। फिर जब पैसे देने की बारी आई तो वो मुझे बोले, मै उसे बोलू। और दुकानदार हमारी शक्ल को देखे। खैर दोनो ने एक दुसरे को गाली दी। वो वहाँ खडा रहा और मैं घर आया पैसे लेके गया।

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  17. bita hua pal hamesa accha lagta hai.....chahe dukh ka ho ya sukh ka....ajeeb fitrat hai ye humlogo ki...bilil sahi likha hai aapne

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  18. तन्हाई भरे इस पर्स से मुफलिसी के वो सिक्के कितने अच्छे थे

    ab kahaan hai wo din

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  19. bade achche lagte hai....vo purane din....aur ya fir aane wale din...aaj ka kya kare??

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  20. "तन्हाई भरे इस पर्स से मुफलिसी के वो सिक्के कितने अच्छे थे"
    वाह...क्या डायलोग है अनुराग जी वाह....लगता है स्व: राजकुमार की किसी फ़िल्म को देख रहे हों...
    अजीब इतेफ़ाक है... जब पर्स खाली था तब आप भरे हुए थे आज जब पर्स भरा हुआ है आप खाली हैं...(तालियाँ तालियाँ...डायलोग का जवाब डायलोग से) .
    आप के कालेज के अनुभव ऐसे हैं जैसे हमारे आज से ३५ साल पहले थे...क्या वक्त वास्तव में नहीं बदला या इंसानी फितरत कभी नहीं बदलती....???
    नीरज

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  21. तन्हाई भरे इस पर्स से मुफलिसी के वो सिक्के कितने अच्छे थे....

    bahut sahi aur sateek baat!!!

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  22. भाई साहब अतीत चाहे जैसा भी हो हमेशा उसकी याद सुखद ही होती है, कुछ को छोडकर ! आपने सभी पढने वालों
    को उसी काल मे पहुन्चा दिया ! धन्यवाद

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  23. क्यूं झूट बोल रहे हैं खाली जेब भी किसी को अच्छी लगी है ?

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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