2008-08-09

एक ओर दिन खर्च हो गया जिंदगी का



रोज सुबह जिंदगी अपने झोले में से नया दिन निकालती है , ओर सूरज अखबार के साथ दिन भर का हिसाब आँगन में फेंक देता है अपनी अपनी जेबों में अपना अपना हिसाब लिए हम पूरा दिन खर्च कर देते है मायूस ओर थका सा चाँद भी जैसे कोई रस्म अदा करने फलक पे आता है ,उम्र इसी हिसाब किताब में गुजर रही है इक उम्मीद मगर रोज सिरहाने साँस लेती है की कल कोई मौजजा होगा .....




कई बार झंझोडा है
गुजरे वक़्त के सफ्हो को
कई बार झाँका है
दीवार के उस जानिब .......
अल्फाज़ फेंके है जोर से दूर तक
नाम लेकर गली गली घूमा हूँ
पिछले कई रोज से
सन्नाटा है जिस्म में
कोई आहट कही सुनाई नही देती
जिंदगी की पेचीदा गलियों में
गुम हो गयी है खुशी

सोचता हूँ थाने में रपट करवा आयूँ

43 टिप्‍पणियां:

  1. बाकी सब ठीक है पर अनुराग जी थाने जाने की गलती मत कर लेना , फ़िर कई अगले कई दिन पिछले एक दिन को ढूढने मे पुलिस थाने मे ही बिताने पडेगे. जब पुलिस वाले खाली आपसे तफ़शीश शुरू. :)

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  2. अनुराग जी, बधाई..
    आपकी भावाभिव्यक्ति सदैव ही प्रशंसनीय रही है.
    हां..............
    पंगेबाज की सलाह भी बढिया है..

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  3. अनुराग जी, गुम हो गई हे खुशी.. बहुत ही उम्दा कविता कही हे आप ने, इस के लिये धन्यवाद.
    अगर थाने मे जाना तो तो ताऊ को साथ ले जाना उस की जान पहाचान पुरानी हे ताई के कारण,

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  4. :) एक अनुभव ही रहेगा अगर थाने हो आये. कई कवितायें एहबएक बन पड़ेंगी बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के. शुभकामनाऐं.

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  5. बहुत अच्छी कविता लिखी है।
    घुघूती बासूती

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  6. अनुराग जी, इसी उम्मीद के सहारे लोग पूरी जिदंगी गुजार जाते हैं। कि कल का दिन अच्छा होगा।
    रोज सुबह जिंदगी अपने झोले में से नया दिन निकालती है , ओर सूरज अखबार के साथ दिन भर का हिसाब आँगन में फेंक देता है

    वाह जी क्या बात। कविता का भी हर बार की तरह जवाब नही। पर सोच कर भी थाने जाने की मत सोचना रपट लिखाने क्योंकि .........।
    कही पढा था अनुराग जी कि
    "खुशी" तितली की तरह होती है जितना आप उसके पीछे भागोगे। वह आपको चकमा दे कर उड़ जाऐगी पर अगर आप अपना ध्यान दूसरी चीजों पर लगाऐगे। वह चुपके से आऐगी। और आहिस्ता से आपके कंधे पर बैठ जाऐगी।

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  7. भाई डा. अनुराग जी भूल कर भी थाने मत जाना ! भले ही
    इच्छा हो तो कुँए में छलाँग लगाने की सोच लेना ! भाटिया
    जी ने क्या क्या मजे नही लिए हैं ! और भाई आपकी इच्छा
    अगर फ़िर भी होती हो तो आपकी मर्जी ! ताऊ के तो थाने
    वालों ने बुरे हाल कर दिए ! आपने सब कुछ हमारी दूकान
    पर पढ़ ही लिया होगा ! अभी तक हड्डियां दुःख रही हैं !

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  8. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  9. मेरा तो आज का दिन एक काली गाय ढूंढते हुए ही खर्च हो गया......गाय मिली भी नही और उपर से समीरजी मेरी पोस्ट पर कह आए कि जब तक काली गाय नहीं ढूंढ लोगे मुक्ति नही मिलेगी.....मैं भी सोच रहा हूं कि थाने में रपट कर दूं ताकि मुक्ति मिले....लेकिन डरता हूं कहीं मुक्ति के चक्कर में अंदर न हो जाउं......पशु आहार में घालमेल करने के आरोप में(बौडम महाराज तो पपीता खिलाओ कह के चले गए).......ईधर रामपुरिया ने और डरा दिया है......कि थाने मत जाना बल्कि कुएं की ओर बढ जाना।
    चलिए हम दोनो साथ ही थाने चलते हैं, शायद काम बन जाय, शिकायत तो एक ही है...हमारा दिन खर्च हो गया :)
    कविता अच्छी लिखी है।

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  10. उम्र इसी हिसाब किताब में गुजर रही है इक उम्मीद मगर रोज सिरहाने साँस लेती है की कल कोई मौजजा होगा .....

    बेशक हर एक ज़िन्दगी इसी उम्मीद पे मुसलसल बढी जा रही है ...


    सुंदर नज़्म कही है.... ज़र्रा ज़र्रा अनुरागी है!

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  11. अल्फाज़ फेंके है जोर से दूर तक
    नाम लेकर गली गली घूमा हूँ
    पिछले कई रोज से
    सन्नाटा है जिस्म में
    कोई आहट कही सुनाई नही देती

    आज आपकी नज्म में ये उदासी की आवाज क्यों आ रही है

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  12. kya kahun, ab kehne ko rah gaya.kal koi maujja hoga bas is umeed ke sahare hai hum bhi.behtareen anuraag jee,badhai

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  13. गुमशुदा खुशी की तलाश हो
    और खुशी दुगुनी होकर आये -
    - लावण्या

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  14. yah kharch hone ki bat na kahen, yanha sabhi kuch kharch hona hai. khushi jarur chahiye par talashne se nahi milegi wo to aapke andar hai jab aise hi baithe honge to chupke se aajayegi. Baharhal puliswale to aapse lakhon sawal poochenge kaun khushi kiski khushi aapki ya kisi aur ki aur fir karcha kitana karenge aap, wo bhi.

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  15. हो सकता है गिरहबान में हो .. या पेशानी में .. [:-)]

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  16. हमें भी यही अनुभव होते हैं।
    थाने हो आये क्या?

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  17. ब्लागजगत ने आप की रपट दर्ज कर ली है। कुछ ब्लागरों को खुशी तलाश करने के काम में लगा दिया गया है। सारे ब्लागर्स को सामान्य हिदायत जारी की गई है कि कहीं भी खुशी दिखाई दे उसे थाने में हाजिर कर आप को थाने तलब किया जाए।

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  18. थाने जाकर खुशियाँ ढुढवाएंगे? बौरा गए का? ...वो तो आप के झोले में ही उलझी पड़ी है।

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  19. आपकी इस नज़्म का मर्म रंजन साहब ने समझा है अनुराग जी ,आजकल की भागती दौड़ती जिंदगी में हम इतना मशगूल हो गए है की मुस्कराए भी जमाना बीत जाता है यही इस नज़्म की "फिलोसफी" है ओर उसे आपने शुरू में बयाँ भी किया है ,बिलकुल "गुलजारिश" अंदाज़ में .बहुत दिनों बाद आपकी नज़्म आयी.आखिरी लाइन अपने आप में एक मर्म है.

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  20. kharch karne ko ek jagah aur mil jayegi fir to....

    aur apka kya hoga janaabe aali

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  21. अपनी अपनी जेबों में अपना अपना हिसाब लिए हम पूरा दिन खर्च कर देते है मायूस ओर थका सा चाँद भी जैसे कोई रस्म अदा करने फलक पे आता है ,उम्र इसी हिसाब किताब में गुजर रही है इक उम्मीद मगर रोज सिरहाने साँस लेती है की कल कोई मौजजा होगा .....









    sach me bada mushkil hai aajkal ki zindgi me

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  22. थाने जाने की ज़रूरत नहीं है...हमारे साथ आकर एक प्याला कॉफी पीजिये और खुश होकर घर जाइये....:) सुन्दर नज़्म!

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  23. जरुर जाइये पर कागज और १००० रुपये साथ ले जाइएगा ...रिपोर्ट के लगतें है

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  24. सन्नाटा है जिस्म में
    कोई आहट कही सुनाई नही देती
    इस सन्नाटे की खबर नहीं मिलती उस अखबार में जिसमें दिनों का हिसाब लिखा मिलता है.

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  25. खुबसूरत ख़यालात... खुबसूरत तरीके से और खुबसूरत सलीके से.

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  26. एक पोस्ट जो सिर्फ़ और सिर्फ़ अनुराग जी ही लिख सकते हैं....तारीफ के लिए खर्च करने को लफ्जों की रकम बेमानी है...अनमोल का क्या मोल????
    नीरज

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  27. थाने जाकर रपट कराने से कुछ नहीं होगा,कोई बेईमान आफ़ीसर फिर आपको दुखी कर देगा! किसी भूखे बच्चे को खाना खिलाकर देखिए, ख़ुशी कहाँ रहती है!

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  28. भाई करीब कई पोस्ट पढ़ गया.रचना-धर्म का पालन आप बखूबी कर रहे हैं.
    बस यही दुआ है जोर-क़लम और ज़्यादा.

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  29. पिछले कई रोज से
    सन्नाटा है जिस्म में
    कोई आहट कही सुनाई नही देती
    जिंदगी की पेचीदा गलियों में
    गुम हो गयी है खुशी
    -------
    ...जो इतनी खुबसुरती से जीवन के हर पहलु को कागज मे उकेरता है, दुसरो के सुख से चहचहाता है, दुसरो की पीडा देख कर गमगीन हो जाता है और जिसके इतने चाहने वाले हो, उसकी खुशी ज्यादा देर तक गुम रह ही नही सकती है| अनुराग भाई थाने जाने की कोई जरुरत नही है मै तो कह्ता हुँ अपने ब्लोग पर काला टीक्का लगा लो, नजर-गुजर लग गई होगी| ये चाँद कोई थका थका नही है, बहुत शैतान है, आपसे बसे एक सुन्दर सा कविता लिखवाना चाहता था... आज सुबह कुछ देखा आपने? सुरज कीतनी लालीमा और जीवनता बिखेर कर उस चाँद को मुँह चिढा रहा था?

    मेरी वो हाल मे लिखी सुकुन वाली त्रिवेनी पढी थी?

    ----------------------------
    सुकुन ना हुआ जैसे पीठ की खुजली
    पास ही होती है पर पहुँच नही होती..

    साथ ना दो, फुँक ही दो, की करार आये
    ----------------------------
    चलो मै यहाँ से फुँकता हु:)

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  30. अरे!!! ऐसा कैसे??? खुशी कहाँ गयी???
    थाने मत जाइए... बची खुची भी चली जायेगी. इससे अच्छा तो यह है की आप समीर जी या ताउजी की कोई भी पोस्ट पढ़ लें..... कम से कम चहरे पर एक सेमी-सर्कल तो बन ही जाएगा....


    अच्छा अच्छा समझ आ गया.... आपकी पोस्ट पर भी हम दूसरों की तारीफ़ कर रहे है इसीलिए खुश नहीं है????
    चलिए भाई मजाक बंद....... बिल्कुल बंद.........

    बहुत बहुत अच्छा लिखा है.... कल्पना को फिर भी मिलाया जा सकता है, पर जज़्बात को कलम से मिलाना और इतने खूबसूरत और भावपूर्ण ढंग से मिलाना आपका जादू ही हो सकता है.....

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  31. अरे!!! ऐसा कैसे??? खुशी कहाँ गयी???
    थाने मत जाइए... बची खुची भी चली जायेगी. इससे अच्छा तो यह है की आप समीर जी या ताउजी की कोई भी पोस्ट पढ़ लें..... कम से कम चहरे पर एक सेमी-सर्कल तो बन ही जाएगा....


    अच्छा अच्छा समझ आ गया.... आपकी पोस्ट पर भी हम दूसरों की तारीफ़ कर रहे है इसीलिए खुश नहीं है????
    चलिए भाई मजाक बंद....... बिल्कुल बंद.........

    बहुत बहुत अच्छा लिखा है.... कल्पना को फिर भी मिलाया जा सकता है, पर जज़्बात को कलम से मिलाना और इतने खूबसूरत और भावपूर्ण ढंग से मिलाना आपका जादू ही हो सकता है.....

    उत्तर देंहटाएं
  32. aaine ke samne dekh ke mushkura dijiye......khushi mushkura degi aapko dekhkar........waise aapka beta bhi aapke liye aaine se kam to nahi .... :)

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  33. खुशी दर्द ..:) अच्छा लिखा आपने .उदासी आप पर अच्छी नही लगती ..पर आपकी लिखी बात दिल को छूती है ..क्यूंकि ज़िन्दगी का एक सच यह भी है ..

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  34. पिछले कई रोज से
    सन्नाटा है जिस्म में
    कोई आहट कही सुनाई नही देती
    जिंदगी की पेचीदा गलियों में
    गुम हो गयी है खुशी

    सब से पहले तो शुक्रिया इस नज़्म के लिए, लेकिन ये क्या अनुराग जी, लेकिन ये क्या, आप उदास क्यों हैं?
    वैसे हैरानी ज़्यादा नही है क्योंकि आप जैसा इंसान सिर्फ़ ख़ुद के लिए ही उदास नही हो सकता, दूसरों के दुःख जिसे बोझल कर देते हों, मेरी नज़र में ऐसे इंसान हैं आप, मैं वजह तो नही पूछूंगी लेकिन बस इतना कहूँगी कि बल्कि दुआ करुँगी कि आपकी सारी उदासी ख़त्म हो जाए और आप मुस्कुरा दें...
    नज़्म के आख़िर में जो लाइन है,''सोचता हूँ थाने में रपट करवा आयूँ'' थोड़ा सा चौंकाती है, क्योंकि ये आपकी स्टाइल से मेल नही खाती, वैसे तो नयापन है इस में लेकिन आपकी स्टाइल में जो दिलकशी और रूमानियत है उसे वैसे ही रहने दें....वही आप पर सूट करता है. फिर भी नज़्म की तारीफ़ तो करनी पड़ेगी.

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  35. कई बार झंझोडा है
    गुजरे वक़्त के सफ्हो को
    कई बार झाँका है
    दीवार के उस जानिब .......
    अल्फाज़ फेंके है जोर से दूर तक
    नाम लेकर गली गली घूमा हूँ
    पिछले कई रोज से
    सन्नाटा है जिस्म में
    " khyalon ko bdee hee khubsurtee ke sath sabdon ke moteeyon mey peeroya gya hai, ek ek sabd apne aapmey ekfsana sa kehta hai, behtreen"

    Regards

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  36. अल्फाज़ फेंके है जोर से दूर तक
    नाम लेकर गली गली घूमा हूँ
    पिछले कई रोज से
    सन्नाटा है जिस्म में

    बहुत बहुत अच्छा लिखा है....

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  37. main to kahungi ki thane mer report kara hi dijiye, koi problem bhi aayi to khushi ki talash ke liye itna to banta hai...
    par khushi ko thane wale dhoondh paayenge kya,shayad khud hi talash karni hogi,warna wo kuch aur laa ke kahenge...ye lo ji apni khushi samhalo aur hamein free karo...mushkil ho jaayegi

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  38. रंजना जी,जाकिर साहेब ,रक्ष्नान्दा ,पूजा ....ढेरो शुक्रिया ...दरअसल ये नज़्म उदास नही है ....मै सिर्फ़ ये कहना चाहता था की आजकल की भागदौड़ की जिंदगी में हम इतना मशगूल हूँ गए है की खुशी के लिए भी टाइम सेट कर देते है.....ओर खुशी धीरे धीरे गुम हो रही है....ये हम सबका फ़साना है......
    गुलज़ार जी का भक्त हूँ....इसलिए उन्ही के स्टाइल में आखिरी लाइन डाली है....

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  39. ham bhi dhundh rahe hain, thane se kuchh achcha feedback mila ho to ham bhi rapat likhwa hi aayein. ham to kab se dhundh rahe hain !

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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