2008-08-04

देस से दूर एक भींगी होली----


कुणाल किशोर
झारखण्ड की कोयला नगरी का धनबाद का ये लड़का यूँ तो सॉफ्टवेयर इंजीनियर है...ओर कुछ समय से अमेरिका के सन प्रांसिस्को राज्य में है ,उम्र में मुझसे छोटा है पर ढेरो तजुर्बे जमा करके बैठा है
ऑरकुट ने मुझे ढेरो दोस्त दिये ये महाशय उनमे से एक है ..एअरपोर्ट से उसने मुझे देर रात सर्दियों में पहली मर्तबा फोन किया था ....उसकी ख़ास बात उसकी हिन्दी है जो अमेरिका में रहकर भी वैसी ही है या यूँ कहे की उसके साथ ओर जुड़ गयी है ....एक जैसे ख्याल... गुलज़ार की त्रिवेणी के अलावा जिस चीज़ ने हमें जोड़ा वो क्रिकेट है... तभी तो २० -२० की जीत पर सन् फ्रांसिस्को में भी डांस हुआ ओर जम कर हुआ इस मर्तबा हमने ये तय किया की उसके भारत आने पर हम मुकम्मल तौर से मिलेंगे .. ....उसके पास एक हीरे का (मै सोने का नही कह रहा उससे ज्यादा कह रहा हूँ )दिल है ...परदेस में रहकर भी इनके लिखे में मिटटी की महक आती है ,आम हिन्दुतानी की तरह ये भी एक भावुक इंसान है जो इनके लिखे को पढ़कर महसूस होता है ...उन्ही की एक याद यहाँ बाँट रहा हूँ.....




...और होली बीत गई| ये मेरी तीसरी होली थी जब मै घर से बहुत दूर हूँ, मीलो दूर, और मैने इस बार भी खूद के साथ बहुत होली खेली| पिछली रात से ही शुरू हो गया, बालकोनी मे बैठ कर पहले मैने यादो की लकडियो मे रात का अगजा जलाया और निःशब्द बैठा उस अगजे की लौ मे मै अपना बचपन और देश मे बीताई थोडी सी जवानी तापने लगा जो मेरे सिगरेट की धुये मे खाँसते मुँह से निकले भस्म साँसो की हौक से और धूँ-धूँ कर जल रही थी और मानो सब कुछ बहुत साफ सा दिख रहा हो और ये कल की ही बात हो.....
....मै पाँच बर्ष का था, मेरे बाबा के बाल पूरे काले थे, माँ के चेहरे मे भी झूर्रिया नही थी| बाबा ने हमे प्लास्टीक की पीली पिचकारी मे लाल रंग थमा दिया और मै आँगन की दीवारो मे पिचकारी की धार से अपने बाल मन की चित्रकारी करता और उधर मेरे बाबा मेरी माँ को रंगो मे सराबोर कर देते| पलट कर जब मै माँ को उस हालत मे देखता तो बाबा को मुक्के से मारता चिल्ला-चिल्ला कर तब तक रोता रह्ता जब तक माँ मुँह धो कर अपने गोद मे मुझे लेकर सुला ना दे| कुछ सालो बाद की होली मे मै अब घर से पिचकारी भर भर कर निकलने लगा और अपने पुराने किराये के मकान वाले उस बील्डीग के १५ परिवरो के हमउम्र बच्चो के साथ होली मनाने का सिलसिला शुरू हो गया| शुराआती दिनो मे गली के शरारती बच्चो ने होली मे बहुत रूलाया क्योकी उम मे मेरे से थोडे बडे होने के कारन वो मेरा कीमती रंग छीन कर मुझे ही उदेल देते| खैर धीरे धीरे हम और बडे हो रहे थे और हमारी होली की परीधी अपने बील्डीग से निकल कर पूरे मोह्ल्ले तक पहँच गई थी और अब हम अपने बील्डीग वाले संगठीत हो कर मोह्ल्ले मे दूसरी बील्डीग के साथी बच्चो को घर से निकाल कर रंगने की मजा का स्वाद चख चुके थे| होली अब रास आने लगी थी, दिन भर भरी दुपहरिया मे टोली बना कर, फटे कपडो मे टिन्ने के डिब्बो को पीटते-गाते, हास्य़ परिहास करते हम सब गाँव वाले कम से कम एक दिन बैर-भाव, जात-पात, ऊँच-नीच भूला कर प्य़ार के एक रंग मे रंग जाते|
...पर शायद मुझे होली के बहुत रंग देखने थे| मेरे दो कमरे का भाडे का घर बडी होती मेरी चार बहनो और दो भाईयो के लिये प्रयाप्त नही था और मेरे पिता ने किसी तरह दुर एक घर बनाया जहाँ बगल मे वहाँ के कोल वाशरी मे काम करने वाले अफसरो की कोलोनी थी| मै उस समय अपने सरकारी हिन्दी विध्यालय मे द्सवी मे पढ्ता था पर मै चाह कर भी अपने बगल के बडे से कोलोनी मे एक दोस्त बना ना सका क्योकी उस 'पोस' कोलोनी के बच्चो के मन मे ना जाने यह धारना बैठ चुकी थी कि उनकी कोलोनी के परिधी से बाहर रहने वाले लोग जिनके घर Dish का connection भी नही और जिनके बच्चे बेचारे सरकारी हिन्दी विध्यालय मे पढ्ते है, उनके स्तर के नहीं| खैर मेरे नये कोलोनी मे भी फिर होली आई और मै रंगो की पूडिया को हर एक पोकेट मे भर कर मै कोलोनी के परिधी मे उस तरह दाखिल हुआ मानो अभिमन्यू अपने को शष्त्रो-अष्त्रो से सुसज्जित कर चक्रव्युह मे घुस रहा हो| पर कोलोनी के अन्दर तो दूसरी दूनिया थी सभांत लोगो की जहाँ ओभरसियर का बेटा तो सुपरवाईजर के बेटे को ही, सुपरवाईजर का बेटा तो सिर्फ इंन्जीनिय्रर के बेटे को हीं रंग लगाता है| मै पूरी कोलोनी का चक्कर लगा कर वापस बेरंग लौटने लगा और पहली बार होली मुझे कचोट रही थी| घर जाने से पहले मैने अपने रंगो को खूद अपने हाथो से चेहरे को रंगा क्योकी मेरे माँ बाबा के कान्हे को होली मे कोई ना रंगे उन्हे गवारा ना होता|
...कुछ होली फिर मेरे ऐसे ही बीते| अब मै अपनी आगे की पढाई के लिये घर से बाहर निकल चुका था और वक्त के साथ होली के बद्ले मायने को सीख रहा था| अब दूनिया सब कुछ के प्रेकटीकल मिनींग सिखा रही थी, होली अब परिवार के सभी सदस्यो को इकट्ठा कर के अपने पास पडोस के लोगो से मिल जुल कर साथ हँसने-गाने, खाने-खिलाने और मिल-जुल कर मनाने के पुराने मानसिकता वाली परिभाषा को नकारते हुये modernise हो गई थी| लडके अभी अभी पार हुये एक बडे त्य़ोहार Valentine's Day की Exhausting feeling से थके थके है और लडकियो को अपने complexion पे risk गवारा नही औरी ऐसे मे होली मे घर जाना कोई जरूरी नही| मै भी जमाने के गुर सिखता रहा और होली मे घर से दूर होता गया और एक बार नौकरी मिली नही कि उसके बाद कभी फुरसत भी नही मिली कि कोई होली घरवालो के साथ बिताऊ|
...काम का दायरा बढता गया, परिवार का दाय़रा छोटा| मै US आ गया और दो होली आई गई सी हो गई| मैने घरवालो को पिछ्ले साल ही ये आश्वासन दिया था कि मै अबकी होली सब के साथ बिताऊगा और सभी मेरे आने की राह देखते रहे| जाने के ऐन वक्त, प्रोजेक्त मे मेरे रूकने की जरूरत आन पडी और मुझे रूकना पड गया| मुझे अब तक मेरी गलती का एह्सास भी नही था क्योकी वक्त के साथ होली के मायने बदल चुके थे और ये इतनी बडी बात नही थी के मै एक और होली घर से दूर रहुन्गा| माँ को मैने जब कहा कि मै इस बार भी नही आ रहा हूँ, माँ ने इतना ही कहा कि बेटे होली मे अच्छा खाना खाना और अबीर लगा लेना|
आज मेरी अगजा की रात थी पर देश मे होली की सुबह हो चुकी थी और मै होली के दिन बनने वाले मेरे घर पर व्यंजनो को बहुत miss कर रहा था| मैने माँ की कही बात याद की और मै देशी रेस्टोरेन्ट मे जम कर खा कर आया| सन फ्रान्सिस्को की रात को निहारता मै अपनी १५ह्वि मंजिल के बाल्कोनी मे बैठ अपने दोस्तो का number घुमाने लगा to wish them Happy Holi. घर का नंम्बर लग नही रहा था और माँ-बाप तो भागते नही, (भागती तो संतान है), मै दोस्तो मे मगरूर रहा उनके GF के साथ होली के चटपटी किस्सो मे अपनी भी होली तलाशता हुआ| आधी रात के बाद जाकर मेरी माँ से बात हुई| मैने माँ से कहा की "माँ तुम और बाबा अकेले हो, बाबा को अच्छा से अबीर लगा दो और सभी पकवान अपने हाथ से खिला दो"| माँ ने मुस्काराते हुये कहा कि "बेटा तुम्हारे बाबा ने तो उसी बार आखिरी बार अबीर को छुआ था जब तुम 1st year मे होली मे आये थे और मै अब पकवान बनाती नही क्योकी बिना तुम लोगो के कोई पकवान हमसे खाये नही जाते| अब अगली बार हो सके तो आने की कोशीश करना और अपने बाबा को अबीर लगाना पर हाँ अपने career को नुकसान पहुँचा कर नही, मै तो ऐसे ही थोडी स्वार्थी हो कर पूछ रही थी क्योकी फिर बहू आने पर पता नही तुम फिर कोई होली हमारे साथ खेल सको या नही? अच्छा ये सब अभी से तु मत सोच, पहले ये बता की तुने आज अच्छा खाया या नही?
मेरी आत्मा रून्ध चुकी थी, मैने माँ से कहा कि माँ आधी रात यहाँ बीत चुकी है, मुझे अगजा जलाना है| और मै बची खुची रात जलाने बैठ गया| बचपन से अब तक सभी होली एक एक कर मुझे याद आती गई| दिख रहा था मुझे कैसे मैने ही छीना था उनसे उनकी होली जब माँ को रंगा देख डर गया था मै, ५ साल का ही था| अगले १० साल उन्होने अपने जज्बात भूला कर हमारे रंगे हुये चेहरो को देख होली खेली| जब आदत सी हो गई थी उन्हे हमारी, हमने अपनी सुविधा से अपनी होली redefine कर ली और किसी की दूनिया बेरंग कर अपने रंग, अपने ढंग भर लिये, छोड दिया उन्हे तब अकेला होली मनाने जब मेरी आन्खो मे गये रंग को साफ करते करते बाबा को मोतियाबिन्द और हमारी पकवान बनाते बनाते मँ को Sugar हो गया|
अगजा जल चुका था और मेरी होली भी हो चुकी थी| भीगा हुआ था मै अपनी दो नयनो कि पिचकारी से, रंग सफेद था पर दाग जा नही रहे थे, रुह तक रिसते हुये कुछ नमक मानो दो बून्द खून से माफी मांग रहे थे|

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कुणाल किशोर्
सन फ्रांसिसको, अमेरिका
होली, २००७

43 टिप्‍पणियां:

  1. निश्चित ही बहुत खूबसूरत तरह से अपने मन की बात कहने में समर्थ हैं आपके मित्र. एक अच्छी पोस्ट के लिये बधाई मित्र. आपने जो कोष्ठक, परिचय के लिए इस्तेमाल किया उससे प्रस्तति भी प्रभावशाली बन रही है.

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  2. kunal sadaa hi bahut acchha likhtey hain...yahaan padhkar ek naya panna khula

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  3. खूबसूरत अन्दाज़े बयां.
    छा गये मित्र और मित्र के मित्र ...

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  4. अनुराग जी आपकी यादों की बारिश मुझे भीगना बहुत अच्छा लगता हैं। कुणाल बहुत सुन्दर ढ़ग से अपनी होली की यादों लिखा हैं।

    माँ-बाप तो भागते नही, (भागती तो संतान है)

    जब आदत सी हो गई.........मेरी आन्खो मे गये रंग को साफ करते करते बाबा को मोतियाबिन्द और हमारी पकवान बनाते बनाते माँ को Sugar हो गया|

    अगजा जल चुका था ...........दो बून्द खून से माफी मांग रहे थे|

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  5. कुणाल ने सीधे दिल से लिखा है। आखिर कोई ऐसे ही तो नहीं रूह के दागो को आंसुओं से धोता होगा। सचमुच उसका अकेलापन बहुत खल रहा है, होली तो सालों से हमने भी मनानी छोड़ दी लेकिन आज भी अपने आस पास रंगे चेहरों को देखकर खेल लेते हैं।

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  6. anuraag ji
    Apne apni khoobasoorat yado ko khoobasoorat dhang se post me ukera hai . padhakar achcha laga .

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  7. कुणाल जी की यादो के संग चलना अच्छा लगा .अकेलेपन की शिद्दंत बखूबी इस में उभर कर आई है | सब बदल सा गया है होली क्या अब सब त्योहारों में वह बात नही रह गई जो कभी के ज़माने में हुआ करती थी ...पर यह पोस्ट होली के एक एक लम्हे में अपने रंग में डुबोने में कामयाब रही है ..शुक्रिया अनुराग जी ..कुणाल जी की उन यादों को हमारे साथ शेयर करने के लि

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  8. आप संस्मरण लिखने में निपुण हैं। बहुत ही तल्लीन होकर वर्णन करते हैं। पढ़ना बहुत ही अच्छा लगता है।

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  9. शब्द प्रयोग सफल रहा, नियमित रूप से लिखते रहें!

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  10. " परदेस से देखते हैँ हम,
    शायद,
    देस मेँ निकला होगा चाँद "
    यही सच है
    जो कुणाल भाई ने महसूस किया.
    उनकी माताजी की बातेँ
    हमारी भारतीय अस्मिता
    और सँस्कृति की नीँव हैँ!
    उन्हेँ कोई भूल ना जाये
    ..अनुराग भाई का शुक्रिया
    इन्हेँ अपने ब्लोग पर
    समानित किये जाने के लिये -
    स्नेह,
    - लावण्या

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  11. ये तो अपनी जड़ों से बिछड़ने का गम है. विदेश बैठे कुणाल जी की होली की यादों में पगी विवशता ने हृदय को छू लिया. पर किया भी क्य़ा जा सकता है.

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  12. विदेश मे बेठे देशी,हर पल अपनी जडो से जुडने की कोशिश करते रहते हे, हर एक पल जो उन्होने भारत मे बिताया उस की यादो मे बिताते हे, कोई जब अपना (भारतीया) मिले तो पलो मे उस से सारी बाते करने को बेचेन हो उठते हे, होली दिपावली भी ऎसे मानाते हे जेसे कोई रस्म पुरी करना चाहते हो, आप की इस पोस्ट से कई बाते अपनी सी लगी, ओर दिल किया जल्द से जल्द उगल दु, धन्यवाद, आप ने याद दिलाया तो..........

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  13. kya kahu Anuraag jee aapke Kunal ki taarif ke liye shabd nahi mil rahe.bus nayano ki pichkaari se rang nikalta sa lag raha hai

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  14. भीगा हुआ था मै अपनी दो नयनो कि पिचकारी से, रंग सफेद था पर दाग जा नही रहे थे, रुह तक रिसते हुये कुछ नमक मानो दो बून्द खून से माफी मांग रहे थे|

    aapne kitni der kee kunal ko padhwane mein.dil ka dard udel kar rakh diya jo seedhe hamare dil tak pahunch gaya. kunal se kahiye ki wo bhi blog banaye apna.

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  15. आप को धन्यवाद कुणाल से मिलाने का। और कुणाल को बधाई। उस ने वतन की आग को दिल में जला कर रखा।

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  16. माँ-बाप तो भागते नही, (भागती तो संतान है)

    -भावुक कर गई कुणाल के जादुई शैली. लगा कि खुद की कहानी बांच रहे हैं. बहुत बधाई मित्र ऐसे उम्दा लेखन के लिए और अनुराग, आपका बहुत बहुत आभार.

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  17. अनुराग जी, बहुत अच्छा लगा, क्या लिखते हैं आप, पढ़कर अच्छा लगा। बहुत ही उम्दा, अति उत्तम।।।।

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  18. मेरे दिल की बात को अगर अनुराग भाई के "दिल की बात" मे जगह मिल गई तो मेरे लिये इससे बडी सम्मान की बात नही हो सकती और मै उनका और आप सब का बहुत आभारी हुँ कि आप सब मेरी संवेदना के वाहक बने और जिस मर्म को मैने कभी मह्शुश कर लिखा, आज आप सब उसमे भींगे हुये है| अनुराग भाई का जब मुझे sms मिला कि मेरा post उनके ब्लोग पर है तो मेरी खुशी की सीमा नही रही क्योकी मै चाह कर भी अपना ब्लोग कभी बना नही सका पर ये दिली ख्वाईश थी की लोग इसे पढे और जाने की परिवार, त्योहार का महत्व क्या होता है क्योकी जब हम घर के करीब होते है तो इन भावनाव को नही समझ पाते पर यकीन मानिये इनकी अहमियत क्या है वो देश से दुर बैठे हम जैसे लोगो से पुछिये जो इसकी इतनी बडी कीमत चुकाते है| अगर आप सब इस बार की होली/दिपावली अपने माँ पिताजी के साथ मनायेंगे तो ये लेखनी मेरे लिये और भी सार्थक होगी|

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  19. अति सुंदर.
    आपकी लेखनी का जवाब नहीं.
    बहुत सी होली की यादें ताज़ा ही आई अपनी भी.
    बहुत खूब लिखा.

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  20. कुणाल को पढ़ा तो बहुत है.. जैसा अनुराग जी ने कहा उनकी हिन्दी का जवाब नही.. उनकी त्रिवेणिया हमेशा से ही मनलुभावन होती है.. आज ये संस्मरण पढ़कर तो निशब्द ही हू.. अनुराग जी आपका भी आभार अपनी ब्लॉग पर कुणाल से मुलाकात करवाने के लिए..

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  21. कुनाल जी के संग उनकी यादों के कारवां के संग चलना बहुत अच्छा लगा, उनके दिल की बात आपने यहाँ हमारे साथ शेयर कर के बहुत ही अच्छा काम किया है, दिल के सारे जज़्बात उन्होंने इस पोस्ट में पिरो डाले हैं, बिल्कुल ऐसे लगा जैसे मैं उनकी यादों के साथ जी रही हूँ,लिख देना और जज्बों की सच्चाई के साथ लिखने में बड़ा फर्क है,कुनाल जी के जज्बों की सच्चाई अपनी पूरी शिद्दत से दिखाई दे रही है....अकेलेपन का दर्द हर हर लफ्ज़ के साथ बोल रहा है...बहुत शानदार पोस्ट...थैंक्स अनुराग जी...


    नज़्म नही लिख पाने की वजह समझ में आगई है....

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  22. बहुत ही खूबसूरत लिखा है. हम सभी को अपने बचपन की होली की याद आ गयी. हमारा बचपन भी ऐसे ही बीता है. परदेस मैं रहकर अपनों और उन होलियो को याद करना वाकई भावुक कर गया.

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  23. रुह तक रिसते हुये कुछ नमक मानो दो बून्द खून से माफी मांग रहे थे|
    ??????????????I am speechless...
    great...

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  24. लेख पढकर बरसों पहले लिखा ये शेर याद आ गया...

    "वो बार बार मुड के देख रहा था घर को,
    कोइ ज़हीन आज कामयाब है शायद..."

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  25. kuchh kucch mere jaisa hi dard hai.. aur maine to pichhle 5 saalon se koi tyohaar apne maa-daddy ke saath nahi manaya... shaadi jo ho gayee...
    iska yah katai matlab nahi hai ki sasural me tyohar achhe nahi lagte....
    par kya karen dil hai ki.......
    aap ladko ko kam se kam yah dard to nahi jhelna padta na!!
    haan videsh me desh ki bahut yaad aati hai... khaskar jab tyohar ho to... bhagwaan kare agli holi-diwali aap aur aapka pariwaar saath manaye..

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  26. अनुराग जी
    जैसे आप वैसे ही आप के मित्र...दूर देश बैठे अपने वतन को याद व्यक्ति की पीड़ा बखूबी व्यक्त की है कुणाल जी ने...उन्होंने अपनी बात कहने में सिर्फ़ शब्दों का सहारा ही नहीं लिया उसमें अपने भाव भी पूर्ण रूप से प्रवाहित किए हैं...तभी ये पोस्ट इतनी असरदायक बन पड़ी है...
    जो लोग देश छोड़ के बाहर रोजगार की तलाश में जाते हैं उन्हें कितनी बड़ी कीमत अदा करनी पड़ती है ये दर्शाती है कुणाल की पोस्ट...
    शहरयार साहेब का एक शेर है:
    आगाज़ क्यूँ किया था, सफर उन ख्वाबों का
    पछता रहे हो सब्ज़ जमीनों को छोड़ के
    नीरज

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  27. I read this previously in gulzar forum...and i was fan of Kunal...he is superb..hats off

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  28. कुणाल जी ने बड़ी खूबसूरत पोस्ट लिखी है. दिल से लिखी है. संवेदना की धरा बहा गए.

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  29. हमेशा की तरह शानदार लेख ! बहुत ही जज्बाती !
    तारीफ़ के लिए शब्द कम पड़ेंगे ! डाक्टर साहब
    कभी तो ख़राब लिखो जिससे आपकी आलोचना
    का मौका तो मिले ! :)

    बहुत बहुत शुभकामनाएं !

    उत्तर देंहटाएं
  30. हमेशा की तरह शानदार लेख ! बहुत ही जज्बाती !
    तारीफ़ के लिए शब्द कम पड़ेंगे ! डाक्टर साहब
    कभी तो ख़राब लिखो जिससे आपकी आलोचना
    का मौका तो मिले ! :)

    बहुत बहुत शुभकामनाएं !

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  31. wah! aapki purani yaadein hamesha khaas hoti hai....kaafi lamba bhi likhte hain.. itni vyast zindagi ke bavjood:)

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  32. Kyon Rulaana chaahte hain Doctor Saahab... AaJ kal main bhi US Mein hi hoon to kuchh jyaada hi chho gayi ye post. Aajkal thoda vyast ho gaya hoon, bahut dino ke baad aaj blog jagat mein wapas aa paaya.

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  33. बहुत खूबसूरत! अनुराग और कुणाल दोनों ही को बहुत बधाई!

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  34. "बेटा तुम्हारे बाबा ने तो उसी बार आखिरी बार अबीर को छुआ था जब तुम 1st year मे होली मे आये थे और मै अब पकवान बनाती नही क्योकी बिना तुम लोगो के कोई पकवान हमसे खाये नही जाते|


    kahane ko kuchh bhi nahi hai

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  35. भीगा हुआ था मै अपनी दो नयनो कि पिचकारी से, रंग सफेद था पर दाग जा नही रहे थे, रुह तक रिसते हुये कुछ नमक मानो दो बून्द खून से माफी मांग रहे थे|
    बहुत खूबसूरत! अनुराग और कुणाल दोनों ही को बहुत बधाई!

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  36. kunal ji ki is post ko pehle bhi padha ...aaj phir padha. Videsh me rehkar unke is lekh ko bahut gehraayi se mahsoos karta hoon. is baantne ke liye dhanyawaad

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  37. यकीन जानिए आपने मुझे अंदर तक भिगो दिया। यह पोस्ट आपकी बहुत ही यादगार रही।

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  38. Yakiinan bahut hi baavuk post hai....

    Shaayad hum jaise kuch kamzor dil log isi liye apni mitti se door jane se inhetaat rahte hain...

    "Ke door ja kar apni mitti se kya paooNga,
    Faqat kuch bechainiyon mein lipat jaaoNga"

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  39. उम्मीद है अब कुनाल अपना एक नया ब्लॉग बनायेगे ओर गाहे बगाहे कुछ न कुछ हम लोगो से बांटेगे...आप सभी लोगो का ढेरो शुक्रिया....

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  40. Mai Kunal ke sath uske office me hun. Kahani par kar bahut muskil ho gaya faisla karna ki.. kaun sa talent jayada kabile tariph hai. Chahe wo software skills hoan ya lekhan kala "Kunal to kamal ka hai".
    Deepak (Dave)

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  41. कुणाल के साथ उनकी होली के बदलते हुए रंगों के अनुभवों ने मानस को पूरी तरह भिगो दिया

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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